प्रकाश मनु के बाल उपन्यासों की मोहक दुनिया

समीक्षक: अशोक बैरागी

पुस्तक: किस्सा चमचम परी और गुड़ियाघर का
लेखक: प्रकाश मनु
प्रकाशक: चिल्ड्रन बुक टेंपल, दिल्ली।
प्रकाशन-वर्ष: 2021
पृष्ठ: 175
मूल्य: ₹ 350.00 रुपए

'किस्सा चमचम परी और गुड़ियाघर का' पुस्तक प्रकाश मनु जी के तीन अजब-अनोखे उपन्यासों का संकलन है। अपनी छड़ी लिए खड़ी परी और उसके सतरंगी लोक वाला आकर्षक आवरण बाल मन को मोहने वाला है। प्यारे मित्र ब्रजेश भाई को समर्पित यह पुस्तक बाल साहित्य के विविध पक्षों को प्रस्तुत करती है। इन बाल उपन्यासों में नए प्रयोग और आयामों को एक साथ सिरजा है। ये उपन्यास बाल मन का प्रतिनिधित्व करते हैं।

लेखक ने 'बाल उपन्यासों की एक अलमस्त दुनिया' भूमिका में बाल लेखन से जुड़ने की प्रेरणा, उद्देश्य, अपनी कथा-यात्रा और रचना-प्रक्रिया पर बहुत ही सम्यक ढंग से अपने मन के भाव पाठकों के सामने रखे हैं। मनु जी लिखते हैं, “सच तो यह है कि बच्चे ही मुझे चरित्र या पात्रों के रूप में फेसीनेट करते हैं। अपनी सरलता, अबोधता और नटखट शरारतों के साथ वे मुझे बहुत मोहते हैं। इस कदर कि मुझे बारीक रेशों में उनके आर-पार बुनी हुई कहानियाँ नजर आने लगती हैं और फिर अचानक, न जाने कब, भीतर कोई कहानी या उपन्यास आकार लेने लगता है।”

अशोक बैरागी
बाल आकांक्षा और बचपन के प्रति मनु जी बहुत संवेदनशील और आस्थावान हैं। वे हर पल बच्चों को हँसता-मुसकराता, प्रसन्नचित्त और आनंद की मस्ती में डूबा हुआ देखना चाहते हैं। इसीलिए वे बच्चों के लिए निरंतर कुछ ऐसा लिखना चाहते हैं जो उन्हें वास्तविक खुशी दे। या जिससे उनका मन हुलसित और तन पुलकित हो। साथ ही वे बच्चों को खेल-खेल में आदर्श जीवन जीने का संस्कार देना चाहते हैं। बच्चों के लिए लिखते समय उनका मन अधिक निर्मल होता है, क्योंकि वे लेखन को ईश्वरीय साधना मानते हैं। अपनी रचना-प्रक्रिया के विषय में वे लिखते है, “बच्चों के लिए लिखूँ या बड़ों के लिए, भीतर उसी दबाव या रचनात्मक तनाव से गुजरना पड़ता है। ऐसा कभी नहीं लगा कि बच्चों की रचना है तो क्या है, जैसे मरजी लिख दो। इसके बजाय बच्चों के लिए कुछ भी लिखना हो तो मैं उसमें अपना दिल, अपनी आँखें पिरोता हूँ। बच्चे मेरे गुरु भी हैं, ईश्वर भी। उनकी निर्मलता में ही मैं ईश्वर को देख पाता हूँ, और उनके लिए लिखते हुए सचमुच एक अलौकिक आनंद महसूस करता हूँ।”

बच्चों की स्नेह-प्रेरणा ही मनु जी का सबसे बड़ा संबल है। पाठक और लेखक की इसी रागात्मक एकता के कारण लेखक को असीम आनंद और ऊर्जा मिलती है। इसलिए यह भूमिका सामान्य नहीं है, बल्कि अनेक अर्थों और संदर्भों में विविध आयामों को सहेजे हुए अत्यंत महत्त्वपूर्ण बन गई है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पढ़ने की रुचि और ललक को बढ़ा देती हैं। यह भूमिका तीनों उपन्यासों के स्वरूप, कथानक, उसके पात्रों और उनके पीछे छिपी प्रेरणा को पाठकों के सामने रखती है। वर्तमान संदर्भों में परीकथाओं या फंतासी का नया रूप-अवतार यहाँ देखने को मिलता है।

पहला उपन्यास है, 'किस्सा चमचम परी और गुड़ियाघर का'। यह फंतासी और कौतुक से भरी अनोखी कृति है। फंतासी भी ऐसी कि मानो वास्तविक जीवन की कहानी हो। इस कथा में बाल मनोविज्ञान, जिज्ञासाएँ और रुचियाँ एकदम स्वभाविक लगती हैं। मनु जी इस उपन्यास के माध्यम से बच्चों को दिखाना चाहते हैं कि यह दुनिया विविध रंगों, क्रिया-कलापों, सुख-दुखों और मनोरंजन के साधनों से भरी है। जो सुख, आनंद और प्रेम यहाँ है, वैसा कहीं और नहीं। धरती के श्रमजीवियों के बीच रहकर ही इस का लुफ्त उठाया जा सकता है। दूसरा, परस्पर प्रेम, सहयोग, सच्चे और अच्छे लोगों के निकट रहने का संस्कार हमारे स्वभाव में होना चाहिए। तीसरा, सार्थक और सफल जीवन के लिए कला, श्रम और सृजन का भी बहुत महत्त्व है। इनके प्रति हमें तत्पर रहना चाहिए। ऐसा लगता है, मानो मनु जी कहना चाह रहे हों कि प्यारे-प्यारे बच्चो! तुम जितने पढ़ने-लिखने और खेलने-कूदने में अच्छे हो, घर के कार्यों में भी उतनी ही रूचि होनी चाहिए। नित नए कार्य और कलाएँ सीखनी चाहिए। तुम्हारे भीतर अनंत संभावनाओं को संभव बनाने का जज्बा है।

तभी तो उनकी चमचम परी गुड़ियाघर के जापानी गुड्डे और गुड़िया को बड़ी शिद्दत से याद करती है, “उस हँसमुख गुड्डे की उसे बहुत याद आ रही थी जो दौड़-दौड़कर उस टीले के उस पार नदी से पानी भरकर ला रहा था। गुड़िया चूल्हे-चौके के काम में जुटी थी और गोल-गोल सुंदर फुलके सेंक रही थी।” यहाँ गुड्डे-गुड़ियों को लेकर मानवीय क्रिया-कलापों की कल्पना बहुत ही जिज्ञासापूर्ण और रोचक है। यह एक नए तरह का मानवीकरण है। प्रत्येक गुड्डा-गुड़िया किसी न किसी काम में लगा है। यही जीवन में सफलता का सूत्र है। काम के प्रति यही रुचि और जिज्ञासा पैदा करना लेखक का उद्देश्य है। इसके साथ ही जो बच्चे परिश्रमी, कलात्मक रुचियों से संपन्न और हरदम कुछ नया करने वाले होते हैं, उनकी प्रतिभा को पहचान कर उचित प्रोत्साहन भी मिलना चाहिए। जैसे चीनी गुड्डे की छोटी सी प्यारी झोंपड़ी देखकर सबने उसकी तारीफ में तालियाँ बजाईं।

चमचम परी भी उसकी तारीफ करते हुए कहती है, “पर वाकई यह तुम्हारी झोंपड़ी है खूबसूरत! इसमें तुम्हारी कला जो है...।” अब देखिए ना! चीनी गुड्डा किसान का बेटा है, खेतों में काम करता है, लेकिन फिर भी कितना बड़ा और सच्चा कलाकार है। कह सकते हैं कि प्रतिभा की कोई जाति या धर्म नहीं होता। वह किसी मामूली किसान-मजदूर के घर में भी जन्म ले सकती है।

