संत गरीबदास की वाणी में नैतिक मूल्य

मुकेश कुमार

ग्राम हथलाना, पो. मंजूरा, जिला करनाल। (हरियाणा)
चलभाष: +91 989 600 4680

मानव सभ्यता और संस्कृति के विकास में मूल्यों का महत्त्व सर्वोपरि है। वर्तमान परिवेश में वैज्ञानिक उन्नति तथा नीति मूल्यों के वैविध्य के कारण पुराने मूल्य घट गए और नए मूल्य उस स्थान पर आ चुके हैं। संत गरीबदास ने अपनी वाणी के माध्यम से मानव को ईश्वर प्राप्ति के लिए नीति मूल्यों का पाठ पढ़ाया। उनकी वाणी की मूल प्रेरणा मानव कल्याण और लोकमंगल ही है। इस दृष्टि से संत गरीबदास जी की वाणी ‘सर्वजन सुखाय’ और सर्वजनहिताय’ की भावना से अनुप्राणित है।
संत गरीबदास जी का प्रादुर्भाव वैशाख पूर्णिमा संवत् 1744 वि. तद्नुसार सन् 1717 ई. को हरियाणा राज्य के झज्जर क्षेत्र में छुड़ानी नामक गाँव में एक संभ्रांत जाट परिवार में हुआ। जहाँ उनके नाना जी का घर था। इनके पिता जी का नाम बलिराम था और माता का नाम श्रीमती रानी था। जिनके साथ विवाह के पश्चात् वह अपनी ससुराल में रहने लगे थे। चिरकाल तक उनकी कोई संतान नहीं हुई। बारह वर्ष बाद एक सिद्ध पुरुष के आशीर्वाद से उन्हें एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। माता-पिता ने अपनी विनयशीलता प्रकट करते हुए बालक का नाम गरीबदास रखा ताकि वह बड़ा होकर गरीबों, दीन-दुःखियों की सेवा कर सके। बाल्यकाल से ही उनके नाम के साथ अनेक चमत्कार जुड़ गए। अपने समवयस्कों के साथ वह सारा-सारा दिन खेलते और उन्हें ज्ञान की बातें सुनाते। लगभग 12 वर्ष की आयु में पिताजी ने उन्हें गोचारण का दायित्व सौंपा। वह अन्य बालकों के साथ जंगल में गौ चराने जाते। वह साधु संतों की सेवा करता रहा जिससे उनका स्वयं का कल्याण हो गया। योगी, तत्त्ववेत्ता, ब्रह्म ज्ञानी, अवधूत, त्यागी वैरागी आदि गुणों का ज्ञान प्राप्त किया और स्वयं सिद्ध हुए।
संत गरीबदास ने मानवीय जीवन में नीति मूल्यों की नितांत आवश्यकता पर जोर दिया है। मानव जीवन का लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति तक पहुँचना है। मन का विचार रहित होना ही मुक्ति है। नीति मूल्यों का लक्ष्य मनुष्य को सन्मार्ग प्रदान करना रहा है। वर्तमान परिवेश में मनुष्य नीति मूल्यों को भूल चुका है। उसमें आज नैतिकता का भाव दिखाई देता है। उन्हें सचेत करने के लिए संत गरीबदास की वाणी बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
भारतीय संस्कृति में जो प्रेम बहुत ही पवित्र वस्तु हैं उसका उदय होते ही अज्ञान जनित अन्धकार नष्ट हो जाता है। आत्म निर्मल होकर ईश्वरोन्मुख होने लगती है। प्रेम की प्रमुख विशेषता एकनिष्ठता है। संत गरीबदास जी ने ईश्वर की प्राप्ति में किसी बाह्यचार का अवलंब न करने की सलाह देते हुए साधक या भक्त के पास प्रेम का होना आवश्यक माना है। संत गरीबदास की स्पष्ट धारणा है कि प्रेम मार्ग की साधना में आत्म-त्याग और आत्म-बलिदान करना पड़ेगा।
