इक्कीसवीं सदी के हिन्दी उपन्यासों में स्वातन्त्र्य और सशक्तिकरण का तंत्र: सह जीवन

किरण ग्रोवर

किरण ग्रोवर

सह-आचार्य, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, डी.ए.वी. कालेज, अबोहर, पंजाब
चलभाष: 94783-20028; ईमेल: groverkirank@gmail.com

सारांशः
भूमण्डलीकरण व बाज़ारीकरण के इस दौर में हमारी पारिवारिक और सामाजिक संरचना में काफी परिवर्तन हुए हैं। भारतीय पारिवारिक और सामाजिक ढाँचे में स्त्रियों पुरुषों के भेदभाव की गहरी खाई और पितृसत्तात्मक विवाह संस्था की जटिलताओं ने सह-जीवन की अवधारणा को विकसित किया। युवा वर्ग के व्यावसायिक व स्वार्थी रवैये के कारण सह-जीवन के रिश्ते पनपने लगे। विवाह जो जीवन को स्थायित्व प्रदान करता है परन्तु आज का युवा वर्ग उसको नकारकर सह जीवन में जीना चाहता है।उपभोक्तावादी समाज में रहते हुए युवा युवतियाँ उतरदायित्व का बोझ न उठा कर उन्मुक्त जीवन शैली की ओर आकर्षित होते हैं। सह-जीवन विमर्श भारत में भी अपनी पैठ बना चुका है। भोग और मस्ती को जीवन का वास्तविक आनन्द स्वीकारते हुए सह-जीवन का प्रचलन प्रारम्भ हुआ। इक्कीसवीं सदी के हिन्दी उपन्यासों में स्वातन्त्र्य और सशक्तिकरण के तंत्र सह जीवन को आधार बनाकर महिला उपन्यासकारों यथा ममता कालिया, अनामिका, रजनी गुप्त, जयन्ती रंगनाथन, शरद सिंह, अलका सरावगी, प्रभा खेतान ने स्त्री पुरुष के भेदभाव की गहरी खाई, पितृसत्तात्मक विवाह संस्था की जटिलता, उन्मुक्त बंधनहीन जीवन, विघटित मानसिकता की परिणति, पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों से मुक्ति, स्व की तलाश, सह जीवन के विश्वास, वायदे, समर्पण, संस्कृति के संक्रमण से उपजी सह जीवन की मान्यता का विश्लेषण किया है जोकि पाठक वर्ग के समक्ष चिन्तन के लिए खुला छोड़ दिया गया है कि हम सह जीवन के विविध पक्षों पर विचारणा करे, यही इस आलेख का चिन्तनमूलक तथ्य है।

बीज शब्दः पितृसत्तात्मक, व्यावसायिक, विघटित मानसिकता, टकराहट, स्व की तलाश

मूल प्रतिपादनः
वैश्वीकरण के बाद से पीढ़ियों का द्वंद्व बहुत तेजी से उभरा है। आपसी सम्बन्धों का स्थान दौलत और शोहरत ने ले लिया। उन्मुक्त जीवन शैली ने मूल्यों और आदर्शों को त्यागकर उच्छृंखलता को ही जीवन लक्ष्य बना लिया। भूमण्डलीकरण व बाज़ारीकरण के इस दौर में हमारी पारिवारिक और सामाजिक संरचना में काफी परिवर्तन हुए हैं। भारतीय पारिवारिक और सामाजिक ढांचें में स्त्रियों पुरुषों के भेदभाव की गहरी खाई और पितृसत्तात्मक विवाह संस्था की जटिलताओं ने सह-जीवन की अवधारणा को विकसित किया।1 हज़ारों किलोमीटर दूर नौकरी करने के कारण युवा पीढ़ी अजनबी देश व नवीन प्रदेश में भावनात्मक लगाव, शारीरिक भूख व असुरक्षा के भय से सह-जीवन की पद्धति का प्रचलन हुआ। युवा वर्ग के व्यावसायिक व स्वार्थी रवैये के कारण सह-जीवन के रिश्ते पनपने लगे।