परी का रूप-सौंदर्य, कार्य, व्यवहार और उसकी सोच को लेकर धरतीवासियों में बहुत हैरानी है, तो धरती की अनेक वस्तुएँ भी चमचम परीके लिए नई और आनंद देने वाली हैं। शायद इसलिए कि ये दोनों ही एक-दूसरे से अनभिज्ञ हैं। इस फंतासी और वास्तविक जीवन की कथा के समन्वय की एक बानगी देखिए। जब नीला ने पिंकी को बताया कि यह मेरी नई दोस्त चमचम परी है तो पिंकी के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उसे विश्वास ही नहीं हुआ। वह झिझकते हुए कहती है, “क्या मैं तुम्हें छू सकती हूँ, चमचम परी?” इसी तरह रसगुल्ले, चाट, मेवा और यहाँ के बच्चों के किस्से-कहानियाँ और शरारतों के बारे में जानकर चमचम परी बहुत हैरान होती है।

प्रकाश मनु
गुड़ियाघर में विभिन्न गुड्डे-गुड़ियों की भावनाओं और उनके क्रिया-कलापों को लेकर भी लेखक ने बहुत ही सुंदर और गजब की कल्पना की है। जरा चमचम परी और इंग्लैंड की गुड़िया मिस मेरी का यह रोचक संवाद देखिए—
“नमस्ते! तुम कैसी हो?” चमचम परी ने मिस मेरी से कहा। इस पर मिस मेरी मुसकराई, “अच्छी हूँ, बहुत अच्छी।” कहकर उसने एकदम चमचम परी का हाथ पकड़ा और प्यार से शेकहैंड किया। फिर कहा, “अरे चमचम परी, तुम थक गई होगी। चलो, अब मेरे घर में आकर बैठो।”

चमचम परी भले ही परी हो और काल्पनिक लगती हो, पर वह मानवीय संवेदना और सरोकारों से परिपूर्ण है। धरती का सौंदर्य, यहाँ के लोगों का रहन-सहन, रीति-रिवाज, खानपान, बच्चे और उनका स्वभाव उसे बहुत ही अच्छा लगता है। वह इनके सुख-दुख में सहभागी होती है। बाँसुरी वाले बूढ़े बाबा की बात सुनकर वह भावुक होकर मानवीय करुणा और प्रेम से भर जाती है। आँखों में आँसू लिए वह रुँधे गले से कहती है, “यह प्यार...यह प्यार तो नीला, बस, धरती पर ही है। हम परीलोक वाले तो इसे समझ ही नहीं सकते। उफ, बाँसुरी वाले बूढ़े बाबा की आँखें मैं कभी भूल ही नहीं सकती।”

वास्तव में धरती के लोगों में जो स्नेह भावना, कला, सौंदर्य और कठिन परिश्रम करने का भाव है, वैसा अन्य किसी लोक में नहीं। मुँह बोलते मिट्टी के खिलौनों की चित्रकारी और गुड्डे-गुड़ियों जैसी रंग बिरंगी हस्त कलाएँ चमचम परी ने पहली बार धरती पर ही देखी थीं। इस कला पर रीझकर वह कहती है, “...सचमुच धरती पर तो रंग ही रंग हैं। कला के रंग, जीवन के रंग, खुशियों के रंग। सच कितनी अच्छी और सुंदर है यह धरती और यहाँ के लोग...!”
हमने आधुनिक जीवन-शैली में बचपन की अनेक चीजों को भुला दिया है। जैसे बचपन की दोस्ती और शरारतें, दादा-दादी से कहानियाँ सुनना, हमजोलियों के साथ तरह-तरह के जोश भरे खेल खेलना और प्रकृति के बीच रहकर नदी, पेड़, तालाब, फल-फूलों से बातें करना, आदि-आदि। यह रचना बच्चों को उनके बचपन और प्रकृति से जुड़कर मौज-मस्ती के लिए प्रेरित करती हैं। यही चीजें हैं जिनसे बाल मन की सहज जिज्ञासाओं, भावाभिव्यक्ति, कला का सृजन, संघर्ष और टीम भावना का उदय होता है। साथ ही मेट्रो जैसी चीजों के प्रति चमचम परी का आकर्षण भी अनोखा है। इस बहाने मनु जी ने बाल मन को आधुनिक विज्ञान और टेक्नोलॉजी से जोड़ने का भी कार्य किया है।

यह सहज-सात्विक भावों को सरल भाषा में कथा में पिरोने का अद्भुत कौशल ही है कि कल्पना भी वास्तविक नजर आती है। जैसे चाँदनी चौक के खिलौने और मकान चमचम परी और नीला के साथ नाचने लगते हैं। छू करते ही नीला के हाथ में करारे नोटों की गड्डी आ जाती है। वैसे ही गुड़ियाघर की गुड़िया मिस मेरी के छोटे से महल में चमचम परी का उठना-बैठना, गुड्डे-गुड़ियों से बातें करना, उनके साथ नाचना कोमल भावनाओं का नवोन्मेष हैं। यह बालसुलभ जिज्ञासा और सजीव दृश्यात्मक बिंब उपन्यास की रोचकता को बढ़ा देते हैं।

साथ ही यह उपन्यास शिक्षा को जीवन के लिए अनिवार्य सिद्ध करने वाला है। इसका समापन भी बहुत ही भावपूर्ण है। शिक्षा के बिना मनुष्य पिछड़ जाता है। शिक्षा ही पहचान और संस्कार देती है। मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाती है। एक प्रकार से कह सकते हैं कि चमचम परी और गुड्डे-गुड़ियाँ काल्पनिक प्रतीक हैं और धरती के लोग मानवीय यथार्थ और संघर्ष के प्रतीक हैं। लेखक भी धरती के लोगों को ही अपेक्षाकृत अधिक महत्त्व देता है। चमचम परी जादू, मंत्र और नाच-गाना जानती है, फिर भी वह शिक्षा को अधिक महत्त्व देते हुए कहती है कि, “हाँ, हाँ, क्यों नहीं? धरती के लोगों से हमने यह सीखा है। पहले हम परियाँ पढ़ती नहीं थीं। बस, थोड़ा नाच-गाना, थोड़ा जादू-मंतर, इतना ही सीख लेती थीं। पर अब हमने सोचा कि हम पढ़ेंगी नहीं तो पिछड़ जाएँगी। इसलिए परी रानी ने हमारे लिए भी एक स्कूल खुलवा दिया...!”

पढ़ाई-लिखाई के इतने बड़े भाव-संस्कार को उपन्यास में बड़ी ही सहजता से बाल मन में स्थापित किया गया है। इस उपन्यास के विषय में मनु जी लिखते हैं, “कहने को चमचम परी और किस्सा गुड़ियाघर का एक फंतासी उपन्यास है, पर यह उपन्यास सच पूछिए तो प्रेम से सरोबार है, जिसमें जीवन छल-छल कर रहा है। उपन्यास खत्म कर लेने के बाद भी बच्चे न चमचम परी को भूल पाएँगे और न नीला, पिंकी व उनकी अन्य सहेलियों को। मित्रता की बड़ी प्रसन्न और मनोहारी छवियाँ हैं इसमें।”

फंतासी होने के साथ-साथ ही यह उपन्यास बच्चों को जीवन की वास्तविकताओं का भी परिचय कराता है। लोगों की परेशानियाँ, दुख, पीड़ाएँ, हर्ष, प्रेम, करुणा, सहानुभूति, हास्य-कौतुक आदि सबके समन्वय से जो संतुलन बनता है, उसी का नाम जीवन है। सुख-दुख जीवन का जरूरी हिस्सा है और इसी से जीवन सुंदर बनता है। उपन्यास के संवाद छोटे, सरल, रोचक और बहुत ही भावपूर्ण भाषा-शैली में लिखे गए हैं। कहीं भी बनावट या सायास कोशिश नहीं दिखती। एक भी शब्द या वाक्य ऐसा नहीं, जिसे समझने में बाधा आई हो। ऐसी कौशलपूर्ण किस्सागोई ही इसे बच्चों की चहेती रचना बनाती है।

