जिंदगी के दिग्गज कथाकार शैलेश मटियानी

प्रकाश मनु
प्रकाश मनु

शैलेश मटियानी की पुण्यतिथि पर (24 अप्रैल) पर विशेष

शैलेश मटियानी जिंदगी के बड़े अनुभवों के बड़े कथाकार हैं। ऐसे दिग्गज कहानीकार, जिन्होंने प्रेमचंद की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए, एक के बाद एक ऐसी कालजयी कहानियाँ हमें दीं, जिन्हें विश्व कथा-साहित्य में पांक्तेय कहा जा सकता है। 'दो दुखों का एक सुख’, 'इब्बू मलंग’, 'मिट्टी’, 'प्यास’, 'मैमूद’, 'वृत्ति’, 'अंहिसा’, 'भविष्य’, 'रहमतुल्ला’, 'छाक’, 'अर्द्धांगिनी’ जैसी दर्जनों असाधारण कहानियाँ मटियानी के यहाँ हैं, जो सिर्फ मटियानी की ही अद्वितीय और सिरमौर कहानियाँ नहीं है, बल्कि सच तो यह है कि हिंदी बड़े गर्व और गौरव के साथ उन्हें विश्व कथा साहित्य के आगे रख सकती है। 

सचमुच मटियानी की कहानियाँ ठेठ हिंदुस्तानी कथा का उत्कर्ष हैं। उन्होंने जिन हालात में लिखना शुरू किया था और लेखक होने के लिए जिस तरह की अंतहीन तकलीफों से वे गुजरे, उन्हें शायद कहा ही नहीं जा सकता। शायद ही मटियानी के अलावा कोई और लेखक हो, जिसे ऐसे दुर्दिनों के नरक से गुजरना पड़ा हो। किशोरावस्था में उन्हें कसाई की दुकान पर कीमा कूटने का काम करने, जूठे बरतन माँजने, भिखारियों की पाँत में बैठकर भोजन पाने की जुगत लगाने, छोटे-मोटे अपराधों पर पुलिस के डंडे खाने और कभी-कभी तो पेट की भूख शांत करने के लिए खुद को पुलिस के हाथों गिरफ्तार करवा देने जैसे अकल्पनीय, थरथरा देने वाले हालात और मजबूरियों का सामना करना पड़ा। फिर भी यह विश्वास उनके भीतर से कभी नहीं डिगा कि उन्हें लेखक होना है और जितने ज्यादा कष्ट वे उठाएँगे, उतना ही उनकी रचनाओं में आंतरिक ताप, ऊष्मा और पाठकों को भीतर तक विचलित और विदग्ध कर देने वाला असर आएगा।।

शैलेश मटियानी
यों 14 अक्तूबर 1931 को अल्मोड़ा जिले के बाड़ेछीना गाँव में जनमे शैलेश मटियानी ने बचपन से ही अपने इर्द-गिर्द दुख के पहाड़ देखे। किशोर अवस्था में ही उनके माता-पिता और भाई-बहन चल बसे और जीवन एक झुलसाने वाले दाह और दुर्भाग्य के साथ उनकी आँखों के आगे पसर गया। जिन चाचा के घर उन्हें दो रोटी खाने को मिलती थी, उनके लिए उन्हें बकरियाँ चराने का काम करना पड़ता और बूचड़ की दुकान पर भी बैठना पड़ता। एक ओर भीतरी आर्द्रता और संवेदना और दूसरी ओर ऐसा कठोर और जुगुप्सापूर्ण कर्तव्य-निर्वाह। जब थोड़ा-बहुत लिखना उन्होंने शुरू किया तो घोर तिलमिला देने वाली उपेक्षा के साथ उन्हें सुनने को मिला, “तो अब बूचड़ों के लड़के भी साहित्यकार बनेंगे!”


शैलेश मटियानी
और तब गुस्से में तिलमिलाए किशोर रमेश मटियानी 'शैलेश’ (शुरू में यही उनका नाम था!) रात भर दीवार से सिर पटकते हुए, माँ सरस्वती से प्रार्थना करते रहे कि “हे माँ, चाहे मुझे कितने ही कष्ट देना, लेकिन मुझे लेखक अवश्य बना देना!”
कोई आश्चर्य नहीं कि मटियानी लेखन को 'कागज पर खेती करना’ कहते थे। जो जीवन उन्होंने जिया, उसने उन्हें एक ऐसी खुद्दारी दी और जीवन के अनुभवों को ऐसा सेक भी कि 'जीवन की तलछट’ कहे जाने वाले कोढ़ियों, भिखारियों, जुआरियों, वेश्याओं, झल्ली उठाने और रिक्शा चलाने वालों की असाधारण मर्मस्पर्शी कहानियाँ उन्होंने लिखीं। सच तो यह है कि दलित और निम्न वर्ग की ऐसी मार्मिक और बेधक कहानियाँ लिखने वाला मटियानी जैसा कथाकार हमारे यहाँ कोई दूसरा नहीं हुआ।