आज समाज की मान्यताओं को रुढ़ि का नाम देकर नकारने का प्रचलन प्रारम्भ हो चुका है। जिनमें विवाह भी एक ऐसा ही बन्धन है जिनमें प्रेम कहीं गुम हो गया है। विवाह, दाम्पत्य, पितृत्व, मातृत्व की भावना को युवा वर्ग तिलांजलि दे चुका है। बच्चों को जीवन के विकास में बाधा मानना विघटित मानसिकता की परिणति है। विवाह जो जीवन को स्थायित्व प्रदान करता है परन्तु आज का युवा वर्ग उसको नकारकर सह जीवन में जीना चाहता है। युवा पीढ़ी निजत्व की तर्क खोजने में तत्पर है। डा.ऋतु सारस्वत लिखती हैं कि ‘आजकल युवा संस्कृति संक्रमण भौतिकतावादी दृष्टिकोण और असीम महत्वाकांक्षाओं के ज्वर में बहकर महानगरों से लेकर छोटे नगरों तक में विवाह संस्था की नींव में सेंध लग रही हैं । युवा पीढ़ी अब बिना किसी समझौते, दायित्व व त्याग के ही एक उन्मुक्त बंधनहीन जीवन जीना चाहती है।2
उपभोक्तावादी समाज में रहते हुए युवा युवतियाँ उतरदायित्व का बोझ न उठा कर उन्मुक्त जीवन शैली की ओर आकर्षित होते हैं। पाश्चात्य संस्कृति के अंग बनते हमारे महानगर स्त्री पुरुष सम्बन्धों की नई परिभाषा गढ़ रहे हैं। स्त्री को पुरुषों के बराबर अधिकार का समापन सह-जीवन के रुप में हुआ। सह जीवन के सम्बन्धों को युवा युवतियाँ स्वातन्त्र्य और सशक्तिकरण मानकर अपना रहे हैं। सह-जीवन विमर्श भारत में भी अपनी पैठ बना चुका है। इस नये विमर्श के अनुसार विवाह एक सामाजिक रुढ़ि है जोकि 21 वीं सदी में समयानुकूल नहीं है। यह रुढ़ि स्त्री को गुलाम व पुरुष को शोषक बनाने में मददगार है और इसका एकमात्र विकल्प सह जीवन है।3 पाश्चात्य उन्मुक्त संस्कृति के संक्रमण से उपजी इस प्रथा की मान्यता है कि स्त्री पुरुष को सह-जीवन के लिए विवाह की आवश्यकता नहीं।
सह-जीवन एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें दो लोग जिनका विवाह नहीं हुआ, साथ ही रहते हैं और पति पत्नी की तरह आपस में शारीरिक सम्बन्ध बनाते हैं। यह सम्बन्ध स्नेहात्मक होता है और रिश्ता गहन भी होता है। सह सम्बन्ध पश्चिमी देशों में आम हो चुके हैं, इस रुझान को पिछले कुछ दशकों में काफी बल मिला है जिसका कारण बदलते सामाजिक विचार विशेषकर विवाह, लिंग, धर्म के मामलों में।4 अगर एक युवक और युवती स्वेच्छा से लिव इन रिलेशनशिप में रहते हैं तो ये गैरकानूनी नहीं है। युवक और युवती की उम्र शादी के लिए कानून तय उम्र पूरी होनी चाहिए। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने लिव इन रिलेशनशिप के समर्थन में एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए कहा है कि यदि दो लोग लम्बे समय से एक दूसरे के साथ रह रहे हैं और उनमें सम्बन्ध है तो उन्हें शादीशुदा ही माना जायेगा।
