महिलाओं की सामाजिक सहभागिता का लोकगीतों में चित्रांकन: एक समाजशास्त्रीय विश्लेषण

- देवी प्रसाद
- सविता यादव

भारत के ग्रामीण अंचल में निवास करने वाले लगभग 17.91 करोड़ परिवारों में आधी आबादी महिलाओं की है, जो  कि अधिकांशतः (लगभग 84 प्रतिशत) लघु उद्योगों, कृषि व इससे संबंधित व्यवसायों में कार्यशील है। इन कार्यशील महिलाओं में 22 प्रतिशत अनुसूचित जातियों, 16 प्रतिशत जनजातियों,  तथा 43 प्रतिशत अन्य पिछड़े वर्गों से हैं (कांची, 2010)। घरेलू कार्यों जैसे- खाना पकाना, बच्चों की देखभाल करना, अतिथियों की आवभगत करने की जिम्मेदारी भी इन्हीं के कंधों पर होती है, लेकिन इन सबके बावजूद उन्हें समाज में बराबरी का दर्जा नहीं मिल पाता है और यह सामाजिक व्यथा, हमें बिरहा लोकगीत के माध्यम से सुनाई देती है। ग्रामीण जगत के हर सामाजिक कार्य में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने के कारण, ग्रामीण लोकगीतों जैसे- वसंत गीत, चैता, सोहर, देवी गीत, फ़ाग गीत, कजरी, मेहंदी गीत, विवाह गीत, नटका, बिदाई गीत, रोपनी गीत, मल्हार आदि में महिलाएं अपना यथोचित स्थान सुनिश्चित की हैं।

प्रस्तुत  लघु शोध पत्र का प्रमुख ध्येय स्त्रियों की ग्रामीण भारत में सामाजिक-सांस्कृतिक सहभागिता के साथ-साथ ग्राम्य जीवन की संस्कृति को संजोने में उनके योगदान को लोकगीतों के माध्यम से समझना हैं। लोकगीत पूर्वी उत्तर प्रदेश के अहीर जाति में अधिक प्रचलित होने के कारण, यह शोध पत्र इस समुदाय पर विशेष रूप से केंद्रित रहेगा। दुग्ध उत्पादन से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े होने के कारण इस समुदाय की कार्यशील महिलाओं को 'ग्वालिन' नाम से सम्बोधित किया जाता है। 'ग्वालिन' नाम सुनने से हमारे मानस पटल पर एक ऐसा चित्र प्रतिबिंबित होता है जो समाज के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अपनी भागीदारी को सुनिश्चित करते हुए, ग्रामीण समाज के रूढ़िवादी रवैये को तोड़ता हुआ नजर आता है।

[सूचक शब्द: ग्रामीण समाज, लोकगीत, महिला सशक्तीकरण, सामाजिक रूपान्तरण] 

प्रस्तावना
ग्राम्य अंचल का स्मरण करने पर हमारे मस्तिष्क पटल पर एक कार्यशील चिरंतन समाज का छायाचित्र उभर कर सामने आता है। मेहनतकश यह ग्रामीण समाज स्त्रियों की साझी विरासत को भी अपने में समेटे हुये है। ग्रामीण उत्तर भारत पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं की बराबर सहभागिता होने के बावजूद उनकी कोई अपनी पहचान नहीं है। पर्दा-प्रथा, अशिक्षा, अनभिज्ञता, उदासीनता, रूढ़ियाँ और अन्धविश्वास ग्रामीण महिलाओं के समुचित विकास, सामाजिक अधिकार तथा सशक्तीकरण में बाधक प्रतीक होते हैं। हालांकि स्त्रियों की सामाजिक स्थिति एवं उनके सामाजिक उत्थान के लिए, 19वीं सदी के शुरुआती दशकों से अनेक विचारकों व सामाजिक सुधारकों ने बढ़-चढ़ कर भाग लेना शुरू कर दिए थे। लोकगीतकारों ने भी इन बिन्दुओं को ध्यान में रखते हुए अपनी रचनाओं में इन्हें प्रमुखता दी है।

कार्यकारी स्त्रियाँ और लोकगीत
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और डीआरडब्लूए की ओर से नौ राज्यों में किये गये एक शोध से पता चलता है कि पशुपालन में महिलाओं की भागीदारी 58 प्रतिशत है। नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन (NSSO) के आंकड़ों की मानें तो 23 राज्यों में कृषि, वानिकी और मछली पालन में ग्रामीण महिलाओं का कुल श्रम की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत है। इसी रिपोर्ट के अनुसार, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और बिहार में ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी का प्रतिशत 70 प्रतिशत रहा है।[i] ग्रामीण भारत में महिलाओं के लिए 20 वीं सदी का अन्तिम दशक बहुत महत्वपूर्ण रहा है, क्योंकि ग्रामीण भारत ‘राजनीतिक विकेन्द्रीकरण' की तरफ अग्रसरित हो रहा था तथा ग्रामीण महिलाओं की बराबर की भागीदारी के लिए के लिए पंचायती राज में 33 प्रतिशत 'आरक्षण' की भी व्यवस्था की गयी।

आंकड़ों की दृष्टि से देखें तो कुशल श्रमिक के रूप में महिलाएँ सकल श्रम शक्ति में बराबरी से काफी पीछे हैं। श्रम मंत्रालय व जनगणना वर्ष (2001) के   अनुसार, महिला श्रमिकों की संख्या 12 करोड़, 72 लाख हैं, जो उनकी कुल संख्या (49 करोड़ 60 लाख के करीब) का एक चौथाई हिस्सा है। इनमें  से लगभग 84 प्रतिशत महिलाएँ कृषि संबंधी रोजगार में हैं (एन.एस.एस., 2004-05)। यदि हम ग्रामीण भारत की महिला श्रमिकों की दिनचर्या पर ध्यान दें तो पाते हैं कि एक हेक्टेयर क्षेत्रफल में एक स्त्री औसतन निराई के लिए 640 घंटे, सिंचाई के लिए 384 घंटे, गोबर व खाद पहुँचाने के लिए 650 घंटे, बीज बोने के लिए 557 घंटे व फसल कटाई के लिए 884 घंटे कार्य करती हैं[ii]। इस तरह देखा जाए तो स्त्रियों का योगदान कृषक समाज में दोहरी भूमिका निर्वाह के कारण पुरुषों की तुलना में ज्यादा हैं।

कृषक समाज विशेष रूप से स्त्रियाँ प्रकृति के बहुत नजदीक होती हैं, उन्हें गर्मी, शरद, बसंत, वर्षा आदि ऋतुओं का सामना नजदीकी से करना पड़ता है। अतः ग्राम्य जीवन में इन ऋतुओं की व्यथा व आनंद लोकगीतों के माध्यम से दृष्टिगोचर होता हैं। उदाहरण स्वरूप कुछ लोकगीतों का भावपूर्ण चित्रण देखा जा सकता है-

