परिवेशीय सृजनशीलता - हिंदी संसार का सच

चंद्र मोहन भण्डारी
चंद्र मोहन भण्डारी

जीवन के प्रखर समर्थक से 
जब प्रश्नचिन्ह
बौखला उठे थे दुर्निवार
तब एक समंदर के भीतर
रवि की उदभाषित छवियों का गहरा निखार
स्वर्णिम लहरों में झल्लाता झलमला उठा
मानो भीतर के सौ सौ अंगारी उत्तर
सब एक साथ झलमला उठे।
- गजानन माधव मुक्तिबोध


प्रस्तुत लेख में एक विश्लेषणपरक अध्ययन के निष्कर्ष देने का प्रयास है- विषय है भारत में विशेषकर हिन्दी भाषी संसार में (विशेषकर स्वातंत्र्योत्तर दशकों में) सृजन परिवेश। कई प्रश्न जो अक्सर चर्चित होते रहे हैं उनमें एक है कि संख्या बल देखते हुए हमारे देश में विशेषकर हिंदी संसार में साहित्यिक या अन्य विधाओं में वह क्रियाशीलता नहीं दिखायी देती जो संख्या के आधार पर अपेक्षित है। इस प्रश्न का कोई एक सरल उत्तर नहीं है। इसके कई कारण हैं जिनमें से कुछ पर चर्चा पहले भी की गयी है और कुछ का जिक्र प्रस्तुत लेख में किया जायगा। एक विशाल समाज व देश की स्थिति का अध्ययन सांख्यिकीय आधार पर ही संभव है जिसके अपने लाभ हैं और हानि भी। लाभ यह कि समस्या और उसके समाधान की दिशा में एक मोटा अंदाजा लगाया जा सकता है जो एकमात्र तरीका है एक बडे निकाय से जुडी चीजों के समझने के लिये। नुकसान यह कि इसे लेकर व्यक्ति विशेष को नहीं समझा जा सकता। बात अगर पूरे जंगल की हो तब एक या कुछ पेड़ों की बात नहीं हो सकती।  

विशेष शब्दावली: सांख्यिकीय आधार, एकल व परिवेशीय सृजनशीलता, आधारिक ढांचा, स्वस्थ मूल्यांकन, सृजन प्रारूप, पहला व दूसरा घेरा, समर्थ व सशक्त दूसरा घेरा, विषय वैविध्य, वैश्वीकरण, समांतरता व शृंखलाबद्धता, शृंखला प्रकिया, टीम वर्क, श्रेय-सहभागिता, रिले दौड, वैचारिक शृंखला।

बौखलाते प्रश्नचिन्ह

एक प्रश्न जो अक्सर उमड़ता रहा है मेरे मन में और लगभग हर हिंदी प्रेमी के मन में कि क्या कारण है हिन्दी भाषियों की विराट संख्या के बावजूद हिंदी को विश्व भाषाओं में वह स्थान नहीं मिला जो अपेक्षित है। इसके कई कारण हैं जिनमें से कुछ का जिक्र यहाँ करना चाहूंगा। इस प्रश्न का दायरा कुछ और विस्तृत कर लिया जाय तो प्रश्न कुछ इस तरह होगा कि इतने बडे हिंदी भाषी क्षेत्र में विभिन्न क्षेत्रों में जो परिवेशीय सृजनशीलता पल्लवित होनी चाहिये थी वह नहीं हो पायी, क्यों? इस सवाल में हिन्दी का रचना संसार भी शामिल हो जाता है साथ ही सामाजिक, आर्थिक और वैज्ञानिक संदर्भ भी इसके अंतर्गत लिये जा सकते हैं। पर पहले भाषा की ही बात करें।
 इस प्रश्न के कई उत्तर हो सकते हैं और कुछ यदा कदा चर्चित भी हुए हैं और कड़वा सच हमारे सामने रख हमें सोचने पर मजबूर कर देते हैं [1]। कभी यह भी होता है कि कुछ नये प्रश्न चिन्ह सामने आ जाते हैं जो ‘बौखला उठते हैं’। यह बौखलाहट बात की तह तक पहुँचने की है और उत्तर अप्रिय या कड़वा भी लग सकता है। बात से बात चल निकलती है. यह भी कि बात जब चल निकलती है तो दूर तक चली जाती है और कभी भीतर के ‘अंगारी उत्तर’ सामने आकर हमारी बौखलाहट कुछ और बढा देते हैं।

किसी भाषा को स्थान कौन देता है? भाषा का प्रयोग करने वाले - सामान्य पाठक, प्रबुद्ध पाठक व सृजनकर्ता यानि रचनाकार। व्यक्तिगत सृजनशीलता मायने रखती है पर अपने आप में पर्याप्त नहीं खासकर भाषा के सर्वांगीण विकास के संदर्भ में और वह हमारी चर्चा में समाहित नहीं इसलिये मुद्दा परिवेशीय सृजनशीलता का हो जाता है।