सह-जीवन आधुनिक संस्कृति का एक हिस्सा है। महानगरों में सह-जीवन की शुरुआत शिक्षित व आर्थिक तौर पर स्वतऩ्त्र मानसिकता वाले लोग जो विवाह की जकड़न से छुटकारा पाना चाहते हैं जिस रिश्ते को दूसरे पक्ष की सहमति के बिना कभी भी समाप्त किया जा सकता है। शारीरिक सम्बन्धों से मिलने वाली शान्ति स्थायी सम्बन्धों के लिए बाध्य नहीं करती। सह-जीवन में अपने पार्टनर के व्यवहार और व्यक्तित्व को जानने में मुश्किल नहीं होती। इस सम्बन्ध में रहने का फैसला पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों से मुक्ति देता है।5 इस सम्बन्ध में अपने सहयोगी के प्रति जवाबदेही नहीं होती। दोनों को रिश्ते को खत्म करने में कानूनी प्रक्रिया से नहीं गुज़रना पड़ता। रिश्ते से बाहर निकलने की पूरी आज़ादी होने के कारण दोनों एक दूसरे के सम्मान के भागीदार बनते हैं। भोग और मस्ती को जीवन का वास्तविक आनन्द स्वीकारते हुए सह-जीवन का प्रचलन प्रारम्भ हुआ।
विवाह जो जीवन को स्थायित्व प्रदान करता है परन्तु आज का युवा वर्ग उसको नकारकर सह जीवन में जीना चाहता है। सह जीवन के सम्बन्धों को युवा युवतियाँ स्वातन्त्र्य और सशक्तिकरण मानकर अपना रहे हैं। सह-जीवन विमर्श भारत में भी अपनी पैठ बना चुका है। ममता कालिया ने दौड़ उपन्यास में सह-जीवन पर पीढ़ी के द्वंद्व को उजागर किया है, ’’ मैने तो ऐसी कोई लड़की नहीं देखी जो शादी के पहले ही पति के घर में रहने लगे। तुमने देखा क्या है माँ? इलाहाबाद से निकलोगी तो देखोगी न। यहाँ गुजरात सौराष्ट्र में शादी से होने के बाद ऐसी महीने भर ससुराल में रहती है लड़का लड़की एक दूसरे के तौर तरीके समझ में के बाद ही शादी करते हैं।'6 मूलतः यह भारतीय समाज में पश्चिमी संस्कृति का ही प्रभाव है। बड़े-बड़े महानगरों में स्त्री-पुरुष एक-दूसरे कि रजामंदी से शारीरिक सुख भोगतें हैं फिर अलग हो जाते हैं।
सह-जीवन’ की संस्कृति का चलन भारतीय समाज में आम होता जा रहा है। जिसका प्रभाव भारतीय स्त्रियों पर भी पड़ा है। आज की ‘स्त्री’बिना विवाह बंधन में बंधे ही किसी पर पुरुष के साथ रहने में कोई गुरेज़ नहीं करती। इस तरह की मानसिकता महानगरों की स्त्रियों में ज़्यादा नज़र आती है। जिसका जिक्र अनामिका ने अपने उपन्यास ‘दस द्वारे का पिंजरा’ में कुछ इस तरह से किया हैं-“मुझे सहजीवन और विवाह में बुनियादी फ़र्क़ नज़र नहीं आता। फ़र्क़ है तो इतना कि विवाह के सिर पर क़ानून की छतरी और धर्म का चंदोवा टंगा है और सहजीवन बिना छतरी और चंदोवे के धूप और बारिश साथ झेलने और भोगने के रोमांस से नहाया हुआ है। विवाह एक परम ठोस सामाजिक व्यवस्था है.... सहजीवन है खुले द्वार का पिंजड़ा, जब तक मिठास से निभे, रहो, वरना तुम अपने रास्ते, हम अपने”।7बाज़ार ने जहाँ स्त्रियों को स्पेस दिया, वहीं उसके सामने कई तरह की समस्याएँ भी खड़ी कर दी है।
