समीक्षा: 'भ्रान्ति' के बहाने कहानी की खोज

समीक्षक: विजय कुमार तिवारी


समीक्षित कृति: भ्रांति
लेखक: डॉ. भोलाशंकर मिश्र

आज कहानी केवल भावनाओं तक सीमित नहीं है, केवल संकटों की चर्चा नहीं करती बल्कि संघर्षों की गाथा लिए होती है और उसका विस्तार बहुत उम्मीदें जगाता है। उसका आकार-प्रकार दोनों अर्थपूर्ण होते हैं और आकर्षित करते हैं। उनका विस्तार मूल कथ्य-कथानक के साथ बहुत कुछ समेटे हुए होता है जो हमारे चिन्तन को समृद्ध करता दिखाई देता है। अक्सर कहानी के तत्वों की तलाश में सामाजिक संवेदना, धड़कता हृदय, स्पंदित मन की चर्चाएं और चुनौतियों से टकराने, संघर्ष करने की बातें होती हैं। किस कहानी को श्रेष्ठ माना जायेगा, शायद अभी भी तय नहीं हो पाया है। हाँ, इससे इतर कमजोर पक्ष की चर्चा में बहुत सी बातें की गयी हैं। यह एक तरह की उलझन है और पाठकों, समीक्षकों, आलोचकों को उलझाती है। विडम्बना यह भी है, कोई अपनी दृष्टि में जिसे अच्छी रचना बताता है, दूसरा उसी रचना से प्रसन्न नहीं होता और नाना विवेचना करता है। यहाँ तक तो ठीक है, समस्या तब खड़ी होती है जब विमर्श में जड़ता दिखाई देने लगती है। समाज गतिशील है, प्रकृति में गतिशीलता है, हमारी सम्पूर्ण सृष्टि की प्राण-चेतना में गतिशीलता, बदलाव और विकास है, ऐसे में हमारे चिन्तन, लेखन में भी गतिशील तत्व होंगे ही, हमारा साहित्य उससे अछूता नहीं रह सकता। कभी-कभी यह प्रवाह सतह पर होता है, सबको दिखाई देता है परन्तु हमेशा यह अन्तर्धारा के रुप में प्रवाहित होता है जिसे सब नहीं समझ पाते। हमारे साहित्य में यह अन्तर्धारा बहती रहती है और सृजन चलता रहता है।

कहानी गढ़ने में कई बार हमारी भीतरी मनःस्थिति, हमारी भावुकता, करुणा, हमारा उछाह, जोश प्रभावित करते हैं तो कई बार बाह्य घटनाएं, सामाजिक प्रभाव और देश, काल, परिस्थितियों का प्रभाव होता है। अक्सर देखा जाता है, एक ही घटना को भिन्न-भिन्न लोग भिन्न- भिन्न तरीके से ग्रहण करते हैं। स्वाभाविक है, सभी की कहानियाँ भिन्न-भिन्न प्रभाव लिए होंगी। मूल्यांकन करते समय या पढ़ते समय समीक्षक, पाठक या आलोचक की मनःस्थिति आदि का भी प्रभाव पड़ता है। इसलिए यह मानकर चलना चाहिए कि अपने-अपने तरीके से, अपनी-अपनी जगह सब सही हैं और सब मिलकर कथा साहित्य को या सम्पूर्ण साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं।

