उभयचर अस्तित्व की कथा [2]

चंद्र मोहन भण्डारी

भविष्यपथ की संभावित रूपरेखा


भारतीय भूभाग में करीब ढाई हजार साल पहले एक सपना पल्लवित होता रहा था जिसमें सारी मानवीय दुविधाओं, स्वार्थलिप्साओं एवं अक्षमताओं के बावजूद उदात्त मानवीय मूल्यों की पहचान भी आकार लेती रही जिसकी झलक पौराणिक साहित्य में प्रचुरता से मिल जाती है। आत्मवत सर्वभूतेषु और तेन त्यक्तेन भुंजीथा जैसी अभिव्यक्तियाँ भले ही कुछ मनीषियों के उदगार रहे हों परन्तु उस देश-काल के प्रबुद्ध जनों ने उन्हें स्वीकृति व महत्व दिया। साथ ही यह भी स्वीकारना होगा कि सामाजिक ताने-बाने में वह उदात्तता एवं उदारता उस सीमा तक सभी के लिये नहीं दिखाई दी जो अपेक्षित थी पर इसके बावजूद वह जनमानस को सैद्धांतिक स्तर पर अमान्य नहीं रहा।

आज वैश्वीकरण की सुनामी में किसी देश का अकेले निर्णय बहुत मायने नहीं रखता और भविष्यपथ लगभग एक साथ ही तय करना आवश्यक होगा। पिछले लेख में प्रस्तुत उभयचरीय दुविधाओं की कथा को आधुनिक संदर्भों में आगे बढ़ाते हुए इस लेख में उन तनावों एवं दबावों की भी चर्चा होगी जो मानव के तथाकथित विकास से जुड़े हैं और उनकी भी जो उसकी स्वायत्त एवं समष्टिपरक अस्तित्वों की टकराहट के मूल में हैं।
 
पिछले लेख [1] में मानव की सांस्कृतिक विकास यात्रा में उसकी ‘उभयचरीय’ दुविधा पर चर्चा की गई थी – यानि दो अलग अस्तित्वों को एक साथ लेकर चलने की दास्तान, जिसमें मुख्य फोकस भारतीय भूभाग पर था। उभयचरीय विडम्बना जो मानव की दो अस्मिताओं – स्वायत्त और समष्टिपरक – के बीच टकराहट की स्थिति से उत्पन्न होती है। यह उभयचरीय द्वैत उसकी दुविधा के मूल में है पर विशेष स्थितियों में सृजनशीलता का आधार भी। मानव की इन दो अस्मिताओं को परिभाषित करती हैं उसकी जिजीविषा एवं जिज्ञासा। जिजीविषा यानि जीने की उत्कट इच्छा जो जीव-जगत में हर कहीं विद्यमान है मानव में भी स्वायत्त-जीव-अस्मिता का प्रतिनिधित्व करती हैं। दूसरी ओर उसका विचारशील चेतन-मन प्रेरित करता है जानने समझने के लिये वह सब जो उसे आंदोलित करता है प्रेरित करता है अपनी स्वायत्त अस्मिता से इतर जाने के लिये। इतिहास भरा पड़ा है उन दास्तानों से जो इसकी पुष्टि करती हैं। अपनी इन लाक्षणिकताओं – जिजीविषा और जिज्ञासा – के साथ मानव-जीव आगे बढ़ा है अपने सांस्कृतिक विकास पथ पर; उसकी यह यात्रा उसकी उभयचरीय दुविधा को और भी उजागर कर जाती है।


आधुनिक परिदृश्य

चार सौ साल पहले यूरोप में विज्ञान के विकास के साथ जो मानववादी चिंतन मुखरित हुआ उससे सैद्धांतिक रूप में व्यक्ति की महत्ता व अधिकार को सैद्धांतिक स्वीकृति मिली और कुछ हद तक यथार्थ के धरातल पर भी इसका असर हुआ। पर इस सबके साथ कई मानव विरोधी अभियान भी चलाये जाते रहे जिनमें साम्राज्यवाद का विस्तार व दास-प्रथा भी साथ-साथ चलती रहीं। आज मानव की गरिमा व अधिकारों के पक्षधर तब उसका शोषण करते रहे, ऐसी वीभत्सता के साथ कि संवेदनशीलता का नामोनिशां भी नहीं मिलता एक दीर्घ कालखंड में। सैद्धांतिक स्तर पर उदात्त मूल्यों की स्वीकृति और जमीनी स्तर पर उसके विपरीत आचरण – उभयचरीय विडम्बना ने किस तरह दोगलेपन या हिपोक्रिसी को परिभाषित एवं प्रभावित किया है पश्चिम जगत में इसका यह एक अच्छा उदाहरण है कुछ वैसे ही जैसे आत्मवत सर्वभूतेषु या वसुधैव कुटुम्बकम जैसी धारणाओं की सैद्धांतिक स्वीकृति के साथ समाज के कमजोर वर्गों के प्रति अन्याय की निरंतर चली आ रही परिपाटी भारतीय भूभाग के संदर्भ में। 

