रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ का ‘अंतहीन’: ग्रामीण परिवेश और भावात्मक व्यवस्था का प्रतिबिम्ब

किरण ग्रोवर

किरण ग्रोवर

सह-आचार्य, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, डी.ए.वी. कालेज, अबोहर, पंजाब
चलभाष: 94783-20028; ईमेल: groverkirank@gmail.com


सारांशः- समाज सामाजिक संबंधों की एक अमूर्त व्यवस्था है। परिवेश के अंतर्गत लोगों के जीने का तरीका, उनकी संस्कृति, उनका समुदाय, उनकी राजनैतिक प्रणाली, उनका पर्यावरण, उनका स्वास्थ्य, उनके व्यक्तिगत और संपत्ति के अधिकार, उनकी आशंकाएँ, महत्वाकांक्षाएँ आदि को सम्मिलित किया जाता है। ग्राम एक पूर्ण सामुदायिक इकाई है जिसमें जीवन की पूर्णता के दर्शन होते हैं। ग्राम के पीछे एक छिपा हुआ इतिहास मिलता है जिसमें उसकी परंपराओं और प्रथाओं का बोध होता है। जनता विभेदीकरण और विशेषीकरण से दूर ग्राम वासी समान जीवन व्यतीत करते हैं। प्रत्येक गाँव का एक भूतकाल होता है, मूल्य व्यवस्था और भावात्मक व्यवस्था होती है ताकि भावात्मक व्यवस्था और मूल्य व्यवस्था ही ग्रामीण मानसिकता को परिवर्तित होने से रोकती है। गाँव भारतीय संस्कृति और विरासत का दर्पण है। गाँव हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी हैं। ग्रामीण समाज में छोटी उम्र में बच्चों का विवाह कर दिया जाता है, इसके लिए धार्मिक रूढ़िवादिता, अंधविश्वास, अशिक्षा, संयुक्त परिवार, कृषि और आर्थिक स्थिति आदि परिस्थितियाँ उत्तरदायी हैं। रूढ़िवादिता और परंपरा ग्रामीण जीवन के मूल समाजशास्त्रीय लक्षण है। रमेश पोखरियाल निशंक की वैचारिक संपन्नता उनकी पूंजी है। कथाकार के रूप में रमेश पोखरियाल निशंक निश्चय ही मूल्यों को साथ लेकर चले हैं। निशंक जी के जीवन में दो प्रकार का सत्य है जिसे कथन सत्य और घटित सत्य का नाम दिया जाता है। मानवीय संवेदना के शिल्पी, ग्रामीण परिवेश के परिचायक रमेश पोखरियाल निशंक जी ने अंतहीन कहानी संग्रह का सृजन किया है। ‘अंतहीन’ कहानी संग्रह की कहानियाँ नारी चेतना का जीता जागता स्वरूप हैं। निशंक जी ने अंतहीन कहानी में ग्रामीण परिवेश की गरीबी, लाचारी को विवेचित करते हुए स्त्रियों की परिवार का लालन पालन की विवशता को दिखाया है, गरीबी का शिकार बच्चों की हतप्रभ वाणी को मनोवैज्ञानिक शब्दावली में अभिव्यक्त किया है। लाला जैसे भ्रष्टाचारियों के प्रति ग्रामीण समाज को प्रतिकार करने की निशंक जी ने प्रेरणा दी है तथा समय की नब्ज़ को पहचानने सम्बन्धी चिन्तन प्रस्तुत किया है। रामकली के माध्यम से ग्रामीण समाज के अंतर्गत अंधविश्वास, अशिक्षा, अज्ञानता, रूढ़िवादिता का भाव विवेचित किया है, हरिलाल के जीवन सत्य को उजागर करके ग्रामीण समाज का भोलापन, सरलता व निश्छलता का प्रतिबिम्ब रचा है। हिंदी साहित्यकारों में रमेश पोखरियाल निशंक ने देदीप्यमान नक्षत्र की तरह अपनी उपस्थिति दर्ज की है। अपनी लेखनी के माध्यम से रमेश पोखरियाल निशंक आम जनमानस की भावनाओं को उभार कर समाज और देश के सामने ऐसे प्रश्न खड़े करते रहेंगे जिनके उत्तर के लिए कभी न कभी जिम्मेदार व्यक्तियों को अपने कर्तव्यों का एहसास जरूर हो पाएगा। 

बीज शब्दः- विशेषीकरण, सामुदायिक, आत्मीयता, रूढ़िवादिता, धर्मवाद भावात्मक।

मूल प्रतिपादनः- समाज सामाजिक संबंधों की एक अमूर्त व्यवस्था है। परिवेश के अंतर्गत लोगों के जीने का तरीका, उनकी संस्कृति, उनका समुदाय, उनकी राजनैतिक प्रणाली, उनका पर्यावरण, उनका स्वास्थ्य, उनके व्यक्तिगत और संपत्ति के अधिकार, उनकी आशंकाएँ, महत्वाकांक्षाएँ आदि को सम्मिलित किया जाता है। ग्राम भारतीय सभ्यता और संस्कृति की आत्मा है। ग्रामीण परिवेश में सजातीयता पाई जाती है। सदस्यों की जीवन पद्धति रहन-सहन, खानपान, रीति रिवाज, धार्मिक विचार, सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवहार लगभग एक जैसे होते हैं, इस कारण सदस्यों में एक व्यवसाय तथा अन्य पहलुओं में एकरूपता होने से भिन्नता का ग्रामीण समुदाय में कोई स्थान नहीं है। ग्रामीण क्षेत्र वह क्षेत्र है जहाँ लोग प्राथमिक उद्योग में लगे हो अर्थात प्रकृति के सहयोग से व्यवस्थाओं का प्रथम बार उत्पादन करते हैं। ग्रामीण शब्द का प्रकृति से घनिष्ठ संबंध है। ग्राम एक पूर्ण सामुदायिक इकाई है जिसमें जीवन की पूर्णता के दर्शन होते हैं। ग्राम के पीछे एक छिपा हुआ इतिहास मिलता है जिसमें उसकी परंपराओं और प्रथाओं का बोध होता है। ग्राम की भारतीय संस्कृति भारत का वास्तविक प्रतिनिधित्व करती हैं। ग्रामीणों को अपने ग्राम घर और भूमि से प्यार होता है उसकी इज्जत, प्रतिष्ठा और सम्मान को देखकर वह गर्व अनुभव करता है।1 गाँव को सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनैतिक दृष्टि से एक इकाई माना जाता है। ग्रामीण सामाजिक जीवन में समानता का अनुभव होता है। रहने और सामान वस्तुओं का उपयोग करने के कारण प्रत्येक ग्रामवासी अपने में और अन्य लोगों में कोई अंतर नहीं समझता। जनता विभेदीकरण और विशेषीकरण से दूर ग्राम वासी समान जीवन व्यतीत करते हैं। उनके व्यवसाय, रीति -रिवाज, प्रथाएँ, रूढ़ियाँ, भाषाएँ, विचारधारा, जीवनधारा, जीवन स्तर सब सामान्य होता है। ग्रामीण एकता के दर्शन उस समय होते हैं जब गाँव में आकस्मिक संकट, महामारी हो किसी वैधानिक नियमों का सामूहिक विरोध करना हो, धार्मिक उत्सव और सामुदायिक त्योहार मनाना हो, गाँव में डकैती हो रही हो या दो गाँवों के बीच में संघर्ष हो रहा हो। प्रत्येक गाँव का एक भूतकाल होता है, मूल्य व्यवस्था और भावात्मक व्यवस्था होती है ताकि भावात्मक व्यवस्था और मूल्य व्यवस्था ही ग्रामीण मानसिकता को परिवर्तित होने से रोकती है।

