अंध-गुफाओं का कैदी

चंद्र मोहन भण्डारी
चंद्र मोहन भण्डारी

कितने-कितने महाभारत
महाभारत का कथा सागर विश्व की पौराणिक धरोहर है न केवल इसलिये कि वह अत्यंत रोचक है और एक विशाल जनमानस की भावनाओं से अंतरंग रूप में जुड़ा है अपितु वह अन्य कारणों से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह एक दस्तावेज है पौराणिक, ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों में मानव की सांस्कृतिक-विकास-यात्रा के उन आयामों का जो उसे परिभाषित करते हैं और आगे भी करते रहेंगे। यह बात अधिक महत्व नहीं रखती कि ऐतिहासिक द्दष्टि से वैसा युद्ध वास्तव में लड़ा गया था या नहीं। वैसे कई तरह के युद्ध लड़े गये हैं आज भी लड़े जा रहे हैं और भविष्य में भी उनकी संभावना बनी रहेगी। सवाल जो हमें आंदोलित करता है और इस निबंध का मूल विषय है कि किस तरह मानव-मन की जटिलता इस तरह की त्रासदी को अंजाम दे जाती है। महाभारत के इस कथा सागर के पात्र मानव के विस्तृत वैचारिक परिवेश का लगभग संपूर्ण वर्णपट प्रस्तुत करते हैं अपनी सारी, अच्छाइयों, कमियों, कुंठाओं, आदर्शों, सुकृतियों एवं विकृतियों के साथ – वह सब जो हर कहीं, हर देश-काल में चरितार्थ होती नजर आ जाती हैं।

महाभारत का कथा साहित्य जीवन के बीहड़ यथार्थ को इतनी स्पष्टता से उजागर करता है और आज भी प्रासंगिक है।

एक बात और ध्यान देने योग्य है श्रीकृष्ण के अवतार में भगवान की उपस्थिति के होते कोई चमत्कारिक समाधान न खोजकर एक वास्तविकता से जुड़ा चित्रण पूरी कथा को एक अद्वितीय आयाम दे देता है। और यह भी कि मानव रूप में अवतरित प्रभु भी स्वयं को उन मानकों से संचालित करते हैं जो सामान्य मानव के लिये स्वीकृत हैं। कथा के अंत में सारे प्रश्नों के समाधान नहीं हो जाते कुछ प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाते हैं। ऐसा होना भी लाजमी है क्योंकि सारा कथाक्रम अंतत: मानव-मन की ही उपज है जिसके मन की जटिलता उसके लिये सबसे बड़ी चुनौती है और इस कथा में ईश्वरीय उपस्थिति के बावजूद अनुत्तरित प्रश्नों का विद्यमान होना उस मानवीय त्रासदी को विशेष तीखेपन में उजागर कर देता है। ईश्वरीय उपस्थिति के बावजूद चमत्कारीय समाधानों की अनुपस्थिति एक अद्वितीय आयाम दे देती है कथा को जो अन्यत्र शायद ही मिले। युद्ध के बाद के हालात विजेता और विजित दोनों के ही लिये त्रासदी से कम नहीं होते जो न केवल युद्ध की विभीषिका को चित्रित करते हैं अपितु उसकी नितांत निरर्थकता को भी प्रस्तुत भी करते हैं। जैसा पहले कहा गया यह कथासागर एक दस्तावेज भी है देश-काल के सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक ताने-बाने का, मूल्यों का, आदर्शों का और साथ ही उन पाशविक प्रवृत्तियों का जो यथार्थ को पूरी नग्नता में उजागर करती हैं। मूल्य समय के साथ बदले हैं और बदलते रहेंगे पर कुछ है जो लगभग स्थायी है और वह हमारी चर्चा का मुख्य विषय भी है। यह पहले कहा गया है कि इस कथासागर के पात्र समाज में विद्यमान चरित्रों का विशद वर्णपट प्रस्तुत करते हैं। दरअसल इसे हम एक दूसरे ही संदर्भ में देखने का प्रयास कर सकते हैं कथा का हर पात्र हम में से हर एक में विद्यमान है प्रेम, घृणा, ईर्ष्या, द्वेष, त्याग, लालच – सभी भाव हर एक में हैं पर उनका प्रतिशत हर एक में किसी समय विशेष में अलग हो सकता है जो उसे परिभाषित करता है यानि जो भाव प्रभावी एवं मुखर हैं उस क्षण उसे परिभाषित करते हैं। समय व परिस्थिति बदलने पर उनमें बदलाव आना स्वाभाविक है. साथ ही यह भी कि हमारे अंदर संग्राम चलता रहता है वैचारिक स्तर पर उन विभिन्न भावों के बीच, हमारे मन-अभ्यंतर में छिपी-दबी भावनाओं के बीच। वह युद्ध जो कभी सुदूर अतीत में कुरुक्षेत्र में लड़ा गया था आज वह एक ऐतिहासिक घटना मात्र न होकर एक प्रतीक बन चुका है हर कहीं हर स्तर पर; युद्ध का मैदान कुरुक्षेत्र हो सकता है या हल्दीघाटी, या वाटरलू या फिर दुनिया में कहीं भी, यहाँ तक कि ‘घर-घर में महाभारत’। शायद महाभारत की रोचकता के साथ उसकी सार्थकता और प्रासंगिकता – दोनों मिलकर उसे अत्यंत प्रभावी बना देते हैं।

