साहित्यकारों की दृष्टि से राजनीति से तात्पर्य और उसका विवेचन

सैयद दाऊद रिज़वी

सैयद दाऊद रिज़वी


 
मानव के जीवन की समवेत अभिव्यक्ति उसके समाज-गठन द्वारा होती है, जिसके निर्माण के पश्चात इसे संचालित और नियंत्रित करने के लिए उसने कुछ नैतिक मूल्यों, नीतियों और नियमों को रचा तथा जिनके आधार पर समाज का उत्थान और विकास हुआ। लेकिन कालांतर में समय के साथ कुछ नीति-नियम परिवर्तित नहीं हुए और वे रूढ़ होते गए। इन्हीं रूढ़ नीति-नियमों के फलस्वरूप समाज और उसकी विभिन्न इकाइयों में कई प्रकार की व्यवस्थाओं और सत्ताओं ने जन्म लिया। इन व्यवस्थाओं ने समाज को व्यवस्थित करने के बजाय उसे खंडित कर दिया। इन व्यवस्थाओं ने समाज में सत्ता और राजनीति की नींव रखी। पहले जहाँ समाज के अस्तित्व की कल्पना मनुष्य के उद्धार और विकास के लिए की जाती थी वहीं अब उसकी कल्पना सत्ता और राजनीति के लिए की जाने लगी। सत्ता और राजनीति के बिना समाज को अधूरा समझा जाने लगा । समय के साथ समाज में अनेक प्रकार की सत्ताओं ने जन्म लिया। इन सत्ताओं में पितृसत्ता, मातृसत्ता, वंशवादी-सत्ता, सामंती-सत्ता, धर्म-सत्ता आदि लक्षित हुए और इन्होंने अपने अस्तित्व और वर्चस्व को स्थापित करने तथा उसे बनाए रखने के लिए समाज में व्याप्त व्यवस्थाओं का सहारा लिया। जैसे धर्म एक ऐसी व्यवस्था थी जिसका संबंध मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन से था लेकिन अब उसी धर्म का प्रयोग मनुष्य ने अपनी सत्ता स्थापित करने के लिए प्रारम्भ कर दिया। मनुष्य ने धर्म को तोड़-मरोड़ कर अपने स्वार्थानुसार उसमें अनेक अंध-विश्वासों, पाखंडों और रीति-रिवाजों को जन्म दिया। राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति करने की प्रवृत्ति ने धर्म में सांप्रदायिकता को अंकुरित किया और सामाजिक धार्मिक हितों वाले धार्मिक समुदाय की यह छद्म चेतना समाज के अभिजन की राजनीतिक आर्थिक प्रतिस्पर्धा की सत्ता प्रेरित अभिव्यक्ति में संचालित हो गई। रचनाकार ने इस घालमेल को समझा तथा साहित्य के पटल पर लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना कर लोगों की विवेकपरक सोच पर बल दिया। साहित्य ने वर्चस्व के प्रत्येक स्वरूप और तंत्र की विवेचना की। उसके प्रतिरोध की परंपरा को स्वर दिया।
समाज से राजनीति का अखंड संबंध रहा है। ‘राज’ और ‘नीति’ के योग से बने ‘राजनीति’ शब्द में ‘राज’ को राज्य और ‘नीति’ को नियमों का द्योतक स्वीकारते हुए संपूर्ण राज्य व्यवस्था  को चलाने हेतु बनाई गई नीति को राजनीति का पर्याय माना गया है। यह शब्द अंग्रेजी भाषा के पॉलिटिक्स' का हिंदी रूपातर है जिसकी उत्पत्ति यूनानी शब्द 'पोलिस' से स्वीकृत है और जिसका सामान्य अर्थ है, नगर या राज्य। वस्तुतः प्राचीन यूनान में आधुनिक राज्यों के समान ही छोटे आकार के नगर राज्य थे, जिनकी जानकारी देने वाले विषय को पॉलिटिक्स या राजनीति कहा गया। विभिन्न शब्दकोश और साहित्यकारों ने राजनीति को अलग-अलग ढंग से परिभाषित किया है। संस्कृत हिंदी कोश में ‘राज’ का प्रथम अर्थ- चमकना, जगमगाना, शानदार या सुंदर प्रतीत होना, दूसरा अर्थ-  हुकूमत करना, शासन करना, उज्जवल करना तथा तीसरा अर्थ-  राजा, सरदार या युवराज स्वीकारा है। इसी प्रकार ‘नीति’ को ‘नी’ धातु में ‘क्तिन’ प्रत्यय के योग से बना कहकर इसका पहला अर्थ- निर्देशन, दिग्दर्शन, प्रबंध आधी, दूसरा अर्थ- आचरण, शालीनता, व्यवहार कार्यक्रम, तीसरा अर्थ- औचित्य, चाल-चलन तथा चौथा अर्थ नीति कौशल, नीतिज्ञता को बताया है।