आकाश में दरार - भाग 4 (धारावाहिक कहानी का अंतिम खण्ड)

प्रभु जोशी

- प्रभु जोशी

4, संवाद नगर, नवलखा, इन्दौर 452001 मध्यप्रदेश
ईमेल: prabhu.joshi@gmail.com


आकाश में दरार कहानी के पिछले अंश
खण्ड 3
खण्ड 2
खण्ड 1


अस्पताल के वार्ड की दीवार जिससे मैं टिक कर बैठा था, शायद कमजोर थी, जो अचानक धँसकी और मैं उसके एक बड़े हिस्से के नीचे दब गया। कमर से नीचे का शरीर का सारा हिस्सा दबा हुआ था और मैं जोर-जोर से चीखे जा रहा था। लोगों का चारों-तरफ से हाहाकार उठने लगा, जिसमें मुझे ताबड़तोड़ बचाये जाने की गुहारें लगायीं जा रही थी। तभी कोई कहीं से दौड़ कर पत्थर काटने वाली मशीन लेकर आया और उसने दीवार के भारी और चौड़े उस सीमेण्टेड हिस्से को काटना शुरू कर दिया, जो अभेद्य-सा दिख रहा था।

मशीन की नुकीली काँटों वाली चकरी तेजी से घूमती जा रही थी। उसके चलने की आवाज चारों तरफ ऐसे भर गयी थी, जैसे लोहे की किसी तीखी चीज से कोई आकाश में चीरा लगा रहा हो। एक लम्बे पूर्ण विराम की तरह खींच रहा हो, लकीर।

मैंने आँखें खोल कर देखा। कहीं कोई दीवार धँसकी हुई नहीं थी, ना ही मेरे पाँवों पर उसका मलबा पड़ा हुआ था। अलबत्ता, अस्पताल का मोटा और भारी-सा डबल घड़ी किया हुआ, वह लाल कम्बल मेरे पाँवों पर जरूर पड़ा था, जो पहले पलंग के पैंताने रखा हुआ था। लेकिन, वार्ड में वह पत्थर के काटे जाने की सी तीखी और चीरती आवाज अभी भी आ रही थी। मैं एक झटके से कम्बल फेंक कर, पलंग से फर्श पर कूद आया। मैंने देखा वार्ड बाय लोहे की लम्बी-सी टंकी खींच कर पिताजी के पलंग की ओर ले जा रहा था। मुझे समझते देर नहीं लगी कि वह ऑक्सीजन की है।

मैं दौड़ता हुआ पलंग के पास पहुँच गया। वार्ड बॉय तथा पास के वार्ड की अनुभवी-सी नर्स थी, उन्होंने धड़ाधड़ प्लास्टिक के कवर से फाड़कर मास्क निकाला और पिताजी के नाक और मुँह पर चढ़ा कर उसे ऑक्सीजन की टंकी से जोड़ दिया।

पिताजी की पसलियाँ जोर-जोर से ऊपर नीचे हो रही थीं, जैसे उन्हें साँस लेने के लिए पूरी देह का जोर लगाना पड़ रहा हो। कुछ समय पहले जो लम्बी-लम्बी साँसें दीर्घ खर्राटों की-सी लग रही थीं, वे अब ऊर्ध्व-श्वास सी लग रही थी। और उन्होंने अपनी बड़ी-बड़ी और पनीली आँखें खोल ली थी। वे मुझे देख रहे थे और देख कर कुछ कहना चाह रहे थे। लेकिन, सांसों की तेज आवाजाही उन्हें जीभ को हरकत करने तक की मोहलत नहीं दे रही थी। माँ मूक और निश्चल सी पलंग के पास खड़ी असहाय-सी सब देख रही थी। मैंने माँ की तरफ देखा। एक बेनींद रात का रात भर सामना करती हुई खुली और अपलक आँख से पिता को देखती रहने वाली माँ की आँखें एकदम सुर्ख-सी हो आयी थीं। पता नहीं, उन आँखों में क्या-क्या और कितने-कितने दृश्य एक के बाद एक-एक आते जा रहे थे।

मुझे क्षण भर में ही बहुत साफ हो आया था कि पिताजी को शायद दिल का जबरदस्त दौरा पड़ गया है। मुमकिन हो कि वह मायोकार्डियक-इन्फ्राॅक्शन ही हो। क्या करूँ रुआँसी रात की यह एक बेतरह बिसूरती ऐसी निष्करूण घड़ी थी, जिसमें मुझे लगा कि पिताजी किसी भी क्षण मेरी और माँ की दुनिया से कूच कर सकते हैं। मैंने हड़बड़ाये स्वर में नर्स से पूछा आपने “डॉक्टर को कॉल भेजा?” ऑक्सीजन लगाते हुए नर्स ने कहा कि मेडिकल वार्ड की सिस्टर फर्नाण्डिस दौड़ कर गयी हैं। वे बस आते ही होंगे।