यह इस युग की नई नैतिकता है जिसे आधुनिक नारी गढ़ रही है। ‘समलैंगिकता’ और ‘सहजीवन’ जैसी अवधारणा आज आम बात हो गयी है। यौन इच्छाओं की संतुष्टि के लिए पुरुष की सत्ता को खारिज कर रहीं हैं। यह आधुनिक चेतना सम्पन्न नारी का फलसफ़ा है। रजनी गुप्त के ‘एक न एक दिन’ की पात्रा ‘कृति’ विवाह-संस्था की आलोचना करते हुये कहती है-“आखिर किसने थमाए एक व्यक्ति के हाथों में इतने अनंत अधिकार क्यों? ये व्यवस्था हमेशा औरत पर ही छीटाकशी के मौके ढूंढती रहती है? महज सात फेरे लेने से क्यूँकर एक पुरुष किसी भी स्त्री का सर्वांग मालिक बन जाएगा।‘8 परंपरागत विवाह-संस्था की कमजोरियाँ खुलकर सामने आने लगी हैं, जहाँ स्त्री को सिर्फ़ दासी समझा जाता है और पुरुष हर तरह से उसका शोषण करता है। अब इस तरह के भेद-भाव के प्रति स्त्रियाँ खुद मुखर हो रही हैं। रजनी गुप्त के ‘एक न एक दिन’ में लड़की से जीवन पर टिप्पणी करते हुए कहती है यही मुंबई में कई घोड़े बिना शादी के बी रहता है खूब मौज मस्ती एण्ड नो कमिटमैण्ट। ऐ ऐसे क्या आप चौड़ी करके दीदे फाड़ रही हो, लिव इन रिलेशनशिप में क्या बुराई है?’9 अभी तक स्त्री जिन मुद्दों पर बात करने से शर्म महसूस करती थी, अब उन्हीं मुद्दों पर बोल्ड होकर बात करती हुई दिखाई देती हैं। विवाह-संस्था, दांपत्य सुख, यौन तुष्टि और सहजीवन पर नई नैतिकता रचती हुई आज की स्त्री को देखा जा सकता है।
अब स्त्रियाँ अपनी निजता पर खुल कर बोल रही हैं, अपनी शारीरिक जरूरतों और यौन इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए विवाह से पहले या विवाहेत्तर संबंध बनाने से भी परहेज नहीं कर रही हैं। जयन्ती रंगनाथन ने अपने उपन्यास ख़ानाबदोश ख़्वाहिशें की नायिका निधि एक ऐसी पात्र है जो कई पुरुषों से शारीरिक संबंध बनाती है जिसका उसे कोई अफसोस नहीं है। वह बेधड़क हो कर कुबूल करती है-“मैंने जो किया, कहा और जिया, उसकी पूरी ज़िम्मेदारी उठाती हूँ। मुझमें किसी किस्म का गिल्ट नहीं।... मैं भी कुछ दिनों पहले तक मानती थी कि औरत को पुरुष दिशा देता है। मैं अपनी तलाश में बहुत भटकी। बहुत पुरुषों में सहारा ढूंढा। पर मिला तो अपने ही कंधों पर। हम हर पुरुष में एक आदर्श ढूंढते हैं। सब किताबी बातें हैं। ऐसा कुछ नहीं होता हैं”।10 सहजीवियों को बदलती मानसिकता के कारण अपराध बोध से ग्रसित होना पड़ता है।
शरद सिंह ने ‘कस्बाई सीमोन’ उपन्यास में कस्बाई नारी को चरितार्थ करते हुए वैश्वीकरण के प्रभाव का उल्लेख किया है। इस उपन्यास के अन्तर्गत सुश्री शरद सिंह ने सुगन्धा व रितिक के माध्यम से सहजीवियों को स्वच्छन्द जीवन जीने के साथ साथ माता पिता का एक दूसरे पर प्रत्यारोपण, अशोभनीय संवाद, अलगाव, माँ बेटी का जीवन संघर्ष, बचपन की नियति, कुसंस्कारों का प्रतिगामी प्रभाव, अपराध बोध, समाज से तकरार, प्रताड़ना व टकराहट, बदलती मानसिकता की बीमारी, सह जीवन के विश्वास, वायदे, समर्पण, चुनौती, जीवन में देह की भूख व अप्राप्य प्रेम के बीच उलझन आदि को विस्तार दिया है जोकि सह-जीवन का प्रतिरुप उपस्थित करता है। उपन्यास की पात्रा सुगन्धा के