हिंदी बाल साहित्‍य का इतिहास - एक रोचक और महत्त्वपूर्ण पुस्‍तक

सोना शर्मा

सोना शर्मा

‘हिंदी बाल साहित्‍य का इतिहास’ एक अत्‍यंत महत्त्वपूर्ण और पठनीय पुस्‍तक है। इसमें इतनी शोधपरक नई-नई जानकारियाँ हैं, जिन्‍हें जानकर सुखद आश्‍चर्य होता है। प्रकाश मनु जी ने लगभग बीस वर्ष तक अथक परिश्रम करके इस पुस्‍तक को बहुत मनोयोग से तैयार किया है। इस इतिहास-ग्रंथ में सन् 1900 से लेकर अब तक, यानी सौ वर्षों से अधिक समय, के बाल साहित्‍य को तीन हिस्‍सों में बाँटा गया है। पहला: प्रारंभिक युग (1901 से 1947 तक), दूसरा: गौरव युग (1947 से 1980 तक) और तीसरा: विकास युग (1980 से अब तक)। पुस्‍तक को पढ़ते हुए महसूस होता है, जैसे हम रंग-बिरंगे सुगंधित फूलों से भरे सुंदर उद्यान की सैर कर रहे हों। मज़े की बात यह कि इस विशाल उद्यान की सैर करते हुए हम ज़रा भी नहीं थकते। हमेशा लगता रहता है कि चलो, ज़रा और आगे बढ़कर देखें, आगे और क्‍या-क्‍या है! एक कुशल माली की तरह प्रकाश मनु जी ने घास-कूड़ा हटा कर अच्‍छे और सार्थक बाल साहित्‍य की रचनाओं से इस उद्यान को सजाया-सँवारा है। तो चलिए, पहले चलते हैं इस उद्यान के उस हिस्‍से में, जहाँ कविताओं के फूल खिले हैं।

हिंदी बाल साहित्‍य का इतिहास (प्रकाश मनु)

कविताओं के गुलदस्‍ते की खुशबू 

प्रकाश मनु जी ने बाल कविताओं के बारे में लिखा है, “हिंदी बाल कविता में भारतीयता का गहरा रंग है। यहाँ पारिवारिक रिश्‍ते और कोमल भावनाएँ बहुत सादगी और सहजता से बालमन को छूती हैं। आज़ादी के पहले के चरण में राष्‍ट्रप्रेम और चरित्र निर्माण की भावना कविताओं में अधिक है लेकिन अच्‍छी बात यह है कि इसमें सहजता है, उपदेशात्‍मकता नहीं है।” बाल साहित्य की नींव रखने वाले कवियों में अयोध्‍या सिंह उपाध्‍याय ‘हरिऔध’ अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। उनकी ‘एक बूँद’ कविता को प्रकाश मनु जी ने इसे एक ऐसी यादगार कविता माना है, जिसकी संरचना ‘क्रिस्‍टल स्‍ट्रक्‍चर’ जैसी लगती है, जिसमें न एक शब्‍द आप कहीं जोड़ सकते हैं, न घटा सकते हैं। ‘हरिऔध’ जी की बाल कविताओं के संकलन है—’बाल विभव’, ‘बाल विलास’, ‘चंद्र-खिलौना’, ‘खेल-तमाशा’ आदि। शिशुगीतों में रामनरेश त्रिपाठी की नटखट कविता ‘नंदू की छींक’ को भुलाया नहीं जा सकता। छह पंक्‍तियों का ‘नंदू की छींक’ शिशुगीत कुछ इस तरह है, “आई एक छींक नंदू को/एक रोज़ वह इतना छींका,/इतना छींका.../सब पत्‍ते गिर गए पेड़ के/धोखा हुआ उन्‍हें आँधी का।”

आजादी से पहले के जिन कवियों ने बहुत अच्‍छी बाल कविताएँ लिखीं, उनमें विद्याभूषण विभु, ‘स्‍वर्णसहोदर’, गिरिजादत्‍त शुक्‍ल ‘गिरीश’, रमापति शुक्‍ल और रामेश्‍वरदयाल दुबे के नाम उल्‍लेखनीय हैं। इनमें रमापति शुक्‍ल तो बच्‍चों की स्‍वतंत्रता के इतने पक्षधर थे कि उन्‍होंने सोचा, क्‍यों न बच्‍चों को घूरने वाली निगाहों और डाँट-फटकार को एक संदूक में बंद करके समंदर में बहा दिया जाए। बेशक, जब बच्‍चे स्‍वतंत्र होंगे तभी तो उनका बेहतर विकास होगा।

प्रकाश मनु
सुप्रसिद्ध कवयित्री सुभद्राकुमार चौहान ने भी बच्‍चों के लिए बहुत प्यारी कविताएँ लिखी हैं, जैसे “मैं बचपन को बुला रही थी, बोल उठी बिटिया मेरी, नंदन वन सी फूल उठी वह छोटी-सी कुटिया मेरी।” इसी तरह उनकी ‘यह कदंब का पेड़’ भी माँ और बच्‍चे के मधुर संबंध की मीठी महक लिए हुए है। सुभद्राकुमारी चौहान की ‘झाँसी की रानी’ कविता बच्‍चे ही नहीं, बड़ों में भी बहुत लोकप्रिय रही है, “बुंदेले हरवोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झाँसी वाली रानी थी।” ‘कोयल’ और ‘सभा का खेल’ सुभद्रा जी की बाल कविताओं के महत्त्वपूर्ण संग्रह हैं।

इस युग के मूर्धन्‍य कवि रामधारीसिंह ‘दिनकर’ की कविता ‘चाँद का कुरता’ भी बहुत अच्‍छी कविता है। इसके बारे में मनु जी ने लिखा है, “दिनकर जी की यह कविता पढ़कर लगता है मानों चाँद के घटने-बढ़ने को ही नहीं, सन-सन हवाओं और ठिठुरती सर्दियों में उसके निपट एकाकी सफर को भी जैसे आँखों के आगे साकार कर दिया गया हो।” ‘धूप-छाँह’, ‘सूरज का ब्‍याह’ ‘मिर्च का मज़ा’ दिनकर जी की कविताओं के चर्चित संग्रह हैं। इस दौर के कवि माखनलाल चतुर्वेदी की कविता ‘एक फूल की चाह’ को आज भी पाठ्य पुस्‍तकों में स्‍थान प्राप्‍त है। इसी तरह राजर्षि पुरुषोत्‍तमदास टंडन की ‘बंदर सभा’ भी एक लंबी कविता है, जिसे उसके छंद-कौशल और रोचक वृत्तांत के कारण याद किया जाता है।

प्रकाश मनु जी की इस पुस्‍तक से हमें यह भी ज्ञात होता है कि बचपन से स्‍कूलों में जिस प्रार्थना को गा-गाकर हम बड़े हुए हैं, ‘वह शक्‍ति हमें दो दयानिधे, कर्तव्‍य मार्ग पर डट जाएँ...’ वह इसी कालखंड के यशस्‍वी कवि मुरारीलाल शर्मा ‘बालबंधु’ की लिखी हुई है। इतना ही नहीं, आज शायद ही किसी को मालूम होगा कि वीरता और देशभक्‍ति का जोश जगाने वाले अमर गीत, ‘विजयी विश्‍व तिरंगा प्‍यारा, झंडा ऊँचा रहे हमारा’ के रचयिता कौन हैं। इसके रचयिता हैं श्‍यामलाल पार्षद जी, जिन्होंने पूरे देश में जागृति लाने वाला यह निराला गीत लिखा।

हिंदी बाल साहित्‍य का इतिहास (प्रकाश मनु)
हिंदी बाल कविता के गौरव युग (1947 से 1980 तक) में बच्‍चों के सामाजिक-सांस्‍कृतिक विकास की ओर ज्‍यादा ध्‍यान दिया गया। इय युग के अनेक कवियों के साथ जिन प्रमुख कवियों का विशेष रूप से पुस्‍तक में उल्‍लेख किया गया है, वे हैं—दामोदर अग्रवाल, सूर्यभानु गुप्‍त, डॉ. शेरजंग गर्ग, डॉ. श्रीप्रसाद, सर्वेश्‍वरदयाल सक्‍सेना, बालस्‍वरूप राही, योगेंद्रकुमार लल्‍ला, कन्‍हैयालाल मत्‍त, प्रयाग शुक्‍ल आदि। इनमें दामोदर अग्रवाल की बाल कविताएँ अपने समय की ज़रूरतों और मुश्‍किलों से जुड़ी होने के साथ ही अपनी भाषा और लय में भी बेजोड़ है। दामोदर अग्रवाल जी के संचयन ‘बच्‍चों की 101 कविताएँ’ (संपादक: प्रकाश मनु) में उनकी सुंदर और उत्‍कृष्‍ट कविताएँ मौजूद हैं।

हिंदी बाल कविता के शीर्षस्‍थ कवि हैं डॉ. शेरजंग गर्ग। मनु जी के शब्‍दों में, “उनके पास बड़ी चुस्‍त, बड़ी ही समृद्ध भाषा है और बात कहने का अपना ढंग और मुहावरा है।” डॉ. शेरजंग गर्ग की नए साल पर लिखी इस कविता में कितना उल्‍लास और नयापन है। वे लिखते हैं, “नए साल में ताजे सुंदर फूल खिलेंगे/नए साल में नए-पुराने मित्र मिलेंगे।/नए साल में भैया-दीदी खूब पढ़ेंगे।” और यह भी कि “स्‍वस्‍थ रहेंगी प्‍यारी दादी नए साल में,/गुड़िया की भी होगी शादी नए साल में।” डा. शेरजंग गर्ग की बाल कविताओं के लगभग एक दर्जन संग्रह प्रकाशित हुए हैं। इनमें बच्‍चों के लिए लिखे गए सुंदर गीतों और कविताओं का खजाना भरा है।

प्रकाश मनु
इसी तरह भला कौन भुला सकता है सर्वेश्‍वरदयाल सक्‍सेना की कविता ‘बतूता का जूता’ को। उन्‍हें आदर से याद करते हुए मनु जी ने लिखा है, “उनकी बाल कविता को दूर से भी देखकर आप कहेंगे, यह सिर्फ सर्वेश्‍वर ही लिख सकते हैं।” कविता की बानगी देखिए— 

इब्‍न बतूता पहन के जूता निकल पड़े तूफान में, 
थोड़ी हवा नाक में घुस गई, घुस गई थोड़ी कान में। 
कभी नाक को, कभी कान को मलते इब्‍न बतूता
इसी बीच में निकल पड़ा उनके पैरों का जूता। 
उड़ते-उड़ते जूता उनका जा पहुँचा जापान में, 
इब्‍न बतूता खड़े रह गए मोची की दुकान में।

ऐसे ही बालस्‍वरूप राही के विषय में मनु जी ने लिखा है कि उनकी भाषा इतनी सजीव है कि वह रचना के जरिए मन में एक मुकम्‍मल चित्र सा बना देती है। इस बात की तसदीक करती हैं उनकी कविताएँ ‘चंदा मामा’, ‘ऊँट बड़े तुम ऊँटपटाँग’, ‘जब हम होंगे बड़े’ आदि। पारंपरिक विषयों पर मजेदार भावपूर्ण कविताएँ लिखने वाले कन्‍हैयालाल मत्‍त की कलम भी बच्‍चों को खूब गुदगुदाती है। उनकी कविता ‘फूल-फालकर’ की बानगी देखिए, “आटे-बाटे दही पटाके, सोलह-सोलह सबने डाटे/डाट-डूटकर चले बाज़ार, पहुँचे सात समंदर पार...!” और आगे क्‍या हुआ? आप पूछेंगे, तो होना क्‍या था, बस हुआ यह कि—“फूल फालकर गाए गीत, बंदर आए लंका जीत/जीत-जात की मिली बधाई, भर-भर पेट मिठाई खाई।”

