बिस्मिल की आत्मकथा - अंश 24

संक्षिप्त परिचय
पण्डित रामप्रसाद 'बिस्मिल' ने अपनी जीवनी सन् 1927 में गोरखपुर जेल की कोठरी में लिखी थी। उनकी फाँसी से एक दिन पहले 18 दिसम्बर 1927 को जब उनकी माँ श्री शिव वर्मा के साथ उनसे अंतिम बार मिलने आयीं तब पंडित जी ने अपनी इस आत्मकथा की हस्तलिखित पांडुलिपि खाने के डब्बे में छिपाकर जेल के बाहर भिजवा दी। इस आत्मकथा का पहला प्रकाशन सिंध में भजनलाल बुकसेलर द्वारा सन 1927 में पुस्तक रूप में हुआ। बाद में इसे श्री भगवतीचरण वर्मा द्वारा भी छपवाया गया। पुस्तक छपते ही दमनकारी ब्रिटिश शासन ने इस पुस्तक पर प्रतिबन्ध लगा दिया और इसकी प्रतियाँ जब्त कर ली गयीं।

पण्डित जी 19 दिसम्बर 1927 को गोरखपुर जिला जेल में अशफाक उल्लाह खाँ, रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिड़ी के साथ हँसते-हँसते फाँसी चढ़ गए।

हुतात्मा पंडित रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा के अंश: सेतु के पिछले अंकों से
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... और अब, बिस्मिल की आत्मकथा - अंश 24

चतुर्थ खण्ड (पिछले अंक से जारी)


परिणाम

अब विचारने की बात यह है कि भारतवर्ष में क्रान्तिकारी आन्दोलन के समर्थक कौन-कौन से साधन मौजूद हैं? पूर्व पृष्‍ठों में मैंने अपने अनुभवों का उल्लेख करके दिखला दिया है कि समिति के सदस्यों की उदर-पूर्ति तक के लिए कितना कष्‍ट उठाना पड़ा। प्राणपण से चेष्‍टा करने पर भी असहयोग आन्दोलन के पश्चात कुछ थोड़े से ही गिने चुने युवक युक्‍तप्रान्त में ऐसे मिल सके, जो क्रान्तिकारी आन्दोलन का समर्थन करके सहायता देने को उद्यत हुए। इन गिने-चुने व्यक्‍तियों में भी हार्दिक सहानुभूति रखने वाले, अपनी जान पर खेल जाने वाले कितने थे, उसका कहना ही क्या है! कैसे बड़ी-बड़ी आशाएँ बांधकर इन व्यक्‍तियों को क्रान्तिकारी समिति का सदस्य बनाया गया था, और इस अवस्था में, जब कि असहयोगियों ने सरकार की ओर से घृणा उत्पन्न कराने में कोई कसर न छोड़ी थी, खुले रूप में राजद्रोही बातों का पूर्ण प्रचार किया गया था। इस पर भी बोलशेविक सहायता की आशाएँ बंधा बंधाकर तथा क्रान्तिकारियों के ऊँचे-ऊँचे आदर्शों तथा बलिदानों का उदाहरण दे देकर प्रोत्साहन दिया जाता था। नवयुवकों के हृदय में क्रान्तिकारियों के प्रति बड़ा प्रेम तथा श्रद्धा होती है। उनकी अस्‍त्र-शस्‍त्र रखने की स्वाभाविक इच्छा तथा रिवाल्वर या पिस्तौल से प्राकृतिक प्रेम उन्हें क्रान्तिकारी दल से सहानुभूति उत्पन्न करा देता है। मैंने अपने क्रान्तिकारी जीवन में एक भी युवक ऐसा न देखा, जो एक रिवाल्वर या पिस्तौल अपने पास रखने की इच्छा न रखता हो। जिस समय उन्हें रिवाल्वर के दर्शन होते, वे समझते कि इष्‍टदेव के दर्शन प्राप्‍त हुए, आधा जीवन सफल हो गया! उसी समय से वे समझते हैं कि क्रान्तिकारी दल के पास इस प्रकार के सहस्रों अस्‍त्र होंगे, तभी तो इतनी बड़ी सरकार से युद्ध करने का प्रयत्‍न कर रहे हैं! सोचते हैं कि धन की भी कोई कमी न होगी! अब क्या, अब समिति के व्यय से देश-भ्रमण का अवसर भी प्राप्‍त होगा, बड़े-बड़े त्यागी महात्माओं के दर्शन होंगे, सरकारी गुप्‍तचर विभाग का भी हाल मालूम हो सकेगा, सरकार द्वारा जब्त किताबें कुछ तो पहले ही पढ़ा दी जाती हैं, रही सही की भी आशा रहती है कि बड़ा उच्च साहित्य देखने को मिलेगा, जो यों कभी प्राप्‍त नहीं हो सकता। साथ ही साथ ख्याल होता है कि क्रान्तिकारियों ने देश के राजा महाराजाओं को तो अपने पक्ष में कर ही लिया होगा! अब क्या, थोड़े दिन की ही कसर है, लौटा दिया सरकार का राज्य! बम बनाना सीख ही जाएँगे! अमर बूटी प्राप्‍त हो जाएगी, इत्यादि। परन्तु जैसे ही एक युवक क्रान्तिकारी दल का सदस्य बनकर हार्दिक प्रेम से समिति के कार्यों में योग देता है, थोड़े दिनों में ही उसे विशेष सदस्य होने के अधिकार प्राप्‍त होते हैं, वह ऐक्टिव (कार्यशील) मेम्बर बनता है, उसे संस्था का कुछ असली भेद मालूम होता है, तब समझ में आता है कि कैसे भीषण कार्य में उसने हाथ डाला है। फिर तो वही दशा हो जाती है जो 'नकटा पंथ' के सदस्यों की थी।