भारत गाँवों का देश कहलाता है। देश की आबादी का 67% अभी भी गाँवों में निवास करता है। भारत के गाँवों में प्राकृतिक सुंदरता देखते ही बनती है, हरे भरे खेतों के चारों तरफ फूलों का लावण्य, दूर दूर तक फैली हुई मादक खुशबू, घर के चारों तरफ पक्षियों का चहचहाना, सादगी ही ग्रामीण जीवन की पहचान है। गाँव के अंतर्गत संस्थाओं और व्यक्तियों का समावेश होता है जो एक छोटे से केंद्र के चारों और संगठित होते हैं तथा सामान्य हितों द्वारा आपस में बंधे रहते हैं। ग्रामीण समुदाय का तात्पर्य एक निश्चित भूभाग पर रहने वाले किसी भी छोटे या बड़े समूह से है जिनमें जनसंख्या की समरूपता, सामाजिक एवं सांस्कृतिक समानता, प्रकृति से समन्वय, सरलता एवं सामुदायिक भावना की प्रधानता होती है।2 गाँव भारतीय संस्कृति और विरासत का दर्पण है। भारत की सदियों पुरानी परंपराएँ आज भी जीवित हैं। गाँव के लोग अपने अतिथियों का गर्मजोशी से स्वागत करते हैं और उनका व्यवहार भी काफी दोस्ताना होता है। ग्रामीण परिवेश में आत्मीयता के वास्तविक स्वरूप के दर्शन होते हैं, तीज, त्योहार, रामलीला, कठपुतली का नाच, नौटंकी आदि रंजन के सस्ते साधन द्वारा लोग मनोरंजन करते हैं और एक दूसरे के सुख दुख में भागीदार बनते हैं। गाँव का जीवन सादा, सरल और कम खर्च में निर्वाह योग्य होता है।
 गाँव हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी हैं। उत्पादन के प्रमुख स्रोत के लिए ग्रामीण कृषि व्यवस्था प्रधान होती है। लोक संस्कृति की कहानियों का सृजन कृषक समाज में ही होता है। कृषक समाज की सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक परिस्थितियाँ होती हैं और लोक संस्कृति इन परिस्थितियों को विविध रूपों में अभिव्यक्त करती है। प्राकृतिक और स्वच्छ वातावरण में रहने के कारण में ग्रामीण निरोग, शक्तिशाली और हृष्ट पुष्ट होते हैं।

विवाह संस्था व्यक्तियों को व्यक्तिवादता की संकीर्णता से बाहर निकालकर परिवार कल्याण की भावना को अधिक दृढ़ बनाती है। यही गुण मानव प्राणी को सामाजिक प्राणी के रूप में परिवर्तित करता है। विवाह के द्वारा एक वंश परंपरा का निर्माण होता है। सांस्कृतिक विशेषताएँ पिता से उसके पुत्र को मिलने से लगातार आगामी पीढ़ी में संचालित होती हैं।3 ग्रामीण समाज में छोटी उम्र में बच्चों का विवाह कर दिया जाता है, इसके लिए धार्मिक रूढ़िवादिता, अंधविश्वास, अशिक्षा, संयुक्त परिवार, कृषि और आर्थिक स्थिति आदि परिस्थितियाँ उत्तरदायी हैं।
परिवेश एक लघु स्वतंत्र इकाई है। सदैव आत्मनिर्भर ग्रामीण में सामान्य सांस्कृतिक, राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक वृत्ति व्यक्ति में सामुदायिक भावना और सहयोगी प्रकृति को जन्म देते हैं। ग्रामीण परिवार के अस्तित्व को बनाए रखने में परंपरा, रीति रिवाज, लोक विश्वास, धर्म और लोक परंपराओं का महत्वपूर्ण स्थान है। ग्रामीण परिवेश में केवल व्यवसायिक समानता ही नहीं अपितु उनके सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन में भी संलिप्तता परिलक्षित होती है, इस मुख्य कारण ग्रामीण समुदाय में समान धर्म के लोगों की बहुलता है। ग्रामीण परिवेश के अधिकाधिक सदस्यों का जीवन सरल एवं सामान्य होता है उनका जीवन जनता से सुदूर सादगी में रमा होता है, उनका भोजन, खान-पान, रहन-सहन, सादा व शुद्ध होता है। ग्रामीण समुदाय में संयुक्त परिवार का विशेष महत्व है। ग्रामीण समुदाय में परिवार को टूटने से बचाना और परिवारिक समस्याओं को अन्य परिवारों से गोपनीय रखने का भी भरसक प्रयास किया जाता है।4 घर का मुखिया अपना सम्मान समझकर परिवार की एकता को बनाए रखने के लिए प्रयत्नशील रहता है। ग्रामीण परिवेश में परिवारिक कठिनाइयों को पारस्परिक सहयोग के द्वारा समाधान करने का प्रयास किया जाता है। ग्रामीण परिवेश में सदस्यों का प्रेम, सहानुभूति, त्याग, धैर्य आदि भावनाएँ देखने को मिलती हैं। समुदाय के सदस्यों में व्यक्तिगत निर्भरता के स्थान पर सामुदायिक निर्भरता अधिक पाई जाती है इसलिए लोग एक दूसरे पर आश्रित होते हैं। विकास एवं विघटन न केवल समुदाय का व्यक्ति विशेष जिम्मेदार होता है बल्कि संपूर्ण सदस्यों को जिम्मेदार माना जाता है।