इस प्रकार की मनोरंजक कविताओं से आगे बढ़ते हुए विकास युग (1980 से अब तक) में नए और जरा गंभीर विषयों पर कवियों की नजर गई, जैसे बच्‍चे का भारी बस्‍ता, महँगाई, भ्रष्‍टाचार, अनाचार, प्रदूषण, ऊँच-नीच, गरीबी आदि। इस दौर के प्रतिनिधि बाल कवि हैं—रमेश तैलंग, दिविक रमेश, प्रकाश मनु, योगेंद्रदत्‍त शर्मा, श्‍याम सुशील आदि। रमेश तैलंग जी की खासियत यह कि वे लीक से हटकर, नए शिल्‍प की कविताएँ लिखते हैं, जो बच्‍चों के मन को छूती हैं। उनकी बाल कविताओं के आठ संग्रह प्रकाशित हुए हैं। दिविक रमेश जी की कविताओं में समकालीन भावबोध है। उनकी कविता ‘घर’ में एक ओर जहाँ माँ की गोद जैसे सुकून से भरे घर के महत्त्व को रेखांकित किया गया है, वहीं दूसरी ओर उन बच्‍चों की पीड़ा का भी जिक्र है, जिनके पास घर नहीं है। दिविक रमेश जी के ‘एक सौ एक बाल कविताएँ’ संग्रह में उनकी सभी चुनिंदा बाल कविताएँ हैं।

लीक से हटकर लिखी गई प्रकाश मनु जी की कविताएँ बच्‍चों के मन, इच्‍छा-संसार और सपनों से सीधे-सीधे जुड़ती हैं। कितनी सहजता और सादगी है इन पंक्‍तियों में, “चिड़िया रानी शॉपिंग करने जाने लगी बाज़ार,/लिस्‍ट सँभाली, पर्स उठाया होकर के तैयार।/छोटे से उनके बटुए में पैंसे थे कुल तीन,/चीनी, चावल, घी लाना था औ’ मुन्‍ने की बीन।” प्रकाश मनु जी के ‘इक्‍यावन बाल कविताएँ’, ‘बच्‍चों की 101 कविताएँ’, और ‘बच्‍चों की अनोखी हास्‍य कविताएँ’ बहुचर्चित संग्रह हैं। हाल ही में उनकी चुनिंदा बाल कविताओं का संचयन ‘प्रकाश मनु की बाल कविताएँ’ छपा है। उन्‍होंने बच्‍चों के लिए गीत-पहेलियाँ भी लिखी हैं, जो ‘बच्‍चों की 101 गीत-पहेलियाँ’ में संगृहीत हैं।

पुस्‍तक में प्रकाश मनु जी ने श्‍याम सुशील, जहीर कुरैशी, रामसेवक शर्मा, भैरूँलाल गर्ग, विनोद भृंग, शंभुनाथ तिवारी, उषा यादव, पद्मा चौंगांवकर, रेनू चौहान आादि की बाल कविताओं पर भी विस्‍तार से प्रकाश डाला है। उन्‍होंने स्‍थापित और चर्चित कवियों की विशेषताओं के साथ ही बिल्‍कुल नए कवियों की कलम की संभावनाओं को भी खोज निकाला है। 400 से अधिक बाल कवियों की कविताओं की पड़ताल कर पाना प्रकाश मनु जैसे सिद्धहस्‍त और समर्पित साधक के बस की बात ही है।

मनमोहक कहानियों का उपहार

अब चलते हैं उद्यान के दूसरे हिस्‍से में, जहाँ बाल कहानियों के पुष्‍प खिले हैं। सुंदर, आकर्षक, मनोरम भाँति-भाँति के पुष्‍प। यदि हम कहें कि बचपन में पढ़ी-सुनी कहानियों की पटकथा पर ही जिंदगी की फिल्‍म तैयार होती है, तो शायद बहुत गलत नहीं होगा। छत्रपति शिवाजी को महान वीर तेजस्‍वी उन वीरतापूर्ण कहानियों ने ही बनाया था, जो माँ जीजाबाई से उन्‍होंने बचपन में सुनी थीं।

आजादी से पहले की कहानियाँ अधिकतर लोक कथाओं पर आधारित थीं, जिनमें बच्‍चों के लिए नीति, शिक्षा व चरित्र निर्माण का स्‍वर अधिक मुखर था। जयशंकर प्रसाद की ‘बालक चंद्रगुप्‍त’ में चंद्रगुप्‍त की बुद्धिमत्‍ता और विलक्षणता को दर्शाया गया है, तो ‘निराला’ जी की ‘सीख भरी कहानियाँ’ में ईसप की चर्चित कहानियों को सहज भाव शिल्‍प के साथ बच्‍चों के लिए प्रस्‍तुत किया गया है। प्रेमचंद की ‘जंगल की कहानियाँ’ में भी अत्यंत रोचक कहानियाँ संगृहीत हैं। इनमें ‘शेर और लड़का’, ‘गुब्‍बारे पर चीता’ आदि कहानियों में मुसीबत में फँसे बच्‍चे कैसे अपनी सूझ-बूझ से बचते हैं, इसका रोचक वर्णन है। प्रेमचंद की कहानियों के कई संग्रह समय-समय पर छपे हैं। उनकी ‘दो बैलों की जोड़ी’, ‘गुल्‍ली-डंडा’, ‘बड़े भाईसाहब’, ‘ईदगाह’, ‘बूढ़ी काकी’ जैसी कहानियाँ भले ही बड़ों के लिए लिखी गई हैं, लेकिन बच्‍चे उन्‍हें बहुत पसंद करते हैं।

रामनरेश त्रिपाठी और रामवृक्ष बेनीपुरी ने भी बच्‍चों के लिए सुंदर कहानियाँ लिखी हैं। रामनरेश त्रिपाठी की ‘बाल कथा-कहानी’ पुस्‍तक दस खंडों में है, जो अपने आप में एक मील का पत्‍थर है। रामवृक्ष बेनीपुरी की कहानियाँ बच्‍चों का भरपूर मनोरंजन करने के साथ ही उनमें कुछ नया करने का जज्‍़बा भी जगाती हैं। ‘हीरामन तोता’, ‘लाल बुझक्‍कड़’, ‘दिनों की कहानी’ आदि उनकी बहुचर्चित और रोचक कहानियाँ हैं। यह जानकर सुखद आश्‍चर्य होता है कि श्रीनाथ सिंह ने ‘परीदेश’ शीर्षक से जो सुंदर परीकथाएँ लिखीं, उन्‍हें उन्‍होंने छोटे बच्‍चों के बीच बैठक उनकी मदद से लिखा है। है न कितना सुंदर और अनूठा प्रयोग! जहूरबख्श भी इस दौर के बड़े कथाकार हैं। उनकी कहानी ‘पागल है’ में बड़े प्रभावी तरीके से बताया गया है कि जनता कैसे अयोग्‍य और चापलूसी पसंद राजा को सबक सिखाती है।

बाल कथा साहित्‍य के प्रारंभिक युग का मंथन करते हुए प्रकाश मनु जी ने लिखा है “इस दौर की कहानियों में एक ओर बच्‍चों की रुचि और मनोरंजन के अनुकूल परीकथाएँ और हास्‍य-विनोद से भरी कहानियाँ लिखी गईं तो दूसरी ओर ऐतिहासिक, पौराणिक और यथार्थपरक कहानियाँ भी लिखी गईं, जो खेल-खेल में बच्‍चों को सीख देते हुए उनके व्‍यक्‍तित्‍व निर्माण में सहायक रही हैं।”

इसी क्रम में इस विधा का दूसरा दौर सबसे अधिक समृद्ध रहा। सही में यह बाल कहानी-यात्रा का गौरव युग है। प्रकाश मनु जी ने इस कालखंड के रचनाकारों की यादगार कहानियों का विवरण पूरे विस्‍तार से प्रस्‍तुत किया है। यहाँ सभी का उल्‍लेख करना तो संभव नहीं है, फिर भी इस युग के प्रमुख कहानीकारों अमृतलाल नागर, कमलेश्‍वर, शैलेश मटियानी, विष्‍णु प्रभाकर आदि की कुछ कहानियों के उल्‍लेख मात्र से यह अंदाजा़ लगाया जा सकता है कि दिग्‍गज कहानीकारों के बच्‍चों के लिए कैसी अदभुत कहानियाँ लिखी हैं।

अमृतलाल नागर जी की बाल कहानियों में गज़ब का आकर्षण और किस्‍सागोई है। इनमें ‘अंतरिक्ष सूट में बंदर’, ‘अमृतलाल नागर बैंक लिमिटेड तथा ‘लिटिल रेड इंजिप्‍शियन’ तो खासी दिलचस्‍प हैं। ‘अमृतलाल नागर बैंक लिमिटेड’ में छोटे-छोटे बच्‍चे अपने आत्‍मसम्‍मान को बचाने के लिए कोई बड़ा काम करने का फैसला लेते हैं। बड़ा काम वह यह करते हैं कि एक बैंक खोल लेते हैं। अब ऐसे समझदार बच्‍चों को बात-बात में डाँटने से पहले टीचर और बड़ों को कम से कम दो बार सोचना ही पड़ेगा! मगर फिर एक मुश्किल आ गई। ये उत्‍साही बच्‍चे बैंक खोल तो लेते हैं, लेकिन इनके आपसी झमेले ऐसे उलझ जाते हैं कि आखिर उन्‍हें बैंक बंद करना पड़ता है। इसी तरह कमलेश्‍वर जी का ‘होताम के कारनामे’ में होताम हातिमताई की तरह करिश्‍माई तो है, लेकिन आज की दुनिया में बेचारा इतना विवश है कि राजू का होमवर्क तक नहीं करवा पाता। उसे लगता है कि आज के जमाने में वह ‘अनफिट’ है।

राजेंद्र यादव, मन्‍नू भंडारी, मोहन राकेश, भीष्‍म सहानी ने भी बच्‍चों के लिए कहानियाँ लिखी हैं। राजेंद्र यादव की ‘परी नहीं मरती’, ‘घर की तलाश’, ‘जय गंगे’, ‘कलाकार’ आदि कहानियाँ खेल-खेल में बहुत कुछ कह जाती हैं। मोहन राकेश की ‘गिरगिट का सपना’, ‘बिना हाड़-मांस का आदमी’ आदि दिलचस्‍प कहानियाँ हैं। मन्‍नू भंडारी की बाल कहानियों के संग्रह ‘आँखों देखा झूठ’ में आठ कहानियाँ हैं। भीष्‍म साहनी की ‘गुलेल का खेल’, ‘अनोखी हड्डी’ और ‘वापसी’ भी बच्‍चों के मन को छूने वाली कहानियाँ हैं। शैलेश मटियानी के बाल कहानी-संग्रह ‘बिल्‍ली के बच्‍चे’ तथा ‘छोटी मछली, बड़ी मछली’ की कहानियाँ में उनका अलग अंदाज़ नज़र आता है। उनकी ‘धनुष-यज्ञ’ कहानी में रामलीला के मैनेजर ख्‍यालीराम और बाँकेराम साहजी के घराने की पुश्‍तैनी दुश्‍मनी रामलीला नाटक में एक और अंदरूनी नाटक को जन्‍म देती है। इधर जनता ‘सियावर रामचंद की जय’ बोलने को उतावली है और उधर शिवजी का धनुष टूट ही नहीं रहा है। है न बड़ा हास्यप्रद प्रसंग!

