ग़ज़ल के क्षेत्र में मील का पत्थर है “साठोतरी हिंदी ग़ज़ल"

- देवी नागरानी

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संग्रह: साठोतरी हिंदी ग़ज़ल
लेखिका: सादिका नवाब,
पृष्ठ 424, पेपरबैक
मूल्य:  ₹ 500.00
प्रकाशक: प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली -110002


"साठोतरी हिंदी ग़ज़ल" शिल्प और संवेदनाः ग़ज़ल संबंधित सम्पूर्ण विशेष सन्दर्भ: दुष्यंत कुमार पर शोध कार्य प्रस्तुत करने वाली डॉ. सादिका असलम नवाब 'सहर' मुंबई महानगरी की एक जानी मानी गज़लकारा है जो साहित्य से निरंतर जुड़ी रहकर उस क्षेत्र में अपनी पहचान की परिभाषा ख़ुद देती है। उनके द्वारा रचित यह कृति ग़ज़ल के क्षेत्र में मील का पत्थर है, और यह कहने में कोई अतिशयोक्ति न होगी की इस ग़ज़ल-संग्रह से जुड़ी हर तकनीक व् ग़ज़ल से जुड़ा ज्ञान एक विशाल भण्डार है। अध्ययन, मनन एवं मंथन से ग़ज़ल विधा पर रचा गया एक सन्दर्भ-ग्रन्थ है।

डॉ. सादिका असलम नवाब 'सहर'
 अपने इस साहित्य के रचनात्मक विस्तार में सादिका नवाब जी ने यह प्रमाणित किया है की रचना का जन्म सिद्धांतों के वैचारिक आदर्शों से नहीं होता बल्कि रचनाकार की रचनात्मक ऊर्जा की परिधि में जब संवेदना का संचार होता है, तब कहीं जाकर कवि अंदर और बाहर की दुनिया को एक सूत्र में जोड़ पाता है। कवि की रचना सहृदय को अपने दिल की आप बीती लगने लगे तो यह रचना की सबसे बड़ी सफ़लता है और यही सम्प्रेश्रणीयता है।

आगाज़ी प्रस्तावना में सादिका जी लिखती है, “साठोतरी हिंदी गज़लें बुनियादी तौर पर विसंगतियों पर प्रहार करती है। वह आज की भ्रष्ट व्यवस्था, भ्रष्ट राजनीति, कालाबाज़ारी, बेरोज़गारी, महंगाई, आम आदमी की वेदनाएँ, समस्याएँ, जीवन संघर्ष से जुड़ी आशा-निराशा सभी के बिम्ब प्रस्तुत करती है। "इसी लहज़े को खुलासा करते हुए श्री अदम गोंडवी (रामनाथ सिंह) का कथन ज़ाहिर कर रहा है:
"भूख के अहसास को शेरो-सुख़न तक ले चलो
या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो
खुद को घायल कर रहे हैं गैर के धोखे में लोग
इस अहद को रोशिनी के बाँझपन तक ले चलो।"

 साहित्य समाज का प्रतीक है। जो जैसा है वैसा ही दिखाई देता है। आज की कृत्रिम दुनिया में जहाँ झूठ-सच में अंतर मिटता चला जा रहा है, सच का गला घोंटा जा रहा है, दिल-दिमाग़ में तकरार पैदा हो रहा है, वहीँ सामाजिक सरोकारों को एक दशा और दिशा प्रदान करने के लिए क़लमकार का भी दायित्व बढ़ जाता है कि वह समाज की विसंगतियों, कुनीतियों, न्याय-अन्याय के परदे में छिपी हुई कुनीत राजनीतियों को, सकारात्मक जीवन मूल्यों का सृजन और विकास करें।

डॉ. सादिका नवाब ने अपने इस शोध-पूर्ण संग्रह में सच के सामने आइना रखते हुए कहा है कि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में ग़ज़ल तो देखने को मिलती जाती है, मगर समीक्षात्मक लेख नहीं मिलते यह सोचने वाली बात है जिसे दिशा मिलनी चाहिए, जो एक तरह से कवि पर दबाव, नियंत्रण बनाये रखने में सक्षम हो। कविता के माध्यम से कवि का जागरूक रूप पाठक के सामने खुलता है। कविता में विवरण या घटित घटनाओं और दृश्यों के पठन से पाठक का ध्यान समाज में हो रही असंगतियों की ओर खिंचता है और वही उसे व्यक्तिगत से सामाजिक बनने की ओर उन्मुख करता है। यह बात इतनी मुखर है कि पाठकों को भी सहज ही अपने मंतव्य को प्रेषित करने की प्रेरणा देती है।