डा० भोला शंकर मिश्र जी के दो कहानी संग्रह मेरे सामने हैं, दोनों का प्रकाशन दिसम्बर 2021 में हुआ है और दोनों संग्रहों को मिलाकर कुल 11 कहानियाँ हैं। 'भ्रान्ति' नामक कहानी संग्रह में 4 कहानियाँ हैं और 'जीवन' नामक संग्रह में 7 कहानियाँ हैं। कहानियाँ आकार में किंचित बड़ी-बड़ी हैं, शायद औपन्यासिक प्रकृति लिए हुए हैं या कथानक बड़ा है। दोनों संग्रहों में संपादकीय टीम का वक्तव्य छपा है। 'भ्रान्ति' में टीम ने शुरुआत में ही उल्लेख किया है, "साहित्य कहीं भी पनप आता है, हरी घास की तरह। बस जरा सी नमी चाहिए। कहानियाँ हरेक जगह हैं, हरेक जिन्दगी की कोई न कोई कहानी होती है, बस कहने का सलीका चाहिए।डा० भोला शंकर मिश्र कहने का सलीका जानते हैं।" टीम की ओर से कहानीकार पर टिप्पणी उद्धृत करने योग्य है, "साहित्य की दुनिया में वे नया नाम हैं, लेकिन उनके अनुभव, उनकी सामाजिकता, उनके कथा संसार का दायरा बढ़ा देते हैं। उनकी कहानियों को पढ़ते हुए लगता है कि वे किसी का भोगा हुआ सच हमारे सामने जस का तस रख रहे हैं। यही कहानीकार की सफलता भी है।"

विजय कुमार तिवारी
डा० मिश्र केन्द्रीय रिजर्व पुलिस में चिकित्सा पदाधिकारी रहे और आईजी/मेडिकल सुपरिटेंडेंट के पद से सेवानिवृत्त हुए। परिवार में साहित्यिक वातावरण था जिसके प्रभाव में उन्होंने लिखना शुरु किया। 'मेरी बात' में उन्होंने लिखा है, " साहित्यकार पिता भुवनेश्वर मिश्र 'भुवन' की पुस्तकों की प्रूफ रीडिंग करते हुए शब्दों से परिचित हुआ।" यह भी सुखद है, उन्होंने लेखन और प्रकाशन की प्रेरणा के लिए अपने परिजनों का आभार जताया है। ऐसा सौभाग्य लेखकों को बहुत कम मिलता है, अक्सर उन्हें नाना विरोधों, संघर्षों से घर में भी गुजरना पड़ता है। उन्होंने अपनी कहानियों के सन्दर्भ में स्वयं लिखा है, "कहानियाँ मन की शान्ति के लिए लिखी गयी हैं, इसलिए थोड़ी लीक से हटकर हैं।" उन्होंने संक्षेप में अपनी कहानियों के पात्रों की चर्चा की है और उम्मीद की है कि पाठक पात्रों, परिस्थितियों, संवेदनाओं, संघर्षों, करुणा, दया, प्रेम जैसी भावनाओं से भरे अनुभवों का आस्वादन करेंगे और कहानीकार को प्रोत्साहित करेंगे।