इस्‍मत चुगताई की ‘कामचोर’ कहानी में महा आलसी बच्‍चों को जब अलग-अलग काम बाँट दिए जाते हैं तो आपसी होड़ में वे ऐसी तूफानी तेजी और धमाचौकड़ी मचाते हैं कि तौबा-तौबा! प्रकाश मनु जी ने सार्थक और रोचक कहानियों, उनके कथा-शिल्प, भाषा-शैली और रचना-कौशल पर प्रकाश डालते हुए इस युग के सभी कथाकारों की विस्‍तार से चर्चा की है। इनमें प्रमुख हैं—शकुंतला सिरोठिया, शीला गुजराल, आलमशाह खान, हरिशंकर परसाई, रघुबीर सहाय, शशिप्रभा शास्‍त्री, आनंदप्रकाश जैन, महीप सिंह, द्रोणवीर कोहली, हिमांशु जोशी आदि।

प्रकाश मनु जी ने बताया है कि विष्‍णु प्रभाकर जी के ‘खोया हुआ रतन’ और ‘घमंड का फल’ संग्रहों में किशोरों के लिए उपयोगी कुछ ऐसी पौराणिक और ऐतिहासिक कथाएँ हैं, जिन्‍हें पढ़ते हुए “बड़े कथाकार की कलम के जादूई स्‍पर्श की अनुभूति होती है।” मन्मथनाथ गुप्‍त ने भी लीक से हटकर बाल कहानियाँ लिखी हैं, जो खेल-खेल में कोई बड़ी बात कहती हैं। ‘ज्ञानी चूहा’ संग्रह में उनकी दस चुनी हुई कहानियाँ शामिल हैं। मस्‍तराम कपूर भी एक प्रतिनिधि बाल कथाकार हैं। ‘बाल कथा-निधि’ में उनकी सैंतालीस कहानियाँ हैं जो मनु जी के शब्‍दों में ‘विविधता और उपलब्‍धियों के लिहाज से पूरे बाल कथा-लेखन को प्रभावित करती हैं।’

इसी प्रकार जयप्रकाश भारती, हरिकृष्‍ण देवसरे, विभा देवसरे, यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’, कन्‍हैयालाल नंदन, के.पी.सक्‍सेना आदि की कहानियाँ भी महत्त्वपूर्ण हैं। इनमें हास्‍य-विनोद, साहसिक यात्राएँ, लोक कथाएँ, आधुनिक सोच जैसे न जाने कितने रंग और छटाएँ मौजूद हैं। संक्षेप में कहें तो इस युग की कहानियाँ बच्‍चों के मन को समझने और उसे पूरी तरह खोलने की कोशिश करती नज़र आती हैं। इन कहानियों में बाल मनोभावों और आत्‍मीयता का रंग काफी गाढ़ा है।

बाल कहानी के विकास युग में कई कहानीकारों की कहानियों के आकर्षक संग्रह प्रकाशित हुए हैं। आत्‍माराम एंड संस से प्रकाशित ‘मेरी इक्‍यावन बाल कहानियाँ’ सीरीज़ तथा इंद्रप्रस्‍थ प्रकाशन की ‘मेरी प्रिय बाल कहानियाँ’ पुस्‍तक-श्रृंखला बहुत चर्चित रही हैं। विकास युग की कहानियों की खासियत यह है कि इनमें बच्‍चे के मनोभावों तथा जिज्ञासा, क्रोध, सपने, संकल्‍प आदि को साफ-साफ देखा, जाना और प्रस्‍तुत किया गया है। इन कहानियों की यथार्थपरकता और साफगोई आकर्षित करती है। इस युग के प्रतिनिधि कहानीकार हैं—देवेंद्र कुमार, अमर गोस्‍वामी, प्रकाश मनु, क्षमा शर्मा, शकुंतला कालरा, डॉ सुनीता, रेनू चौहान, मंजुरानी जैन, मो. अरशद, विनायक आदि।

देवेंद्र कुमार की ‘कितनी गहरी नींव’, ‘कबूतरों वाली हवेली’, ‘रिक्‍शा डॉक्‍टर’ आदि नए अंदाज़ की यादगार कहानियाँ हैं। कथाकार विनायक की कहानियाँ प्रकृति, वन्‍य जीवों और पर्यावरण से जुड़ी हैं। ‘छोटा गाँधी’ भी उनकी एक अविस्‍मरणीय कहानी है जिसके अंत में हेडमास्‍टर साहब एक सीधे-सादे बच्‍चे में गाँधी के चरित्र को पाकर कहते हैं, “इस स्‍कूल में हमने हजारों साक्षर पैदा किए, आज एक इनसान भी पैदा किया है।” अमर गोस्‍वामी की कहानियों में नाटकीयता और नटखटपन है, जो बच्‍चों केा सहज ही आकर्षित करता है। उनकी पशु-पक्षियों पर लिखी कहानियों में पूरी जीवंतता है। ‘टुन्‍नी मछली’, ‘शेरसिंह का चश्‍मा’, ‘भालू का घर’, ‘जंगल में घड़ी’ जैसी उनकी सभी कहानियाँ कथानक और भाषा की दृष्‍टि से बेजोड़ हैं। राष्‍ट्रीय पुस्‍तक न्‍यास ने ‘अमर गोस्‍वामी की चुनिंदा बाल कहानियाँ’ शीर्षक से उनकी दस श्रेष्‍ठ कहानियों का संग्रह प्रकाशित किया है।

प्रकाश मनु जी ने स्‍वयं बच्‍चों के लिए इतना लिखा है, जिसकी थाह पाना मुश्‍किल है। उनकी कहानियों में बच्‍चों की सादगी, सहजता, शरारतें, मनमौजीपन के साथ ही जीवंतता, संघर्ष, सीखने की इच्‍छा और उनकी सतरंगी दुनिया की बहुआयामी छवियाँ मौजूद हैं। बच्चे उनकी पुस्‍तकें एक-दूसरे से माँगकर पूरी तन्‍मयता के साथ पढ़ते हैं। ये पुस्‍तकें बच्‍चों को ही नहीं, बड़ों को भी ये खासी प्रभावित करती हैं। उनकी ‘नंदू की छींक’, ‘झटपट सिंह’, ‘मिठाई लाल’, ‘होली है भई होली है’ हास्‍य के रंग से सराबोर कहानियाँ हैं। ‘तुम भी पढ़ोगे जस्‍सू’, ‘माँ का प्‍यार’ और ‘रहमान चाचा’ बच्‍चों की तरह-तरह की परेशानियों, तकलीफों और उनसे जूझने की बात कहती हैं। इसके अलावा ‘तितली का घर’, ‘चींटी चढ़ी पहाड़ पर’, ‘चिड़ियाघर में चुनमुन’, ‘शेर गिरा धड़ाम’ आदि कहानियाँ पशु-पक्षियों के संसार से बच्‍चों को इस तरह जोड़ती हैं कि उसका मन उल्‍लास से भर उठता है। ‘लो चला पेड़ आकाश में’ और ‘मंगल ग्रह की लाल चिड़िया’ उनके द्वारा रचित रोचक विज्ञान कथाएँ हैं। प्रकाश मनु जी की बाल कहानियों के प्रमुख संग्रह हैं—’इक्‍यावन बाल कहानियाँ’, ‘भुलक्‍कड़ पापा’, ‘चिन-चिन चूँ’, ‘लो चला पेड़ आकाश में’, ‘नटखट नंदू की कहानियाँ’, ‘अजब अनोखी विज्ञान कथाएँ’, मेले में ठिनठिनलाल’, ‘करामातीलाल की तलवार’ आदि। इन संग्रहों की कहानियों में फंतासी, किस्‍सागोई, हास्‍य-विनोद, विज्ञान लोक आदि के विविध रंग मौजूद हैं।

इस युग की महिला बाल कहानीकारों का भी विस्‍तार से पुस्‍तक में जिक्र किया गया है। इनकी कहानियों का गहन अवलोकन करते हुए प्रकाश मनु जी यह स्‍पष्‍ट करते हैं कि किस प्रकार क्षमा शर्मा की कहानियों में उनके बचपन और निजता की झलक मिलती है, तो डॉ शंकुतला कालरा की कहानियों में विविधता और विस्‍तार है। मंजुरानी जैन की कहानियों में किस्‍सागोई का रस है, तो सरोजनी प्रीतम ने लीक से हटकर हास्‍य-विनोदपूर्ण कहानियाँ लिखी हैं। डॉ. सुनीता की कहानियाँ चाहे ग्रामीण परिवेश से जुड़ी हों या शहरी पृष्‍ठभूमि वाली, उनमें गरीब, अभावग्रस्‍त बच्‍चों की खुद्दारी और मेहनत को रेखांकित किया गया है। ‘वह मासूम बच्‍चा’, ‘गरीब घर की रानी’, ‘किस्‍सा एक मासूम चोरी का’ आदि मानवीय करूणा से उपजी उनकी ऐसी कहानियाँ हैं जिनकी अनुगूँज देर तक सुनाई देती है। उनकी कहानियों के छह से अधिक कहानी-संग्रह प्रकाशित हुए हैं, जो बहुचर्चित रहे हैं।

इस दौर के कहानीकारों में अपने समय और बच्‍चों की दुनिया की छोटी-बड़ी समस्‍याओं के प्रति संवेदनशीलता अधिक है। पंकज चतुर्वेदी की ‘बेलगाम घोड़ा’ में विषय विज्ञान कथा का है, लेकिन बात कहने का अंदाज़ परीकथा जैसा दिलचस्‍प है। प्रहलाद श्रीमाली के ‘इनसानियत का फल देने वाले पेड़’ में बाहर से अधिक भीतर के पर्यावरण की चिंता की गई है, क्‍योंकि “यदि यह बिगड़ा तो कुछ भी नहीं बचेगा।” इसी तरह मो. अरशद की ‘किराए का मकान’ और ‘पानी-पानी रे’ बिल्‍कुल अलग ढंग की कहानियाँ हैं, जो आज की समस्‍याओं को केंद्र में रखकर लिखी गई हैं। मुकेश नौटियाल की ‘बहुत कठिन है डगर’ कहानी में बच्‍चे के सिर पर लाद दिए गए पढ़ाई के बोझ और उसके नीचे दबे रहने की उसकी पीड़ा की मार्मिक अभिव्‍यंजना है। इतना ही नहीं विष्‍णुप्रसाद चतुर्वेदी, जाकिर अली ‘रजनीश’, हरिकृष्‍ण देवसरे, देवेंद्र मेवाड़ी, रमाशंकर आदि ने बच्‍चों के लिए सुंदर विज्ञान कथाएँ लिखी हैं, जो खेल-खेल में विज्ञान लोक की सैर कराते हुए विज्ञान सिद्धांतों के परिचित कराती हैं।

प्रकाश मनु जी ने पुस्‍तक में नए-पुराने लगभग सभी समर्थ कहानीकारों की कहानियों के सागर में से ऐसे मोती चुनकर पाठकों के सामने रखे हैं, जिन्‍हें जानने से बाल कथा-साहित्‍य की समृद्धि का अंदाज़ लगाया जा सकता है। नया और सार्थक लिखने वाला कोई भी लेखक मनु जी की पारखी निगाह से छूटा नहीं है। 