नवीनता के प्रभाव की न्यूनता ग्रामीण समुदायों की रूढ़िवादिता को प्रदर्शित करती है। ग्रामीण समुदायों में देवी देवताओं और प्राकृतिक शक्तियों में विश्वास अंधविश्वास के द्योतक हैं। रूढ़िवादिता और परंपरा ग्रामीण जीवन के मूल समाजशास्त्रीय लक्षण है। समुदाय की शिक्षा, अज्ञानता और रूढ़िवादिता का सीधा प्रभाव स्त्रियों की स्थिति पर पड़ता है। ग्रामीण समुदाय में बाल विवाह, दहेज प्रथा, पर्दा प्रथा, लड़कियों को शिक्षा के बाहर नौकरी से रोकना आदि सार्वभौमिक दिखाई देती है जो स्त्रियों की गिरी हुई दशा के लिए उत्तरदायी हैं। ग्रामीण समुदाय में बढ़ रही जनसंख्या, बेरोजगारी, गरीबी उन्हें चारों ओर से जकड़ रही है यहाँ तक कि ग्रामीण जीवन में राजनीति भी बुरी तरह से प्रभावित कर रही है, इन सब के कारण ग्रामीण परिवेश में अपराधों की संख्या बढ़ रही है। शिक्षा के अभाव में ग्रामवासी अनेक अंधविश्वास और कुसंस्कारों का शिकार बने रहते हैं तथा भाग्यवादिता पर अधिक विश्वास रखते हैं।5 समुदाय में अधिकाधिक लोगों की जातिवाद और धर्मवाद में अटूट श्रद्धा होती है। समाज में छुआछूत की संकीर्णता पर विशेष बल दिया जाता है। ग्रामीण परिवेश नई चीजों से दूर और पुरानी परंपराओं में संलिप्त रहता है इसी कारण ग्रामीण समाज धर्म परायण बना रहता है। सीमित क्षेत्र उसे बाहरी दुनिया के प्रभाव से मुक्त रखता है और इसी कारण उसमें विस्तृत दृष्टिकोण भी आसानी से नहीं पनप पाता।

समय बदलने के साथ-साथ समाज में संस्कृति में भी परिवर्तन आते रहते हैं। साहित्य समाज के यथार्थ जीवन को गतिशील तरीके से स्वागत करके उसकी आंतरिक चेतना को दुनिया के सम्मुख प्रस्तुत करता है। विसंगतियों, विद्रूपताओं, द्वंद्वों से जूझ रही जनता की मानसिक यंत्रणा को वाणी देने में साहित्यकार सफल होता है। विधाओं में कहानी आज साहित्य की केंद्रीय विद्या बन गई है।6

रमेश पोखरियाल निशंक जी अपने परिवेश से जुड़े हुए हैं और अपने आप को अभिव्यक्त करने के लिए छटपटाते हैं, उनके भीतर जो घटित घटनाएँ हैं, वे कहीं न कहीं शब्दबद्ध होने के लिए उन्हें प्रेरित करती हैं:-
 मैं अनमना सा सोच रहा, अपने ही भीतर स्वयं को खोज रहा।

समाज को प्रभावित करने वाले प्रत्येक क्षेत्र को कहानीकार ने अपने कहानी का वर्ण्य विषय बनाया है। परिस्थिति, संघर्ष, सहयोग, अनुभव, कर्तव्य की दृष्टि से निशंक जी का रचनात्मक जीवन भरपूर रहा है और वे इसका उपयोग अपने सृजनशील व्यक्तित्व के निर्माण में भी करते हैं। डा.ऋषभदेव शर्मा ने अपनी ज़मीन से जुड़े निशंक जी को निरभिमान, सहज स्वभावी, पारदर्शी व्यक्तित्व को बचा कर रखने वाला कहा है। उनके व्यक्तित्व में विशेष प्रकार की उदारता व उदात्तता विद्यमान है। निशंक जी ने जीवन की पाठशाला से बहुत कुछ सीखा, पत्रकारिता ने निशंक जी को अधिक सूझबूझ और पैनी दृष्टि प्रदान की। जीवन का लंबा समय पत्रकारिता और समाज सेवा को देने से राजनैतिक सफर सहज होता चला गया।7