रोपनी तथा निरवाही (सोहनी) लोकगीत
ग्रामीण कार्यशील महिलाएं जब धान रोपने तथा निरवाही करने खेत में जाती हैं तो अपनी व्यथा (पारिवारिक जीवन की कटुता, प्रेम, आदि) व आकांक्षाएं (गहने, जेवरात, शहर व तीरथ दर्शन, आदि) 'रोपनी' व सोहनी नामक गीत से व्यक्त करतीं हैं। प्रस्तुत गीत का प्रसंग है कि यदि अपना ही देवर यदि भाभी के रूप पर आसक्त हो और धृष्ट प्रस्ताव करे, तो नारी कैसे सहन करे। किस प्रकार से वह बुद्धि और विवेक से अपनी रक्षा करती है, प्रस्तुत सोहनी लोकगीत में अवलोकनीय है-

“अपुना त चल्या देवरा, पूर्वी बजनियाँ हो राम।
देवरा हमकाँ तूँ काव लै आइबा हो राम...
राजा भैया के मारे बहिंयाँ टूटै हो राम” (डॉ. विद्या विंदू सिंह, 2016: 80-81)।

इसी क्रम में रोपनी लोकगीत का एक सुन्दर उदाहरण-
“रिमझिम बरसत पनियाँ, आवा चली धान रोपै धनिया।
... भरि जहिहैं कोठिला ये धनियाँ, आवा चली धान रोपै धनिया” (डॉ. विद्या विंदू सिंह, 2016: 88-89)।

इसी क्रम में दैन्य व विवशता का एक यथार्थ चित्रण-
“जहिया से आयों पिया तोहरी महलिया, रतिया दिन करौ टहलिया रे पियवा।
देहियाँ झुरनि मोरी करति टहलिया, सपना भै सुख कै सपनवाँ रे पियवा।
बखरी का हरा तुहूँ जोत्या रात दिनवाँ, तबहूँ न भर पेट भोजनवां रे पियवा।
चिपरी पाथत मोरी अंगूरी खियानी, तबहुँ न तन कै कपड़वा रे पियवा” (डॉ. विद्या विंदू सिंह, 2016: 88-89)।

नकटा लोकगीत
कृषि कार्य से फुरसत पाने पर महिलाएं सामाजिक दायित्वों की पूर्ति में लग जाती हैं। उत्तर-प्रदेश में विवाह, रतजगा, गोदभराई, मुंडन संस्कार आदि शुभ अवसरों पर महिलाओं को इकट्ठा होने का मौका मिलता है तो वे 'नकटा' नामक लोकगीत गाकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं। अक्सर ऐसे स्वर रातों में छतों पर या आंगन में गूंजते हैं और कुछ महिलाएँ या घर की बच्चियाँ इस पर नृत्य करना भी आरम्भ कर देतीं हैं। यही उनका सरल और सहज मनोरंजन होता है। नकटा एक प्रकार का मांगलिक गीत होने के साथ ही एक प्रहसन भी है जो वर पक्ष की स्त्रियाँ बरातियों की विदाई के उपरांत (रात में) करती हैं। घर की चारदीवारी में बंद ये महिलाएँ इस अवसर पर अपनी दबी हुई यौन कुंठाओं को मजाक-मजाक में एक-दूजे से साझा करती हैं क्योंकि इस दिन पुरुष (बारात जाने के कारण) घर में नहीं होते हैं। नीचे दिए गए गीत में एक औरत की अभिलाषा को प्रस्तुत किया गया है-

“मैं फैशनवाली बालम मोरा बनिया।
 ऊँचे चौतारा, नीची दुकनिया, मैं बेचू हल्दी, बालम बेचे धनिया।
सास मोरी सेंके, ननद मोरी बेलैं, मैं बैठी जेयूं, बलम भरे पनियाँ।
सास मोरी मारयें, ननद ललाकारें, मैं बैठी रोऊँ, बलम लेवैं कनियाँ...।”[iii]

धार्मिक उन्मुखता, अन्धविश्वास और लोकगीत
ग्रामीण संस्कृति की सरलता, सहजता, शिक्षा का अभाव, समय की बहुलता आदि कारण स्त्रियों की धार्मिक रुझान के प्रमुख वजह है। इसके अलावा कुल देवता की पूजा, डीह पूजा, प्रकृति पूजा, स्थानीय देवस्थान आदि तथ्य ग्रामीण महिलाओं की धार्मिक उन्मुखता के कारण हैं। पारिवारिक कष्ट के समय पर स्त्रियाँ 'बिरहा’ लोकगीत तथा ख़ुशी के मौके पर ‘देवी’ गीत गाना एवं सुनना पसंद करती हैं। दीपावली के दिन 'पचरा’ लोकगीत गाकर वे 'राजाबली का आवाहन करती हैं तथा श्रीकृष्ण जन्मष्टमी पर 'सोहर’ लोकगीत गाती हैं। इसी तरह महिलाओं का एक अन्य महत्वपूर्ण त्यौहार 'नागपंचमी’ है, जिसमें साँपो को दूध पिलाने की मान्यता है। एकादशी, जिसे बूढ़ी दीपावली भी कहा जाता है, को भुईंया बनायी जाती है जिसे अहितकारी दैत्य आत्मा माना जाता है। इसे दरिद्रता का प्रतीक भी माना जाता है। इसको आंगन में अंकित कर महिलाएँ आलेखित सूप में, ब्रह्ममूहूर्त में, गन्ना, दाड़िम, अखरोट पर पुष्प डालकर आहुति देती हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में ऐसी मान्यता है कि एकादशी के दिन ‘सूप पीटने से’ घर में दरिद्रता नहीं आती है। दीपावली के ग्यारह दिन बीत जाने पर बारहवें दिन स्त्रियाँ भोर में सूप पीटती हुई तथा एक स्वर में "ईश्वर आवे दरिद्र जाये" कहती हुई गाँव के पूरब दिशा की ओर जाती हैं। सूप पर जोर से प्रहार करने के कारण तेज आवाज निकलती है जिससे वे समझती हैं कि 'दरिद्र' (दुष्ट आत्मा) डर के मरे गाँव छोड़कर भाग जायेगा। जोर से प्रहार करने के कारण सूप टूट जाता है तथा टूटे हुए सूप को गाँव के बाहर ही फेंक दिया जाता है तथा घर वापस आते समय वे ‘पचरा’ गीत गाती है।

गृहस्थी में व्यस्त स्त्रियाँ, परस्पर अपने सुख एवं दुःख को लोकगीतों के माध्यम से प्रकट करती हैं। जब कभी ग्रामीण महिलाएं गरीबी, सामाजिक तथा पारिवारिक समस्याओं से अपने आपको असहाय महसूस करती हैं तब वे 'दुरदुरिया' नामक देवी से मन्नत मांगती है तथा इष्ट की पूर्ति होने पर वे सात या चौदह की संख्या में एकत्रित होकर खुशी का इजहार करती हैं। दुरदुरिया के अवसर पर गाए जाने वाले ‘संकटा माता’ लोकगीत का एक सुन्दर उदाहरण-

“देवी औसान घरे आय गई अपने। सोने की थारी में ज्योना परोस्यों, जेवैं क मैया घरे आइ गई अपने। ...सुतै क मैया घरे आई गई अपने” (डॉ. विद्या विंदू सिंह, 2016:147)।