अंधायुग: विश्लेषणपरक चित्रण व बात अंधगुफाओं की
धर्मवीर भारती कृत ‘अंधायुग’ [1] अपने समय का एक सशक्त काव्य-नाटक है जो महाभारत की पृष्ठभूमि में लिखा गया है और युद्ध के बाद के हालात पर केन्द्रित है जहाँ दोनों पक्ष आकलन करते हैं उस त्रासदी के प्रभावों का। कथा का सारांश भारती के ही मार्मिक चित्रण में:

पथभ्रष्ट, आत्महारा, विगलित
अपने अंतर की अंध-गुफाओं के वासी
यह कथा उन्हीं अंधों की है
यह कथा ज्योति की है अंधों के माध्यम से।

महाभारत या कोई अन्य युद्ध, सब मिलाकर बात अंतर की अंध-गुफाओं पर आ जाती है जो हमारे मन की बनावट और बुनावट [2] का प्रतिफल है। जो संग्राम अंदर चल रहा वह तो अंदर का है ही पर वह जो बाहर घटता है उसका भी मूल स्रोत वहीं है मन के अंदर की अंध-गुफाओं में। थोड़ा सा प्रयास करते है बात की तह तक पहुँचने के लिये।

आज हम यह जानते हैं कि धरती पर जीवन का क्रमिक विकास हुआ है और करोड़ों सालों में जीव-जगत का वर्तमान स्वरूप विकसित हुआ है। मानव के जैविक इतिहास पर नजर डालें तो लगभग साठ लाख साल पहले का चिम्पांजी नजर आता है जीव-जगत में मानव का सबसे करीबी रिश्तेदार। कभी-कभी दो पैरों पर चलने का प्रयास एवं हाथ की उंगलियों का अपेक्षाकृत अधिक प्रयोग चिम्पांजी के लिये असामान्य नहीं था। माना जाता है कि इनमें से कुछ जीवों ने सीधे खड़े हो दो पैरों पर चलने का सफल प्रयास किया और तभी से एक विशेष परिवर्तन आना शुरू हुआ जिसमें मस्तिष्क अपेक्षाकृत बडा और अधिक विकसित होने लगा। दो पैरों पर सीधे खडे होना व मस्तिष्क का त्वरित विकास लगभग तीस लाख साल पहले आरम्भ हो गया था जो मानव को शेष पशु जगत से अलग करता गया। मूलत: मानव एक विचारशील पशु ही है और उसकी सोचने की सामर्थ्य ने अक्सर उसकी पाशविक प्रवृत्ति को उभारने में मदद की है उसकी विध्वंसात्मक क्षमता को आवर्द्धित किया है जबकि दूसरी ओर विचारशील मन समय-समय पर उन भावों को भी उभारता रहा है जो प्रेम, त्याग एवं आत्मवत सर्वभूतेषु जैसी उदात्त एवं निजेतर भावनाओं से संबद्ध हैं।