प्रोफेसर देव सिंह पोखरिया से कुछ वर्ष पहले हुई निशंक जी की बातचीत में उन्होंने अपने सर्जनात्मक सफर के विषय में इस प्रकार बताया कि मुझे ऐसा लगता है मन में जब कोई कहीं भी छटपटाहट होती थी तो मैं लिखता था शुरू से जो हमारे अपने लोगों में भारत की संस्कृति है, संस्कार हैं, जो हमारी पारस्परिक समर्पण की भावना है, उन्हें मैंने अपनी कविताओं और कहानियों के द्वारा प्रस्तुत किया। हिंदी संस्थान के उपाध्यक्ष अनिल जोशी जी ने अपने व्याख्यान में कहा था कि "निशंक लिखते भी नहीं है, निजी होकर लिखते हैं जो जिया वह लिखा है, लेखन को जीवन बना कर लिखते हैं। आप भी ऐसे अनेक राजनेताओं को जानते होंगे जो बिना लाग लपेट के अपने मन की बात कहते हैं। निशंक जी वैचारिक संपन्नता उनकी पूंजी है। राजनीति में भी साहित्य की तरह जीवन मूल्यों की चिन्ता करते हैं।"8 डॉ अरुण ने निशंक की एक रचनात्मक व्यक्तित्व के विविध पहलुओं के बारे में लिखा है, " जीवन मूल्यों के सार्थक और सजीव चित्रण सही साहित्यकार की रचना कालजीवी और दीर्घ जीवी हो पाती है। मेरा तो निष्कर्ष यही है कि कथाकार के रूप में रमेश पोखरियाल निशंक निश्चय ही मूल्यों को साथ लेकर चले हैं और उच्चतर जीवन मूल्यों जैसे त्याग, समर्पण, सहयोग, राष्ट्रप्रेम, कर्तव्य बोध, पारस्परिक सहयोग और व्यक्तिक निष्ठा आदि का सजीव चित्रण उनके सभी पात्रों में हुआ है।" बटोही निशंक जी को सांस्कृतिक जीवंतता और प्रोफेसर हरिमोहन उनके दृष्टिकोण और लेखन की सहजता को रेखांकित करते हैं। राजनेता अटल बिहारी वाजपेई का स्नेह निशंक की बहुमूल्य उपलब्धि ही है, "मुझे निशंक का संघर्ष और दृढ़ इच्छाशक्ति पर पूर्ण विश्वास है। वह अपने राजनैतिक जीवन की व्यस्तताओं के उपरांत भी अपनी लेखनी के माध्यम से आम जनमानस की भावनाओं को उभार कर समाज और देश के सामने ऐसे प्रश्न खड़े करते रहेंगे जिनके उत्तर के लिए कभी न कभी जिम्मेदार व्यक्तियों को अपने कर्तव्यों का एहसास जरूर हो पाएगा।"9 

निशंक जी के लेखन पर डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की टिप्पणी दृष्टव्य है, " हिंदी साहित्यकारों में रमेश पोखरियाल निशंक ने देदीप्यमान नक्षत्र की तरह अपनी उपस्थिति दर्ज की है। निशंक की निरंतर अबाध गति से चली आ रही साहित्य यात्रा हिंदी की समृद्धि और श्री वृद्धि कर एक नया आयाम स्थापित करेगी। ऐसी रचनाएँ लोगों में देशभक्ति का जज्बा पैदा करती हैं सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय रहने वाले निशंक जी अब तक डेढ़ दर्जन से भी अधिक पुस्तकों का प्रकाशन उनकी प्रखरता, संकल्पशीलता, रचनाधर्मिता और संवेदनशीलता का प्रमाण देती हैं, निश्चित ही निशंक जी ने ऐसी कृतियों की रचना कर राष्ट्र का गौरव बढ़ाया है।"10 

निशंक जी के जीवन में दो प्रकार का सत्य है जिसे कथन सत्य और घटित सत्य का नाम दिया जाता है। रमेश पोखरियाल निशंक मौलिक रूप से साहित्यिक विधा के व्यक्ति हैं, उन्होंने हिंदी साहित्य की तमाम विधाओं कविता, उपन्यास, खंडकाव्य, लघु कहानी, पर्यटन, यात्रा वृतांत, बाल कहानी और व्यक्तित्व विकास संबंधी पुस्तकें प्रकाशित की हैं। उनकी प्रकाशित रचनाओं ने उन्हें हिंदी साहित्य में सम्मानजनक स्थान दिलाया है। उनकी रचनाओं में राष्ट्रवाद की भावना कूट-कूट कर भरी हुई है। रमेश पोखरियाल निशंक जी के साहित्य की प्रासंगिकता को अनुभव किया जा सकता है कि उनके साहित्य को विश्व की कई भाषाओं जर्मन, अंग्रेजी, फ्रेंच, भारत की तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम, मराठी, गुजराती, पंजाबी संस्कृत आदि भाषाओं में अनूदित किया जा चुका है। उनके साहित्य को मद्रास, चेन्नई और हैंबर्ग, विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। उनके साहित्य पर अब तक डॉ. श्याम धर तिवारी, डॉ. विनय डबराल, डॉ.नगेंद्र, डॉ. सविता मोहन, डॉ. नंदकिशोर, डॉ. योगेंद्र नाथ शर्मा अरुण, डॉ. सुधाकर तिवारी आदि अनेक शिक्षाविदों द्वारा समीक्षात्मक ग्रंथों का प्रकाशन किया जा चुका है। उनके साहित्य पर गढ़वाल विश्वविद्यालय, कुमाऊं विश्वविद्यालय, सागर विश्वविद्यालय, मद्रास विश्वविद्यालय, हैमबर्ग विश्वविद्यालय, जर्मनी विश्वविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय, मेरठ विश्वविद्यालय में शोध कार्य हो चुका है और जारी भी है। ‘देश हम जलने ना देंगे’ रचना पर तत्कालीन राष्ट्रपति श्री ज्ञानी जैल सिंह जी द्वारा राष्ट्रपति भवन में सम्मानित हो चुके हैं। ‘भूमि के लिए’ रचना पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा द्वारा भी उन्हें अलंकरण की प्राप्ति हुई। ‘तेरे लिए’ रचना पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वारा साहित्य गौरव सम्मान से अलंकृत हुए।अंतर राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय श्रीलंका द्वारा डॉक्टर ऑफ साइंस की मानद उपाधि से सम्मानित हुए। रचनाधर्मिता के कारण तत्कालीन उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत से सम्मान प्राप्त हुआ। रचनाकर्म के कारण अटल बिहारी वाजपेयी जी द्वारा साहित्यभारती सम्मान मिला।‘कोई मुश्किल नहीं’ रचना के विमोचन अवसर पर डॉ. रामानंद सागर द्वारा साहित्यचेता सम्मान से सम्मानित हुए। मुक्त विश्वविद्यालय श्रीलंका द्वारा डॉक्टर ऑफ लिटरेचर सम्मान से अलंकृत किया गया। जर्मनी विश्वविद्यालय के अतिरिक्त हाॅलैंड, नार्वे, रूस सहित कई यूरोपीय देशों और विश्वविद्यालयों द्वारा साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य हेतु सम्मान से नवाज़ा गया और साथ ही भारत अंतरराष्ट्रीय मैत्री समिति द्वारा भारत गौरव सम्मान, लोक कला संस्थान नई दिल्ली द्वारा साहित्य भूषण सम्मान, उत्तराखंड उत्थान समिति हरिद्वार द्वारा ‘गढ़ रतन सम्मान’, हिमालय रक्षा मंच चंडीगढ़ द्वारा ही ‘पुत्र सम्मान’, देश विदेश से 300 से अधिक सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक संस्थाओं द्वारा विभिन्न अवसरों पर सम्मानित हुए।11

