कहानी: देवों का देश

- मुक्ता सिंह-ज़ौक्की


भौतिकी में पी एचडी, मुक्ता सिंह-ज़ौक्की हिन्दी और अंग्रेज़ी, दोनों भाषाओं में लिखती हैं। इनकी कई कहानियाँ भारतीय और अमरीकी पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। सन् 2008 में ये अमरीकी स्टोरीकोव शॉर्ट फ़िक्शन अवार्ड से सम्मानित हुई थीं। 2014 में इनका पहला उपन्यास “द ठग्ज़ ऐंड ए कोर्टिज़न” प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास का हिन्दी अनुवाद “ठग” 2018 में प्रकाशित हुआ।


-1-
सीता से प्रसव-पीड़ा सहन नहीं हो पा रही थी। बड़ी देर से तड़प रही थी। हर बार टीस उठती और सीता ज़ोर से हूकने लगती, सिरहाने बैठा दया उसके कंधे पकड़ कर उसे सम्हालता। सिर झुकाए आँसुओं के बाँध तोड़ते जाता। फिर एक और टीस उठी, सीता ने समझ लिया कि ये अंतिम वाली ही है। उससे गर्भ धकेला नहीं गया। चौंक कर उसने दया की पकड़ कस ली, आँखें फाड़ कर उसे देखती रही। दया के मुख से इतना नहीं निकल पाया, मत जाओ! सीता को उसने अपने सीने से लगा लिया और मन ही मन ये कह कर कि जाओ! लिखा होगा तो फिर मिलेंगे, अपनी पत्नी को विदा कर दिया।
सीता की साँस रुक गई थी, लेकिन हवा में उसकी चबकती चीत्कार अब भी स्पंदन कर रही थी। दया ने उसका सिर अपनी बाहों से रिहा कर के पलंग पर कर दिया। दीवार पर लगी घड़ी पर समय जाँचा। उसके चेहरे पर एक अंतिम बार हाथ फेरा और उठ कर बाहर जाने लगा।
अंदर डॉक्टर बच्चे को बचाने में लगे थे। गर्भ में दो जुड़वाँ बच्चियाँ थीं। बाहर सीता की माँ और भाई खड़े थे। बूढ़ी, थकी माँ ने अपने नव-विधुर दामाद को सम्हाला। उसका माथा चूमा।
हो गया, बिना किसी भाव के दया ने कहा।
हाँ, बेचारी सीता। कितना चाहती थी अपनी बच्चियाँ जनना ... दया की तरह माँ भी भावहं से रिक्त हो चुकी थी। बस बोले जाना चाह रही थी।
दया ने सीता के भाई को संकेत भेजा। कश्यप।
उसकी आवाज़ इतनी हल्की थी कि उस बंद हॉलवे में भूले से अगर हवा का झोंका घुस आता तो उसके शब्दों को संग उड़ा ले जाता।
भाई ने हौले से सिर हिलाया। बाहर चला गया।
-2-
सूरज ढलते ही इस देश की काया पलट जाती है। गाता हुआ जग एक वीरान जगह बन जाता है। खिलखिलाते खेलते-कूदते हुए बच्चे, ऑफ़िस से घर लौटती कारें, बाहर टहलते लोग – सभी को उनके-उनके घर दबोच लेते हैं। घरों की लिविंग-रूम की खिड़कियों से टीवी की रौशनी के गोले प्रेतों के भांति फुदकते हुए दिखते हैं और सड़क किनारे पेड़ अंधेरे में राक्षस से खड़े लगते हैं।
फिर भी, कोई शांति से टहलना चाहता है, तो इस समय ही निकले। तब मंद पवन हाथ घुमा के आसपास के इलाकों को अपने लपेट में ले लेती है, शाम की महक फड़क-फड़क के तीव्र हो जाती है और कानों को दूर से उठती शहर की धीमी दहाड़ भाने लगती है।
और लगभग हर बार कश्यप से मिलना हो जाता है।
कश्यप! कंधे ताने, मुट्ठियाँ जेबों में घुसेड़े, बिजली के स्केटबोर्ड पर सवार, कश्यप! हवा में उसके सिर के ऊपर, बाज़ की तरह कभी नीचे को जाते, कभी ऊपर उठते, लेकिन हमेशा उसके आसपास, उसके साथ-साथ मंडराता है उसका ड्रोन, बाज़-ड्रोन
अंधेरा होते ही कश्यप खाली रास्ते ऐसे नापता है जैसे वह कोई पिशाच हो। लेकिन वह एक ग्रह-गणितज्ञ है, इस इलाके का ज्योतिषी। दिन में डाकिया घरों के चक्कर लगाता है, शाम होते कश्यप। तब इस सभ्य देश में सब अपने-अपने घरों में मिल जो जाते हैं।
कश्यप एक निपुण ज्योतिषी है। अंतरिक्ष में स्थित ग्रहों और नक्षत्रों की परस्पर दूरी, गति और परिमाण और उन सब का इंसानों पर सूक्ष्म से सूक्ष्म प्रभावहं का वह पूरा ज्ञान रखता है। इस देश में ज्योतिष-विज्ञान इतना विकसित है कि यहाँ हरेक अपने साथ अपने जीवन की कहानी की किताब लिये घूमता है। जब आगे का कुछ जानना होता है, तो समय बीतने का इंतज़ार नहीं करना पड़ता है, बस कुछ पन्ने पलट कर जान लेता है। इस तरह अपने जीवन की हर छोटी-बड़ी घटना के लिये तैयार रहता है। अपने इलाके के सब लोगों की जीवन कुंडली कश्यप अपने डेटा-बेस में रखता है। बाज़-ड्रोन लगातार इस डेटाबेस की छानबीन करता रहता है। जब दो अनजान लोगों को मिलना होता है, तब कश्यप का काम सामने आ जाता है। लोग उससे सम्पर्क करते हैं, छानबीन कर वह शाम को निकलता है, बारी-बारी से दोनों घरों के दरवाज़े खटखटाता है, उन्हें सायत से और एक दूसरे के पते से अवगत कराता है, और चला जाता है।
जैसे कि उस शाम हुआ था। जब कश्यप ने खंडेलवाल परिवार का दरवाज़ा खटखटाया और खंडेलवाल जी ने स्वागत करते हुए कहा, हाँ कश्यप, तुम आ गए!
