अमर कथाशिल्पी विष्णु प्रभाकर: प्रकाश मनु

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प्रकाश मनु
विष्णु प्रभाकर ने साहित्य की अनेक विधाओं में लिखा, लेकिन प्रथमतः वे कहानीकार हैं और उनका सफल कहानीकार होना ही संभवतः नाटक, उपन्यास, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत तथा अन्य विधाओं में भी उनकी अपार सफलता में सहायक हुआ। विष्णु जी ने जब लिखना शुरू किया, तभी से उनके मन में अपने कहानीकार होने का एक धुँधला सा बिंब था। बचपन में दादी की कहानियाँ सुनते थे, तो उनका मन कल्पना के पंखों पर उड़ने लगता था। कहानी के अलौकिक आनंद का अनुभव उन्होंने तभी किया। लगा, कहानी सुनते हुए हम आसपास की बहुत सारी चीजों से ऊपर उठ जाते हैं। मन मुक्त होकर उसमें बहने लगता है।

बाद में उन्होंने ‘चंद्रकांता’, ‘चंद्रकांता-संतति’ और ‘भूतनाथ’ पढ़ा। ‘किस्सा हातिमताई’ और ‘किस्सा साढ़े तीन यार’ सरीखी पुराने दौर की रचनाएँ पढ़ीं तो किस्से-कहानी की रोमांचकारी शक्ति से परिचित हुए। कुछ आगे चलकर प्रेमचंद को पढ़ा, जैनेंद्र और चंद्रगुप्त विद्यालंकार को पढ़ा तो मन कहानी लिखने के लिए ललक उठा और उनकी सृजन-यात्रा की शुरुआत भी एक कहानी से ही हुई। लाहौर से निकलने वाले पत्र ‘हिंदी मिलाप’ में उनकी कहानी ‘दीवाली के दिन’ छपी थी। वही उनकी प्रकाशित पहली सृजनात्मक रचना थी।

विष्णु प्रभाकर
स्वयं विष्णु जी अपनी कथा-यात्रा के बारे में बताते हुए अतीत की गलियों में झाँकते हैं, तो ऐसे कई रोमांचक क्षण सामने आ जाते हैं, जिन्होंने जाने-अनजाने उनकी कथाकार शख्सियत को गढ़ा था—
“सबसे पहले कहानी लिखने की बात मेरे मन में कैसे उठी, यह तो अब ठीक-ठीक याद नहीं। हाँ, प्रेरणा की बात अवश्य बताई जा सकती है। मेरे परिवार में मेरी माँ पहली पढ़ी-लिखी नारी थीं। यह उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक की बात है। उनके पास पुस्तकों का एक बक्स भी था। उन्हीं को फाड़-फाड़कर मैंने छापे के अक्षरों की महिमा को पहचाना। कुछ बड़ा हुआ तो पिता जी की दुकान पर टोकरे में भरी पुस्तकें खोज निकालीं। वहीं ‘किस्सा हातिमताई’ और ‘किस्सा बीबी मटियारी’ से लेकर राधेश्याम कथावाचक की ‘रामायण’, ‘प्रेमसागर’, ‘सुखसागर’ तक का पारायण किया। वहीं ‘चंद्रकांता’, फिर उसकी संतति, फिर ‘भूतनाथ’ की रोचक कहानियाँ पढ़ीं। पढ़ते-पढ़ते सोचता था, कैसे लिखीं इन्होंने ये किताबें? क्या मैं भी ऐसा लिख सकता हूँ?”

विष्णु जी ने चौथे दशक में नियमित कहानियाँ लिखना शुरू किया। जल्दी ही एक समर्थ कहानीकार के रूप में उनकी पहचान बन गई। पर कई तरह के द्वंद्व और मुश्किलों से भी गुजरना पड़ा। उस समय की अपनी मनःस्थिति और कथायात्रा के शुरुआती चरण के बारे में स्वयं विष्णु जी ने लिखा है—
“एक नवोदित लेखक कहाँ-कहाँ नहीं जुड़ना चाहता। डरते-डरते मैं श्रद्धेय महावीप्रसाद द्विवेदी तक जा पहुँचा, पर वे तो अशक्त हो चुके थे। तब तक मैं प्रेमचंद की ओर मुड़ा। सन् 1932 की बात है। बड़े प्यार से अपना लिया उन्होंने। बताया कि कहानी में वर्णन ही नहीं, संवाद भी आवश्यक हैं। ‘जागरण’ में मेरी रचनाएँ छापी थीं। पर तब मुझे लिखने का समय बहुत मुश्किल से मिल पाता। दो वर्ष बाद जब कुछ गंभीर हुआ तो श्री चंदगुप्त विद्यालंकार का द्वार खटखटाया। पंजाब में ही रहते थे वे। मुक्त मन से मेरी सराहना करते हुए उन्होंने सुझाव दिया कि युग मनोविज्ञान का है, इस बात पर मेरी दृष्टि रहे। चार कहानियाँ भेजी थीं। उन्होंने दो छापीं। फिर पत्रिका बंद हो गई। वे कहानियाँ भी नष्ट हो गईं। 1936 में जब प्रेमचंद की मत्यु हो गई तो शिवरानी देवी उसकी संपादिका बनीं। वे मेरी कहानियाँ ‘हंस’ में निरंतर प्रकाशित करती रहीं।

विष्णु प्रभाकर
“उनके बाद जैनेंद्र जी संपादक हुए। उन्होंने मुझे प्रोत्साहित करने की दृष्टि से लिखा, मुझे तुमसे ईर्ष्या होती है। यह सलाह भी दी कि मैं अपनी कहानियों में भावनाओं की मुलायमियत कम करके परपज के काठिन्य पर जोर दूँ। अज्ञेय ने ‘विशाल भारत’ में मेरी कहानी छापते हुए मुझे सावधान किया था, कि बहुत से व्यक्ति मुझे छोटा जैनेंद समझते हैं। सर्वश्री गुलाबराय, सियारामशरण गुप्त, भगवतीपसाद वाजपेयी और उपेद्रनाथ अश्क जैसे अग्रजों ने मुझे इस तरह सहेज लिया कि जैसे मेरे युग-युग के मीत हों। मेरे शिल्प को रूप देने में इन प्रभावों का बड़ा योगदान है। सहज सरल भाषा मुझे धरती से विरासत में मिली है। ठेठ हिंदी के उस जन्मस्थान पर मुसलिम संस्कृति का बहुत गहरा पभाव रहा है।”
(‘अपनी कहानियों में से गुजरते हुए’ लेख, ‘मैं: मेरी कहानी’, सं. श्रवण कुमार, पृष्ठ 285)

विष्णु जी की सर्वाधिक चर्चित कहानी ‘धरती अब भी घूम रही है’ सन् 1955 में ‘पथिक’ के कहानी विशेषांक में छपी थी। और छपते ही कहानी की धूम मच गई। उसकी पृष्ठभूमि की चर्चा करते हुए वे कहते हैं—
“एक लंबा इतिहास है मेरी कहानियों का। कुछ कहानियाँ बहुत लोकप्रिय हुईं, जैसे ‘धरती अब भी घूम रही है’। यह कहानी सन् 1954 के अंत में लिखी थी और जनवरी 1955 के कहानी विशेषांक ‘पथिक’ में प्रकाशित हुई थी। प्रसिद्ध आलोचकों ने इस कहानी को स्वीकार नहीं किया, लेकिन आश्चर्य यह है कि मैं इस एक कहानी के कारण इतना प्रसिद्ध हुआ, जितना मैं अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘आवारा मसीहा’ के कारण भी नहीं हुआ।”

‘पथिक’ पत्रिका का वह कहानी विशेषांक बहुत चर्चित हुआ। इसलिए कि हिंदी की कथाधारा में पुराने ढंग की कहानी का अंत हो रहा था और एक नए ढंग की कहानी जन्म ले रही थी, यह परिवर्तन की रेखा उस विशेषांक में स्पष्ट रूप से देखी गई। उस विशेषांक में बहुत से दिग्गज कथाकारों की कहानियाँ छपीं। मंटो की ‘टोबा टेकसिंह’, रांगेय राघव की ‘गदल’, उग्र की ‘पवित्रता’ और विष्णु प्रभाकर की ‘धरती अब भी घूम रही है’ कहानियाँ पहली बार छपकर पाठकों के सम्मुख आईं और उनकी जबरदस्त चर्चा हुई। इतना ही नहीं, नए आने वाले कथाकारों में शेखर जोशी, अमरकांत, उषा प्रियंवदा, कमलेश्वर आदि कथाकारों की कहानियाँ भी उस विशेषांक में थीं। बाद में चलकर ये सभी हिंदी के अत्यंत समर्थ और चर्चित कथाकार सिद्ध हुए। 