यह सही है कि सत्ता प्रबुद्ध जनों या मनीषियों के हाथ में नहीं होती और समाज में अपने विशिष्ट स्थान के बावजूद यथार्थ के स्तर पर इस वर्ग की भूमिका सीमित ही रहा करती है। सत्ता की राजनीति प्रबुद्ध विचारों का उपयोग करती रही है अपने लाभ के लिये और शायद संकीर्ण मानसिकता के साथ भारी-भरकम शब्दावली का प्रयोग हर कहीं दीख पड़ता है। यह भी होता है कि वैचारिक स्तर पर उदार व्यक्ति सैद्धांतिक स्वीकृति के बावजूद अपने भौतिक सुखों का परित्याग नहीं करना चाहता – उसकी स्वायत्त अस्मिता की पकड़ समष्टिपरक दृष्टि पर हावी हो जाती है। साथ ही यह भी सच है कि दीर्घ परिसर में वैचारिक परिवेश में परिवर्तन होने के भी उदाहरण हैं: पश्चिम में दास-प्रथा का विरोध स्वयं उन्हीं लोगों के बीच होना आरंभ हुआ जो उसके पक्षधर थे जिसकी परिणति अमेरिका में गृहयुद्ध के साथ हुई। आज मानवाधिकारों की बात भी वहीं से उठी है जिन्होंने कुछ समय पहले इसका हनन किया था। इसमें कुछ सीमा तक दिखावा या पाखंड शामिल है फिर भी सब के लिये ऐसा नहीं कहा जा सकता। भारत में भी सदियों से प्रताड़ित दलित वर्ग के समर्थन में आवाज उठी और संविधान ने उन्हें बराबरी का स्थान दिया जिसके वे हकदार थे। पर जमीनी हकीकत में यह संघर्ष अभी थमा नहीं है और बहुत कुछ होना बाकी है।

इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए यह समझ पाना संभव हो सकता है कि भारतीय संदर्भ में एक उदार दृष्टि के बावजूद अनुदार सामाजिक परम्परा भी स्वीकृत होती गईं। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ या ‘आत्मवत सर्वभूतेषु’ को स्वीकृति देकर हमने अपने मन की जरूरत के एक हिस्से को पूरा करने की कोशिश की और समाज के एक बड़े हिस्से को जीवन की आवश्यकताओं से वंचित कर अपने तथाकथित विशिष्ट समाज की सुविधाओं को भी बनाये रखा।

एक सपना था सर्व से आत्मवत होने का, पर मन की इस ताकत को उसी की कमजोरी ने धराशायी कर दिया। हमने समाज को टुकड़ों में बांट दिया. फिर बीत गयीं सदियाँ – दुनिया बदलती रही, पर हम नहीं बदले। अपने ही सपनों के कैदी हम सपने में ही रहे यह सोचते कि हमने जो दर्शन दिया वह अद्वितीय था और यह कि वह विशिष्ट चिंतन अपनी समर्थता में हमारे हर दोष को छिपा सकता है। आज इक्कीसवीं सदी के आरंभिक दशकों में आँखें मलते हम नींद से जाग तो रहे हैं पर कुछ लोग अब भी समझ नहीं पा रहे कि 12 वीं तथा 21 वीं सदियाँ कैसे हमारे मानसपटल पर एक साथ विद्यमान हो सकती हैं। आज भी ऐसे उदाहरण सामने आ जाते हैं जो हमें सदियों पीछे धकेलते दिखाई देते हैं। यों कभी-कभी सुनाई दे जाती है सांकल हिलने की आवाज, शायद दस्तक दे रहा है जमाना हमें चेतावनी देता हुआ। यह हम पर है कि हम उस चेतावनी को सही मायनों में ले पाते हैं या नहीं।