मानवीय जीवन में प्रेम के साथ ‘सत्याचरण’ की आवश्यकता होती है। आज के राजनीति के परिवेश में सत्य बोलने वाला शायद ही कोई मिल जाएगा। सत्य बोलने वाले मनुष्य को समाज पागल ठहराता है।
गरीबदास जी ने मानव कल्याण का सबसे बड़ा रास्ता बताया है कि वह सतगुरु के चरणों की सेवा व उसकी महिमा का गुणगान करे क्योंकि उसके नाम की महिमा में ही अनन्त महिमा है। वह बिना छेड़े महकता है। वह निरंकारी अनुपम है। केवल त्रिकुटी में ध्यान स्थिर करने पर दिखलाई देता है। इसके आगे त्रिकुटी भृकुटी में भेद मिटाकर घट-मठ से अलग उसका अनादि अनन्त स्वरूप है। उसको जननी से जना नहीं उसके कोई माता पिता नहीं। वह त्रितफ से मुक्त पिंड-ब्रह्माण्ड से रहित, स्वयंभू है-
”न सतगुरु जननी जन्या, जाके माया न बाप।
पिंड ब्रह्माण्ड से रहित है, ना वहाँ तीनों ताप।।“1
संत गरीबदास ने गुरु की महिमा को अपरम्पार माना है। वे कबीरदास को ही अपनी वाणी में गुरु स्वीकार करते हैं। जिनका स्थान सभी सन्तों में सर्वश्रेष्ठ है। गरीबदास जी कहते हैं-
”गरीब ऐसा सतगुरु हम मिल्या, सुरति सिंघ के तीर।
सब सन्तन सिसाज है, सद्गुरु अदल कबीर।।
छप्पन भोग विलास, कंद निज खीरा है।
गरीबदास का सतगुरु-पुरुष कबीरा है।।“2
संत गरीबदास जी ने अपनी वाणी में सदाचार और नैतिकता पर बल दिया। उन्होंने समाज में व्यक्ति को सुधारने के लिए सदाचार, एवं नैतिकता का पाठ पढ़ाया। उनकी वाणी में अनेक स्थलों पर सदाचार और आचरण की सुन्दर उक्तियाँ मिलती हैं। यदि उनकी वाणी में आचार संहिता कहा जाए तो कोई अत्युति नहीं होगी। संत जी ने हमेशा सत्य की प्रशंसा की है। झूठ को त्यागने को बार-बार कहा है।
”गरीब साचे कुं प्रणाम है, झूठे के शिर डंड।
चंद सूर की आयु लग, दोखज निकसे नाहि।।”3
जो लोग समाज में नशा, मांस, मदिरा आदि का सेवन करता है। उसका डटकर विरोध किया। जो इन व्यसनों का सेवन करता है वह परमात्मा को ही प्राप्त होता है-
”सुरापान भंगी मीट मांस खाहिं
कक्कड़ चरस पीय यमलोक जाहिं।।“4
संत गरीबदास जी ज्ञानमार्गी धारा के संत होते हुए भी संस्कार व विभिन्न संस्कारों एवं मान्यताओं से जुड़े हुए थे। उन्होंने मानव जीवन के षोडश संस्कारों को बताया। उनकी वाणी में मंगलाचरण मिलता है। सतगुरु ब्रह्म और गुरु जिन्होंने सुर, नर, मुनि, साधु-संतों को सब कुछ प्रदान किया।
”नमो नमो सत्पुरुष कूं, नमस्कार गुरु कीन्हीं।
सुर, नर, मुनि, जन साधवा, संतों सरबस दीन्ही।।“5