परिवेशीय सृजनशीलता स्वयं परिवेश या माहौल की देन हुआ करती है और हर नव सृजन क्रमश: उसे (माहौल को) अधिक समृद्ध करता जाता है और ऐसा जब जब होता है एक नहीं अनेक प्रतिभाऐं सम्मुख आ जाती हैं और सृजन का एक युग परिभाषित हो जाता है। यह बात साहित्य मे ही नहीं अन्य विधाओं में भी लागू होती है।
किसी भाषा का विकास उसका प्रयोग करने वालों की संख्या और गुणवत्ता दोनों पर निर्भर करता है। हिन्दी के मामले में संख्या बल निर्विवाद है पर गुणवत्ता के संबंध में यह नहीं कह सकते और उसमें काफी सुधार की गुंजायश है। भाषा दो स्तरों पर विकासमान होती है पहला स्तर सामान्य बोलचाल का है जिसमें हर व्यक्ति भागीदार है बडा, छोटा, धनी, निर्धन, शिक्षित, अल्प शिक्षा प्राप्त। दूसरा स्तर भाषा के विशिष्ट उपयोग का है जिसमें जटिल भावों व धारणाओं के लिये प्रावधान होने की जरूरत होती है ताकि भाषा विचारों के प्रभावी संप्रेषण में सहायक हो सके। विज्ञान में और आजकल कम्प्यूटर विज्ञान में यह बात साफ देखी जा सकती है। नयी शब्दावली, नया वाक्य विन्यास भाषा की सक्षमता को बढाते हैं। विज्ञान विधाओं के लिये गढे गये सैकडों शब्द आज सामान्य बातचीत में भी प्रभावी हो रहे हैं जो भाषा को समृद्ध करते हैं। भाषा की समृद्धता विकासशील होती है और समय के साथ नये शब्दों व प्रतीकों का प्रयोग व प्रभाव साहित्य की सभी विधाओं में भी परिलक्षित होता है।

आज विश्व में परिवर्तन की गति अत्यधिक तीव्र हो गयी है। मानव सभ्यता के इतिहास में तीन बडे क्रान्तिकारी परिवर्तन हए हैं – कृषि क्रान्ति, औद्योगिक क्रान्ति और सूचना क्रान्ति। पहली और दूसरी क्रान्तियों के बीच लगभग तीन हजार वर्षों का अंतर था जबकि दूसरी और तीसरी के बीच केवल तीन सौ वर्षों का। परिवर्तन की यह तीव्रता भाषा के विकास में भी परिलक्षित होती है नयी धारणाओं, नये संदर्भों को आत्मसात करने में। कोई भी जीवंत साहित्य केवल पारम्परिक आयामों तक ही सीमित नहीं रह सकता। अंग्रेजी साहित्य पर नजर डालें तो इस बात को आसानी से समझा जा सकता है।

वैश्वीकरण का प्रभाव

वैश्वीकरण के कारण भाषाई परिदृश्य में बडा बदलाव आया है जिसे चाहकर भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। आज अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय संप्रेषण की भाषा बन चुकी है और हर एक के लिये उसे सीखना अनिवार्य सा हो गया है। इस वैश्वीकरण के चलते विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी में इसके प्रयोग की अनिवार्यता ने अन्य भाषाओं के प्रयोग व विकास को प्रभावित किया है। यह बात हिन्दी के संदर्भ में और भी अधिक प्रभावी जान पडती है।
हम यह जानना चाहेंगे कि वे कौन से तत्व हैं जो सृजन परिवेश को समृद्ध करते हैं? इस सवाल ने मुझे पिछले कई दशकों से उलझाया है और इसका जवाब तलाशने की पुरजोर कोशिश की है। इन बातों का विस्तृत वर्णन मेरे उन लेखों में है जो काफी पहले प्रकाशित [2, 3, 4] हुए थे। मुझे लगता है इस तरह के लेखों को अधिकतर लोग नहीं पढ़ते और जो पढने में रुचि रखते भी हैं उन को वह प्रकाशन उपलब्ध नहीं हो पाता। प्रबुद्ध व जिज्ञासु पाठक वर्ग भाषा के विकास के लिये अनिवार्य है और साथ ही वह आधारिक ढ़ाँचा भी निहायत जरूरी है जो विचारों के विनिमय, संकलन व प्रकाशन का प्रभावी ढंग से प्रबंधन कर सके।

आज भारत जैसे देशों में अंग्रेजी केवल अंतर्राष्ट्रीय संपर्क भाषा न रहकर मातृभाषा के समान्तर खडी हो चुकी है और कहीं कहीं उसके लिये चुनौती बन गयी है। आज उच्च शिक्षा प्राप्त हर व्यक्ति अपने विशिष्ट कामों के लिये अंग्रेजी को स्वीकार चुका है और हिन्दी किसी हद तक सामान्य दैनिक कामों में प्रयोग तक सीमित रह गयी है।
वैसे यह बात विश्व की अन्य कई भाषाओं पर भी लागू होती है पर कुछ बातें ऐसी हैं जो हिन्दी भाषियों के लिये खास तौर पर कही जा सकती हैं। विशिष्ट अवसरों पर हम आपसी बातचीत में अंग्रेजी को माध्यम बना लेते हैं। यह भी सच है कि अंग्रेजी में अपने ही लोगों के बीच संप्रेषण में अधिकांश लोग गर्व की अनुभूति करते हैं और जो प्रभावी रूप से अंग्रेजी में संप्रेषण नहीं कर पाते उन्हें कुछ कमतर आँकने लगते हैं भले ही सोच के स्तर पर उनमें अधिक परिपक्वता हो। यह मानसिकता कुछ अपवाद छोड अधिकांश में देखी जा सकती है। ऐसे में हिन्दी को उसका उचित स्थान वाली बात बेमानी सी हो जाती है। यह भी कह सकते हैं कि हमारी मानसिकता को देखते हुए हिन्दी को उसका उचित स्थान ही मिल पाया है। जब हम अपनी भाषा को अपनों के बीच भी सम्मान का स्थान नहीं दे सकते तब फिर विश्व स्तर पर उसका कैसा स्थान तलाश रहे हैं?