माँ ने मेरी तरफ देखा फिर निकट आकर बाँह थाम कर बोली “घबराणे जेसी बात नी है रे बेटा, उणके एकदम साँस उठी अई है। ... थारे मालम तो है, पेलां भी तो ऐसीज साँस उठी आती थी। डॉक्टर साब अई रिया है, दवा देगा तो फिर से नज-मजे का हुई जायेगा।” बाद इसके तो उसने हड़काने के ही लहजे में कहा, “थारा तो निवरा ज पोटा फाटे।”

अब की बार मुझे माँ के इरादतन प्रकट किये गये इस अज्ञान पर दया नहीं खीझ और गुस्सा हो आया कि वह ऐसे और इतने सारे झूठ का क्षण भर में छार-छार हो जाने वाला आवरण चढ़ा कर आखिर क्या करना चाहती है? क्या वह मुझे पिता के मृत्यु के भय से बचाना चाहती है या कि खुद तार-तार हो रही, हिम्मत के लिए कच्चे थेगले ढूंढ रही है? जबकि अब मुझे बहुत साफ हो चुका है कि मृत्यु की यह कोई दीर्घ और सुपरिचित पूर्व तैयारी ही थी, जिसके तहत वह पिताजी पर बाज की तरह मण्डरा रही है। मैं बुरी तरह डर उठा था कि यदि पिता को मृत्यु ने निगल लिया तो क्या होगा? गाँव की सारी सम्पत्ति ताऊजी हड़प लेंगे और मुझे पढ़ाई बीच में छोड़ कर वापस गाँव जाना पड़ेगा और माँ वैधव्य के साथ नर्क हो चुके परिवार के बीच एक अधपढ़े बेटे के भरोसे जिन्दगी कैसे काटेगी? और देखा जाये तो सारा का सारा माँ को मुझे डॉक्टरी पढ़ाने के स्वप्न को धूलधानी होता देखने के लिये वैसे ही बहुप्रतीक्षित हैं। मुझे लगा, जैसे मैं एक मृत अतीत और अजन्मे भविष्य के बीच फड़फड़ाते वर्तमान की पथरीली सचाई पर अपना सर्वस्व स्वाहा कर रहा हूँ, जैसे हलाक होते हैं, मूक प्राणी किसी बलिवेदी पर।

पिताजी की सांसों की गति तेज होती जा रही थी। मुझे एकबारगी लगा कि कहीं पिताजी को कार्डियेक अस्थमा तो नहीं है? पहले भी गाँव में कभी-कभी देर रात गये पिताजी की हालत लगभग इसी तरह की गम्भीर सी हो जाया करती थी। जैसे अब हवा में उनके लिए साँस लेने लायक कुछ भी नहीं बचा है।

तभी मेडिकल वार्ड वाली नर्स इंजेक्शन की कोई शीशी और सिरिंज लिये आ गयी। वह शीशी को छत की ओर ऊपर करके सिरिंज से उसमें भरी दवाई खींच कर लगाने जा रही थी कि मैं तेजी से आगे बढ़ा और मैंने कहा, “आप यह क्या दे रही हैं, इन्हें?

“क्यों क्या आप डॉक्टर हैं?” इंजेक्शन लगाने को उद्यत नर्स ने हाथ रोक कर त्यौरियाँ चढ़ाकर कहा,

“डॉक्टर नी है, पण डॉक्टर हुई जायेगा, थोड़ाक दिन में। हाँ।” अचानक माँ ने आगे आते हुए लगभग मुँह तोड़ मुद्रा में बीच बात के बोला। उसकी आवाज इतनी दर्प दीप्त थी कि मैं खुद हक्का-बक्का रह गया कि ऐसे में जबकि पिता की प्राणान्त की घड़ियाँ थी। माँ में ऐसा ऊँचा स्वर कहाँ से आ गया?