मटियानी जिंदगी से इतने गहरे जुड़े हुए थे कि उन्हें किसी के अनुकरण की जरूरत नहीं थी। कहानी के तमाम आंदोलनों और फैशनों को एक ओर रखते हुए, अपनी कहानियों का मुहावरा उन्होंने खुद ईजाद किया और तराशा था। यों वे 'एक समूचे भारतीय कथाकार’ हैं, जिनकी कहानियों में ठेठ हिंदुस्तानियत का ठाट नजर आता है।

शैलेश मटियानी
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मटियानी जी से हुई निजी मुलाकातों को याद करूँ तो भीतर एक गहरी-गहरी सी पीड़ा और तृप्ति एक साथ महसूस होती है। बेशक मुझे अपनी जिंदगी के सबसे सौभाग्यशाली दिन वे लगते हैं, जो मटियानी जी के साथ गुजरे, उनके हृदयद्रावक अनुभवों की अंतहीन कथा का श्रोता और कुछ-कुछ 'सहयात्री’ बनकर। हालाँकि उनके साथ जो कुछ गुजरा, उसकी याद से ही रूह काँपती है! उससे यह भी पता चलता है, हम अपने बड़े लेखकों की कितनी घोर उपेक्षा करते हैं। 
यों उनसे पहली मुलाकात ही बड़ी यादगार है। खूब अच्छी तरह याद है, मटियानी जी से मेरी मुलाकात राजेंद्र यादव ने करवाई थी। मैं 'हंस’ के दफ्तर गया था राजेंद्र जी से मिलने। उन्होंने सामने सोफे पर विराजमान एक भव्य 'काया’ की ओर इशारा करते हुए कहा, “इनसे परिचय है आपका?” 
“नहीं...!” मैने अचकचाकर कहा। 
“आप शैलेश मटियानी...!” 
“ओह!” मैं खड़ा हुआ। दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार किया और शायद बेतुके ढंग से हाथ भी मिलाया। 
मेरी खुशी ऐसी थी जैसे इस अपार संसार में किसी को एकाएक किसी मोड़ पर अपना हमसफर—नहीं-नहीं, 'हमशक्ल’ मिल जाए। 
“इधर आप लगता है, साहित्य के मैदान की सफाई में जुटे हैं—बड़े-बड़े युद्ध लड़ रहे हैं, एकदम खड्गहस्त होकर!” मैंने उनके इधर के लेखों को याद करते हुए कहा। 
“अच्छा...तो पढ़ लिया आपने?” वे हँस रहे हैं। किसी भोले-भाले गोलमटोल बच्चे की तरह, जो जरा सी बात पर खुश हो जाता है, जरा सी बात पर तिनक जाता है, लेकिन अपने भीतर कुछ नहीं रखता। 
मुझे वह हँसी बड़ी प्यारी मालूम देती है—एकदम निर्मल, निष्कलुष। जैसी बेलाग बातें, वैसी बेलाग हँसी। क्षण भर में जैसे हम 'संवाद’ की स्थिति में आ गए हों। 
इतनी लंबी-चौड़ी बातचीत के बाद उन्हें खयाल आता है, “आप क्या लिखते हैं?” 
“थोड़ा बहुत लिखता हूँ—कुछ कविताएँ, लेख...!” मैं संकोच से कहता हूँ। 
“देवेंद्र सत्यार्थी पर इनकी किताब आई है, ‘देवेंद्र सत्यार्थी: चुनी हुई रचनाएँ’।” राजेंद्र यादव जो हमें भिड़ाकर उत्सुकता से सुन रहे थे, किताब के साथ-साथ बातचीत का एक सिरा पकड़ा देते हैं मटियानी जी को। 
“अच्छा, यह तो बहुत अच्छा काम है।” पुस्तक पलटते हुए मटियानी जी कह रहे हैं। 