सृजनशीलता – व्यक्तिगत या एकल प्रतिभा छोड – जिस सृजनशील माहौल की देन हुआ करती हैं वह हिन्दी जगत में लगभग अनुपस्थित है। हमें अपनी भाषा से वह लगाव नहीं है जो होना अपेक्षित है। अंग्रेजी के अंधमोह का एक ताजा उदाहरण - हाल में सुश्री हिमा दास ने 400 मीटर दौड़ में देश के लिये पहला अंतर्राष्ट्रीय स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा। तभी किसी विशिष्ट खेल अधिकारी ने इस प्रतिभागी की अंग्रेजी दक्षता पर अपनी आपत्ति दिखाकर उस मानसिकता का परिचय दिया जिसका जिक्र इस लेख में हुआ है। मैं इसी बात का जिक्र कर रहा था कि जब यह मानसिकता समाज मे अपनी पकड़ बना चुकी हो तब हम हिन्दी के किस उचित स्थान की बात कर रहे होते हैं।

किसी भाषा का स्थान उसका प्रयोग करने वाले बनाते हैं और अंग्रेजी से अभिभूत समाज मातृभाषा को कितना कुछ दे सकेगा यह विचारणीय है. जो अंग्रेजी से अभिभूत नहीं हैं उनके प्रयासों की प्रभावोत्पादकता जिन लाक्षणिकताओं पर निर्भर करती है उसकी कुछ चर्चा इस लेख में की जायेगी।

जब हम एक समाज की बात कर रहे होते हैं करोड़ों की बात कर रहे होते हैं तब कुछ ऐसे भी होते हैं जो सामान्य से अलग हैं, और जिन्हें औसत के मानदंड से नहीं आँका जाना चाहिये। साठ करोड़ में दस प्रतिशत भी यदि अपनी भाषा पर गर्व करते हों और उसके विकास में भागीदार बनें तो यह संख्या 6 करोड़ होती है जो विश्व के अधिकांश देशों की आबादी से अधिक होगी। इतनी संख्या भी कम नहीं है हिन्दी के स्थान को कई पायदान ऊपर ले जाने में। इसके जवाब में दो बातें कही जा सकती हैं: पहली बात यह कि संभवत: ऐसे लोग दस प्रतिशत भी नहीं हैं जो अपनी भाषा पर गर्व करें ओर उसके लिये कुछ करना चाहें। दूसरी संभावित बात यह कि शायद इतनी संख्या तो है पर कुछ अन्य कारण हैं जो सृजन में बाधक हैं। मेरा मानना है कि यह दूसरी बात सही है तब यह जानने का प्रयास करना होगा कि वह कौन सी बातें है जो समस्या के मूल में मुख्य हैं।

हम यह मानकर चलते हैं कि 6 करोड़ लोग ऐसे हैं जो अपनी भाषा से प्यार करते हैं और अंग्रेजी को मात्र संपर्क भाषा मानते हैं, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर। आज की दौड़-भाग वाली प्रतिस्पर्धात्मक जीवन शैली में, भाषा के सर्वांगीण विकास के लिये कुछ और भी दरकार है। सृजनशीलता की बात भाषा के सर्वांगीण विकास से जुड़ी है और परिवेशीय सृजनशीलता एक माहौल का प्रतिफल होती है। माहौल की बात करें जिसमें उचित शिक्षा, विविध साहित्यिक गतिविधियों की परम्परा जैसे गोष्ठियाँ, सेमिनार, सम्मेलन और प्रकाशन शामिल किये जा सकते हैं। साथ ही हर प्रकार की गतिविधि में गुणवत्ता पर आग्रह निहायत जरूरी है और गुणवत्ता के महत्व को हम अक्सर नजरअंदाज करते रहे हैं।

एक सृजन प्रारूप

एडवर्ड डि बोनो [5] ने सृजनशीलता के विषय पर गहन अध्ययन किया है। उन्होंने सृजनशील परिवेश के लिये एक प्रारूप दिया जिसके अनुसार बात को समझने के लिये हम दो समकेन्द्रीय वृत्तों या घेरों की कल्पना करते हैं। पहला वृत्त या घेरा छोटा पर केन्द्र के निकट है और दूसरा केन्द्र से दूर और बड़ा। पहले घेरे पर वे लोग हैं जो सृजन से अंतरंग रूप से जुड़े हैं जैसे लेखक, कवि, कलाकार, दार्शनिक, वैज्ञानिक आदि। दूसरे घेरे पर पाठक हैं जिनकी संख्या अधिक है और जो सृजन में सीधे भागीदार न होते भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। दोनों घेरे एक दूसरे से अलग-थलग नहीं अपितु अप्रत्यक्ष रूप से सम्पर्क में हैं। पहले घेरे का हर रचनाकार एक पाठक भी है और इस नाते कुछ हद तक दूसरे घेरे में भी है लेकिन दूसरे घेरे की आबादी का एक छोटा प्रतिशत ही पहले में शामिल हो पाता है। पहला घेरा सृजन से सीधे जुड़ा है और उसकी विशिष्टता व महत्व से लोग सामान्यतया परिचित हैं। पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि सृजन परिवेश के निर्माण में दूसरे घेरे की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। साहित्य हो या कला या कोई अन्य विधा उसके विकासमान होने या न होने का बीज दूसरे घेरे में है जो अपनी सबल क्रियाशीलता से प्रतिभा को आगे बढ़ने को प्रेरित कर सकता है। अच्छे साहित्य के प्रचार प्रसार में इसकी भूमिका आधुनिक संदर्भ में और भी बढ़ गयी है।