'जिन्दगी की जद्दोजहद' 'भ्रान्ति' संग्रह की चार कहानियों में से एक है। बड़ी ही मार्मिक, संवेदनाओं से भरी, रिश्तों की असलियत बताती, औपन्यासिक पृष्ठभूमि की कहानी, सम्पूर्ण विस्तार लिए भावुक कर देने वाली है। थोड़ी भाषा की समस्या है, प्रवाह कभी-कभी खंडित होता है, कथ्य-कथानक को आपस में जोड़ने और कथा प्रवाह को बनाये रखने की आवश्यकता है। एक घटना से दूसरी घटना के विवरण का चित्रण करते समय किंचित अधिक ध्यान देने की जरूरत है। कहानी की विषय-वस्तु में जिन्दगी की जद्दोजहद और मनोविज्ञान खूब रचा-बसा है। कहानीकार ने कहानी के पात्रों को समीप से देखा और अनुभव किया है। हमारे समाज का चरित्र ऐसा ही है, कहानी वह सच दिखाती है। कहानी के मार्मिक दृश्य विचलित करते हैं और जेहन में अनेकों प्रश्न खड़ा होते हैं जिनका उत्तर किसी के पास नहीं है। कहानी का नायक प्रकृति से प्रेम करता है, जब भी मौका मिलता है या मन व्यथित होता है, वह गाँव की ओर भागता है। अमरू के जीवन का अंत भी गाँव में ही होता है और जिसकी उपस्थिति सबसे अधिक आह्लादित करती है वह टीपू है, उसका कुत्ता, आत्मीय भाव से चाटता, लिपटता। अमरू पर खुदा की नेमत बरसी है, सब कुछ है उसके पास। कहानी में हिन्दी के साथ-साथ उर्दू शब्दों की भरमार है। स्वाभाविक ही है क्योंकि कहानी के पात्र उर्दू जबान वाले हैं। उनकी तहजीब झलक रही है जो कहानी को प्रभावशाली बनाती है। अमरू को कैन्सर हो गया है। डाक्टर, दवाएं, इलाज और उसकी मनःस्थिति सब कुछ पूरे यथार्थ रुप में चित्रित हुए हैं। अमरू रिश्तों की सच्चाई समझ चुका है, जिनके लिए उसने पूरे जीवन त्याग किया, जीवन भर संघर्ष करके सबको बेहतरीन जीवन दिया, ऐसे में सब किनारा कर गये हैं। रिश्ते कितने निष्ठुर हैं, पत्नी जेबन कहती है, "खुदा के लिए इतनी जोर मत चीखिए, बच्चे नाराज होते हैं, कहते हैं सोने भी नहीं देते।" अमरू की पीड़ा देखिए, "अब मैं समझ गया था कि मेरी रुलाई, मेरी चीख उन लोगों के लिए परेशानी का कारण बन गयी है।" अमरू को डाक्टर आत्मीय लगते हैं, उनके लिए सेवइयों का पैकेट ले जाता है। पार्क में बैठे-बैठे वह अपनी जीवन-यात्रा को याद करता है। छोटी-छोटी रोचक घटनाएं उसे सुख देती हैं, उसे उन लोगों के बीच सुख मिलता है जो दूर के हैं। खून के रिश्तों ने निराश किया है। इस तरह डा० मिश्र ने भावुक कर देनी वाली कहानी लिखी है और रिश्तों के मनोविज्ञान को खूब उकेरा है।

जीवन में अक्सर ऐसी घटनाएं होती रहती हैं जिन्हें समझ पाना सहज नहीं होता। अन्तर्द्वन्द होता है, अन्तर्विरोध होता है और गुत्थियाँ ऐसी कि कोई ओर-छोर मिलना मुश्किल। कुछ वैसी ही कहानी है 'दर्द' जिसके शुरु में पीड़ित रोगी मनोहर लाल का वक्तव्य है, "मेरा दर्द मत छीनो डाक्टर, मैं दर्द-मुक्त नहीं होना चाहता, मैं मरना भी नहीं चाहता, मैं इस दर्द के साथ जीना चाहता हूँ।" डाक्टर को आश्चर्य होता है, यह भावनाप्रवण व्यक्ति है, क्षण भर में सबको भावनात्मक बंधन में बाँध दिया है। डाक्टर को मनोहर लाल जी ने पुत्रवत मान लिया है और नर्स को बेटी कहा है। अक्सर वे डाक्टर के जेहन में प्रश्नचिन्ह बनकर उभरते, दर्द के प्रति उनका विचित्र स्नेह उलझा देता है, क्यों यह व्यक्ति दर्द के साथ जीना चाहता है?कोई भी सामान्य व्यक्ति ऐसा नहीं सोच सकता। डाक्टर विचलित होते हैं जब पता चलता है कि उनके क्लिनिक और आवास को मनोहर लाल जी ने खरीद लिया है। डाक्टर उलझन में हैं, उनसे मिलने पहुँचते हैं। शहर के बाहरी छोर में उनका आवास शान्त और पेड़-पौधों से युक्त है। वहाँ कुछ विद्यार्थी हैं, उन्होंने परिचय दिया, "ये हैं डाक्टर नारायण, मेरे पुत्र।" छात्रों के चेहरों पर आश्चर्य के भाव उभरते हैं। उन्होंने कहा, "इसमें आश्चर्यचकित होने की कोई बात नहीं, बाल्यावस्था में पोषण करता है पिता, वृद्धावस्था में पोषण और रक्षा करता है पुत्र। इसने मुझे जीवनयापन दिया है, मुझे श्रद्धा एवं स्नेह से देखा है, इसलिए मेरा पुत्र है।" कहानी में डाक्टर और मनोहर लाल जी के बीच के संवाद मानवीय हैं, भावनाओं से भरे हैं और मनोवैज्ञानिक भी। इस कहानी में ईश्वर के प्रति आस्था है यह भाव भी कि ईश्वर का यही संकेत है। कहानीकार ने बेहतरीन कहानी बुनी है और रिश्तों को जीवन्त कर दिया है। मनोहर लाल कहते हैं, "तुम आते हो तो मन स्थिर सा हो जाता है अन्यथा बहुत विकलता महसूस करता हूँ। अस्थिर चित्त मुझे अशान्त करता रहता है।" डाक्टर के कुरेदने पर मनोहर लाल जी अपनी पूरी व्यथा कथा सुनाते हैं। उनकी कथा में पूरी जीवन यात्रा है, पत्नी रमा का आना, जीवन को सुखों से भर देना और एक दिन उन्हें अकेला छोड़ चले जाना है। सम्पूर्ण भाव-संवेदनाओं के साथ जी रहे व्यक्ति की मनोदशा का बहुत ही मार्मिक चित्रण हुआ है। यहाँ कहानी की भाषा और शैली चमत्कृत करती है। कहानीकार स्वयं डाक्टर हैं, निश्चित ही किसी को उन्होंने बहुत करीब से देखा है, इसलिए उनकी कहानी हृदयस्पर्शी है और भावुक कर रही है।

