यूनिस डिसूज़ा की याद में (29 जुलाई, 2017)

यूनिस डी सूज़ा (Eunice de Souza)

यूनिस डी सूज़ा (1940-2017) अंग्रेजी साहित्य की कद्दावर अध्यापिका होने के साथ ही एक आलोचक, संपादक, शोधकर्ता, स्तम्भ लेखक व बाल साहित्य की रचनाकार के रूप में भी जानी जाती हैं ।

तेज़ाबी व्यंग्य के पुट से सराबोर, टैलीग्राम सरीखी, पैनी और धारदार कवितायेँ लिखना और किसी 'गेटो' के जाल में न फंसना, चाहे वह बौद्धिक, अकादमिक, धार्मिक या राजनैतिक क्यों न हो, उनकी ख़ासियत थी। विद्रोही, उन्मुक्त और तेज़ वोल्टेज व्यक्तित्व की स्वामी थी यूनिस।

अपनी 'इकबालिया' कविता शैली के माध्यम से उन्होने न सिर्फ गोअन कैथोलिक समाज के कट्टरपन बल्कि संपूर्ण पितृसत्तामक समाज में दमित नारी की बेबसी और गहन वेदना को उकेरते हुये स्पष्ट शब्दों में कहा कि प्रेम और यौन शुचिता के बारे में, औरत की अपनी इच्छा के बारे में मूक रहना बेहतर बताया गया है। ऐसे वातावरण में तनाव और निराशा के बीच औरत आजीवन जूझती है क्योंकि जिस तरह से वह जीना चाहती है और जिस तरह का जीवन जीने के लिये उसे मजबूर किया जाता है, उसमें बहुत असंगति है।

यूनिस के दिवंगत होने के साथ एक ऐसे युग का लगभग अंत हो गया जो अपनी कलात्मक ऊर्जा और बौद्धिक सहभागिता के विस्फोट से, तंग और सीलन भरी सोच को तितर बितर कर देने का सामर्थ्य रखता था।

29 जुलाई को उनकी पुण्यतिथि मनाई जाती है । उनकी कुछ चर्चित अंग्रेज़ी कविताओं का हिंदी में अनुवाद निम्नलिखित हैं।

हिन्दी अनुवाद: ममता जोशी


डच तस्वीरों में औरतें

उनके चेहरों को उकेरती
दोपहर के सूरज की आभा
दिखाती है वह शांत हैं, बेवकूफ़ नहीं
माँ बनने वाली है पर गाय सरीखी नहीं
चित्रों में नही, जिंदगी के कैनवस पर
ऐसी ही औरतों से वाकिफ़ हूँ मैं
एक रिश्तेदार
जो पति को पलट कर जवाब नहीं देती थीं
इसलिये नहीं कि वह साधारण दिखतीं थीं
और आन्ना
जो कवितायें लिखती है
सोचते हुये कि मक्खनफल (ऐवोकाडो) का बीज
उसकी रसोई में जम सकता है
आवाज़ में उसकी जौवार और शहद की मिठास घुली है।
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समय आ गया है जगह ढूंढने का

समय आ गया है जगह ढूंढने का
एक दूसरे से संवाद विहीन रहने का
बहुत बकबक की है मैंने
स्टाफ़ रूम, गलियारों और रेस्तरां में
जब तुम पास नहीं होते
मैं मन ही मन बहुत बातें करतीं हूँ
इस कविता में भी ज़रूरत से ज़्यादा है
यह अड़तालिस लफ़्ज़।
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कवियों से मुलाकात

कवियों से मिलते समय
मेरा चित्त व्याकुल हो जाता है
कभी उनके मोजो़ं के रंग पर ध्यान जाता है
कभी लगता है बाल नकली है
विग पहना है
आवाज़ में बर्रे के जहरीले दंश
पूरा माहौल सीलन से बोझिल सा लगता है
बेहतर होगा उनसे कविताओं में ही मिला जाय
जैसे धब्बों से भरी चित्तीदार ठंडी उदास सीपियॉं
जिनमें सुनाई देती है
सुदूर समुद्र की सुकून भरी आवाज़
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आत्मकथ्य

देखो!
अब सही उफान आया है
तीन वर्ष की थी मैं
जब मैंने अपने पिता की हत्या की थी
मेरी रूमानी ज़िन्दगी में हमेशा उथल -पुथल ही रही
कई रिश्ते बने पर नतीजा सिफ़र
इन कसैले अनुभवों से मुझे ज़रा सी भी सीख नहीं मिली
हर बार नीरसता से
गहरी खाई में
नियमित रूप से गिरती रही हूँ।

दुश्मनों का कहना है
मैं महज आलोचना करती हूँ
केवल जलन के मारे मैं हरदम तड़पती हूँ
इसलिए मुझे शादी कर लेनी चाहिए।
दोस्तों के हिसाब से
मैं काफी प्रतिभाशाली हूँ।

और हाँ!
मैंने आत्महत्या की कोशिश भी की थी
अपने कपडे सँवारे
लिख कर कोई कागज़ का पुर्जा नहीं छोड़ा
ताज्जुब तो तब लगा
जब सुबह मैं भली-चंगी उठ गयी।

एक दिन मैंने अपनी आत्मा को
देह से बाहर पाया
वह मुझे निहार रही थी
जब मैं ऐंठ रही थी, बड़बड़ा रही थी
अनर्गल प्रलाप करते मुस्कुरा रही थी
मेरी त्वचा मेरी हड्डियाँ पर कसती जा रही थीं
मुझे लगा
पूरी दुनिया तेज़, धारदार उस्तरे से
मेरा पूरा शरीर चीर कर रख देगी
एक घिसा-पिटा मुहावरा मुझे याद आया
और मैंने महसूस किया
यही तो मैं भी पूरी शिद्दत से करना चाहती हूँ
इस जहाँ के साथ ।
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सहयाद्रि (उनकी अंतिम कविता)

उड़ा देना
मेरी राख को
पश्चिमी घाट में
अब वही पहाड़ियाँ घर सी लगती हैं
तेंदुऐ शायद कविता का स्वाद चख लें
कौव्वे और चील अपनी आवाज़ के उतार चढ़ाव को
सँवार लें
मौसम चाहे प्रतिकूल भी हो
धुंध और झरने
घास और फू़ल
कायम रहें
हर समय।

3 comments :

  1. बेहद अच्छी कवि की बेहद अच्छी कविताओं का बेहद अच्छा अनुवाद। ममता जी कायल हो गया आपका। ढेर सारे अनुवाद कीजिए। आप भी अच्छी कवि हैं।
    सादर

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    Replies
    1. अनिल जी, प्रेरित करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद|
      ममता जोशी

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