सघन सृजन परिवेश

पहले हम सृजन परिवेश या माहौल की बात कर चुके हैं। विस्तार से देखते हैं कि यह परिवेशीय समृद्धता है क्या और कैसे प्रभावित करती है सृजन की गुणवत्ता और उसके विस्तार को। ऐसा कई बार होता है जब एक प्रतिभाशाली व्यक्ति गुमनामी की जिन्दगी जीता है क्योंकि उसकी प्रतिभा की समझ रखने वाले उपस्थित नहीं हैं जो उसे और भी अच्छा करने के लिये प्रेरित कर सकें और साथ ही उससे कुछ सीखकर सृजन की एक परम्परा का निर्माण कर उसे विस्तार दे सकें, दिक व काल में। दिक से भाव चारों दिशाओं में क्षैतिज प्रसार का है और काल में समय के साथ परम्परा के दूर तक जाने की बात है। यदि ऐसा नहीं हो पाता तब कहा जायगा कि सृजन परिवेश या तो अनुपस्थित है या कमजोर है। यह बात साहित्य, कला, विज्ञान या अन्य किसी विधा पर लागू हो सकती है। सत्रहवीं तथा अठारहवीं सदियों में यूरोप में आधुनिक विज्ञान की नींव रखी गयी थी और धीरे-धीरे ऐसा परिवेश बनता गया जिसने एक क्रान्ति को जन्म दिया जिसे हम औद्योगिक क्रान्ति के नाम से जानते आये हैं। उस देश-काल में वैज्ञानिक चिन्तन के लिये अनुकूल परिवेश उपलब्ध था जिसका भरपूर लाभ यूरोपीय देशों को मिला विकास के पथ पर आगे बढ़ने के लिये। इसका बहुत दुरुपयोग भी हुआ और उपनिवेशवाद की डगर पर वैज्ञानिक उपलब्धि दूसरे देशों के शोषण का जरिया बन गयी। 

सृजन परिवेश किसी भी क्षेत्र में राष्ट्र की प्रगति का मानदण्ड निर्धारित करता है और प्रस्तुत लेख में हमारी चर्चा का केन्द्र बिन्दु है। भारत के संदर्भ में ऐसा सृजन परिवेश बीसवीं सदी के आरंभिक दशकों में कोलकता में निर्मित हुआ था विज्ञान, साहित्य, संगीत और कला में। जैसा पहले भी कहा जा चुका है जब ऐसा परिवेश विकसित हो जाता है तब हर क्षेत्र में सृजन के नये आयाम प्रस्तुत होने लगते हैं। यहाँ भारतीय विज्ञान, साहित्य, संगीत, कला व सिनेमा जैसी विविध विधाओं में बहुत कुछ घटा था बीसवीं सदी के आरंभिक दशकों में।

हिन्दी के संदर्भ में स्वतंत्रता के बाद के आरम्भिक दशकों में कुछ क्रियाशीलता नजर आती है पर वह अस्थायी थी। इन दशकों में कई पत्रिकाऐं प्रकाशित होती थी जो कालान्तर में अदृश्य हो गयीं. साप्ताहिक हिन्दुस्तान, धर्मयुग, दिनमान, सारिका इतने बडे पाठक वर्ग व रचनाकारों के लिये भी अपर्याप्त थे और संभवत: यह संख्या पन्द्रह या बीस तक पहुँचने की जरूरत थी पर यह संख्या चार से घटकर शून्य पर आ गयी। साठ करोड हिंदी भाषी एक भी पत्रिका को सुचारु रूप से चलाने की क्षमता नहीं रखते और फिर वे आश्चर्य करते हैं कि हिन्दी को उसका उचित स्थान क्यों नहीं मिलता। मिले भी क्यों जब इतनी बड़ी आबादी लगभग निष्क्रिय है मातृभाषा के संदर्भ में। और आज मैं सेतु के माध्यम से यह बात सामने रख पा रहा हूँ अन्यथा इस चर्चा का अता-पता भी नहीं होता और यह सारी बात गुमनामी के अंधेरे में खो गयी होती। यह भी एक व्यक्ति का प्रयास था जिसमें बाद मे लोग आ जुड़े। आशा है यह अभिनव प्रयास समय और परिस्थितियों के थपेडों से थमेगा नहीं, चिरस्थायी होगा। वैसे यह तभी संभव होगा जब सारी जिम्मेदारी एक इंसान के मत्थे न मढकर इसे जन भागीदारी का आधार दे सकें जो दुर्भाग्यवश अब तक हिन्दी जगत में लगभग अनुपस्थित रहा है। यह नहीं कि हिंदी भाषी अपनी मातृभाषा से लगाव नहीं रखते या उसके विकास हेतु कुछ करना नहीं चाहते पर एक गहन वैचारिक शैथिल्य व सृजन परिवेश की कमी उन्हें कुछ अवसर नहीं देती इस बात को हमें विस्तार से समझने की जरूरत है। 