रमेश पोखरियाल निशंक के कहानी संग्रह-रोशनी की एक किरण, बस एक ही इच्छा, क्या नहीं हो सकता, भीड़ साक्षी है, एक और कहानी, खड़े हुए प्रश्न, विपदा जीवित है, मेरे संकल्प, अन्तहीन, वाह ज़िन्दगी मुख्य हैं।
निशंक के साहित्यिक व्यक्तित्व की प्रखरता और प्रभविष्णुता का शब्द चित्र पाठक के मानस में बनता चला जाता है। निशंक जी का साहित्यिक व्यक्तित्व सच्चे अर्थों में निजी पहचान लिये हुए है जो उनके विपुल कृतित्व से निर्मित होता चला जाता है। निशंक जी की कहानियाँ जीवन मूल्यों की स्थापना का लक्ष्य लेकर मानवीय संवेदना की ज्योति जलाती हैं। सुधांशु शुक्ला जी ने रमेश पोखरियाल जी की कहानियों के विषय में लिखा है, "डॉ रमेश पोखरियाल जी की कहानियाँ मानव जीवन के हर रिश्ते को दिखाती, समझाती नजर आती हैं। इनकी कहानियों पर इनकी भाषा, इनके स्वभाव अर्थात व्यक्तित्व की छाया है। व्यक्तित्व की सादगी और ताजगी की तरह बहुत ही सहज भाषा में सहजता के साथ जीवन की तमाम उलझनों, संघर्षों और जीवन की जिजीविषा को जीवंतता के साथ अभिव्यक्त किया है।"12

निशंक जी ने अन्तर्विरोधों का मार्मिक चित्रण करते हुए हदयवाद के साथ साथ बुद्धिवाद का भी सहारा लेते हैं। भारतीय जीवन बोध को अपने परिवेश व ज़मीन से जुड़ाव स्थापित करके कहानियों को शब्दबद्ध किया है। 
मानवीय संवेदना के शिल्पी, ग्रामीण परिवेश के परिचायक रमेश पोखरियाल निशंक जी ने अंतहीन कहानी संग्रह का सृजन किया है। इस कहानी संग्रह के अंतर्गत उन्होंने मध्यवर्गीय जीवन के चरित्रों को बुना है। डॉ. बी. एल. गॉड जी ने निशंक के कहानी संग्रह अंतहीन को निश्चित ही श्रेष्ठ जनकृति होने की कसौटी पर कसा है और उन्होंने माना कि निशंक का जीवन अनंत सीमा तक अनगिनत लोगों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है। उनका जीवन जन-जन में निरंतर आगे बढ़ने की और श्रेष्ठतम प्राप्त करने की यात्रा का मानदंड स्थापित करता है।"13 

निशंक जी ने ‘अंतहीन’ कहानी संग्रह की कहानियाँ स्त्री के दैनिक जीवन के संघर्ष को रुपायित करती हैं जोकि आशावादी दृष्टिकोण प्रतिपादित करता है। निशंक जी के स्त्री पात्र सुमंगला, कुंती, अनुराधा, रामकली, जूली आदि के माध्यम से नारी की मूक वेदना को स्वर प्रदान किया है व उन्हें स्वावलंबी बनाने की चेष्टा की है। नारी के आर्थिक संकटों का चित्रण करके निर्भीक अनाचारों से लड़ने का साहस उत्पन्न किया है है। ‘अंतहीन’ कहानी संग्रह की कहानियाँ नारी चेतना का जीता जागता स्वरूप हैं। निशंक जी का अनुभवजगत से प्रतीत होता है, उनकी कहानियों की भाषा उनकी संवेदना, उनकी पात्र संरचना विस्तार और गहराई लिए हुए हैं। निशंक जी नारी के संघर्ष को जीवन का मूल मंत्र मानते हैं।14 

रूढ़िवादिता और परंपरा ग्रामीण जीवन के मूल समाजशास्त्रीय लक्षण है। समुदाय की शिक्षा, अज्ञानता और रूढ़िवादिता का सीधा प्रभाव स्त्रियों की स्थिति पर पड़ता है। ग्रामीण समाज में शिक्षा के अभाव के कारण किस प्रकार जनता गरीबी का शिकार होती है और गरीब मजदूर कभी बच्चे के बीमार होने पर, कभी त्यौहार मनाने पर, कभी जन्म मृत्यु के संस्कार करने पर घर का खर्चा चलाने के लिए किस प्रकार गाँव के लाला से वह पैसे उधार लेते हैं। रमेश पोखरियाल निशंक जी ने अंतहीन कहानी में ग्रामीण परिवेश की गरीबी, लाचारी को विवेचित करते हुए स्त्रियों की परिवार का लालन पालन की विवशता को प्रकाशित कर झुमकी के पिता को व्यसन में परिवार के प्रति असहाय दिखाया है। ग्रामीण परिवेश में पुरुष वर्ग परिवार के प्रति कितना निर्दय व्यवहार करते हैं? इस वास्तविकता को पाठकों के समक्ष खोल कर रख दिया है। ‘अंतहीन’ कहानी की झुमकी चार भाई-बहनों में सबसे बड़ी रेलवे लाइन से लगी झुग्गियों में माता पिता के पास साथ रहती है। पिता मजदूरी करते और जो कमाते शाम को उसे शराब में गमाकर आते है। चार बच्चों को पालने की जिम्मेदारी झुमकी की माँ पर आन पड़ी। झुमकी की माँ चार-पाँच घरों में झाड़ू बर्तन कर बच्चों का पेट भरने लायक तो कमा ही लेती। निशांत जी ने अंतहीन कहानी के माध्यम से ग्रामीण समुदाय की अशिक्षा, अज्ञानता का सीधा प्रभाव स्त्रियों की स्थिति पर पड़ता दिखाया है कि किस प्रकार औरतें मेहनत मजदूरी करके परिवार का पालन पोषण करती हैं, " पिता के शराब पीने की आदत ने बच्चों को बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया। बच्चे पिता की गालियाँ खाने के बाद माँ की तरफ बड़े प्यार से निहारते। माँ की चीख-पुकार सुन बच्चे सहम जाते।वह भी जोर जोर से चीज कर माँ के सुर से सुर मिलाने का प्रयास करते"15