“सिस्टर, ये एड्रेनालिन है। इट्स डायरेक्ट इन्सल्ट टू हार्ट! आप इन्हें ये इन्जेक्शन नहीं दे सकते। मैंने ऐसा कहा जैसे मैं मेडिकल की किसी किताब का पन्ना खोल कर बोल रहा हूँ। “ मेरे पिता को शायद कार्डिएक अस्थमा है। “
इतने में नाइट-सूट और स्लीपर पहने डॉक्टर फुर्ती से वार्ड में घुसते दीखे। उन्होंने पिताजी के पलंग के पास आकर उनकी अवस्था देखकर कहा कि “इन्हें तुरंत अंदर ले चलो। आई-सी-यू में।” वार्ड-बॉय और दोनों नर्सों ने पिताको पलंग से उठा कर स्ट्रेचर पर रखा और स्ट्रेचर को धक्का देते हुए ले गये। माँ मिट्टी की मूक मूर्ति-सी वहीं खड़ी रह गयी। और मैं पीछे-पीछे हो लिया। इमरजेंसी वार्ड में। नर्स जो इस वार्ड की थी और जिसे देखकर मुझे बार-बार धापू बेन की याद हो आयी थी- रूकी और उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा। जैसे बहुत निकट का ही कोई अपना हाथ रखता है। उसने कहा “प्रे टू गॉड एण्ड विलीव इन डॉक्टर। घबराइये नहीं, डॉक्टर श्रीवास्तव हैं, तो सब ठीक हो जायेगा” और वह खुद भी इमरजेंसी वार्ड के अंदर चली गयी। मैं उसकी दूर होती पदचापों को सुनता हुआ बाहर ही खड़ा रह गया।

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पता नहीं भीतर आपातकालीन कक्ष में काफी देर तक क्या चल रहा था। कोई बीस-पच्चीस मिनट गुजर चुके थे। नतीजन, आशंकाएँ मेरे साहस को चारों तरफ से घेर कर इतने-इतने निर्मम और निष्करूण तरीकों से आहत करती जा रही थी कि उसका कोई प्रथमोचार संभव ही नहीं लग रहा था। न तो मैं आपातकालीन कक्ष में दरवाजे के सामने से हट पा रहा था और इस सब के चलते ना ही वार्ड में छूट चुकी माँ के पास जा पा रहा था। पता नहीं वहाँ माँ क्या कर रही होगी? क्या सोच रही होगी? कितनी और कैसी-कैसी आशंकाओं ने उसे घेरना शुरू कर दिया होगा, इसकी कल्पना कर पाने में भी मैं खुद को अशक्त पा रहा था। लगा जैसे मेरा मस्तिष्क संज्ञा-शून्य सा होता जा रहा है। समझने-सोचने की सारी शक्ति ही समाप्त हो गयी है।
तभी दरवाजा खुला।

डॉक्टर अपने उसी परिधान में थे। नाइट सूट में स्लीपर पहने हुए। वे मेरे निकट आये। कंधे पर सहानुभूति का हाथ रखा, जो दूसरे ही क्षण मुझे लगा कि वहाँ सहानुभूति नहीं, उनकी असफलता का अफसोस है।
“सॉरी” एक ही शब्द था, उनके पास। वे बोले और आगे निकल गये।

मैंने वार्ड और आपातकालीन कक्ष के बीच के गलियारे से बाहर दिखते आकाश की ओर देखा। लगा अस्पताल के ऊपर के आकाश में दुष्ट ग्रहों की कोई गुप्त मंत्रणा चल रही थी, जिसे माँ और मैं समझ नहीं पाये। ऐसा सोच कर पहले क्षण नम हुआ फिर आँख और बाद इसके भीतर से बाहर की ओर सारे अवरोधें को तोड़कर बहने लगा। गाढ़ा और गर्म लावे-सा कुछ था। मैं गलियारे की दीवार से टिक कर फूट-फूट कर रोने लगा। रोते हुए मुझे लगा जैसे उस दीवार के भीतर मेरे पहले भी सिर टकरा कर रोने वाले और लोगों के करूण रुदन की अनगिनत अनुगूंजें भरी हैं।

कुछ देर बाद दरवाजा फिर से खुला और स्ट्रेचर पर सफेद चादर के नीचे पिताजी की देह थी, जिसे वार्ड बॉय धकाता हुआ शवगृह की ओर ले जा रहा था। वार्ड बॉय ने मेरी तरफ तनिक-सी भी गरदन घुमाकर नहीं देखा। वह ऐसे निर्विकार भाव से ले जा रहा था, जैसे उस स्ट्रेचर पर वहाँ अभी तक साँस ले रहा कोई आदमी नहीं बल्कि अस्पताल का कोई निहायत ही गैर जरूरी सामान हो। एक क्षण को लगा कि दौड़ूँ और सफेद चादर ओढ कर स्ट्रेचर पर लेटे पिता के वक्ष पर अपना सिर रखकर चीखने लगूँ। लेकिन, पैरों में जैसे जड़ें निकल आयीं थी और वे तिल भर भी नहीं हिल पा रहे हैं। भीतर जमीन और आसमान एक-दूसरे में गड्डमड्ड हो रहे थे। मैं किंकर्तव्यविमूढ़ सा कुछ क्षण वहीं खड़ा रहा। अब मेरे सामने पिता की मृत्यु से ज्यादा दहशतनाक बात माँ तो माँ को इस सब की सूचना देने थी कि पिताजी की साँस थम गयी है और अब हवा जिसके एक-एक कण के लिए वह लड़ रहे थे। उनके लिए अब किसी काम की नहीं रह गयी है। गो कि वह बाहर इराफात में है।