“आपने पढ़ा है सत्यार्थी जी को? मिले हैं उनसे?” मैं उत्सुकता से पूछ लेता हूँ। 
“उन दिनों जब किशोरावस्था में साहित्य के संस्कार हम बटोर रहे थे, तब सत्यार्थी जी की बहुत पुस्तकें पढ़ी थीं। हमारे शहर के पुस्तकालय में उनकी बहुत सी किताबें थीं। ‘धरती गाती है’, ‘बेला फूले आधी रात’, ‘बाजत आवे ढोल’, ‘ब्रह्मपुत्र’...” मटियानी याद करके बताते हैं। 
अब तक मटियानी जी पुस्तक उलट-पुलट चुके हैं और वह फिर से राजेंद्र यादव की मेज पर आ गई है। 
“मैं पुस्तक की एक प्रति आपको भेंट करना चाहता हूँ। कैसे हो, बताइए...? अभी तो मेरे पास है नहीं।” मैं अपनी समस्या बताता हूँ। 
“यहाँ आप छोड़ दें तो मुझे मिल जाएगी।” कुछ देर बाद कहते हैं, “वैसे हो सकता है, मैं आऊँ उधर दो-एक रोज में। खुद आकर ले लूँगा।” 
एक संक्षिप्त सी मुलाकात। लगभग बेमालूम सी। लेकिन मिलकर आया तो लगा, मटियानी मेरे भीतर आकर बैठ गए हैं। 
इसके दो-तीन रोज बाद की बात है। लंच में जब मैं दफ्तर में अकेला ही था और कोई पत्रिका उलट-पुलट रहा था, देखा दरवाजा खुला और वही भव्याकृति जो 'हंस’ के कार्यालय में मिली थी, मुसकराती हुई मेरी मेज की ओर बढ़ी चली आ रही है। फर्क सिर्फ यही कि अब हाथ में एक छोटा सा काला ब्रीफकेस है। दाढ़ी कुछ-कुछ उसी तरह बढ़ी हुई। मुसकराहट में एक घना-घना सा अपनत्व। 
“अरे, मटियानी जी, आप...?” घबराहट, उत्सुकता और सम्मान के मिले-जुले भाव से मैं खड़ा हो गया और सम्मान से उन्हें बैठाया, “आइए...आइए!” 
वे बैठ गए हैं, फिर भी देर तक मेरे भीतर खुदर-बुदर चलती रहती है। जैसे विश्वास न हो रहा हो कि जो शख्स सामने बैठा है, वह शैलेश मटियानी ही है। शैलेश मटियानी मुझे इतने सहज प्राप्त कैसे हो सकते हैं?
यह खुशी से अवाक या सन्न रहने की स्थिति थोड़ी ही देर रहती है। फिर एक छोटा सा विषाद आकर मुझे घेर लेता है, “अरे, पुस्तक लेने खुद मटियानी जी आए, लेकिन पुस्तक की कोई प्रति इस समय तो है ही नहीं मेरे पास। एक प्रति थी, वह एक सज्जन आकर ले गए। उन्हें देते हुए मैंने सोचा था कि मटियानी जी ने कहा तो है, मगर वे कहाँ आएँगे। इतने बड़े लेखक हैं, क्या याद रहेगा?” 
मैं मटियानी जी को बड़े संकोच सहित बताता हूँ तो वे हँसकर कहते हैं, “कोई बात नहीं, फिर कभी आकर ले लूँगा। मैं तो आपसे मिलने चला आया।” 
मैं उनकी इस सरल सादगी पर मर मिट चला हूँ। क्या यह सच है? मुझसे मिलने आए हैं मटियानी जी? मुझ जैसे तुच्छ आदमी से!
मैं महसूस करता हूँ, मटियानी जी का बड़प्पन और बड़ा हो गया है और मेरी 'तुच्छता’ भी उनकी निकटता से कुछ-कुछ महिमा मंडित हो चली है।