 झुमकी जोकि भोजन को देखकर कितनी ललचाए नजरों से उसके स्वाद को ग्रहण करना शुरू कर देती है, "झुमकी ने ऐसा स्वादिष्ट खाना पहले कभी नहीं खाया था? बड़े मनोयोग से वह रायते की पत्तल चाट रही थी, रायता तो तो खत्म हो ही चुका था साथ ही पत्तल पर पड़े उसके निशान भी झुमकी के उधर में समा चुके थे लेकिन उसका मन ना भरा।"16 विवेच्य कहानी के संवाद में निशंक जी ने गरीबी का शिकार बच्चों की हतप्रभ वाणी को मनोवैज्ञानिक शब्दावली में अभिव्यक्त किया है।

गरीब मजदूर कभी बच्चे के बीमार होने पर, कभी त्यौहार मनाने पर, कभी जन्म मृत्यु के संस्कार करने पर, घर का खर्चा चलाने के लिए, किस प्रकार गाँव के लोग लाला से वह पैसे उधार लेते हैं तो उनकी जीवन सत्य को निशंक जी ने रेखांकित किया है। ग्रामीण परिवेश की झुग्गी बस्ती में रहने वाले लोगों को अपने झांसे में फंसाने वाले लाला जोकि अन्तहीन यात्रा में संलग्न प्रतीत होता है।, "मजदूर न तो ब्याज का हिसाब लगाना जानते, न किसी से पूछते। उनके लिए तो लाला भगवान के समान था। वरना कौन देता उन्हें उधार? यह अलग बात थी कि उधार की रकम जब चुकाये न चुकती तो कर्जदार के बीवी बच्चों को ही लाला की सेवा कर कर्ज उतारना होता। सुबह के झुटपुटे में में लोगों ने कई बार लाला के घर से किसी कर्जदार की बीवी या बेटी को निकलते देखा था।"17 

लाला जैसे भ्रष्टाचारियों के प्रति ग्रामीण समाज को प्रतिकार करने की निशंक जी ने प्रेरणा दी है तथा समय की नब्ज़ को पहचानने सम्बन्धी चिन्तन प्रस्तुत किया है। ग्रामीण समुदाय में बढ़ रही जनसंख्या, बेरोजगारी, गरीबी उन्हें चारों ओर से जकड़ रही है यहाँ तक कि ग्रामीण जीवन में राजनीति भी बुरी तरह से प्रभावित कर रही है, इन सब के कारण ग्रामीण परिवेश में अपराधों की संख्या बढ़ रही है। शिक्षा, अज्ञानता और रूढ़िवादिता का सीधा प्रभाव स्त्रियों की स्थिति पर पड़ता है। ग्रामीण समुदाय में बाल विवाह, दहेज प्रथा, पर्दा प्रथा, लड़कियों को शिक्षा के बाहर नौकरी से रोकना आदि सार्वभौमिक दिखाई देती है। 

विवाह संस्था व्यक्तियों को व्यक्तिवादता की संकीर्णता से बाहर निकालकर परिवार कल्याण की भावना को अधिक दृढ़ बनाती है। यही गुण मानव प्राणी को सामाजिक प्राणी के रूप में परिवर्तित करता है। ग्रामीण समाज में छोटी उम्र में बच्चों का विवाह कर दिया जाता है, इसके लिए धार्मिक रूढ़िवादिता, अंधविश्वास, अशिक्षा, संयुक्त परिवार, कृषि और आर्थिक स्थिति आदि परिस्थितियाँ उत्तरदायी हैं। लाला की नजर जैसे ही लुभाया राम की बेटी झुमकी पर पड़ती है तो वह अपने भविष्य के बारे में सपने संजोने लगता है। लाला के मन की अशांति बढ़ जाती है वह भागदौड़ और थकान के बावजूद नींद भी नहीं ले पाता। लाला की पत्नी की जब मृत्यु होती है तो तेरहवीं के संपन्न होने के बाद ही अपने भावी जीवन के बारे में अनेक अटकलें लगाने लगता है। ग्रामीण समाज में विवाह की प्रथा को निशंक जी ने अनमेल विवाह के रूप में रुपायित किया है कि बेटी की उम्र वाली झुमकी के साथ लाला विवाह करने के लिए तत्पर हो जाता है। ‘अंतहीन’कहानी में झुमकी के माता-पिता जब आपस में संवाद कायम करते हैं कि "झुमकी से शादी बनाना चाहता है, वह और बदले में सारा कर्जा माफ।

"लेकिन झुमकी कैसे? वह तो पन्द्रह बरस की है अभी। लाला की तो बेटियाँ भी। लुभाया की पत्नी को यह प्रस्ताव समझ में न आया।"

 "तो क्या हुआ? शादी तो करनी ही है हमने उसकी। इससे अच्छा वर और कहाँ ढूंढ पाएंगे? लुभाया लाला को हाँ बोल चुका था।"18 विवेच्य कहानी के अन्तर्गत निशंक जी ने स्पष्ट किया है कि ग्रामीण समाज के सीमित क्षेत्र ग्रामीणवासियों को बाहरी दुनिया के प्रभाव से मुक्त रखते हैं और इसी कारण उनमें विस्तृत दृष्टिकोण भी आसानी से नहीं पनप पाता, " लाला की दोनों बेटियाँ भी उसी की हम उम्र थी। उनको खेलते- कूदते देख झुमकी का भी मन करता कि वह भी उनके साथ खेले। लेकिन कैसे? लाला से वह डरती भी कम न थी। लाला का परिपक्व और अमानवीय प्यार प्रदर्शन उसके कोमल मन को बार-बार आहत कर जाता।"19 निशंक जी ने ग्रामीण समाज की अनपढ़ता पर समाज का ध्यान केंद्रित करना चाहा है कि किस प्रकार माता पिता एक पन्द्रह बरस की बेटी का विवाह एक बुजुर्ग के साथ करने के लिए तत्पर हो जाता है जिसमें असंतुलन का भाव है जिसने करीबी से ग्रामीण परिवेश को प्रभावित किया है।