कश्यप के हाथ में एक ड्राइव था। बोला, श्रीमान, अगले माह आपकी बेटी की शादी के शुभ-मुहूर्त के सिलसिले में आया हूँ। लड़के की कुंडली, नाम और पता देख लीजिये।
खंडेलवाल जी ने कश्यप को अंदर आमंत्रित किया, डेटा लेने के लिये अपना स्मार्ट-फ़ोन आगे बढ़ा दिया और आवाज़ ऊँची करके बोले, अजी सुनती हो!
देखते ही देखते मिसेज़ खंडेलवाल चौके से प्लेट में मिठाई लेकर हाज़िर हो गईं और बेटी खंडेलवाल कहीं से उड़ती हुई आई, और पिता के हाथ से उनका फ़ोन छीन कर वापस उड़ गई।
लो बेटा, खुश-खबरी ले कर आए हो। लड्डू खाओ।
कश्यप ने उन्हें बधाई दी और एक लड्डू उठा लिया। फिर जब जाने को हुआ तब मिसेज़ खंडेलवाल बोल उठीं, और तुम बताओ तुम्हारी शादी कब की पड़ रही है?
वह हँस दिया। अभी कुछ समय और बकाया है आज़ादी का, जी भर के उसे जी लूँ  - कहते हुए चला गया।
-3-
बाज़-ड्रोन ने अगले पते का रास्ता पकड़ लिया था। कंधे ताने, मुट्ठियाँ जेबों में घुसेड़े, बिजली के स्केटबोर्ड पर सवार, कश्यप बेपरवाह बाज़-ड्रोन के पीछे लगा हुआ था। सोच में डूबा था।
ये हम कैसे कारागार में फंसे हुए हैं? सब कुछ मालूम है, नाखुश फिर भी हैं!
घने अंधेरे में दो बत्तियाँ जली थीं, एक कश्यप के स्केटबोर्ड की, दूसरे उससे कई सिर ऊपर।
अब जिस पते पर जाऊँगा, वहाँ सबसे ज़्यादा नाखुशी फैलाऊँगा।
उस पते पर रहने वाली – मयूरी - हमेशा भावविभोर जो रहती थी। कभी प्रेम-भाव में रमी होती, कभी नए ज्ञान से आश्चर्यचकित! जब जीवन की कोई निराशा – छोटी या बड़ी - सामने आती, तब तबाह हो जाती।
बाज़-ड्रोन उसके किवाड़ के सामने ऊपर-नीचे मंडराने लगा। कश्यप ने देखा कि दरवाज़े पर कई लाइनें लिखी थीं ... किसी और देश का गीत लिखा था।
मधुर-मधुर सपनों में देखी मैंने राह नवेली,
छोड़ चली मैं लाज का पहरा जाने कहाँ अकेली,
चली रे जाने कहाँ अकेली ...