कुछ पल बाद साहस बटोर कर धीरे-धीरे चलता हुआ, मैं वार्ड में दाखिल हुआ तो देखा माँ पलंग के पास लोहे के स्टूल पर बैठी हुई है। उसने अपने दोनों हाथ जिनमें कोहनी से बस कुछ ही नीचे तक लाख के चूड़े पहन रखे थे, अपनी गोद में धरे हुए थे। मुझे आया देखकर अगले ही क्षण माँ झटके के साथ खड़ी हो गयी। उसकी आँखों में एक बेसब्री थी। मेरे द्वारा बोले जाने वाले शब्दों को सुनने की। खड़े होने में उसके हाथ के लाख के चूड़ों की खनक उठी जो कानों से मेरे भीतर जाकर जैसे मर्म में गहरे तक धंस गयी हो। यह सोच कर मन भर आया कि शायद, माँ के हाथों में चूड़े की खनक को मैं आखिर बार सुन रहा हूँ। बाद इसके हाथ हमेशा-हमेशा के लिये चूड़े रहित और निरबंक सूने।

मैं कुछ कहने की तैयारी में नजरे झुका कर फर्श की ओर देखने लगा। वहाँ, फर्श पर माँ के पाँवों के पास मैली-कुचैली चिंदी पड़ी हुई थी। शायद यह वह चिंदी नहीं, बस धराशायी उम्मीद थी, जिसे माँ ने पिता के सिरहाने के नीचे रखा था। और जिसमें वैद्यजी द्वारा माँ दुर्गा के सिंहासन से उठा कर दिया हुआ फूल बंधा था, जो माँ को हंसते होंठों से लौटा कर ले जाने वाला था। मेरे आने के पहले शायद वह पुट्टल उसके हाथ में रही होगी। जतन से हथेली में ले कर तोले जा रहे किसी अचूक अस्त्र की तरह।

“क्यों कंई बात है? बोले नी,? “माँ के स्वर की बेकली बरदाश्त बाहर हो रही थी। शायद उसके स्वर में साहस का अभेद्य-सा जान पड़ता रहने वाला आवरण अब छार-छार होने को आया था।

मैंने सिर उठा कर माँ की ओर देखा। मुझे लग रहा था कि जैसे ही मैं उसे पिताजी की मौत की सूचना दूंगा, वह मिट्टी के एक के ऊपर एक रखे गए बर्तनों की उतरेड़ की तरह धँसक जायेगी। सब कुछ छार-छार और किरच-किरच हो उठेगा। गोड़ से कटे किसी वृक्ष की तरह वह मेरी बाँह में गिरेगी, आकाश में दरार डालती असह्य चीख के साथ।

मैंने उसकी आँखों से आँखें मिला कर धूजती आवाज में कहा, “दायजी तो चल्या गया।”

“ऐं! का रे, तू यो कई के? अने उईं कसै चल्या गया? उनकी पनी तो अबी म्हारा पोटला में पड़ी है और उबाणे पाँव तो उई डेल का बायर पाँव भी नी धरे, फिर इत्ता सवेरे म्हारे बिना बताय कसै चल्या गया? हम दोई तो सांत जाणे वाळा था, फिर? अने तू ने बी उणके रोक्या नी?”

वह बोली तो मैं बुरी तरह डर गया कि एक हादसे जैसी इस अप्रत्याशित सूचना ने जैसे उसके दिमाग का संतुलन गड़बड़ा दिया है। उसका चित्त मुकाम से उचट गया है और अगले आने वाले किसी भी क्षण में वह बावरी होकर दौड़ती हुई, उनको जाने से रोकने के लिए झपट पड़ेगी, उस गलियारे की तरफ, जो शवगृह की ओर जाता है।
“सुण, अपण गाँव में ताऊजी के समाचार भेजी दां। उई अई जायगा।” मैंने कहा तो माँ मुझ पर एकाएक लगभग बिफरती-सी बोली “म्हारे बता, थारे हुई कंई ग्यो? उण के काय वास्ते याँ तेड़ां? अने उई याँ अइने भी कंई कर लेगा? का रे, मरिया हुआ आदमी के मसाण में मदद चइये भी तो काय की? लक्कड़ की ज नी?”