स्वस्थ मूल्यांकन, गुणवत्ता और दूसरा घेरा

संक्षेप में बात कह लेने के बाद यह जरूरी है कि उसकी तह तक जाया जाये और जानने की कोशिश की जाये कि वैसा है तो क्यों है? हम उन बातों को जानना चाहेंगे जो सृजन की परम्परा को जन्म दे सकती हैं। हम यह भी जानना चाहेंगे कि कौन सी बातें हैं जो क्षैतिज व समय अक्षों पर दूर तक जा सकती हैं। एक जीनियस अपनी बात कहता है पर आसपास कोई ऐसा है ही नहीं जो उसे समझता हो और कोई ऐसी विधि नहीं जो उस बात को उन लोगों तक पहुँचा सके जिनमें उसकी बात को समझने की प्रतिभा हो। ऐसे में संभावना यही है कि वह प्रतिभा गुमनामी के अंधेरे में खो जाये। इतिहास में ऐसे कितने ही उदाहरण मिलेंगे पर चूंकि वे गुमनाम ही रहे उनके बारे में थोडी जानकारी कुछ ऐसी घटनाओं से हो सकीं जो गुमनाम होते होते रह गयीं। 

भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन का जिक्र समीचीन होगा। एक गरीब परिवार में जन्मे रामानुजन का गणित से लगाव था और कोई विशेष शिक्षा न मिलते भी कई महत्वपूर्ण गणितीय सिद्धान्त व निष्कर्ष उन्होंने अपने ही प्रयत्नों से प्राप्त किये जो आसपास के गणितज्ञ समझ पाने मे असमर्थ थे। रामानुजन ने अपना कुछ काम केम्ब्रिज के प्रोफेसर जी एच हार्डी के पास भेजा जिन्होंने रामानुजन की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें केम्ब्रिज बुलाया। गणित में उनके योगदान के लिये उन्हें एफ आर ऐस (फेलो आफ रायल सोसायटी) की उपाधि से सम्मानित किया गया। हार्डी भी अगर उस काम को न समझते या उस पर ध्यान न देते तो रामानुजन का काम कभी सामने न आ पाता।

ऐसे जीनियस अन्य विधाओं में भी होते रहे हैं जिनको उचित परिवेश व मदद न मिल पाने से उनकी प्रतिभा अजानी रह जाती है या सही तरीके से निखर नहीं पाती। साहित्य में भी कमोबेश यही बात लागू होती है। भाषा और उसका साहित्य अंतत: प्रबुद्ध पाठक और उसकी जागरूकता एवं क्रियाशीलता पर निर्भर करता है। कहते हैं, जंगल में मोर नाचा, किसने देखा? वैसे मोर हमारे आपके लिये नाच नहीं दिखाता और जिसे दिखाना होता है उसी के लिये नाचता है। कवि अपनी रचना खुद गुनगुनाता हो ऐसा भी हो सकता है पर अगर सुनने और सराहने वाले मिल जायें तो बात चल निकलती है और दूर तलक जा सकती है। पाठकीय जागरूकता और क्रियाशीलता की बात करें। साहित्यिक क्रियाशीलता में रचनाओं का स्वस्थ मूल्यांकन, पुस्तकों, पत्रिकाओं का प्रकाशन, वितरण आदि शामिल हैं इनमें कोई भी कमी सृजन शृंखला को प्रभावित कर सकती है। एक उदाहरण लें, पत्रिका या पुस्तक प्रकाशन हो रहा हो पर उसे खरीदने वाले पर्याप्त संख्या में नहीं तब प्रकाशक अनिश्चित काल तक घाटे का सौदा नहीं करेगा और उस तरह की पत्रिकाओं व पुस्तकों का प्रकाशन बन्द कर देगा. प्रबुद्ध पाठकों का अच्छी संख्या में होना और प्रकाशित साहित्य खरीदना भी महत्व रखता है। इसे हम सृजनशीलता का अर्थशास्त्र कहें तो अन्यथा न होगा।

स्वस्थ मूल्यांकन का महत्व

मूल्यांकन की निष्पक्षता जैसी छोटी छोटी बातें दूरगामी प्रभाव रखती हैं इस बात को समझने का प्रयास करेंगे। समान्यतया हर परीक्षा में मूल्यांकन होता है। पर यह अक्सर सुनने में आता है कि अमुक जगह मूल्यांकन में हेर फेर होता रहा है। हमारे देश मे हेरा फेरी और घोटालों की कमी नहीं रही है और आजादी के बाद ये अनियंत्रित रूप में बढे हैं। जिस शिक्षा पर हम अक्सर गर्व करते आये हैं उसका विघटन जिस तेजी से हो रहा है वह हमारे देश में शिक्षा के भविष्य के लिये चिंता का विषय है। पहले बिजनेस स्कूल की चर्चा होती थी अब स्कूल खोलना बिजनेस हो चुका है। इंटरनेशनल स्कूलों की जैसे बाढ़ सी आ गयी है जहाँ संभ्रांत परिवार के बच्चे ऊँची फीस लेकर भर्ती किये जाते हैं। अंग्रेजी माध्यम ही इनका एकमात्र आकर्षण है और शिक्षा का स्तर जैसे प्रश्न बेमानी लगते हैं। जो नेशनल या स्थानीय स्तर के भी नहीं वे इंटरनेशनल कहलाते हैं। कुछ संस्थानों और विश्वविद्यालयों को छोड अधिकांश में शिक्षा के स्तर व मूल्यांकन मामलों में यह गिरावट छात्रों के अलावा शिक्षकों की चयन प्रक्रिया में भी दिखायी देती है। लगभग एक साल पहले सेतु में प्रकाशित अपने लेख [6] में मैंने इस विषय पर विस्तार से चर्चा की थी। इस विषय पर कोई प्रतिक्रिया पाठकों की ओर से नहीं प्राप्त हुई। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि हिंदी जगत के संदर्भ में सृजन का दूसरा घेरा सशक्त नहीं है।