विष्णु प्रभाकर तथा देवेंद्र सत्यार्थी
इस लिहाज से ‘पथिक’ पत्रिका का कहानी विशेषांक मील का पत्थर ही कहा जाएगा। विष्णु जी के शब्दों में, “इस विशेषांक के साथ एक युग समाप्त हुआ और दूसरे युग का प्रारंभ हुआ।” और निस्संदेह विष्णु जी की कहानी ‘धरती अब भी घूम रही है’ इसी नए युग की आहट लेकर आई थी। इसीलिए हिंदी की सर्वाधिक चर्चित कहानियों में इसकी गणना होती है। इतना ही नहीं, स्वयं विष्णु प्रभाकर के कथाकार की पहचान भी इस कहानी के साथ जुड़ सी गई।

विष्णु प्रभाकर उन कथाकारों में से हैं जो पाठकों के दिलों में बसते हैं। उनकी शक्ति है, दूर-दूर तक फैले पाठकों का स्नेह और प्यार, जिन्होंने उन्हें खूब पढ़ा और सराहा। अपने हृदय के ऊँचे सिंहासन पर बैठाया। असंख्य पाठकों के दिलों में उनके लिए सम्मानपूर्ण स्थान है। पाठक आज भी उन्हें पढ़कर अभिभूत होते हैं और बहुत प्रेम से याद करते हैं। बहुतों को लगता है, विष्णु जी ने तो बिल्कुल उन्हीं की बात कह दी। लिहाजा उन्हें बड़ा कथाकार देश भर में फैले असंख्य पाठकों ने ही बनाया, आलोचकों ने नहीं। इसीलिए आलोचकों की कटुतम समीक्षा से भी वे विचलित नहीं हुए। बड़ी विनम्रता से उन्होंने लिखा—
“मैं यह अवश्य स्वीकार करूँगा कि निश्चय ही मैं कोई बड़ा लेखक नहीं हूँ। बड़ी कटु समीक्षा हुई है मेरी कहानियों की, लेकिन अनेक पाठकों ने उतना ही उन्हें सराहा भी।”

विष्णु जी की विनम्रता सिर माथे। पर वे निश्चय ही हिंदी के बड़े लेखक, बड़े कथाकार हैं, जिन्होंने हजारों लोगों के मन में घुमड़ते भावों को व्यक्त किया। एक बड़ी बात यह भी है कि वे किसी एक जगह टिके नहीं रहे। उनके जीवन, सोच और कहानियों में भी निरंतर विकास नजर आता है। अपनी इस विकास-यात्रा पर स्वयं विष्णु जी ने बहुत खुलकर लिखा है—
“विकास की रेखाएँ बहुत स्पष्ट हैं। भावबोध भी बदलता ही है। प्रारंभ में मैं आर्यसमाज के प्रभाव में आया। फिर गाँधी जी की उँगली पकड़ ली। मैं प्रेम का भूखा था। गाँधी जी प्रेम के अवतार थे। शरत भी प्रेममय थे। शुरू-शुरू में मेरी कहानियों में आर्यसमाज के सुधारवाद का प्रभाव है तो उसके तुरंत बाद देशभक्ति और उदात्त मानवता, जो अहिंसा और प्रेम का ही प्रतिरूप है, मुझे प्रिय रहे। मेरे आंतरिक दर्द के कारण जैनेंद जी के शब्दों में मेरी कृतियों में भावना की मुलायमियत कुछ अधिक है। प्रगतिवाद और समाजवाद का प्रभाव भी मुझ पर है, लेकिन यह भी सच है कि कि इसके बावजूद मैं हदय में ही विश्वास रखता हूँ। मेरा समाजवाद कुछ और नहीं, उदात्त मानवता की खोज का ही दूसरा नाम है। मेरे कहने का ढंग सपाट हो सकता है, इसलिए मेरे आलोचक मुझे सृजक नहीं मानते। मुझे कोई आपत्ति नहीं है, पर उदात्त की तड़प कहीं न कहीं मुझे परेशान किए रहती है। मैं न उन आदर्शों में बँधा हूँ न सिद्धांतों से। बस भोगे हुए यथार्थ की पृष्ठभूमि मे उस उदात्त की खोज में चलता चला जा रहा हूँ।”

छठे-सातवें दशक में हिंदी साहित्य में कई आंदोलन आए और गए। एक भीषण तूफान सा था, जिसमें बहुत सारे मूल्य भरभराकर ढहते नजर आ रहे थे। थोड़े समय के लिए विष्णु जी भी इस प्रभाव में आए, पर फिर जल्दी ही सँभल गए—
“मैं बराबर लिखता रहा और प्रगतिशील आंदोलन से मैं सघन रूप से जुड़ा रहा। मुझे याद है कि काफी हाउस में उन दिनों इन आंदोलनों की बड़ी चर्चा हुआ करती थी। सभी बड़े-बड़े साहित्यकार नाना नगरों में काफी हाउसों की ही देन हैं। कोलकाता, शिमला, लखनऊ, इलाहाबाद और दिल्ली के काफी हाउसों में खोजा जाए तो हिंदी साहित्य का बहुत बड़ा इतिहास मिलेगा। मैं भी निरंतर काफी हाउसों में जाता रहता था। वाद-विवाद भी होते थे। ऐसे ही एक प्रसंग में दिल्ली में जैनेंद जी ने मेरी ओर देखा और कहा, ‘विष्णु, तुम्हारी जिज्ञासा मरती जा रही है।’
“मैं तो काँप उठा। जिज्ञासा ही मर गई तो कहानी कहाँ से आएगी? बहुत सोचने के बाद सामने आया कि जैनेंद जी कह रहे थे कि तुम कहानी लिखने की ओर ध्यान न देकर, आंदोलनों की ओर ध्यान दे रहे हो। उन्होंने मुझसे यह भी कहा था, यथार्थ का अतिक्रमण करने के बाद ही कहानी बनती है।”

और यह सचमुच सुकून की बात थी कि विष्णु जी फिर अपनी वास्तविक जमीन पर आ गए, जिसमें यथार्थ की तीक्ष्णता के बावजूद प्रेम और हृदय का साम्राज्य है और साहित्य उदात्त जीवन-मूल्य, उदात्त सौंदर्य तथा उदात्त मानवता की खोज में व्यग्र नजर आता है।


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विष्णु जी उन बड़े कथाकारों में से हैं, जिन्होंने औरों की तरह सिर्फ लिखा नहीं, बल्कि लगभग अपना समूचा जीवन ही लेखन को समर्पित कर दिया है। और अंतिम समय में बगैर किसी प्रचार या शोर-शराबे के चुपचाप ‘देहदान’ करके उन्होंने साबित कर दिया कि एक लेखक के रूप में उनकी आस्था या सादगी कोई दिखावा नहीं बल्कि अपने एक बड़ी गहराई और क्रांतिकारिता छिपाए हुए थी। ठीक यही बात उनकी कहानियों और समूची लेखक-यात्रा के बारे में कहीं जा सकती है। यों उनकी जीवन-कथा और लेखन-यात्रा दो अलग-अलग चीजें नहीं, लगभग एकमेक हो गई लगती है।

वैसे तो विष्णु जी ने साहित्य की तमाम विधाओं में लिखा है—कहानी, उपन्यास, नाटक, जीवनी, संस्मरण आदि-आदि, और लगभग हर विधा में उन्होंने कुछ नया और मूल्यवान जोड़ा है। पर वे स्वयं मानते हैं कि उनके साहित्य की केंद्रीय धुरी कहानी ही है। कहानी के साथ उनकी कलम खूब खेलती है और साथ-साथ पाठकों को जीवन के विशाल रंगमंच पर तमाम रंगों परिदृश्यों की अंतहीन छवियों के बीच यात्रा के लिए छोड़ देती है।
यह बड़े सुख और संतोष की बात है कि अलग-अलग कालखंडों में लिखी गईं विष्णु जी की संपूर्ण कहानियाँ अब उपलब्ध हैं। आठ खंडों में छपी विष्णु प्रभाकर की ‘संपूर्ण कहानियाँ’ एक मानी में दुर्लभ दस्तावेज ही हैं। उससे कोई छह दशकों में फैली विष्णु जी की कथा-यात्रा से गुजरने का दुर्लभ अवसर हमें मिल जाता है। यहाँ तक कि शुरुआती दौर की बहुत सी अनुपलब्ध कहानियाँ भी फिर से पढ़ने को मिलीं। गौर से देखा जाए तो विष्णु प्रभाकर के एक उदीयमान लेखक से बड़े कथाकार बनने की पूरी कथा भी आठ जिल्दों में छपी इन कहानियों में नजर आ सकती है। इनमें से हर खंड का शीर्षक उनकी किसी कहानी पर है। इस लिहाज से ‘विष्णु प्रभाकर संपूर्ण कहानियाँ’ के इन आठ खंडों के शीर्षक हैं, ‘मुरब्बी’, ‘आश्रिता’, ‘अभाव’, ‘मेरा वतन’, ‘एक और कुंती’, ‘धरती अब भी घूम रही है’, ‘पुल टूटने से पहले’ और ‘जिंदगी एक रिहर्सल’।