एक ध्यान देने वाला तथ्य यह हैं कि प्रायः घनघोर गरीबी के दुश्चक्र में फँसा व्यक्ति, दूसरे गरीब परिवारों की तरफ देखकर अपनी वेदना पर मरहम लगाता हैं। ये गरीब परिवार एक दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़े होते हैं तथा पारस्परिक संबंध विकसित करते है, जिससे कि वे अपनी व्यथा बांट सके। इन गरीब परिवारों में परस्पर संचार स्थापित करने में 'बिरहा' लोकगीत बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इन परिवारों की स्त्रियाँ प्रायः अपने दुःखों को व्यक्त करने के लिए 'पचरा' नामक बिरहा लोकगीत गाती हैं -

“जागु-जागु देविया, जागु दुरुगवा, जागु दिनवानाथ हो।
जागु-जागु इहवाँ के डिहऊ, तोहरे कइले बानी आस हो” (शांति जैन, 1999: 447)।।

पिछले दो-तीन दशकों में, ग्रामीण क्षेत्रों में ढाँचागत संरचनात्मक परिवर्तन हुए हैं, जिसके फलस्वरूप वहाँ के सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन देखने को मिल रहा है। आज ग्राम्य जीवन में भी 'फास्ट-फ़ूड’ जैसे- मैगी, चाउमीन, मोमो, डोसा, आदि का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। ये नये-नये परिवर्तन ग्रामीण संस्कृति का अंग बनते जा रहे हैं। जैसा कि विदित है, स्त्रियाँ खट्टी-मीठी चीजें खाना बहुत पसंद करती हैं। इस खान-पान की आदत को वे धर्म से देखती हैं। ग्रामीण महिलाओं का एक समूह (प्रायः सात से चौदह स्त्रियाँ) किसी पुनर्निर्धारित स्थान पर एकत्रित होकर 'चटपटा देवी’ की आराधना करती हैं। ग्रामीण महिलाओं के द्वारा 'चटपटा माई' नामक यह उत्सव इसका अप्रतिम उदाहरण है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण जगत की महिलाओं में यह मान्यता है कि 'देवी माँ' (चटपटा माई) को खट्टी-मीठी चीजें बहुत भाती हैं। परिवार पर 'चटपटा माई' की कृपा-दृष्टि बनी रहे, इसी आशा के साथ महिलाओं का एक समूह किसी स्थान पर बैठकर 'चटपटा माई' से संबंधित ‘पचरा’ [iv] गीत गाता है तथा खट्टी-मीठी खाद्य-वस्तुओं को आपस में मिल-बाँटकर खाता है।


लिंग भेद का लोकगीतों में निरूपण
ग्रामीण समाज में स्त्रियों एवं पुरुषों के अलग-अलग प्रकार के गीत होते हैं, जिन्हें विभिन्न अवसरों एवं क्रियाकलापों के दौरान गाने की परम्परा रही है। जहाँ एक तरफ, महिलाएं ‘रोपनी गीत’ (धान रोपते हुए), नटका (अनाज पिसते हुए), कजरी (सावन के महीने में झूला झूलते हुए), विवाह (बन्ना व बन्नी) गीत, कलेवा (बरातियों के नाश्ते के समय पर गया जाने वाला गीत), गारी/बनरा (विवाह के समय), सोहर (बच्चे के जन्म होने पर) आदि लोकगीतों को गाना पसंद करती हैं। वहीं दूसरी तरफ, पुरुष समाज में फगुआ (होली पर्व पर गाया जाने वाला), चैता (चैत के माह में गया जाने वाला श्रृंगारपरक गीत) बारहमासा (ऋतुवर्णन), आल्हा (वीरता का बखान), बिरहा आदि लोकगीत लोकप्रिय है। जहाँ महिलाओं के गीतों में दैनिक-दिनचर्या, यौन संबंध, दुःख-सुख, हंसी-मजाक तथा मानवीयता से संबंधित मुद्दों का बहुत बारीक़ निरूपण होता है, वहीं पुरुष समाज के गीतों में राजनीति, पुरुष औचित्य (masculineness), कामुकता जैसे विषय प्रधान स्थान पाते है। डॉ शांति देवी जैन के अनुसार- ''इन लोकगीतों में लोक का समस्त जीवन चित्रित है। शिशु के प्रथम क्रंदन से लेकर जीवन की अंतिम कड़ी तक  के भाव चित्र इसमें होते हैं। भाई से मिलने को व्याकुल बहन की व्यथा कथा, स्त्रियों का आभूषण प्रेम, सास, ननद, सौत के अत्याचारों से पीड़ित स्त्री की विपन्नता, वीरों की शौर्यकथा तथा मिलन-बिरह के रंगारंग इन गीतों में मिलते हैं।''

उदाहरण
''पिया परदेस गेलु, नेबुआ फुलाए गेल, दए गेल हिरदय कलेस गे” (मोहनदास झा, 1989: 59)।

आमतौर पर लोकगीतों को स्त्रियाँ कुछ खास त्योहारों, नई ऋतुओं, बदलते मौसम, सामाजिक अवसरों, देवी-देवताओं को प्रसन्न करने हेतु, मुंडन तथा छेदन संस्कार आदि के अवसर पर गाती हैं। ग्राम्य जनमानस के गीतों में महिलाओं की वेदनाएँ जैसे पितृसत्तात्मक जकड़न की छटपटाहट, स्त्री विरोधी परम्पराओं के प्रति क्षोभ, नैहर में सखियों के साथ बीते हुये पल, शराबी या बेवफा पति का अत्याचार, आर्थिक विपन्नता, आदि का जीवंत वर्णन होता है। ग्रामीण समाज में बेटी को जन्म  से लेकर मृत्यु तक अनेक भेदभावों का सामना का करना पड़ता है, जिसकी छाप लोकगीतों में दिखाई पड़ती है। उदाहरण स्वरूप, बेटी के साथ उसके बचपन में हुए भेदभाव का मगही लोकगीत में एक जीवंत वर्णन है -

''जहि दिन हे अम्मा भइया के जनमवा
सोने की छुरी कटइलो नार हो।
जहि दिन अहे अम्मा हमरो जनमवा, हसुआ खेजइते हे अम्मा खुरपी न भेंटे
मिटकी कटइले मोरी नार हो” (विनीत कुमार, 2012)।।

स्त्री विमर्श प्रायः सभी असाधारण कवियों में एक अपनी अलग जगह बनाई है। प्रेमचंद्र 'नमक का दरोगा' नामक कहानी में प्रस्तुत करते है कि 'लड़कियाँ घास-फूस की तरह बढ़ती जाती है। 'बेटी का जन्म पिता के लिए 'बोझ' की तरह होता है, क्योंकि वह अपनी गाढ़ी का एक हिस्सा 'दहेज़' में खर्च कर देता है। 'दहेज़ प्रथा’ के संदर्भ में एक माँ अपनी बेटी से कहती है -

''जेहिर दिन ऐ बेटी तोहरो जनमवां, सोनवा सकल पीले अनुरे,
जहि दिन --------हमरे सिरे बेसहलू गारिरे...
पापी दहेजवा के बादर करेजवा, क़ितनिन के लूटल सिंगार, हे बाबू कैसन है रीतिया तोहार” (प्रभा दीक्षित, 2013)।।