संभावित अगला कदम

सारी बात जान लेने के बाद अब अगला सवाल यही उठता है कि हमारे लिये कौन से विकल्प खुले हैं और हमारे प्रयत्न किस दिशा में होने चाहिये? हर एक की राय अलग हो सकती है मैं अपनी बात करूंगा। हमने जिस सपने की बात की है मैं चाहूंगा कि वह सपना कायम रहे – नींद में नहीं, जागृत अवस्था में – सपना न टूटे, अगर कुछ टूटना है तो टूटें वे जंजीरें जो उस सपने को अपनी गिरफ्त में लिये थीं। अगर हम यह कर सके तब एक लम्बे अंतराल के बाद सही कदम लेने के गौरव और संतोष के सही हकदार होंगे। मेरी नजर में हमारे प्रबुद्ध जन के लिये यह एक चुनौती होगी – एक विराट चुनौती।

पश्चिम में विज्ञान व प्रौद्योगिकी के विकास के साथ औद्योगिक क्रान्ति पल्लवित हुई और उसने मानव की जीवन शैली में आमूल परिवर्तन कर दिया। वैचारिक स्तर पर भी अभिनव प्रयोग होने लगे और सारी उठापटक, मारकाट और युद्धोन्माद के बीच मानव की आधारभूत समानता व गरिमा की भावना भी पल्लवित होती रही। प्रौद्योगिकी का प्रभाव जीवन शैली के साथ-साथ संस्कृति को भी प्रभावित करने लगा और धीरे-धीरे एक नयी संस्कृति का आविर्भाव हुआ जिसे आज हम उपभोक्त‍ा संस्कृति कह सकते हैं। बात वैसे कुछ खास नहीं लगती पर दीर्घ परिसर में इसके प्रभाव या दुष्प्रभाव दूरगामी हो सकते हैं। क्यों न हम अपने देश की बात करें?

अपने अतीत की सारी कमियों के बावजूद एक ठोस आधार पर खड़ी भारतीय जीवन दृष्टि संभवत: अकेली है जो विश्व में पनप रही उपभोक्ता संस्कृति का स्वस्थ विकल्प देने की सोच भी सकती है। यह सोचने का ठोस कारण है। महात्मा गांधी ने जब ग्राम-स्वराज की बात की, अनावश्यक औद्योगीकरण का विरोध किया तथा सरल जीवन पर बल दिया – यह सब उस उपभोक्ता संस्कृति का विकल्प देने का एक आरंभिक प्रयास था [4]।
एक पिछड़ा नवोदित देश संभवत: गांधी के सपने को साकार नहीं कर सकता था। सदियों की गरीबी, दासता, चरमराता अर्थतंत्र, एक पारम्परिक अंधविश्वासी समाज और बढ़ती आबादी – इन स्थितियों में औद्योगीकरण के अलावा कोई विकल्प भी न था। एक और खास बात कि आज के विश्व की परिस्थितियों मे अपना अस्तित्व बनाये रखना तभी संभव है जब प्रतिस्पर्द्धा में दूसरों से बहुत पीछे न रह जायें।


विडम्बना

पर जो सबसे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण था वह यह कि गा़ंधी के ही तथाकथित अनुयायी कुछ तो उनके मंतव्य को न समझ सके और कुछ थे जिन्हें मात्र उनके नाम की जरूरत थी आदर्शों की नहीं। अपनी जरूरतों के लिये आज के जीवन में बहुत कुछ जरूरी हो सकता है पर अनियंत्रित उपभोक्तावाद तथा उसका मीडिया द्वारा अनावश्यक प्रसार – साथ ही एक बड़े वर्ग का गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन, सब मिलाकर एक खिचड़ी संस्कृति का आविर्भाव दिखायी दिया जिसमें विकृतियों ने अपना सिर उठाना शुरू कर दिया। 

 
‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ से ‘सर्वे भवन्तु उपभोक्ता:’ तक