कहना न होगा कि जीवन के विविध रंग-रूपों और अनुभवों से संपन्न विष्णु जी की यह कथा-यात्रा हिंदुस्तान के आम लोगों की जिंदगी के कोई छह दशकों का जीवंत इतिहास भी है। पिछले साठ-पैंसठ बरसों में लिखी गई उनकी कोई पौने तीन सौ कहानियों को एक साथ पढ़ने का सुख निराला है। फिर इससे विष्णु जी के कहानीकार की भीतरी परतों को देखने-समझने, उनके कहानीकार के बुनियादी स्वभाव और सरोकारों से परचने और लंबे विकास-क्रम में उसमें आए मोड़ों और तब्दीलियों को देख पाने का सुभीता भी है। दूसरों शब्दों में कहा जाए, तो विष्णु जी का यह विपुल कथा-संसार एक बार फिर से आलोचकों की उपेक्षा और अवहेलना की हदबंदियों के भीतर से अपने सही-सही मूल्यांकन की चुनौती हिंदी साहित्य के दिग्गज आलोचकों के सम्मुख उपस्थित करता है।

यहाँ विष्णु जी के विविधताओं भरे कथा-संसार की संपूर्ण पड़ताल या मूल्यांकन तो संभव नहीं है। पर हाँ, इस बात की परख जरूर की जा सकती है कि कई दशकों में फैली विष्णु प्रभाकर की कथा-यात्रा में ऐसा क्या है जो पुराना होकर भी पुराना नहीं पड़ता और हर पीढ़ी के लेखकों और पाठकों को लगभग एक जैसी कशिश के साथ खींचता है। अगर अधेड़ या युवतर लेखकों को विष्णु जी की कहानियों की खासी रुचि और उत्साह से चर्चा करते देखा जा सकता है, तो एकदम नए और तरुण लेखकों को भी उनकी कहानियों के आलोक-मंडल की ओर खिंचते, उनसे ऊर्जा ग्रहण करते और प्रभावित होते देखा जा सकता है। विष्णु जी की कहानियों में ऐसा क्या है जो कहीं न कहीं हिंदी के दिग्गज आलोचकों की उपेक्षा के बावजूद उन्हें हिंदी के लेखकों और पाठकों का प्रिय पात्र बनाता है? और क्यों उनकी कहानियाँ काल और वय की बाधाओं को तोड़ती हुई, बदलते वक्तों और बदलते हालात में लगातार अपना नवीकरण करती हुई, हरदम ताजा और प्रासंगिक बनी रहती हैं?

इसका जवाब भी कहीं और से नहीं, स्वयं विष्णु प्रभाकर की कहानियों के भीतर से ही मिलता है जो तात्कालिक और समयबद्ध सवालों से जूझते हुए भी, अंतत: मानवता या मनुष्य मात्र के सार्वकालिक सवाल ही उठाती हैं और यों हमें अपने घेरे से बाहर आकर, एक बड़ी आधार-पीठिका पर खड़ा करके, बड़े परिप्रेक्ष्य में चीजों को देखना सिखाती हैं। चाहे प्रेम और स्त्री को लेकर लिखी गई विष्णु जी की दर्जनों कहानियाँ हों या गरीबी और आर्थिक दुष्चक्रों को लेकर लिखी गई करुण और भावना से सीझी हुई कहानियाँ, देश-विभाजन की भीषण त्रासदी को लेकर लिखी गई दुख-हाहाकार भरी कहानियाँ हों या मनुष्य-मन के क्षुद्र कोनों, कमजोरियों और यहाँ तक कि धूर्तताओं को भी उघाड़ती कहानियाँ, विष्णु जी प्रारंभ सदैव एक छोटे लोकेल से करते हैं और कहानी का अंत आते-आते हम एक बड़े परिप्रेक्ष्य में, बड़े सवालों की बेचैनी और मनुष्य पर की एक बड़ी आस्था की रोशनी में खुद को खड़ा पाते हैं।

विष्णु जी की कहानियों की यह विशेषता उनकी कथाकार शख्सियत को एक अलहदा और विशिष्ट पहचान तो देती ही है।


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अलबत्ता विष्णु जी की इन कहानियों को पढ़ते हुए हिंदी साहित्य की इस अजीब सी विडंबना की ओर ध्यान जाता है कि हमारे यहाँ किसी भी बड़े लेखक पर, जिसने अपना पूरा जीवन साहित्य-सृजन में लगाया हो, एक सुविधाजनक लेबल चस्पाँ कर दिया जाता है। और फिर उसका पूरा कृतित्व, पूरी साधना उस छोटे से लेबल की ओट में दब गई लगती है। यह इस जल्दबाज ‘लेबलवादी’ समीक्षा की है विडंबना है कि अकसर विष्णु प्रभाकर को ‘एक भावुक और आदर्शवादी कथाकार’ कहकर छुट्टी पा ली जाती है। और दूसरी ओर उनके संपूर्ण कृतित्व को ‘आवारा मसीहा’ और ‘धरती अब भी घूम रही है’ की कारा में कैद कर दिया गया है।

‘आवारा मसीहा’ निस्संदेह विष्णु जी का एक शाहकार काम है और ‘धरती अब भी घूम रही है’ हिंदी की बीसवीं शताब्दी की सबसे अच्छी और महान कहानियों में से एक हैं जिसने अपने रचना-काल में और बाद में भी पूरे हिंदी साहित्य में एक तरह की हलचल बल्कि सनसनी सी पैदा कर दी कि अरे! कहानी ऐसी भी हो सकती है! निस्संदेह यह एक ऐसी रचना है जिस पर संपूर्ण हिंदी साहित्य को गर्व है, भले ही कुछ बड़े आलोचक इसे अवमूल्यित करने की कोशिश करते रहें। पर पूरी विनम्रता के साथ हमें यह कहना होगा कि ‘आवारा मसीहा’ और ‘धरती अब भी घूम रही है’ कितनी ही महान रचनाएँ क्यों न हों, वे इस बात की हकदार हरगिज नहीं हैं कि एक लंबे काल-खंड में फैले विष्णु जी के संपूर्ण कृतित्व को उनकी ओट में कर दिया जाए।

अगर सिर्फ कहानियों की ही चर्चा करें तो ‘मुरब्बी’, ‘बोधिवृक्ष’, ‘एक और कुंती’, ‘अभाव’, ‘आश्रिता’, ‘कैसी हो मारियम्मा’, ‘जिंदगी: एक रिहर्सल’, ‘पुल टूटने से पहले’, ‘गर्विता’, ‘मेरा वतन’, ‘हरीश पांडे’, ‘सुराज’, ‘एक कहानी का जन्म’, ‘भिखारी’, ‘ताँगे वाला’, ‘अब्दुल्ला’, ‘जीवन एक कहानी’, ‘सच मैं सुंदर हूँ’ जैसी दर्जनों कहानियाँ पढ़ने के बाद मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ यह बात कह सकता हँ कि विष्णु प्रभाकर की लंबी और समृद्ध कथा-यात्रा अपनी कुछेक सीमाओं और कमजोरियों के बावजूद, निरंतर मूल्यांकन और नए सिरे से समझे जाने की चुनौती देती है और उसे ठीक-ठीक समझे बगैर हिंदी कहानी की अचरज भरी विकास-यात्रा पर बात करना संभव ही नहीं है।