डा० मिश्र जी की भाषा को लेकर मैंने शुरु में टिप्पणी की है, 'महाकाल' कहानी में उनकी वही भाषा अनुकूल, सहज, प्रवाह से भरी और गूढ़ व्याख्या करती हुई दिखाई दे रही है। उनके शब्द सामर्थ्य से चमत्कृत हुआ जा सकता है और विषय-वस्तु की व्याख्या सहज ही समझी जा सकती है। यह उनके चिन्तनात्मक विवरणों से भरी, कथा सुनाने की शैली की कहानी है जिसमें खोज है, प्रश्न हैं, उत्तर हैं और संयोगों की अद्भुत विवेचना है। बेजोड़ चरित्र उभरे हैं और सबने अपना चरित्र बेहतरीन तरीके से निभाया है। यह अध्यात्म-कथा है, उससे बढ़कर कोई प्रेम-कथा है और शायद पूर्णतः मनोवैज्ञानिक-कथा है।

'महाकाल' कथा में मुख्य रुप से तीन पात्र हैं, अभिजित, भास्कर(राजू) और मधु। इसमें आस्था, भक्ति, अतीन्द्रिय शक्तियों का उदय, त्रिकोणात्मक प्रेम और अद्भुत सकारात्मक अंत की परिणति की कथा बुनी गयी है। राजू मन्दिर की भीड़ में महाकाल के सम्मुख खड़ा है। ज्योतिर्लिंग सहसा सजीव सा होता दिखा। वहीं उसे उसका पुराना मित्र अभिजित अस्त-व्यस्त सा दिखा। उसने कहा, "मैं तो अपने वर्तमान में ही खो चुका हूँ, भूत भविष्य क्या याद रखूँ।" उसने ईश्वरीय व्यवस्था की बहुत सी बातें की, एकाएक उठा और भीड़ में कहीं गुम हो गया। राजू की स्मृतियाँ जाग उठीं, उसे मधु की याद आयी जिसे वह मन ही मन प्यार करता था। मधु की शादी अभिजित से हो गयी थी। दोनों सम्पन्न और हर तरह से एक-दूसरे के योग्य थे। अभिजित को इस हालत में देखकर उसे मधु की चिन्ता हुई। शिप्रा के तट पर अगली साँझ अभिजित ध्यानावस्थित दिखा। उसे लोग महायोगी, संत या महात्मा के रुप में सम्मान दे रहे थे। उसकी वाणी से बहुतों का कल्याण हो रहा था, अनेकों कहानियाँ प्रचलित हो गयी थीं और लोगों का भगवान था। राजू ने तय कर लिया कि वह अभिजित को वापस उसके घर तक पहुँचायेगा। अभिजित कहीं छिप गया था। उसे खोजते मधु भी आ गयी। दोनों के भीतर का प्रेम, इतने वर्षों में मरा नहीं था, दोनों मिलकर खुश हुए। प्रेम सम्बन्धी सारे संवाद अद्भुत तरीके से व्यक्त हुए हैं और प्रभावशाली हैं। सारे संवाद मर्यादा और संस्कार लिए हुए हैं। मधु राजू से सब कुछ बताने का आग्रह करती है और स्वयं अपना अतीत व्यक्त करती है। उन दोनों को पता है, अभिजित सब जानता है। अंत में अभिजित बच्चों के लिए शिक्षण केन्द्र खोलता है और तीनों मित्र अध्यापन का कार्य करते हैं। घर की व्यवस्था राजू की पत्नी रजनी के हाथ में है। डा० भोलाशंकर मिश्र जी का कहानी लेखन चमत्कृत करता है। उनकी भाषा-शैली भाव-प्रवाह बढ़ाने वाली है। प्रेम की अनुभूतियों का चित्रण कोई अनुभवी ही कर सकता है। मधु के चरित्र में नायिका के बहुत से स्वरुप उभरते हैं, कहीं धीरा है, कहीं गंभीरा है, फिर उसका उदात्त चरित्र उभरता है और कहीं मानिनी है।