बाल उपन्‍यासों का अदभुत संसार

आजा़दी से पहले यद्यपि बाल उपन्‍यास बहुत कम लिखे गए, लेकिन हिंदी में रूपांतरित ‘रॉबिन्सन क्रूसो’, ‘सिंदबाद जहाजी’, ‘अलीबाबा चालीस चोर’ जैसी कृतियाँ बहुपठित और बहुचर्चित रहीं। हिंदी में पहला बाल उपन्‍यास प्रेमचंद का ‘कुत्‍ते की कहानी’ है। इस उपन्‍यास में बताया गया है कि सारे ऐशो –आराम और मान-सम्‍मान के बावजूद यदि गले में गुलामी का पट्टा बँधा हो तो आदमी तो दूर, कुत्‍ता भी खुश नहीं रह सकता। यह उपन्‍यास बताता है कि असली सुख आजा़दी में ही है, गुलामी तो नरक का द्वार है। भूपनारायण दीक्षित का ‘खड़-खड़देव’ एक मनोरंजक उपन्‍यास है, जिसमें होली के अवसर पर शरारती बच्‍चे एक गधे के गले में टीन का खाली कनस्‍टर बाँधकर उसे जंगल में छोड़ देते हैं। कनस्तर की आवाज़ से भयभीत गधा बदहवास होकर भागता फिरता है। जंगल के जानवर व पशु-पक्षी उसे कोई बला समझकर भयभीत हो जाते हैं। इसी तरह अमृतलाल नागर का उपन्‍यास ‘बजरंगी-नौरंगी’ भी एक दिलचस्‍प और जिंदादिली से भरपूर उपन्‍यास है।

इस दौर के अनेक दिलचस्‍प उपन्‍यासों के बारे में इस पुस्‍तक से ऐसी जानकारियाँ मिलती हैं कि इन उपन्‍यासों को खोजकर पढ़ने को मन लालायित हो उठता है। बच्‍चे भी इन्‍हें पढ़कर आनंद से भर उठेंगे। भगवतशरण उपाध्‍याय का उड़ीसा के मछुआरों के जीवन पर लिखा ‘सागर का घोड़ा’, सौरमंडल के रहस्‍यों से परचित कराने वाला मनोहर श्‍याम जोशी का ‘आओ करें चाँद की सैर’, रजि़या सज्‍़जाद ‘ज़हीर’ का ‘नेहरू चाचा का भतीजा’, मन्‍नू भंडारी का ‘आस-माता’, द्रोणवीर कोहली का ‘टप्‍पर गाड़ी’ और ‘करामाती कददू’, आबिद सुरती का ‘बहत्‍तर साल का बच्‍चा’ और ‘नवाब रँगीले’ ऐसे ही मनोरंजक उपन्‍यास हैं।

प्रकाश मनु जी के अनुसार उपन्‍यास-यात्रा के इस प्रारंभिक दौर के बाल उपन्‍यासों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी कलात्‍मक पूर्णता और विविधता है। उन्‍होंने लिखा है कि, “इस दौर में एक ओर ऐसे उपन्‍यास लिखे गए, जिनमें मौजूदा यथार्थ जीवन और उसमें बच्‍चे की मुश्‍किलों की चर्चा थी, तो दूसरी ओर ऐतिहासिक कथानकों और इतिहास प्रसिद्ध पात्रों को बाल उपन्‍यासों के जरिए सामने लाने वाले उपन्‍यासों की भी बेहद सशक्‍त और दमदार धारा दिखाई पड़ती है।” इस दौर के प्रतिनिधि उपन्‍यासकार हैं आनंदप्रकाश जैन, सत्‍यप्रकाश अग्रवाल, मस्‍तराम कपूर, हरिकृष्‍ण देवसरे आदि। इन सभी रचनाकारों की उत्‍कृष्‍ट रचनाओं की इस पुस्‍तक में विस्‍तार से चर्चा की गई है।

सत्‍यप्रकाश अग्रवाल के बाल उपन्‍यास ‘एक डर पाँच निडर’ में एक समझदार बच्‍चा अपने साथियों को ‘अत्‍याचार’ का अर्थ कुछ इस तरह समझाता है, “ये जो रोज जुल्‍म होते हैं न बस, इन्‍हीं को अत्‍याचार कहते हैं। तुम इसे यों समझो कि दुनिया वाले हम बच्‍चों पर जो करते हैं न, वह सब अत्‍याचार ही होता है। समझ गए न!” और इस अत्‍याचार से बचने के लिए बच्‍चे अपनी अलग दुनिया बसाने का फैसला करते हैं। वह अपनी नई दुनिया उस भूतिया हवेली में बसाते हैं, जहाँ कोई आता-जाता नहीं है। इन निडर बच्‍चों के सामने हवेली का तथाकथित भूत टिक नहीं पाता। वह अपनी जान बचाकर भाग खड़ा होता है। मनोहर वर्मा ने ‘लोहा सिंह’ और ‘थ्री टाइगर्स’ जैसे साहसिक कथानकों वाले उपन्‍यास लिखे। इसके साथ ही उन्‍होंने ‘हम हारेंगे नहीं’ जैसे विकलांग बच्‍चों की मेहनत, सच्‍चाई और ईमानदारी को उजागर करने वाले तथा ‘एक थी चुहिया दादी’ जैसे मन को लुभाने वाले बाल उपन्‍यास भी लिखे। मनु जी ने टिप्‍पणी करते हुए लिखा है, “यदि वर्मा जी के सभी बाल उपन्‍यास एक जिल्‍द में सामने आएँ, तो उनकी सृजनात्‍मक शक्‍ति के साथ-साथ बाल साहित्‍य के एक गौरवशाली दौर का इतिहास भी सामने आ सकेगा।”

आनंदप्रकाश जैन का उपन्‍यास ‘भूलना मत काका’ एक ऐसा उपन्‍यास है जिसमें चंबल के डाकुओं के आत्‍मसमर्पण जैसे गंभीर विषय को इतने रोचक ढंग से प्रस्‍तुत किया गया है कि पाठक इसके कथा-रस में आरंभ से अंत तक बहता चला जाता है। ‘पराग’ में धारावाहिक रूप से छपा ‘ताऊ तिलकू की कहानी’ भी उनका बहुत मजेदार और यादगार उपन्‍यास है। इसमें ताऊ तिलकू गाँव के ठाटदार आदमी हैं। उनका छोटा भाई, जिसे फौज में काम करने के कारण, कप्‍तान कहा जाता है शहर बंबई में रहता है। ताऊ तिलकू की बैलगाड़ी और शहरी जीवन की नई चाल का इस उपन्‍यास में बेहद सहज, चुटीली भाषा में वर्णन हुआ है। ताऊ ठेठ ग्रामीण भाषा में अपनी पत्‍नी से मोटी रोटी बनाने को कहते हैं, “गद्दर-गद्दर पो, क्‍या कप्‍तान की चिठिया सी चिंदी-चिंदी पो रही है।” बचपन में पढ़े इस उपन्‍यास की ऐसी पंक्तियाँ आज भी याद आती हैं।

इसी प्रकार आनंदप्रकाश जैन जी के ‘ढीली ईंट का रहस्‍य’ में बच्‍चों की जासूसी और इंटेलीजेंस का ऐसा कमाल है कि जज व अधिकारी भी दाँतों तले उँगली दबा लेते हैं। इतना ही नहीं, बच्‍चों के माध्‍यम से स्‍कूल में जाल फैलाकर नशे का करोबार करने का इरादा रखने वाले दुष्‍टों की किरकिरी करने वाला आनंद जी का उपन्‍यास ‘डबल सीक्रेट एजेंट जीरो-जीरो वन बाई टू’ भी अपने समय का ‘बेस्‍ट सेलर’ उपन्‍यास रहा है। बाल उपन्यासों की धारा को समृद्ध करने में हरिकृष्‍ण देवसरे का भी काफी बड़ा योगदान है। देवसरे जी के ‘महानायक मंगल पांडे’ और ‘तात्‍या की तलवार’ अच्‍छे और प्रभावी ऐतिहासिक उपन्‍यास हैं। ‘सुरखाब के पर’ में पक्षियों का रंगारंग संसार और उसके प्रति आदमी की संवेदनशीलता का वर्णन है। देवसरे जी के ‘बहादुर भालू’, ‘जाली नोट’, ‘होटल का रहस्‍य’ भी उल्‍लेखनीय जासूसी बाल उपन्‍यास हैं।

इस पुस्‍तक में प्रकाश मनु जी ने मस्‍तराम कपूर, सत्‍यप्रकाश शील, डॉ. राधेश्‍याम विगत, शांति भटनागर, शशिप्रभा शास्‍त्री के बाल उपन्‍यासों पर भी विस्‍तार से चर्चा की है। उन्‍होंने पुस्‍तक में यह भी बताया कि क्‍यों और कैसे ऐतिहासिक बाल उपन्‍यासों में बाँकेबिहारी भटनागर का ‘जय सोमनाथ’, राधेश्‍याम प्रगल्‍भ का ‘शाही हकीम’, वीरेंद्र गुप्‍त का ‘चाणक्‍य’ तथा ललित सहगल का ‘बीरबल’ इस युग के महत्त्वपूर्ण और याद किए जाने वाले उपन्‍यास हैं।

इसके बाद विकास युग की संभावनाओं पर प्रकाश डालते हुए प्रकाश मनु जी ने लिखा है, “यद्यपि इस युग में हिंदी बाल उपन्‍यास लेखन की गति कुछ मंद पड़ गई, फिर भी बीच-बीच में विविधता और कलात्‍मकता से पूर्ण उपन्‍यास भी छपकर सामने आए। मिसाल के तौर पर गुलज़ार का ‘बोसकी का कौआनामा’, जो खासा मनोरंजक उपन्‍यास है।”

प्रदूषण की समस्‍या और पर्यावरण संरक्षण को रोचक कथानक में बुनकर प्रस्‍तुत करने वाले देवेंद्र कुमार ने ‘चिड़िया और चिमनी’ तथा ‘पेड़ नहीं कट रहे’ जैसे सशक्‍त उपन्‍यास लिखे हैं। हरिपाल त्‍यागी का ‘ननकू का पाजामा’ में नौटंकी में काम करने वाले ननकू के झकाझक सफेद पाजामे को गाँव के मास्‍टर जी द्वारा अपने मैले पाजामे से बदल लिए जाने का मजेदार किस्‍सा है। मनु जी के शब्‍दों में ‘हिंदी में गाँव की जमीन पर लिखे गए इतने सच्‍चे और खरे उपन्‍यास बहुत कम हैं।’ गाँव की पृष्‍ठभूमि पर नासिरा शर्मा का ‘भूतों का मैकडोनल’ भी ऐसे पाँच दोस्तों की कहानी कहता है, जो शरारतों में भूतों से कम नहीं हैं। लेकिन बाद में वे क्‍यों और कैसे बदलते हैं, यह उपन्‍यास पढ़कर ही जाना जा सकता है। इरा सक्‍सेना का ‘कंप्यूटर के जाल में’ भी विज्ञान फंतासी पर आधारित बाल उपन्‍यास है, जिसमें कथ्‍य की नवीनता और कंप्यूटर युग की तेजी है।

प्रकाश मनु जी के अपने खुद के उपन्‍यासों के केंद्र में बच्‍चे ही हैं। ‘गोलू भागा घर से’ में गोलू को महसूस होता है कि घर के लोग उसे समझते नहीं हैं। इसीलिए वह घर से भाग जाता है। इसके बाद दुर्भाग्‍य से वह एक अपराधी गिरोह के चंगुल में फँस जाता है। आगे क्‍या होता है, कौन उसकी मदद करता है? यह सारा घटना-क्रम बहुत रोचक है। इसी प्रकार ‘एक था ठुनठुनिया’ उपन्‍यास में ठुनठुनिया महोदय के ऐसे प्रसंग हैं, जो कौतुक और हास्‍य दोनों उत्‍पन्‍न करते हैं। इस उपन्‍यास को साहित्‍य अकादेमी द्वारा पहले बाल साहित्‍य पुरस्‍कार से नवाजा गया है।