बहरहाल विष्णु जी के इस विपुल कथा-संसार से गुजरते हुए बार-बार यह अहसास होता है कि उन्हें भावुक और आदर्शवादी कथाकार कहना या उन्हें महज गाँधीवादी कथाकार कहना, उनके कथाकार के कद को छोटा, बहुत छोटा करके देखना है। विष्णु जी का कहानीकार न सिर्फ खास बोल्ड है, बल्कि यथार्थ पर उसकी पकड़ भी बहुत मजबूत है। और उसे जब जो कहना होता है, वह कहता है। यहाँ तक कि बहुत सी नैतिक मान्यताओं और तथाकथित इनसानी आदर्शों पर वह बड़ी हिम्मत के साथ सवालिया निशान लगाता है। खासकर स्त्री पर जो आदर्श जबरन थोपे गए हैं, उन्हें ध्वस्त और तार-बार करने में विष्णु प्रभाकर का कथाकार बड़े दुस्साहसिक ढंग से रुचि लेता है। इसी तरह जिंदगी की तलछट में उतरकर उसकी असली सूरत दिखाने में उनकी कुछ कहानियाँ इस कदर कामयाब हैं कि एक पाठक के रूप में मेरे लिए यह एक अविस्मरणीय अनुभव है। हालाँकि विष्णु प्रभाकर के कहानीकार की यह एक सहज प्रकृति ही है जिसमें उन्हें कुछ भी असहज नहीं लगता। इसलिए कि नित नया अन्वेषण या नित नए रास्तों की तलाश ही कहानीकार का प्रिय है।

विष्णु जी की कहानी ‘तलाश’ को पढ़ें तो उनके कहानीकार की यह उधेड़बुन साफ-साफ समझ में आती है। इस कहानी के नायक की एक अजब सी मुश्किल यह है कि वह मनचाही मूरत बनाना चाहता था, किसी साँचे में ढली मूरत नहीं। इसलिए कि वह जानता है कि कोई भी अच्छी रचना साँचों को तोड़कर बाहर आती है। साँचों को तोड़ना मुश्किल काम है, इसमें बहुत खतरे हैं। लेकिन साँचों को तोड़े बगैर रचना भी संभव नहीं है। मुझे लगता है, यह परेशानी केवल विष्णु प्रभाकर के कथानायक की ही परेशानी नहीं है, स्वयं विष्णु जी के कथाकार की भी परेशानी है। इसलिए उनकी तमाम कहानियाँ ऐसी हैं जो अपना रास्ता और अपनी भाषा खुद लेकर आती हैं। इसीलिए माफ कीजिए—जैसा मैंने पहले कहा, इन कहानियों को पढ़ते हुए मुझे विष्णु जी केवल गाँधीवादी भावुक कथाकार हरगिज नहीं लगे।

गाँधीवाद में नैतिकता का जो अतिरिक्त पसारा है और सफेद चादर के नीचे न झाँकने की ‘भद्रता’ है, वह यहाँ हरगिज नहीं है। इसीलिए जहाँ कहानी की तलाश का सवाल है, विष्णु जी किसी कीचड़ या दलदल में उतरने से नहीं घबराते। कहानी उनके लिए कुछ इतनी बड़ी चीज, इतनी बड़ी उपलब्धि है जिसके लिए हर खतरा उठाया जा सकता है!

संभवतः इसीलिए विष्णु जी की कहानियाँ सीधे-सीधे पाठकों के दिलों पर असर डालने वाली कहानियाँ हैं। वे हर तबके को अपनी कहानियाँ, अपने कहानीकार की कहानियाँ लगती हैं, मानो हर दुखी का साथ निभाने का वे वादा करती हैं! लेकिन साथ ही जहाँ चोट करने की जरूरत है, वहाँ चोट करने से वे हरगिज नहीं चूकतीं और अपने स्वाभाविक निष्कर्षों की ओर बढ़ती हैं, भले ही वे निष्कर्ष दूसरों को और कहना चाहिए कि ‘अति-नैतिकतावादियों’ और ‘पवित्रतावादियों’ को एक आघात की तरह क्यों न लगें। मसलन विष्णु प्रभाकर की खासी चर्चित कहानी ‘एक और कुंती’ में एक स्त्री की एक स्वतंत्र और मुक्त अवधारणा है। यह नए जमाने की नई कुंती है जो देश-विभाजन के दुखियारे दौर में बलात्कृत होती है। लेकिन फिर एक के बाद वह ऐसे पुरुषों के संपर्क में आती है, जिनके साथ उसका देह का नहीं, मन का भी रिश्ता जुड़ता है।

लेकिन यहीं कुंती की मुश्किलें, उसकी उथल-पुथल और अपमान भरी कथा शुरू होती है। नैतिकता का मोटा लबादा लादे समाज के लिए यह कुंती एक मरी हुई कुंती से भी बदतर है। लेकिन नहीं, यह जो आज की कुंती है, वह इन सारे अपमानों की ‘दुर-दुर’ के बीच भी अविचलित है। वह उन रिश्तों को उसी गरिमा से याद और स्वीकार करती है, मन से जीती है। भले ही उसके पिता और परिवार के लोग उसे पापिष्ठा या कलंकिनी कुछ भी कहें।
ऐसे ही ‘मुरब्बी’ शुरुआती दौर (सन् 1937) में लिखी गई विष्णु जी की एक कमाल की कहानी है, जिसका केंद्रीय चरित्र मुरब्बी बड़ा ही कड़क और जानदार शख्स है। उसकी भाषा, उसका मिजाज, उसकी खीज और झल्लाहट, उसका बात-बात में गालियाँ देने का ठेठ अंदाज, कुछ नहीं भूलता। आप चाहें तो भी नहीं भुला सकते। पर इससे भी बढ़कर है—सख्त, बेहद सख्त कलेवर के भीतर छिपा उसका बहुत-बहुत कोमल मन जो किसी की भी तकलीफ पर इस कदर द्रवित होता है कि तब लगता है, यह मुरब्बी के भीतर का कोई और मुरब्बी निकलकर बाहर आ गया है। पुराने मटियाले रिश्तों का दर्द क्या हो सकता है—और खासकर दोस्ती के रिश्ते का दर्द, इसे मुरब्बी से ज्यादा कोई और नहीं जानता।

जब मुरब्बी के बेटे राधे ने एक गरीब किसान पर नालिश करने का फैसला कर लिया, तो जरा मुरब्बी की यह एकांत बड़बड़ाहट सुन लीजिए—
“ऊहूँ, थारा यारबास है। कहोगे, पूच्छा भी नहीं। पूछकर क्या कर लिया? मुझसे कहलवाना चाहता था। शर्म नहीं आई हराम के खाने वाले को। बाप से भी छल करे, लाला को पता नहीं कि मैं उसे तब से जानूँ हूँ, जब लाला पैदा ही नहीं हुए थे। गरीब किसान खेती करके पेट पाले है, ऐसा यारबास कि झूठ-मूठ भी काम का पता चल जाए तो दिके भगा चला आवे। पार साल गंगा माई चढ़ आई थीं, सब घाट बहा ले गईं। पानी इतना गहरा कि हाथी डूब जए, लेकिन उसने कहा कि साल भर का त्योहार यूँ नहीं छोडे जा, नहान होगा। राम थारा भला करे, मंदर का कुआँ उसी ने अपने हाथों से खोदा था। बोला, वही हाथ अब भी हैं। रही जान की बात, सो हाथ में नहीं, मन में ही...!”