सुनकर मैं हक्का-बक्का रह गया। माँ का चेहरा एकाएक बदल-सा गया। उसकी भौहें तन-सी गयी जैसे दुर्गा बुआ की भौहें, तब तन जाती थीं, जब उनके शरीर में चाण्याथळ की चामुण्डा माता उतर आती थी। मुझे समझ में ही नहीं आ पा रहा था कि मैं क्या करूँ? मेरी तो बुरी तरह से घिग्घी-सी बंध गयी थी। माँ के कपाल पर दमकने वाली सिंदूर की बिंदिया अचानक दमक उठी थी जैसे बुझने के पहले एकाएक दमक उठती है दीये की बाती की लौ।
इतने में देखा कि वार्ड के दरवाजे में चाय के थर्मस और नाश्ते का छोटा-सा झोला लिये प्रकाश दाखिल हो रहा है। वह आया और हम माँ-बेटे के चेहरों पर खिंचे सन्नाटों की एक दूसरे को काटती, आड़ी-तिरछी रेखाओं को पढ़कर आशंकित हो उठा।

“भइया, प्रकाश, तम जाव और अपणा चार-पाँच पिचाण का लोग के और लई आव।” माँ ने फटाकदणी से प्रकाश के सामने प्रस्ताव रखा। “ऐ का दायजी नी रहिया।”

वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में फटाफट शब्द उगलने वाला प्रकाश एकदम अवाक् हो गया। मुझे याद आया कि प्रकाश को तो कुछ देर बाद भाई को पुलिस से छुड़वाने सेंधवा जाना है।

मैंने एक भी शब्द बोले बगैर चपचाप झुक कर फर्श पर से माँ का पोटला उठा लिया। प्रकाश ने पानी से भरा ताम्बे का गड़ू और गिलास और पिता के पलंग के सिरहाने रखी दवाइयों की वह थैली भी यह कह कर उठा ली कि उनमें से जो दवाइयाँ उपयोग में आने से बची रह गयी हैं, वह उन्हें वापस दुकानदार को लौटा देगा। वैसे अधिकांश दवाइयाँ भर्ती करवाते समय वही लाया भी था।

फिर हम तीनों धीरे-धीरे चलते हुए वार्ड से बाहर निकल आये और अस्पताल के उस विभाग की ओर जा रहे थे, जहाँ मुझे और माँ को मरीज की मृत्यु के बाद की सरकारी अस्पताल की औपचारिकताएँ पूरी करना थी, जो उसके संबंधियों को करना होती है। शव लेने के लिये।

बाहर भोर की मटमैली रोशनी फैल रही थी, जिसमें परिसर में खम्बों पर रात भर जल-जल कर थकी बत्तियाँ थीं, जो अब चुपचाप सिर्फ अपने लिये जल रहीं थीं। कोने के नीम पर कौवे काँव-काँव कर रहे थे, जैसे पिता के न रहने की खबर उनके बीच भी फैल गयी है और वे उसी को लेकर आपस में अपनी कागारौल कर रहे हैं। मैंने एक नजर खाली बोतलों के ढेर की तरफ डाली। मुझे लगा कल या परसों वे बोतलें भी इनके बीच ढेर में शामिल हो जायेगी, जिनमें भरा जीवन रक्षक द्रव, निकल-निकल कर धीरे-धीरे बूंद-दर-बूंद पिताजी की नब्जों में समा गया था।

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सफेद बादलों से भरे निर्धूप दिन का यह पूर्वार्द्ध था। उज्जैन में रामघाट जाकर पिता का उत्तर कार्य निबटाये को आज पूरे पन्द्रह दिन हो चुके थे। और अब मैं यहाँ प्रकाश का इंतजार कर रहा था। उसने खुद रह कर ही कहा था कि वह माँ को गाँव जाने वाली बस में चढ़ाने के लिए मोटर स्टैण्ड पर आ जाएगा। मेरा मन माँ को वापस गाँव भेजने की इस घड़ी में कच्चा-कच्चा हो रहा था। हम कितने ही पढ़ लिखकर बड़े हो जाएँ, लेकिन माँ की उपस्थिति में मन वही हो आता है, बचपन का। मैंने सोचा था कि प्रकाश के साथ रहने से मुझमें भावनाओं को ढंग से संभाल सकने वाली हिम्मत बनी रहेगी।