हम महाभारत की कथा को एक विचारशील पशु-मानव की प्रवृत्तियों के घटनाक्रम के रूप में देख सकते हैं जो मस्तिष्क की बनावट व बुनावट का प्रतिफल हैं। मन मस्तिष्क की संरचना पर आधारित है और उसकी बुनावट एक सीमा तक मस्तिष्क का ही आईना है। एक सरलीकृत प्रारूप में अगर मस्तिष्क को हार्डवेयर (कम्प्यूटर) से प्रदर्शित करें तो मन को सोफ्टवेयर के समकक्ष रखना होगा। यह एक सरलीकरण है बात के समझने एवं समझाने के लिये और अपनी सीमा के अंदर सार्थक भी।

मन: बनावट व बुनावट
विज्ञान ने पिछले चार सौ सालों में हमारी जानकारी में अभूतपूर्व वृद्धि की है। जो वैज्ञानिक प्रगति हजारों सालों के इतिहास में नहीं हो सकी वह मात्र चार सदियों में संभव हो गयी। फिर भी आज जितना हम जानते हैं वह सब उसकी तुलना में नगण्य है जिसे हम अभी तक नहीं जानते। इसी में से कुछ हम जानने का प्रयास कर रहे हैं। आज जीवन की उत्पत्ति एवं विकास के बारे में काफी जानकारी हो चुकी है पर मानव मस्तिष्क और मन की जानकारी में अभी बहुत कुछ होना बाकी है। मन एक अथाह सागर की तरह है जिसमें सतह पर की हलचल ही सामान्यतया हम देख पाते हैं और कभी-कभार कुछ हाल गहराई का भी ज्ञात कर लेते हैं। मन की काफी जानकारी उन मनोरोगों के अध्ययन से मिलती रही है जिनके बारे में मनोचिकित्सक काफी समय से प्रयासरत रहे। जैसे जैसे प्रौद्योगिकी का विकास हुआ मन के अंदर की हलचल कुछ अधिक समझ आने लगी। एफ एम आर आइ यानि फंक्शनल मैगनेटिक रेजोनेन्स इमेजिंग (functional magnetic resonance imaging, FMRI) जैसी आधुनिक प्रौद्योगिकी मस्तिष्क की कार्यपद्धति को कुछ सीमा तक बिम्बित करती है और हमें वह जानकारी दे सकती है जिसकी हमें तलाश है।

इस लेख में मस्तिष्क की संक्षिप्त कार्यप्रणाली देने का उद्देश्य केवल उसकी जटिलता को दर्शाना है क्योंकि अंतत: मस्तिष्क की जटिलता प्रतिबिम्बित होती है मानसिक क्रियाओं में। यही मानसिक क्रियाऐं उन अंधगुफाओं तक ले जाती हैं जो हमारी कथा के मूल में है।