इस पर किसी ने खाना खाने की बात कहीं, तो जरा मुरब्बी के कहने का अंदाज, भाषा और ठसक देखिए—
“क्या कहा? हाँ, हाँ, ले आ। सवेरे का भूक्का हूँ। देख, पराँवठों में अजवाइन डलवा देना और हाँ चूरन लाना मत भूल जाना। अरे मेरे यार, चला जावे है। बात तो सुन लिया कर, दिके मुनक्का खतम हो गई, लेते आना। भूलना मत। अब खड़ा-खड़ा क्या देक्खे है। राम थारा भला करे। जा, दौड़ के जा।”

मुरब्बी के चरित्र के पेंचदार व्यवहार या निजता की मन पर गहरी छाप डालने वाले कहानी के इस रोमांचक अंत की भी यहाँ विस्तार से चर्चा हो सकती है। पर मैं समझता हूँ कि सिर्फ इतना इशारा कर देना ही काफी होगा कि मुरब्बी का बेटा जिस शख्स पर नालिश करता है, खुद मुरब्बी अपने बेटे से छिपाकर उसे चुपके से पैसा दे आता है और नालिश से बचाता है। लेकिन यह बात अंत तक गोपनीय ही बनी रहती है, मुरब्बी के रहस्यमय और कड़क चरित्र की तरह, जिसे कभी पूरा समझा ही नहीं जा सकता।

पाठक खुद यह कहानी पढ़ें तो जान पाएँगे कि सन् 1937 में लिखी गई इस कहानी का मुरब्बी क्या शै है और किस फौलाद या इस्पात का बना है! साथ ही यह भी जोड़ देना जरूरी होगा कि जो कहानीकार अपनी कथा-यात्रा के शुरुआती दौर में ही ‘मुरब्बी’ जैसी पुरजोर कहानी लिख सकता है, उसका अनुभव कितना सघन और रेंज कितनी बड़ी है।

विष्णु जी की कहानियाँ किस तरह उनकी जीवन यात्रा के समानांतर चलती हैं, यह इसी से जाना जा सकता है कि मुरब्बी पात्र में उनके सगे बाबा का कैरीकेचर है, जिनका उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। यहाँ तक कि उन्होंने कहानी में पात्र का नाम तक बदलने की जरूरत नहीं समझी। विष्णु जी से एक बार उनकी कहानियों पर चर्चा हुई तो उन्होंने खुद इस बात का जिक्र किया कि उनके बाबा का नाम मुरब्बी ही था। बचपन में बाबा की बातें सुनकर ही उन्हें जीवन की विविधता का बोध हुआ। बाबा अनुभवों की खान थे और उनकी बातों में जीवन छलछलाता था। इसीलिए उनकी बातें सुनना विष्णु जी को अच्छा लगता था। मुरब्बी नाम से उहोंने नाटक भी लिखा है, पर उन्हें ज्यादा तसल्ली नहीं हुई। इसलिए कि विष्णु जी का कहना है कि वे एक उपन्यास के पात्र है। विष्णु जी भले ही बाबा पर उपन्यास न लिख पाए हों, पर मुरब्बी को उन्होंने एक ऐतिहासिक और कालजयी पात्र जरूर बना दिया है।
‘अब्दुल्ला’ भी ऐसी ही यादगार कहानी है। बूढ़ा अब्दुल्ला दिन भर आम के बाग में बैठा आमों की रखवाली करता रहता है, पर स्कूल के बच्चे आते हैं तो वह जान-बूझकर आँखें बंद कर लेता है। सोचता है, बच्चे हैं, कुछ आम खा लेंगे तो क्या बिगड़ जाएगा? पर बच्चों का हुड़दंग बढ़ा तो एक दिन रहा नहीं गया। अब्दुल्ला को उस स्कूल के हेडमास्टर जी से शिकायत करनी पड़ी। सबसे शरारती बच्चे दीपू को सजा मिली। बेंतों से पिटाई हुई। पर अगले दिन वह फिर अब्दुल्ला के सामने खड़ा था, पूरी अकड़ के साथ। जैसे चुनौती देने आया हो कि लो, फिर से पकड़ो और ले जाओ हेडमास्टर के पास। बेंत लगवाओ। अब्दुल्ला ने उसे प्यार से पुचकारा तो शरारती दीपू जोर से पत्थर मारकर भाग गया। पत्थर बड़े जोर से अब्दुल्ला के घुटने पर लगा। वह घुटना पकड़कर जमीन पर बैठ गया।
जाहिर है, दीपू पर उसे क्रोध था। पर कई दिनों तक दीपू नहीं आया तो वह बेसब्र हो उठा। लगा, कहीं कुछ कमी है। फिर पता चला कि दीपू को तेज बुखार आ गया है। अब्दुल्ला उदास था, बहुत उदास। एक दिन वह बढ़िया-बढ़िया आम एक टोकरे में रखकर डरता-डरता दीपू के घर गया। उस समय की उसकी मनःस्थिति का कैसा भावपूर्ण चित्र विष्णु जी की कलम से उतरा है—
“वह कई दिनों तक लगातार वहाँ आता रहा और उस बंद मकान से निकलने वाले प्रत्येक प्राणी के चेहरे का अध्ययन करता रहा। वह जान-बूझकर किसी के सामने नहीं पड़ा। पर एक दिन वह भाँप गया कि दीपू अब अच्छा हो रहा है। तब उसका दिल रोशनी से भर उठा। अगले दिल उसने चुन-चुनकर बढ़िया अमियाँ टोकरी में भरीं और सीधे उस बंद दरवाजे पर जाकर दस्तक दी। दीपू के एक बाबा जो अब्दुल्ला को अच्छी तरह जानते थे, वहाँ मौजूद थे। इसलिए उसे दीपू के पास तक पहुँचने में कोई कठिनाई नहीं हुई। पर जब उसने दीपू को देखा तो उसके हदय को बड़ी चोट पहुँची। देखा, वह गले तक चादर से ढका पड़ा है, उसका अंगार सा दहकता मुख पीला पड़ गया है, आँखें अंदर धँस गई हैं और उसके सुनहरे लटूरे बाल रूखे-सूखे हो रहे हैं। दीपू ने देखा, देखता ही रहा। सहसा उसकी मानसिक प्रतिकिया का किसी को पता नहीं लगा, पर अब्दुल्ला भाँप गया और बड़ी कठिनता से वह आँसुओं को रोक पाया। उसने हँसते हुए कहा—हैं, हैं, लल्लू, अब ठीक हो? जल्दी ठीक हो जाओ, मैं तुम्हारे लिए आम लाया हूँ, तुम टपके के आम खाते थे न? ठीक होकर जल्दी आना। हैं, हैं, जल्दी आना!”

अब्दुल्ला मुड़ा तो उसकी आँखें पनीली थीं। रुँधे हुए कंठ से उसने दीपू के बाबा से कहा, “कई दिनों से नहीं देखा। सोच्चूँ था, क्या हुआ लल्लू को। मालिक बड़ा मेहरबान है, बड़ा रहीम है। बस, ठीक हुआ समझो।” और तहमत से अपनी गीली आँखें पोंछता हुआ चला गया।...मगर इनसान और इनसानियत की रोशनी क्या होती है, इसे बिन कहे वह पाठकों के दिलों में उतार देता है।

यह कहानी जितनी बार भी मैं पढ़ता हूँ, आँखें भीगती हैं। जो लोग यह जानना चाहते हैं कि अच्छी कहानी क्या होती है, वे ‘अब्दुल्ला’ पढ़ लें, तो मेरा खयाल है, कुछ और जानना बाकी न रहेगा। यहाँ इस बात का जिक्र भी शायद अप्रासंगिक न होगा कि विष्णु जी की कहानी का यह नटखट शरारती दीपू कोई और नहीं, बल्कि हिंदी के एक बड़े कवि देवराज दिनेश हैं, दशकों पहले कवि-सम्मेलनों में जिनकी कविताओं की धूम मचा करती थी। अब्दुल्ला में दीपू के रूप में विष्णु जी ने सुकवि देवराज दिनेश के बचपन को साकार कर दिया।

मुझे याद है, बरसों पहले ‘नंदन’ पत्रिका में इस कहानी को छापने की अनुमति लेने के लिए जब मैंने विष्णु जी को फोन किया, तो उनकी आवाज में सहसा एक उल्लास सा छलछला उठा था। और फिर बड़े तरन्नुम में उन्होंने कहानी से जुड़ा हुआ देवराज दिनेश जी के बचपन का पूरा किस्सा सुनाया तो मैं एकाएक अवाक रह गया था।


[4]

विष्णु जी के यहाँ ऐसी एक नहीं बहुत कहानियाँ हैं, जो परपंरागत कहानी की लीक को छोड़कर अपना अलग रास्ता चुनती हैं। कई बार तो कोई इतनी छोटी सी बात या कोई इतनी नामालूम सी दिखने वाली घटना उनकी कहानी में आकर इतनी बड़ी और अर्थपूर्ण हो जाती है कि हम हैरान और भौचक्के रह जाते हैं। एकाएक यकीन नहीं होता कि अच्छा, कहानी यह भी हो सकती है, या कि अरे! कहानी ऐसे भी बन सकती है!

