आत्मकथा-अंश: कुछ सतरें पिता के बारे में

प्रकाश मनु

प्रकाश मनु

पिता के बारे में लिखते हुए उनकी पठानों जैसी कद-काठी और छवि आँखों में तैर रही है। वे बिल्कुल पठानों जैसे ही थे। सफेद कुरता, सफेद धोती और सिर पर सफेद रंग का ही पग्गड़...! बड़ी-बड़ी और शानदार मूँछें, जिनमें बाद में चलकर तो पूरी सफेदी उतर आई थी। और थोड़ी प्रशांति भी। उनकी यह धज देखते ही बनती। खूब गोरे रंग के, पर चेहरे पर ऐसी लाली कि किसी को भी रश्क हो। कमलेश दीदी कभी-कभी हँसकर कहतीं, “चंदर, हमारे पिता तो बिल्कुल पृथ्वीराज कपूर जैसे हैं!” सुनकर मुझे भी मजा आ जाता। सचमुच बहुत कुछ उनकी धज और चेहरा-मोहरा भी पृथ्वीराम कपूर से मिलता था। कोई एक बार देखे तो भूलना मुश्किल। उनका रोबदाब भी कुछ वैसा ही था।

यों यह धज उनकी तब होती थी, जब उन्हें विशेष रूप से किसी से मिलने या किसी विशेष आयोजन में जाना होता था। नहीं तो पगड़ी सामान्यतः वे नहीं पहनते थे। और कुरता भी ज्यादा देर तक उनसे नहीं झिलता था। घर से चक्की पर जाते तो कुरता पहनकर और वहाँ जाते ही कुरता उतार देते थे। और फिर उनकी सदाबहार पोशाक बनियान-धोती दिन भर उनका साथ देती। घर लौटते समय फिर वे कुरता पहन लेते।

कुरते के नीचे घर की बनी सफेद मलमल या किसी और मुलायम कपड़े की बनी बनियान ही वे अकसर पहनते थे, जिसकी बाँहें छोटी होती थीं और उसमें एक जेब बाहर, दूसरी अंदर की ओर गई गहरी जेब होती थी। इसे वे चोर जेब कहते थे, जिसमें रुपए-पैसे वगैरह रखते थे। बाहर की जेब में यों ही लिखत-पढ़त की छोटी-मोटी कुछ चीजें, या कोई कागज वगैरह। बनी-बनाई जो बनियान बाजार से मिलती है, वह उन्होंने कभी नहीं पहनी। यहाँ तक कि हमारे लिए तो यह कल्पना भी मुश्किल थी कि पिता उन्हें कभी पहनेंगे। इसके बजाय वे खुद पतले, मुलायम कपड़े की बनियान बनवाते थे, जिसकी बनावट बड़ी सादा सी थी और जो खुद एक छोटी कुरती सी लगती थी। सर्दियों में इसकी जगह कुछ मोटे कपड़े की बनियान आ जाती।

यही घर की बनी बनियान और कोई ढाई गज वाली लुंगी की तरह लपेटी जाने वाली सफेद उजली धोती या पंछा, यही सामान्यतः उनकी पोशाक थी, जिसमें वे अकसर नजर आते। पर इस सादा सी पोशाक में भी वे खासे जँचते थे और उनके चेहरे की ललछोंही आभा उनके व्यक्तित्व को प्रभावपूर्ण बना देती थी।

अब लिखने बैठा हूँ तो बहुत सी बातें पिता और उनकी आदतों को लेकर तत्काल याद आ रही हैं। यादों की झड़ी सी लग गई है। पर साथ ही लगता है, कि शायद पिता के बारे में लिखना आसान नहीं है। माँ के बारे में लिखना जितना सीधा-सरल है, पिता के बारे में लिखना उतना ही जटिल और मुश्किल काम है। इसलिए कि माँ की तुलना में पिता का व्यक्तित्व भी जटिल था। माँ को जिस तरह से ‘ममता और वात्सल्य की मूरत’ कहता हूँ, पिता को उस तरह से स्नेह और प्यार की मूरत तो नहीं कह सकता। ऐसा नहीं कि पिता ने हमें प्यार न किया हो। पर हिंदुस्तानी घरों में धन कमाना शायद अब भी पुरुष का—स्त्री का नहीं, पुरुष का—पहला पुरुषार्थ है। वह कई बार उसे संतान का मन समझने में असमर्थ बना देता है और माँ के निकट आकर बेटे या बेटी का मन पूरी तरह खुलता है। वही समझ पाती है कि उसकी संतान के भीतर क्या कुछ चल रहा है और उसकी खुशी या फिर उसे सही राह पर लाने के लिए क्या किया जा सकता है।

पिता यहाँ अकसर असहाय ही साबित होते हैं जो अकसर बाहर ही बाहर रह जाते हैं और संतान की भीतरी दुनिया की हलचल से वाकिफ नहीं हो पाते। उन्हें अकसर बच्चों को जन्म देने वाली अपनी जीवन-सहचरी के जरिए ही बच्चों के मन और उनकी जिदों को समझना होता है।

मुझे लगता है कि जैसे पहले कबीलाई संस्कृति में वीर और बहादुर व्यक्ति जमीनें जीतने में लगे रहते थे। यानी आक्रमण करो और जीतो, यही उनका पहला पुरुषार्थ था। बाद की अर्थ-संस्कृति में वही जीतना धन कमाना हो गया। इसीलिए आधुनिकता के आने के साथ-साथ बहुत कुछ बदला, पर पिता का कबीलाई चरित्र, रूखा और सख्त चेहरा नहीं बदला। वह अब धीरे-धीरे बदल रहा है, हालाँकि बदलते-बदलते भी अभी शायद उसे सदियाँ लगेंगी!