मन डोले मेरा तन डोले
मेरे दिल का गया करार रे
कौन बजाए बाँसुरिया [1]
दरवाज़ा पहली रिंग में ही खुल गया। खोलने वाली ख़ुद मयूरी थी।
तुम? उसके चेहरे पर एक प्यारी मुस्कान फैली थी। आखिर तुम आ ही गए। इतनी बार तुम्हें देखा है, बात कभी नहीं हो पाई। चलो आज अच्छी तरह बातें करेंगे। इतना कह कर वह कश्यप का हाथ खींच कर उसे अंदर ले आई।
कश्यप अंदर खिंचे हुए चला आ रहा था, हिचकिचा रहा था, और उसी हड़बड़ाहट में बोले जा रहा था। दूत हूँ, बस इसीलिये मुझे सब जानते हैं। सुनो, तुम्हारे माता-पिता से मिलना था, उन्हें बुलाना तो, उन को एक ज़रूरी संदेशा देना था।
तुम दूत हो तो मतलब इंसान नहीं रहे? न- आज तो मैं तुम से जी भर के बातें करने के बाद ही अपने पापा-मम्मी को बुलाऊँगी। मालूम है मैं रोज़ तुम्हारी राह देखती हूँ। उसने अपनी आँखें बड़ी कर-कर के कहा।
जब-जब कश्यप मयूरी के घर के रास्ते से निकलता था तो दूर से ही उसे दिखता था कि अपने कमरे की खिड़की से टकटकी बाँधे वह उसे देख रही है। कई बार वह रास्ता बदलने की सोचता भी था, पर बदलता नहीं था। पता नहीं क्यों।
हाँ, मुझे मालूम है। सुनो, तुम्हारा ये रवैया अच्छा नहीं है। ऐसा मत किया करो।
मयूरी हँस दी। हँसते हुए बोली, क्यों? मेरे इस रवैये से मेरी कौन सी हानि होगी? बताओगे नहीं। तुम्हारे पास तो मेरी पूरी कुंडली है। तुमको तो मालूम ही है कि मेरे पूरे जीवनकाल में मुझे कभी न तो कोई मान हानि होगी, न ही धन की कमी। फिर मैं अपनी मन-मर्ज़ी क्यों न करूँ।
कुछ देर वह उसे देखता रहा। वह जो कुछ कह रही थी, सब सच था। उसे क्या जवाब दे, समझ नहीं पा रहा था।
वही बोलती गई। मैं कुछ भी करूँ, मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा, क्योंकि जो होना है, वह हो कर रहेगा और हम सब जानते हैं कि हमारे जीवन में क्या होने वाला है। इसीलिये, मेरा जो मन करेगा, करूँगी। मेरा तुमसे बात करने का जी करेगा, सो करूँगी। तुम्हें छूने का जी करेगा, छूऊंगी। तुम्हें पाने का –
मयूरी! कश्यप बैठा हुआ था, खड़ा हो गया। ऐसी बातें करनी सही नहीं है। जाओ, अपने माँ-बाप को बुलाओ।
सही-ग़लत मैं नहीं मानती। पहले ही हमारे जीवन को एक ही रास्ते पर बाँध कर रखा हुआ है, अब तुम कह रहे हो कि भावनाओं को भी बंदिशों में बाँध देना चाहिये। क्यों, कश्यप, क्यों? ऐसा कह कर उसने कश्यप की कलाइयाँ पकड़ लीं।
ऐसा मत करो। अपनी कलाइयाँ छुड़ा कर वह उससे कुछ कदम पीछे हट गया। तुम किसी और की होने वाली हो। मैं तुम्हारे होने वाले पति का रिश्ता ले कर आया हूँ। तुम्हारी शादी तुरंत ही दया से होने वाली है। उसकी पत्नी गुज़र गई है, अब दो-दो बच्चियाँ ...
मयूरी को कश्यप का यों हटना दुतकार सी लगी। वह रोने लगी और सिसकियाँ लेते-लेते बोली, अगर ऐसा ही होना था तो हमें भावनाएँ दी ही क्यों गईं थीं?
हाँ, ऐसा करो, तुम रो लो। नदी-भर रो लो! वह सीढ़ियों के पास चला गया। प्लीज़ अब अपने पापा-मम्मी को बुलाओ। आवाज़ ऊँची कर के, कोई है!
मैं खुद को मार डालूँगी ...
नहीं, तुम्हें तो अभी बहुत साल जीना है। फिर से आवाज़ ऊँची कर के, हैलो... कोई है!
मयूरी के मम्मी-पापा एक साथ सीढ़ियों से उतर कर आने लगे। स्टिक-ड्राइव आगे बढ़ा कर कश्यप कह रहा था, आपकी बेटी का रिश्ता ...
मयूरी के माँ-बाप जैसे पहले ही जानते थे, सीढ़ियों से ही चहल-पहल मचाते हुए, खनखनाते हुए उतर रहे थे।
पीछे मयूरी फूट-फूट कर रो रही थी।
-4-
शादी में न शहनाई बजी, न सज-धज कर दूल्हा बारात ले कर आया। दो परिवारों के मित्रों और ख़ास रिश्तेदारों का साधारण सा जमघट था। एक-एक कर सब नव-विवाहित जोड़े से मिले, उन से परिचित हुए और चले गए। ज़्यादातर उपहार भी दोनों नवजात बच्चियों के लिये थे। यहाँ तक कि मयूरी के माँ-बाप ने उसे शादी पर पलंग और ड्रैसिंग-टेबल जैसे उपहार न दे कर दो पालने ही दिये थे। दया ने ही उन से फ़ालतू के उपहारों के लिये मनाही की थी। उसका घर तो पहले से बसा हुआ था। और फिर मयूरी की दो छोटी बहनें भी थीं, और पिता की आय सीमित। दुनियादारी में डूबे माँ-बाप का इस बात पर ध्यान नहीं गया कि मयूरी के भावुक मन पर क्या बीत रही थी।
उस भीड़ में बस एक कश्यप का उपहार अद्भुत सा था। कुछ मयूरी की कुंडली में उसकी शादी के दिन के गहराई से अध्ययन के कारण, कुछ अपनी ज़बरदस्त कल्पना के कारण उसने मयूरी की दुल्हन बने तस्वीर बनाई थी। यही तस्वीर वह दया और उसके पास खड़े मयूरी के माँ-बाप को दिखा रहा था। वे हैरान थे कि तस्वीर में मयूरी हू-ब-हू वैसी ही लग रही थी जैसे कि शादी के उस रोज़। सब कश्यप के हुनर की दाद दे रहे थे।
खुशी तो क्षणभंगुर होती है। तुम्हारी भेंट ने उसे शाश्वत बना दिया, कश्यप, कहते हुए दया उसे आभार प्रकट कर रहा था। मयूरी भी पास आ गई। तस्वीर देख कर वह अपने सौन्दर्य से स्तब्ध हो गई। मैं इतनी सुंदर हूँ!