भक्ति का एक रूप का नाम स्मरण भी है। ‘सुमरन का अंग’ में गरीबदास ने अपने इष्ट का अनेक रूपों में स्मरण किया है। वह अविर्गत, अनादि, अनन्त, अपार, अमोल, अचल, शाश्वत है। कादर, करीम, सबका मालिक रमता राम है। वह निर्गुण-सगुण से परे शब्दतीत है। वह हमारे शरीर में व्याप्त है। उसने अनेक भक्तों का उद्धार किया है। वह उन्हीं के लिए सदा प्रगट होता है। अनेक प्रकार से ईश्वरीय स्मरण करते हुए उन्हें मानव को नैतिकता, सदाचार एवं भाईचारे का पाठ पढ़ाया है-
”राम रसाइन पीजिए, यौह औसर यौह दाव।
फिर पीछे पछताइगा, चला चली होई जाव।
राम रसाइन पीजिए, चैबा फूल चुवाई।।
सुनि सरोवर हंस मन, पीया प्रेम अधाई।।“6
संत गरीबदास की वाणी में ज्ञान, योग के साथ भक्ति अन्र्धारा सी प्रवाहित है। भागवत में श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद सेवन, अर्चना वंदन, दास्य, सख्य आदि भक्ति के नौ प्रकार बतलाये गये हैं। उन्होंने मानव को भक्ति के स्मरण करने पर बल दिया-
”राम रटत नहिं ढील कर, हर दम नाम उचार।
अमी महारस पीजिए, यो तत बारंबार।।“7
संत गरीबदास परोपकार को सबसे बड़ा पुण्य कर्म मानते हैं। उनके अनुसार परोपकार करते समय पात्र-अपात्र का विचार करना व्यर्थ है। मेघ बरसते समय यह नहीं देखते कि अमुक भूमि उपजाऊ है या अनुपजाऊ, वह दोनों को समान रूप से संचित करता है। गंगा का पवित्र पानी उत्तम और
अधम का विचार किए बिना सबकी प्यास बुझाता है-
”नाही विचारीत। मेघ हागणदारी सेत
नये पाहे त्याचा अंत। ठेवी कारणाचे चित्त।
वर्जीत गंगा। नाही उत्तम अधम जगा।।“8
संत गरीबदास ने ईश्वर प्राप्ति का आसान मार्ग भक्ति को बताया है। श्रद्धा और प्रेम के योग से भक्ति का निर्माण होता है। ईश्वर को प्रेम के
आधार पर प्राप्त किया जा सकता है।
”प्रेम तेथे वास करी। सुखी उच्चारिता हरी।
प्रेम पाति लागे बले। भक्त देखानिया भोले।।“9
संत गरीबदास ने माया से छुटकारा पाने के लिए सच्चे गुरु की प्राप्ति अनिवार्य है जो साधक को माया रूप विषमान करने से दूर रख सकता है। सद्गुरु के बिना साधक की ज्ञान रूपी आँखें अज्ञान रूपी विष के प्रयोग से विषय विकार रूपी अन्धत्व को प्राप्त हो जाती-
”गरीब माया का रस पीय कर, फूटि गये दो नैन।
ऐसा सतगुरु हम मिल्या, वास दिया, सुख चैन।।
गरीब माया का रस पीय कर, हो गये भूत खबीस।।
ऐसा सतगुरु हम मिल्या, भक्ति दई बखसीस।
गरीब माया का रस पीयकर, हो गए डामा डोल।
ऐसा सतगुरु हम मिल्या, ज्ञान योग दिया खोल।।“10