आज वही बेटी ससुराल जाते समय, अपने पिता से बोलती है-
“काहे को ब्याही विदेश रे बाबुल मोरे
हम तो बाबुल तोहरे आँगन की चिड़िया
भोर होत उड़ जाये से बाबुल मोरे
बिरन की दीनी महल अटरिया
हमको दीनी परदेस रे बाबुल मोरे” (प्रभा दीक्षित, 2013: 3-5)।


यहाँ यह बताना ध्यातव्य होगा कि भारत सरकार ने दहेज निषेध अधिनियम, 1961 लागू करके इस प्रकार की कुप्रथा पर विराम लगाने का सार्थक प्रयास किया, परन्तु पूर्णरूपेण सफलता अभी तक प्राप्त नहीं की जा सकी है और भारतीय पेनलकोड भाग 304 बी तथा 498 ए के अनुसार लगभग दो लाख लोगों को दहेज में लिप्त होने के कारण गिरफ्तार किया जा चुका है, जिसमें 47 हजार 951 महिलाएँ भी शामिल हैं। हालाँकि किसी भी कारण से सिर्फ 15 प्रतिशत लोगों को ही दोषी करार किया गया।

पूजा विधानों का समाजशास्त्र और महिलाएँ
ग्राम्य जनमानस 'देवी गीत' के माध्यम से अपनी संवेदनाएँ (दुःख, सुख, आपबीती) प्रकट करता है। अगर हम ग्रामीण समाज की पूजा पद्धति व विश्वासों पर दृष्टि डालें तो पाते हैं कि प्रकृति की पूजा-याचना करना ग्रामीण संस्कृति का सदैव एक अभिन्न अंग रहा है। सूर्य, धरती, नदी, विशिष्ट औषधीय पेड़-पौधों, आदि की आराधना महिलाओं द्वारा की जाती है। ग्रामीण लोकगीतों में भी इन्हें यथोचित स्थान प्राप्त है।

उदाहरण
“हे माई, हे माई तु तौ बसी परबतवा पै, मोका छोड़े नरवै किनार।…
कि मतवा गई है लोभाय” (एम. प्रताप नारायण अवस्थी, 1985: 196)।

यदि हम सामाजिक-राजनीतिक दृष्टि से ग्राम्य जनमानस में फैले धार्मिक विश्वासों का अध्ययन करें तो पाते हैं कि मुगल तथा अंग्रेजों के शासन से त्रस्त जनता मुक्ति की आकांक्षा पाली हुई थी। संरचनात्मक विकास के अभाव के कारण ग्रामीण जनमानस महामारी, अकाल, बाढ़ तथा अन्य समस्याओं के कारण व्यापक निराशा से अभिशप्त था, जिसके फलस्वरूप प्रकृति पूजा तथा देवी पूजा एक दूसरे के अभिप्राय हो जाना मनोवैज्ञानिक रूप से स्वाभाविक था। उदाहरण स्वरूप- हैजा, चेचक, काला ज्वर आदि बीमारियाँ स्वच्छ पानी नहीं मिलने से उत्पन्न होती थी तथा पर्याप्त स्वास्थ्य केन्द्रों के अभाव में पूरे गाँव को अपने चपेट में ले लेती थी। अनपढ़ ग्रामीण समाज इन बीमारियों से मुक्ति पाने के लिए 'देवी पूजा' का सहारा लेता था। इसलिए 'देवी पूजन' का चलन गाँव के लोकगीतों में अप्रतिम जगह बनाया। आज भी देवी आराधना प्रायः स्त्रियों के द्वारा ही किया जाता है। स्त्रियों की भौगोलिक समझ को दर्शाता देवी गीत का एक सुन्दर स्पष्टीकरण-

“हँसि हँसि पूछें श्री भगवन, शारदा माई कै बहिनी?
पहिली बहिन परबत पै बिराजैं, जिनके पारबती नावँ।
दूसरी बहिनि मैहर मा बिराजैं, जिनकै सारदा नावँ।
तिसरी बहिनि बिंध्याचल मा बिराजैं, जिनकै बिंध्यवासिनी नावँ।
चौथी बहिनि कलकत्ता बिराजैं, जिनकै कलिका नावँ।
पांचवी बहिनि पावागढ़ माँ बिराजैं, जिनके दुर्गादेवी नावँ।
छठवीं बहिनि कमरू मा बिराजैं, जिनकै कामाख्या नावँ।
सातवीं बहिन हिंगलाज माँ बिराजैं, जिनकै चन्द्रिका नावँ।
सारदा सात बहिनी” (डॉ. विद्या विंदू सिंह, 2016:148)।

उपरोक्त इंगित चरण में देवी आराधना के माध्यम से सामाजिक परिस्थितियों को दर्शाया गया है। गाँव में एक लोकप्रिय कहावत है, लोकगीत स्वाभाविक रूप से हृदय से फूट पड़ते है। जब व्यक्ति बहुत प्रफुल्लित हो तो वह गुनगुनाने लगता है। जिसे नीचे दी गई पंक्तियों के माध्यम से जिसे निरूपित किया जा सकता है-

“काहे से सींचौं मतवा बेला-चमेला काहे से सींचौं गुलाब।
…दुधवा पियै के चाही मतवा गउसलवा, दहिया खाय के अहिरान” (एम. प्रताप नारायण अवस्थी, 1985: 197)।

अतः हम कह सकते है कि लोकगीत हमारे जीवन विकास के मौखिक इतिहास होने के साथ ही वे स्वच्छन्दता, सरलता एवं सरसता की पीयूषधारा है, जिसमें भूत, वर्तमान और भविष्य संचित रहता है। गाँव की एक प्रमुख विशेषता 'डीह देवता' की कल्पना है। हर गाँव का एक 'डीह' होता है, और उससे सम्पूर्ण गाँव की सुरक्षा की अपेक्षा की जाती है। प्रायः प्रत्येक शुभ कार्य करने से पहले स्त्रियाँ ग्राम देवता की पूजा-अर्चना करती हैं। इस सन्दर्भ में एक सुंदर उदाहरण प्रस्तुत है-

“फेरु एहु ले लाभ निवरीं आंगा भजहिं ठाकुर के नाव। आंगा भजीं ठाकुर के नाव थोरे सुमिरि लेतीं डीह नगरे के, बाबा नहिं जनलि नाव तोहार” (एस.एम. पांडे, 2012)।