मस्तिष्क मूलत:दो हिस्सों या गोलार्द्धों में बँटा है बायाँ और दाहिना; सामान्यतया दोनों जुडे रहते है कोरपस कोलोसम के द्वारा। दोनों हिस्सों में कुछ अंतर दिखायी देता है और यह अंतर तब अधिक उजागर हो जाता है यदि कोरपस क्षतिग्रस्त हो जाय; ऐसा होने पर दो गोलार्द्धों के बीच तालमेल नहीं हो पाता और दोनों हिस्से दो अलग इंसानों की तरह बर्ताव करने लगते हैं। बायाँ हिस्सा पूर्ण चेतन व्यक्ति की तरह व्यवहार करता है जिसके साथ संवाद करना आसान है जबकि दाहिने हिस्से के साथ संवाद होना कठिन होता है। बायें से संवाद के दौरान यदि प्रश्न किया जाय कि ‘क्या तुम मेरी बात समझ रहे हो’ तो उत्तर होगा ‘हाँ’. लेकिन दाहिने से कोई उत्तर मिलना मुश्किल होगा। ऐसा इसलिये कि बोलने की सामर्थ्य सिर्फ बायें हिस्से में होती है जबकि समझ दोनों में होती है। दोनों गोलार्द्ध चार भागों में बंटे हैं जिनके अलग-अलग काम हैं:     (1) पिछला भाग ओक्सिपिटल (Occipital) द्दष्टि से मुख्य रूप मे जुड़ा है, (2) कान के पास का भाग टेम्पोरल (Temporal) कहलाता है जिसका काम श्रवण, भावना व कुछ सीमा तक द्दष्टि से भी जुडा है, (3) तीसरा भाग पेरियेटल (Parietal) है जो स्पर्श से संबंध रखता है और वस्तुओं के त्रिविमीय अवलोकन के लिये भी जिम्मेदार है, (4) मस्तिष्क का अगला भाग फ्रंटल (Frontal) कहलाता है जिसकी जानकारी अब तक कम ही हो सकी है पर इतना कहा जा सकता है कि हमारे अमूर्त विचार, नैतिक मूल्य, आकांक्षा आदि का इस भाग से संबंध है। इनमें से किसी भाग के क्षतिग्रस्त होने पर उसकी कार्य-क्षमता प्रभावित होती है। मस्तिष्क की कोशिकाऐं जो उसका कार्य सुगम करती है न्यूरॉन कहलाती हैं। औसतन मस्तिष्क में लगभक एक खरब न्यूरॉन होते हैं जिनके मध्य संचार संपर्क अधिकतर रासायनिक विधि से होता है।

विभिन्न कार्यों के लिये मस्तिष्क में अलग क्षेत्र निर्धारित हैं जैसे रंगों की समझ, स्पर्श संवेदन, भाषा व गणित; भाषा वाचन व भाषा की समझ के अलग क्षेत्र हैं इसी तरह गणित में प्रयुक्त संख्या की पहचान एवं गणितीय प्रक्रिया के भी अलग क्षेत्र हैं [3]। शरीर के लगभग हर भाग पर स्पर्श किये जाने की सूचना मस्तिष्क में एक अलग क्षेत्र को उत्तेजित करेती है यह स्पर्श-संवेदना क्षेत्र पेरियेटल भाग में है और होमनक्युलस कहलाता है. गणितीय संख्या का क्षेत्र एवं रंग-द्दष्टि क्षेत्र पास-पास हैं और कुछ व्यक्तियों में एक दूसरे को स्पर्श करने लगते हैं कुछ वैसे ही जैसे इलेक्ट्रोनिक सरकिट में कभी गलत कनेक्शन हो जाते हैं। गणित की संख्या एवं रंग के क्षेत्र जो पास-पास हैं जब स्पर्श करने लगें ऐसी स्थिति असामान्य है और जब यह होता है अंक रंगीन दिखने लगते हैं यद्यपि आँखों के सामने सफेद कागज पर काले से लिखा गया है। विभिन्न अंक अलग रंग के भी दीख सकते हैं जैसे 2 व 5 लाल व हरे रंग के दिख सकते हैं। इस असामान्य हालत को सिनेस्थेशिया कहा जाता है। पहले इस तरह की बातों को भ्रम समझ कर टाल दिया जाता था पर धीरे-धीरे यह उजागर होने लगा कि यह कुछ लोगों में आनुवंशिक कारणों से संभव है। इसे सिद्ध करने के लिये एक अत्यंत सरल प्रयोग किया जाता है। एक सफेद बोर्ड पर काले से ५ का अंक बहुत संख्या में लिखा जाता है और 2 का कुछ कम, पर अंक 2 को इस तरह लिखा जाता है कि वे एक त्रिभुज. आयताकार या वृत्ताकार रेखाचित्र बनाते हैं। प्रयोग में इसे कई लोगों के सामने अचानक प्रस्तुत किया जाता है और पूछा जाता है कि अंक 2 किस ज्यामितीय चित्र का निर्माण करते हैं। सामान्य व्यक्ति को लगभग 25-30 सेकेंड का समय लगता है यह ढूढने में कि अंक 2 कहाँ पर हैं एवं कौन का ज्यामितीय आकार प्रस्तुत करते हैं। जिनको सिनेस्थेसिया है वे 2 एवं 5 के अलग रंगों के कारण दो या तीन सेकेंड के अंदर ही प्रश्न का सही उत्तर दे देते हैं।