अलबत्ता माँ से हम जितने खुले हुए थे या जैसी निकटता महसूस करते थे, वैसी न जाने क्यों पिता के साथ नहीं थी। बचपन से ही हम उनसे बात करते डरते थे या कहिए कि बीच में हमेशा एक दीवार जैसी महसूस करते थे। और हमें सुभीता इसी में नजर आता था कि पिता से जो कहना है, वह माँ की मार्फत कहा जाए। मानो माँ जो कुछ हम सोचते या चाहते हैं, उसे इशारे भर से जान जाती थीं और यह भी जानती थीं कि पिता से उसे कैसे पास कराना है।

माँ जितनी सरल स्नेहमयी थीं, पिता उतने ही जल्दबाद और गुस्सैल। पिता ने, याद पड़ता है कि हमें कभी नहीं पीटा, पर फिर भी जाने क्यों हम पिता के गुस्से से बहुत ज्यादा डरते थे। उसकी एक आधी वास्तव, आधी कल्पित तसवीर हमारे जेहन में हर वक्त रहती थी और वह कभी धुँधलाती न थी। यहाँ तक कि कई बार जब हम माँ के काबू में न आते थे, तो माँ को भी हमें डराने के लिए उसका इस्तेमाल करना होता था। और वे कुछ गुस्से में, कुछ हँसते हुए कहती थीं, “आण दे तेरे भाइए नूँ, मैं दस्साँगी।” (आने दो तुम्हारे पिता जी को, मैं उन्हें बताऊँगी।)

“भाइए नूँ...!” यानी भाइया जी को। पिता जी को हम सब भाई-बहन ‘भाइया जी’ ही कहते थे। पिता जी नहीं, भाइया जी, जो कभी-कभी जल्दी में ‘भाई जी’ भी बन जाता था। पर मूलतः था वह भाइया जी ही।...‘भाइया जी’ पंजाबी शब्द है। इसका हिंदी समानार्थक शब्द ढूँढ़ूँ तो वह होगा भाई, या फिर भाई सरीखा। मैंने कुछ और लोगों के परिवार में भी देखा है। पुराने समय में वहाँ पिता को पिता नहीं, ‘भाई जी’ या फिर ‘चाचा’ कहा जाता था। पिता को सीधे-सीधे पिता कहना जैसे अच्छा न माना जाता हो।

रामविलास शर्मा की ‘घर की बात’ में ऐसे कई प्रसंग हैं। उनके बेटे-बेटियाँ उन्हें चाचा ही कहते थे। रामविलास जी के भाई मुंशी जी के बेटे-बेटियाँ भी उन्हें चाचा ही कहते हैं।...एक कारण यह भी हो सकता है कि संयुक्त परिवारों में पिता अपने बच्चों को अतिरिक्त लाड़ करे, यह अच्छी बात न थी। दूसरे सब तो प्यार करें, पर पिता कुछ दूर ही रहे। तो पिता को घर में बाकी सब बच्चे जैसे संबोधित करते थे, उनकी अपनी संतानें भी वैसे ही संबोधित करने लगती थीं। इसीलिए अपने बच्चों के भी वे पिता न रहकर, भाई जी या चाचा हो जाते थे।

मुझे लगता है, संयुक्त परिवारों वाला यह ‘भाइया जी’ पारंपरिक रूप से तब भी चलता रहा, जब शुरू-शुरू में संयुक्त परिवारों में अलगाव हुआ। बाद की पीढ़ी में यह संबोधन ‘भाइया जी’ संभवतः पिता में बदला होगा। पर पिता होते ही, आधुनिकता की मार से वह बड़ी जल्दी डैडी या पापा हो गया।...पर हमारे भाइया जी तो भाइया जी ही थे। इसके अलावा कोई और संबोधन उनके लिए सटीक ही नहीं लगता।


[2]

पिता ऐसा नहीं कि प्यार न करते हों। बचपन की स्मृतियों को खँगालता हूँ तो पिता को हमेशा थैले भर-भरकर घर में कुछ न कुछ लाते देखता हूँ। कभी ढेर सारी जलेबी और इमरतियाँ, कभी संतरे, खरबूजे, तरबूज, अंगूर, केले, अमरूद और भी ढेर-ढेर-सी चीजें। सर्दियों में कड़-कड़ बजती रेवड़ियाँ और गजक। सुबह-सुबह जब वे नहा-धोकर मंदिर जाते, तो लौटते हुए एक बड़े से अखबारी लिफाफे में आधा किलो गरमागरम जलेबियाँ लाना न भूलते। वे इतनी रसदार और इतनी बढ़िया सिंकी हुई जलेबियाँ होतीं कि उनका स्वाद मैं अब भी भूला नहीं हूँ।

इसी तरह आम या खरबूजों का मौसम आता तो वे दो-चार किलो से कम आम, खरबूजे कभी न लाते। हम लोग जी भरकर उनका आनंद लेते। खासकर चूसने वाले आम तो बचपन में जितने खाए, उतने बाद में कभी नहीं खाए। इसी तरह तरबूज उन दिनों बहुत बड़े-बड़े होते थे। जिस दिन पिता जी तरबूज लेकर आते, वह दिन किसी उत्सव सरीखा होता था। पहले तो ठंडे पानी की बालटी में उसे घंटों ठंडा होने के लिए रखा जाता। फिर शाम को माँ उसे काटकर हम सबको देतीं, तो सब एक साथ उसका आनंद लेते। ऐसे क्षणों में पिता जी के लाए तरबूज का आनंद कई गुना बढ़ जाता था।

यों सच पूछिए तो पिता ने हमें कभी किसी चीज की कमी नहीं महसूस होने दी। लेकिन पिता ने कभी हमें अपनी छाती से नहीं चिपकाया, कभी भाव-विभोर होकर मीठे बोल नहीं बोले। यह सब देखकर माँ कभी-कभी चिढ़कर कहा करती थीं, “तुम्हें तो बस पैसा कमाना आता है। बाकी तुमने कुछ सीखा भी है?”