उदाहरण देना हो तो ‘जीवन एक कहानी’ का जिक्र किया जा सकता है। कहानी का नायक एक लेखक या कहानीकार है। साफ लगता है कि यह विष्णु जी के आत्मकथात्मक कहानी है। नायक सब दिन इस चिंता में पड़ा खुद को तौलता रहता है कि जो थोड़ी सी उसकी आमदनी है, उससे घर के खर्चों को कैसे पूरा किया जाए और फिजूल खर्चों की कहाँ, क्या कतरब्योंत की जाए कि सबकी जरूरतें पूरी हो जाएँ। इतने में एक पुस्तक-विक्रेता उसका नाम पूछते-पूछते उसके घर आ जाता है और आते ही यह शिकायत करता है कि इस शहर में सुरुचिपूर्ण लोग नहीं है जो किताबों की कद्र कर सकें। फिर आग्रह के साथ कहता है कि किसी ने आपका नाम सुझाया है कि आप बड़े लेखक हैं, आप बस किताबें देख भर लीजिए। अगर खरीदना चाहें तो मैं आपको कुछ ज्यादा कमीशन दे दूँगा। यों ना-ना करते भी अपनी घोर कंगाली में लेखक बारह रुपए की किताबें खरीद लेता है और खुद अपनी परेशानी बढ़ा लेता है।

ऐसे ही ‘उलझन में’ कहानी में एक ट्यूशन पढ़ाने वाले अध्यापक के अभाव की कथा है। एक घर के दो बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने में जो पैसे उसे मिलते हैं, उससे उसका गुजारा नहीं होता। अंत में वह तय करता है कि वह यह ट्यूशन छोड़ देगा। यह बात वह बच्चों को बताता है और इसका कारण भी गुस्से में उन्हें बता जाता है। दोनों बच्चे थोड़ी देर तक असहज रहते हैं। फिर वे गुपचुप आपस में बात करते हैं और अंत में परस्पर सलाह करके जो शब्द अध्यापक से कहते हैं, उससे ट्यूशन करने वाला वह अध्यापक थोड़ी देर के लिए तो एकदम सन्न रह जाता है। 
आप जानना चाहते हैं, क्यों? असल में बच्चों ने समस्या का समाधान यह निकाला था कि बीस रुपए उनके पिता ट्यूशन के देते हैं। वे दोनों मिलकर अपने जेब-खर्च से पाँच रुपए और दे दिया करेंगे और फिर अध्यापक से वे पूछते हैं, ‘अब तो आपका खर्च चल जाएगा न!’

बस, कहानी यहीं खत्म हो जाती है। और यह आज से कोई सात दशक पहले लिखी गई कहानी है, जो फिजूल की नाटकीयता से बचकर चलती है। लेकिन आज भी यह कहानी हमें एकाएक स्तब्ध कर देती है। ‘उलझन में’ कहानी इस बात की गवाह है कि अगर कहानीकार के पास दृष्टि बड़ी है, तो वह एक छोटी सी बात को इतने बड़े संदर्भ में रख देता है कि कहानी खुद-ब-खुद बनती है और हमें अपनी करुणा से आप्लावित करती है।

अब विष्णु जी की सर्वाधिक चर्चित कहानी ‘धरती अब भी घूम रही है’ पर थोड़ी बात करें। इस कहानी में भी दो मातृहीन बच्चे हैं, नीना और कमल। दोनों भाई-बहन अपने पिता के जेल जाने की घटना से दुखी और क्लांत हैं। उनके दुख और मुश्किलों की कोई सीमा नहीं। जिन मौसा-मौसी के पास उहें रहना पड़ रहा है, उनका व्यवहार भी दिल तोड़ देने वाला है। कमल छोटा है, नीना कुछ बड़ी और उस किशोर वय बच्ची के भीतर माँ का सा दिल है—
“नीना ने अनुभव किया कि कमल अब रोया, अब रोया। वह विह्वल हो उठी। उसने अपना मुँह उसे मुँह पर रख दिया और दोनों हाथों से उसे अपने वक्ष में समेटकर वह शिशु माँ वहीं लेट गई। बोली वह कुछ नहीं। बस उस स्तब्ध वातावरण में उसे जोर-जोर से थपथपाती रही और वह सुबकता रहा...”

कमल की शिकायतें हैं कि खत्म होने में नहीं आतीं, “जीजी, आज मौसी ने हमें बासी रोटी दी। सारा हलवा प्रदीप और रंजन को दे दिया और हमें बस खुरचन दी। और जीजी, आज दोपहर को हम मौसा जी के कमरे में गए तो हमें घुड़ककर निकाल दिया। जीजी, वहाँ हमें क्यों नहीं जाने देती? जीजी, तुम स्कूल से जल्दी आ जाया करो। जीजी, पिता जी को जेल में क्यों बंद कर दिया? वहाँ पिता जी को रोटी कौन खिलाता है? हम वहाँ क्यों नहीं रहते? प्रदीप कहता था, तेरे पिता जी चोर हैं...!”

फिर वे दोनों भाई-बहन नीना और कमल बिना शब्दों का आशय समझे, अपने भोले भाव में घर को आर्थिक संकट से उबारने के लिए चल पड़ते हैं और अदालत जा पहुँचते हैं। वह अदालत, जिसे न्याय का घर कहा जाता है। मगर वहाँ उनके अबोध मुखों से जो बात निकलती है, उससे जज हक्का-बक्का है और एकबारगी पाठक का हृदय जैसे झनझना सा उठता है। नीना जज के सामने जाकर कहती है, “आपने हमारे पिता जी को जेल भेजा है। आप उन्हें छोड़ दें...!” और कमल का कहना है, “मेरी जीजी खूबसूरत है और आप खूबसूरत लड़कियों को लेकर काम कर देते हैं...!”

कहानी की आखिरी सतरों में एक तीखा व्यंग्य और विडंबना बोध है, जो सीधा पाठकों के दिल में उतर जाता है—
“रटे हुए पार्ट की तरह एक के बाद एक जब वे दोनों इस प्रकार बोल रहे थे, तो न जाने हमारे कथाकार को क्या हुआ, वह वहाँ से भाग खड़ा हुआ। उसे ऐसा लगा, जैसे धरती सूर्य की चुंबक शक्ति से अलग हो रही है, लेकिन ऐसा होता तो क्या हम पुनश्च लिखने को बाकी रहते? धरती अब भी उसी तरह घूम रही है।”

कैसी झिंझोड़ देने वाली कहानी है! और इससे भी बढ़कर दुख और आश्चर्य की बात यह कि हजारों पाठकों ने जिसे दिल से सराहा, उसकी महत्ता को समझने में हिंदी के बहुत से नामी-गिरामी आलोचक असमर्थ रहे।

इसी तरह सन् 1946 में लिखी गई ‘सुराज’ कहानी में विष्णु प्रभाकर सुराज से जनता के हुए मोहभंग की जो करुण त्रासद तस्वीर खीचंते हैं, वह कई दशकों बाद आज भी हमें एकदम सच्ची और प्रामाणिक लगती है। ‘भिखारी’ कहानी में काफी हाउस के एक ‘जीव’ प्रभात के विभक्त व्यक्तित्व की विडंबना है। वह बड़ी-बड़ी बातें करता है। प्रेम का बड़ा दिखावा और नाटक करता है। अपने को विशिष्ट, और जीनियस किस्म का व्यक्ति जताता है। और कहानी का अंत आते-आते उसके चेहरे में स्वत: एक भिखारी का चेहरा उग जाता है। यह तथाकथित आधुनिकता की विडंबना है, जिसकी भीतरी परतों में काफी दयनीयता और सड़ाँध भी है। लेकिन विष्णु जी ऊपर-ऊपर रुकते नहीं है। वे काफी नीचे तह तक जाकर इस छद्म आधुनिकता की धुर्रियाँ बिखेरते हैं। और आश्चर्य नहीं कि यहाँ विष्णु प्रभाकर की भाषा ही नहीं, कहानी कहने का अंदाज भी एकदम बदला-बदला सा है।

यही अंदाज उनकी एक बहुचर्चित कहानी ‘जिंदगी: एक रिहर्सल’ में दिखाई पड़ता है जिसमें मुसकराते चेहरे के बावजूद एक स्त्री की भीतरी टूटन को विष्णु जी इतनी दूर तक जाकर देखते और दिखाते हैं और उसके इतने बारीक से बारीक विवरणों की तह तक जाते हैं कि सचमुच हैरत होती है। सच पूछिए तो ‘जिंदगी: एक रिहर्सल’ कोई कहानी नहीं है, बल्कि एक स्त्री की इतनी बारीकी से खींचा गया एक्स-रे है कि विष्णु जी की इधर की कहानियों में इसे एक बड़ी और यादगार कहानी कहना होगा।