मृत सीता की माँ ने, मेहमानों के जाने के बाद बच्चियाँ मयूरी के सुपुर्द कर दीं। बच्चियों को ले कर मयूरी अंदर जा रही थी, तो दया ने उसे उनकी कुंडली का स्टिक-ड्राइव भी पकड़ा दिया। कश्यप ने दिया था, इन्हे कम्प्यूटर में दर्ज़ कर लो, कल लौटाना है।
दोनों बच्चियाँ अपने पालनों में बहुत प्यारी लग रही थीं। मयूरी ने दोनों को एक बार फिर चूमा, फिर साथ लगे अपने कमरे में चली गई। वहाँ पलंग के ठीक सामने दीवार पर कश्यप की बनाई तस्वीर टंगी थी। उसी को वह देर तक निहारती रही। फिर, उठी, स्टिक-ड्राइव निकाल कर दोनों बच्चियों की कुंडलियाँ पारिवारिक कम्प्यूटर में दर्ज़ करने लगी। नन्ही राधा और कंगना की कुंडलियाँ कम्प्यूटर में दर्ज़ हो गईं। मुड़ कर उसने एक झलक अपनी तस्वीर दुबारा देखी, कुछ सोचा और जन्म-कुंडलियों के नाम अदल-बदल कर दिये।
-5-
राधा और कंगना को मयूरी ने जी-जान से पाला। कोई सोच भी नहीं सकता था कि वह उन की सौतेली माँ थी। उनका हँसता-कूदता बचपन उनकी माँ ने प्यार से सींचा था। थी भी वह प्यार से लबालब भरी। उसने बच्चियों की शिक्षा में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। दोनों का किन-किन विषयों की ओर रुझान है, पहचाना, फिर उन-उन विषयों में परिश्रम के लिये लगातार प्रोत्साहन दिया। उन्हें अपने काम में उत्तमतर होने के लिये उकसाया। जो भी करो जोश से करो। उस में आग डाल दो। लोग कहेंगे तुम्हारा जीवन तो एक जाना हुआ, सीधा रास्ता है, फिर इतना जोश क्यों? लेकिन मेरी बच्चियों तुम्हें अपने-अपने जीवन दोनों हाथ पसार कर, ऊँची उछालें मार-मार कर जीने हैं। अपने जीवन को एक लकीर में थोड़े नहीं सिमटे रखना है, उसे तो तुम्हारे चारों ओर जो संसार है, उसमें समाना है। क्योंकि जीते रहने का सौभाग्य सब को नहीं मिलता है और शायद एक बार ही मिलता है।
मयूरी ने बच्चियों को अच्छे संस्कार दिये। दोनों तमीज़दार थीं, सफ़ाई से रहती थीं, खाना बना सकती थीं, बड़ों की इज़्ज़त करती थीं और भगवान को मानती थीं। उसने उन्हें ये भी सिखाया कि भगवान तो हर जगह, प्रकृति की हर चीज़ में हैं। कलकलाती धारा को देखो, सख्त पत्थर को देखो, गिरते झरने को देखो, ओंस धुली घास को देखो, क्या इन में तुम्हें भगवान नहीं दिखते? देखते ही देखते दोनों लड़कियाँ अपने चारों तरफ़ हर वस्तु को पागलों की तरह श्रद्धालु नज़रों से देखने लगीं। रोज़ाना सुबह उठतीं, गीत गा-गा कर अनंत हर्ष के साथ नए दिन का स्वागत करतीं। बाहर निकलतीं, उंगलियाँ फूलों का स्पर्श करतीं, और वे खुद भी खुशी से सिहर उठतीं, मन ही मन उड़ती चिड़ियों को सलाम करतीं और आप दौड़ने लगतीं। अट्ठारह साल की उम्र में दोनों जब दो अलग कॉलिजों में जाने के लिये घर छोड़ने को हुईं, तब दोनों की दोनों एकदम अपनी सौतेली माँ का स्वरूप थीं।
-6-
सीधी-सादी कंगना मयूरी की गर्दन से लटक कर खूब रोई। मुझे नहीं जाना इतनी दूर, माँ। कॉलिज मैं तुम्हारे साथ रह कर भी तो जा सकती हूँ ...