डा० भोलाशंकर मिश्र जी के पात्र हमारे आसपास के माहौल से निकले मध्यमवर्गीय हैं। गंगा के किनारे बसा गाँव गुलजार नहीं है। गाँव में वृद्ध, महिलाएं और बच्चे रह गये हैं। काम करने योग्य व्यक्ति शहरों मे पलायन कर गये हैं। ये आज के गाँवों की सच्चाई है। गाँव का यह भी चित्र है-प्रातः की वेला, ठंडी हवाएँ, कच्चा रास्ता, दोनों ओर हरे-भरे खेत। वे रिश्तों के भीतर की उष्मा सहजता से निकाल लाते हैं, गर्व की अनुभूति, प्रेम की भावना व सुसंस्कार स्पष्ट होते हैं और सर्वत्र अपनापन पसरा हुआ है। विभु उन भावों को समझता है और डूबता-उतराता है। मिश्र जी रोग-व्याधियों के डाक्टर तो हैं ही, मन के भीतर के भावों को समझने में कहीं अधिक पारंगत हैं। पार्वती और विभु के बीच का संवाद, मिलना और सहजता से स्नेहिल हो जाना, ऐसा लेखन कोई सामान्य व्यक्ति नहीं कर सकता। मनोविज्ञान के साथ भावनाओं को पकड़ना, बीते वर्षों की संवेदनाओं से जोड़ देना और कोई टीस उभार लाना, बहुत बड़ी बात है। पार्वती को विभु के पिता गणित पढ़ाते थे और उसके पिता दोनों की शादी कर देना चाहते थे। आज उसी राजकुमार का बेटा सामने है, पार्वती कहती है, "बेटा मेरे पास आना जरूर, तुझे देखकर बहुत अच्छा लगा।" इतने से पार्वती का मन नहीं भरता, वह मुखर होती है, "ठीक है, तुम लोग चाय पीओ, इसको भीतर भेज दो, इससे बातें करुँगी।" विभु इस ममत्व से अछूता नहीं है, उसका मन पार्वती और सविता में उलझा हुआ है। प्रेम की सूक्ष्म पकड़ मिश्र जी की लेखनी को है जो रिश्तों के बीच फैली हुई है।

कहानी अक्षुण्ण आस्था, अविरल प्रेम और प्रगाढ़ वात्सल्य सहित जीवन की सच्चाइयों को सामने लाती है। विभु को पिता के बारे में जानने, समझने की बेचैनी है, वह बार-बार अपने गाँव सुरता जाता है, रिश्तों की मदद से अपना घर मन्दिर, बाग-बगीचे सुव्यवस्थित करता है। उसे मां की अन्तरंग मित्र से बहुत सी जानकारियाँ मिली जिसे जानकर उसका मन दुखी हो उठा।