माध्यम से स्व की तलाश हेतु अनेक प्रश्न उपस्थित किये गये हैं -‘उफ् ये विवाह की परिपाटी। गढ़ी तो गई स्त्री के अधिकारों के लिए जिससे उसे उसके बच्चों को सामाजिक मान्यता और आर्थिक सम्बल आदि मिल सके लेकिन समाज ने ही इसे तमाशा बना कर रख दिया। मैं इस तमाशे को नहीं जीना चाहती थी। मैंने सोच रखा था कि कभी विवाह नहीं करुंगी। माँ के अनुभवों की छाप मेरे मन मस्तिष्क पर गहरे तक अंकित थी। उसे चाहकर भी नहीं मिटा सकती थी।11 सुश्री शरद सिंह ने विवेच्य उपन्यास में नारीवाद के वैश्विक स्वरुप को स्वीकारते हुए भारतीय नारी के लिए स्व की तलाश का उल्लेख किया है।
इस उपन्यास के सह जीवी पात्र रितिक और सुगन्धा के बीच संवाद सह जीवन के विश्वास, वायदे, समर्पण, चुनौती की अवधारणा को स्पष्ट करता हैः-‘ये किसने कहा कि मैं तुमसे शादी करना चाहती हूँ ? कि तुम से बच्चे पैदा करना चाहती हूँ? तुम्हें पसन्द करती हूँ बस, इसलिए तुम्हारा साथ चाहती हूँ।
मैंने कहा था ‘फिर पसन्द’? प्रेम नही ?
हाँ -हाँ, वही प्रेम, प्रेम करती हूँ तुम से।
मेरे साथ रहोगी बिना शादी किये ? लिव इन रिलेशन? रितिक ने चुनौती सा देते हुए पूछा था और मैं रितिक के जाल में फंस गई थी। कारण मैं अपने जीवन को अपने ढंग से जीना चाहती थी और लिव इन रिलेशन वाला फंडा मुझे अपने ढंग जैसा लगा था।‘’12 बिना विवाह किये किसी पुरुष के साथ पति पत्नी के रुप में रहने की कल्पना ने मुझे रोमांचित कर दिया। विवेच्य उपन्यास में सुश्री शरद सिंह ने सहजीवियों की समाज से तकरार व टकराहट का कच्चा चिट्ठा प्रस्तुत किया है। वस्तुतः ‘कस्बाई सिमोन’ उपन्यास कस्बे में रहने वाली स्त्री के मन में चल रही कशमकश व पीड़ा का दस्तावेज़ है, सह-जीवन रुपी फीचर की कार्यशाला है, अनुभवों का रेखाचित्र है।13
केवल स्त्रियाँ ही सह जीवन की और अग्रसर नहीं, पुरुष भी अब अकेले जीवन यापित करना चाहता है। पुरुष समाज के बीच अविवाहित जीवन बिता रहे हैं। अलका सरावगी ने एक ब्रेक के बाद उपन्यास में गुरुचरण राय के माध्यम से सह जीवन के सन्दर्भ में पुरुष मानसिकता का वर्णन किया हैः- ‘’गुरु चरण गाय लक्की मैन का फोन किसी शाम नहीं बजता । वह मोबाइल ही नहीं रखता । इसी झंझट से बचने के लिए तो शादी नहीं की।‘’14 अलका सरावगी ने भारतीय सामाजिक परिवेश में सह जीवन संबंधों पर चिंतन मनन किया है, ’’ गुरुचरण गुरुजी की साक्षात मूर्ति महिला का फ्रैंड, फिलासफर, गाइड के साथ-साथ कुछ और भी है, पर जाहिर है कि यह सब बातें कभी चाहे जाहिर नहीं की जाती।‘’15 आर्थिक तौर पर स्वतऩ्त्र मानसिकता वाले लोग जो विवाह की जकड़न से छुटकारा पाना चाहते हैं जिस रिश्ते को दूसरे पक्ष की सहमति के बिना कभी भी समाप्त किया जा सकता है।