बड़ी मुश्किल से उसे खुद से छुड़ा कर अलग किया। फिर जा कर मयूरी बोली, मुझ से अलग रह कर सही तौर से अपने सब काम कर पाना, ये भी एक शिक्षा है। अब तुम्हेंअपने पैरों पर खड़े होना सीखना है। इसलिये तुम्हें जाना होगा।
राधा अपनी जुड़वाँ बहन से एकदम विपरीत स्वभाव रखती थी, बेहद चंचल थी। ओ माई गॉड, वहाँ ज़िंदगी मेरा इंतज़ार कर रही है, और मैं यहाँ बैठे अपनी बहन को आँसू बहाते हुए देख रही हूँ। तुम्हें जितना रोना हो, बाद में रो लेना। तुम्हारे आँसुओं का टैंक कितना बड़ा है, हम सब जानते हैं। लेकिन इस वक्त हमारा निकलना ज़रूरी है। मॉम, कौर्स आईल मिस यू। तुम मुझसे हर महीने मिलने आती-जाती रहना, नॉट फॉर लौंग टाईम, यू नो, एक-दो दिन की विज़िट ...
दोनों बहनें सुंदर थीं, सुशील थीं, आत्म-विश्वासी थीं। इसलिये, हालांकि शुरुआत के दिन ज़रा लड़खड़ाते हुए बीते, कॉलिज के नए जीवन का ढर्रा सही बैठने में ज़्यादा समय नहीं लगा। अपनी-अपनी क्लासों में भी दोनों अग्रणी रहीं। कॉलिज की श्रेष्ठतम छात्रों में गिनी जाने लगीं। सबों में जानी जाने लगीं। लोकप्रिय हो गईं।
कंगना रोजाना फ़ोन पर मयूरी से बातचीत करती थी। उन्हीं बातचीतों के दौरान मयूरी को पता चला कि उसकी बेटी का उठना-बैठना राजकुमार प्रीतम के साथ है। राजकुमार कॉलिज में कंगना के सहपाठी थे। अगली बार जब उसकी मुलाकात कश्यप से हुई, उसने उसे याद दिलाया कि कंगना की जन्म-कुंडली में राजघराने में शादी लिखी थी। कश्यप ने कंगना की कुंडली जाँची तो वाक़ई उस में राजलक्षण देखे। कुंडली-अनुसार उस ने पाया कि राजघराने में कंगना के आने से राज्य की प्रगति के शुभ-आसार थे। बस, इस जानकारी के बाद और ज़्यादा समय नहीं लगा और राजकुमार प्रीतम और कंगना की शादी की बातचीत चलने लगी। जब तक कॉलिज खत्म हुआ, दोनों के लगन की तैयारी भी शुरू हो गई।
कंगना चौंक उठी। घबरा कर अपनी माँ के पास गई और बोली, माँ, ये कैसे हो गया? प्रीतम मेरा दोस्त ज़रूर है, मगर मैं उस से प्यार नहीं करती हूँ। हमारे शौक एकदम अलग हैं। हमारा कोई मेल नहीं हो सकता है। हमारी शादी कैसे हो सकती है?
मयूरी ने मुसकुराते हुए कहा, तुम्हारी कहानी में राजकुमार प्रीतम ही है। प्यार तो हमें प्रकृति की हर चीज़ से करना चाहिये। अपना दिल आसमान की तरह खोल कर रखो। प्यार हो जाएगा।
राजसी शादी बहुत धूमधाम से हुई। प्रीतम और कंगना की जोड़ी से सारा राज्य मोहित था। कुछ समय दोनों खुश रहे। फिर दोनों के स्वभाव सामने आने लगे। कंगना को बस सच्चे प्यार की ज़रूरत थी। प्रीतम दिल हाथ पर धरे घूमता था। उसे प्यार का खेल खेलने की ज़रूरत थी। इश्कबाज़ था। हर सुंदर लड़की से इश्क लड़ाता था। शादी से पहले भी कंगना उसका मिज़ाज समझती थी। तब दोनों दोस्त थे। लेकिन अब शादी के बाद उसकी ये बातें उसे बहुत दुख पहुँचाती थीं।
वह प्यार का खेल पसंद करता है, तो क्या? मयूरी ने बेफ़िक्र अंदाज़ में कहा। तुम उसे लुभाने का नृत्य करो। देखना कैसे फंसता है!
लुभाने का नृत्य?
सभी नृत्यों का राजा है ये लुभाने का नृत्य ... उसके सामने अगर ये सोचकर नाचोगी कि दुनिया का वह आखिरी आदमी है, तो देखना उसे ज़रूर हासिल कर लोगी।
माँ – ज़्यादा अच्छा ये नहीं होता अगर मैं उस से शादी करती जिसे मैं चाहती और जो मुझे चाहता ...