पहले कहा जा चुका है यहाँ पर मस्तिष्क की संरचना व कार्यविधि की विस्तृत जानकारी देने का इरादा नहीं और यह संभव भी नहीं है। लेख का उद्देश्य मस्तिष्क और मन की जटिल कार्यप्रणाली को दिखाना है। यह दिखाना है कि प्रतीकात्मक इस महासागर में गहराई तो है ही ऊबड़-खाबड़ तलहटी है जिसमें पर्वत और घाटियाँ है वनस्पतियाँ हैं और गुफाऐं हैं अंधेरी डरावनी गुफाऐं। यह अंधेरा, गहरा निचला क्षेत्र अचेतन मन कहलाता है जहाँ स्मृति कोशिकाओं में संचित है बहुत कुछ जिसकी अंध-गुफाओं में अतृप्त इच्छाओं के हुजूम हैं कुंठाओं के विस्तार हैं जिनकी विस्तृत चर्चा सिग्मंड फ्रायड ने की है। फ्रायड का विचार था कि बिम्बों व प्रतीकों में हमारी दबी अतृप्त इच्क्षाऐं उजागर होती हैं सपनों के माध्यम से। यह अचेतन मन जिसे हम खुद ठीक से नहीं जानते हमारे काम-काज को अप्रत्यक्ष रूप में प्रभावित करता है। पर यह सोचना भी गलत होगा कि यह अंधेरा और अंध गुफाओं का क्षेत्र केवल दबी अतृप्त इच्छाओं, कुंठाओं व वासनाओं का ही केन्द्र है। यहाँ दीर्घकालीन सुप्त स्मृति में अगर ये सब हैं तो कुछ अच्छा भी है कुछ प्रेरणाप्रद। समझा जाता है कि वैज्ञानिकों, कवियों व मनीषियों के तथाकथित प्रेरक क्षण वे ही रहे हैं जिनमें अचेतन से कुछ मोती निकल सतह पर आ जाते हैं। कहने का अर्थ यह कि दीर्घ स्मृति में संचित इसमें सभी कुछ है अधिकतर दबी इच्छाएँ, कुंठाएँ, वासनाएँ और साथ ही कभी-कभी प्रेरणाप्रद विचार व भावनाएँ।

चेतन, अवचेतन, अचेतन – मन का यह प्रारूप उसकी कार्यविधि समझने में सहायक रहा है। जिन अंधगुफाओं की बात की जा रही है अधिकतर अचेतन में ही भले हों उनकी उपस्थिति अवचेतन और कभी-कभी चेतन में भी दीख पड़ती है। वास्तव में मानव जीवन बहुत कुछ स्मृतियों का ही मेला और खेला है जिनकी बनावट व बुनावट अलग-अलग तरह से हमें प्रभावित कर सकती है। कौन सा स्मृति क्षेत्र प्रभावी होगा निश्चित रूप में नहीं कहा जा सकता - प्रेम, ईर्श्र्या, क्रोध, अवसाद, या फिर घनीभूत पीड़ा। कवि जयशंकर प्रसाद के वर्णन में –

जो घनीभूत पीड़ा थी मस्तक में स्मृति सी छाई
दुर्दिन में आँसू बनकर वह आज बरसने आई।

घनीभूत पीड़ा हो या घनीभूत कुंठा या द्वेष या घृणा - आँसू बनकर बरसेंगे या प्रतिशोध के यंत्र बनकर गरजेंगे या फिर अवसाद का कारण बनकर नैराश्य की अंधेरी गुफाओं में ला पटकेंगे। यह जिन बातों पर निर्भर करेगा उनमें कुछ की चर्चा हम करेंगे।

