पी.सी. बरुआ और सहगल की ‘देवदास’

अरविंद कुमार

क्लासिक फ़िल्म

“लगता है मेरा जन्म ‘देवदास’ लिखने के लिए हुआ था और तुम्हारा उसे परदे पर नया अर्थ देने के लिए।”
– शरत् चंद्र चट्टोपाध्याय (पी.सी. बरुआ से)

लेखक:अरविंद कुमार
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1935 में न्‍यू थिएटर्स ने प्रमथेश चंद्र बरुआ के निर्देशन में देवदास पर पहली बोलती फ़िल्म बांग्ला भाषा में बनाई, फिर हिंदी और असमिया में। इन्होँ ने देवदास कल्ट को पूरे हिंदोस्तान में पहुँचा दिया। इस में देवदास (1935) की भूमिका स्‍वयं बरुआ ने की थी। पारो थी उनकी पत्नी जमना और चंद्रमुखी थीँ चंद्रवती देवी। बांग्ला फ़िल्म में सहगल को चंद्रमुखी के कोठे पर आने वालोँ में एक के रूप में दिखाया गया था। न्‍यू थिएटर्स में लगी भयानक आग में बांग्ला प्रिंट ख़ाक़ हो गया था।
प्रमथेश चंद्र बरुआ
बरुआ ने मूल उपन्यास को जैसे का तैसा नहीं फ़िल्माया था। उपन्यास के कथानक का मूल तत्व पकड़ा – देवदास और पार्वती की दुःखांत प्रेम कथा। उन का बचपन बिल्कुल नज़रअंदाज़ कर दिया। उपन्यास का अंत भी इस तरह बदल दिया कि यह त्रासदी नायक और नायिका की निजी त्रासदी न रह कर सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश में प्रेमी युगल की संयुक्त त्रासदी बन गई।
पार्वती दुस्साहसी है, समाज की सीमाओं को तोड़ती है और अंत में परिवार की चहारदीवारी में घुटने को विवश हो जाती है। देवदास कमज़ोर है, समाज की और परिवार की सीमाओं की घुटन तो महसूस करता है, पर उन सीमाओं को तोड़ने के लिए तैयार नहीं है। वह न इधर का है, न उधर का। न पार्वती का हो सकता है, न चंद्रमुखी का रह सकता है। उस की ज़िंदगी शराब में और आवारगी में निकास देखती है। पर यह भी और इस से भी कोई निकास नहीं है। निकास है तो अभिशप्त जीवन से मुक्ति में है।
शरच्चंद्र चटोपाध्याय

यही देख कर शरत् बाबू ने बरुआ से कहा था – “लगता है मेरा जन्म देवदास लिखने के लिए हुआ था और तुम्हारा उसे परदे पर नया अर्थ देने के लिए।
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बांग्ला का हिंदी रीमेक किया बरुआ ने अगले साल 1936 में। देवदास की भूमिका कुंदन लाल सहगल को दी गई, पार्वती रहीं वही जमना और चंद्रमुखी बनी अभिनेत्री राजकुमारी। बिल्कुल नए अंदाज़ में। शुरूआत होती है –
बंगाल की शस्‍य श्‍यामल धरती का एक टुकड़ा। बीचोबीच किसी युवती का सिर, केश की लट पीठ पर लटक रही है। दाहिने कंधे पर थाली में फूल रखे हैँ। वह हम से दूर जा रही है। धीरे धीरे हम उसे सिर से पैर तक देखते हैँ। यह पार्वती है जो हमारी संस्कृति का प्रतीक बन जाती है। इसी दृश्य में हमें मिलता है नटखट देवदास। वह गा क्या रहा है उसे छेड़ रहा है, पुकार रहा है – बालम आय बसो मेरे मन में। पार्वती भी कम शरारती नहीं है। देव के कान में तिनका करती है। पार्वती से ही देवदास को पता चलता है कि उसे दूर कलकत्ता भेजा जा रहा है कालिज में इंग्लिश पढ़ने।