यह अफसोस के साथ कहना पडता है कि इस तरह की बातें हिन्दी भाषी क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक होती रही हैं। परीक्षा हो या पत्रिका प्रकाशन - गुणवत्ता से समझौता किया गया तो निश्चय ही उत्कृष्टता की आशा करना बेमानी होगा। गणितज्ञ हार्डी ने काम की गुणवत्ता देख कर ही रामानुजन की मदद की अन्यथा हम इस गणितज्ञ का नाम भी न जान पाते। साहित्य में भी कमोबेश यह सब देखने को मिलता है। पत्रिकाऐं हिन्दी जगत में नहीं के बराबर हैं और जहाँ हैं भी, प्रकाशन केवल गुणवत्ता को आधार बनाकर ही नहीं अन्य कारणों से भी होता है ऐसे में स्वस्थ मूल्यांकन कैसे हो सकेगा और कैसे सृजन की शृंखला दूर तक जा सकेगी। 

कुछ समय पूर्व सेतु ने अपने जीवन के तीन वर्ष पूरे किये और हम सभी यह जानकर खुश हुए कि लगभग तीन लाख ‘हिट’ का महत्वपूर्ण आंकडा सामने आया। हमने हिंदी जगत के संख्या बल की बात की है जरा इस पर भी विचार करें। तीन लाख की यह संख्या हिंदी भाषी संसार की साठ करोड आबादी का लगभग 0.05 प्रतिशत है। एक पाठक या लेखक कई बार हिट करता है इसे देखते हुए पाठकों की संख्या और भी कम होगी यानि .05 प्रतिशत से भी कम। यह पाठकीय प्रतिशत बहुत कम है लगभग नगण्य। गुणवत्ता की बात दूर यह संख्या बल भी लगभग नगण्य है। 

समय अक्ष पर सृजन शृंखला

बात को दूर तक ले जाने की प्रक्रिया पर विचार करते हैं. हमारे यहाँ कितनी संस्थाएँ हैं जो दो सौ साल पुरानी हैं कितनी पत्रिकाएँ हैं जो पचास साल पुरानी हैं? हिन्दी में शायद एक भी न हो जबकि दो दर्जन होनी चाहिये थी आबादी को देखते हुए। जिन भाषाओं को बोलने समझने वाले हमारी तुलना में बहुत कम हैं वहाँ भी पत्रिकाओं की संख्या अधिक है। तेलुगु और मलयाली में पत्रिकाओं की संख्या अच्छी है जो कि हिंदी में लगभग नगण्य है। 

ब्रिटेन में रायल सोसायटी की स्थापना की गयी थी सन 1650 के करीब जिसका काम था वैज्ञानिक शोधों की गुणवत्ता को परखना और उनका प्रकाशन। यह संस्था लगभग चार सौ साल बाद आज भी वैसे ही कार्यरत है। रायल सोसायटी का मोटो था – ‘नुलियस इन वरवा’ (Nullius in Verba) – जिसका अर्थ है किसी की भी बात सहज स्वीकार मत करो चाहे वह कितना ही प्रभावशाली क्यों न हों। कहने का तात्पर्य यह कि उस बात को तर्क की कसौटी पर जाँचा परखा जाये तभी उसे स्वीकार किया जाय। यह बात विज्ञान के संदर्भ में कही गयी थी पर यह हर क्षेत्र में लागू होती है। गुणवत्ता का मूल्यांकन स्वस्थ और सही होना चाहिये और जब मूल्यांकन सही होगा जब वह तर्क आधारित होगा न कि व्यक्ति आधारित। बीसवीं सदी के मध्यवर्ती दशकों में क्वांटम सिद्धान्त की मूलभूत अवधारणा गहन चर्चा का विषय थी और आइंस्टाइन जैसे प्रतिभावान वैज्ञानिक को दो दशकों तक चली बहस के बाद स्वीकारना पड़ा कि उनका दृष्टिकोण गलत था। स्वस्थ व तर्क आधारित मूल्यांकन सघन सृजन परिवेश की पहली व आवश्यक शर्त है जिसमें अन्य बातों के अलावा उचित आधारिक ढांचे (infrastructure) की उपलब्धता शामिल है और एक सबल व क्रियाशील दूसरा घेरा इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