मयूरी ने कंगना के होंठों पर अपनी उंगली रखी और बोली, मेरी बेटी, यही जीवन की रीति है, हमें इस ही को अपनाना है।
राधा को अपनी बहन के सौभाग्य पर अचंभा भी हुआ और खुशी भी मिली। मॉम, सब मुझसे कहते हैं कि मैं पावर-हंगरी हूँ। पावर की ही सोचती हूँ, पावर के पीछे भागती हूँ ... और क्यूं न हूँ! कोई मुझे ये बताए कि इस से बेहतर सोचने को और है ही क्या? ओह, आए ऐम सो हैपी फ़ॉर कंगना।
उसकी बात सुन कर मयूरी हँस दी। वह भी बहुत खुश थी। उसकी दो बेटियाँ थीं, दोनों एक दूसरे से एकदम अलग। जब दोनों घर में एक साथ होतीं, वह उन्हें ऐसे निहारती जैसे उसके सामने दो अद्भुत फूलों का एक सुंदर गुलदस्ता हो।
कंगना की शादी के बाद, राधा ने उसे धर्मेश से मिलाया। कॉलिज में उसके साथ अर्थशास्त्र का विद्यार्थी, लीडर और अब उच्च शिक्षा खत्म होने के बाद एक प्रोफ़ेसर। मयूरी को राधा के कॉलिज के दिनों में ही राधा की बातों से उस होनहार नौजवान की भनक पड़ गई थी। अब जब वह उस से मिली, तो बेटी की पसंद से बेहद प्रभावित हुई। धर्मेश देखने में रूपवान था, तीक्ष्ण बुद्धि वाला था, और पूरी तरह से राधा का जोड़ीदार लगता था। कंगना के बाद अब राधा की शादी की बारी आ गई। वह शादी भी बड़ी धूम से मनाई गई।
-7-
दया को गुज़रे हुए एक दशक बीत चुका था। दोनों बेटियों का उत्तरदायित्व पूरी तरह मयूरी पर था। जहाँ एक तरफ़ उसे दोनों के व्यक्तित्व पर नाज़ था, दूसरी तरफ़ दोनों के जीवन जिन दिशाओं की ओर बढ़ रहे थे उससे मयूरी को अकसर चिंता होती थी।
राधा और धर्मेश देश के एक प्रभावशाली दम्पति थे। राधा गणितज्ञ थी, निराकार संसार का विश्लेषण करने का शौक रखती थी, जब उसमें खोई नहीं होती थी, तो दुनिया के हर मसले पर राय रखती थी। ज़ोर से ज़ाहिर करती थी। उसकी तरह उसका पति, धर्मेश भी निर्भीक स्वभाव रखता था, लेकिन असल संसार के अध्ययन में रुचि रखता था। सामाजिक और खासतौर से आर्थिक असमानताओं का प्रमुख विशेषज्ञ था, कुछ ही सालों में राजा प्रीतम का प्रत्यक्ष विरोधी बन गया।
राधा और धर्मेश की आवाज़ तो देश में हर कोई सुनता था। ऐय्याश राजा प्रीतम भी सुर्खियों में रहते थे। लेकिन मयूरी को सबसे ज़्यादा चिंता अपनी शांत बेटी कंगना की थी। उसकी इस चिंता का जन्म तो उस रोज़ ही हो गया था, जब कंगना पहली बार राधा के मंगेतर धर्मेश से मिली थी। मयूरी ने अच्छी तरह से उसके चेहरे पर उठते भाव से उसके हृदय का हाल जान लिया था। राधा और धर्मेश की जोड़ी अच्छी थी, लेकिन कंगना और धर्मेश यदि एक साथ होते, तो वह एक सम्पूर्ण जोड़ी होती, ये बात मयूरी उस दिन भली प्रकार समझ गई थी।
अपने और कंगना के पति को प्रतिद्वंद्वी बनते देख राधा भी चिंतित होने लगी थी। इसमें मेरा भी योगदान है मॉम। न मैं इतनी मुँहफट होती, न धर्मेश ऐसा रिऐक्शनरी होता। आर्थिक शास्त्र के विशेषज्ञ और भी भला काम कर सकते हैं, उसे राजा से ही भिड़ने की क्या ज़रूरत थी। इतना बुरा भी नहीं है हमारा सिस्टम। आप नहीं जानती, मॉम, धर्मेश मुझसे बहुत प्रभावित है और मैं एक नम्बर की बेवकूफ़ हूँ। कुछ भी ज़ोर से बोल देती हूँ। अब देखिये न, बेचारी कंगना को कितनी तकलीफ़ झेलनी पड़ रही है।
लेकिन राधा की बातें मयूरी के मन में कोई सांत्वना नहीं ला पाईं। और समय बीता। दोनों दामादों की शत्रुता इतनी बढ़ गई थी कि राजा ने धर्मेश की गतिविधियाँ जानने के लिये उसके पीछे खुफिया पुलिस लगा दी। फिर धर्मेश ने छिपना शुरू कर दिया। ऐसी नौबत आ गई जब राधा को भी अकसर ये मालूम नहीं हो पाता था कि उसका पति है किधर।
-8-