समर्थ कथाकर क्षमा शर्मा ने भी बच्‍चों के लिए खूब लिखा है। ‘होमवर्क’, ‘शिब्‍बू पहलवान’ उनके चर्चित उपन्‍यास हैं। हरीश तिवारी का ‘मैली मुंबई का छोक्रा लोग’ भी एक अत्यंत मर्मस्‍पर्शी उपन्‍यास है, जिसमें झोंपड़पट्टी में रहने वाले बच्‍चे के संघर्ष की कहानी है। यह बच्‍चा नाइंसाफी और अपमान सहकर भी पढ़-लिखकर इतनी सफलता हासिल करता है कि लोग भौचक्‍के रह जाते हैं। प्रकाश मनु जी की इस पुस्‍तक से हमें यह भी ज्ञात होता है कि कृष्‍ण कुमार के ‘पूड़ियों की गठरी’, योगेंद्रदत्त शर्मा के ‘रेगिस्‍तान में खरगोश’, विमला भंडारी के ‘इल्‍ली और रानी’, अलका पाठक के ‘इंसान का बेटा’, मोनिका गुप्‍ता के ‘वो तीस दिन’ उपन्‍यासों में बच्‍चों की दुनिया और उनके सरोकारों का अदभुत वर्णन है।

पुस्‍तक में ऐसे उपन्‍यासों का भी अलग से सविस्‍तार उल्‍लेख किया गया है, जिनमें पशु-पक्षियों के प्रति अनुराग की बात है। इनमें पंकज बिष्‍ट, हिमांशु जोशी, बानो सरताज, प्रेम जनमेजय, विनायक, क्षितिज शर्मा आदि के बाल उपन्‍यास शामिल हैं। इसके अलावा पुस्‍तक में हिंदी में अनूदित बाल उपन्‍यासों पर भी विस्‍तार से प्रकाश डाला गया है।


रंगमंच की दुनिया और बाल नाटक

बाल नाटकों का इतिहास लिखते हुए प्रकाश मनु जी ने बताया है कि “बाल साहित्‍य की अन्‍य विधाओं के मुकाबले बाल नाटकों में अपने कथ्‍य के विस्‍तार की प्रवृत्‍ति कहीं ज्‍यादा दिखाई देती है, साथ ही अपने आप को बदले हुए समाज के मिजाज से जोड़ने की भी।”

मनु जी के अनुसार पहला उल्‍लेखनीय बाल नाटक राजा लक्ष्‍मणसिंह का ‘भरत’ है, जो शकुंतला के पुत्र भरत को केंद्र में रखकर लिखा गया है। मंचन की दृष्‍टि से भारतेंदु हरिश्चंद्र का ‘अंधेर नगरी’ बहुत सशक्‍त नाटक है। इसे आज भी जगह-जगह मंचित किया जाता है। हिंदी साहित्‍य के प्रसिद्ध लेखकों केशवचंद्र वर्मा, विष्‍णु प्रभाकर, कमलेश्‍वर और रेखा जैन ने नाटकों के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। डॉ. श्रीप्रसाद, राष्‍ट्रबंधु, प्रकाश मनु और बानो सरताज ने भी विविधतापूर्ण नाटक लिखे हैं। डॉ. बानो सरताज, प्रकाश मनु और राष्‍ट्रबंधु के बाल नाटकों के संग्रह प्रकाशित हुए हैं तो जाकिर अली ‘रजनीश’ द्वारा संपादित नाटकों की पुस्‍तक ‘तीस बाल नाटक’ और अशोक वाजपेयी के संपादन में प्रकाशित बारह बाल नाटकों का संग्रह भी उल्‍लेखनीय है।

नाटकों के इतिहास के प्रारंभिक दौर में हास्‍य-विनोद से भरपूर नाटक लिखे गए जो बच्‍चों के स्‍कूल के माहौल तथा शिक्षकों और बच्‍चों के संवादों के कारण खूब लोकप्रिय हुए। भगवन्‍नारायण भार्गव के बाल नाटक ‘पाठशाला’ में शरारती बच्‍चों को डंडे से जोर से काबू में करने के लिए मास्‍टर साहब डंडा लाने को कहते हैं तो एक छात्र पूछता है, “पंडित जी डंडे का क्‍या कीजिएगा?” पंडित जी जवाब देते हैं, “तुम लोगों की मरम्‍मत करूँगा।” इस पर दूसरा छात्र कहता है, “क्‍या हम टूटे-फूटे पदार्थ या वस्‍तु हैं, जो आप हमारी मरम्‍मत करेंगे?” ऐसे में पंडित जी का खीजना स्‍वाभाविक है। रामचंद्र रघुनाथ सर्वटे का ‘पाठशाला का एक दृश्‍य’ भी ऐसा ही नाटक है, जिसमें बच्‍चों को भूगोल या व्‍याकरण के पाठ याद करना किसी पहाड़ की चढ़ाई चढ़ने से कम कठिन नहीं लगता और वे इससे बचने के तमाम बहाने ढूँढ़ते रहते हैं।

इसी प्रकार बलदेवप्रसाद के ‘मच्‍छड़राम’, रामेश्‍वरदयाल दुबे के ‘वैयाकरण’, डॉ. रामकुमार वर्मा के ‘छींक’ और ‘तैमूर की तलवार’ आदि नाटकों को मनु जी ने ऐसे नाटक कहा है, जिन्‍होंने हिंदी बाल नाटकों की नींव रखी। इतना ही नहीं, श्रीकृष्‍ण और योगेंद्रकुमार लल्‍ला ने तो लेखकों से आग्रह करके नाटक लिखवाए और ‘प्रतिनिधि बाल एकांकी’ शीर्षक से उन्‍हें प्रकाशित किया। यों तो शायद ही कोई अच्‍छा नाटक ऐसा हो, जिसका इस पुस्‍तक में उल्‍लेख छूट गया हो। फिर भी गौरव युग के कुछ अविस्‍मरणीय नाटक हैं—केशवचंद्र वर्मा का ‘बच्‍चों की कचहरी’, आनंदप्रकाश जैन का ‘परियों के देश में’, सर्वेश्‍वरदयाल सक्‍सेना का, ‘भों’भों-खो-खो’ तथा ‘लाख की नाक, रेखा जैन का ‘अप्‍सरा का तोता’ तथा ‘थप्‍प रोटी, थप्‍प दाल’, विष्‍णु प्रभाकर का ‘ऐसे-ऐसे’, श्रीकृष्‍ण का ‘हिरण्‍यकश्‍यप मर्डर केस’, कमलेश्‍वर का ‘पैंसों का पेड़’, चिंरजीत का ‘मदारी’ और हरिकृष्‍ण देवसरे का ‘बाल संसद।

विष्‍णु प्रभाकर जी के नाटक ‘ऐसे-ऐसे’ में मोहन के पेट में ऐसा दर्द होता है, जिसका कोई इलाज नहीं कर पाता। उसका दर्द तभी शांत होता है, जब मास्‍टर जी उसे ‘होमवर्क’ पूरा करने के लिए दो दिन की छुटटी दे देते हैं। केशवचंद्र वर्मा के ‘बच्‍चों की कचहरी’ में जज बच्‍चे हैं और मुजरिम वे सभी लोग हैं, जो बच्‍चों की आज़ादी में बाधक हैं। सर्वेश्‍वरदयाल सक्‍सेना के ‘भों-भों, खो-खो’ में बच्‍चों की आपसी लड़ाई का सजीव चित्रण है। रेखा जैन का ‘गणित देश’ दिलचस्‍प नाटक है, जिसमें सोनू इसलिए स्‍कूल नहीं जाना चाहती, क्‍योंकि उसे गणित बिल्कुल अच्‍छा नहीं लगता है। गणित में उसकी रुचि जगाने के लिए क्‍या-क्‍या उपाय किए जाते हैं, यह नाटक पढ़कर ही जाना जा सकता है। बच्‍चों के हास्‍य नाटकों में के.पी.सक्‍सेना का ‘चोंचू नवाब’ और ‘दस पैसे के तानसेन’ के साथ ही विमला लूथरा का ‘मोटे मियाँ’, प्रेमलता दीप का ‘सिर मुँडाते ओले पड़े’ आदि नाटकों के बारे में पढ़ते हुए बरबस होंठों पर मुसकान आ जाती है।

प्रकाश मनु जी के बाल नाटकों में बच्‍चों की मस्‍ती, शरारतों और भीतरी ऊर्जा का सजीव चित्रण हुआ है। उनके बाल नाटकों के लगभग डेढ़ दर्जन संग्रह प्रकाशित हुए हैं। उनके ‘अजब छींक नंदू की’, ‘झटपटसिंह फटफटसिंह’, ‘मैं करमकल्‍ला नहीं हूँ’ आदि हास्‍य प्रधान नाटक हैं, तो ‘सपनों का पेड़’, ‘नए साल क्‍या-क्‍या लाओगे’ नाटक बच्‍चों के सपनों, संकल्‍पों से रू-ब-रू कराते हैं और उन्‍हें कुछ नया करने के लिए प्रेरित करते हैं। उनके नाटक ‘युद्ध अब कभी नहीं’ में सच्‍ची वीरता क्‍या है, इसे बहुत ही प्रभावी ढंग से रेखांकित किया गया है और ‘जानकीपुर की रामलीला’ तो खुद नाटक के अंदर नाटक का मजा देता है। इसमें गाँव में रामलीला की तैयारियों और उत्‍साह का ऐसा माहौल रचा गया है, जिसे महसूस किया जा सकता है। ऐसी रामलीला के उल्‍लासमय वातावरण में पाठक का मन भी खुशी से झूम उठता है।

यह प्रकाश मनु जी की कलम का जादू ही है कि उनके नाटकों को पढ़ते समय हम उन्‍हें सामने घटित होता महसूस करने लगते हैं। नाटक के पात्रों के चुटीले संवाद और घटना-क्रम के साथ प्रसंगानुकूल गीत और कविता का समावेश पाठक को मंत्र-मुग्‍ध किए रहते हैं। मनु जी ने पर्यावरण, युद्ध, निरक्षरता निवारण आदि जैसे सामयिक और जरा गंभीर मुद्दों पर भी नाटक लिखे हैं।

पुस्‍तक में ऐसे नाटककारों का जिक्र भी हैं, जिन्‍होंने बच्‍चों के लिए अधिक नाटक नहीं लिखे। लेकिन उन्‍होंने जो नाटक लिखे हैं, उनका अपना एक अलग मुकाम है। इनमें चंद्रदत्‍त ‘इंदु’ का ‘एक मूँछ और’, प्रसाद निष्‍काम का ‘ओना मासी धम’ तथा देवेंद्र कुमार का ‘छुट्टी का दिन’ बहुत सशक्‍त और प्रभावी नाटक हैं।

हिंदी बाल साहित्‍य का इतिहास पुस्‍तक में बाल कविता, कहानी, उपन्‍यास और नाटक के अलावा बाल साहित्‍य के तीन अन्‍य पक्षों का भी विस्‍तृत विवेचन और विश्‍लेषण है। बाल साहित्‍य के ये आयाम हैं—बाल ज्ञान-विज्ञान साहित्‍य, बाल जीवनी तथा अन्‍य विधाएँ (जैसे संस्‍मरण, यात्रा-वृत्‍तांत, रेखाचित्र, पत्र आदि) तथा बाल पत्रिकाएँ। इन विधाओं के बारे में जानना भी बहुत रुचिकर है। 


ज्ञान-विज्ञान की नई बातें

विज्ञान साहित्‍य आज की जरूरत है और चुनौती भी। निश्‍चय ही बच्‍चों के लिए लिखा गया विज्ञान साहित्‍य सहज, सरल भाषा में होने के साथ ही प्रामाणिक भी होना चाहिए। ऐसे साहित्‍य की सार्थकता तभी है, जब वह बच्‍चों के मन में नया सोचने और कुछ बेहतर करने की इच्‍छा जगाए। उनके कल्‍पना-लोक को सही दिशा और पंखों को नई परवाज़ दे। आज़ादी से पहले ‘सरस्‍वती’ पत्रिका में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने विज्ञान संबंधी लेख और वैज्ञानिकों के जीवन-चरित छापकर हिंदी में बाल विज्ञान लेखन को बढ़ावा दिया। उनके संपादन में इस पत्रिका में विज्ञान के नये आविष्‍कारों की विज्ञान कथाएँ भी छपीं।