एक-दो शब्दों को लेकर मेरी थोड़ी जिज्ञासा अवश्य है। जैसे पृष्ठ 32 पर फूलों के बड़े-बड़े झाड़ लिखा गया है। मेरे विचार से यहाँ 'झाड़' शब्द पर विचार करना चाहिए। यहीं पर अगले पैरे में बच्चे जब खेलते हैं, तब आँखें बाहर निकलने को थीं। आँखें बाहर निकलने का मतलब आंतरिक दबाव और अत्यधिक पीड़ा की ओर इशारा करता है, जबकि बच्चे मस्ती में खेल रहे थे। पृष्ठ 48 पर पुराने वाले विशाल भालू और नए वाले विशाल भालू की जगह बूढा और युवा भालू ज्यादा जँचता। खैर, लेखक का उद्देश्य बहुत सराहनीय है। यह उपन्यास बाल साहित्य की श्रेष्ठता की कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरता है। बच्चे इसे पूरे आनंद और मस्ती में पढ़कर इसका आनंद लेंगे। साथ ही इसे पढ़ते हुए वे नए-नए समाजोपयोगी कार्य करने की अंत:प्रेरणा से प्रेरित होंगे। यही लेखक की सफलता भी है। 
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पुस्तक का दूसरा उपन्यास 'फागुन गाँव का बुधना और निम्मा परी' भी एक अनोखी फंतासी और निर्मल प्रेम की भावना से परिपूर्ण कृति है। इसमें ग्राम्य लोकजीवन का यथार्थ सौंदर्य है। बल्कि कहना चाहिए कि इसमें ठेठ ग्रामीणों का ठाट है। और इसी भावभूमि पर निम्मा और बुधना की प्रेम कथा फलती-फूलती है। निम्मा परी है और बुधना मानव। इसमें एक तरफ परी का अनुपमेय, दिव्य और सदा एक जैसा रहने वाला सौंदर्य है जबकि दूसरी तरफ धरती का मानवीय और प्राकृतिक सौंदर्य जो अपने क्रमिक विकास के कारण निरंतर बदलता रहता है। यहाँ धरती के प्रेम और सौंदर्य का आकर्षण अपेक्षाकृत अधिक सजीव और प्रभावी है। परीलोक का जीवन एकरसता का प्रतीक है। उसका सौंदर्य यांत्रिक सा है। इससे ऊबकर निम्मा परी बुधना के फागुन गाँव में चली आती है, जहाँ उसे गाँव के सीधे-सादे, निश्छलता से प्रेम करने वाले तथा निर्मल हृदय के परिश्रमी ग्रामीण मिलते हैं। जीवन का यही सौंदर्य निम्मा परी को लुभा लेता है।

इस समन्वय को लेकर मनु जी लिखते हैं, “देखा जाए तो परीकथाएँ भी एक तरह की फंतासी कथाएँ ही हैं और वे बहुत बार यथार्थ के प्रभाव को और अधिक बढ़ा देती हैं। इससे कथा में रोचकता के साथ-साथ एक गहरा-गहरा सा प्रभाव भी आता है। किस्सागोई भी, जिससे रचना बाल पाठकों को बाँध लेती है और उसके जरिए वह जीवन की सच्चाइयों को कहीं अधिक अच्छे ढंग से सीख लेता है...हालाँकि फंतासी के साथ साथ उसमें गाँव के जीवन की सच्चाइयाँ और यथार्थ भी बहुत गहराई के साथ उभरकर आया है।”

देखने की बात यह भी है कि फंतासी या जो कल्पना है, वह लोकजीवन के यथार्थ के प्रभाव को कम न करके उलटा बढ़ा देती है। यहाँ लेखक का उद्देश्य बच्चों के काल्पनिक लोक को वास्तविक जीवन में होने वाले संघर्षों से जोड़ना है। कहानी इस तरह से आगे बढ़ाती हैं कि बच्चे परिश्रम को अपना स्वभाव बना लेते हैं। इसे जीवन का अनिवार्य अंग मानकर सहजता से स्वीकार कर लेते हैं। लेखक का यह एक अलग और विशिष्ट प्रयोग है।

परीकथाओं को लेकर यह धारणा है कि वर्तमान जीवन में परियों से जुड़ी कपोल कल्पनाएँ और जादू-टोना प्रासंगिक नहीं है। आधुनिक यथार्थ, वर्तमान परिवेश और ज्ञान विज्ञान से जुड़ी कथाएँ ही बच्चों को पढ़ाई जानी चाहिए। इस धारणा के जवाब में लेखक का यह सफल प्रयास है। यह परी नए जमाने की है, बिना पंखों, बिना छड़ी के और बगैर जादू-मंत्रों वाली। निम्मा परी को धरती का मानवीय, प्राकृतिक और दैहिक सौंदर्य परीलोक के स्थिर सौंदर्य के अपेक्षा अधिक लुभाता है। वह आम लोगों की तरह परिश्रम करके सुख-दुख झेलना चाहती है। वह गरीब बच्चों से प्रेम करते हुए जरूरतमंदों की सहायता करती है। उसे बच्चों को अच्छा और नया कार्य करने के लिए प्रेरित करना अच्छा लगता है। किसी जादू-मंत्र से कार्य को सिद्ध करना उसे स्वीकार नहीं। वह परी होते हुए भी मानव बन कर सामान्य ढंग से जीना चाहती है। ऐसा ही स्वभाव बुधना का भी है। दोनों के स्वाभिमान, परिश्रम, धैर्य और सहजता को देखकर लोग बड़े हैरान होते हैं।

मनु जी यहाँ इन दोनों पात्रों के माध्यम से बच्चों में स्वाभिमान और स्वालंबन का भाव जाग्रत करना चाहते हैं। निम्मा परी जब काम करते हुए बुधना को देखती है तो उसकी सरलता पर मोहित होकर उसके साथ ही काम में लग जाती है। मनु जी कहना चाहते हैं कि सफल और सार्थक जीवन के लिए कोई जादू-मंतर काम नहीं करता, बल्कि परिश्रम ही सफलता का एक मूलमंत्र है। इसी में जीवन का सच्चा सुख भी है। आप ख़ुद निम्मा परी का कथन देखिए, “अरे मेरे प्यारे देवर, काश, तुम जान पाते कि मेहनत में कितना सुख, कितना आनंद मिलता है।...वह सुख बड़े-बड़े पेटवाले सेठों को अपनी तिजोरी में बंद सोने-चाँदी से नहीं मिल सकता, जो एक सीधे-सच्चे मेहनती इनसान को मेहनत करके पसीना बहाने में मिलता है..!”

यहाँ प्रकृति और मानवीय सौंदर्य का वर्णन बड़ा ही काव्यात्मक और अभिभूत करने वाला है। मानवीय सौंदर्य में बुधना का मेहनत के पसीने से तर कसरती बदन निम्मा को आकर्षित करता है। वैसे भी बुधना जमीन से जुड़ा, साँवले रंग का, निर्मल हृदय वाला सीधा-साधा लड़का है। फागुन गाँव का प्राकृतिक सौंदर्य भी हर किसी को अपनी ओर खींचता है। देखिए, “आह, कितनी सुंदर है यह धरती! कितने सुंदर लहराते खेत। हवा में झूमते-इतराते फूल, मीठे-मीठे फल। सुंदर पहाड़, हरी-भरी घाटियाँ और दूर-दूर तक फैली छतनार दरख्तों की कतारें। चिड़ियों की मीठी चहकार, खेतों में कुहु-कुहु...कुहुक...चिरपों...चिरपों... चिरपों...!”