सामर्थ्य का कैदी: पैटर्न की कैद
सवाल फिर उठता है कि प्रतीकात्मक अंध-गुफाओं का स्वरूप क्या है? यह जान लेना जरूरी होगा कि मन की कार्यप्रणाली कुछ सीमा तक सामान्य कम्प्यूटर की तरह होते भी कई मायनों में एकदम अलग है। जहाँ तक सामान्य गणना का सवाल है कम्प्यूटर अप्रत्याशित तेजी से वह कर सकता है जिसे करने में हमें घंटों या हफ्तों लग जायें, पर कुछ ऐसा भी है जो हमारा मन जिस तेजी से कर गुजरता है उसका तोड़ पाने में कम्प्यूटर को अभी समय लगेगा जैसे किसी चेहरे को या किसी द्दश्यावली को तुरंत पहचान लेना।

मन की कार्यप्रणाली कुछ सीमा तक पैटर्न पर आधारित है। कार्य करने का यह तरीका मन की क्षमता को कई गुना बढ़ा देता है पर इसमें एक कमी भी है कि मन धीरे धीरे इनकी गिरफ्त में आ सकता है। पहले हम यह जान लें कि पैटर्न क्या है और क्यों इतना प्रभावी है? जिलेटिन प्रयोग द्वारा एडवर्ड दि बोनो (3) इसे समझाते हैं. कल्पना करें एक समतल बोर्ड की जिस पर जिलेटिन की तह चढी हुई है जिसे थोडा तिरछा रख देते हैं ताकि हलका ढाल उसमें बना रहे। अब बोर्ड के ऊपरी हिस्से के किसी स्थान पर गरम स्याही धीरे-धीरे उड़ेलते हैं स्याही ढाल की दिशा लेकर बहना आरम्भ करती है और उसके बहाव-पथ में कुछ जिलेटिन पिघलता है इस तरह जिलेटिन की सतह पर बहाव-पथ नालियों के रूप में साफ दिखायी देता है। यही प्रयोग दोहराने पर एक बात साफ है कि अबकी बार अधिकतर स्याही पूर्व निर्मित बहाव-पथ की ओर ही बहती है जिसके कारण कुछ और जिलेटिन पिघल कर बहाव-पथ को कुछ और गहरा कर देती है। यह माना जाता है कि एक बच्चे का मन कुछ जिलेटिन सतह की तरह ही होता है जिसपर पहली सूचना गहरा असर करती है। संस्कार कुछ इसी तरह मन-पटल पर अंकित होते हैं। इन्हीं पूर्व अंकित लगभग स्थायी प्रभावों को पैटर्न कहा जाता है। हमारी कई आदतें, संस्कार और अवधारणाऐं विशेष प्रकार के पैटर्न ही हैं।

उपरोक्त प्रयोग में ये पैटर्न बहाव-पथ को लगभग पूर्व निर्धारित कर देते हैं कुछ वैसे ही जैसे बारिश का पानी नदियों के बहाव-पथ की ओर अग्रसर होता है। पृथ्वी की सतह पर नदियों के बहाव-पथ एक तरह के पैटर्न ही हैं। कुछ इसी तरह हमारे वैचारिक प्रवाह को भी मानस-पटल के पैटर्न सुगम करने में मदद करते हैं। एक दो उदाहरण लेना समीचीन होगा। हम किसी इंसान से मिलते हैं अचानक हमें याद आने लगता है इसे कहीं देखा है कुछ पल भटकने के बाद धीरे-धीरे याद आ जाता है कि ये तो अपना बचपन का यार मंटू है। हम किसी गीत की पंक्ति भूल रहे होते हैं तभी कोई हमें उसका पहला शब्द याद दिलाता है बस फिर तो हम पूरा गीत दोहरा जाते हैं। ये दोनों उदाहरण दर्शाते हैं कि हमारे मन की कार्यप्रणाली में इन पैटर्न की कितनी बड़ी भूमिका है। बचपन में क्लासरूम में पहाड़े रटना या प्रार्थना करना हम सबको ज्ञात है। बीस साल बाद भी थोड़ा सा याद दिलाने पर हम उन्हें आसानी से दोहरा सकते हैं।