बरसात का मौसम था। एक दिन बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी। मयूरी के घर में अचानक धड़ल्ले से कंगना आ गई। तनाव ने उसका चेहरा बिखेर डाला था। मयूरी के हाल पूछने पर वह कहने लगी, माँ, शादी से पहले आपने मुझसे कहा था कि राजा ऐयाश होते हैं, इसलिये मुझे प्रीतम का मिजाज स्वीकार लेना चाहिये। लेकिन माँ ये भी तो एक नियम है न कि राजा एक होता है, और बाकी सब प्रजा। तो जब कोई राजा के खिलाफ़ आवाज़ उठाता है तो राजा उसे मिटाने की भी सोच सकता है, अब मेरे पति मेरी बहन के पति को मिटाने की योजना बना रहे हैं और मैं समझ नहीं पा रही हूँ कि मैं क्या करूँ।
उस समय राधा भी वहीं थी। अपनी बहन को बेहाल देखकर भड़क गई। दैट्स इट! अब इस बात का निपटारा हो ही जाना चाहिये। मैं आज ही धर्मेश को अल्टिमेटम देती हूँ। मेरे साथ रहना है, तो फ़ैमिली के साथ कोई पंगा नहीं लेना होगा।
इतना कह कर वह जाने को खड़ी हो गई लेकिन मयूरी ने उसे रोक लिया। ये कह कर कि धर्मेश को अपनी पत्नी का नज़रिया भली प्रकार मालूम है, शायद उसे अब कोई और ही ज़्यादा प्रभावित कर पाएगा, उसने कंगना को संभाला और बोली, तुम खुद को इतना असहाय कब से समझने लगी? तुममें वैसी ही ऊँची समझ है जैसी राधा में, उसके पति में या तुम्हारे पति में। ये सब तुम्हारी इज़्ज़त भी करते हैं। ये मसला तुम्हें आज ही खुद सुलझाना होगा। जाओ, अभी धर्मेश से बातें करो। वह तुम्हारी बात ज़रूर समझेगा।
मयूरी की बात कंगना को सही लगी। उसकी बात सुनकर उसमें एक नया विश्वास जागने लगा। माँ के घर से ही उसने धर्मेश को फ़ोन लगाया, उससे मिलने का समय निश्चित किया, प्रीतम को भी अपनी योजनाओं से अवगत किया। फिर अंत में माँ से और बहन से आलिंगन किया और चली गई।
उसके जाने के बाद राधा सब दुविधाओं के लिये फिर खुद को कोसने लगी। कश्यप भी वहाँ मौजूद था। दोपहर को आया था, बारिश में फंस गया था। मयूरी और उसकी बेटियों की बातें सुन चुका था। उसने अपना टैबलट निकाला। ड्रोन का इस्तेमाल करना उसने कई साल पहले ही बंद कर दिया था। उसका आना-जाना भी अब सौर-चलित चार-पहिये वाली गाड़ी से ही होता था। टैबलट में उसने राधा और कंगना की कुंडलियों पर नज़र दौड़ाई और बोला, अरे आप सब बिना बात के परेशान हो रही हैं। असली खुशी जानने के लिये दोनों बहनों का दाम्पत्य जीवन देखना चाहिये। ये देखिये, दोनों की कहानियों में अपने पतियों के साथ मरना लिखा है। बस ऐसे नापी जाती है खुशी।
-9-
वह खिड़की के बाहर देखकर मुसकुरा रही थी। शहर के सैंट्रल सर्कल के संगमरमरी खंभे उसके सामने से निकले जा रहे थे। बारिश के पानी में धुल कर निखर आए थे। कहने को वह इस देश की रानी थी, मगर उसकी शक्ति का असल एहसास केवल उसकी माँ उसे करा पाती थीं। माँ! व्यक्तित्व के हर छिदरे भाग को बार-बार भर कर सब ठीक कर देने वाली उसकी माँ ने उसे फिर यह आभास कराया था कि वह असहाय नहीं है। अब वह सब हाल ठीक करने का सामर्थ्य रखती थी। उसे पूरा यकीन था कि कुछ ही पलों में उसके जीवन का सबसे बड़ा क्लेश दूर हो जाएगा।
अचानक उसका ध्यान गया कि गाड़ी की दिशा बदल गई है। उसने ड्राइवर से पूछा और ड्राइवर ने जवाब देते हुए कहा, महारानी! वहाँ जाने में खतरा है। राजा साहब का अभी फ़ोन आया था कि आपको वापस राजमहल ले आऊँ।
कंगना को अपमान भी महसूस हुआ और क्रोध भी आया। लेकिन वह दोनों पी गई। बड़ी शांत आवाज़ में ड्राइवर से गाड़ी रोकने को कहा। गाड़ी रुकी और वह आगे की सीट में बैठ गई। गाड़ी की चाभी हाथ में ली, ड्राइवर को बाहर निकलने का आदेश दिया, फिर उसकी जगह ले कर गाड़ी चलाने लगी।
कंगना को कैफ़े के द्वार से अंदर घुसता देख धर्मेश खड़ा हो गया। वह उसकी तरफ़ बढ़ रही थी। चेहरे के चारों तरफ़ बारिश से गीले बाल एक सुंदर फ़्रेम जैसे चिपके हुए थे, चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान फैली हुई थी। इंतज़ार करता धर्मेश भी मुसकुरा रहा था। उन दोनों के बीच राधा एक कड़ी थी। लेकिन एक तरह का खरा भाव भी था। क्या था, इन्हें कभी समझ नहीं आ पाया। हाथ फैलाए हुए कंगना उसके पास पहुँच चुकी थी। वह भी उसे आलिंगन में भरने वाला था। उसी वक्त एक तेज़ धमाका हुआ। कैफ़े एक तीन-मंज़िले बिल्डिंग में था, बम्ब नीचे तहखाने में। एक पल में सब तहस-नहस हो गया।