लड़कियों का कम उम्र में विवाह कर देना यह ग्रामीण परिवेश की मानसिकता का परिणाम दिखाई देता है।‘कतरा-कतरा मौत’ कहानी की कुंती विवाह कम उम्र में सम्पन्न किया जाता है, " पन्द्रह बरस की बरस की थी कुंती जब इस घर में ब्याह कर आई थी। घर में थे ससुर और दो छोटे देवर। सास की मृत्यु बहुत पहले हो चुकी थी। दो बेटियाँ थी, उनका भी विवाह हो चुका था, घर में कोई औरत न रही तो मंगसीरु का विवाह कर दिया वह तब बीस बरस का था।‘20 ‘कतरा-कतरा मौत’ कहानी के अन्तर्गत निशंक जी ने ग्रामीण समाज की अनपढ़ता पर समाज का ध्यान केंद्रित करना चाहा है।

निशंक जी ने ‘रामकली ‘कहानी के माध्यम से पन्द्रह वर्ष की आयु में रामकली के विवाह का उल्लेख किया है, " पन्द्रह वर्ष की आयु में रामकली न तो पति का मतलब समझती थी, न ससुराल का लेकिन काम करने की खूब आदत थी उसे। यूं तो सुमेरु ने पैसा खूब कमाया लेकिन अकेला होने के कारण घर की और ध्यान न दिया। विवाह के बाद सुमेरु बस पन्द्रह दिन घर रहा। बचपन से अपनों के प्यार को तरसती रामकली के जीवन में स्नेह का नव संचार कर गया।"21निशंक जी ने पति पत्नी के प्यार, त्याग और समर्पण की गाथा का गायन किया है और रामकली के माध्यम से ग्रामीण समाज की अज्ञानता रूढ़िवादिता, अबोधता का भाव विश्लेषित किया है। "रामकली के गर्भवती होने का पता भी उसे छह माह बाद पता चला। इस बीच अकेली रामकली अपने अंदर परिवर्तनों को झेलती रही।"22 निशंक जी ने रामकली के माध्यम से ग्रामीण समाज के अंतर्गत अंधविश्वास, अशिक्षा, अज्ञानता, रूढ़िवादिता का भाव विवेचित किया है।

ग्रामीण परिवेश में सदस्यों का प्रेम, सहानुभूति, त्याग, धैर्य आदि भावनाएँ देखने को मिलती हैं। समुदाय के सदस्यों में व्यक्तिगत निर्भरता के स्थान पर सामुदायिक निर्भरता अधिक पाई जाती है इसलिए लोग एक दूसरे पर आश्रित होते हैं।ग्रामीण परिवार के अस्तित्व को बनाए रखने में परंपरा, रीति रिवाज, लोक विश्वास, धर्म और लोक परंपराओं का महत्वपूर्ण स्थान है। ग्रामीण परिवेश के अधिकाधिक सदस्यों का जीवन सरल एवं सामान्य होता है उनका जीवन जनता से सुदूर सादगी में रमा होता है, उनका भोजन, खान-पान, रहन-सहन, सादा व शुद्ध होता है। ‘फिर जिंदा कैसे’ कहानी का नायक सुनील जब गाँव में सड़क बनवाने का ठेका लेकर एक चौकीदार हरिलाल के यहाँ आता है तो उसके शब्द पाठक की संवेदना को जागृत करते हैं। चौकीदार के शब्दों में मार्मिकता का पुट इस प्रकार है, " बेटा गरीब की झोपड़ी है। यही रह लो गाँव में लोग किराए पर घर तो देते नहीं तो मैंने सोचा हम तो दो ही प्राणी है। कितनी जगह चाहिए हमें।"23 निशंक जी ने हरिलाल के जीवन सत्य को उजागर करके ग्रामीण समाज का भोलापन, सरलता व निश्छलता का प्रतिबिम्ब रचा है।

कहानी का नायक सुनील जब हरी लाल की बेटी बिंदिया के साथ विवाह का प्रस्ताव सामने रखता है तो हरिलाल ऐसे चैंका जैसे उसने जैसे उसने जलता कोयला छू लिया हो क्योंकि एक पिता होने के नाते उसके उसने भीतर ज्वार भाटा उगलने लगा, " साहब कहाँ तुम और कहाँ हम। ऐसा कैसे हो सकता है।
 
क्यों? क्या तुम इंसान नहीं?
 साहब वह तो ठीक है लेकिन हमारी जात।
मैं नहीं मानता जात पात को। सुनील का स्वर दृढ़ था।
लेकिन गाँव वाले क्या कहेंगे? कैसे रह पाऊंगा मैं विवाह के बाद गाँव में। हरिलाल को अपनी बेटी के भविष्य से अधिक इस बात की चिंता थी कि लोग क्या कहेंगे?"24

ग्रामीण परिवेश नई चीजों से दूर और पुरानी परंपराओं में संलिप्त रहता है इसी कारण ग्रामीण समाज धर्म परायण बना रहता है। ग्रामीण समुदाय के सदस्यों में व्यक्तिगत निर्भरता के स्थान पर सामुदायिक निर्भरता अधिक पाई जाती है इसलिए लोग एक दूसरे पर आश्रित होते हैं। ग्रामीण परिवेश के अधिकाधिक सदस्यों का जीवन सरल एवं सामान्य होता है उनका जीवन जनता से सुदूर सादगी में रमा होता है, उनका भोजन, खान-पान, रहन-सहन, सादा व शुद्ध होता है। ग्रामीण समुदाय में बढ़ रही जनसंख्या, बेरोजगारी, गरीबी उन्हें चारों ओर से जकड़ रही है। ग्रामीण जीवन में राजनीति भी बुरी तरह से प्रभावित कर रही है, इन सब के कारण ग्रामीण परिवेश में अपराधों की संख्या बढ़ रही है। ग्रामीण परिवेश में न्याय और चिकित्सा की कमी के कारण किस प्रकार लोगों को यातनाएँ भोगनी पड़ती है, इस कटुसत्य को निशंक जी ने ‘रामकली’ कहानी के माध्यम से बताना चाहा है, " हमारे लिए तो तुम बड़े डॉक्टर हो। भोले भाले गाँव वालों की समझ में नहीं आता कि वह ऐसा क्यों कह रहे हैं। जब बहुत दिनों तक डॉक्टर साहब के दर्शन नहीं होते तो कंपाउंडर उन्हें शहर के बड़े अस्पताल की राह दिखाता।"25 निशंक जी ने ‘रामकली ‘कहानी के माध्यम से पाठकों को सचेत करना चाहा है कि नवीनता के प्रभाव की न्यूनता ग्रामीण समुदायों की रूढ़िवादिता को प्रदर्शित करती है। ग्रामीण परिवेश को राजनीति भी बुरी तरह से प्रभावित कर रही है।