यों सच तो यह है कि स्त्री को लेकर लिखी गई कहानियों का विष्णु जी के यहाँ इतना बड़ा, अकल्पनीय और बेछोर संसार फैला हुआ है कि इन्हें पढ़ते हुए मैं कई जगह चकित हुआ हूँ। स्त्री की कितनी शक्लें विष्णु जी की कहानियों में हैं और वे सब एक-दूसरे से कितनी अलग और भरी-पूरी हैं, यह सोचकर ताज्जुब होता है।

विष्णु जी की कहानियों को पढ़ते हुए जितनी स्त्रियों से हम मिलते हैं—और उनमें ज्यादातर इसी दुनिया की ठोस और सुख-दुख से भरी स्त्रियाँ हैं—इतनी स्त्रियाँ तो मुझे किसी बड़ी से बड़ी ‘नारीवादी’ महिला की कहानियों में भी नजर नहीं आईं। कुछ नाम गिनाने ही हों तो ‘एक और कुंती’ की बहुत बोल्ड और मानवीय कुंती है, ‘सच मैं सुंदर हूँ’ की सरल किंतु जटिल भाभी, ‘जिंदगी: एक रिहर्सल’ की भीतर-भीतर टूटन झेलती रेणुका, ‘पाषाणी’ की सख्त किस्म की डॉ. ऋता, ‘बोधिवृक्ष’ की बहुत-बहुत संजीदा कुन्नी, ‘राजम्मा’ की अपने पति के होते दूसरे पुरुष से प्रेम करने और साफ-साफ यह कहने का साहस रखने वाली राजम्मा, ‘गर्विता’ की राधा, ‘मारिया’ कहानी की सुंदर और उदार मारिया और ‘अभाव’, ‘आश्रिता’, ‘चैना की पत्नी’ जैसी कहानियों की अनगिनत कथा-नायिकाएँ।

इनमें हर कहानी में स्त्री का एक अलग ही रूप है। ‘मारिया’ कहानी में विदेश में दुभाषिए के रूप में मौजूद जिस युवती के खुलेपन को लेखक कुछ और समझ बैठा, कहानी के अंत में उसकी सहज उदारता और मानवीय व्यवहार का सही अर्थ उसे समझ में आया। मारिया ने लेखक के दिए सभी उपहार बड़ी खूबसूरती से वापस कर दिए थे और बिना किसी शिकायत के जो एक छोटी सी बात कही, उससे मन के बहुत सारे जाले साफ हो जाते हैं।

इसके बिल्कुल दूसरे छोर पर खड़ी ‘चैना की पत्नी’ कहानी में छप्पर बाँधने वाले चैना के मर जाने पर उसकी सुंदर पत्नी ने एक दूसरे मर्द के साथ करेवा कर लिया और उसके साथ रहने लगी। न उसने अपने जवान बेटे की चिंता की, न आसन्नप्रसवा बहू की और न दो छोटी-छोटी बेटियों की। पर जब उसका नया मर्द उसके बेटे की जगह फार्म में ठेका लेने के लिए आगे आ गया तो वह सिंहनी की तरह फुफकार उठी कि चैना का छप्पर का ठेका तो उसका बेटा ही लेगा। वह ठेका मंसूख नहीं होगा। यहाँ तक कि नए पति ने गुस्से में उसके चरित्र को लेकर कुछ उलटा-सीधा कहा तो वह उसकी जान लेने पर उतारू हो गई। कहानी का अंत स्तब्ध कर देने वाला है।

चैना का पूर्ण स्वस्थ पर्वताकार शरीर, मदमाता सौंदर्य, उसकी जिद और उसका कर्तव्य-बोध सब कुछ उसे औरों से लग और विशिष्ट बनाता है। चैना स्त्री है, पर इतनी विलक्षण कि उसकी थाह लेना आसान नहीं है। इसी तरह ‘अभाव’, ‘आश्रिता’, ‘राजम्मा’ जैसी कहानियाँ भुलाए नहीं भूलतीं। इन्हें पढ़कर समझा जा सकता है कि स्त्री क्या है और क्या हो सकती है।

अलबत्ता विष्णु जी की इन स्त्री-केंद्रित कहानियों को पढ़कर जाना जा सकता है कि स्त्री मन के कितने छिपे हुए कोने, और स्त्री-व्यक्तित्व के कितने अज्ञात कोण हैं! वे शायद अज्ञात ही रह जाते, अगर विष्णु जी की ये कहानियाँ न लिखी जातीं। और यह कोई कम आश्चर्य की बात नहीं कि विष्णु जी के बृहत् कथा-लोक की कोई आधी से अधिक कहानियाँ सच में स्त्री-मन की ही कहानियाँ है।


[5]

विष्णु जी की कहानियों में विविधता ही नहीं है, उनका कैनवास भी बहुत बड़ा है और बहुत कुछ उसमें समाया हुआ है। पूरी एक दुनिया उसमें साँस लेती है। यही कारण है कि स्वाधीनता-संग्राम, देश-विभाजन और सांप्रदायिकता की समस्या पर विष्णु जी ने जितनी कहानियाँ लिखी हैं, उतनी बहुत कम कहानीकारों ने लिखी होंगी। खासकर सांप्रदायिकता की समस्या पर लिखी गई उनकी कुछ कहानियाँ तो एकदम बेजोड़ हैं। इन कहानियों को पढ़ते हुए लगता है कि विष्णु जी चोट करना जानते हैं और जहाँ चोट करने की जरूरत होती है, वहाँ सीधे-साद लफ्जों में भी कुछ ऐसी मार कर दिखाते हैं कि जिंदगी भर वह चोट, वह मार भूलती नहीं।

उनकी एक ऐसी ही कहानी ‘अधूरी कहानी’ सांप्रदायिकता पर है। मुझे स्वीकार करना चाहिए कि किसी हिंदू की ऊपरी उदारता के अंदर छिपी हुई जो हिंसा और अहम्मन्यता है, उसे उघाड़ने वाली ऐसी कोई दूसरी कहानी मैंने नहीं पढ़ी। बचपन में एक बहुत-बहुत भले गरीब मुसलिम बच्चे ने, जो अपने एक हिंदू सहपाठी के घर ईद की सेवैंया देने गया था, हिंदुओं की इस उदार ‘शाकाहारी’ हिंसा का जो स्वाद चख लिया था, वह बड़े होने पर भी उसे भूलता नहीं। और उसके तरकश में जो बाण विष्णु प्रभाकर ने रखे हैं, वे इतने सख्त, इतने नुकीले, सच्चे और मर्मभेदी हैं कि मुझे लग रहा है कि जब ये पंक्तियाँ लिखी जा रही हैं, वे बाण अब भी मुझे भीतर-बाहर से छेद रहे हैं और उनका जवाब मेरे पास नहीं है।

यह है बहुत सीधी-सादी लगती हुई विष्णु प्रभाकर की कहानियों की असली ताकत। वे ऊपर से शांत, लेकिन अंदर-अंदर बेहद क्षुब्द कर देने वाली और मन में बड़ी हलचल मचा देने वाली कहानियाँ हैं। जो लोग विष्णु प्रभाकर को केवल ‘धरती अब भी घूम रही है’ का कहानीकार मानते हैं, वे अगर खुलेपन से इन कहानियों को पढ़ें, तो उन्हें ऐसी बहुत सी ‘धरतियाँ’ घूमती हुई दिखाई पड़ेंगी और हर धरती एक अलग कीली पर, अलग गति और अलग वेग के साथ घूमती दिखाई पड़ेगी!