भारत के नव-धनाढ्य वर्ग ने एक स्वस्थ आधुनिक समाज के सपने को चकनाचूर कर दिया और देश के तथाकथित प्रबुद्ध खेमों में बँट गये। विचारकों के अपने-अपने खेमे थे- वामपंथी, दक्षिणपंथी, मध्यमार्गी, जातिवादी, परम्परावादी, प्रगतिवादी, राष्ट्रवादी और अवसरवादी – दर्जनों खेमे थे अपने-अपने झंडे लिये। ऐसे में वह जो जरूरी था नहीं हो सका – स्वस्थ, तर्कसंगत संवाद से परिस्थिति व समय को देखते हुए एक कार्यकारी सूत्र (working formula) पर सहमति। वैसे अगर ऐसा हो भी जाता तब भी हालात बदतर हो सकते थे क्योंकि प्रबुद्ध जन की बात शक्ति-केन्द्रों को स्वीकार्य हो, जरूरी नहीं। संविधान की मूल भावना निर्विवाद वह स्वस्थ विकल्प दे सकती थी पर जब जनमानस में समझ व आस्था की कमी हो, निजी स्वार्थ देशहित से ऊपर हो, प्रबुद्ध-वर्ग दिशाहीन और बँटा हो तब वही हो सकता था जो होता रहा है – फूहड़ नकलची उपभोक्ता संस्कृति का विस्तार।

इस देश पर समय-समय पर खतरे आते रहे जिनका सामना साहस और दिलेरी से हुआ। कभी उनसे न जूझ पाने के कारण घुटने भी टेकने पड़े पर सब मिलाकर इस भूमि व समाज ने अपनी पहचान को बनाये रखा। लेकिन आज जो खतरा सामने है वह पहले के खतरों से बड़ा है साथ ही उस से लड़ने का साहस व संकल्प बिलकुल नाकाफी है। यह खतरा वही है जिसका जिक्र पहले कर चुके हैं – फूहड़ उपभोक्ता वाद। बात सिर्फ आर्थिक संदर्भों की होती तब संभवत: चिंता होते भी उसे आंशिक स्वीकृति देना संभव होता पर बात इसके आगे चली जाती है जिसमें जीवन शैली और सांस्कृतिक पहलू आकर जुड़ जाते हैं अपनी पूरी गहराई में। वो बनाते हैं हम खरीदते हैं, वो लिखते हैं हम पढ़ते हैं, वो कहते हम सुनते हैं वो फिल्म बनाते हम देखते हैं। जैसे वो जन्मदिन बनाते हैं हम ठीक वैसे ही करते हैं। यहाँ तक कि बम्बई फिल्म नगरी को बाँलीवुड में रूपांतरित कर हमें होता है एक महान उपलब्धि का आभास। हर जगह मात्र उपभोक्ता हैं हम, चाहे मशीनें हों या किताबें या फिल्में, वह भी मौलिकता से अछूते मात्र नकलची फूहड़ उपभोक्ता; और हमारा उनका यह रिश्ता दिनों दिन प्रगाढ होता जाता है। आत्मवत सर्वभूतेषु सैद्धांतिक तौर पर ही सही हमारी मूल भावना को चित्रित करता था। वैसे यह हम अब भी कह सकते है कि ‘सभी में विद्यमान है हमारा जैसा उपभोक्ता’, यानि सर्व भूत की जगह पर सर्व उपभोक्ता। यह दूसरी बात है कि उपभोक्तावाद के बावजूद एक विशाल वर्ग को जीवन यापन की सामान्य चीजें भी हासिल नहीं। बात आगे भी जा सकती है। पहले समय में सपना हमारा अपना था और जब तक ऐसा था कुछ आशा थी लेकिन अब तो सपने भी वे ही बनाते हैं और हम शुद्ध व मिलावट रहित उपभोक्ता हैं – सपनों के भी। हम अपने सपनों की गिरफ्त से बाहर निकलने का प्रयास करते न करते इसके पहले हम दोबारा सपनों के कैदी बन गये – सपने जो हमारे नहीं दूसरों के हैं।

यह तो न था हमारे सपनों का‍ भा‍रत- मात्र एक पिछलग्गू; हमारा वह सपना कुछ संकल्पों, विशेषताओं और अनुभवों पर आधारित था जो समय के प्रवाह में धराशायी होता दिखा। वह पुराना सपना पूरी तरह अभी भूले नहीं हैं बस वही एक कहने भर को धरोहर है हमारी। हाँ पर चिंगारी बुझी न हो तब कुछ आशा की जा सकती है बशर्ते उसे आगे ले जाने की इच्छाशक्ति हो। वर्तमान में एक बार फिर अवसर है हमारे सामने, उस सपने को नये संदर्भ में साकार करने का। साथ ही हमें कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक होगा:

- बहुलतावादी दृष्टि-वैविध्य के प्रति एक सहज स्वीकारी भाव; अपने ही समाज के एक वर्ग को सामाजिक न्याय से वंचित रखने और सर्व स्वीकारी भाव को अपना आदर्श मानने की हिपोक्रिसी से निजात पाना ही होगा। . 

