मनुष्य का सर्वोत्तम नाम: सादुल्लाह जान बर्क़

आफ़ताब अहमद

अनुवाद: आफ़ताब अहमद

व्याख्याता, हिंदी-उर्दू, कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क


जिस प्रकार सुख-दुख “जुड़वाँ भाई” बताए जाते हैं और अक्सर लोगों की इच्छा होती है कि सुख का यह भाई बचपन में ही मर जाता तो कितना अच्छा होता, और अगर पैदा ही न हुआ होता तो और भी अच्छा होता, और अगर अब कोरोना या कोविड-नाइनटीन के हाथों इसका सत्यानाश हो जाए तो फिर क्या कहने! लेकिन ऐसा होता नहीं। अगर चूहों की, चिड़ियों की, और कबूतरों की दुआएँ क़बूल होतीं तो बिल्लियों का नामोनिशान न होता। बहरहाल, “दुख और सुख” की तरह “सोना” और “सोचना”  भी जुड़वाँ बताए जाते हैं। अक्सर लोग सोते हैं, फिर सोचते हैं। “सोचते हैं” और “सोते हैं” के बीच में सिर्फ़ ‘च’ का अंतर है। सोचने की ‘च’ हटाकर किसी भी समय सोना हो सकता है। बल्कि प्रोफ़ेसर डॉक्टर नयनदुख उर्फ़ कोइड-नाइनटीन का कथन है कि मनुष्य जीवन में यही दो काम तो करता है। दिन को सोचना और रात को सोना। बल्कि दिन को बुरा-बुरा सोचना और रात को अच्छा-अच्छा सोना। अब हमें देखिये लम्बे समय से सोच रहे हैं कि “मनुष्य” के लिए कोई उचित नाम सोचें क्योंकि अब तक उसने जितने भी नाम स्वयं अपने लिए चुने हैं ,वो सब-के-सब या तो आधे-अधूरे हैं या कवियों के उपनामों की तरह जटिल और उल्टे-पुल्टे हैं, अर्थात ‘आँख के अंधे नाम नयनसुख’ या ‘कव्वे की चोंच में अंगूर।’ अर्थात जो उसके अन्दर नहीं है वह नाम या उपनाम द्वारा अपने अन्दर डालना। इसलिए मनुष्य का कोई ऐसा नाम भी होना चाहिए जिसमें इसके इतिहास, उसके भूगोल, लम्बाई-चौड़ाई और नामकरण का औचित्य समाहित हो। दीर्घ काल तक सोचने और सोने के आदान-प्रदान के बाद अंततः एक बहुत ही अच्छा और उसके हस्बे-हाल और हर कोण से अत्यंत उचित नाम मिला और वह नाम है “डरू”। अर्थात डरने और डरते रहने वाला। बिल्कुल उसी प्रकार जिस प्रकार ताड़ने वाले को “ताडू”, फेंकने वाले को “फेंकू” और पापी को “पप्पू” कहते हैं। क्योंकि हमने जब इतिहास, भूगोल और अन्य सभी क्षेत्रों में शोध का टट्टू दौड़ाया तो मनुष्य को हर पक्ष और हर कोण से “डरू” ही पाया। इसका बहुत कुछ बदल जाता है लेकिन “डर” हमेशा इसके साथ होता है। मृत्यु से डर तो इसकी घुट्टी में पड़ा हुआ है। उसके बाद यह कहीं भी हो, कैसा भी  हो, कुछ भी कर रहा हो, कौन हो, क्या हो, कहाँ हो, जहाँ-जहाँ होता है “डर” इसके साथ लगा रहता है
कभी तक़दीर का मातम कभी दुनिया का गिला
मंज़िल-ए-ज़ीस्त में हर गाम पे रोना आया
(मंज़िल-ए-ज़ीस्त: ज़िन्दगी की मंज़िल ;  गाम: रास्ता, क़दम)

दरिंदों, चरिंदों, परिंदों, ख़ज़िन्दों (सर्पणशीलों) बल्कि सारे ज़िन्दों को तो छोड़ दीजिये, यह तो मुर्दों तक से डरता है। यहाँ तक कि अन्देखों यानी कोरोनों और कोइडों से भी हर समय थर-थर कांपता रहता है। हालाँकि इसे यह भी दावा है कि इसने सबको क़ाबू में कर लिया है। और यह दावा ग़लत भी नहीं। इस संसार में कोई एक ऐसा “ज़िन्दा” नहीं जो इससे डरता न हो, लेकिन यह ख़ुद भी डरता रहता है। कहते हैं किसी ने गीदड़ से पूछा कि तुम यह रात भर “हुआँ-हुआँ” क्यों करते रहते हो? बोला, लोगों को डराता हूँ। पूछने वाले ने पूछा कि फिर यह काँपते क्यों हो? बोला, ख़ुद भी डरता हूँ न। गीदड़ का तो पता नहीं कि वह किससे डरता है, लेकिन मनुष्य के सम्बन्ध में यह बात सिद्ध हो चुकी है कि दूसरे तो दूसरे, यह सबसे अधिक “अपने आप” से डरता है और यह “डर” उसका बिल्कुल सही है क्योंकि उसे सबसे बड़ा ख़तरा अपने आप ही से होता है। अपने आपसे उसका डरते रहना उचित है। इससे अधिक उचित होने का सबूत और क्या होगा कि अंतिम निर्णय उसका यह है कि एक दूसरे से “निकट” बिल्कुल न जाओ वर्ना ---
उस वृक्ष के निकट मत जाओ वर्ना...
(संकेत: “ला-तक़रबा हाज़िहिश्शजरा फ़तकूना मिनाज़्ज़ालिमीन” - तुम दोनों उस वृक्ष के निकट मत जाओ वर्ना तुम पापियों में शामिल होगे—क़ुरान -सूरा अल-बक़रा )