विष्णु जी की एक ऐसी ही अद्वितीय और लाजवाब कहानी ‘वह रास्ता’ भी है जिसे उनकी ‘अधूरी कहानी’ का ‘काउंटर पार्ट’ भी कहा जा सकता है। यह कहानी एक जोशीले प्रगतिशील मुस्लिम युवक अमजद की अजीब सी त्रासदी की कहानी है। वह अमजद जो आधुनिक और प्रगतिशील विचारों का खासा क्रांतिकारी किस्म का युवक हुआ करता था, उसे हम बहुत दुख के साथ धीरे-धीरे सांप्रदायिकता की अँधेरी सुरंग में प्रवेश करते देखते हैं, जहाँ जाने के रास्ते तो हैं लेकिन वहाँ से निकलने के रास्ते बहुत कम हैं।

अमजद जैसे जोशीले युवक की यह परिणति एक साथ उदास और त्रस्त कर देने वाली है। और विष्णु जी उसे एक व्यक्ति की पतन-गाथा के रूप में उपस्थित न करके, सांप्रदायिकता की समस्या के एक बड़े सवालिया निशान की तरह हमारे सामने रखते हैं। इसके दूसरे छोर पर है दिल्ली के गरीब ताँगेवाले की कहानी ‘ताँगेवाला’, जिसके ताँगे पर कोई हिंदू बैठने को तैयार नहीं है। सारे दिन बेकार यात्रियों को आवाज देते और गुहार लगाने के बाद वह घर लौटता है तो यहाँ एक सीली हुई गरीबी उसका इंतजार कर रही होती है। उसकी पनीली आँखों में गहरा दुख और उदासी है। साथ ही एक बेपनाह करुणा, जिसे विष्णु प्रभाकर सरीखा कोई उदार कथाकार ही अपने शब्दों में पिरो सकता है।

इसी तरह स्वाधीनता संग्राम के उत्सर्गपूर्ण जज्बात और झंझावातों पर लिखी गई विष्णु प्रभाकर की ‘गर्विता’, ‘हरीश पांडे’, ‘ट्रेन में’ जैसी कहानियाँ हों या देश-विभाजन की पृष्ठभूमि पर लिखी गई ‘मेरा वतन’ जैसी कहानियाँ, विष्णु जी का कहानीकार अपने समय और बदलते वक्तों की नब्ज पर हाथ जरूर रखता है। यहाँ तक कि नक्सलवाद की पृष्ठभूमि पर लिखी गई विष्णु प्रभाकर की कहानी भी पढ़ने को मिल जाती है। यह दीगर बात है कि उसे देखने वाली दृष्टि या ‘आँख’ उनकी अपनी है।


[6]

निस्संदेह विष्णु जी की सभी कहानियाँ एक जैसी उम्दा और प्रभावशाली नहीं है। इनमें कमजोर और अति-भावुकता से ग्रस्त कहानियाँ भी हैं और ऐसी कहानियाँ भी, जो आज पढ़ने पर हमें कुछ निष्प्रभावी सी लगती हैं। लेकिन इसके बावजूद, विष्णु जी की इस लंबी कथा-यात्रा में कहानी के बने-बनाए ढाँचे को अतिक्रमित करके आगे जाने वाली शक्तिशाली और यादगार कहानियाँ इतनी अधिक हैं कि वे विष्णु प्रभाकर को बीसवीं सदी के बड़े और दिग्गज कहानीकारों की पाँत में ला खड़ा करती हैं। हिंदी के बड़े साहित्यकारों ने उनकी कहानियों को सराहा। प्रारंभिक दौर की उनकी कहानी ‘आश्रिता’ पढ़कर जैनेंद्र जी ने लिखा, “कहानी बहुत-बहुत अच्छी मालूम हुई। मुझे ईर्ष्या होती है। इतनी सक्षमता हिंदी में तो देखने को नहीं मिलती...!”

विष्णु जी सीधे-सरल लेखक थे। बनावट न उनके व्यक्तित्व में थी और न कहानियों में। दूसरों पर रोब गालिब करने के लिए वे विचार या चिंतन की किसी भारी-भरकम, उलझाऊ शब्दावली की ओट में छिपना पसंद नहीं करते थे। इस लिहाज से उनकी कहानी लिखने की रचना-प्रकिया भी बड़ी सहज थी। कहानी लिखने के लिए उन्हें कैसा वातावरण चाहिए? किस मनःस्थिति में वे लिख पाते हैं, आदि प्रश्नों पर विचार करते हुए उन्होंने लिखा है—
“अपने लिए कभी कोई विशेष वातावरण नहीं चाहा। चाहने की स्थिति में ही नहीं रहा। साधारण जन, जिसे आम आदमी कहा जाता है, रह भी नहीं सकता। फिर भी वातावरण लेखक को चाहिए अवश्य, पर बाहरी कम, आंतरिक अधिक। जब तक लेखक अपने अंतर में समस्याओं से साक्षात्कार नहीं करता, बालक की तरह पूछे जाने वाले मासूम प्रश्नों से नहीं जूझता, पराई पीर को सहज पीर नहीं बना लेता, तब तक सार्थक सृजन नहीं हो सकता। दिनों-महीनों ही नहीं, कभी-कभी तो वर्षों जूझा हूँ कथानकों से। कई कथानकों से अभी भी जूझ रहा हूँ। पिछले दिनों प्रकाशित मेरी दो कहानियाँ ‘कहानी का जन्म’ और ‘वर्षगाँठ’ दस-पंद्रह वर्ष पूर्व लिखी थीं। इधर ‘नीम की गंध’ शीर्षक से एक कहानी अरसे से दिमाग में चल रही है। इसमें मैं अपने समूचे परिवेश को पकड़ना चाहता हूँ। विशेषकर वह जो पिछले कुछ वर्षों में जिया है।” (‘अपनी कहानियों में से गुजरते हुए’ लेख, ‘मैं: मेरी कहानी’, सं. श्रवण कुमार, पृष्ठ 286)

विष्णु जी ने निरंतर लिखा है और अपनी कहानियों के मूल्यांकन का जिम्मा निस्पृह भाव से आलोचकों और सुधी पाठकों पर छोड़ दिया है। निंदा और प्रशंसा से परे, वे बस लिखने में ही रमे रहे। अपनी संपूर्ण कथायात्रा पर एक नजर डालते हुए वे लिखते हैं—
“मैंने लगभग 300 कहानियाँ लिखी होंगी। अनेक कारणों से कुछ को संग्रहों में देना नहीं चाहा। तेजी से बदलते मूल्यों के युग में कुछ कहानियाँ अर्थ खो बैठी हैं। ...मेरी कौन सी कहानी सर्वश्रेष्ठ है, यह मैं भी नहीं जानता। मेरे लिए सर्वश्रेष्ठ वही होती है, जो अभी लिखी जानी शेष है। समय-समय पर कुछ कहानियाँ मकबूल हुई हैं, पर ‘धरती अब भी घूम रही है’ के बाद जैसे सब कहानियाँ पीछे छूट गईं। ...अग्रजों ने इसे नहीं स्वीकारा, प्रतिष्ठित आलोचकों ने इसकी निंदा की।...फिर भी इस कहानी ने मुझे भी आतंकित कर दिया।” (वही, पृष्ठ 289)

कुछ लोगों का कहना है कि विष्णु प्रभाकर पर शरत का प्रभाव है। पर इससे एक बड़े लेखक के रूप में उनका कद और सम्मान कम नहीं हो जाता। स्वयं विष्णु जी बड़ी स्पष्टता से कहते हैं—
“आलोचक कहते रहे हैं कि मुझ पर शरतचंद्र का प्रभाव है। मैंने भी स्वीकार किया है कि मेरे परिवेश के वे ही सबसे अधिक पास हैं। उनसे मैंने सबसे अधिक पाया है। औरों से भी पाया है। प्रेमचंद, रवींद्र, तालस्ताय, गोर्की—इन सभी से कुछ न कुछ पाया है, पर यह पाना अपने को खोना कभी नहीं रहा।”

कहना न होगा कि विश्व के जितने भी बड़े साहित्यकार हैं, वे सभी कहीं न कहीं से प्रेरणा ग्रहण करते हैं, पर लिखते समय अपनी आत्मिक ऊर्जा से वे उसे अपना बना लेते हैं और अपने अद्वितीय भाषा-शिल्प में एक बिल्कुल अलग काट और चमक के साथ व्यक्त करते हैं। सृजनात्मक सत्य हो या सौंदर्य, वह इसी तरह पुनर्नवा होता है। फिर सबसे बड़ी बात तो यह है कि विष्णु जी की कहानियाँ सीधे-सीधे आज के जीवन महाभारत से निकली हैं। शायद इसीलिए आत्मिक सत्य से स्वतः स्फूर्त होने के बावजूद वे एक बड़े सामाजिक सत्य की वाहक लगती हैं। उनके आईने में निरंतर बनते-बिगड़ते और बहुत कुछ खोकर, समय के साथ आगे बढ़ते भारतीय समाज की सूरत देखी जा सकती है।

सच तो यह है कि विष्णु प्रभाकर सिर्फ एक बड़े कथा-लेखक ही नहीं, वे एक ऐसे महारथी हैं जिनकी रचनाएँ बीसवीं सदी के मनुष्य और समाज को भीतर से देखने की ‘आँख’ भी देती हैं। काश, हममें आँखें खोलकर उन्हें पढ़ने का साहस होता!
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प्रकाश मनु, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008
चलभाष: 9810602327,
ईमेल: prakashmanu333@gmail.com

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