ये पैटर्न हमारा काम सुगम करते हैं कह सकते हैं कि यह प्रकृति द्वारा दी गयी एक सुविधा है। पर यह भी ध्यान रखना है कि अक्सर ही हम इनकी गिरफ्त में आ जाते हैं। एक दिशा में ये ज्ञानार्जन-प्रक्रिया को सुगम करते हैं एवं यदा-कदा प्रेरणा के यंत्र बनते हैं तो दूसरी दिशा में कट्टरपंथियों का काम भी आसान कर देते हैं। एक कट्टरपंथी कुछ खास परह के पैटर्न की गिरफ्त में है। आदर्श स्थिति वह होगी जिसमें हम पैटर्न की सामर्थ्य का उपयोग करें पर यह भी कोशिश करते रहें कि हम उनके कैदी बनकर न रह जायें यानि उनका लाभ हमें मिलता रहे पर उनसे होने वाली संभावित हानि नहीं। क्या इस प्रकार की ‘चित भी मेरी, पट भी मेरी’ वाली बात वास्तविक स्थितियों में चरितार्थ की जा सकती है? आसान नहीं है यह पर एक लघु सीमा तक आंशिक रूप में संभव है निरंतर प्रयास करते रहने पर।

मन की जिन अंध-गुफाओं की बात से बात चल निकली थी उनकी संरचना में इन पैटर्न की भूमिका महत्वपूर्ण है। महाभारत के अधिकतर पात्र इन्हीं पैटर्न-गुफाओं में कैद थे और हर देश-काल में यह लगभग शाश्वत सत्य बनकर उभरता रहा है जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है। हर कट्टरपंथी, चाहे धार्मिक आधार पर हो या राजनैतिक, या सामाजिक, इन पैटर्नों का (अंध-गुफाओं का) कैदी है पर उसे नहीं लगता कि वह कैदी है अन्यथा उस से बाहर निकलने का प्रयास करता जरूर।

देहयष्टि में कैद जीव सब
मानव दोहरी सजा भोगता
कैदी तन का, मन का भी
न्यूरॉन-तंतुओं के उलझाते जालों में
स्मृति-कोशिकाओं में संचित
पैटर्न-गुफाओं के गहरे अंधियारों में
झेलता चेतन मन का द्वंद।
हलचल मन-अभ्यंतर की
अंतस्तल तक ले आती भूचाल
घनीभूत पीड़ाओं के विस्तार
कुंठाओं की उद्दाम तरंगों पर सवार
सुनामी ले आते विकराल।

यह कथा ज्योति की है
महाभारत की कथा या कोई भी कथा वस्तुत: मानव मन की कथा है मन के अस्तित्वजनित द्वैत की कथा है ज्योति की और साथ ही अंधपगुफाओं की कथा। पैटर्न आधारित कार्यशैली के कारण मन की विराट सामर्थ्य उसे द्रष्टा भी बना सकती है और दैत्य भी। द्रष्टा एवं दैत्य और उनके बीच के विराट क्षेत्र में अनुभवों व अनुभूतियों के विस्तार - अंतत: क्या वास्तव में फलीभूत होगा यह कई बातों पर निर्भर करेगा जिसमें संस्कारों, आदतों, मस्तिष्क की असामान्य स्थितियों व बाहरी परिस्थितियों का मिला जुला प्रभाव हो सकता है। इन बाहरी परिस्थितियों में अब बड़ा परिवर्तन आया है प्रौद्योगिकी के विकास के साथ मीडिया का प्रभाव क्षेत्र बढ़ा है और साथ ही बढ़ी है हमारी जानकारी भी। लेकिन यह भी ध्यान में रखना है कि मन की अंध-गुफाओं में भी हलचल हुई है जिसके कारण असहज एवं असामान्य मनस्थितियों का सैलाब सा दिखायी पड़ने लगा है। हमारे मन के अंदर चलने वाले सतत संग्राम में कई नये आयाम जुड़ रहे हैं मानसिक विकृतियों के नये-नये रूप सामने आ रहे हैं जिनके बारे में समाचार पत्रों व पत्रिकाओं की एक झलक भर काफी है। इन सबसे निपटने में अभी बहुत कुछ करने की जरूरत होगी। जिदु कृष्णमूर्ति इस बात को सही अंदाज में प्रस्तुत करते हैं यह कहकर कि मानव की बौद्धिक उपलब्धियाँ बहुत प्रभावशाली हैं पर मनोवैज्ञानिक रूप से वह अभी परिपक्व नहीं है। पैटर्न संचालित मन [5] को वे अवधारणात्मक (conceptual mind) कहते हैं क्योंकि हमारी कई धारणाऐं व अवधारणाऐं भी पैटर्न आधारित हुआ करती हैं। दूसरा मन जो पैटर्नों से अप्रभावित है वह विचारशील या विवेकी मन (perceptive mind) है। जिसे हम विवेक कहते हैं वह बौद्धिक-मनोवैज्ञानिक समन्वय से प्राप्त सहज संतुलित निष्कर्ष माना जा सकता है।