'भ्रान्ति' कहानी में आध्यात्मिक चिन्तन और रिश्तों की जटिलता भरी पड़ी है। विभु और भीखू के बीच गंगा किनारे का संवाद रोचक और ज्ञानवर्धक है। भीखू महाराज कहते हैं, "विभु! मैं भक्ति और साधनाहीन व्यक्ति हूँ। एकान्त में रोता अवश्य हूँ, उसका नाम लेकर, वह भी अपनी मन की शान्ति के लिए। जानता हूँ, उस रोने में छल है क्योंकि मैं अपनी सुरक्षा के लिए रोता हूँ, उसका नाम लेते समय भी मन भ्रमित रहता है। मन सांसारिक प्रपंचों में लगा रहता है।" विभु पूछता है, "आपके मन में भी सांसारिक प्रपंच उठता है?" भीखू महाराज उत्तर देते हैं, "हाँ, प्रतिष्ठित होने का, अच्छे भोजन का, किसी का भला कर सकूँ और लोग यह जाने, यह सब प्रपंच ही तो है। एकान्त निष्ठा, सरल समर्पण कहाँ है?" अध्यात्म की इतनी अच्छी व्याख्या मिश्र जी जैसा अनुभवी ही कर सकता है। संवाद, मन के प्रश्न और संशय सब मिलकर कहानी को रोचक बना रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण है, भाषा, शैली, मुहावरे और गद्य-लालित्य। हमारे सनातन संस्कारों का बहुत सुन्दर और यथानुकूल प्रयोग कहानी को उच्च गरिमा प्रदान कर रही है।

भीखू महाराज जी और रामशंकर के बीच का संवाद रोचक व गहरे अर्थों से जुड़ा है। कहानी में अन्तर्द्वन्द है, विरोध है, अन्तर्विरोध और आकर्षण है। विभु सुरेश की बहन गीता की ओर आकर्षित हो रहा है। कहानीकार सौन्दर्य चित्रण में पारंगत है, नारी सौन्दर्य का पारखी और सबसे अच्छा है उसका पात्रों के मनोविज्ञान की समझ। शहरी व्यक्ति का ग्रामीण शैली में ढलना अच्छा लगता है । अत्यन्त सहज तरीके से कथाकार ने जीवन की जटिलताओं से निकलने का मार्ग सुझाया है। भक्ति में डूबने, ईश्वर पर विश्वास करने और अहंकार से मुक्त होने में ही जीवन की सार्थकता है। कहानी स्पष्टतः संकेत करती है, यदि हम अहंकारी हैं, उद्धत प्रवृत्ति के हैं, लोगों को अपमानित करते हैं, एक न एक दिन उसका दण्ड भोगना पड़ता है। विभु अपने पिता को खोज निकालता है। बहुत ही मार्मिक दृश्य है-पिता-पुत्र का मिलन। 'भ्रान्ति' कहानी की बुनावट बेजोड़ है। यहाँ गाँव है, शहर है, नदी है, खेत-खलिहान हैं और सभी पात्र बहुत अच्छे स्वभाव-विचार के हैं। कहानी में अद्भुत प्रवाह है, एक बार पढ़ना शुरु करने पर छोड़ने का मन नहीं होता और उत्सुकता बनी रहती है। किसी भी रचना की महत्ता तभी है जब वह हमारी संवेदना, करुणा को जगाती है। कहानी में प्रयुक्त शब्द हिन्दी साहित्य की समृद्धि बढ़ाते हैं। स्थितियों और दृश्यों का चित्रांकन सम्मोहित करता है। कहानी सुखान्त है। शान्ति स्वतः परिवर्तित होती है और अपने पति को याद करती है। भ्रान्ति शीर्षक बहुत सार्थक और उपयुक्त है इस कहानी के लिए। मिश्र जी को हमारे घर-परिवार का, हमारे बीच के सम्बन्धों का, संघर्षों और वैचारिक मतभेदों का सही अनुभव है, अध्यात्म और ईश्वरीय चेतना की गहन अनुभूति है। यह कहानी जीवन की जटिलताओं से निकलने और सुख से जीवन जीना सिखाती है।

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