- कुछ सीमा तक एक स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं वस्तुपरक दृष्टि जो आरंभिक चरणों में इस समाज में मौजूद थीं जैसा कि ऋग्वेद के नासदीय सूत्र में स्पष्टतया उदभाषित होता है। यह चिंगारी न बुझे यह प्रयास करते रहना है।

- लोकतांत्रिक प्रणाली का शुरूवाती दौर होने से उन खतरों के प्रति सावधान रहने की अधिक जरूरत होगी जो सस्ती लोकप्रियता पर आधारित हैं और वोट की राजनीति पर आश्रित हैं। होने से हो सकने तक का सफर अभी लम्बा है पर देखना यह है कि हम सही दिशा-निर्धारण भी कर पाते हैं या नहीं।

- हमारे प्रबुद्ध वर्ग की जमीनी स्तर पर अकर्मण्यता शोचनीय है । किसी समाज में विकास-प्रक्रिया सरल रेखीय नहीं होती उसमें उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। पर एक सशक्त और प्रभावी प्रबुद्ध वर्ग उस अलख को जगाए रहता है जो दैनिक जीवन की विडम्बनाओं, राजनैतिक ऊहापोहों और सामाजिक तनावों के बीच भी वैचारिक-विकास-प्रक्रिया को थमने नहीं देता। इस बात की संभावना कम होते भी नगण्य नहीं है और इतिहास पर नजर डालें तो ऐसे उदाहरण मिल जाते हैं जहाँ प्रबुद्ध वर्ग की भूमिका ने जमीनी स्तर पर हालात को प्रभावित करने में सहायता की।

प्रबुद्ध वर्ग की भूमिका: दो उदाहरण

पहला उदाहरण भारतीय भूभाग का लेते हैं। आज से लगभग ढाई हजार साल पहले सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध की त्रासदी से प्रभावित होकर हिंसक विजय अभियानों पर रोक लगा दी और बुद्ध के उपदेशों से प्रभावित होकर अपनी सामर्थ्य का उपयोग देश-विदेश में शांति व स्थिरता के हित में किया। माना कि यह एक सम्राट का निर्णय था और इसलिये प्रभावी हो सका। पर जरा गहराई से देखें तो तो इसमें एक सशक्त प्रबुद्ध समाज की भूमिका भी साफ नजर आती है। उस पुरातन काल में भी बुद्ध की बातों को समझने और जन सामान्य तक ले जाने में जिस सामर्थ्य और संकल्प की जरूरत थी वह हासिल होती रही और सम्राट की बातों को देश-विदेश तक ले जाने में यह भूमिका निर्णायक सिद्ध हुई। राजसी शक्ति और प्रबुद्ध जन की वैचारिक सामर्थ्य का यह तालमेल कारगर हो गया। आज भी भारत के इतर दक्षिण-पूर्वी एशिया में इसके सबूत भरे पड़े हैं।

दूसरा उदाहरण आधुनिक अमेरिकी राष्ट्र का लिया जा सकता है। उन्नीसवीं सदी के मध्यवर्ती दशकों में गृहयुद्ध जिस कारण से लड़ा गया उसमें एक अपेक्षाकृत उदार एवं मानववादी सोच की झलक साफ नजर आ जाती है। यह अभियान संयुक्त राज्य अमेरिका के उत्तर पूर्वी भाग में केन्द्रित था और न्यू इंगलैन्ड कहे जाने वाले इस क्षेत्र में एक सशक्त प्रबुद्ध वर्ग आकार ले रहा था जिसके कुछ प्रणेता भारतीय चिंतन के कतिपय पहलुओं [2, 3] से प्रभावित थे। अमेरिकन ट्रान्सेन्डेन्टल मूवमेन्ट [4, 5] इसी समाज की सोच का प्रतिफल था और किसी सीमा तक इसने आगामी अमेरिकी सोच को दिशा देने में सफलता प्राप्त की। इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि उस देश में आने वाले दशकों में सब ठीक ही होता रहा। लेकिन यह भी ध्यान देने योग्य है कि अमेरिका के सुपरपावर बन जाने पर हालात अपेक्षाकृत उनसे बेहतर ही हुए जो ब्रिटेन, जर्मनी या जापान के संदर्भ में हो सकते थे। सुपरपावर ने अपनी ताकत का दुरुपयोग निहित स्वार्थ के लिये नहीं किया ऐसा कहना असत्य ही होगा पर अन्य संभावित परिस्थितियों में हालात इससे अधिक खराब हो सकते थे।

