शिष्ट जीवन आचरण ही है अहिंसा का मूल

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।


सही और गलत पर बहुत व्यापक बहस है। किसी व्यक्ति के लिए कुछ चीजें सही होती हैं तो हो सकता है कि वे ही किसी दूसरे के लिए सही नहीं हों। मनुष्य सामाजिक प्राणी है, और समाज का हिस्सा है, इसलिए उसके आचरण व्यक्ति और समष्टि के लिए कैसे हों, इस पर विचार अवश्य करना चाहिए। विचारशील व्यक्ति ऐसा करता ही करता है। हम प्रायः विचारशील उन्हें मान बैठते हैं जो पढ़े-लिखे हैं। लेकिन यह अर्द्ध-सत्य है। हर पढ़ा-लिखा व्यक्ति बुद्धिमानी से सब निर्णय लेता है यह सही नहीं है। बल्कि यदि पुराकाल से अब तक के इतिहास की पड़ताल करें तो यह पायेंगे कि पढ़े-लिखे लोगों द्वारा ज्यादा अनीति की गयी है। उनके द्वारा सिस्टम खराब हुआ है। उनके द्वारा सामाजिक व्यवस्था प्रभावित हुई है। उनके द्वारा अतिक्रमण हुआ है। दीक्षित लोगों की बात यहाँ नहीं की जा रही है। डिग्रीधारी होना ही तो आज के समय में पढ़ा-लिखा होना है। जबकि दीक्षित होना कई संस्कारों का समुच्चय है। तो पढ़े-लिखे लोगों द्वारा सत्य को झूठ और झूठ को सत्य साबित किया गया है। बल्कि अपढ़ और कम पढ़े लिखे लोगों ने सरोकार को महत्त्व दिया है। आपसी भाईचारे की मिसाल पेश की है। वे अतिक्रमण नहीं करते और एक-दूसरे के सुख-दुःख में शामिल भी होते हैं। यह संस्कार ग्रामीण सभ्यता में ज्यादा मिलता है। देसज लोगों में मिलता है। यह संस्कार उनको परिपाटी से मिला है, विरासत में मिला है। उनकी परिपाटी है कि वे सरोकार रखते हैं। उन्हें सौदा नहीं करना होता इसलिए। वह बदले में कुछ नहीं चाहते इसलिए भी वे सरोकार रखते हैं। दीक्षित वे तो अपने सामासिक संस्कृति से हो जाते हैं, इस सभ्यता का इसलिए उनमें विकास हो जाता है। देखा यह गया है कि उसी समाज का व्यक्ति जब स्वघोषित सभ्यता का स्वांग रचने लगता है तो उसमें सौदेबाजी आ जाती है। अनिर्णय की स्थिति में व्यक्ति यदि कुछ ऐसा कार्य करता है जो वह नहीं करना चाहता था तो यह बात अलग है लेकिन यदि पूर्णतया जानबूझकर ऐसा कार्य करे जिसमें पूरी समष्टि का अहित समाहित हो तो वह अपराध है। पढ़े-लिखे लोगों की अनिर्णय की कथाएँ ज्यादा मिलती हैं। उनका पढ़ना-लिखना उनकी चालाकी के कारण ऐसे अनिर्णय की स्थिति में उन्हें रखता है जिसका परिणाम हमें नकारात्मक मिला वरना यदि वे विवेक को समष्टिगत भाव से प्रयोग में लाते तो उसका परिणाम सामाजिक और अन्य कई रूपों में जनहितकारी हो जाता है। दुनिया के विभिन्न कोने में यदि हमें विवेकशील लोगों के बहुत से अच्छे और जनोपयोगी कार्यों की मिसाल मिलती है उसकी वजह यही है कि वे अपने विवेक को प्रत्येक वैयक्तिक की गरिमा के साथ जोड़कर खड़े रहे।