नए-नए बदलाव और लोकगीत
आजादी के पूर्व (ब्रिटिश भारत में) तथा स्वतंत्र भारत में 80 के दशक तक बाल विवाह जैसी सामाजिक कुप्रथाएँ पर्याप्त चलन में थी, जिसका प्रमुख शिकार महिलाएँ ही होती थीं। उन्हें इस कुप्रथा के कारण शिक्षा से वंचित होना पड़ता था, और वे कम ही उम्र में माँ बन जाती थी। कई बार तो उन्हें प्रसव-पीड़ा से अपनी जान भी गँवानी पड़ती थी। 19वीं सदी के प्रारम्भिक दशकों में कुछ समाज सुधारकों (दयानन्द सरस्वती, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, राजा राममोहन राय) ने बाल विवाह रोकने की दिशा में सार्थक प्रयास किया था। हालांकि भारत सरकार ने बाल विवाह अधिनियम-1929 पारित करके इस सामाजिक कुप्रथा का अन्त कर दिया और समय-समय पर इस धरा में अनेक संशोधन होते रहे हैं। इस कुप्रथा का चलन वर्तमान परिदृश्य में भी देखने को मिलता है। ‘तृतीय राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण’ (सन् 2005-06) के अनुसार, '20 से 24 वर्ष की आयु की विवाहित महिलाओं से विवाह के समय की आयु की जानकारी लेने पर पाया गया कि इनमें से 44.5 प्रतिशत का विवाह 18 वर्ष से कम आयु में ही हो गया था तथा 22.5 प्रतिशत का विवाह तो 16 वर्ष की आयु में और 2.6 प्रतिशत का तो 13 वर्ष की उम्र में ही हो गया था’।[v]

जब वर-वधू पाँच से दस वर्ष के बीच में होते थे, तभी उनका धार्मिक कर्मकाण्डों व विश्वासों के अनुसार विवाह करवा दिया जाता था। हालांकि विवाह के समय वधू की विदाई नहीं होती थी। उन्हें प्रौढ़ावस्था (गवन) तक इन्तजार करना पड़ता था। जिसे लोकगीतों में बड़ी खूबसूरती से उकेरा गया है। प्रायः पत्नी अपने पति से मिलन की आस लगाये अपने मन को घरेलू कामों में उलझाने का प्रयास करती थी।

उदाहरण-
''रितु आई रे सखीरी फागुन की, रितु आई रे ...
गमक उठी फूलन फुलवारी, कुहक उठी कोयल मतवारी, हरे-हरे खेत लहर लहरायें, रितु आई रे ...” (पवित्रा, 1999: 163)।

पिया बिरह से सम्बंधित ‘वियोग गीत’ का एक अन्य उदाहरण-
“पिया-पिया कहत पियर भइली देहिया, लोहवा कहेला पिण्ड रोग।
गऊँआ के लोगवा त मरमियो न जानेला, भइले गवनवा न मोर” (शांति जैन, 1999:446)।।

ग्रामीण महिलाओं में स्वाभिमान, आत्म-विश्वास एवं स्वावलम्बी जीवन का प्रमुख श्रेय भारत सरकार की समय-समय पर लागू की गयी योजनाओं को जाता है। आजादी के कुछ दशकों के बाद महिलाओं में सामाजिक-राजनीतिक जागरूकता का भी संचार हुआ। 73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 तथा शिक्षा का संचार स्त्रियों के आत्म-विश्वास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ग्रामीण महिलाओं में आये सामाजिक-राजनीतिक सशक्तीकरण की झलक ग्रामीण लोकगीतों में भी दिखायी देती है। ग्रामीण महिलाओं में आये आशा के संचार के साथ-साथ स्वाभिमान की झलक लोकगीतों के माध्यम से समझा जा सकता है। प्रभा दीक्षित (2013) के अनुसार, एक घुड़सवार कुएँ में पानी भर रही एक दलित युवती से कहता है, ''तुम इतना कष्ट क्यों उठा रही हो, चलो मेरे साथ सुख से रहो।" इस पर वह करारा जवाब इस तरह देती है-

''अस राजपुतवा जो पाइत त चाकर बनाइत हो
अपने प्रभु जी के पाँव के पनहिया,
त तोहसे ढोवाइत हो” (प्रभा दीक्षित, 2013)।

दूसरा संदर्भित उदाहरण-

राजा धोबिन को धूप में कपड़ा धोते देख अपने राजमहल में चलने को कहता है, इस धोबिन कहती है -
''रंगमहल में तो आगि लगावो रे। कुरिया के मोल अपार” (प्रभा दीक्षित, 2013)।


इसी क्रम में ‘बेला नटनी’ नामक निपुण नृत्यांगना का यहाँ सन्दर्भ देना भी उपयुक्त होगा। इस प्रयोज्य में डॉ. मोना जैन कहती हैं कि, ‘धरती पर जब तमाल (बेला नटनी का साथी, ढोल वादक) ढोल बजाता था, तब ढोल की ताल-धुन के साथ रस्सी पर अधर में बेला नटनी के करतब और नृत्य लोगों को मोहित कर देती थी तथा अद्भुत समां बांध देती थी। बेला नटनी की आंखों में देखने वालों को अजीब सा जादू दिखाई देता था, वह सभी को अपनी ओर आकर्षित कर लेती थी, पद्य रूप में एक सुन्दर उदाहरण-

“मोरी बेला-तमाल, रस्सा पे चल रई हंस की चाल… बेला-तमाल।।”[vi]

ध्यातव्य है कि कुछ प्रमुख योजनाएं जैसे ‘प्रधानमंत्री जन धन योजना’ (2014), ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ (2016), 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' (2015), ‘राजीव गाँधी किशोरी सशक्तीकरण स्कीम-सबला’ (2010-11), ‘स्टेप’ (1987), ‘स्वाधार’ (2001-02), ‘स्वावलंबन’ (1975), आदि ने ग्रामीण महिलाओं के विकास में महती भूमिका निभाई तथा ग्रामीण समाज में विकास के पहिये को आगे बढ़ाने में महिलाओं ने अनुपूरक के रूप में सामने आई। हालांकि ग्रामीण औरतों में अनेक नई-नई चुनौतियाँ भी आती रही हैं। उनके लिए ग्राम्य जीवन का अनुभव कभी गुलाबी परिदृश्य नहीं रहा है। कभी पति से बिछड़ने का दुःख तो कभी दहेज न दे पाने के कारण पारिवारिक कलह महिलाओं के सामने एक चुनौती के रूप में हमेशा रही है। जिनका ममस्पर्शी विवरण ग्रामीण लोकगीतों में बहुतायत रूप में मिलता है।