हालाँकि पिता का प्रेम-प्रदर्शन का एक तरीका भी था। हमारी कोई अच्छी बात जानकर या हमारी किसी सफलता के बारे में सुनकर उनकी आँखों में एक तरह की चमक उभरती थी, मूँछें फड़कने लगती थीं और आवाज भी कभी-कभी गद्गद हो जाती थी या फिर काफी मुलायम। सिर गर्व से कुछ तन जाता था, और हम उसी से जान जाते थे कि पिता को यह अच्छा लगा है। बहुत छुटपन का एक प्रसंग याद आता है। पिता को एक बार बहुत लाड़ आया, तो ढेरों छेद वाले निक्के पैसों की माला बनाकर उन्होंने मेरे गले में पहना दी थी। फिर इसी रूप में मुझे घर भिजवाया। किसी नौकर को शायद साथ भेजा था। मैं इसी अनोखी धज में घर पहुँचा तो माँ देखकर पहले तो हैरान हुईं, फिर लाड़ से भरकर बलैयाँ लेती हुई बोलीं, “वेखो नी वेखो, ए आया मेरा राजा पुत्तर...!” (देखो री देखो, यह आया मेरा राजा बेटा!)

ऐसे ही माँ ने बताया कि मैं बचपन में मिट्टी बहुत खाता था। इसीलिए मेरे पेट में कीड़े, जिन्हें पंजाबी में ‘मलप्प’ कहते हैं—बहुत हो गए थे। हमारे घर का ज्यादातर हिस्सा तब कच्चा था। कमरों में फर्श न थे। तो भला मैं मिट्टी खाने से कैसे रुक सकता था? आखिर माँ ने पिता से कहा, “जैसे भी हो, फर्श तो बनवाना ही पड़ेगा। नहीं तो लड़का बीमार पड़ जाएगा।”

यह कठिन दौर था। देश-विभाजन के बाद विस्थापित होकर पिता कुछ अरसा पहले ही आए थे, और जीवन-यापन के लिए कठोर संघर्ष कर रहे थे। बहुत कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी, तब घर में चार पैसे आते थे। पर मैं मिट्टी न खाऊँ, इसलिए आर्थिक मुश्किलों के उस दौर में भी पिता ने मेरे छुटपन में, बाकी सारे झंझटों और व्यस्तताओं को परे रख, सबसे पहले घर के कमरों में फर्श बनवाए। यह भी पिता द्वारा अपनी संतान के लिए प्रेम-प्रदर्शन ही था, लेकिन मूक प्रेम-प्रदर्शन।

पिता जी एक तरह के कर्मयोगी थे। मानो काम करना ही उनके जीवन की सबसे बड़ी पूजा हो। बगैर काम किए कैसे रहा जा सकता है, उन्हें समझ में नहीं आता था। उनका प्रतिदिन का नियम यह था कि सुबह-सुबह उठकर थोड़ा घूमने जाते और दातुन करते। नीम का दातुन उन्हें बहुत प्रिय था। बचपन में उनके कहने पर हम लोगों ने भी बहुत किया। बड़े हुए तो घर में टूथपेस्ट आ गया। पर पिता को कहीं से अच्छे, ताजा दातुन मिल जाते तो जोर देकर कहते, “रोज पेस्ट करते हो, आज दातुन करो। इससे पूरा मुँह साफ होता है और पेट भी हलका हो जाता है।” हमें उनकी बात माननी पड़ती। और सच पूछिए तो बचपन में दातुन करने में मुझे भी बहुत आनंद आता था। फिर इसमें पिता की भी खुशी शामिल होती तो यह आनंद और बढ़ जाता था।

रोज दातुन करने में कोई आधा घंटा तो वे जरूर लगाते होंगे। इसका परिणाम यह हुआ कि सौ बरस की उम्र में जब वे गए, उनके ज्यादातर दाँत सही-सलामत थे। दातुन के बाद फिर नहाते-धोते और नाश्ता करके चक्की पर चल देते थे। कोई सात बजे चक्की खुल जाती। यों तो उसमें तेल का एक बड़ा एक्सपेलर भी था और रूई की मशीन भी। पर कहलाती वह चक्की ही थी।

चक्की पर पहुँचकर ताला खोलते ही वे सुबह-सुबह लोटा भरकर पानी छिड़कते। फिर झाड़ू-बुहारी करके बाहर वाले थल्ले यानी चबूतरे पर गोबर लीपना। फिर धूपबत्ती जलाकर संक्षिप्त पूजा, और उस धूप को भीतर-बाहर ले जाकर वातावरण को पवित्र करना। उसके बाद ही वे कोई और काम करते।

पिता जी को अपने हाथ से काम करने की आदत थी। बल्कि एक खास तरह का आनंद आता था। खुद कुछ निर्मित करने का आनंद। एक बार, मुझे याद है, मुझे साथ लेकर उन्होंने घर के सामने वाले चौक में मेरे लिए छोटी सी चारपाई, जिसे पंजाबी में ‘पघूड़ा’ कहते हैं और हिंदी में पालना, वह बुनी थी। कभी धूप तेज हो जाती तो वे चौक के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में आ जाते, जहाँ छाया होती। पर चारपाई का बुनना निरंतर जारी था। यों थी तो वह चारपाई ही, कोई पालना नहीं, पर बच्चे की चारपाई को ‘पघूड़ा’ ही कहा जाता था। एक सिरे पर पिता जी, दूसरे पर मैं। कोई तीन-चार घंटे तो लगे होंगे, पर ऐसी बढ़िया चारपाई बनी कि मुझे अब भी याद है। बुनने के बाद पिता जी ने दौन डालकर उसकी दौन कसी और मुझे भी इसका सही तरीका समझाया। उसके बाद मैं खुद घर की चारपाइयों की दौन कसने लगा।

एक बात और उन्होंने सिखाई, कि अपने काम में शर्म कैसी? आदमी को स्वाभिमानी होना चाहिए। लेकिन उसे मेहनत में शर्म नहीं करनी चाहिए। खूब मेहनत करो, पर किसी से माँगो नहीं, किसी के आगे सिर न झुकाओ। यही उनकी नजरों में स्वाभिमान था। मेहनत करने से स्वाभिमान पर चोट नहीं आती, दूसरों के आगे हाथ पसारने से स्वाभिमान पर चोट पड़ती है और आदमी को जिंदगी भर इस चीज से बचना चाहिए।