आचार प्रभावो धर्मः, जिसका अर्थ है उपयुक्त आचरण ही धर्म है, कह कर व्यक्ति के वैयक्तिक आचरण का महत्त्व बताया गया है। सामूहिक में वैयक्तिक आचारगत गरिमा को धर्मों में भी विशिष्ट स्थान मिला है। वैसे तो लौकिक दृष्टि से देखा जाये तो धर्म मानव के कर्त्तव्य भाव में भी शास्त्रसम्मत बताया गया है। कर्म को साधनों के रूप में आत्मसात करने और सदाचरण से अपने धर्म का निर्वाह करने की बात भी शास्त्रों में मिलती है। हाँ, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि व्यक्ति की रुचि एवं परिस्थितियों के अनुसार कभी किसी चीज को ज्यादा महत्त्व मिला कभी किसी चीज को। परन्तु किसी एक की बहुतायत सामाजिक विकार के कारण भी बने। इससे हिंसा को बल मिला। इससे पाप को बल मिला। इसे अतिक्रमण को बल मिला। इससे असमानता व्याप्त हुई। ये असमानता, अतिक्रमण, अपमान और अन्य मानवीय विकार हिंसा की जड़ों में हैं। इससे मनुष्य का सीधा युद्ध सदियों से चला आ रहा है। पढ़े-लिखे लोग आडम्बर फैलाकर हिंसा को प्रसारित करने में बहुत चतुराई दिखाए हैं। सहज व्यक्ति इस हिंसा का शिकार हुआ है। लेकिन सहज और सीधा व्यक्ति यह सहने के लिए बाध्य नहीं है और ना ही चतुर लोगों को सहज व्यक्तियों पर अपने चतुराई का वज्रपात करने का हक है। भारतीय जीवन दर्शन के अनुसार मनुष्य के जीवन का उद्देश्य भी है। उसका उद्देश्य हिंसा फैलाना कतई नहीं है। वैर भाव रखना तो कदापि नहीं है। हिंसा और वैर-भाव मनुष्य की खूबसूरती को नष्ट कर देते हैं। उसके अंतर्मन को दूषित कर देते हैं। उसकी मूल चेतना को जो प्रकृति से उसे मिली है उसे भटका देते हैं। इसीलिए भारतीय दर्शन में बाह्य की जगह आंतरिक चेतना को ज्यादा महत्त्व दिया गया है। तथ्य और सत्य में फ़र्क नीर और क्षीर की भांति मनुष्य ही कर सकता है इसीलिए हर तथ्य सत्य ही होगा इस पर बहस होती है और तथ्य का सत्य जानने पर ही न्याय का प्रतिपादन हो पाता है। यह न्याय ही तो अहिंसा है। सत्य ही तो अहिंसा है। तथ्य हिंसक हो सकता है पर न्याय और सत्य हिंसक नहीं हो सकते। निर्णय हिंसक हो सकता है पर न्याय तो ईश्वर का दूसरा रूप है जैसे सत्य अहिंसा का दूसरा रूप है ऐसा शास्त्रों में कहा गया है।

टॉलस्टॉय की एक कहानी ‘What Men Live By’ का हिंदी अनुवाद प्रेमचंद ने ‘मनुष्य का जीवन आधार क्या है?’ शीर्षक से किया है। इस कहानी में टॉलस्टॉय ने उस पक्ष को दर्शाने का प्रयास किया जिसका भ्रम प्रेम के बरक्स प्रायः अपने उन आचार-व्यवहार में हम देखते हैं जो सच नहीं होता। इस कथा में दो पात्रों के संवाद के जरिए टॉलस्टॉय ने कथा बुनने का प्रयत्न किया है। प्रेमचंद कृत अनुवाद में दो पात्रों माधो और मैकू के साथ कथा का अंश इस प्रकार है -