‘गोपिकाएँ’ एवं ‘ग्वालिन’ तथा आर्थिक निर्भरता का सफर

हिंदी साहित्य में सगुण भक्ति धारा के कृष्णाश्रयी भक्ति शाखा के अनेक कवियों ने ग्वाल-बाल तथा गोपिकाओं के माध्यम से भक्ति साहित्य को समृद्ध किया। इन ग्वाल-बाल तथा गोपिकाओं के धीरोदत्त नायक भगवान कृष्ण का चरित्रांकन, चाहे वह कृष्ण के बाल-काल का हो या मथुरा से बृन्दावन जाने का हो, हिंदी साहित्य के विद्वानों (पाठकों) को काफी आकृष्ट करता है। आर्थिक आत्मनिर्भरता की परिचायक ग्वालिनों की दही भरी गगरियाँ कुछ दशक पूर्व तक ग्रामीण महिलाओं को काफी आकर्षित करती रही है। जहाँ एक तरफ ग्रामीण समाज पर 'रूढ़वादी' होने का तमगा लगाया जाता रहा है, क्योंकि स्त्रियों को परिवार की इज्जत का प्रतिष्ठा का केंद्र बिंदु बनाकर और उन्हें समाज का हवाला देकर घर की चहारदीवारी में रहने पर मजबूर किया जाता था (राजेंद्र यादव, 1957)। वही दूसरी तरफ यादव समाज दुग्ध व्यवसाय से जीविकोपार्जन करता था तथा इस समाज की महिलाएँ भी कंधे से कंधा मिलाकर अर्थ उत्पोसर्जन में हाथ बँटा रही थी। इन समाज की स्त्रियाँ 'ग्वालिन' नाम से लोकप्रिय थी। वे पड़ोसी गाँवों में जाकर दही का व्यापार किया करती थी। दही बेचना उनके लिए गर्व की अनुभूति थी, क्योंकि वे मथुरा की 'गोपिकाओं' का अपना आदर्श मानती थीं। भले ही सूरदास की वे गोपिकाएँ काल्पनिक हो, लेकिन ग्रामीण 'ग्वालिनों' के लिए वे एक मिशाल या प्रेरणास्रोत हैं तथा रूढ़िवादी समाज को आइना दिखाने के लिए एक 'साधन'। सामाजिक संघर्षों के बावजूद गोपिकाएँ किस तरह अपने अडिग विश्वास के साथ कार्य के प्रति समर्पित हैं, नीचे दिए गए लोकगीत माध्यम से समझ सकते हैं-

''कान्हा रोक मत डगरिया दहिया बेंचन जाई, एक तो म्हार थकल मन दूजे तू दुश्मनवा सारी सखी छोड़ी गयी दूर है भवनवा ... (धनञ्जय, 2013: 122)।''

यादव समाज से आने वाली इन 'मातहत औरतों' (subaltern women) पर इतिहासकारों की लेखनी हमेशा उपेक्षापूर्ण रही। दही बेचने के साथ-साथ ये औरतें परम्परागत ज्ञान-विज्ञान में भी दक्ष थी। लोगों के सेहत का ध्यान रखना इन्हें बखूबी आता था, इसलिए ग्रामीण समाज में 'ग्वालिन' शब्द कभी आत्मसम्मान से परिपूर्ण 'प्रोग्रेसिव वीमेन' का सूचक था। आर्थिक आत्मनिर्भरता से आये आत्मविश्वास व एक पहचान को नीचे दी गयी पंक्तियों के माध्यम से समझा जा सकता है –

"दही लेलो विहारी नन्दलाल, हो दहिया मेरी लेलो।
कहवां की तू सुघर ग्वालीनियाँ, क्या है तुम्हारा नाम हो, दहिया तेरी ले लूँ।
मथुरा की मै सुघर ग्वालिनिया, राधा हमारा नाम हो, दहिया मेरी ले लो।"[vii]


इस संदर्भ में यहाँ यह भी बताना सर्वोपयुक्त होगा कि पिछले दो-तीन दशकों में पिछड़ी जातियों में राजनीतिक चेतना में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है तथा उत्तर भारत का यादव समुदाय भी एक मजबूत सामाजिक-राजनीतिक कड़ी के रूप में उभरा है। इस सामाजिक-राजनीतिक बदलाव को 'भारत की मूक क्रांति' कहा गया (क्रिस्टोफ जाफेलोट, 2003)। इस सामाजिक-राजनीतिक बदलाव का श्रेय लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, जे. पी. आंदोलन तथा मंडल आयोग को जाता है। हालाँकि यह सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन, यादव समुदाय में 'अखिल भारतीय यादव महासभा', 1923[viii] के गठन के समय से ही शुरू हो चूका था।  यह आंदोलन पुरुष औचित्य (masculinity) को भी बढ़ावा दिया (लुइसा मिशेट्टी 2008)। जिसके परिणाम स्वरूप ग्वालिनों का परम्परागत व्यवसाय 'दही बेचना' भी लुप्तप्राय हो गया। आज नयी पीढ़ियो का शिक्षा के प्रति रुझान बढ़ गया है तथा वे 'ग्वालिन' कहलाना भी पसन्द नहीं करती है। आज वे अपने आप को 'यादव' कहलाना अधिक पसंद करती हैं, क्योंकि 'यादव' शब्द आधुनिकता का बोध कराता है (देवी प्रसाद, 2016)। प्रायः यादव समाज के परम्परागत लोकगीतकार भी सहर्ष स्वीकार करते हैं तथा लोकगीत के माध्यम से इस नये बदलाव को व्यंग्यात्मक शैली में कुछ इस तरह से व्यक्त करते हैं-

''जब से लडकियाँ साइकिल चलाने लगी, तब से आगे का डंडा खत्म हो गया।''[ix]

[प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से लोकगीतकार समाज में पुरुषों के एकाधिकार के समाप्ति तथा लड़कियों में आत्मनिर्भरता की ललक की तरफ इंगित करना चाह रहा है।]

लोकगीतों में राजनीतिक आकांक्षा का अद्भुत समन्यवय देखने को मिलता है। हालांकि लोकगीत में राजनीतिक स्वरों का अध्ययन करने से पूर्व हमारा ध्यान ऐसी रचनाओं पर भी जाता है, जिसमें एक दमित या शोषित वर्ग प्रतिरोध के रूप में ‘बिरहा लोकगीत’ के माध्यम से अपनी आवाज बुलंद करता है। समाज के हाशिये पर खड़े वर्ग (अहीर जाति) की आवाज को जन-जन तक पहुँचाना ‘बिरहा लोकगीत’ का अनिवार्य भाग रहा है, जो कि मौखिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को (गुरु शिष्य परम्परा के रूप में) हस्तांत्रित किया जाता है। लुइसा मिशेट्टी ने अपने शोध में पायी कि आज यादव समुदाय स्वयं को 'पेट से ही राजनीति सीख कर आने वाली जाति' समझता है तथा हिन्दू देवता ‘श्रीकृष्ण’ को अपना ‘पूर्वज’ तथा ‘राजनीतिक गुरू’। कृष्ण से अपना सहोदर नाता जोड़ने के कारण, आज यादव समुदाय में एक अलग राजनीतिक समझ पैदा हुयी है। युवा वर्ग प्रायः यह दावा करता है कि 'राजनीति तो मेरे खून में है'। इस सोच का प्रमुख कारण हिन्दू देवता कृष्ण से उसका भावात्मक लगाव (2008)। ऐसी धारणा/चेतना के विकसित होने का प्रमुख कारण 'बिरहा लोकगीत' ही है। कुछ लोकगीतकारों से वार्तालाप करने के उपरांत यह उभर कर सामने आया कि अहीर/यादव समुदाय कुछ दशक पूर्व तक हीनभावना के शिकार थे, क्योंकि वे अपने आप को शूद्र समझते थे। लेकिन बिरहा लोकगीत ने उनमें 'अहीर गौरव गाथा'[x] तथा ‘रेजांगला की लड़ाई’[xi] के माध्यम से 'क्षत्रियत्व' का बोध कराया। कांचा ऐलय्या भी अपनी किताब 'पोस्ट हिन्दू इंडिया: अ डिस्कोर्स इन दलित-बहुजन, सोसिओ-स्प्रिटुअल एंड साइंटिफिक रेवोलुशन, 2010' में पशु-पालक जातियों के बारे में एक सकारात्मक छवि प्रस्तुत करते हैं तथा पशुपालन तथा श्रम के महत्व को रेखांकित करते हैं। यादव समुदाय में आये आत्म-सम्मान के सन्दर्भ में बिरहा लोकगीत का एक उदाहरण प्रस्तुत है-