इस समय माँ और मैं स्टैण्ड पर थे। एक बड़े और घने दरख्त के तने को घेर कर बना दिया गया, सीमेण्ट का गोल ओटला था, जिस पर मैंने माँ को उसके पोटले के साथ बिठा दिया था। ओटला हालांकि, साफ थ, लेकिन कहीं-कहीं परिन्दों की बीट पड़ी थी। मैंने अंदाज लगाया, सांझ के वक्त जरूर इस दरख्त पर पक्षियों के झुण्ड में ढेरों कौव्वे जमा हो जाते होंगे। दायीं ओर पाँच छह यात्री बैठे थे। उनके सिरों के ऊपर स्थानीय टाकीज वालों द्वारा लटका दिया जाने वाला, उस फिल्म का पोस्टर लगा था, जिसे मैं और प्रकाश मेटिनी शो में देखने गये थे। पोस्टर के धर्मेन्द्र तथा राखी नाम की हीरोइन के चेहरे थे। फिल्म का नाम “जीवन-मृत्यु” था, जिसको पेण्टर ने अपनी सीमित कला बुद्धि से एक तरह के “कण्ट्रास्ट” में बनाने की कोशिश की थी। फिल्म देखने के पहले हमने सोचा था, फिल्म से निकलेंगे तो हम कोई बड़ा सवाल लेकर निकलेंगे, लेकिन जब टाकीज से बाहर आये थे तो हमारे पास एक ही सवाल था कि आखिर हम इसे देखने ही क्यों गये थे? कोने में प्याऊ का नल था, जहाँ गाँव की तरफ जाने वाली दो-एक सवारियाँ पानी पी रही थीं।

गाँव की तरफ जाने वाले लम्बे रूट की बस अभी आयी नहीं थी। हालांकि उसके आने का वक्त हो चुका था। आज शायद वह लेट थी।

मैंने कनखियों से माँ के चेहरे की तरफ देखा। बरसों से बंद ताले की तरह जड़ी और जंग लगी-सी सर्द चुप्पी थी, माँ के चेहरे पर जिसने वहाँ किसी उजाड़ का-सा सघन सन्नाटा उतार दिया था। आगे आने वाले दिनों में उठने वाले उस बवण्डर का पता इस समय मुझे माँ की सूनी आँखों से लग रहा था, जिससे उसे अकेली ही भिडन्त लेनी होगी।

माँ के साँवले और सूने कपाल की तरफ देखते हुए मुझे बचपन के भूतेश्वर के मेले के दिनों की याद हो आयी। माँ पिताजी को मेले में जाने के लिए निकलते समय बार-बार रह-रह कर याद दिला रही थी, “सुणो, तम म्हारो चूड़ो, म्हारी बिछिया, म्हारी टिकली होण लेणो मत भूली जाजो। फिर मुझे सख्त आवाज में हिदायत दी थी-ऐ छोरा तू याद दिलाई देजे थारा दायजी के, हो रे। म्हारी चीज लाणे की।” माँ ऐसे कहती, जैसे ये तमाम चीजें उसकी है और जिसे दुकानदार ने अपने पास रख रखा है। हो सकता हो, माँ को आज लग रहा हो कि यह सब तो उसका था ही नहीं। जैसे वह तो एक मृत-व्यक्ति की सम्पदा थी और अब उस पर कब्जा बनाये रखना सामाजिक-अपराध की श्रेणी में आ जायेगा। माँ ने श्मशान से मेरे लौटने के बाद, मुझ से पोटला खोलने को कहा था। उसमें से पिताजी की नई पनहियाँ निकलीं, माँ का लाख का एक चूड़ा, जो झड़ गया था। हो सकता हो, वह उस रात बिसर भूले में, मेरे पोटले पर बैठने से ही झड़ गया हो। पिताजी का जर्दे का बटुआ, एक कमीज और गुलाबी साफा था। मैंने एक-एक चीज उठा कर मैय्यत वालों को देना शुरू की।

और जब मैं पिताजी का गुलाबी साफा भी निकाल कर देने लगा था तो उसने हाथ के इशारे से मुझे बरज दिया था-और, इस समय वह उसके पोटले में था। माँ ने उसे धोने भी नहीं दिया था। हो सकता हो, वह उसमें रची-बसी पिता की देह गंध को छुड़ा देना नहीं चाहती हो। मुझे याद आया, माँ के पोटले में पिता की छोटी-छोटी कुछेक अस्थियाँ भी थीं जिनहें दाह-संस्कार के तीसरे दिन सारी सोरते समय पण्डित ने राख में सबसे पहले इन्हीं को ढूंढा था,फिर कहा था, “ये फूल हैं। इनको बाद में सोरम जी जाकर विसर्जित करना होगा। तब तक उनकी सूक्ष्म देह तुम लोगों की आसक्ति से मुक्त नहीं हो पायेगी। “अस्थियाँ अग्नि-स्नान के बाद फूल हो जातीं हैं, यह मेरे जैसे विज्ञान के विद्यार्थी के लिये उलझन पैदा करने वाली जानकारी थी।

माँ बीच-बीच में मुझे कहती जा रही थी कि मैं खूब मन लगाकर पढ़ूँ उसमें जरा-सी भी चूक न करूँ। रात में स्वेटर पहन कर सोऊँ। बाजार का अळळ-बळळ न खाऊँ, क्योंकि उससे बीमार पड़ गया तो पढ़ाई का हरजा हो जायेगा। उसने पिता की मृत्यु के बारे में भी कहा कि “देख उण पे मौत तो कई दिन से मण्डरई री थी पर भगवान का याँ उणको कग्गद खोवई गयो थो और अबे मिळी गयो... कंई करो। थोड़़ाक दिन और नी मिळतो तो ऊई थारे डॉक्तर बणते देखी लेता।”