शायद इसी बात का असर रहा होगा कि घर के छोटे-बड़े कई काम मैं बड़े शौक से करता था। उन दिनों गैस का चूल्हा तो आया नहीं था, चाय वगैरह के लिए जब-तब स्टोव से काम ले लिया जाता था। पर सुबह-शाम खाना बनाने के लिए अँगीठी का इस्तेमाल होता था, जो एक बार गरम होने पर देर तक चलती थी। अँगीठी में पक्के कोयले जलाए जाते थे, जो जल्दी आँच नहीं पकड़ते थे। उऩ्हें सुलगाने के लिए जतन करना पड़ता था। तब कली भाभी मुझे एक पंखा या गत्ते का टुकड़ा पकड़ाकर कहती थीं, “चंदर, जरा जल्दी से अँगीठी तो सुलगा दो।”

अँगीठी को वे हमारे घर के सामने वाले चौक में रख देती थीं। मैं वहीं बैठकर जोर-जोर से पंखा करता तो दस-पंद्रह मिनट में अँगीठी सुलग जाती थी। इस बीच कोयलों से खूब सारा काला, कड़वा धुआँ निकलता था, जो पंखा फटफटाते हुए आँखों में जाता था। पर फिर भी मैं यह काम बड़े शौक से करता था। क्योंकि आखिर इसी अँगीठी पर तो घर भर का खाना बनना होता था।

अँगीठी में पक्के कोयले डालने से पहले थोड़ी सी लकड़ी की खपचियाँ भी डालनी होती थीं। वे जल्दी आँच पकड़ लेती थीं और फिर उनके सहारे ही थोड़ी देर में कोयले भी सुलग उठते थे। पर परेशानी यह थी कि घर में खपचियाँ तो हमेशा मिलती नहीं थीं। कई बार इसके बजाय लकड़ी के मोटे लट्ठे या गाँठें होती थीं। उन्हें कुल्हाड़ी से फाड़कर छोटी-छोटी खपचियाँ बनानी होती थीं। हमारे घर में एक अच्छी सी कुल्हाड़ी भी थी। मैं उस कुल्हाड़ी से लकड़ी के मोटे लट्ठों और गाँठों को काटकर छोटी-छोटी खपचियों में बदल देता था और फिर वे कई दिनों तक काम आ जाती थीं। कुल्हाड़ी से लकड़ी कैसे काटनी है और अपने पैर को बचाते हुए, लकड़ी को कैसे पतली-पतली खपचियों में बदलना है, यह कला भी पिता जी ने ही सिखाई थी और मैं जल्दी ही इस कला में पारंगत हो गया।

मैं थोड़ा बड़ा हुआ, छठी क्लास में आया, तो पिता जी ने एक काम और मेरे जिम्मे लगा दिया। बुधवार बाजार की साप्ताहिक छुट्टी का दिन होता। उस दिन चक्की बंद रहती और वे घर पर ही होते थे। मैं स्कूल से आता तो वे मुझे पास बैठा लेते, नाते-रिश्तेदारों को चिट्ठियाँ लिखवाते। पहले तो हफ्ते भर में जो चिट्ठियाँ आती थीं, वे उन्हें फिर से बाँचने के लिए कहते। फिर पोस्टकार्ड या अंतर्देशीय पर हर चिट्ठी का जवाब लिखवाते। पिता जी के सगे भाई-बहन तो थे नहीं। चाचा-ताऊ के बेटे थे। मेरे वे सब चाचा ही लगे। चाचा मुल्कराज और सोनामल। वे पंजाब के यमुनानगर में रहते थे, जो बाद में हरियाणा में आ गया। परस्पर हालचाल जानने या सुख-दुख की खबर के लिए उन्हें चिट्ठियाँ लिखी जातीं। इसी तरह देहरादून में कौशल्या मौसी जी थीं, जिन्हें माँ शल्ली कहकर पुकारती थीं। माँ की वही एकमात्र बहन थीं, उनसे कुछ बरस छोटी। तो मौसी जी और मौसा जी को भी खत लिखकर राजी-खुशी ली जाती। 
उन दिनों टेलीफोन तो थे नहीं। और वे मोबाइल जो आज घर-घर दिखाई पड़ते हैं और हर कान से चिपके नजर आते हैं, उनकी तो कोई दूर-दूर तक कल्पना नहीं कर सकता था। चिट्ठी ही हाल-चाल जानने का एकमात्र जरिया थी और उसमें भी पोस्टकार्ड ही ज्दादा लिखे जाते। विस्तार से कुछ लिखना होता तो अंतर्देशीय काम आते। अभिवादन के बाद, “यहाँ सब राजी-खुशी हैं और वहाँ भी ईश्वर की कृपा से सब नेक चाहते हैं।” यह पहला वाक्य लिखा जाता था, जिसे मैं बिना बोले झटपट लिख लेता। फिर “आगे खबर यह है कि...” के साथ आगे चिट्ठी चलती।

पिता जी बोल-बोलकर मुझे लिखवाते थे। फिर आधी चिट्ठी हो जाती तो कहते, “पुत्तर, पहले इतना ही सुना दे।” मैं सुनाता तो उनके चेहरे पर हलका संतोष दिखाई देता। वे कुछ सोचकर आगे की बात लिखवाते। और अंत में “सब छोटों को प्यार और बड़ों को राम-राम!” इसके लिए जगह रखनी पड़ती। इसलिए कि कभी-कभी छोटे-बड़ों में कुछ के नाम भी लिखवाए जाते।

माँ घर के कामों में लगी होतीं, पर एक कान उनका भी इधर ही लगा होता। तो बीच-बीच में वे भी कोई एकाध बात जुड़वा देतीं। पूरी चिट्ठी लिखवाने के बाद पिता जी एक बार फिर सुनते। कहते, “कुक्कू, अब जरा पढ़कर सुना दे।” चिट्ठी सुनकर उनके चेहरे पर अपूर्व संतोष छा जाता, जैसे दूर बैठे रिश्तेदारों से उन्होंने बातें कर ली हों। सबके पते उन्हें मौखिक याद थे। कभी-कभी भूलने पर कृष्ण भाईसाहब इसमें मदद कर देते। उन्होंने एक कॉपी में रिश्तेदारों के पते लिख रखे थे। वही हमारी संक्षिप्त, बहुत संक्षिप्त सी डायरेक्टरी थी।