(पूरा संवाद इस प्रकार है - हँसते हँसते पार्वती गंभीर हो आई। सहम कर कहने लगी, “देवदास, अब मज़ाक़ छोड़ो। मुझे तुम से एक ज़रूरी बात पूछना है। / क्‍या?” / “तुम कलकत्ते जा रहे हो?” पार्वती की आवाज़ में उदास गंभीरता थी। / कलकत्ते!देवदास हैरान रह गया। / हाँ।पार्वती कह रही थी। मैँ ने सुना है तुम जा रहे हो।” / “तुम से किस ने कहा?” / “तुम्‍हारे पिता जी ने।”/ “पिता जी ने?” एक पल तो देवदास चुप रहा फिर च्‍च्‍च्‍चकरते हुए उस ने पार्वती को विश्‍वास दिलाया: मैँ कहीं नहीं जाऊँगा।”/ “अगर ज़बरदस्‍ती भेजा गया, तो?” / “ज़बरदस्‍ती! हुँहुँहुँ?” देवदास हँसा। फिर बोला, “नहीं, पार्वती, मैँ तुम्‍हेँ छोड़ कर हरगिज़ नहीं जाऊँगा।”)
पिता की एक घुड़की उसे चुप कर देती है। जागीरदार साहब ने हुक्‍म सुना दिया, “कल सुबह - दस बजे की गाड़ी सेतुम को जाना पड़ेगा। समझे?”
दानवी रेलगाड़ी देव को कलकत्ता ले जा रही है। गाड़ी के पहिए तेज़ी से घूमते दिखाई देते हैँ। कई ऐंगल से। कलकत्ता निकट आ रहा है, धुमैला, अप्रिय।
कलकत्ते वाले उस के पहनावे पर हँसते हैँ। हँसने वालोँ में एक है गलमुच्छोँ वाला चुन्नी लाल – बीमा कंपनी का एजेंट। देवदास के एक एक वस्‍त्र को इशारा करता कहने लगा, “उँहूँयह यहाँ नहीं चलेगा। अजब! ये कोई यहाँ चलने के क़ाबिल है? ये धोती! ये गंजी! ये कोट - मैँ सब ठीक कर दूँगा।उस के लिए देवदास एक शिकार भर है पैसा ऐंठने का।
अपरोक्ष रूप से निर्देशक दर्शक के मन में देवदास की निजी ट्रैजडी के छिपे कारण अच्‍छी तरह स्‍थापित कर देता है। उस ज़माने के आम भारतीय की तरह देवदास की ट्रैजडी आधुनिकता की ओर यात्रा के कारण होती है। आधुनिकताकी तलाश में अपना स्‍वाभाविक प्राकृतिक वातावरण छोड़ कर उसे शहर आना पड़ा। आधुनिकताकी प्रतीक दैत्‍याकार रेल उसे उस की प्रेमिका से दूर ले आई। आधुनिकताउस देहाती पर ठठा कर हँसी और अब जब उस ने पूर्णत: आधुनिकहोने का फ़ैसला कर ही लिया तो आधुनिकता के एजेंट उस से छलपूर्वक कमीशन वसूल कर रहे हैँ।
चुन्नीलाल ही उसे चंद्रा के कोठे पर ले जाता है। ग्लानि से बटुआ वहीं फेँक जाना और चुन्नी का हत्प्रभ रह जाना और चंद्रा का देवदास में कुछ अनोखा देखना – यह सब बरुआ और सहगल बड़े सशक्त तरीक़े से दिखा पाते हैँ।
धीरे धीरे देवदास फिर चंद्रा के पास आता है। हम हमेशा उसे चंद्रा के नृत्य-गान कक्ष में देखते हैँ। पार्वती की शादी से त्रस्त देवदास हमें जब मिलता है तो चंद्रा के बैडरूम में। यह दृश्य अपने आप में पूर्ण परिवर्तन का द्योतक बन जाता है। उस के कानोँ में अभी तक पार्वती की शादी की शहनाई  गूँज रही है। गूँजे जा रही है। यह जो गूँज थी अब ठोस हो जाती है। भीतर वाले कमरे की पिछड़ी खिड़की से आ रही है। देवदास उठता है, वह खिड़की बंद करता है। शहनाई बंद हो जाती है। देवदास के मन से पार्वती की शादी अब इतिहास हो जाती है।
बरुआ उपन्यास आगे बढ़ाता हमें गाँव में पार्वती के साथ दिखाता है। पार्वती चाहती है कि देवदास को अपने साथ ससुराल ले जाए। उसे ग़ुमान है कि वह ससुराल की प्रमुख है। जागीरदार पति यह सह लेँगे। देवदास साथ जाने से इनकार कर देता है, पर वादा करता है जीवन में एक बार वह पारो के पास आएगा ज़रूर।
जिस हंसमुख देवदास को हम ने पहले दृश्य में देखा था, धीरे धीरे वह विचारशील, फिर कुछ हताश सा, कभी पार्वती पर झुँझलाता छड़ी से वार करता दिखाई देता है, तो कभी पगलाया सा पक्षियों का शिकार करता, इधर उधर भटकता, पार्वती से कहता कि तुम मेरी ज़िंदगी में होतीँ तो कुछ और बात होती, अंत तक लाचार, अपनी आँखोँ में इतना घिनौना महसूस करता है कि माँ को मुँह दिखाने लायक़ नहीं समझता। एकमात्र निजी सेवक धर्मदास पर आश्रित, बीमार, अशक्त, दुखों का मारा। पर वह ट्रैजिक हीरो कहीं नहीं है। दर्शक ज़रूर उस की त्रासदी महसूस करता है।