माधो— परमेश्वर ने यह दंड तुम्हें क्यों दिया था? वे तीन बातें कौन सी हैं, मुझे भी बतलाओ। मैकू— मैंने भगवान की आज्ञा न मानी थी, इसलिए यह दंड मिला था। मैं देवता हूँ, एक समय भगवान ने मुझे एक स्त्री की जान लेने के लिए मृत्युलोक में भेजा। जाकर देखता हूँ कि स्त्री अति दुर्बल है और भूमि पर पड़ी है। पास तुरन्त की जन्मी दो जुड़वाँ लड़कियाँ रो रही हैं। मुझे यमराज का दूत जानकर वह बोली— मेरा पति वृक्ष के नीचे दबकर मर गया है। मेरे न बहन है, न माता, इन लड़कियों का कौन पालन करेगा? मेरी जान न निकाल, मुझे इन्हें पाल लेने दे। बालक माता-पिता बिना पल नहीं सकता। मुझे उसकी बातों पर दया आ गई। यमराज के पास लौटकर मैंने निवेदन किया कि महाराज, मुझे स्त्री की बातें सुनकर दया आ गई। उसकी जुड़वाँ लड़कियों को पालनेवाला कोई नहीं था, इसलिए मैंने उसकी जान नहीं निकाली, क्योंकि बालक माता-पिता के बिना पल नहीं सकता। यमराज बोले— जाओ, अभी उसकी जान निकाल लो, और जब तक ये तीन बातें न जान लोगे कि 1) मनुष्य में क्या रहता है, 2) मनुष्य को क्या नहीं मिलता, 3) मनुष्य का जीवन आधार क्या है, तब तक तुम स्वर्ग में न आने पाओगे। मैंने मृत्युलोक में आकर स्त्री की जान निकाल ली। मरते समय करवट लेते हुए उसे एक लड़की की टांग कुचल दी। मैं स्वर्ग को उड़ा, परन्तु आंधी आयी मेरे पंख उखड़ गए और मैं मन्दिर के पास आ गिरा। मनुष्य शरीर में मैं केवल इस कारण जीता बचा कि तुमने और तुम्हारी स्त्री ने मुझसे प्रेम किया। वे अनाथ लड़कियाँ इस कारण पलीं कि एक स्त्री ने प्रेमवश उन्हें दूध पिलाया। मतलब यह है कि प्राणी केवल अपने जतन से नहीं जी सकते। प्रेम ही उन्हें जिलाता है। पहले मैं समझता था कि जीवों का धर्म केवल जीना है, परन्तु अब निश्चय हुआ कि धर्म केवल जीना नहीं, किन्तु प्रेमभाव से जीना है। इसी कारण परमात्मा किसी को यह नहीं बतलाता कि तुम्हें क्या चाहिए, बल्कि हर एक को यही बतलाता है कि सबके लिए क्या चाहिए। वह चाहता है कि प्राणिमात्र प्रेम से मिले रहें। मुझे विश्वास हो गया कि प्राणों का आधार प्रेम है, प्रेमी पुरुष परमात्मा में, और परमात्मा प्रेमी पुरुष में सदैव निवास करता है। सारांश यह है कि प्रेम और परमेश्वर में कोई भेद नहीं।

इस रहस्य को यदि यमराज अपने दूत को न समझाते तो प्रेम की महत्ता वह नहीं समझ पाता। वह ज्यादा काबिल था और विधि को भी एक बार चुनौती देते हुए उस महिला के प्राण नहीं निकाले। किन्तु उसे प्रेम की उस पराकाष्ठा के लिए किए गए ईश्वर के विधान की समझ नहीं थी इसलिए उसने यमराज से निवेदन किया। जबकि यहाँ प्रेम की उपस्थिति से उस मूल्य को प्रकट करने की कोशिश थी जो समाज के लिए मिसाल बने। उसकी कीमत समझ आए। इस कथा के माध्यम से यदि मनुष्य के स्वभाव को समझने की कोशिश की जाये तो यह प्रतीत होता है कि अनिष्ट में भी इस जगत में रहस्य जरूर है। उसे स्वीकार करना चाहिए लेकिन प्रेम के मूल्य को भी समझना आवश्यक है शायद इसे समझ लेना ही हिंसा से अहिंसा की ओर बढ़ने का सही मार्ग प्रशस्त होता है। प्रेम से ही सरोकार की भावना बढ़ती है। जो एक शिष्ट समाज की विशेषता है। शिष्ट होने का मतलब पढ़ा लिखा कतई न समझें बल्कि शिष्टता तो हमारी विरासत है। हमारी अपने पूर्वजों की संजोई हुई और परम्परागत तरीके से जीवन जगत में अपनाई जाने वाली शक्ति भी है। इस शिष्टता की मिसाल यदि अपने परिवार से ही लें तो यदि आप अपने परिजन, माँ-पिता और बड़ों का आदर करते हैं तो वह घर में छोटे बच्चे के मन मस्तिष्क पर असर डालता है। हम देखेंगे कि घर के बच्चे भी अपने बड़ों के साथ वैसा ही व्यवहार करते हैं।

उपरोक्त उदाहरण वाला बच्चा किसी विद्यालय से डिग्री लेकर नहीं आया लेकिन सहज ही शिष्ट व्यवहार करने लगा। वह प्रेम भी करने लगा यह प्रेम ही उसको अहिंसक भी बना देता है क्योंकि उसकी सम्पूर्ण गतिविधि प्रेम के अधीन हो चुकी होती है इसलिए वह ऐसा व्यवहार करता है। इस भाव की व्युत्पत्ति कैसे वृहत्तर पैमाने पर बढ़ाई जा सकती है इस पर यदि समाज के सब लोग विचार करना शुरू कर दें तो एक मनोरम वातावरण का उद्भव स्वतः हो जायेगा। इसे परिभाषित करने की फिर जरूरत नहीं पड़ेगी कि यह एक अहिंसक मनोवृत्ति वाला समाज है।

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