पिता जी ने एक काम और मेरे जिम्मे लगाया, हर बृहस्पतिवार को उन्हें और माँ को बृहस्पतिवार की कथा सुनाने का। मुझे याद है, शुरू में तो हमारे यहाँ बस ‘ओम जय जगदीश हरे...’ वाली सीधी-सादी आरती ही होती थी। या फिर एकादशी आदि के व्रत, जिनके लिए किसी लिखित कथा की जरूरत न थी। फिर न जाने कब बृहस्पतिवार की कथा शुरू हुई और उसे सुनाने का जिम्मा मुझ पर आ गया। मोटे अक्षरों में छपी उस कथा में एक के बाद एक कई घटनाएँ हैं। मुख्य कथा है एक व्यापारी की, जिसे बृहस्पतिवार की कथा और उसके प्रसाद की अवहेलना करने पर सर्वनाश झेलना पड़ा। उसके पास अपार संपत्ति थी। पर देखते ही देखते उसका सब कुछ तबाह हो गया। माल-असबाब से भरे हुए जहाज डूब गए, जवान बेटा न रहा, और भी बहुत कुछ। वह कंगाली की हालत में पहुँच गया। फिर इस दुर्दशा में वह सेठ हर बृहस्पतिवार को बृहस्पतिवार का व्रत रखने लगा, तो एक के बाद एक चमत्कार हुए और उसके सुख के दिन लौट आए।

इस पूरी कथा को सुनाने में कोई बीस-पच्चीस मिनट लग जाते। कभी-कभी आधा घंटा भी। कथा के बाद भुने हुए चने और मुनक्के का प्रसाद बाँटा जाता, जिसकी व्यवस्था पूरे साल माँ रखतीं। कुछ समय बाद वह छपी हुई कथा की पुस्तक फटकर जीर्ण-शीर्ण हो गई, तो मैंने उसे हाथ से लिख लिया। पर कथा लंबी थी और एक के बाद एक कई घटनाएँ। मैंने हाथ से लिखते हुए थोड़ी संपादकीय चतुराई से काम लिया, जो उस बाल्यकाल में भी थोड़ी-बहुत तो थी ही। मैंने कथा इस रूप में लिखी कि वह पूरी तो लगे, पर हो संक्षिप्त रूपांतरण। यों संपादन के कारण दोहराव कुछ कम हो गया, संवाद भी मैंने संक्षिप्त कर दिए।

मैंने सोचा, “इससे क्या फर्क पड़ता है? कहानी तो पूरी हो ही गई। इस तरह कथा सुनाने में हर बार मेरे पाँच-सात मिनट भी बच जाएँगे।” माँ तो मेरी कैशौर्य काल की यह चतुराई न पकड़ सकीं, पर पिता जी ने सुना तो अविश्वास से भरकर कहा, “बस, हो गई कथा पूरी..?”

“हाँ, पिता जी...!” मैंने उन्हें भरोसा दिलाते हुए कहा। पर उन्होंने गुस्से में मेरी ओर देखा, जैसे मेरी चालाकी समझ गए हों। लेकिन अब उसी लिखित कथा को सुनना उनकी लाचारी थी। इस तरह हर बार उस कथा को सुनाने में मेरे पाँच-सात मिनट बच जाते। पिता जी मजबूरी में सुनते तो रहे, पर जैसे उन्हें पूरी तसल्ली न हो। बाद में बृहस्पतिवार की कथा की नई पुस्तक मँगवा ली गई, तो मेरी चालाकी धरी की धरी रह गई।

सुबह-सुबह हमारा पढ़ने का समय होता। ऐसे में परेशानी तो होती ही थी। पिता जी से तो कुछ कहने की हम बच्चों की हिम्मत न होती थी। पर माँ झट हमारी बात समझ जाती थीं। मैंने उनसे कहा, “माँ, सुबह-सुबह मेरा पढ़ने-लिखने और स्कूल जाने का समय होता है। ऐसे तो मैं कैसे पढ़ाई कर पाऊँगा?” इस पर माँ ने सामने वाले मंदिर के पुजारी जी से कहा। वे नियम से घर आकर कथा सुनाने लगे तो मुझे इस जिम्मेदारी से छुट्टी मिल गई। 

इसी तरह छुटपन में एक और काम मेरे जिम्मे था। चक्की पर पिता जी और कृष्ण भाईसाहब के लिए घर से चाय-नाश्ता लेकर जाना। वहाँ आने-जाने में पूरा एक घंटा लग जाता था, जो बहुत अखरता था। इसलिए कि शाम का समय हमारा खेलकूद का समय होता था। भाभी चाय बनाकर बार-बार टेरतीं, “कुक्कू, चक्की पर चाय ले जानी है। चाय ठंडी हो रही है। भाइया जी डाँटेंगे!” पर मैं खेल के जोश में होता। इसलिए दूर से पुकारकर कहता, “अभी आया, बस अभी...!”

यह ‘अभी...!’ बहुत लंबा खिंच जाता तो भाभी फिर याद दिलातीं, चाय फिर से गरम करके देतीं। तो भी डोलू में चक्की तक चाय ले जाने में कई बार चाय ठंडी हो जाती तो डाँट पड़ती थी। साथ ही चक्की के सामने वाले हलवाई से चाय गरम करवा के लानी पड़ती थी।

काफी समय तक यह परंपरा चली। इसके पीछे शायद विचार यह रहा करता था कि घर की चीज आखिर घर की चीज है। बाहर वैसा खाना, चाय या नाश्ता भला कहाँ मिल सकता है? बाद में हम बच्चे बड़े हुए, पढ़ाई का दबाव भी आया। तब परिवर्तन यह हुआ कि खाना तो घर से ही जाता था, पर चाय-पकौड़े वगैरह बाहर से ले लिए जाते। यों किशोरावस्था में इन बंधनों से थोड़ी मुक्ति मिली। साथ ही खेल-कूद को बीच में छोड़कर चक्की पर भागने की बाध्यता भी न रही।...और सबसे बढ़कर, पिता जी की डाँट से बचे। इसलिए कि चाय ठंडी होती तो डाँट पड़ती ही थी।