धमाके की खबर मयूरी के घर तुरंत पहुँच गई। राधा रात के खाने के लिये रुकने का सोच रही थी। कश्यप उठ कर जाने ही वाला था। खबर सुनते ही दोनों की नज़रें मयूरी पर ठहर गईं। उस पल में दोनों को एक साथ और पहली बार सालों पहले मयूरी का कुंडलियों का अदला-बदली करना समझ आ गया। बहुत देर तक मयूरी की आँखें फटी की फटी रहीं। जैसे तैसे किसी ने पहल की। कश्यप ज़रा हिला, जैसे उठ कर जाने वाला हो। तब जा कर मयूरी के आँसू बहने शुरू हुए।
कई दिनों से आसमान इतना पानी बरसा रहा है, लगता है पैरों के नीचे की मिट्टी घुल जाएगी और अपने साथ सबों को धरती की कोख में बहा ले जाएगी। मयूरी के आँसू बहने बंद ही नहीं हो रहे हैं। अपना सब सामान ले कर अब राधा उसके साथ रहने आ गई है। उसकी आँखें तो पहले दिन ही सूख चुकी थीं। अब तो बस राजा की हस्ती मिटा देने का जुनून सवार है। राजा के लिये ये लड़ाई आसान नहीं है। जनता राधा के साथ है। राधा जैसे घोर शत्रु कम मिलते हैं। फिर भी अपनी पूरी ताकत के साथ वह डटा हुआ है।
***
कई साल बीत गए है। लड़ाई अब भी जारी है। इतने सालों में और सशक्त हो गई है। हैं भी दोनों पक्ष दमदार। टिके हुए हैं दोनों अपने-अपने दम पर। एक में जोश है, गुस्सा है, बदला लेने की तर व ताज़ा हवस है। दूसरा राज करना अपना हक मानता है, यही विश्वास उसके भीतर का योद्धा जीवित रखे हुए है। बस लोगों की दशा है जो बेपरवाही से दिनो-दिन बिगड़ती जा रही है। काम पर से भी लोगों का ध्यान जाता जा रहा है। देश में हर चीज़ के स्तर घटिया होते जा रहे हैं।
घर में मयूरी के बाल पक चुके हैं, आँखों को सदैव नम रहने की आदत हो गई है। हर बार जब राधा माँ के कमरे में घुसती है, तो उसकी दीवार पर कोई नया गीत लिखा पाती है।
एक दिन जब वह उसके कमरे में घुसी, माँ नया गीत लिखने के लिये दीवार की पुताई करने जा रही थी। राधा उसे अपने साथ पलंग पर खींच लाई, उसकी आँखें पोंछीं और उसके कंधे पर हाथ डाल कर बोली, तुम खुश नहीं हो। काश हमारी ज़िंदगी में इतनी सारी ग़लत बातें नहीं हुई होतीं।
नहीं बेटा। मेरी आँखों में आँसू ज़रूर हैं, पर मैं दुखी नहीं हूँ। अपनी बात कहते-कहते वैसे ही बैठे-बैठे मयूरी पेंट-ब्रश तैयार करने लगी। ज़िंदगी में सही-गलत ढूँढने का कोई मतलब नहीं होता है। ज़िंदगी हमें जो देती है, हमें तो वही स्वीकारना होता है, बस।
राधा उठ खड़ी हुई। उसे किसी मीटिंग में जाना था। वैसे भी उसे अपनी माँ की बातें समझ नहीं आ पाती थीं। उसे लगता था कि वह बोलती कुछ है, सोचती न जाने क्या, जैसे वह असल दुनिया के बजाय, विभिन्न तरह के ख्यालों के सूप में तैर रही हो। अच्छा मॉम, जाती हूँ। दीवार पर नज़र फेरते हुए, नई पोयम ... कान्ट वेट टु सी इट ... आय लव औल यौर पोय्म्स ... कहाँ से ढूंढ कर लाती हो इतनी सुंदर लाइनेंआउट ऑफ दिस वर्ल्ड ... कहते-कहते वह चली गई।
उसके जाने के बाद मयूरी अपना नया गीत लिखने के लिये दीवार के सामने खड़ी हो गई। प्रकृति ने अपने जीव-जंतुओं को प्रवृत्तियाँ तो दीं, उनमें भावनाएँ तो डालीं, मगर इन सब बातों का जीवन से कोई संबंध नहीं बनने दिया। कुछ ऐसी बातें सोच रही थी। थकान तो थी ही, अचानक और बढ़ गई। चेहरे पर गिरती अपनी सफ़ेद लट को झटकाया और दीवार पर पेंट ब्रश चलाने लगी। चारों दीवारें सफेद पोत कर ही मानी। फिर पलंग पर बैठ कर सोचने लगी कि जिन बातों का उसके जीवन से कोई संबंध ही नहीं था, उनको वह अब तक अपनी दीवारों पर क्यों घर देती आ रही थी। तय कर लिया कि अब से अपने कमरे की दीवारें सफेद ही रखूंगी।


[1] राजेंद्र कृष्ण के शब्द

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।