समांतरता व शृंखलाबद्धता

अब हम दूसरी महत्वपूर्ण बात पर आते हैं जिस पर साधारणतया ध्यान नहीं जाता। चिंतन को मोटे तौर पर हम दो भागों में बाँट सकते हैं सुविधा के लिये हम उन्हें समांतर और शृंखलाबद्ध चिंतन कहेंगे। मान लें हम किसी समस्या विशेष का हल खोजने का प्रयास कर रहे हैं। हर विचारशील व्यक्ति अपने अपने तरीके से प्रयास करके किसी निष्कर्ष पर पहुँचता है यह समांतर चिंतन कहलाता है। पर जटिल समस्या का हल इतनी सरलता से व्यक्तिगत प्रयास मात्र से नहीं खोजा जा सकता। बात को आगे बढाना जरूरी है जिसमें आपसी चर्चा करके उन अलग अलग निष्कर्षों का तुलनात्मक अध्ययन कर अपेक्षाकृत सरल और प्रभावी बिन्दुओं का चयन कर आगे बढ़ना होता है। विभिन्न समस्याओं के समाधान का यह तरीका नया नहीं है और प्रयोग में लाया जाता रहा है। लेकिन अक्सर होता यह है कि योग्य समर्थन, निष्पक्ष मूल्यांकन व समर्थता हम नहीं जुटा पाते और बात दूर तक नहीं जा पाती। तब यह कहा जायगा कि शृंखला दूर तक नहीं जा सकी।

वैचारिक शृंखला - एक रिले दौड़

शृंखलाबद्धता एक रिले दौड़ की तरह है जिसमें मैं कुछ दूर तक दौड़कर अपना प्रतीक चिन्ह या टोकन दूसरे को थमा देता हूँ। वह दूसरा धावक एक निश्चित दूरी तय कर अपना टोकन तीसरे को थमा देता है और इस तरह हर धावक थोडा दूर ही जा पाता है पर टोकन काफी बड़ी दूरी तय कर लेता है।

टोकन की तुलना विचार या चिंतन से कर सकते हैं जो काफी दूर तक जा सकता है अगर रिले दौड़ की हमारी इच्छा और समर्थता मौजूद हो। इसमें क्या कठिनाई हो सकती है जरा विचार कर लें। इसमें धावकों के बीच अच्छे तालमेल की जरूरत होगी जिसमें उचित सहयोग व समर्थन अति आवश्यक हैं। अच्छा धावक यह सोच सकता है कि मैं इतना तेज जा सकता हूँ एकल दौड़ पर ही ध्यान क्यों न केन्द्रित करूँ तब सारा श्रेय मेरा ही होगा जो रिले दौड़ में कई धावकों में आवंटित होगा। यह एक मनोवैज्ञानिक पहलू है जो अपनी जगह पर महत्वपूर्ण है। निश्चय ही रिले दौड़ में कुछ बिन्दु महत्व के हैं [1] टीम भावना, [2] उचित समन्वय, [3] न्यायपूर्ण श्रेय साझेदारी।

मेरा यह मानना है कि रिले दौड़ एकल दौड़ की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक कठिन है जिसके लिये कुशल प्रबंधन जरूरी है और जिसके अभाव में इसकी सफलता पर प्रश्नचिन्ह आसानी से लग सकते हैं। शृंखला निर्माण के लिये वे सभी बातें आवश्यक होती हैं जो रिले दौड़ में भी आवश्यक हैं। मेरा यह भी मानना है कि हम शृंखलाबद्ध चिंतन में कुशल नहीं है व्यक्तिगत स्तर पर प्रतिभा की कमी न होते भी। अपने पहले प्रकाशित लेखों [ 2, 3] में इस बात पर मैंने विस्तार से चर्चा की है लेकिन शृंखलाबद्धता की कमी के कारण वह बात आगे नहीं बढ़ सकी और एक वैचारिक शृंखला निर्मित न हो सकी। उन लेखों को कुछ प्रबुद्ध पाठकों ने पढा होगा पर मैंने उस पर सहमति या असहमति सूचक कोई आलोचनात्मक बात नहीं सुनी और वह बात आगे न बढ़ सकी। यह भी संभव है कि कुछ और लेखकों ने इन बिन्दुओं पर अपने तरीके से चर्चा की हो जो मुझ तक नहीं पहुँच सकी। पत्रिकाओं की उपस्थिति और उनकी सामान्य पाठक तक पहुँच भी जरूरी शर्तें हैं वैचारिक शृंखला निर्माण के लिये। 

शृंखला प्रक्रियाएँ हर विधा में अलग हो सकती हैं और उनकी प्रभावोत्पादकता भी अलग हो सकती है। साहित्य या कला की तुलना में दर्शन या विज्ञान जैसी विधाओं में वे बहुत महत्वपूर्ण हैं। 