कोई भी संत बुरे मार्ग पर जाने की सलाह नहीं देता है। समाज में मनुष्य को एक दूसरे के साथ व्यवहार करते हुए नेक आचरण करना चाहिए। सदाचारी मनुष्य ही ईश्वर को सबसे प्रिय लगता है। संत गरीबदास जी ने सदाचरण के लिए कथनी और करनी में साम्य होना आवश्यक माना है। लोग ईश्वर की पूजा अर्चना करते समय बाह्याचार तथा कर्मकांड करते हैं परन्तु उसमें सदाचार नहीं होता। सदाचारी मनुष्य सबके साथ सत्य तथा प्रेमपूर्वक व्यवहार करता है। लेकिन आज के इस आपाधापी भौतिकवादी युग में मनुष्य की कथनी-करनी में भिन्नता पैदा हो गई। लेकिन ऐसे लोग सदाचार एवं ईश्वर से कोसों दूर जाते हैं। संत गरीबदास जी ने अपने युग की सामाजिक तथा धार्मिक समस्याओं के प्रति सजग रहे। उनके उपदेश शाश्वत जीवन मूल्यों से अनुप्राणित है। उनके उपदेश सार्वभौमिक सत्य के रूप में सर्वग्राह्य है। मानव धर्म से बढ़कर अन्य को धर्म नहीं होता, यह नसीहत उन्होंने समग्र विश्व को दी है। जिनकी वर्तमान परिवेश में भी आवश्यकता है।
(1) संत गरीबदास ने मनुष्यों में नीति मूल्यों की आवश्यकता पर बल दिया।
(2) गरीबदास जी ने प्रेम, दया, शांति, सत्य को ईश्वर प्राप्ति का मार्ग बताया है। इन्हीं तत्त्वों से मनुष्य में संचित अहंकार नष्ट हो जाता है।
(3) संत गरीबदास जी ने समाज में अच्छे लोगों का संग करके उनके सद्गुणों को ग्रहण करने की सलाह दी है।
(4) संत गरीबदास जी ने अहिंसा को मनुष्य का परम धर्म मानते हुए हिंसा करने वालों का विरोध किया।
सारांश रूप में कहा जा सकता है कि संत गरीबदास की वाणी ने लोगों को नैतिकता का पाठ पढ़ाया। उन्होंने ईश्वर प्राप्ति के लिए भक्त जनों को नीति मूल्यों का आसन मार्ग बताया जो उनकी वाणी का विषय बन गया। प्रेम, सत्य, दया, दान, सहनशीलता, अहिंसा, सदाचार, परोपकार, निंदा का विरोध जैसे मूल्यों का पाठ पढ़ाया। इसी प्रकार से संत सुंदरदास जी ने नैतिक-नियमों का वर्णन व्यवस्थित रीति से करते हुए कहते हैं-
”प्रथम अहिंसा सत्य, हि जानि सोय सुन्यागै।
ब्रह्मचर्य दृढ़ गहै क्षमा, धृति सों अनुरागै।।
दया बड़ो गनु होइ, माज्र्जव हृदय सुआने।
मिताहार पुनि करै, शौच नीकी विधि जानें।।“11
संतों की वाणी में वह अलौकिक शक्ति एवं प्रेरणा विद्यमान रहती है जो अपवित्र हृदयों को भी पवित्र कर देने की क्षमता रखती है। इसी प्रकार से संत गरीबदास की वाणी संत परम्परा को समृद्ध और पुष्ट करती है। उनकी वाणी धर्म और समाज की एकता एवं विश्वबंधुत्व का संदेश दे रही है और नीति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे रही है।

संदर्भ-
1. ज्ञान चंद शर्मा, आचार्य गरीबदास की वाणी, पृष्ठ 9
2. वही, पृष्ठ 12
3. डॉ. रणधीर सिंह, संत गरीबदास दर्शन और रहस्यवाद, पृष्ठ 122
4. वही, पृष्ठ 122
5. ज्ञानचंद शर्मा, आचार्य गरीबदास और उनकी वाणी, पृष्ठ 13-14
6. वही, पृष्ठ 23
7. वही, पृष्ठ 25
8. वही, पृष्ठ 27
9. वही, पृष्ठ 36
10. डॉ. रणधीर सिंह, संत गरीबदास दर्शन और रहस्यवाद, पृष्ठ 126
11. डॉ. सुनीता धानुका अग्रवाल, मध्यकालीन संत साहित्य और मान व मूल्य, पृष्ठ 105

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।