महानगरों में सह-जीवन की स्वतऩ्त्र मानसिकता वाले लोग जो विवाह की जकड़न से छुटकारा पाना चाहते हैं, शारीरिक सम्बन्धों से मिलने वाली शान्ति स्थायी सम्बन्धों के लिए बाध्य नहीं करती। प्रभा खेतान के उपन्यास पीली आंधी में के सह जीवन को पद्मावती और सुराणा के माध्यम से विश्लेषित किया है। सुराणा पद्मावती के सामने जब विवाह का प्रस्ताव रखते हैं तो पद्मावती इन्कार कर देती है।पद्मावती कहती है मैं बस एक ही चाहती हूँ बिल्कुल गोपनीयता आप प्रतिज्ञा कीजिए। स्त्री और पुरुष के सह जीवन को लेकर अदालत ने फैसले सुनाने प्रारम्भ कर दिए हैं, तब से समाज में भी इसको लेकर काफी चर्चा हो रही है, इसके पक्ष और विपक्ष में अपने- अपने तर्क वितर्क हैं। अदालत यह तय कर रही है इस सहजीवन के दौरान होने वाली संतानों का पूर्वजों की जायदाद पर अधिकार होंगा या नहीं। शहरी जीवन शैली में विवाह संस्थाओं पर इसका सर्वाधिक प्रभाव परिलक्षित हो रहा है।प्रभा खेतान ने ‘पीली आंधी’ उपन्यास में लिखा है कि’’ एक बात गांठ बांध लो सालो, तुम दोनों एक साथ कर ही नहीं सकती। प्रेम करो या विवाह करो और जिसे प्रेम करो उससे ब्याह तो हरगिज़ मत करो।‘’16 इस उपन्यास में जीवन के मूलभूत प्रश्नों को बहुत सलीके से उठाया गया है। ‘’विवाह एक संस्था है, रजिस्टरी के कागज़ों पर सही किया हुआ नाम है।कानून मनुष्य के स्वभाव को देखकर ही बनाया जाता है और क्या यह ज़रूरी है कि कोई किसी को ताउम्र प्यार करता रहे, विकास की यात्रा में जीवन के काल खंड में कभी स्त्री तो कभी पुरुष का स्वभाव, उसका मूल्य बोध, जीवन दृष्टि बदल सकता है और जब कोई बदल जाता है तब बची रहती है जड़ता। मगर सुजीत यह प्रेम तो नहीं।‘’17 परम्परा, सामाजिकता और कानून आदि पर अनेक प्रश्न खड़े हो जाते हैं, इन प्रश्नों का जवाब प्रभा खेतान ने विवेच्य उपन्यास में दिया है ।
भूमण्डलीकरण व बाज़ारीकरण के इस दौर में हमारी पारिवारिक और सामाजिक संरचना में काफी परिवर्तन हुए हैं। भारतीय पारिवारिक और सामाजिक ढांचें में स्त्रियों पुरुषों के भेदभाव की गहरी खाई और पितृसत्तात्मक विवाह संस्था की जटिलताओं ने सह-जीवन की अवधारणा को विकसित किया। युवा वर्ग के व्यावसायिक व स्वार्थी रवैये के कारण सह-जीवन के रिश्ते पनपने लगे। विवाह जो जीवन को स्थायित्व प्रदान करता है परन्तु आज का युवा वर्ग उसको नकारकर सह जीवन में जीना चाहता है। युवा पीढ़ी निजत्व की तर्क खोजने में तत्पर है। पाश्चात्य संस्कृति के अंग बनते हमारे महानगर स्त्री पुरुष सम्बन्धों की नई परिभाषा गढ़ रहे हैं। सह जीवन के सम्बन्धों को युवा युवतियाँ स्वातन्त्र्य और सशक्तिकरण मानकर अपना रहे हैं। इक्कीसवीं सदी के हिन्दी उपन्यासों में स्वातन्त्र्य और सशक्तिकरण के तंत्र सह जीवन को आधार बनाकर महिला उपन्यासकारों यथा ममता कालिया, अनामिका, रजनी गुप्त, जयन्ती रंगनाथन, शरद सिंह, अलका सरावगी, प्रभा खेतान ने स्त्री पुरुष के भेदभाव की गहरी खाई, पितृसत्तात्मक, विवाह संस्था की जटिलता, उन्मुक्त बंधनहीन जीवन, विघटित मानसिकता की परिणति, पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों से मुक्ति, स्व की तलाश, सह जीवन के विश्वास, वायदे, समर्पण, संस्कृति के संक्रमण से उपजी सह जीवन की मान्यता का विश्लेषण किया है जोकि पाठक वर्ग के समक्ष चिन्तन के लिए खुला छोड़ दिया गया है कि हम सह जीवन के विविध पक्षों पर विचारणा करे, यही इस आलेख का चिन्तनमूलक तथ्य है।