[3]

उन दिनों बिजली नहीं थी और मैं पढ़ाकू ऐसा कि कमरे में या छत पर, शाम के स्याह हो जाने तक किताब पर नजरें गड़ाए पढ़ता रहता था। शायद इस कारण मेरी निगाह कमजोर हो गई। यों तो छठी क्लास में ही मुझे समस्या आने लगी थी। अध्यापक द्वारा ब्लैकबोर्ड पर लिखे गए शब्द मेरे ठीक-ठीक पढ़ने में नहीं आते थे। तब मजबूरी में मैं पास बैठे किसी सहपाठी की कॉपी देख-देखकर मैं ब्लैकबोर्ड पर लिखी इबारत को कॉपी पर उतारता था। इसमें अकसर एक गड़बड़ हो जाती, उस सहपाठी की जो भूलें और वर्तनी की गलतियाँ होतीं, वे मेरी कॉपी में भी आ जातीं। पढ़ते समय मुझे पता चल जाता कि कहीं कुछ गड़बड़ है, पर मजबूरी थी। अध्यापक से कुछ पूछने का साहस तब न था।

पर आठवीं या नवीं क्लास में ठीक-ठीक समझ में आ गया कि मेरी निगाह कमजोर है। मैंने माँ से कहा, माँ ने पिता जी से और बड़े भाइयों से। जगन भाई साहब तब अलीगढ़ से इंजीनियरिंग में डिप्लोमा करके आ चुके थे। पता नहीं उन्होंने बताया या किसी और ने, कि अलीगढ़ में आँखों का बड़ा अस्पताल है, वहाँ दिखाना चाहिए। वह अस्पताल था गाँधी आई हास्पीटल, जो अब भी उतना ही प्रसिद्ध है।

मुझे अच्छी तरह याद है, पिता जी के साथ मैं रेलगाड़ी में बैठकर अलीगढ़ गया था। उस अस्पताल का कोई डाक्टर शायद परिचित भी निकल आया था। पिता जी ने अस्पताल का पता और उस डाक्टर की जानकारी एक परचे पर लिखवा ली, फिर मुझे लेकर आगरा गए। शायद वह रेलगाड़ी में बैठने का मेरा दूसरी मौका था। इससे पहले बड़े भाई साहब के साथ एक बार आगरा गया था, उसकी याद है।

अलीगढ़ शिकोहाबाद से आगरा की तुलना में चूँकि ज्यादा दूरी पर है, इसलिए इस बार अपेक्षाकृत लंबी यात्रा थी, जिसमें कोई चार-पाँच घंटे लगे थे। फिर रिक्शे वाले ने हमें गाँधी आई हॉस्पीटल पहुँचाया। बड़ा ही विशाल अस्पताल था, जिसकी इमारत खासी भव्य थी।

मुझे याद है, पहली बार जब पिता जी के साथ मैं अस्पताल पहुँचा तो डाक्टर ने दवा डालकर आँखों की जाँच की। फिर आँखों में नियमित लोकुला ड्रॉप्स डालने का निर्देश देकर कहा, “एक सप्ताह बाद आप लोग आएँ। फिर मैं दोबारा चेक करूँगा। तभी पता चलेगा कि चश्मे लगाने की जरूरत है, या फिर वैसे ही काम चल जाएगा?”
अगली बार गया तो डाक्टर ने फिर से चेक करके बताया कि चश्मा ही लगेगा। मैं अंदर ही अंदर खुश और रोमांचित हो रहा था। नीचे आए तो चश्मा बनाने वाली बहुत सी दुकानें थीं। हम लोग सोच ही रहे थे कि कहाँ जाएँ, इतने में एक दुकानदार ने आकर लगभग घेर लिया, “आपको चश्मा लेना है न? आइए-आइए, आप मेरे साथ आइए। आपको बड़ा अच्छा और किफायती फ्रेम दूँगा। शीशे भी बहुत अच्छे!” आखिर हम लोग उसी की दुकान पर गए। और शायद मेरे फ्रेम पसंद करने के बाद कोई डेढ़-दो घंटे में उसने चश्मा तैयार करके भी दे दिया।

उसी शाम को पिता जी के साथ मैं रेलगाड़ी से वापस लौट आया। चश्मा लगाए हुए। मन ही मन कुछ अटपटा लग रहा था कि अब मित्रों को कैसे फेस करूँगा? उनके तरह-तरह के सवालों के क्या जवाब देने होंगे? पर इस सब से ज्यादा अंदर ही अंदर एक गुदगुदी सी हो रही थी। मैं अब चश्मे वाला हो गया। कुछ अलग, कुछ खास। कुछ बच्चे ‘चश्मुद्दीन’ या ‘चश्मेबद्दूर’ कहकर चिढ़ाएँगे, यह बात तो जानता था। पर मैंने सोचा, इसकी क्या परवाह? जब ओखली में सिर दिया तो मूसलों का क्या डर...?

अलबत्ता चश्मा पिता जी के साथ अलीगढ़ जाकर बनवाया था। यह बात फिर-फिर याद आती है। उस यात्रा की और भी बहुत सी बातें याद आ रही हैं। रेलगाड़ी की खिड़की के पास मैं बैठा था और दूर से दौड़ते पेड़ों और हरे-हरे खेतों की वह छुआछाई आज भी याद है। वह यात्रा लंबी थी, जरूर चार-पाँच घंटे लगे होंगे अलीगढ़ पहुँचने में। पर यात्रा सुखद और आनंदकारी थी। रेलगाड़ी की यात्रा बार-बार मन को खींचती है, यह शायद मैंने पहली बार जाना था।