जब चारों ओर से असफलता तथा अविश्‍वास की घटाएँ दिखाई देती हैं, तब यही विचार होता है कि ऐसे दुर्गम पथ में ये परिणाम तो होते ही हैं। दूसरे देश के क्रान्तिकारियों के मार्ग में भी ऐसी ही बाधाएँ उपस्थित हुई होंगी। वीर वही कहलाता है जो अपने लक्ष्य को नहीं छोड़ता, इसी प्रकार की बातों से मन को शान्त किया जाता है। भारत के जनसाधारण की तो कोई बात ही नहीं। अधिकांश शिक्षित समुदाय भी यह नहीं जानता कि क्रान्तिकारी दल क्या चीज है, फिर उनसे सहानुभूति कौन रखे? बिना देशवासियों की सहानुभूति के अथवा बिना जनता की आवाज के सरकार भी किसी बात की कुछ चिन्ता नहीं करती। दो-चार पढ़े लिखे एक दो अंग्रेजी अखबार में दबे हुए शब्दों में यदि दो एक लेख लिख दें तो वे अरण्यरोदन के समान निष्‍फल सिद्ध होते हैं। उनकी ध्वनि व्यर्थ में ही आकाश में विलीन हो जाती है। तमाम बातों को देखकर अब तो मैं इस निर्णय पर पहुँचा हूँ कि अच्छा हुआ था जो मैं गिरफ्तार हो गया और भागा नहीं, भागने की मुझे सुविधाएँ थीं। गिरफ्तारी से पहले ही मुझे अपनी गिरफ्तारी का पूरा पता चल गया था। गिरफ्तारी के पूर्व भी यदि इच्छा करता तो पुलिस वालों को मेरी हवा न मिलती, किन्तु मुझे तो अपने शक्ति की परीक्षा करनी थी। गिरफ्तारी के बाद सड़क पर आधे घण्टे तक बिना किसी बंधन के खुला हुआ बैठा था। केवल एक सिपाही निगरानी के लिए पास बैठा हुआ था, जो रात भर का जागा था। सब पुलिस अफसर भी रात भर के जगे हुए थे, क्योंकि गिरफ्तारियों में लगे रहे थे। सब आराम करने चले गए थे। निगरानी वाला सिपाही भी घोर निद्रा में सो गया! दफ्तर में केवल एक मुन्शी लिखा पढ़ी कर रहे थे। यह भी श्रीयुत रोशनसिंह अभियुक्‍त के फूफीजात भाई थे। यदि मैं चाहता तो धीरे से उठकर चल देता। पर मैंने विचारा कि मुन्शी जी महाशय बुरे फंसेंगे। मैंने मुंशी जी को बुलाकर कहा कि यदि भावी आपत्ति के लिए तैयारी हो तो मैं जाऊँ। वे मुझे पहले से जानते थे। पैरों पड़ गए कि गिरफ्तार हो जाऊँगा, बाल बच्चे भूखे मर जायेंगे। मुझे दया आ गई। एक घण्टे बाद श्री अशफाक‍उल्ला खाँ के मकान की कारतूसी बन्दूक और कारतूसों से भरी हुई पेटी लाकर उन्हीं मुंशी जी के पास रख दी गई, और मैं पास ही कुर्सी पर खुला हुआ बैठा था। केवल एक सिपाही खाली हाथ पास में खड़ा था। इच्छा हुई कि बन्दूक उठाकर कारतूसों की पेटी को गले में डाल लूँ, फिर कौन सामने आता है! पर फिर सोचा कि मुंशी जी पर आपत्ति आएगी, विश्‍वासघात करना ठीक नहीं। उस समय खुफिया पुलिस के डिप्‍टी सुपरिण्टेण्डेंट सामने छत पर आये। उन्होंने देखा कि मेरे एक ओर कारतूस तथा बन्दूक पड़ी है, दूसरी ओर श्रीयुत प्रेमकृष्ण का माऊजर पिस्तौल तथा कारतूस रखे हैं, क्योंकि ये सब चीजें मुंशी जी के पास आकर जमा होती थीं और मैं बिना किसी बंधन के बीच में खुला हुआ बैठा हूँ। डि० सु० को तुरन्त सन्देह हुआ, उन्होंने बन्दूक तथा पिस्तौल को वहाँ से हटवाकर मालखाने में बन्द करवाया। निश्‍चय किया कि अब भाग चलूँ। पाखाने के बहाने से बाहर निकल गया। एक सिपाही कोतवाली से बाहर दूसरे स्थान में शौच के निमित्त लिवा लाया। दूसरे सिपाहियों ने उससे बहुत कहा कि रस्सी डाल लो। उसने कहा मुझे विश्‍वास है यह भागेंगे नहीं। पाखाना नितान्त निर्जन स्थान में था। मुझे पाखाना भेजकर वह सिपाही खड़ा होकर सामने कुश्ती देखने में मस्त है! हाथ बढ़ाते ही दीवार के ऊपर और एक क्षण में बाहर हो जाता, फिर मुझे कौन पाता? किन्तु तुरन्त विचार आया कि जिस सिपाही ने विश्‍वास करके तुम्हें इतनी स्वतन्‍त्रता दी, उसके साथ विश्‍वासघात करके भागकर उसको जेल में डालोगे? क्या यह अच्छा होगा? उसके बाल-बच्चे क्या कहेंगे? इस भाव ने हृदय पर एक ठोकर लगाई। एक ठंडी साँस भरी, दीवार से उतरकर बाहर आया, सिपाही महोदय को साथ लेकर कोतवाली की हवालात में आकर बन्द हो गया।

[क्रमशः अगले अंक में]

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