 अध्ययन, मनन, और मंथन के लिए ज़रूरी हर विषय-वस्तु सादिका जी के इस संकलन में अध्ययन के पहले अध्याय ‘शिल्प और संवेदना’ और तद पश्चात कुलमिलाकर आठ अध्याय में अपनी रचना धर्मिता को मुखरित किया है और वही साहित्य की ओर धर्मनिष्ठा उनकी शख्सियत को एक अनूठी बुलंदी पर पहुंचाती है। अपनी क़लम के बलबूते पर "साठोतरी हिंदी ग़ज़ल" कल्पना से नहीं बल्कि यथार्थ के परों पर परवाज़ करके अपने ख्यालों और ख़्वाबों को लफ़्ज़ों का पैरहन ओढ़ा कर ज़िन्दगी की राहों को रोशन करती, सभी लिखित अध्यायों के माध्यम से ग़ज़ल का हर स्वरुप प्रेषित करने में सफ़ल हुई हैं।

 ग़ज़ल की मांग सँवारते और एक बार फिर ग़ज़ल का किला मज़बूत करते हुए सादिका नवाब ने अपने फ़न और उसकी माहिरता से अदब के संजीदा कारीन को अपनी तरफ वतवज्जाह किया है। ग़ज़ल-ज्ञान के अथाह सागर में उनके ही शब्दों में, “ग़ज़ल में शब्द और अर्थ, जल और जलतरंग के समान कहने में अलग-अलग हैं, परन्तु वास्तव में अभिन्न हैं"। ग़ज़ल भी अपने स्वरुप या शिल्प विधान से पहचानी जाती है, शब्दों का रख-रखाव, करीने से सजाई गई ईंटों की तरह है।

जो काव्य-भवन के निर्माण में अपना महत्त्व रखते हैं। इसका खुलासा करते हुए सादिका जी ने "ग़ज़ल के शिल्प विधान" उन्वान के अंतर्गत ग़ज़ल की मांगों को उजगार किया है जिसमें ज़रूरी है ज़मीन, काफ़िया, रदीफ़, रुक्न, मिसरा, मतला एवं मक्ता और अंतिम शेर का विवरण उदाहरण समेत दिया है

 सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए "ग़ज़ल का छंद-शास्त्र अथवा उरूज़" अध्याय के अंतर्गत चुने हुए बहरों को सुंदर सरल पठनीय तरीके से मिसाल के तौर पर शेर, उसके नीचे उसकी तख्ती और ज़रुरत अनुसार खास टिप्पणी भी पेश की है। बहरों की संक्षिप्त जानकारी में हैं 1) बहरे- मुतक़ारिब, 2) बहरे-मुतदारिक, 3) बहरे-रमल, 4) बहरे-रजज़, 5) बहरे-हजज़, 6) बहरे-मज़ारे, 7) बहरे-कामिल, 8) बहरे-मुजतस, तथा 9) बहरे-ख़फीफ़

 इस संग्रह में पहले अध्याय से गुज़रते हुए महसूस होता है। जैसे कोई ग़ज़ल पाठशाला में दाखिल हुआ हो, जहाँ दूर तक कोई मंजिल नज़र नहीं आती, बस तवील सफ़र ही सफ़र सामने है। इस विधा को जानने और पहचानने के लिए मौन साधक बनना पड़ता है जहाँ बैठकर संकेतार्थों की विशेषता और परिधियों के परिवेश से परिचित हुआ जाता है। यहाँ वरिष्ठ गज़लकार श्री मधुप शर्मा जी का एक शेर अपनी सार्थक और प्रेणादायक भूमिका निभा रहा है- जितना कहा उससे अधिक का संकेत देता है, जो अनकहा रह गया है वह पाठक समझ लें। उनकी बानगी इस हक़ीक़त को सामने रख पाई है---
ऐ अदीबो! लिखो तो कुछ ऐसा
आने वालों को शाहकार मिले।

 इसी पाठशाला के कार्यक्रम में सादिका जी ने सरल ढंग से शेर के दोष का विवरण, प्रवाह या रवानी का दोष, ग़ज़ल की विशेषताएँ और उनके निर्णायक तत्व, उनकी प्रकृति के अनुसार शब्दों को नर्म-नाज़ुक, पुरदर्द और हुस्नो-निखार के कई हवाले दिए है जहाँ शब्द और अर्थ का पारस्परिक सम्बन्ध होना आवश्यक है, इसी बात के महत्व पर ज़ोर दिया है।

 समकालीन ग़ज़ल केवल प्रेम की अभिव्यक्ति मात्र न बनकर आम आदमी की ज़िन्दगी की समस्याओं से खुद को जोडती है, समसामयिक जीवन की जटिलताएँ और विसंगतियाँ कई स्वरुप धारण करके व्यक्त होती है। और इसी प्रयास को सकारात्मक दिशा देने वाली शायरा डॉ. सादिका नवाब 'सहर' का यह संग्रह न फ़कत पठनीय और संग्रहनीय है, बल्कि इस विधा के नवोदित ग़ज़लकारों और शोध-कर्ताओं के लिए मार्गदर्शक भी है। वे अपना उचित स्थान साहित्य जगत में हासिल करें और ऐसे शोधकार्यों के साहित्य से ग़ज़लकारों को मालामाल करती रहें, यही मेरी शुभकामना है।

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