हँसती-गाती सरसों, हुमचती फसलें। चारों ओर हवा में बिखरी गेंदे, कनेर और गुलाब की खुशबू। फूलों की घाटी के बीच फागुन गाँव को देखकर निम्मा को ऐसा लगा, जैसे पूरा गाँव खुद में ही एक अनोखा फूल हो, जो धरती फोड़कर निकल आया है। प्रकृति के इस सुच्चे सौंदर्य में सम्मोहन है। उत्सुकता है। पाठक पढ़ते-पढ़ते बिना रुके बहता ही चला जाता है। ऐसा लगता है जैसे पाठक साक्षात इन हरी-भरी वादियों के बीच झूमती फसलों वाले खेतों में आ गया हो। यहाँ प्रकृति दिव्य और अलौकिक रूप में नहीं, बल्कि यथार्थ की भावभूमि पर वर्णित है, जो ठेठ ग्रामीण जीवन के अधिक निकट है।

निम्मा परी शीघ्र ही बुधना और उसके परिवेश में रमकर वैसी ही हो जाती है। यहाँ मनु जी बच्चों के साथ बड़ों को भी श्रम का संस्कार देते हैं तथा गाँव और शहर के बीच की खाई भी मिटाना चाहते हैं। वे बुधना के गाँव फागुन के माध्यम से शहरी अमीर बच्चों में गाँव, गाँवों के लोगों, उनके परिवेश और जीवन-शैली के प्रति आकर्षण, रुचि, स्नेह, सहयोग और अपनेपन का भाव भरना चाहते हैं। शहर का जीवन बनावटी, प्रकृति से दूर और मानवीय मूल्यों से रहित है। लेखक शहरों को लोक जीवन के प्रति संवेदनशील बनाना चाहते हैं। वे स्पष्ट कहते हैं कि स्वस्थ और सुखी जीवन का आधार प्रकृति है। हमें प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य के बीच प्राकृतिक ढंग से ही रहना चाहिए।

बच्चों को सिखाने का यह सबसे सहज और आसान तरीका है कि वे किसी भी कार्य को स्वयं ही अपनी अंत:प्रेरणा से करें। बुधना जब परिश्रम करता है, तो निम्मा भी उसका साथ देती है। बुधना उसे कमजोर मानकर मना करता है, तब निम्मा परी कहती है, “लो जी, इसमें क्या बात है? तुम उठा सकते हो तो मैं क्यों नहीं? मैं भी थोड़ा भार तो उठा ही सकती हूँ।” यहाँ मनु जी यह नहीं कहते कि 'परिश्रम करना चाहिए', बल्कि पात्र स्वयं ऐसा करते नजर आते हैं। पूरे उपन्यास में वे कहीं भी उपदेश नहीं देते, बल्कि अपनी कुशलता से ऐसा परिवेश निर्मित कर देते हैं कि पात्र स्वयं वैसा काम करने को तैयार हो जाता है, जिससे जीवन में उत्फुल्लता आए।

इस उपन्यास में जहाँ अच्छे काम को प्रोत्साहन का भाव है, वहीं सात्विकता से भरा रहस्य और रोमांच भी है। निम्मा परी का गाँव के जीवन में घुल-मिलकर कठिन परिश्रम करना, बिट्टू, टुन्नू और सत्ते का बड़ी उत्सुकता से परी से मिलना, ये बहुत ही कौतुक और हास्य से भरे प्रसंग हैं। बुधना और निम्मा परी की प्रेम भरी नोक-झोंक भी कई जगह आई है। निम्मा जब जरा-जरा सी फूल जैसी रोटियाँ सेंक रही थी, तब हँसते हुए बुधना बोला, “न अम्माँ, न, इसको रोटियाँ न बनाने देना। वरना यह बनाती जाएगी, मैं खाता जाऊँगा। सुबह से शाम हो जाएगी, पर पेट नहीं भरेगा।”
बुधना और निम्मा परी के मिलन में दोनों ओर का निश्छल प्रेम और विश्वास प्रकट होता है। ऐसे ही बच्चों का अपने बड़ों से ज्ञानवर्धक और मनोरंजक कहानियाँ सुनना भी बाल मनोविज्ञान के अनुकूल है। बड़ों के पास बैठना और उनके अनुभव की बातें सुनना बहुत अच्छी बात है। इससे उनकी सेवा का अवसर मिलता है। जीवन की वास्तविकता का पता चलता है और साथ ही जीवन में आने वाली समस्याओं का व्यवहारिक समाधान भी मिलता है। यह सामाजिक उठना-बैठना बचपन को सँवारने के लिए आवश्यक है।

निम्मा परी फागुन गाँव के जमींदार जोगा सिंह के सतखंडी महल, उसके धन-वैभव, प्रभाव और रईसी शान को नकारकर बुधना के साथ उसके घर रहकर रूखा-सूखा खाना स्वीकार करती है। वास्तव में प्रेम को धन-बल और दिखावे से प्राप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए तन मन की निर्मलता जरूरी है। सच्चा प्रेम तो सादगी और सच्चाई में आनंद का अनुभव करता है।

इस उपन्यास में जीवन की सफलता और सुंदरता के लिए धैर्य, आत्मसंतोष, प्रेम और परिश्रम जैसे अनेक सूत्र बिखरे हुए हैं। निम्मा को दिखावा तो बिल्कुल ही पसंद नहीं है। एक बानगी देखिए, जब बुधना की माँ निम्मा को अच्छा खाना खिलाने के लिए पड़ोस से घी वगैरह लेने जाने लगती हैं तो निम्मा उऩ्हें रोकते हुए कहती है, “अम्माँ, जैसा खाना आप रोज खाती हैं, मैं भी वैसा ही खाऊँगी। घी नहीं है, तो कोई बात नहीं। मेरे लिए आप जरा भी दिखावा मत कीजिए। नहीं तो मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा।”

निम्मा परी अपने आसपास की अन्य लड़कियों को नाचना-गाना और पढ़ना सिखाती है। दौड़, रस्साकशी, कुश्ती और कबड्डी की प्रतिस्पर्धा में भाग लेने के लिए मानसिक रूप से तैयार करती है। एक लड़की शरमाते हुए खेलने से मना करती है, तब निम्मा की कुशलता देखिए, वह स्वयं खेल में भी भाग लेती है और उसे भी प्रोत्साहित करती है। वह कहती है, “वाह, तुम जीतोगी तो इनाम भी तो मिलेगा। इसमें शरम की कौन सी बात?...फिर मैं भी तो रहूँगी तुम्हारे साथ। खेलकूद, रस्साकशी, कबड्डी सबमें बराबर हिस्सा लूँगी। भागदौड़ और कुश्ती में भी..!” निम्मा की सहभागिता से गाँव में लड़कियों के प्रति निषेध और परंपरागत धारणाएँ टूटती हैं। अब लड़कियों के लिए भी स्वतंत्रता और समानता से आगे बढ़ने की नई राहें खुलती हैं। वे अपनी शर्म-झिझक को छोड़कर नई ऊँचाइयाँ छूने के लिए अपने पंख फड़फड़ाती हैं। इस प्रगतिशील और क्रांतिकारी पहल का श्रेय भी निम्मा परी को जाता है।
फागुन गाँव के मेले का दृश्य बहुत जीवंत और भावविभोर कर देने वाला है। एकदम लाजवाब। ऐसा लगता है, जैसे लेखक साक्षात मेले में खड़ा होकर एक-एक दृश्य हमारी आँखों के आगे उपस्थित कर रहा है। धरती के कण-कण में बसी खुशबू और सुंदरता का बखान करने वाले धरती गीत का एक-एक शब्द मन में उजाला भरता है। निम्मा के सदगुणों, निर्मल स्वभाव, नवोन्मेषी दृष्टि और दृढ़ निश्चय के कारण वह सारे गाँव की 'चहेती-प्यारी बेटी' बन जाती है। बुधना और निम्मा दोनों की खुशी के लिए बुधना की माँ उनका विवाह करवा देती है। विवाह भी बहुत ही सादगी और देसी ढंग से। बिना दान-दहेज, तामझाम और दिखावे के। वास्तव में यह विवाह एक-दूसरे के प्रति प्रेम, समर्पण, विश्वास और चारित्रिक दृढ़ता की सीख देता है। साथ ही लेखक विवाह समारोहों को सादगी का संस्कार देना चाहता है।