''सहर चौकड़ी जिला जमुनपुर, जहाँ गैना अहिरिन को घर। ...
जब खूने के चले फुहारा, बहिगै धरती तिरै तर” (एम. प्रताप नारायण अवस्थी, 1985:197-98)।।

यादव समुदाय में दशकों से 'बिरहा' तथा 'लोरिक' लोकगीत बहुत लोकप्रिय रहा है। इन लोकगीतों को वे पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी स्मृति में सँजोते आये हैं। तथापि यादव समुदाय सिर्फ 'लोरिक' लोकगीत का विशेषज्ञ कहकर, उनकी आलोचना भी की जाती है।

''कतनो अहीर होय सयाना, लोरिक छोड़ ना गावहीं आना।''[xii]

संक्षिप्त में हम यह कह सकते हैं कि लोकगीत ग्रामीण जीवन के 'जीने के तरीके' के मौखिक इतिहास को अपने में समेटने के साथ ही अभिनव सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्यों को भी समेटे हुए है, जिसके फलस्वरूप ग्रामीण संस्कृति की यह विधा आज भी प्रासंगिक है। इस संदर्भ में मोहनानंद झा का मानना है कि 'सदियों से चले आ रहे रीति-रिवाजों, संस्कारों, त्योहारों, विवाहों, व्रत एवं पूजा विधानों में गाये जाने वाले गीतों और कथाओं को अपने कंठस्त रखने का श्रेय भी बहुजन महिलाओं को जाता है। झा के शब्दों में, "बहुत सी ऐसी लोरियाँ, विरह एवं तन्हाई तथा हर्षोन्माद के लोकगीत हैं जो संभवतः मानसिक स्तर से परिष्कृत एवं संवेदनशील दैनंदिन कामों में व्यस्त महिलाओं द्वारा जोड़ी गयी लड़ियाँ प्रतीत होती हैं, जिसमें साहित्यिक अन्य गुणों की कमी होते हुए भी भावाभिव्यक्ति की मार्मिकता  जरूर मिलती है।" समाजशास्त्री रावर्ट रेडफील्ड व मिल्टन सिंगर ने लोकगीत की परम्परा को 'लिटिल ट्रेडिशन' अवधारणा के अंदर समावेशित करते हैं। इस गुरु-शिष्य परम्परा में महिलाओं को भी सम्मानित स्थान मिला है। कुछ गायिकाएँ जैसे - राणा राव, कविता, प्रीति पाल, रजनीगन्धा, उजाला यादव, निलिमा सिंह, मालिनी अवस्थी, शारदा सिन्हा, कल्पना पटवारी, कौशिकी चक्रवर्ती आदि महती भूमिका निभा रहीं हैं। आज इंटरनेट व सोशल-मीडिया के जमाने में ये गायिकाएँ उत्तर भारत में काफी लोकप्रिय है तथा जनमानस पर अपने व्यक्तित्व की स्पष्ट छाप छोड़ने में काफी हद तक सफल हैं। यद्यपि ध्यान देने योग्य बात है कि लोकगीतों में व्यक्ति-विशेष का महत्व हमेशा गौण है तथा समाज व सामूहिकता को हमेशा प्रथम स्थान मिला है, जिससे ग्रामीण पारिवारिक, सामाजिक मुद्दे व महिलाओं की सामाजिक समस्याओं को एक सामाजिक विमर्श के रूप में लोकगीतकार प्राथमिकता देता रहा है।

निष्कर्ष
ग्रामीण संस्कृति तथा सामान्य जनमानस का लोकगीतों से हमेशा एक घनिष्ठ संबंध रहा है तथा पिछले दो-तीन दशकों में आधुनिक दूरसंचार के माध्यमों (जैसे- टीवी, कम्प्यूटर, स्मार्टफोन आदि) ने नयी पीढ़ी को स्पष्ट रूप से प्रभावित किया है। जिसके फलस्वरूप नई पीढ़ी मोबाइल फोन पर ही लोकगीतों का आनंद ले पा रही है।  हालांकि पश्चिमी सभ्यता के संगीत तथा भारतीय सिनेजगत ने परंपरागत ग्रामीण सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों का ह्रास किया है, जिसके परिणाम स्वरूप जनमानस के लोकगीत भी लुप्तप्राय से होने लगे है। ध्यातव्य है कि ग्रामीण महिलाएँ आज भी आधुनिक 'प्लास्टिक स्माइल' जैसे 'इमोजी’, व्यंग्यचित्र आदि को प्राथमिकता न देकर अपनी भावनाएँ हृदय को मुग्ध कर देने वाले लोकगीतों के माध्यम से व्यक्त करतीं  हैं । राणा राव, कविता, प्रीति पाल, रजनीगन्धा तथा मालिनी अवस्थी आदि विश्व प्रसिद्ध गायिकाएँ लोकगीतों के माध्यम से भारतीय ग्रामीण संस्कृति को सजाने व संवारने का सार्थक प्रयास कर रही हैं। ये गायिकाएँ बड़े-बड़े चैनलों के माध्यम से अपनी आवाज बुलंद कर रही हैं।

यदि हम ग्रामीण महिलाओं की सामाजिक-सांस्कृतिक दशाओं का मनोवैज्ञानिक पक्ष देखें तो ज्ञात होता है कि उनमें दो प्रमुख समस्याएँ हैं: एक तो परम्पराओं में गहरे अन्धविश्वास के कारण भूतनी आने की समस्या तथा दूसरी, यात्रा के दौरान मिरगी या चक्कर आने की प्रवृत्ति। मनोचिकित्सकों का मत है कि भूतनी आना 'हिस्टीरिया' नामक मनोवृत्ति है, जिसका प्रमुख कारण मानसिक तनाव या आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण ऐसी मनोवृत्ति जन्म लेती है। यहाँ यह संकेत करना अत्यन्त महत्वपूर्ण होगा कि 'इमोजी' या 'व्यंग्यचित्र' इन घनघोर मानसिक तनाव को दूर करने में अशक्त है तथा लोकगीत ही एक ऐसा माध्यम है जो ग्रामवासियों के हृदय की महत्वाकांक्षाओं, अभिरुचियों, हर्ष-विषाद आदि की तह तक पहुँचने में सक्षम है।