गाँव को सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनैतिक दृष्टि से एक इकाई माना जाता है। सब ग्रामीणों को अपने ग्राम घर और भूमि से प्यार होता है उसकी इज्जत, प्रतिष्ठा और सम्मान को देखकर वह गर्व अनुभव करता है। निशंक जी ने ‘एक थी जूही’ के माध्यम से ग्रामीणवासियों के मन में शिक्षा ग्रहण करने की आकांक्षा का प्रत्यक्षीकरण किया है कि शारीरिक सौंदर्य की स्वामिनी जूही घर में अपनी मां के कामकाज में हाथ बटाती, अपने भाई बहनों को संभालती और फिर भी पढ़ाई के शौक के कारण जब कभी उसे वक्त मिलता तो वह पढ़ने में रत हो जाती, "जूही का दिमाग भी तेज निकला---- यूँ तो सरकारी स्कूल में उसी की तरह ही गरीब बच्चे पढ़ते थे। जिनके माता-पिता को उनकी पढ़ाई से कोई सरोकार न था लेकिन इसके बावजूद जूही ने अपने अध्यापकों के दिल में अपनी जगह बना ली थी।"26 ग्रामीण समाज में शिक्षा के अभाव के कारण बच्चों के मन में किस प्रकार पढ़ने की भावना उत्पन्न होती है, इस स्थिति को निशंक जी ने ‘एक थी जूही’ के माध्यम से दर्शाना चाहा है।

हिंदी साहित्यकारों में रमेश पोखरियाल निशंक ने देदीप्यमान नक्षत्र की तरह अपनी उपस्थिति दर्ज की है। उनकी प्रखरता, संकल्पशीलता, रचनाधर्मिता और संवेदनशीलता का प्रमाण देती है। निशंक जी ने जीवन की पाठशाला से बहुत कुछ सीखा, पत्रकारिता ने निशंक जी को अधिक सूझबूझ और पैनी दृष्टि प्रदान की। निशंक जी की कहानियाँ जीवन मूल्यों की स्थापना का लक्ष्य लेकर मानवीय संवेदना की ज्योति जलाती हैं। व्यक्तित्व की सादगी और ताजगी की तरह बहुत ही सहज भाषा में सहजता के साथ जीवन की तमाम उलझनों, संघर्षों और जीवन की जिजीविषा को जीवंतता के साथ अभिव्यक्त किया है। निशंक जी ने के ‘अंतहीन’कहानी संग्रह की कहानियों के कथ्य में बेबस, गरीब व लाचार मज़दूर वर्ग का संघर्ष, सामाजिक ताने-बाने में रची-बसी विभिन्न विसंगतियों पर सटीक प्रहार, शासनतन्त्र में व्याप्त भ्रष्टाचार की पोल खोलता स्वर प्रतिध्वनित हुआ है। निशंक के कहानी संग्रह ‘अंतहीन’ को निश्चित ही श्रेष्ठ जनकृति कहने मे गर्व अनुभूत होता है और निशंक का जीवन अनंत सीमा तक अनगिनत लोगों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है। वह अपने राजनैतिक जीवन की व्यस्तताओं के उपरांत भी अपनी लेखनी के माध्यम से आम जनमानस की भावनाओं को उभार कर समाज और देश के सामने ऐसे प्रश्न खड़े करते रहेंगे जिनके उत्तर के लिए कभी न कभी जिम्मेदार व्यक्तियों को अपने कर्तव्यों का एहसास जरूर हो पाएगा।

सन्दर्भ ग्रन्थः-
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3. https://ccsuniversity.ac.in › bridge-library › sociology
4. https://www.uou.ac.in › files › slm › MASO-201
5. https://ncert.nic.in › textbook › pdf › lhgy110
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7. https://sm.education.gov.in/hi/ministers-profile
8. https://pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=1674815
9. https://books.google.co.in/books?id=1_YeEAAAQBAJ&pg=PT9&lpg=PT9&dq=ramesh+pokhriyal+aantheen+kahani+sangrah&source17
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12. https://www.thepurvai.com/a-report/
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14. https://sm.education.gov.in/hi/ministers-profile
15. रमेश पोखरियाल निशंक, ‘अंतहीन’, अंतहीन, राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, दिल्ली, पृष्ठ संख्या: 58
16. वही पृष्ठ संख्या: 60
17. वही पृष्ठ संख्या: 58
18. वही पृष्ठ संख्या: 63
19. वही पृष्ठ संख्या: 63
20. रमेश पोखरियाल निशंक, ‘अंतहीन,’ ‘कतरा-कतरा मौत’, राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, दिल्ली, पृष्ठ संख्या: 67
21. रमेश पोखरियाल निशंक, ‘अंतहीन,’ ‘रामकली, राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, दिल्ली, पृष्ठ संख्या: 107
22. वही पृष्ठ संख्या: 108
23. रमेश पोखरियाल निशंक, ‘अंतहीन,’ ‘फिर जिंदा कैसे’, राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, दिल्ली, पृष्ठ संख्या: 94
24. वही पृष्ठ संख्या: 97
25. वही पृष्ठ संख्या: 106
26. रमेश पोखरियाल निशंक, ‘अंतहीन,’ ‘एक थी जूही’ राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, दिल्ली, पृष्ठ संख्या: 116

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