इस संदर्भ में मनु जी ने बहुत सुंदर बात भूमिका में लिखी है, “असल में बुधना के चरित्र की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह जैसा भी है, एक स्वाभिमान भरी जिंदगी जीना चाहता है। उसे अपने जीवन से कोई शिकायत नहीं है। यही बात निम्मा और बुधना को आपस में प्यार के धागे से जोड़ती भी है।” अपने इन्हीं उदात्त गुणों, शील स्वभाव और संवेदना के कारण बुधना 'धरती का परिश्रमी बेटा' बन जाता है। त्याग, परिश्रम और आत्मसंतोष जैसे उदात्त गुणों को दोनों ही जैसे श्वास-श्वास जीते हैं। इसी से जुड़ा एक प्रसंग देखिए। विवाह के समय निम्मा परी कहती है, “देखो बुधना, मुझे तो तुम्हारा घर जैसा है, वैसा ही पसंद है। मेरे लिए तो तुम्हारी झोंपड़ी भी स्वर्ग है। मेहनत कर लूँगी और खुशी-खुशी तुम्हारे साथ रहूँगी।...हाँ, पर तुम्हारी कोई इच्छा हो तो कहो। मैं परीलोक जाकर वहाँ से कुछ बेशकीमती रत्न और मणियाँ ले आती हूँ।” इस पर स्वाभिमानी बुधना नाराज हो जाता है। निम्मा शर्मिंदा होकर उससे क्षमा माँगती है। यहाँ स्वाभिमान का भाव जैसे हिलोरें मारता है। वे दोनों मुफ्त का दान-दहेज-उपहार आदि लेना बिल्कुल पसंद नहीं करते। उन्हें तो केवल अपने परिश्रम पर भरोसा है। कथारस से परिपूर्ण इस उपन्यास के शब्द-शब्द से श्रम सिंचित मिट्टी की सोंधी महक और जीवन का संगीत सुनाई देता है।

निम्मा और बुधना के माध्यम से फंतासी और यथार्थ के समन्वय का नया और अपने आप में यह अद्भुत प्रयोग बहुत ही प्रासंगिक है। बच्चे इसे पढ़कर मन में गाँठ बाँध लेंगे कि कोई भी कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता, बल्कि उसके पीछे भावना पवित्र होनी चाहिए। हृदय की निर्मलता से बड़प्पन आता है, किसी अन्य चीज से नहीं। उपन्यास की भाषा एकदम बालसुलभ और स्वाभाविक है। दूसरा, छोटे और चुस्त संवादों की सरसता देखते ही बनती है। भाव और शैली की उत्सुकता-रोचकता गजब है। वाक्य बहुत छोटे हैं। सरल हैं। उलझाऊ वाक्य कहीं भी नहीं है। कहीं तो एक-दो शब्दों में ही पूरा वाक्य सहजता से स्पष्ट हो जाता है। उपवाक्यों से बचा गया है। इन्हें स्वतंत्र वाक्यों की तरह लिखा गया है।

मनु जी ने 'फागुन गाँव का बुधना और निम्मा परी' उपन्यास लिखकर श्रेष्ठ बाल साहित्यिक रचनाओं में एक नायाब हीरा और जड़ दिया है। इस उपन्यास के माधुर्य और सौंदर्य की अनुगूँज और सुगंध सदियों अनुभव की जाती रहेगी। इस कला-कौशल के लिए मनु जी की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है।
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पुस्तक में संगृहीत तीसरा उपन्यास 'सब्जियों का मेला' हास्य-विनोद और कौतुक से भरा बड़ा अनोखा बाल उपन्यास है। यहाँ मनु जी ने मानवीय भावनाओं, क्रियाओं, गुण-दोषों, और स्वभाव आदि को विभिन्न सब्जियों के माध्यम से प्रस्तुत किया है। इसमें मानव जीवन की विभिन्न स्थितियों और चरित्रों को जीवंत बनाने का अनोखा कार्य किया है। इसी संदर्भ में इसकी भूमिका में मनु जी लिखते हैं, “मैं चाहता था कि सब्जियों का एक जीता-जागता और हलचलों भरा संसार बच्चों के सामने आए। बिल्कुल मनुष्यों की तरह ही। मन के विविध भावों, भंगिमाओं और एक से एक विचित्र जीवन स्थितियों के साथ, और उसमें हर सब्जी की एक निराली ही छवि हो। औरों से बिल्कुल अलग,...पर उनमें कुछ-कुछ हमारी मौजूदा जिंदगी के भिन्न-भिन्न चरित्रों की छाप भी नजर आए।”

मुख्य कथानक में अनेक कौतूहल भरी उपकथाएँ शामिल हैं। ये कथाएँ अच्छे चरित्र, नैतिकता, सम्यक व्यवहार और जिम्मेदारी निभाने की सीख देती हैं। मनु जी इन्हें इतनी सूझ-बूझ और गहराई से मनकों की तरह पिरोते हैं कि पाठक दाँतों तले उँगली दबा लेता है। तब उसके भीतर से आवाज आती है कि, 'अरे! आलू करेला, लौकी, कद्दू, और बैंगन भी ऐसे हो सकते हैं क्या? तो हम क्यों नहीं?' इसी कौशल से पाठकों में सही-गलत की समझ और अच्छा कार्य करने की ललक पैदा होती है। यही लेखक की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

एक-एक सब्जी की शारीरिक भाव-भंगिमा, स्वभाव, वेशभूषा और कार्य-व्यवहार को बहुत ही सूक्ष्मता से उजागर किया है। पाठक बड़े आनंद से कथा का रस ले-लेकर जब अंत तक पहुँचता है, तब उसकी आँखों में चमक और मन में खुशी पुलक रही होती है। उपन्यास में एक से बढ़कर एक शानदार और जानदार प्रसंग आपस में मणि-कंचन से गुँथे हुए हैं। भाषा बहुत ही सरल और स्वाभाविक है, जो बाल समाज में प्रचलित है। संवाद भी छोटे और उक्तियों जैसे मीठे हैं। बीच-बीच में ध्वन्यात्मक शब्दावली, शारीरिक-मानसिक भाव भंगिमाएँ और प्रसंगानुकूल मुहावरों से भाषा और कथा में अतिरिक्त जायका आ गया है। उपन्यास की घटनाएँ कुछ अजीबोगरीब होते हुए भी मजेदार हैं। इसीलिए यह उपन्यास सभी आयु वर्ग के पाठकों को ऐसा बाँध लेता है कि पाठक बीच में उठ ही नहीं पाता।

उपन्यास में एक-एक पात्र की कमजोरियों को दिखाना, फिर बड़े ही सहज कौशल से उन्हें दूर करना अपने आप में एक उपलब्धि है। वह चाहे भिंडी चाची का प्रसंग हो, कटहलराम का हो, आलू-कचालू का हो या फिर धनिया देवी का। ऐसे में कद्दूमल, लौकीदेवी, करेला रानी, पालक रानी, राजा बैंगन शाह और परवलचंद आदि से जुड़े प्रसंग बहुत ही भावविह्वल करते हैं।

“एक था सब्जीपुर। खूब हरा-भरा, खिला-खिला और रंग-रंगीला सब्जीपुर और सब्जीपुर में खूब रौनक थी...।” यहाँ से उपन्यास का श्रीगणेश होता है। यहाँ विभिन्न पात्र अपनी-अपनी विशेषताओं के साथ आते हैं। कुछ सादगी भरे, कुछ रोब-दाब वाले, कुछ बातूनी और कुछ गुस्सैल। कुछ पात्र आदर्श और व्यावहारिक हैं, तो कुछ विरोधाभासी गुणों के स्वामी। पर हैं सभी अलमस्त, मनमौजी और हँसने-हँसाने वाले। भिंडी चाची इन्हीं में से एक है। वह गुणी तो बहुत है, पर कभी-कभी दूसरों से चिढ़ती भी है। उसके गुस्से और नखरे का इलाज करती है प्याजो। वह अपनी व्यवहार-कुशलता और प्रतिभा से उसे स्वभाव बदलने के लिए मजबूर कर देती है।