जनमानस में लोकगीतों की पहुँच का प्रमुख कारण लेखिकाओं या गायिकाओं का स्थानीय समुदाय से वाकिफ होना तथा एक भावात्मक जमीनी लगाव महसूस करना भी है। लोकगीत ग्रामीण महिलाओं की 'सेक्स-लाइफ' की परिस्थितियाँ तथा उनके शृंगारिक विभाव, अनुभाव तथा संचारी भावों पर खुलकर बात करता है। परन्तु ये महिलाएं कब व किन परिस्थितियों में पेटभर कर खाना खाती हैं और शौच के लिए कहाँ जाती हैं, आदि मुद्दे लोकगीतों में प्रायः गौण होते हैं। जो कि लोकगीतों पर पितृसत्तात्मक समाज के अधिपत्य की तरफ इंगित करता है तथा इन पर चर्चा किए बगैर महिलाओं की सामाजिक सहभागिता का लोकगीतों में चित्रांकन की बात करना बेमानी सिद्ध होगा। आए दिन समाचार पत्रों में बलात्कार की बातें सामने आती रहती हैं कि- शौच के लिए घर से निकली बालिका या महिला का बलात्कार। ये महिलाएं कौन हैं, जो शौच के लिए घर से निकलती हैं और उनका बलात्कार करके मार दिया जाता है? जाहिर है ये महिलाएं ग्रामीण इलाकों की गरीब, दलित-बहुजन बहू-बेटियाँ हैं। जिन्हें शौच के लिए रात होने का इंतज़ार करना पड़ता है क्योंकि दिन में पुरुषों के आवागमन के कारण खुले में महिलाएं शौच नहीं कर सकती और ना ही इनके घरों में शौचालय की सुविधा है। जिसके परिणाम स्वरूप स्त्रियों में कई नकारात्मक बदलाव दृष्टिगोचर होते हैं तथा स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं घर कर जाती हैं।

उपरोक्त मुद्दों के अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों में प्रदूषित पेयजल, देशी जहरीली शराब, अगुणवत्तापरक भोजन ग्रहण करना, भाँग एवं अन्य जहरीली पत्तियों का प्रयोग नशे के रूप में लेना तथा स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता के अभाव के कारण रोगों का प्रसार अधिक है। जिसके फलस्वरूप परिवार का आर्थिक तानाबाना दगमगा जाता है और इसका सीधा असर लड़कियों के शिक्षा पर पड़ता है। आज ग्रामीण युवक गाँव के स्वस्थ सामाजिक वातावरण से निकलकर रोजगार की तलाश में शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं। शहर में कम आय प्राप्त होने के कारण उन्हें गन्दी बस्ती के दूषित माहौल में रहना पड़ता है, जिससे नवयुवकों में जुआ खेलना, शराब पीना व वेश्यावृत्ति जैसी कुप्रवृत्ति फैलती है, और वे पुनः गाँवों में लौटते हैं तो गाँवों के स्वस्थ वातावरण को भी दूषित कर देते हैं, ज्यादातर जिसकी भुक्तभोगी महिलाएँ व कम उम्र के बच्चे ही होते हैं। आंकड़ों पर ध्यान दें तो ज्ञात होता है कि भारत में प्रति वर्ष लगभग 78 लाख, 3 हजार गर्भवती महिलाएँ एच.आई.वी. से संक्रमित हो जाती हैं, जिसके फलस्वरूप लगभग 23,490 बच्चे भी हर साल एचआईवी से संक्रमित हो जाते हैं। गाँव की इकाई 'परिवार' के कर्ता-धर्ता को मुखिया कहते हैं। यदि वह इन आकस्मिक कारणों से मृत्यु को प्राप्त होता है तो उसका परिवार बिखर जाता है और उस परिवार के लोगों को साहूकारों के सामने हाथ फैलाने के लिए विवश होना पड़ता है। विवशता, लाचारी, रोगग्रस्तता तथा ऊपर से साहूकारों (जिसे कान्या एलैया 'सोशल स्मगलर’ कहते हैं) की अमानवीयता या ज्यादती 'गरीबी के दुष्चक्र' को और भी कष्टसाध्य बना देती है। बिरहा लोकगीत में इन सामाजिक समस्याओं का वर्णन लेखकों द्वारा स्पष्ट रूप से गुम्फित किया जाता है।

टिप्पणियाँ
[i] Retrieved 30 October 2017, from https://www.gaonconnection.com/swayam-project/when-will-the-female-veterinarians-recognize
[ii] प्राथमिक स्त्रोत पर आधारित।
[iii] Retrieved 30 October 2017, from https://www.youtube.com/watch?v=9T-79tgXHoo
[iv]Retrieved 28 October 2017, from https://www.youtube.com/watch?v=Q7oW6ICR9HQ
[v]Retrieved 30 October 2017, from http://www.deshbandhu.co.in/parishist/%E0%A4%AD%E0%A4%BE %E0%A4%B0% E0%A4%A4-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%B2-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B9-13548-2
[vi] Retrieved 30 October 2017, from http://www.deshbandhu.co.in/parishist/bundeli-folk-saga-recorded-on-the-pages-of-history-61472-2
[vii] Retrieved 30 October 2017, from https://www.youtube.com/watch?v=Rr-2Z_cxjRU
[viii] “सन 1923 से पूर्व वे अलग-अलग स्थानीय संगठनों में विभाजित थे, जैसे- ‘यादव श्री कृष्ण प्रचारक मंडली’, मुंबई (1903), ‘गोपाल मंडली’ (1909), ‘अहीर यादव क्ष्रत्रिय महासभा’ (1908), ‘बंगिया गोप समिति’ (1922), आदि। ये स्थानीय संगठन सुनियोजित तरीके से सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए प्रयासरत थे, लेकिन अखिल भारतीय स्तर पर अपनी बातों को रखने का कोई व्यापक मंच उपलब्ध नहीं था। इसलिए 1923 में इन संगठनों ने एक साथ आने का फैसला किया, तथा बिहार में ‘अखिल भारतीय यादव महासभा’ की नीव रखी, जिसका प्रमुख उद्देश्य देशभर में फैली पशुपालक यादव जातियों को पहचानना तथा ब्रिटिश-भारतीय जनगणना में ‘यादव’ शब्द को एक उपजाति के रूप में दर्ज कराना था। यादवों में जातीय-उपजातीय पदानुक्रम को समाप्त करना, यादव जाति में फैली कुप्रथा, बाल-विवाह, दहेज प्रथा, नशावृत्ति, परम्पराओं की ओर अधिक झुकाव से मुक्ति दिलाना, इत्यादि इस संगठन के मुख्य उद्देश्य थे (देवी प्रसाद, 2017)।”
[ix] प्राथमिक स्त्रोत (अवलोकन) पर आधारित.
[x] Retrieved 30 October 2017, from https://yadavgatha.wordpress.com/2012/06/06/yadav-yaduvanshi-aheer-yadukul-ahir-gaurav-gatha-yaduvansh-history-poem-veer-ras-kavita/comment-page-1/
[xi] Retrieved 30 October 2017, from https://www.youtube.com/watch?v=KDj3r83zrM0
[xii] Retrieved 30 October 2017, from http://www.dalitweb.org/?p=3454


सन्दर्भ ग्रन्थ सूची
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संपर्क सूत्र

देवी प्रसाद, शोधार्थी, समाजशास्त्र विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय, गचिबोली, हैदराबाद -500046, तेलंगाना
ईमेल: dpsocio@gmail.com

सविता यादव, स्नातकोत्तर छात्रा, हिंदी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय, गचिबोली, हैदराबाद -500046, तेलंगाना
ईमेल: savita7088@gmail.com

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