अन्य प्रारूप

शृंखला प्रक्रिया निर्माण में रिले दौड़ के अतिरिक्त अन्य प्रारूप भी लिये जा सकते हैं। लकड़ी या कोयला लेकर आग जलाने की प्राचीन प्रक्रिया पर ध्यान दें। हम कोयले के टुकड़ों को इस तरह रखते हैं कि वे न तो बहुत पास पास हों और न ही बहुत दूर दूर। बहुत पास रखने पर उनके लिये जरूरी आक्सीजन ठीक से न मिल सकेगी और आग न जल सकेगी। दूर होने पर भी आग न जल सकेगी क्योंकि कोयले एक दूसरे की ऊष्मा से वंचित रहेंगे। आधुनिक प्रौद्योगिकी में नाभिकीय शृंखला प्रक्रिया के निर्माण में भी कुछ यही धारणा काम करती है। इसमें क्रांतिक द्रव्यमान की बात महत्व की है जिसमें नाभिकीय पदार्थ जैसे यूरेनियम की मात्रा एक आवश्यक न्यूनतम से अधिक होनी जरूरी होती है ऐसा न होने पर नाभिकीय शृंखला प्रक्रिया आरम्भ नहीं हो सकेगी। एटम बम हो या एटमिक रिएक्टर इस बात का ध्यान रखना जरूरी है। कुछ इसी तरह की बात कोयलों के संदर्भ में भी सही है, एक या दो कोयलों से आग नहीं जलेगी उसके लिये एक न्यूनतम मात्रा होना आवश्यक है। वैचारिक शृंखला के संदर्भ में इन प्रारूपों का महत्व देखा जा सकता है जिसमें एकल व सामूहिक कार्यों के बीच समन्वय जरूरी है। यदि मैं सारा समय चर्चा में ही लगा रहूँगा तब चिंतन पर ध्यान न दे सकूंगा। यदि मैं एकल चिंतन ही करूँ और विचार विनिमय पर ध्यान न दूँ तब भी बात आगे न बढ़ सकेगी। दोनों किस अनुपात में होंगे यह परिस्थिति व आपसी तालमेल पर निर्भर करेगा।

मैं सभी ओर से खुला हूँ
वन सा, वन सा अपने में बंद हूँ
शब्द में मेरी समाई नहीं होगी
मैं सन्नाटे का छंद हूँ।
- अज्ञेय

चारों ओर से खुला और अपने में बन्द – दोनों के बीच एक तालमेल जरूरी है जिसका उचित अनुपात व्यक्ति और परिवेश की लाक्षणिकताओं के साथ बदल सकता है। 

यहाँ पर जो कुछ चर्चित हुआ है वह एकदम नया हो ऐसा भी नहीं है। हाँ, शब्दावली नयी हो सकती है। गौर से देखें तो साफ दिखायी देगा कि किसी भाषा का विकास स्वयं एक शृंखला प्रक्रिया की देन है। कुछ यही बात संस्कृति के लिये भी कही जा सकती है। इन प्रक्रियाओं व धारणाओं का प्रयोग किसी न किसी रूप में होता रहा है और होता रहेगा। हमारा प्रयास यह होना चाहिये कि इस प्रतिस्पर्धात्मक युग में हम उस कार्य को अधिक दक्षता और समझदारी के साथ कर सकें।

पिछले कई दशकों में भारतीयों ने विज्ञान तथा अन्य क्षेत्रों में एक मुकाम हासिल किया है। अगर हम गौर से देखें तो कुछ अपवाद छोड उच्च स्तरीय काम विदेश में ही हो सका है। क्यों है ऐसा यदि हम विश्लेषण करें तो साफ होगा कि विदेश में प्रबंधन, टीम वर्क व श्रेय-सहभागिता हमें नहीं करना है। शृंखला की हर आवश्यक शर्त पहले से तय की हुई है हमें बस काम करना है। रिले का सारा प्रावधान और प्रबंधन कुशल हाथों में है। 

इन्हीं कारणों से प्रस्तुत लेख में मैंने एक सबल और समर्थ दूसरे घेरे पर बल दिया है और साथ ही उचित आधारिक ढांचे की बात कही है जिसका हिंदी जगत में बडा अभाव रहा है। आज सेतु के माध्यम से इन बातों को पुन: सामने लाना संभव हो सका है। सेतु व ऐसी कुछ अन्य पत्रिकाओं ने आंशिक रूप से वह आधारिक ढाँचा दिया है जिसकी कमी सभी हिंदी भाषियों को खलती रही थी। किन्तु यह परीक्षा अभी बाकी रहेगी कि क्या इस प्रयास को हम स्थायी या दीर्घकालिक बना सकते हैं? यह रिले दौड़ की तरह एक सहयोगी, समन्वयात्मक व स्वस्थ टीम वर्क के बिना कारगर नहीं हो सकेगा।

परिस्थितियाँ कठिन हैं और आगे का मार्ग आसान नहीं। कुछ निराशावादी क्षणों में यह भी सोचने लगता हूँ कि रिले का सवाल तो तब उठेगा जब दौड़ने वाले तैयार हों, वह भी टीम भावना के साथ। लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि हिंदी का जन्म एवं विकास कठिन समय से होकर गुजरा है और ऐसे निराशा के पल संघर्ष का हिस्सा होते हैं। आज उस आधारिक ढाँचे को सुदृढ करने का प्रयत्न किया जा सकता है जिससे वैचारिक शृंखला आगे बढायी जा सके। मैंने पहले भी कहा है हिंदी जगत में व्यक्तिगत या एकल प्रतिभाओं की कमी नहीं है जरूरत सृजन परिवेश को सशक्त एवं समृद्ध करने की है ताकि सृजन का एक युग परिभाषित हो सके। 

शब्दों-शब्दों में वाक्यों में
मानवी अभिप्रायों का जो सूरज निकला
उसकी विश्वाकुल एक किरण 
तुम भी तो हो
धरती के जी को अकुलाने वाली
छवि-मधुरा कविता की 
प्यारी-प्यारी सी एक कहन 
तुम भी तो हो।
- मुक्तिबोध

संदर्भ

[2] चन्द्र मोहन भंडारी, सृजनशीलता- दूसरा घेरा, आविष्कार, नयी दिल्ली, जनवरी 1995.

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