ये उदाहरण इस बात को इंगित करने के लिये हैं कि एक सीमित संदर्भ में आज का भारतीय प्रबुद्ध समाज अपनी आवश्यक भूमिका निभा सकता है बशर्ते उसमें वह इच्छाशक्ति और संकल्प हो जिसकी उससे अपेक्षा है। यही बात अमेरिका व यूरोपीय देशों के लिये भी कही जा सकती है। प्रबुद्ध वर्ग की ऐसी सक्रिय भूमिकाओं की संभावना कम अवश्य है पर नगण्य नहीं ऐसा मेरा विश्वास है।


एक संभावित भविष्यपथ 

मानव की सांस्कृतिक विकास कथा उसकी उभयचरीय अस्मिता व विसंगतियों की कथा है। यह कथा भौगोलिक व क्षेत्रीय विशेषताओं को प्रतिबिम्बित करती है जो इसके वैविध्य के मूल में है। आज हमारी जानकारी बढ़ी है और हम सांस्कृतिक विकास यात्रा में अब तक तय की गई दूरी एवं उसके मुख्य पड़ावों पर एक नजर डाल सकने की स्थिति में हैं। यह जानकारी हमें आगे का मार्ग व दिशा निर्धारित करने में सहायता कर सकती हे। आने वाले समय में मानव की सांस्कृतिक यात्रा को प्रभावित करने वाली बातों में कुछ नये मोड़ आ सकते हैं जो न केवल उन अंदरूनी दबावों (स्वायत्त-समष्टिपरक द्वैत) का आंशिक समाधान प्रस्तुत कर सकते हैं अपितु एक नई शुरुआत के जनक हो सकते हैं। यह तथाकथित नई शुरुआत वास्तव में उन बाहरी दबावों की वजह से हैं जो धरती के स्व-नियोजी संतुलन [6, 7, 8, 9] को अस्थिर करने में भूमिका निभा रहे हैं। 

जिन अंदरूनी व बाहरी दबावों का जिक्र हुआ है उन्हें समझने के लिये एक सरल उदाहरण लेना उपयोगी होगा। एक विशाल जहाज पर कई यात्रियों के समूह हैं जिनकी अपनी छोटी-बड़ी समस्याऐं हैं। समस्याऐं हर स्तर की व हर किस्म की हैं और उनसे जुड़े तनाव भी हैं। जगह, भोजन व अन्य सुविधाओं पर दबाव है और यह भी आपसी तनावों की वजह है। एक समूह के अंदर आपसी तनाव हैं तो विभिन्न समूहों के बीच भी खींचतान चलती रहती है। तभी अचानक तूफानी हवाऐं चलती हैं और जहाज डगमगाने लगता है यह प्रक्रम कुछ देर चलता है और हवा थमने का नाम नहीं लेती। ऐसे में एक परिवर्तन नजर अता है आपसी मनमुटाव, तनाव एवं रंजिश की जगह अब अस्तित्व के संकट ने ले ली है। एक बड़ी समस्या ने अपेक्षाकृत छोटी घटनाओं का प्रभाव कम कर दिया है।
धरती ही वह जहाज है और इसके जीव ही वे यात्री हैं जो इस पर सवार हैं। आपसी तनाव अपनी जगह हैं लेकिन जहाज की सुरक्षा से संबंधित चिंताऐं प्राथमिकता सूची में पहले हैं। धरती जो करीब साढ़े चार अरब साल पुरानी है उसमें करीब ३ अरब सालों से किसी न किसी रूप में जीव की उपस्थिति रही है जिसकी वजह से उसका वायुमंडल व उसमें आक्सीजन का प्रतिशत, औसत ताप जो शून्य से ५० सेल्सियस के आसपास निरंतर बना रहा है जिसके बिना जीवन अस्तित्व में शायद न आ पाता। लेकिन आज यह संतुलन बदलता नजर आ रहा है और इस पर समुचित ध्यान न दिया गया तब अस्तित्व का संकट आ सकता है।