इसके बाद इसी कालखंड में अन्‍य अनेक विज्ञान संबंधी विषयों पर पुस्‍तकें छपीं, जिनमें ‘आग की कहानी’, ‘बिजली की लीला’, ‘आकाश की सैर’, ‘आविष्‍कारों की कहानी’ आदि अत्‍यंत महत्त्वपूर्ण जानकारी देने वाली पुस्‍तकें थीं। इसी समय की बात है जब आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की ‘विश्‍व परिचय’ नामक पुस्‍तक का हिंदी में अनुवाद किया था। यह बात हमें बाल साहित्‍य के इतिहास की इस पुस्‍तक से ही ज्ञात होती है।

गौरव युग के विज्ञान संबंधी बाल साहित्‍य में रमेश वर्मा की ‘झिलमिल सितारे’ अंतरिक्ष ग्रहों और तारों की जानकारी देने वाली पुस्‍तक है। इस पुस्‍तक के संबंध में मनु जी ने लिखा है कि “रमेश वर्मा की भाषा में ऐसा आकर्षण है कि झिलमिलाते सितारों पर लिखी गई यह पुस्‍तक किसी परीलोक की सैर जैसी लगती है।” इसके अलावा रमेश वर्मा ने रेडियो, टेलीवीजन, रॉकेट, उड़नतश्‍तरी पर भी किताबें लिखी हैं। इसी युग में गुणाकर मुले ने हिंदी विज्ञान लेखन को बहुत समृद्ध किया है। उनकी ‘प्राचीन अंकों की कहानी’, ‘लिपियों की कहानी’, ‘अक्षरों की कहानी’, ‘भारतीय विज्ञान की कहानी’ ‘प्राचीन भारत के महान वैज्ञानिक’ आदि अत्‍यंत महत्त्वपूर्ण पुस्‍तकें हैं। इसके साथ ही ‘आर्यभट’, ‘भास्‍कराचार्य’ भी ऐसी पुस्‍तकें हैं, जिन्‍होंने बच्‍चों में विज्ञान के प्रति रुचि जगाई।

गुणाकर मुले के योगदान को सम्‍मान से याद करते हुए प्रकाश मनु जी ने लिखा है, “बाल पाठकों को विज्ञान की दुर्लभ और महत्त्वपूर्ण जानकारी देने में जितना कठिन परिश्रम अकेले गुणाकर मुले ने किया है, उतना शायद दस-बीस लेखकों ने मिलकर भी न किया हो। गुणाकर मुले की खासियत यह है कि वे प्राच्‍य भारतीय विद्या के विद्वान तो हैं ही, पाश्‍चात्‍य ज्ञान-विज्ञान की भी उन्‍हें गहरी समझ है।” कोई आश्‍चर्य नहीं कि गुणाकर मुले जी की पुस्‍तकों से प्रेरणा पाकर जो कल बच्‍चे थे, वे आज कुशल वैज्ञानिक बनकर देश की सेवा कर रहें हों।

हरिकृष्‍ण देवसरे की ‘नील गगन पर उड़ते विमान’ तथा ‘सागर पर चलते जलयान’ भी विज्ञान के रहस्‍यों से जुड़ी दिलचस्‍प पुस्‍तकें हैं। जयप्रकाश भारती जी की पुस्‍तक ‘कितना अनजाना तुम्‍हारा कारखाना’ में मनुष्‍य के शरीर को एक कारखाने के रूप में दर्शाया गया है। इस कारखाने के सभी अंग अपना-अपना काम निर्धारित पद्धति से करते हैं। मनुष्‍य की अपनी लापरवाही ही इन अंगों या मशीनी भाषा में कहें तो कलपुर्जों के सुचारु संचालन में बाधा उत्‍पन्‍न करती है। मनु जी के शब्‍दों में, “बच्‍चों के लिए विज्ञान की अच्‍छी पुस्‍तकें कैसे लिखी जाएँ, इसके मॉडल के रूप में भारती जी की इस पुस्‍तक को प्रस्‍तुत किया जा सकता है।”

इसी प्रकार वीरकुमार अधीर की ‘मस्‍तिष्‍क के रहस्‍य’, श्रीकृष्ण की ‘विज्ञान की मजेदार बातें’, योगेंद्रकुमार लल्‍ला की ‘खेल भी विज्ञान भी’, रत्‍नप्रकाश शील की ‘विज्ञान की कहानियाँ’, वेदमित्र की ‘दूरबीन की कहानी’ आदि के बारे में मनु जी ने इस पुस्‍तक में जो जानकारी दी है, उससे यह जाहिर हो जाता है कि गौरव युग में बच्‍चों के लिए ज्ञान-विज्ञान से संबंधित कितना अधिक और सार्थक साहित्‍य लिखा गया है, जिससे हम शायद अभी तक अनजान ही हैं।

विकास युग को कंप्यूटर युग भी कहा जा सकता है। इस युग में आधुनिक भारत की उपलब्धियों और नई तकनीक से जुड़ी जानकारी देने वाली अनेक पुस्‍तकें प्रकाशित हुई हैं। इस युग का प्रतिनिधित्‍व करने वाली कुछ उल्‍लेखनीय पुस्‍तकें हैं—रमेशदत्‍त शर्मा की ‘धान कथा’, देवेंद्र मेवाड़ी की ‘फसलें कहें कहानी’, दिलीप एम. सालवी की ‘वैज्ञानिकों की रोचक बातें’, प्रकाश मनु की ‘अजब–अनोखी विज्ञान कथाएँ’, ख्‍वाजा अहमद अब्‍बास की ‘फिल्‍म कैसे बनती है’ आदि। प्रकाश मनु जी के अनुसार इन किताबों को इतना रस लेकर और इतने आधिकारिक ढंग से लिखा गया है कि बच्‍चे बार–बार इन किताबों को पढ़ना पसंद करते हैं।

इतना ही नहीं बाल साहित्‍य के इतिहास की इस पुस्‍तक में मनु जी ने जीव–जंतुओं, पशु-पक्षियों और वनस्‍पति जगत के बारे में लिखी गई रोचक पुस्‍तकों की विस्‍तृत जानकारी भी दी है। बच्‍चों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करने वाली पुस्‍तकों पर भी अलग से प्रकाश डाला गया है। नदियों की कहानी हो या खेल–खेल में विज्ञान की बात, फंतासी से जुड़ी विज्ञान कथाएँ हों या हिंदी में अनूदित ज्ञान-विज्ञान साहित्‍य, भला कौन सा ऐसा पक्ष है जो इस पुस्‍तक में मनु जी की पैनी नज़र से छूटा हो। कितना व्‍यापक और विस्‍तृत है उनके अध्‍ययन और मनन का फलक। 


बाल जीवनियाँ- बच्चों के लिए प्रेरणा-स्रोत

बाल जीवनियाँ साहित्‍य की ऐसी विधा हैं जो बच्‍चों को वर्तमान के साथ–साथ अतीत में झाँकने और भविष्‍य की परिकल्‍पना करने की सुविधा देती है। बाल जीवनियों से प्रेरणा लेकर बच्‍चा यह सोचने व समझने लगता है कि वह भविष्‍य में कैसा बनना चाहेगा या क्‍या करना चाहेगा। एक तरह से जीवनियाँ बच्‍चों के लिए भविष्‍य के कपाट खोलती हैं। आजा़दी से पहले महापुरुषों की जो जीवनियाँ लिखी गईं, उनमें बच्‍चे के मन में नैतिकता, राष्‍ट्रीयता और स्‍वाभिमान के अंकुर रोपित करने का भाव प्रमुख था। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के प्रयासों से ‘बालसखा’ पत्रिका में ऐसी जीवनियाँ छपीं जो बच्‍चों को वीर और निडर बनाती थीं।

कथा-सम्राट प्रेमचंद ने ‘शेख सादी’ और ‘दुर्गादास’ की जीवनियाँ लिखीं थीं। इसके अलावा उनकी एक और पुस्‍तक ‘कलम, तलवार और त्‍याग’ शीर्षक से छपी थी, जिसमें लेखकों, कलाकारों, संतों, समाज सुधारकों, स्‍वाधीनता सेनानियों, इतिहास पुरुषों और जननायकों के जीवन पर प्रेमचंद ने लिखा था। निश्‍चय ही यह पुस्‍तक अपने आप में बच्‍चों के लिए ऐसा प्रेरणा-स्रोत होगी, जिसने बच्‍चों के मन-मस्‍तिष्‍क पर जादू का सा असर किया होगा। क्‍यों न हम आज भी प्रेमचंद की ये पुस्‍तकें खुद भी पढ़ें और नयी पीढ़ी को भी उपहार में दें।

प्रकाश मनु जी हमें बताते हैं कि गौरव युग में गौरव युग में सबसे अधिक जीवनियाँ क्रांतिकारियों और स्‍वाधीनता सेनानियों की लिखी गईं। इस युग में लिखी गई लेखकों, कलाकारों, समाज सुधारको की जीवनियों की जानकारी भी इस पुस्‍तक से हमें मिलती है। शायद कम लोग जानते होंगे कि डॉ रामविलास शर्मा जी ने ‘निराला की साहित्‍य साधना’ पुस्‍तक से पहले बच्‍चों के लिए ‘सूर्यकांत त्रिपाठी निराला’ शीर्षक से पुस्‍तक लिखी थी। यह पुस्‍तक पिता और पुत्री के संवाद के रूप में लिखी गई है, जिसमें वे निराला जी के बड़े कद के विशाल व्‍यक्‍तित्‍व तथा उनके जीवन संघर्ष के बारे में अपनी पुत्री को बताते हैं। बताने का अंदाज़ इतना अनूठा है, मानो वह नन्‍ही, अबोध बच्‍ची की उँगली पकड़कर उसे निराला जी जैसी शख्सियत से मिलाने ले जा रहे हों।

इसी प्रकार विष्‍णु प्रभाकर जी ने शरतचंद की कालजयी जीवनी ‘आवारा मसीहा’ तो बाद में लिखी थी, इससे पहले उन्‍होंने बच्‍चों के लिए शरतचंद की संक्षिप्‍त, किंतु अत्‍यंत रोचक जीवनी लिखी थी। बाल जीवनी-माला सीरीज के अंतर्गत पीपुल्‍स पब्‍लिशिंग हाउस से प्रकाशित उनकी इस पुस्‍तक में शरतचंद के बचपन, उनके स्‍वभाव, साहित्‍यिक रुचियों और संधर्षमय जीवन की झलक है। इसी तरह बाबा नागार्जुन ने भी बच्‍चों के लिए ‘प्रेमचंद’ की जीवनी लिखी है। इसमें प्रेमचंद और उनकी पत्‍नी शिवरानी देवी के आपसी संवाद के साथ ही प्रेमचंद के सरल स्‍वभाव के प्रसंग और कठिनाइयों से भरे जीवन का चित्रण है।

पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस (पीपीएच) से प्रकाशित रजिया सज्‍जाद जहीर की ‘मिर्जा गालिब’, भदंत आनंद कौसल्‍यायन की ‘राहुल सांकृत्‍यायन’ भी रोचक और पठनीय जीवनियाँ हैं, जिन्‍हें बहुत सराहा गया है। इतना ही नहीं, बाल जीवनी-माला के अंतर्गत विश्‍वप्रसिद्ध वैज्ञानिकों जैसे डार्विन, एडीसन, मैडम क्‍यूरी, जगदीशचंद्र बसु और कोपरनिकस की जीवनियाँ भी आधिकारिक विद्वानों से लिखवाकर छापी गईं। इन जीवनियों की विशेषता यह थी कि इनके लेखकों ने सीधी-सरल भाषा में घटनाओं एवं तथ्‍यों को प्रस्तुत करके, इन पुस्तकों को बच्‍चों के लिए रोचक बनाए रखने का पूरी शिद्दत से प्रयास किया।

इसी कालखंड में प्रकाशित नित्‍यानंद तिवारी की ‘पाँच पांडव’, जगदीश विद्यालंकर की ‘पुरखों का चरित्र‍’, जगदीश भारती की ‘विज्ञान की विभूतियाँ’ और वेदमित्र की ‘प्रतिभा के पुत्र’ बड़ी साहसपूर्ण और भावनात्‍मक पुस्‍तकें हैं, जो असाधारण काम करने वाले नायको की छवियाँ बच्‍चों के मन में उकेरती हैं। इसी तरह सुभाष मुखोपाध्‍याय द्वारा लिखी गई जगदीशचंद्र बसु तथा वजीर हसन आब्‍दी द्वारा लिखी गई कोपरनिकस और रामानुजन की जीवनियाँ भी बहुत आकर्षक हैं।

भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित ‘भारत के गौरव’ सीरीज़ का भी अपना अलग महत्त्व है। यह जानकर आश्‍चर्य होता है कि यह सीरीज़ नौ खंडों में प्रकाशित हुई है, जिसमें लगभग पौने दो सौ महान विभूतियों के जीवन-चरित एक साथ सामने आते हैं। बाल जीवनी लेखन के विकास युग की विशेषता है, रचनाओं की विविधता और कलात्‍मक निखार। इस युग की प्रमुख जीवनियों का उल्‍लेख करते हुए प्रकाश मनु जी ने कुछ रचनाओं को खास तौर से रेखांकित किया है। इनमें अक्षयकुमार जैन की ‘देश-विदेश के महापुरुष’ पुस्तक भी है, जिसमें देश-विदेश के बीस महापुरुषों के जीवन की रोचक झलकियाँ हैं। डॉ राजेंद्रप्रसाद श्रीवास्‍तव की ‘भारत के शिक्षा-शास्‍त्री’ पुस्तक में अपने उच्‍च विचारों से देश को नयी राह दिखाने वाले शिक्षा-शास्‍त्रियों के जीवन दर्शन का बड़ी सरल भाषा में वर्णन है। 
स्वयं बाल साहित्य के इतिहासकार प्रकाश मनु जी की ‘जो खुद कसौटी बन गए’ में महात्‍मा गाँधी, स्‍वामी विवेकानंद, स्‍वाधीनता सेनानी महिलाओं तथा हिंदी-सेवी महापुरुषों की प्रेरक बातों को प्रस्‍तुत किया गया है। उषा यादव की ‘सुनो कहानी : नानक बानी’ में गुरु नानक के व्‍यक्तिव और मानवतावादी बातों को शामिल किया गया है। डॉ. सुनीता ने देश-विदेश के अट्ठाईस महानायकों की जीवन-गाथा प्रस्‍तुत की है, जिन्‍होंने अपना जीवन दुनिया को बेहतर बनाने के प्रयासों में लगाया है। ये जीवनियाँ बच्‍चों को सही और सकारात्‍मक सोच के साथ जीवन में कुछ अच्‍छा करने और समाज को कुछ नया देने के लिए प्रेरित करती हैं।

बाल साहित्‍य की वरिष्‍ठ लेखिका शांति अग्रवाल ने ‘भारत के राष्‍ट्रपति: राजेंद्र बाबू से कलाम तक’ किताब लिखी। इसमें उन्‍होंने सभी राष्‍ट्रपतियों पर आत्‍मीयता से लिखा है। खास बात यह कि जिन राष्‍ट्रपतियों से वे स्‍वयं मिलीं, उनके अंतरंग संस्‍मरण भी इसमें शामिल हैं। रत्‍नप्रकाश शील ने ‘शांति-दूत की देन’ पुस्‍तक में जवाहरलाल नेहरू के जीवन प्रसंगों को प्रस्‍तुत किया है। बेहद सक्रिय रहने वाले श्‍यामसिंह ‘शशि’ ने महान बलिदानी विरसा मुंडा के जीवन की वीरतापूर्ण घटनाओं का परिचय कराने वाली पुस्‍तक ‘स्‍वतंत्रता सेनानी विरसा मुंडा’ लिखी। उनकी ‘भारत के यायावर’ भी एक अत्‍यंत महत्त्वपूर्ण पुस्‍तक है।

वर्तमान दौर में के.सी. खन्‍ना द्वारा लिखी ‘भारत में विदेशी यात्री’ पुस्तक में चार विदेशी यात्रियों—मेग्‍स्‍थनीज़, फाह्यान, ह़वेनसांग तथा अलबरूनी के जीवन, व्‍यक्‍तित्‍व की खूबियों और उनकी भारत-यात्रा का रुचिकर वर्णन है। प्रकाशन विभाग द्वारा ‘भारत की महान नारियाँ’ श्रृंखला के अंतर्गत ऐसी जीवनियाँ प्रकाशित की गईं जो महिलाओं के त्‍याग, आत्‍मसम्‍मान, दृढ़ निश्‍चय, आंतरिक शक्ति और अदम्‍य संघर्ष पर प्रकाश डालती हैं। इस पुस्‍तक में मनु जी ने इसी संदर्भ में कुछ अन्‍य महान विभूतियों का उल्‍लेख करते हुए कामना की है कि “बेहतर होगा, अगर महादेवी वर्मा, महाश्‍वेता देवी, आशापूर्णादेवी, इंदिरा गाँधी, बछेंद्रीपाल, कर्णम मल्‍लेश्‍वरी, पी.टी. उषा जैसी साहसी महिलाओं के जीवन संबंधी पुस्‍तकें भी बच्‍चों के लिए लिखी जाएँ।”

जीवनियों के अलावा महापुरुषों के प्रेरक प्रसंगों के आधार पर प्रकाशित पुस्‍तकों पर प्रकाश मनु जी ने अलग से चर्चा की है। ऐसी पुस्‍तकों का महत्त्व भी बच्‍चों के लिए कम नहीं है। 


बाल पत्रिकाएँ- बच्‍चों से सीधा संवाद

बाल साहित्‍य को पाठकीय मंच प्रदान करने में बाल पत्रिकाओं का अहम योगदान रहा है। ये पत्रिकाएँ बच्‍चों के मानसिक विकास में मददगार रही हैं। पुस्‍तकों की अपेक्षा पत्रिकाएँ कम खर्च पर और आसानी से मिल जाती हैं। इसीलिए इनकी पहुँच बच्‍चों तक हमेशा रही है। प्रारंभिक बाल पत्रिकाएँ, जो बच्‍चों की रुचियों को ध्‍यान में रखकर निकाली गईं, वे थीं—‘बालहितकर’, ‘बाल विनोद’, ‘बाल प्रभाकर’, ‘बाल हितैषी’, ‘मॉनीटर’ आदि। इन पत्रिकाओं में इनके योग्‍य संपादकों द्वारा यद्यपि बच्‍चों के लिए बहुत अच्‍छी रवनाएँ और बालोपयोगी विविध सामग्री प्रकाशित की गई, फिर भी ये पत्रिकाएँ कुछ वर्षों तक ही जारी रही पाईं।

इसके पश्‍चात इलाहाबाद से ‘शिशु’ और ‘बालसखा’ पत्रिकाओं का प्रकाशन किया गया। ये पत्रिकाएँ लंबे समय तक निकलती रहीं। ‘शिशु’ बयालीस वर्षों तक निकली और इंडियन प्रेस से प्रकाशित ‘बालसखा’ तिरेपन वर्षों तक। इन दोनों पत्रिकाओं ने अच्‍छा बाल साहित्‍य उपलब्‍ध कराने की दिशा में ऐतिहासिक काम किया। इसी प्रकार ‘बालक’ भी एक स्‍तरीय बाल पत्रिका थी, जिसका प्रकाशन आजादी के बाद भी लंबे समय तक जारी रहा। स्‍वतंत्रता संग्राम के समय तथा उसके बाद भी अनेक बाल पत्रिकाएँ सामने आईं, जिनमें से प्रमुख थीं—‘खिलौना’, ‘वानर’ और ‘चमचम’। इन पत्रिकाओं ने बाल साहित्‍य के विकास में बहुत योगदान दिया।

आज़ादी के बाद ठाकुर श्रीनाथसिंह के संपादन में मित्र प्रकाशन से लोकप्रिय पत्रिका ‘मनमोहन’ निकली। इस पत्रिका ने बाल साहित्‍य को नई दिशा देने के साथ ही, नये लेखकों को प्रोत्‍साहित किया। मनु जी ने इस पत्रिका के संबंध में लिखा है कि “बाल साहित्‍य’ में वरिष्‍ठ पीढ़ी के बहुत से लेखक ऐसे हैं, जिन्‍हें सामने लाने का श्रेय ‘मनमोहन’ को है।” इसी दौरान स्‍थायी महत्त्व की जो उल्‍लेखनीय पत्रिकाएँ प्रकाशित हुईं, वे थीं—‘बाल भारती’, ‘चंदामामा’, ‘नंदन’, ‘चंपक’, ‘मेला’ आदि।

‘बाल भारती’ पत्रिका भारत सरकार के प्रकाशन विभाग से 1948 में निकाली गई। इसके संपादन का कार्य साहित्‍य मनीषियों ने समय–समय पर सँभाला। इसे देवेंद्र सत्‍यार्थी, मन्मथनाथ गुप्‍त और द्रोणवीर कोहली जैसे संपादकों की सोच और रचनात्‍मक दृष्टि का लाभ मिला। इसमें बच्‍चों को देश और समाज की रोचक जानकारी देने वाले लेख छपे। साथ ही मैथलीशरण गुप्‍त, भीष्‍म साहनी, कृश्‍न चंदर, इस्‍मत चुगताई, कृष्‍णबलदेव वैद सहित हिंदी के अनेक दिग्‍गज साहित्‍यकारों की कहानियाँ भी इसमें छापी गईं। इसके एक वर्ष बाद 1949 में चेन्‍नई से ‘चंदामामा’ पत्रिका निकली, जिसके रंगीन चित्र, साज-सज्‍जा बहुत आकर्षक थी। इसमें प्रकाशित विक्रम-वेताल की कहानी को भला कौन भुला सकता है? यह पत्रिका यद्यपि अभी भी प्रकाशित हो रही है, लेकिन इसमें अब वह आकर्षण नही रहा, जो पहले था। 
बाल साहित्‍य की पत्रिकाएँ, जिन्‍होंने अखिल भारतीय स्तर की अपनी अलग पहचान बनाई, वे थीं— टाइम्‍स ऑफ इंडिया प्रतिष्‍ठान की बाल पत्रिका ‘पराग’, हिंदुस्‍तान टाइम्‍स की ‘नंदन’ और दिल्‍ली प्रेस की ‘चंपक’। ‘चंपक’ छोटे बच्‍चों की तो ‘पराग’ और ‘नंदन’ कुछ बड़े बच्‍चों की पत्रिकाएँ थीं। ‘चंपक’ क्‍योंकि छोटे बच्‍चों की पत्रिका थी, इसलिए बच्‍चों के मन को भाने वाली जानवरों की कहानियाँ इसमें छापी गईं। इससे बड़े और व्‍यापक स्‍तर की पत्रिका ‘नंदन’ में बच्‍चों के बहुमुखी विकास को ध्‍यान में रखकर उत्‍कृष्‍ट रचनाएँ छापी गईं।