अन्याय के विरुद्ध लड़ने वाले कद्दूमल की घुड़सवारी का वर्णन भी बेहद साहसिक और रोमांचक है। कद्दूमल एकदम फिल्मी स्टाइल से अत्याचारी जमींदार घमंडीसिंह के घर में जाकर तोड़फोड़ करता है। उससे माफी मँगवाता है। जरा कद्दूमल का रौद्र रूप यहाँ देखिए, “कद्दूमल तो इस समय क्रोध के अवतार बने हुए थे और उनका घोड़ा साक्षात काल। जमींदार के घर की दीवारें, मोटे-मोटे खंभे और छत की कड़ियाँ टूट रही थीं और पत्थर खुद जमींदार के ऊपर गिर रहे थे। बेचारा जमींदार यहाँ-वहाँ भागता हुआ चिल्ला रहा था, 'बचाओ, बचाओ!”
अगले प्रसंग में लहीम-शहीम कटहलराम बड़ा घमंडी, तुनकमिजाज, अकड़ू और डींगें हाँकने वाला है। यहाँ तक कि वह बैंगन राजा को भी कुछ नहीं समझता। तब आलू-कचालू की सेना उसकी सारी हेकड़ी निकाल देती है। ऐसे ही टिंडामल वाला प्रसंग तो बहुत ही मार्मिक है। पाठक अपने बचपन में खो जाता है और कमर पर हाथ लगा-लगाकर गेंदतड़ी के खेल में हुई उस सिंकाई को याद करता है, जिसमें पीठ एकदम लाल हो जाती थी। इस प्रसंग को पढ़कर जो आनंद की अनुभूति होती है, वह अनिर्वचनीय है। वर्तमान के वीडियो गेम, कंप्यूटर और मोबाइल के खेलों की तुलना में पंचगुट्टी और गेंदतड़ी बच्चों को ज्यादा खींचते हैं। इन देशज खेलों से मुसीबत में एक-दूसरे के काम आना, विवेक का प्रयोग करना और जुझारूपन भी आता है, जबकि आधुनिक गेम शारीरिक व मानसिक विकास को कुंद करके केवल टाइम पास करते हैं। ये मानसिक और शारीरिक विकारों को जन्म देकर हमारे मौलिक सृजन और कल्पनाशक्ति का ह्रास करते हैं। कुंठा और तनाव को जन्म देते हैं। देशज खेल नेतृत्व करना, निर्णय लेना और मुश्किल समय में संघर्ष करना आदि गुणों को हमारे स्वभाव में शामिल कर देते हैं। इनके लिए अलग से ट्रेनिंग नहीं लेनी पड़ती।

उपन्यास को पढ़कर बचपन में हुई हार, पिटाई, धक्का-मुक्की और चोट लगने पर भी आनंद और मस्ती की याद आती है। इससे जहाँ नैतिक और सामाजिक संस्कार मिलते थे, वहीं बुराइयों का विरेचन भी होता था। यहाँ बच्चे बिना थकावट और झुँझलाहट के खुशी से निरंतर खेलते रहते थे। गेंदतड़ी की एक बानगी आप स्वयं देखिए—
“जब आलूराम ने एक दनदनाती गेंद टिंडामल की पीठ पर मारी कि बेचारे उछल गए, ‘उई-हुई...उई-हुई..उई..!’ 
“उसकी रोनी सूरत बनी देखकर सारे खिलाड़ी हँस पड़े और बोले, ‘पक्के हो जाओगे, तो खेलना सीख लोगे। झेलना भी। अभी कच्चड़ हो न।’
“अब टिंडामल में जोश आ गया। उन्होंने मन ही मन कहा, ‘मैं ही क्यों रोता रहूँ? मैं भी तो कुछ करके दिखा सकता हूँ।’”

फिर खेल खत्म होने पर टिंडामल थोड़े शरमाकर कमाल की बात कहते हैं कि, “ओह राजा साहब, लगी तो खूब, पर कुछ भी कहो, बड़ा आनंद आया...!”

यह लेखक का कौशल है कि चोट खाकर भी पात्र हौसला नहीं छोड़ते, बल्कि हर बार उनके भीतर बेहतर करने की प्रेरणा दृढ़ हो रही है। यह है श्रेष्ठ बाल साहित्य की मानक कसौटी।

इसी तरह लौकीदेवी और करेला रानी के प्रसंग बहुत उत्साहित और रोमांचित करने वाले हैं। दोनों ही महादेवियाँ अपार गुणों की खान हैं। लौकीदेवी गाँधी जी के आदर्शों और जीवन मूल्यों की प्रतिरूप हैं। वे आदर्श गाँव बनाने और उसके विकास के लिए गाँव में शिक्षा, स्वास्थ्य, लघु हस्त उद्योगों और कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देना चाहती हैं। स्वरोजगार और प्रदूषण रहित हरा-भरा पर्यावरण रखने का विचार, यह गाँधी जी की संकल्पना थी। वास्तव में मनु जी स्वयं गांधीवादी दर्शन के हिमायती हैं और वे गाँधी जी के शैक्षिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय जीवन मूल्यों को प्रासंगिक सिद्ध करते हैं। आज के दौर में आत्मनिर्भर और खुशहाल गाँव कैसे बनाए जाएँ? इसका जवाब उन्होंने लौकीदेवी के नवाचारों द्वारा गाँधी दर्शन में ही दिखाया है।

सब्जियों के माध्यम से सन 1942 के आंदोलन का चित्रण मनु जी ने बहुत ही सजग और ओजस्वी ढंग से किया है। यहाँ हमारे क्रांतिकारी, राष्ट्रभक्तों की जीवन शैली, स्वाभिमानी गुणों और सामाजिक सरोकारों का पता चलता है। लौकीदेवी जहाँ गाँधी जी के अनुरूप सत्य, अहिंसा, त्याग, संयम और शांति से परिपूर्ण है, तो वहीं सरदार पटेल के व्यक्तित्व से प्रेरित करेला रानी का राष्ट्र सेवा का उत्साह भी सराहनीय है। इस प्रसंग को लेखक ने बड़े ही मनोयोग से रमकर लिखा है। लेखक इन दोनों को संन्यासिनी और महादेवी की उपमाएँ देते हैं। दोनों का व्यक्तित्व अद्भुत, उदात्त और अनुकरणीय है। यहाँ राष्ट्रीयता की भावना और इतिहास के प्रति जागरूकता पैदा करना ही महत्त्वपूर्ण नहीं है, बल्कि मनु जी बच्चों से ऐसे व्यक्तित्व और चरित्र की आशा भी रखते हैं। उनकी लेखन शैली इतनी जीवंत है मानो वे स्वयं आँखों देखा वर्णन सुना रहे हों। करेला रानी को गाँधी जी ने जगह-जगह जनता को अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक बनाकर, स्वतंत्रता का अलख जगाने के लिए भेजा है। वे बड़े जोशीले स्वर में बच्चों और नौजवानों की सभा में कहती हैं कि, “हम आजादी लेने के लिए आगे बढ़ चले हैं।...अब रुकेंगे नहीं, झुकेंगे नहीं!” करेला रानी का सत्याग्रह देखकर गाँधी जी के प्रति पटेल का समर्पण स्पष्ट होता है। लेखक का भी।