इस मुरदार बूटी से कम-से-कम छह फ़ुट के फ़ासले पर रहो वर्ना...
सत्य है कि मैं करोनाचारियों में हूँ।
(पैरोडीयुक्त संकेत: ला इलाह इल्ला अंता सुब्हानका इन्नी कुन्तो मिनाज़्ज़ालिमीन—किसी को पूजे जाने का अधिकार नहीं सिवाय तुम्हारे, ओ अल्लाह, आप परमेश्वर हैं। सत्य है कि मैं पापाचारियों में से हूँ - पैरोडी)

कभी-कभी हम सोचते हैं, पता नहीं सही या ग़लत, लेकिन सोचते हैं कि कहीं एक बार फिर इतिहास अपनी पुनरावृत्ति तो नहीं कर रहा है, कहीं मनुष्य के बनाए हुए इस दूसरे स्वर्ग में “कोई” घुस तो नहीं आया है? इसका अहंकार तोड़ने के लिए। बहरहाल “डर” मनुष्य का वह साथी है जो कभी उसका साथ नहीं छोड़ता। चाहे यह सो रहा हो, चाहे सोच रहा हो।
पानी से सग-गज़ीदा डरे जिस तरह ‘असद’
डरता हूँ आईने से कि मर्दुम-गज़ीदा हूँ
(सग-गज़ीदा: श्वान-दंशित अर्थात जिसे कुत्ते ने काटा हो; असद: मिर्ज़ा ग़ालिब का दूसरा उपनाम; मर्दुम-गज़ीदा: मानव-दंशित अर्थात जिसे आदमी ने डसा या सताया हो )

हम विस्तार में तो नहीं जा सकेंगे क्योंकि हम स्वयं भी तो “डर” के सबसे बड़े शिकार हैं, अलमबरदार हैं और गिरफ़्तार हैं। लेकिन कुछ लोग बताते हैं कि मनुष्य ने जो ये वर्जनाएँ या पूज्य प्रतीक बनाए हैं ये सब केवल डर के मारे बनाए हैं, जितने अस्त्र-शस्त्र बनाए हैं या जितना रक्तपात या उत्पात किया है, ये सब कुछ इसी डर का नतीजा हैं। मनुष्य डरता है इसलिए दूसरों को डराता है। इसलिए दूसरों को डराता है कि स्वयं भी डरता है। अर्थात उसका सब किया-कराया केवल “डर” ही का नतीजा है। गुरु जी (ग़ालिब) ने भी कहा है कि
अपने पे कर रहा हूँ क़यास अहल-ए-दहर का
समझा हूँ दिलपज़ीर मता-ए-हुनर को मैं
(क़यास करना: अनुमान लगाना;  अहल-ए-दहर: दुनिया वाले;  दिलपज़ीर: मनभावन; मता-ए-हुनर: हुनर की सामग्री)

“मता-ए-हुनर”(हुनर की सामग्री) के स्थान पर “मता-ए-डर” (डर की सामग्री) रख दीजिये तो सब कुछ समझ में आ जाएगा। इस समय संसार में मनुष्य जो कुछ भी कर रहा है दूसरों के मारने की सामग्री जमा कर रहा है। नानाप्रकार की वस्तुएँ बना-बनाकर बेचता है, “सुरक्षा” के नाम पर एक हंगामा मचा रखा है। ये सब कुछ “डर” ही का बखेड़ा है।
मुमकिन नहीं कि भूल कर भी आरमीदा हूँ
मैं दश्त-ए-ग़म में आहू-ए-सय्याद दीदा हूँ
(आरमीदा: आराम पाया हुआ; दश्त-ए-ग़म: दुख का जंगल;  आहू-ए-सय्याद दीदा: शिकारी द्वारा ताड़ा हुआ हिरण; आहू: हिरण; सय्याद: शिकारी: दीदा:  देखा या ताड़ा हुआ

आहू-ए-“सय्याद दीदा” (शिकारी द्वारा ताड़ा हुआ हिरण) चींटियों के बिल पर रात बिताता है तो किस लिए? इसलिए कि शिकारी से डरता है। सच तो यह है कि आज अगर मनुष्य भी चींटियों के “बिल” पर सो रहा है  तो इसे उस शिकारी का डर है जो उसके पैदा होते ही उसके पीछे लगा हुआ है। किसी फ़िल्म में किसी पात्र ने दूसरे पात्र को डर का दर्शन समझाते हुए कहा है कि डर को पालो-पोसो क्योंकि डर बहुत महान वस्तु है। इसे हमेशा अपने पास रखो क्योंकि यही डर ही तुम्हारा शस्त्र है। उदाहरण देकर हम आपका समय क्यों बरबाद करें, अपने इर्द-गिर्द देखिये, स्वयं अपने अन्दर झाँकिए, सिवाय डर के और कुछ भी दिखाई नहीं देगा।
हम हुए तुम हुए कि ‘मीर’ हुए
इसकी ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए
(ज़ुल्फ़ों के असीर: ज़ुल्फ़ों के क़ैदी या गिरफ़्तार)

चुनांचे वाक़यात के गवाहों की दलीलें सुनने के बाद “अदालत” इस नतीजे पर पहुँची है कि जैसे ताड़ने वाला “ताडू”, फेंकने वाला “फेंकू” और पाप करने वाला “पप्पू” कहलाता है, उसी प्रकार मनुष्य का अगर कोई उचित नाम हो सकता है तो वह है “डरू”।

[मूल आलेख का श्रेय: एक्सप्रेस न्यूज़, 19 जून, 2020]

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।