‘  आदर्श हिंदी शब्दकोश में शासक और प्रजा के संबंधों के रूप को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि ‘वह नीति जिसके अनुसार राजा या शासक अपने शासन तथा प्रजा की रक्षा करता है।’  इसी संबंध को केंद्र बना मानक हिंदी कोश में भी बताया गया है कि ‘वह नीतियाँ या वो पद्धति जिसके अनुसार किसी राज्य का प्रशासन किया जाता है या होता है, राजनीति कहलाती है।’  यानी उन नियमों, विधानों आदि को राजनीति कहा जाता है, जिनके अनुसार राज्य का शासन चलाया जाता है किंतु यहाँ उल्लेखनीय है कि साहित्य और साहित्यकार राजनीति को केवल शासकीय नीतियों या प्रजा संबंधी नियम से इतर अधिक जनता से परखते और विश्लेषित करते हैं। दरअसल शासक समाज को एक राज्य और देश की दृष्टि से देखता है। उसके लिए शासन करना ही सर्वोपरि होता है। कभी-कभी यही शासक शासन करने में निरंकुश हो जाता है। तब साहित्यकार इसकी निरंकुशता पर अपने साहित्य के माध्यम से अंकुश लगाता है। उसकी दृष्टि में समाज सर्वोपरि होता है। वह समाजगत परिस्थितियों और विषमताओं को तर्क, विवेक और विश्लेषण की कसौटी पर कसता है। अतएव जयशंकर प्रसाद कहते हैं, "राजनीति ही मनुष्यों के लिए सब कुछ नहीं है। राजनीति के पीछे नीति से भी हाथ न धो बैठो, जिसका विश्व-मानव के साथ व्यापक संबंध है।"  हज़ारी प्रसाद द्विवेदी लिखते हैं, "राजनीति भुजंग से भी अधिक कुटिल है,असिधारा से भी अधिक दुर्गम है, विद्युत-शिखा से भी अधिक चंचल है।"  श्रीलाल शुक्ल मानते हैं, "हमारी राजनीति और हमारी रेलगाड़ी -ये दोनों चीज़ें एक हैं। दोनों ही पहियों पर लुढ़कते हुए बड़े-बड़े गाँव की तरह हैं, जो आधुनिक होकर भी प्रागैतिहासिक हैं।"  और रघुवीर सहाय स्पष्ट करते हैं, ‘मैं राजनीति के अर्थ के बारे में बहुत साफ कहना चाहता हूं। अगर आपका बार-बार यह अर्थ है कि दलों की राजनीति या सत्ता की राजनीति तो मेरा वह अर्थ नहीं है क्योंकि सत्ता की राजनीति और रचना का तो बिल्कुल छत्तीस का संबंध है।“   
राज्य को सुचारु और सुव्यवस्थित रूप से संचालित करने के लिए जिस नीतिपूर्वक ढंग का प्रयोग किया जाता है उस ढंग को राजनीति कहते हैं। इस नीति का मुख्य उद्देश्य प्रजा का हित है न कि स्वयं का। लेकिन यह हमारे समाज का दुर्भाग्य है कि आज समाज की राजनीति का अर्थ और स्वरूप दोनों परिवर्तित हो चुके हैं। आज ‘नीति’ का ‘राज’ न होकर ‘राज’ की नीति बन गयी है। समकालीन राजनीति समाज और मनुष्य को स्वार्थी और संकीर्ण बना रही है। हमारे समाज और देश के राजनेता देश-हित का नकाब पहने हुए हैं और अपने स्वार्थों की पूर्ति कर रहे हैं। आज की राजनीति में बेईमानी, स्वार्थ, झूठ, छल-कपट आदि जैसे कुरीतियाँ अपना घर बना चुकी हैं। अतः कहा जा सकता है कि आज कि राजनीति का अर्थ और स्वरूप आंतरिक तौर पर खोखला हो चुका है।

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