किसी के बहकावे में आकर झूठी बातों पर विश्वास करने का परिणाम क्या होता है, उपन्यास के एक प्रसंग में यह भी समझाया गया है। ऐसे में व्यक्ति को विवेक से काम लेना चाहिए। प्रेम, विश्वास और सहयोग बहुत बड़े मूल्य हैं। इससे भी बड़ा भाव है अपनी गलती स्वीकारते हुए माफी माँगकर पुन: एक हो जाना। आलू-कचालू वाला प्रसंग इसी बात को सिद्ध करता है। आलू-कचालू की दोस्ती भी लाजवाब है। दोनों के बीच की गलतफहमी दूर होने पर दोनों मस्ती में गाते हैं 'ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे'। आलूराम बैंगन शाह का महामंत्री है। वह अपनी पद-प्रतिष्ठा के अहंकार में अपने अधिकारों का दुरुपयोग करता है। तब धनिया चाची आम जनता की प्रतिनिधि बनकर आलूराम के माध्यम से वर्तमान नेताओं के व्यक्तित्व की पोल खोलती है। स्पष्ट है कि हमें धनिया चाची जैसा सच्चा, बेबाक टिप्पणी करने वाला और निडर होना चाहिए।

मूली रानी का धनिया चाची से संगीत सीखने वाला प्रसंग इस बात को स्पष्ट करता है कि जब हम ठान लेते हैं, तब कोई भी कार्य मुश्किल नहीं होता। अपनी मेहनत, लगन और अनुशासन से हम राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित कर सकते हैं। आलोचना और बाधाओं से कभी डरना नहीं चाहिए, बल्कि सफल होकर उनका जवाब देना चाहिए। लौकीदेवी बहुत ही सुंदर और व्यावहारिक जीवन का संदेश देती हैं कि, “पगली, समय किसी की मुट्ठी में कैद नहीं है। पता नहीं कल क्या हो जाए!..दुखी होने के बजाय कोशिश करो कि उसे बदलो और कुछ बनकर दिखाओ।” करेला रानी, लौकीदेवी और धनिया चाची जैसी विदुषियों के विराट व्यक्तित्व को 'महादेवी' की उपमाएँ देना बाल साहित्य में एकदम सफल और नया प्रयोग है। इनका निर्मल व्यक्तित्व लुभाता भी है।

उपन्यास में ऐसा ही एक प्रसंग आता है पुदीना दीदी की संगीतशाला का, जिसे पढ़कर पाठक का रोम-रोम हर्षित हो उठता है। यहाँ पुदीना दीदी केवल एक शिष्य से अपनी संगीतशाला प्रारंभ करती हैं। रास्ते में रुकावटें भी आती हैं, परंतु अपनी सच्ची लगन, साधना और धैर्य से वे 'धुन की पक्की' वाले मुहावरे को चरितार्थ करती हैं। वही लोग जो कभी रास्ते में रुकावटें बनते थे, बाद में उनकी मेहनत और प्रतिभा का लोहा मानकर सिर झुकाते हैं।

गाजर देवी और निक्की हरी मिर्च का पुदीना दीदी से मिलना भी सुखद है, जिसमें वे अपने राजसी वैभव को भुलाकर सादगी में सच्चे सुख की अनुभूति करती हैं। यहाँ हर किसी के मन, मस्तिष्क, शरीर और आत्मा पर संगीत के सुखद प्रभाव को दरशाया गया है। संगीत ईश्वरीय साधना है जो सभी को आनंदित करता है। इसी तरह सब्जियों के सम्मेलन में पालक रानी का स्वागत करना अपने बड़े-बुजुर्गों का स्मरण और सम्मान है। भौतिक जीवन की भागमभाग में बड़े-बुजुर्गों को भुला देने से उनका आत्मसम्मान आहत होता है। वे अकेले पड़ जाते हैं, जो सभ्य समाज के लिए अच्छी बात नहीं है। हम अपने बड़े-बुजुर्गों को साथ लेकर आगे बढ़ें। उनके अनुभव और ज्ञान का भरपूर लाभ लें।

इसी तरह पालक रानी की काव्यात्मक कहानी शुरू से अंत तक बहुत ही मार्मिक है और संवेदित करती है। यहाँ एक प्रश्न भी उठता है कि अपने बड़ों की उपेक्षा क्यों? बैंगन शाह बहुत ही उदारमना, सहृदय, क्षमाशील और हँसमुख व्यक्तित्व के धनी हैं। वे दूसरों की गलतियों को भुलाकर सबको साथ लेकर चलने में विश्वास करते हैं। आलूराम वर्तमान के महत्त्वाकांक्षी मंत्रियों का प्रतीक है, जो चापलूसों के बहकावे में आकर अपनी राजनैतिक मर्यादा भूल जाते हैं। वह अपनी शक्ति के मद में चूर राजा के ताज को छीनने का प्रयास करता है, परंतु सब्जीपुर की जनता जागरूक है। अपने सच्चे हितैषी को जानती है। प्रजा राजा बैंगन शाह के साथ मिलकर महामंत्री आलूराम को उसके किए की सजा देकर सबक सिखाती है। अपमानित आलूराम क्षमा माँगते हुए राज्य छोड़ जाने की बात कहता है। तब विशाल हृदय वाले उदार राजा बैंगन शाह उसे गले लगाते हैं। जरा उनका बड़प्पन देखिए, “तुम तो हमारे दिल के टुकड़े हो...गलतफहमियाँ कब नहीं होती? साथ रहे तो बर्तन खड़कते ही हैं, पर उनके खड़कने का भी एक संगीत होता है..?” भरत मिलाप जैसे इस अनूठे दृश्य से पाठकों की आँखें भीग जाती हैं। यहाँ स्पष्ट है कि भूल-चूकों को भुलाकर माफ करना ही बड़प्पन और सज्जनता है।

गाँधी जी की अवधारणाओं को समर्पित यह प्रयोगात्मक उपन्यास मौलिक शिक्षा, स्वदेशी और लघु उद्योगों पर आधारित एक आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी समाज के निर्माण की आवश्यकता पर बल देता है। यहाँ यह भी स्पष्ट होता है कि हमें जाति, धर्म, संप्रदाय और अमीर-गरीब का भेदभाव भुलाकर एक समरस, सहिष्णु, संगठित, स्वच्छ और लोक कल्याणकारी समाज बनाना चाहिए। 'किस्सा सब्जीपुर और फलम प्रदेश का' अध्याय में फलों और सब्जियों की एकता से यही स्पष्ट होता है। मनु जी अपना मंतव्य मानो स्वयं बताते हैं कि 'भाई ही भाई का साथ देता है।’ समाज को अच्छी व्यवस्था देने के लिए बैंगनुल्ला शाह स्पष्ट घोषणा करते हैं कि, “देखो भाई, जब तुम चाहो तो हम तुम्हारे भाई हैं वरना बेगाने—यह परिपाटी अब नहीं चलेगी। बिल्कुल नहीं चलेगी।...अच्छी तरह सोच-विचार लो। अगर सिर्फ अवसरवादी दोस्ती करनी है, तो हमारी ओर से तो न है!” यहाँ राजा परोपकारी अवश्य है, पर डरपोक नहीं। वह अवसरवादी और दोहरे मानदंड रखने वाले लोगों को भी चेतावनी देता है।

'बारिश में सब्जियों का महासम्मेलन' अध्याय में नाटकीयता और प्रभावोत्पादकता बेहद सराहनीय है। इस सम्मेलन में छोटे-बड़े, मोटे-पतले, मंत्री-संत्री, बड़े-बुजुर्ग, कलाकार, संगीतकार से लेकर साहित्यकार तक राजा बैंगन शाह के सम्मेलन में आते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि अब इन सबका मन साफ है। सभी प्रेम, मैत्री, सद्भाव और सहिष्णुता की भावना से एकत्र हुए हैं। सम्मेलन में मिर्ची रानी और पुदीना दीदी के संगीतमय नाटक की लाजवाब प्रस्तुति सबको भावविभोर कर देती है। आलूराम पश्चात्ताप के आँसू भरकर राजा से सब भूलों के लिए क्षमा माँगते हैं। इस काव्यमय नाटक के संवाद बेहद रोचक और सूक्तियों जैसी कसावट लिए हैं। तुक और लय इतनी सुंदर ढंग से मिलती है कि बार-बार गुनगुनाने को मन करता है। ये पंक्तियाँ बिना उपदेश दिए अंतर्मन में रमती चली जाती हैं। इसमें बहुत ही कोमल अहसासों का गीत-संगीत हैं। इस नाट्य प्रस्तुति में हास्य-व्यंग्य के साथ जनता की प्रतिक्रिया भी है। बीच में आने वाले संवादों की एक बानगी देखिए—
“हर कोई गुस्से से उबल रहा था। एक ने कहा, ‘जिसने किया धोखा, वह चैन न पाएगा।’
“दूसरे ने कहा, ‘अपने ही दु:ख की आग में वह झुलस जाएगा।’
“तीसरे ने कहा, ‘पछतायेगा वो, दूसरों को जो सताएगा।’”