मनु जी के शब्‍दों में, “‘नंदन’ का जोर शुरू से ही बच्‍चों के संपूर्ण विकास पर रहा, जिसमें मनोरंजन, जानकारी और रचनात्‍मक प्रतिभा का विकास—तीनों बिंदुओं के बीच संतुलन साधने की कोशिश की गई।” इस पत्रिका के संपादक कथाकार राजेंद्र अवस्‍थी और जयप्रकाश भारती जी रहे थे। इस पत्रिका में जवाहरलाल नेहरू से अटलबिहारी वाजपेयी तक अनेक बड़े राजनेताओं के लेख और अमृतलाल नागर से लेकर रामदरश मिश्र तक सभी बड़े साहित्‍यकारों की रचनाएँ प्रकाशित की गईं। अपनी सरल, सहज और सरस भाषा तथा अच्‍छी पठनीय सामग्री के कारण ‘नंदन’ की लोकप्रियता निर्विवाद बनी रही।

इसी प्रकार मुंबई से प्रकाशित ‘पराग’ भी बाल साहित्‍य की घर-घर में पढ़ी जाने वाली पत्रिका रही है। इसके प्रथम संपादक सत्‍यकाम विद्यालंकार थे। इससे कालांतर में समय-समय पर जुड़े साहित्‍यकारों आनंदप्रकाश जैन, कन्‍हैयालाल नंदन, सर्वेश्‍वरदयाल सक्‍सेना और हरिकृष्‍ण देवसरे की संपादन-कला का इसे बेहद लोकप्रिय बाल पत्रिका बानाने में अप्रतिम योगदान रहा। ‘पराग’ में यात्रा-वृत्‍तांत, ऐतिहासिक स्‍थलों का विवरण, विज्ञान-कथाओं, नाटकों, कहानियों, धारावाहिक उपन्‍यासों आदि का नियमित रूप से प्रकाशन किया गया। बेशक हिंदी बाल साहित्‍य को नयापन देने और उसे आधुनिक सरोकारों से जोड़ने में ‘पराग’ का बड़ा योगदान रहा है। दुर्भाग्‍य से किन्हीं कारणों से इसका प्रकाशन अब बंद हो गया है।

ऐसी बाल पत्रिकाएँ जो काफी लोकप्रिय थीं, लेकिन व्‍यावसायिक दबावों के कारण अधिक समय तक जारी नहीं रह पायीं, वे थीं—रत्‍नप्रकाश शील द्वारा संपादित ‘मिलिंद’ और योगेंद्रकुमार लल्‍ला द्वारा संपादित ‘मेला’। इसी तरह अपनी अदभुत सर्जनात्‍मक क्षमता और नये तेवरों के बावजूद कुछ अच्‍छी बाल पत्रिकाएँ ज्‍यादा समय तक बच्‍चों के साथ नहीं रह पाईं। ये पत्रिकाएँ थीं – ‘नन्‍हे तारे’, ‘किशोर लेखनी’, ‘बाल मेला’, ‘समझ झरोखा’ आदि।

गत दो दशको से श्री भैरूँलाल गर्ग द्वारा भीलवाड़ा से प्रकाशित ‘बालवाटिका’ बाल साहित्‍य की एक महत्त्वपूर्ण पत्रिका बनी हुई है। यह एक ऐसी समग्र पत्रिका है जिसमें कविता, कहानी से लेकर गंभीर आलोचनात्‍मक लेख, यात्रा-वृत्‍तांत, संस्‍मरण, पुस्‍तक समीक्षा, चिट्ठी और बाल साहित्‍य के सरोकारों से जुड़ी विविध संगोष्ठियों, समारोहों की रिपोर्ट आदि छपती हैं। इस पत्रिका का कलेवर इतना सहजता और आत्‍मीयता से परिपूर्ण है कि इसे मनु जी ने एक ऐसी ‘पारिवारिक चौपाल’ कहा है, जिसमें लेखक अपनी रचनाएँ साझा करते हुए खुलकर चर्चा भी करते हैं। इसीलिए प्रकाश मनु जी ने आने वाले समय में इसकी अकूत संभावनाओं की ओर इशारा करते हुए लिखा है कि “सच पूछिए तो बाल साहित्‍य की सही आलोचना की राह यहीं कहीं से निकलेगी।”

इसके अलावा ‘बालवाणी’ और ‘चकमक’ भी ऐसी बाल पत्रिकाएँ हैं, जिन्‍होंने बाल साहित्‍य के विकास में उल्‍लेखनीय भूमिका निबाही है, साथ ही बच्‍चों की रचनात्‍मकता को प्रोत्‍साहित भी किया है।

वर्तमान समय की जिन अन्‍य बाल पत्रिकाओं पर बाल साहित्‍य के इतिहास की इस पुस्‍तक में प्रकाश डाला गया है वे हैं—‘अभिनव बालमन’, ‘अपना बचपन’, ‘बाल प्रहरी’, ‘नई पौध’ और ‘नन्‍ही कलम’। इनमें रामकुमार कृषक के संपादन से सज्जित ‘नई पौध’ में एक बच्‍चे की डायरी के प्रकाशन तथा बच्‍चों से लिए गए इंटरव्‍यू के प्रकाशन जैसे अभिनव प्रयोग किए गए, जिन्‍हें सभी ने काफी पसंद किया। इसके अलावा श्‍याम सुशील ने भी बच्‍चों को साथ लेकर अपनी पत्रिका ‘नन्‍ही कलम’ को ऐसा नयापन दिया कि इस पत्रिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। पत्रिका में बाल साहित्‍य के लेखकों के साथ बच्‍चों की अपनी रचनाएँ उन्‍हीं की हस्‍तलिपि में छापा जाना पत्रिका को और अधिक आकर्षक बना देता है।


अन्‍य विधाएँ- नई दिशाएँ

हिंदी बाल साहित्‍य का इतिहास पुस्‍तक में बाल कविता, कहानी, उपन्‍यास, नाटक, ज्ञान–विज्ञान, बाल जीवनियाँ और बाल पत्रिकाओं के अलावा बाल साहित्‍य की कुछ अन्‍य विधाओं का भी विस्‍तृत विवेचन और विश्‍लेषण किया गया है। अन्‍य विधाएँ जो बाल साहित्‍य में अपना स्‍थान बना चुकी हैं, वे हैं – आत्‍मकथा, संस्‍मरण, यात्रा-वृत्‍तांत, रेखाचित्र, डायरी-अंश, पत्र आदि। इन विधाओं के बारे में जानना भी बहुत रुचिकर है। इन विधाओं के तहत रचनाएँ पहले पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई और बाद में इनकी छोटी–छोटी पुस्‍तकें भी निकलीं। कुछ बेहतरीन आत्‍मकथात्मक पुस्‍तकें हैं—जयप्रकाश भारती की ‘उनका बचपन यों बीता’, श्रीकृष्‍ण द्वारा संपादित ‘मेरा बचपन’, बचेंद्रीपाल की ‘एवरेस्‍ट : मेरी शिखर-यात्रा’ तथा प्रभा शुक्‍ल की ‘साक्षरता के पड़ाव’। इनमें अनेक रोचक व ज्ञानवर्द्धक बातों को आत्‍मकथात्‍कम शैली में प्रस्‍तुत किया गया है।

इसी प्रकार संस्‍मरण लेखन भी एक ऐसी विधा है जो अतीत के खट्टे–मीठे अनुभवों को साझा करती है। ‘बालवाटिका’ का मई 2016 अंक संस्‍मरण विशेषांक के रूप में प्रकाशित किया गया। इस अंक को सभी ने बहुत पसंद किया। दिविक रमेश की ‘फूल और फल भी’, रमाशंकर द्वारा संपादित ‘साहित्‍यकारों के संस्‍मरण’, ‘साहित्‍यकारों का बचपन’ आदि संस्‍मरण विधा को केंद्र में रखकर लिखी गई अच्‍छी पुस्‍तकें हैं। इसी प्रकार आठ वर्ष के शिवांक की पुस्‍तक ‘आज से मैंने सोचा’, अपूर्वा जगत की ‘समंदर के तट पर’, सविता चड्ढा की ‘मुसकान की डायरी’ आदि पुस्तकें डायरी लेखन विधा के माध्‍यम से बच्‍चों के अंतर्मन के बंद कपाट खोलती हैं। इस संबंध में मनु जी ने लिखा है कि “इस तरह की डायरियाँ सामने आएँ तो बच्‍चों के मन और भीतरी जगत के खुलने के साथ-साथ उनकी भाषा के बड़े जीवंत और विलक्षण नमूने भी सामने आएँगे।”

इसके अलावा पुस्‍तक में पत्र विधा का भी मनु जी ने उल्‍लेख किया है। इसमें नेहरू जी की पुस्‍तक ‘पिता के पत्र पुत्री के नाम’ तथा चंद्रपाल सिंह ‘मयंक’ की ‘चाचा नेहरू का पत्र बच्‍चों के नाम’, पत्रों के आत्‍मीयता भरे लहजे में देश-दुनिया की बातें बताती हैं। डॉ सुनीता की पुस्‍तक ‘खेल-खेल में बातें’ में भी पत्र-शैली में कुरुक्षेत्र-यात्रा का वर्णन है। इसी प्रकार निबंध, यात्रा-वृत्तांत, चित्रकथाएँ और पहेलियाँ भी हर उम्र के बच्‍चों से वास्‍ता रखने वाली सुंदर विधाएँ हैं। इन विधाओं पर भी प्रकाश मनु जी ने प्रकाश डाला है। इसके साथ ही ‘नन्‍ही कलम’ पत्रिका ने तो बच्‍चों से इंटरव्‍यू भी प्रकाशित किए, जिसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था। बच्‍चों का मन गीली मिट्टी सा सोंधी सुगंध लिए होता है, जिसके पास जाना अपने आप में एक अनूठा अनुभव है।

इन सब नई-नई विधाओं के संबंध में प्रकाश मनु जी का यह कथन गौर करने योग्‍य है कि “इधर बाल साहित्‍य का इतिहास लिखने बैठा तो अवाक रह गया। लगा, बाल साहित्‍य जिसे ‘एक छोटा पोखर’ कहकर मज़ाक उड़ाया जाता रहा है, वह तो एक अगाध समंदर है, जिसकी सीमाएँ दूर-दूर के अनुभव प्रदेशों को छू आई हैं।”

सच तो यह है कि बाल साहित्‍य का इतिहास लिखकर प्रकाश मनु जी ने अच्‍छे और सार्थक बाल साहित्‍य के मानदंडों को रेखांकित किया है। उनके इस श्रमसाध्‍य कार्य से नई कलमों को नई सर्जनात्‍मक दिशा मिलेगी। बेशक यह एक अत्‍यंत गंभीर किस्‍म का कार्य है। इसके बावजूद भाषा की सहजता, सरलता व प्रवाह के कारण इसको पढ़ते समय कहानी पढ़ने जैसा आनंद आता है। इस पुस्‍तक में प्रकाश मनु जी ने बाल साहित्‍य की विविध विधाओं की जिन उपलब्‍धियों और विशेषताओं से अवगत कराया है, वे निश्‍चय ही ऐतिहासिक महत्त्व की हैं।

यों सच तो यह है कि बाल साहित्‍य रूपी उद्यान के एक-एक फूल के पास जाना अभी बाकी है। पूरे उद्यान का आनंद लेने और इसकी हरियाली के बीच सैर करके तरोताजा होने के लिए हम यहाँ जितनी बार आएँ, उतना कम है।
*

सोना शर्मा, 786 सेक्टर-46, फरीदाबाद (हरियाणा), चलभाष: +91 995 858 0248

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।