फिर कुछ और बातें भी याद हैं। उन दिनों मेरे बड़े भाई साहब जगन भाईसाहब के विवाह की बात चल रही थी। संभवतः कुछ प्रस्ताव रिश्ते के लिए आए भी थे, पर वे जगन भाईसाहब को पसंद न थे। तो वह ऐसा कुछ गहमागहमी का दौर था। अलीगढ़ प्रवास में किसी दूर के रिश्तेदार के घर ही हम लोग रुके थे। उन लोगों ने हमारी काफी खातिर करने के बाद, बातों-बातों में कैसे रिश्ते की बात चलाई थी और पिता जी को इस संबंध के लिए मनाना चाहा था, इसकी याद है।

पर जगन भाईसाहब अपनी पसंद से विवाह करना चाहते थे। इसलिए पिता जी ने हाँ न करके यही कहा, कि मैं घर पर बात करूँगा। और फिर वह प्रसंग यहीं समाप्त हो गया।


[4]

एक और बात, जिसकी ओर बार-बार मेरा ध्यान जाता है, वह यह कि माँ और पिता का संबंध बड़ा अद्भुत था। वे झगड़े बगैर रह नहीं पाते थे और हफ्ते में एक-दो बार तो जरूर किसी छोटी-मोटी बात पर उलझ जाते थे, पर उनमें आपस में इतना गहरा प्रेम था कि क्या कहा जाए।

हाँ, फर्क यह था कि झगड़ा तो शब्दों में व्यक्त होता था और हम लोगों तक भी उसकी ध्वनियाँ आ जाती थीं, पर प्रेम शब्दातीत था। वह पिता की मूँछों से फिसलती गहरी मुसकान में व्यक्त होता था और माँ के उस राजमहिषी जैसे गर्व में, जिसके पीछे पिता का प्रेम जीत लेने का विश्वास ही था। यों माँ के साथ पिता का झगड़ा भी, प्यार भी अंत तक चला। अकसर माँ एक सीमा तक चुपचाप सुनती रहतीं। फिर कहतीं, “बस-बस, हुण बहूँ हो गया!” और आश्चर्य, इसके बाद पिता के मुँह से एक शब्द तक नहीं निकलता था।

इस प्रेम में, आज लगता है, दोनों का एक-दूसरे के प्रति आदर भी जरूर शामिल रहा होगा। एक बार की बात मुझे याद है, माँ देहरादून गई थीं, छोटी बहन से मिलने। पीछे पिता थे और हम बच्चे। यह कलकत्ते वालों के मकान की बात है, जहाँ हम कुछ दिन किराए पर रहे थे।...सर्दियों के दिन। एक सुबह की बात, पिता कंबल ओढ़े हुए चारपाई पर बैठे बीड़ी पी रहे थे। तभी अचानक बीड़ी की राख कंबल पर गिरी। चुपचाप किन्हीं खयालों में खोए पिता को शायद कुछ देर बाद पता चला। जैसे ही ध्यान गया, उन्होंने झट उस राख को झाड़ा। पर तब तक तो उस गरम राख का असर हो चुका था। एक जगह जहाँ राख ज्यादा गिरी, वहाँ बड़ा सा छेद हो गया, आस-पास कुछ छोटे-छोटे छेद भी।

पिता जी को बड़ा दुख हुआ, नया कंबल था। अब वह भद्दा हो गया। बोले, “पुत्तर, तेरी माँ आएगी तो गुस्सा करेगी। तू ऐसा कर, कहीं से सूई और धागा ढूँढ़कर ला।”

पता नहीं मैं या फिर कमलेश दीदी सूई-धागा ढूँढ़कर लाई। पिता ने उसी समय सूई में काले या किसी गहरे रंग का धागा डालकर कंबल को रफू करना शुरू कर दिया। मुझे अब भी याद है कि उन्होंने कितने जतन, कितनी बारीक निगहबानी से यह काम किया था। जब तक कंबल के सारे छेद ढक नहीं गए, तब तक वे बारीक-बारीक रफूगीरी करते रहे। काम पूरा होने पर उन्होंने एक निगाह और कंबल पर डाली। देखकर उनके चेहरे पर संतोष उभर आया। सचमुच पिता ने बड़ी सफाई से रफू किया था। पिता द्वारा रफू किया गया कंबल आज भी मेरी आँखों के आगे से नहीं हटता। वैसे वे घर के कामों में हाथ तक न लगाते थे। पर कोई काम करने पर आ जाएँ तो किस सफाई से करते थे, उनका रफू किया गया कंबल इसकी मिसाल था।

पिता को शादियों में कभी-कभार भोजन भी तैयार करते देखा है। तब हलवाई की कम ही जरूरत पड़ती थी। बिदादरी वाले ही बड़े उत्साह से काम में हाथ बँटाने के लिए आ जाते थे। उन्हीं दिनों देखा कि पिता यों सामान्यतः चाहे भोजन न बनाते हों, पर उन्हें पाक-कला या चीजों के अनुपात वगैरह का अच्छा ज्ञान था और वे बड़ी रुचि से आनंदपूर्वक इसमें हिस्सा लेते थे।

ऐसे ही गायन में भी वे निपुण थे। याद पड़ता है, बिरादरी के एक परिवार में विवाह था। मैं तब छोटा ही था और पिता जी के साथ बारात में गया था। बारात जब लौट रही थी, तो बस में कुछ लोगों ने मिलकर हीर गाना शुरू कर दिया, जिसमें एक-एक करके कई लोग शामिल होते गए। कुल मिलाकर तो यह एक सहगान सरीखा ही था, जिसमें एक पद गाकर अगला पद गाने के लिए अपने साथ वाले को इंगित कर दिया जाता। कहना न होगा, यह पूरा गायन पक्के राग में था। जिसे ऊँचे सुर में गायन और तालबंदी का अभ्यास हो, वही इसे गा सकता था। इसी तरह गाते हुए जब पिता की बारी आई तो उन्होंने एकदम सधे हुए कंठ से इतनी पूर्णता और गहरी तल्लीनता के साथ गाया कि मैं कुछ-कुछ चकित और विस्मित सा उन्हें देखता रह गया।

पिता का यह रूप मेरे लिए एकदम नया और अनजाना था, जिसे बरसों बाद भी याद करके मैं मुग्ध हो उठता हूँ। 