उसकी बातों से मेरा मन, बार-बार, भर-भर जा रहा था। डर लगने लगा था, कहीं मैं रो न पड़ूँ। इसलिए, यह कह कर उठ गया कि वह कहीं उठ कर न जाये मैं प्रकाश को ढूंढ कर आता हूँ। कहीं वह हमें कच्चे रास्ते वाली बसों की तरफ तो नहीं ढूंढ रहा हो।

वहाँ से हटने के बाद थोड़ी देर में ही मैंने भावनाओं के बढ़ते वर्चस्व पर यथोचित नियंत्रण पा लिया और लौट कर फिर से ओटले के पास आया। देखा माँ का पोटला तो ओटले पर रखा है, पर माँ नहीं दिखायी दे रही थी। कहाँ चली गयी? मैंने बेकली में दूर बस की टिकिट खिड़की की तरफ देखा। वहाँ माँ नहीं थी।

“उ थारो गोंई परकास भैयो नी आयो कंई?”

माँ आकर मेरे पीछे खड़ी थी। मैं चौंक गया। पहले माँ के आने में होती थी, चूड़ियाँ। वे माँ से पहले आतीं। एकदम कानों के पास। माँ बाद में दिखायी देती। पहली बार ऐसा हो रहा था कि वह चलती हुई मेरे पास आयी थी-उसके साथ सब कुछ बेआवाज था। मेरे चेहरे की प्रश्नाकुलता को देख कर बोली “थोड़ो गळो सूखी रियो थो, म्हने पानी का वां से दो घुटका भरी लिया। गाड़ी में एक बार बैठी गई तो बाट में फिर पाणी पीणे के कां मिलेगा?” उसने प्याऊ की ओर इशारा किया।

“म्हारे लागी कि मोटर आणे वाली ही है।” माँ ने अपने तईं अनुमान लगा कर कहा और कमर में खुंसी रहने वाली कपड़े की वह थैली निकाली, जिसमें वह पिताजी के इलाज में संभावित खर्च से निबटने के लिए रूपये लायी थी। और मुझे देते हुए आगे बोली, नाना, पइसा भी पनही की तरहे होय रे, तंग होय तो छाला पड़ी जाय अने ढीली होय तो पाँव लड़खड़ाय-और अभी अपणे चलनो तो कोस-कोस है।”

मैंने माँ की दी थैली ली। लेते समय मेरे हाथ कांपे। फिर थैली को पेण्ट की जेब में रख ली। मैं सोचने लगा, माँ ने पूंजी और उसके व्यवहार के बारे में जो कुछ भी अपनी मालवी बोली के शब्दों में कहा था। मैं हतप्रभ हो गया। मुझे लगा, माँ अपढ़ जरूर है, लेकिन उसके भीतर दुनिया की हकीकत की कितनी गहरी समझ है। उसने अलग से कुछ पैसे और दिये यह कहते हुए कि मैं टिकट ले आऊँ। उसमें काफी सारी रेजगारी थी। रेजगारी देकर बोली, बेटा,याद राख जे थारो यो समैयो रेजगारी सरीखो ही है, रे धीरे-धीरे और गिणी-गिणी ने खरचजे हो।”

गाड़ी शायद सत्तर सीटों वाली बडीं गाडी थी। उचकी हुई गिट्टियों वाले बस स्टैण्ड में धड़धड़ाती घुसी तो धूल का एक बड़ा-सा गुबार उसके चारो ओर उठ गया। मैं दौड़कर टिकिट ले आया और बस में पहले पोटला और फिर माँ को चढ़ा दिया। माँ को मैंने खासतौर पर खिड़की वाली सीट पर बिठा दिया था। क्योंकि माँ को बस में हवादार जगह न बैठने को मिले तो उछाट होने-होने जैसा लगने लगता है।

गाड़ी में कुछेक सवारियों के पास सामान कुछ ऐसा बडा और मारी था, जो छत पर चढ़ाया जा रहा था। माँ आकर निरात से खिड़की की उस सीट पर बैठ गयी और उसने खिड़की से हाथ बाहर निकाल मेरे सिर पर फिराया। मैंने बालों के भीतर फिरती उसकी अंगुलियों से अनुभव किया कि वे धीरे-धीरे काँप सी रही हैं। लेकिन, मुँह से वह बहुत निष्कम्प आवाज में कह रही थी। वे ही बातें कि हिम्मत रखना और “ज्वान-मान की आँख में आँसू थोड़ी अच्छा लागे....नाना, काठी छाती राखजे और भणवा में कसर मत राखजे। बखत का गाल पे झापड़ो हाथ से नी लागे हो, बेटा।” मैं सोचने लगा पता नहीं जाने कहाँ से माँओं के भीतर एक साथ दो-दो भाषाएँ चलती रहतीं हैं। एक दूसरे से जुड़ी हुई और एक दूसरे से एकदम अलग भी। हाथ में कुछ और तथा होठों पर कुछ और।