जिजीविषा-जिज्ञासा का द्वैत आरम्भ में हमारी चर्चा का विषय था यह हजारों साल पहले विद्यमान था आज भी है।उसमें कुछ परिवर्तन दिखाई देता है अब जिजीविषा का सामूहिक प्रक्षेपण हमारी आज की अस्तित्व की समस्या को उजागर करता है और जिज्ञासा के नये आयाम उदभाषित हो रहे हैं। आज जिजीविषा एक इंसान ही नहीं पूरे मानव समाज की भावनाओं को प्रतिबिम्बित करती है जैसा संक्रमण काल के दौरान परिलक्षित हुआ है। दूसरी ओर जैविक विकास की जानकारी के तहत जिज्ञासा पूरे जीव जगत को अपने आगोश में ले लेती है और जीवन से जुड़े द्वैत को एक नये प्रारूप में प्रस्तुत कर रही है। दोनों आज विरोध की स्थिति में दिखायी देते हैं उन्हें पूरकत्व की मुद्रा में स्वीकार करना ही आगे का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

यह काम आसान नहीं होगा पर असंभव भी नहीं। बाह्य जगत की बढ़ती जानकारी के साथ अंतर्जगत की आवश्यक समझ [2, 10] एवं भौतिक परिवेश के साथ वैचारिक परिवेश की गुणवत्ता पर ध्यान देना आवश्यक होगा [11]। इस दिशा में आंशिक सफलता भी उभयचरीय दुविधाओं से निपटने में अधिक कारगर हो सकेगी, इस विश्वास के साथ भविष्यपथ की संभावित रूपरेखा लेकर हमें आगे बढ़ना होगा।

हमने धरती के स्व-नियोजी संतुलन के डगमगाने की बात की है और आने वाले समय में उसपर कुछ ठोस निर्णय लेने आवश्यक हो जायेंगे। धरती के सीमित संसाधन मानव की ७ अरब आबादी की बढ़ती जरूरतें पूरी नहीं कर सकतीं और विकास का यह प्रारूप आगे की यात्रा निर्धारित नहीं कर सकता। विकास एवं प्रगति जैसी अवधारणाओं को पुनर्परिभाषित एवं पुनर्मूल्यांकित करना नितांत आवश्यक होगा और भविष्यपथ ‘बेकनी प्रारूप’ पर आधारित न होकर प्रकृति के साथ संतुलन की भावना पर आधारित होना ही होगा।


संदर्भ:
[1] चन्द्रमोहन भंडारी, उभयचरीय अस्तित्व की कथा: (1) एक विशिष्ट परन्तु अधूरा अभियान, सेतु, मार्च 2022।
[2] चन्द्रमोहन भंडारी, हिमालय और हडसन के बीच – एक आंतरिक भ्रमण-पथ पर, सेतु, जून 2019.
[3] Ralph Waldo Emerson: Collected Poems and Translations, New York: The Library of America, 1994.
[4] Lawrence Buell (ed.) The [[American Transcendentalists, New York, The Modern Library, 2006.
[5] Dale Riepe, The Indian influence in American philosophy: Emerson to Moore, Philosophy East and West, 17: ¼ (1967) 125-137.
[6] Jared Diamond, Rise and fall of the Third Chimpanzee, Vintage, 2002. 
[7] विकास की भूल भुलैया: (1) अंधे युगों की परम्परा, सेतु, फरवरी 2021.
[8] विकास की भूल भुलैया: (2) गाया की सहमती काया, सेतु, अप्रैल 2021.
[9] विकास की भूल भुलैया: (3) गाया संकट और गांधी दर्शन की प्रासंगिकता, सेतु, जून 2021.
[10] Ken Wilber. ‘Up from Eden: Transpersonal view of human evolution’, Quest Books, 1996.
[11] चंद्रमोहन भंडारी, पर्या-दर्शन: पर्यावरणीय समस्या पर गहन चिंतन, सेतु, अक्टूबर 2020.


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