इसी तरह पिता सख्त थे, पर विवेकवान भी। कब झुकना है, वे जानते थे। सही बात चाहे किसी ने कही हो, वह सही है, यह एहसास होते ही झुकना उन्हें अच्छा लगता था। माँ पिता जी की बातों की बहुत कद्र करती थीं। पर माँ की सही बात के आगे पिता को झुकते भी मैंने देखा है। यों भी उनकी सख्ती के भीतर एक मृदुलता थी। इसीलिए माँ के जाने के बाद वे इतने बदल गए कि हमें माँ और पिता दोनों ही लगने लगे। “तेरी माँ होती तो ऐसा कहती...या करती!” वे बार-बार कहते थे और खुद भी वैसा ही करने की कोशिश करते थे।


[5]

पिता जी की एक खास बात और याद आ रही है, जो किसी हद तक मुझमें भी आई। उनकी आदत थी, जिस बात की धुन लग जाए, उसे पूरा करके मानना। यह बात हमारे चौक में बने मंदिर को लेकर याद आ रही है, जिसे बनवाने में उनकी बड़ी भूमिका रही।...असल में, हमारे घर के सामने काफी बड़ा सा चौक है। पिता जी ने देखा, चौक के तीन तरफ तो मकान बने हैं, पर एक तरफ की जमीन का बड़ा सा टुकड़ा खाली है। उनके मन में आया, यहाँ आसपास कोई मंदिर नहीं है। मोहल्ले की स्त्रियों को गली के दूसरे छोर पर बने एक मंदिर में जाना पड़ता है। उस मंदिर की सीढ़ियाँ भी बहुत ऊँची हैं, जिन पर चढ़ना बूढ़े लोगों और स्त्रियों के लिए आसान नहीं है।

पिता जी ने सोचा, ‘यहाँ चौक में ही एक सुंदर सा मंदिर बने तो सबको सहूलियत होगी। साथ ही एक बड़ा सा हाल और एक धर्मशाला भी हो, तो शादी-ब्याह और दूसरे कामों में बड़ा आराम हो जाएगा।’

उन्होंने मोहल्ले और बिरादरी के लोगों से बात की तो सभी ने इस विचार को पसंद किया। एक समिति बनी। पैसा इकट्ठा हुआ और जमीन का वह टुकड़ा खरीद लिया गया। पर मंदिर निर्माण के लिए तो बहुत धन की दरकार थी। पिता जी ने करीब दो साल तक व्यवसाय से हाथ खींचा और उसे बेटों के भरोसे छोड़ा। खुद धन एकत्र करने के काम में जुट गए। शहर में बहुत सारे परिचित थे, जो पिता जी की बहुत इज्जत करते थे। उन्होंने आज तक किसी से कभी कुछ न माँगा था। आज एक धार्मिक कार्य के लिए माँगा तो किसी ने मना न किया।

जैसे-जैसे पैसे आते गए, निर्माण होता रहा। जरूरत पड़ने पर उन्होंने कानपुर और दूसरे अन्य शहरों की भी यात्राएँ कीं, जहाँ व्यवसाय में उनके सहयोगी लोग थे। पिता जी ने आग्रह कर-करके उनसे बड़ी राशि इकट्ठी की। हैरानी की बात यह है कि इसमें धर्म और संप्रदाय का कोई फर्क न रहा। जिससे भी कहा, उसने खुले हाथों से मदद की।

आखिर एक सुंदर सा मंदिर बना, उसका बड़ा सा भव्य हाल और धर्मशाला भी। पिता जी का मन था कि मंदिर के सामने पीपल का पेड़ हो। उन्होंने अपने हाथ से पीपल का पेड़ लगाया और उसके चारों ओर एक गोल घेरा भी बनवा दिया। आज वह पेड़ इतना बड़ा है कि मंदिर की शोभा तो है ही, साथ ही बहुतों को छाया और सुकून देता है। उसका चबूतरा भी काफी बड़ा हो गया है और वहाँ हर वक्त छाया में बैठे लोग दिखाई पड़ सकते हैं। पिता जी आज नहीं हैं, पर उनका बनवाया हुआ वह सुंदर मंदिर है, जो पूरे मोहल्ले को प्रेम, शांति और भाईचारे की सीख देता है। और मंदिर के सामने जो बड़ा सा छतनार पीपल का पेड़ है, उसमें न जाने क्यों, आज भी मुझे पिता का अक्स दिखाई पड़ता है।

बात छोटी सी है, पर यह मंदिर बनवाना उनके लिए तपस्या थी। इसीलिए जिन दिनों मंदिर बन रहा था, पिता जी ने दिन नहीं देखा, रात नहीं देखी, हर वक्त दौड़ते-भागते ही रहे, ताकि इतना धन हो जाए कि निर्माण अधूरा न रहे। मंदिर की एक-एक ईंट उन्होंने अपने सामने लगवाई। निर्माण में कितना सीमेंट, कितना लोहा, कैसा मसाला बने, एक-एक चीज की उन्हें पूरी जानकारी थी। और इसीलिए मंदिर की इमारत भी सादगी के बावजूद सुंदर और भव्य है, ठीक वैसी ही, जैसा उनका सपना था।

पिता जी की यह खासियत थी कि जो काम उन्हें ठीक लगता था, और जिसे पूरा करने की धुन मन में बैठ जाती थी, उसे वे किए बगैर न रहते थे। मेरे और उनके जीवन, और शायद जीवन आदर्शों में भी बड़ा फर्क है। पर यह चीज उनकी किसी हद तक मुझमें भी आई कि जिस काम को करो, उसे पूरा किए बिना मत छोड़ो, चाहे रास्ते में जो भी बाधाएँ आएँ। बढ़ते रहो। अगर मंजिल तक न पहुँच पाओ, तो भी कम से कम उसकी दुर्निवार तड़प तो बनी ही रहे।

इसके लिए बहुत बार मैं एकांत में चुपचाप उन्हें धन्यवाद देता हूँ तो लगता है, उनका आशीर्वाद असीम प्रेम बनकर मेरे ऊपर बरस रहा है।
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प्रकाश मनु, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
चलभाष: 09810602327,
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