 तभी बस ने हार्न दिया। यह उसके बस-स्टैण्ड छोड़ कर चलने की सूचना थी। माँ के हाथ में हाथ को खिड़की से अंदर कर लिये जाने की तैयारी भर आयी थी। सिर पर घूमते माँ के हाथ ने मेरे गाल को आखिरी बार छुआ। फिर उसने उसे अन्दर कर लिया। मैंने देखा पिछले पन्द्रह दिनों से उजाड़-सी रहने वाली माँ की आँखें कुछ अजीब-सी हो आयी थी। तभी बस चल दी। चलते ही बस ने सहसा ऐसी गति पकड़ ली जैसे वह स्टैण्ड छोड़ कर भागने को बहुत ही ज्यादा बेसब्र हो। उसके पीछे हवा भी भागने लगी। पीछा करती-सी। जैसे कोई छूटी हुई बात कहना चाहती हो, उसके पीछे-पीछे दौड़कर।

मैं पलट कर चलने को ही हुआ था कि देखा थोड़ी ही दूर चलने पर किसी सवारी ने हाथ देकर उसे रोक लिया है। मुझे बस को पूरी तरह स्टैण्ड छोड़कर बाहर जाते हुए देखने का मन हुआ। वह मेरे लिए केवल बस नहीं, पिता को खोने के बाद गाँव लौट जाने वाली माँ की पीठ थी। धूल की झीनी-सी पर्त के पीछे। वह भी मुझ से कोई अप्रत्यक्ष-सा संवाद थी। मैं ठिठक गया। शायद, हाथ देकर चढ़ने वाली सवारियों की संख्या अधिक थी, नतीजतन बस के ठिठकने का वक्फा बढ़ रहा था। मन में यक-ब-यक एक बेकाबू-सी इच्छा हुई कि दौड़ कर बस की उस खिड़की के निकट जाऊँ और एक बार माँ को फिर से देख लूँ। पता नहीं फिर कितने दिनों तक देखने को नहीं मिल पाये, माँ का चेहरा।

मैं ज्यादा वक्त बर्बाद किये बगैर फुर्ती के साथ दौड़ा और माँ की खिड़की के पास पहुँच गया। मैंने देखा माँ ने अपने सफेद लुगड़े का पल्ला मुँह के आगे ले लिया था। और चुपचाप फूट-फूट कर रो रही थी। एक बेआवाज रोना, जिसमें चीख की शक्ल ले सकने की भरपूर ताकत थी। पता नहीं माँ ने उस विस्फोट को चीख न बनने देने में अपनी नैसर्गिक पीड़ा को कैसे समेटा होगा। मैंने धीरे से खुद को एक कदम पीछे किया और बाद इसके पूरी तरह से बस की खिड़की के सामने से हटा लिया। मैंने आकाश की तरफ मुँह करके नहीं देखा, लेकिन लगा वहाँ, बादलों से भरे, उस निर्धूप आकाश में कोई दरार पड़ गयी है और वह धीरे-धीरे दरकता ही जा रहा है।

बस धीरे-धीरे गियर बदल कर स्टैण्ड से बाहर निकलने लगी। मैंने पलट कर बस की तरफ देखने से खुद को जब्त कर लिया और सड़क की उचकी हुई गिट्टियों को देखता हुआ आगे निकल आया। सीमेण्ट के ओटले से घेर दिये तने वाले घने और उस बूढ़े दरख्त के नीचे से गुजरते हुए मैंने पाया कि वहाँ उसकी शाखों और पत्तियों के बीच से बीच बीच में कौवों की काँव-काँव उठ रही है।

मैंने चलते हुए चुपचाप अपना दाहिना हाथ पेण्ट की जेब में डाला। मेरे हाथ की अंगुलियाँ माँ के लिए बस का टिकिट कटाने के बाद भी बच रही रेजगारी से टकरा गयी। एक खनक-सी उठी। जेब के भीतर से। वहाँ जेब में कलदार नहीं थे। बस कुछ चवन्नियाँ-अठन्नियाँ थीं। पेड़ से कौवों की काँव-काँव अभी भी उठ रही थी।
मैं धीरे-धीरे चलता हुआ अवश-सा, कौव्वों की काँव-काँव सुनता हुआ बस स्टैण्ड से बाहर निकल आया।

[समाप्त]

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