उपन्यास का आखिरी अध्याय 'सब्जीपुर जिंदाबाद...!' बहुत ही शानदार और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लिखा गया है। ऐसे प्रसंगों से बाल साहित्य को नए आयाम मिलते हैं। इस समसामयिक मुद्दे की जितनी प्रशंसा की जाए, उतनी ही कम है। यहाँ एक अच्छे राजा, मंत्री और जागरूक जनता के अधिकार और कर्तव्यों की ओर ध्यान दिलाया है। वहीं इससे भी बढ़कर सुंदरी कुँजड़िन के माध्यम से अधिक से अधिक मुनाफा कमाने के लिए जमाखोरी जैसी घटिया मानसिकता को उजागर किया है। इसके साथ फल व सब्जियों पर जानलेवा और विषैले रसायनों के प्रयोग से सावधान किया है। फल-सब्जियों के माध्यम से यह सीधा मानव शरीर में जाता है और मानव को तन, मन और बुद्धि से विकलांग बनाता है। इनके प्रयोग से धरती बंजर हो रही है और अनेक असाध्य रोग पैदा हो रहे हैं। इन विषैले कीटनाशकों के प्रयोग से पर्यावरण और जमीन के अंदर रहने वाले सूक्ष्म जीव और किसान मित्र कीट भी नष्ट हो रहे हैं। अत: इनका प्रयोग एकदम बंद कर देना चाहिए।

बाल साहित्य में ऐसे संवेदनशील विमर्श की प्रतिष्ठा मनु जी जैसे वरिष्ठ और अनुभवी कलाकार ही कर सकते हैं। ये साहित्यिक नवोन्मेष और नवाचार रचना की उपयोगिता एवं महत्त्व को चार चाँद लगाते हैं। यहाँ एक साहित्यकार के सामाजिक सरोकारों का बखूबी निर्वहन किया गया है कि उसके लेखन से स्वस्थ और सुंदर समाज का निर्माण कैसे हो?

सार रूप में कह सकते हैं कि मनु जी एक आदर्श समाज की स्थापना के लिए हर छोटे-बड़े कार्य को बराबर महत्त्व और सम्मान देते हैं। वे सब्जी उगाने वालों के कार्य को छोटा नहीं मानते और उन्हें आवश्यक सुविधाएँ देने की वकालत करते हैं। उपन्यास का अंत सरोकारों और संस्कारों से परिपूर्ण है। लेखक ने कुछ भी तो नहीं छोड़ा! साहित्य, राजनीति, अर्थनीति, समाज, संस्कृति, कृषि, पर्यावरण, शिक्षा, आदि हर क्षेत्र में इस छोटे से उपन्यास के माध्यम से सशक्त और सार्थक हस्तक्षेप किया है। जो संकल्प सब्जीपुर के निवासी करते हैं, वही संकल्प हम सबको सच्चे मन से लेना है। तभी हम और हमारा समाज खुशहाल होगा।

सब्जीपुर के महासम्मेलन में संगीत व साहित्य की दृष्टि से जो सफलता मिर्ची देवी को मिली है, वही सफलता इस उपन्यासकार को भी मिली है। राजा बैंगन शाह जैसी शुभ भावना हम सभी को रखनी चाहिए। क्योंकि, “...मेरा और आपका, हम सबका मकसद तो एक ही है, सब्जीपुर को खूब सुंदर, सुरीला और आनंदपूर्ण बनाना। और सिर्फ सब्जीपुर ही क्यों? सच तो यह है कि इस दुनिया को इतना सुंदर, सुरीला और प्यार भरा बनाने में हम सबने भी बड़ा काम किया है और करते रहेंगे।”

वास्तव में इस उपन्यास में मनु जी ने एक ऐसे शुभ संकल्प को शब्दबद्ध किया है, जिससे एक स्वस्थ, शिक्षित, संगठित और जाति-धर्म के भेदभाव से परे मानवीय समाज का निर्माण हो सके। साथ ही प्रत्येक नागरिक स्वयं अपने प्रति और अपने देश-समाज के प्रति जागरूक हो। वे एक ऐसा समाज गढ़ना चाहते हैं, जिसमें कला, साहित्य, संगीत, लोकसंस्कृति और परिश्रम को भरपूर सम्मान मिले।

इस पूरे उपन्यास में मनु जी का एक और रूप बार-बार उभरकर आता है। यह है, गाँधी जी के पैरोकार का। उन्होंने एक बाल साहित्यकार के रूप में समकालीन समय और समाज के लिए गाँधी की अनिवार्यता को अजब-अनोखे ढंग से प्रमाणित किया है। गाँधी जी ने जिन सरोकारों और जीवन मूल्यों को जिया है, वे आज भी पूर्णत: प्रसांगिक हैं। यह बाल उपन्यास गांधी के उन्हीं जीवन मूल्यों को बहुत ही कलात्मक ढंग से प्रस्तुत करता है। साहित्यिक दृष्टि से यह प्रयोग एकदम नया और चमत्कृत करने वाला है। इस सफल, सार्थक और कलात्मक आयोजन के लिए प्रकाश मनु जी को ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ।

मैं ऐसा अनुभव करता हूँ कि इन तीनों उपन्यासों की कथा का एक क्रमिक विकास भी लेखक ने दिखाया है। पहले भाग में चमचम परी धरती के प्राकृतिक सौंदर्य और मानवीय भावनाओं को धरती पर रहकर अपनी सखी नीला के साथ प्रत्यक्ष अनुभव करती है। उसे यहाँ असीम आनंद की अनुभूति होती है और वह दोबारा आने का वायदा करके वापस लौट जाती है। दूसरे भाग में यही परी निम्मा परी बनकर आती है। उसे धरती के अद्भुत सौंदर्य का अनुभव पहले ही था। इसलिए वह धरती पर अपने परी वाले चोले को उतारकर मानव बन जाती है। वह बुधना के साथ सादगी, प्रेम और परिश्रम भरा जीवन यापन करते हुए दूसरों का हित-चिंतन करती है। वह अपने नवाचारों द्वारा एक आदर्श और प्रगतिशील समाज का निर्माण करने में भरसक सहयोग करती है।

वहीं तीसरे उपन्यास में वह लौकीदेवी, करेला रानी, पुदीना दीदी और मिर्ची रानी के रूप में अवतरित होती है। ये सब भिन्न-भिन्न माध्यमों से समाज के वास्तविक ताने-बाने, उसके चरित्र, उसके स्वभाव, भाव संवेगों और संवेदना को पाठकों के सामने रखती हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि एक स्वस्थ, संगठित समाज में एक-एक व्यक्ति की क्या भूमिका हो सकती है? आदमी एक स्वतंत्र व्यक्तित्व या इकाई होते हुए भी समाज का ही अंग है। समाज में रहकर ही उसे पूर्णता मिलती है। जैसे अज्ञेय जी कहते हैं कि, “यह दीप अकेला स्नेह भरा/ है गर्व भरा मदमाता पर/ इसको भी पंक्ति को दे दो।”
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अशोक बैरागी
हिंदी प्राध्यापक, राजकीय कन्या उच्च विद्यालय, हाबड़ी,
तहसील - पुंडरी, जिला - कैथल (हरियाणा), पिन-136026,
चलभाष: +91 946 654 9394

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