(पूरी फ़िल्‍म में निर्देशक बरुआ ने रेलगाड़ी का, विभिन्‍न कोणोँ से लिए गए रेल के चलने के दृश्योँ का और उस की आवाज़ का बड़ा सुंदर प्रयोग किया है। पुराने देहाती संस्‍कारोँ में पले देवदास को पार्वती से दूर ले जाने वाली आधुनिकता और शहर की प्रतीक यह मशीन फ़िल्‍म के अंत तक पहुँचते देवदास की आवारगी, लाचारी और दयनीयता की प्रतीक बन जाती है। यह प्रतीक भारतीय अवचेतन में इतने गहरे घर कर गया कि सत्‍यजित राय की पथेर पंचाली’, ‘अपराजितऔर अपूर संसारकी रेलेँ बरुआ की रेलोँ से ही प्रभावित मालूम होती हैँ और बाद में अवतार कौल की सत्ताइस डाउनमें रेलवे के डिब्बोँ में बीतती ज़िंदगी पर भी देवदासके दृश्योँ की स्‍पष्‍ट छाप दिखाई पड़ती है।) 

अंत की ओर देवदास की वहशियत और आवारगी दिखाने का माध्यम भी रेलगाड़ी है - एक शहर से दूसरे शहर। देश के एक कोने कोने में भागते रहने में। वह कहीं टिकता नहीं। रेल में ही उस का बिगड़ता स्वास्थ्य दिखाया जाता है। पार्वती के पास लौटने के लिए उसे बैलगाड़ी में सवार होना पड़ता है। बैलगाड़ी की रफ़्तार कम है, उस की हालत बिगड़ रही है, उसे चिंता है कि क्या वह पहुँच पाएगा? वह पूछता है, बैलगाड़ी वाले यह सफ़र कब ख़त्म होगा?” लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी है।)
बरुआ का मास्टरस्ट्रोक पारो का ग़ुमान चकनाचूर करने में था। जब पार्वती को मालूम होता है कि हवेली के पास जो मरा है, वह देवदास है, तो उसे देखने को दौड़ती है। जागीरदार परिवार के सब सदस्य हवेली का मुख्य फाटक बंद कर देते हैँ। पार्वती की असली त्रासदी यही है। अपने परिवेश में सब कुछ नियंत्रित करने वाली पार्वती बस एक मनोकल्पना थी।

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अंत में – सहगल वाली देवदास हिंदी के लेखक थे पंडित केदार शर्मा। उन्हीं ने अपनी फ़िल्म जोगन में भाव अभिव्यक्ति की जुगत सिखाई थी दिलीप कुमार को – मैँ तुम्हेँ शेर सुनाता रहूँगा, तुम बस रीऐक्ट करते रहना। बिमल राय वाली फ़िल्म में देवदास थे दिलीप कुमार।  प्रीमियर के अंत में दिलीप ने केदार शर्मा से राय माँगी। पंडित जी ने जवाब दिया – तुझे तो फ़िल्म का अंत पहले शौट से ही पता था। उन के कहने का मतलब था कि दिलीप पहले सीन से ही ट्रैजिक हीरो बने हुए थे।

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ट्रेन से उतर कर बैलगाड़ी की ओर मोंताज

फाटक बंद हो जाता है
चिता जल रही है

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