सन्दर्भ ग्रन्थः
1 http://www.setumag.com/2017/03/Book-Review-Lata-Agrawal-Sharad-Singh-Poonam-Dogra.html
2 _rq lkjLor]lg thou dh my>usa]nSfud tkxj.k]30 vDrwcj]2010A
3 http;//www.myupchar.com/sexual-health/in-live-in-relationship
4 http://sharadakshara.blogspot/2020/01/blog-post_5.html
5 http://hi.wikipedia.org/wiki/ लिव इन सम्बन्ध
6 ममता कालिया दौड़, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2000, पृ 64।
7 अनामिका, दस द्वारे का पिंजरा, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2008, पृ 92।
8 रजनी गुप्त के ‘एक न एक दिन’ किताब घर प्रकाशन, नई दिल्ली 2008, पृष्ठ 45।
9 वही पृष्ठ 84।
10 जयन्ती रंगनाथन, ख़ानाबदोश ख़्वाहिशें, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, 2010, पृ 31।
11 सुश्री शरद सिंह, कस्बाई सिमोन, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, 2014, पृष्ठ 77 ।
12 वही पृष्ठ 105 ।
13 http://sahityacinemasetu.com/shodh-lekh-sharad-singh-ke-upnayas-kasbayi-cimon-mein-chitrit-nari-vimarsh-ke-vividh-aayam/
14 अलका सरावगी, एक ब्रेक के बाद, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019, पृष्ठ 78 ।
15 वही पृष्ठ 82।
16 प्रभा खेतान, पीली आंधी, लोकभारती प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019, पृष्ठ 39।
17 वही पृष्ठ 244।

ई- सामग्रीः
1 https://www.jansatta.com/sunday-magazine/first-lady-of-womens-discourse-and-woman-litterateur-social-worker-prabha-khaitan-topped-in-writing/1559165/
2 http://yugmanas.blogspot.com/2014/04/blog-post_28.html
3 https://hindisamay.com/upanyas/daud.htm
4 http://www.setumag.com/2017/03/Book-Review-Lata-Agrawal-Sharad-Singh-Poonam-Dogra.html
5 https://aharbinger.wordpress.com/2009/03/06
6 https://www.matrubharti.com/book/19871928/wanting-for-live-in-relationship
7 https://timesofindia.indiatimes.com/life-style/relationships/love-sex/marriage-vs-live-in-relationship-two-different-approaches-to-exploring-love-and-companionship/articleshow/71582056.cms
8 streekaal.com/2017/10/review-dasduwarekapinjara/
9 http://samixa.blogspot.com/2009/10/blog-post_25.html
10 https://hindisamay.com/upanyas/daud.htm

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।