यह मानव-मन का द्वैत उसे न जीने देता है और न मरने। अंतर्मन की अंध-गुफाओं का कैदी मात्र कैदी नही है। जैसा पहले भी जिक्र किया जा चुका है चेतन व अचेतन के ये अजाने क्षेत्र जिनमें अंध-गुफाओं के विस्तार हैं केवल मानव की पाशविक प्रवृत्तियों का ही आगार नहीं है अपितु उसकी सृजन ऊर्जा का भी भंडार है व उसके निजेतर संकल्पों का भी। निज के लिये तो हर पशु जीता है जिनमें मानव भी शामिल है पर उसका चेतन-मन जब-तब लम्बी उड़ान पर जाने का प्रयास करता है और कई बार सफल भी होता है। निजेतर संकल्पों की चर्चा विस्तार से अन्यत्र देखी जा सकती है [2, 6]। उन्नीसवीं सदी के मध्यवर्ती दशकों में अमेरिकी ट्रान्सेन्डेन्टल मूवमेन्ट उस श्रंखला की आधुनिक कड़ी है वैसे ही जैसे उपनिषदों में वर्णित कतिपय संदर्भ या आधुनिक समय में गांधी का सत्याग्रह आंदोलन। पर निजेतर संकल्पों की राह कभी भी आसान नहीं रही क्योंकि जो शक्तिशाली हैं अधिकतर वे स्वयं अंध-गुफाओं के कैदी हैं अजाने पैटर्नों की गिरफ्त में हैं। निजेतर सकल्पों की ज्योति का रास्ता अंध-गुफाओं से होकर जाता है और ‘आग का दरिया है और डूब के जाना है’ की बात को चरितार्थ करता है। सब मिलाकर यह कथा मानव जीवन के द्वैत की कथा है मन की पाशविक प्रवृत्तियों से लड़ते हुए निजेतर संकल्पों की ज्योति तक जा सकने के प्रयासों की कथा है। 

संदर्भ:
[1] धर्मवीर भारती, अंधायुग (नाटक), लेखन 1954, प्रथम मंचन 1962, किताबघर प्रकाशन, 2005.
[2] चन्द्र मोहन भंडारी, हिमालय और हडसन के बीच- एक अंदरूनी भ्रमण-पथ पर, सेतु, जून 2019.
[3] रामचन्द्रन, The Emerging Mind, Profile Books Ltd., 2003.
[4] एडवर्ड दि बोनो, Lateral Thinking, Schumacher Lectures (Ed: Satish Kumar), Blond and Briggs, 1980.
[5] A D Dhopeshwarkar, J Krishnamurti and Mind in Revolution, Chetna, Bombay 1971.
[6] Lawrence Buell (ed.), The American Transcendentalists, New York, The Modern Library, 2006.

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