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इसके बाद तो उनसे लगातार मिलना हुआ। कभी-कभी हफ्ते में दो-दो बार भी। कोई भी विषय हम उठा लेते और उस पर मटियानी जी के विचार सुनने को मिलते। वे विचार, यह तय था कि सौ प्रतिशत मटियानी जी के ही विचार होते और पूरे हिंदी जगत में वैसा सोचने वाला लेखक शायद ही कोई और हो। 
जल्दी ही पता चल गया कि बातचीत में मटियानी जी 'दीर्घसूत्री’ हैं और उनसे बातचीत करते हुए न समय का अंदाजा आपको रहता हैं, न उन्हें। और अगर पंद्रह-बीस मिनट में आपको कोई बात करनी है तो हो सकता है, दो-ढाई घंटे हो जाएँ और बात फिर भी अधूरी ही रहे। फिर अचानक घड़ी पर आपकी नजर पड़े और आप अचकचा जाएँ, “अच्छा, ढाई घंटे हो गए! कुछ पता नहीं चला, कमाल है।” मुझे अच्छी तरह याद है, एक बार दफ्तर का समय खत्म होने के बाद कोई आठ बजे चौकीदार के खटखटाने पर हम उठे थे। 
ऐसी कुछेक लंबी मुलाकातों की याद मुझे अब भी बनी हुई है। एक में लेखक-संपादक के रिश्तों की बात चली थी। लेखक और संपादक के आदर्श संबंधों को वे क्या समझते हैं? यानी आदर्श संपादक की तसवीर उनके जेहन में क्या है? मेरे पूछने पर वे एक उदाहरण देकर समझाने लगते हैं—
“मान लीजिए कि मैं संपादक हूँ—हूँ नहीं, लेकिन कल्पना में तो हो ही सकता हूँ। तो मैं संपादक हूँ और सड़क पर जा रहा हूँ, सामने से कोई लेखक आ रहा है। मान लीजिए, उस लेखक से रास्ते में मेरी बहस होने लगती है। होते-होते झगड़ा शुरू हो जाता है। अब वह लेखक...कल्पना कीजिए, गुस्से में आकर रास्ते में पड़ा पत्थर उठाकर मेरे सिर पर दे मारता है और मैं खूनमखून हो जाता हूँ। इस पर मुझे गुस्सा न आए, ऐसा नहीं हो सकता। लेकिन अगर मैं सच में संपादक हूँ तो उससे कहूँगा—भाई मेरे, तुमने मेरा सिर फोड़ दिया, यह अलग बात है...लेकिन तुम अच्छे लेखक हो। अपनी कोई बढ़िया रचना लिखो तो पहलेपहल मुझी को देना।” 
इतना ही नहीं, बल्कि आदर्श संपादक मटियानी जी के हिसाब से भिखारी है। जो आदर्श भिखारी होगा, वही आदर्श संपादक हो सकता है। इसी सिलसिले में उन्होंने कन्हैयालाल नंदन जी का एक प्रसंग सुनाया था। उस समय का, जब वे 'सारिका’ के संपादक थे। उस समय उनकी कोई गर्वस्फीति भरी बात सुनकर मटियानी जी ने उनकी 'घूमने वाली कुर्सी’ पर जो फब्ती कसी थी, उससे नंदन जी का मुँह उतर गया था। 
इन्हीं दिनों उनके कहानी संग्रह 'बर्फ की चट्टानें’ पर मैंने दैनिक हिंदुस्तान में एक लंबा आलोचनात्मक लेख लिया। इसमें संग्रह की अच्छी कहानियों, 'छाक’, 'अर्द्धांगिनी’, 'दो दुखों का एक सुख’ और 'प्रेत मुक्ति’ की विस्तार से चर्चा के साथ-साथ जो कमजोर कहानियाँ थीं, उन पर थोड़ी कठोर टीप थी कि ये कच्ची कहानियाँ हैं, इन्हें हरगिज इस संग्रह में नहीं होना चाहिए था। 
लेख छपा तो मुझे आशंका थी, हो सकता है, मटियानी जी बुरा मान जाएँ। उनके बारे में चारों तरफ इसी तरह की बातें कही-सुनी जाती थीं। पर मेरा अनुभव एकदम भिन्न निकला। जब उन्होंने लेख पढ़ा तो उस पर खुशी ही प्रकट की। बोले, “इतने विस्तार से मेरी कहानियों पर कम ही लोगों ने लिखा है। जो लेख लिखे भी गए, वे छपे नहीं—किसी राजनीति के कारण। ऐसा भी हुआ कि लेख छपने गया और आखिरी वक्त में रोक लिया गया। डा. रघुवंश का मुझ पर लिखा गया ऐसा ही एक लेख अब भी मेरे पास पड़ा होगा। तुमने जिन कहानियों को कमजोर बताया है, वे मेरी भी प्रिय कहानियाँ नहीं हैं। बस, आ गईं किसी तरह...!” 
ऐसी सरलता और ऐसी साफगोई भला मटियानी जी के सिवा और किस लेखक में मिलेगी?
मटियानी जी से हुई मुलाकातों को याद करूँ तो उसमें कहानी की मौजूदा हालत, लेखक के सरोकार और समाजिक प्रश्नों से लेकर मटियानी जी के अतीत, घर-परिवार, वर्तमान परिस्थितियाँ आदि तथा उनकी कहानियों की चर्चा की याद ही ज्यादा आती है। वे खुलकर और विस्तार से बात करते थे, अपनी एकदम सहज मुद्रा में। हालाँकि एक दफा 'हंस’ के एक संपादकीय में छपे विचारों पर मैंने मटियानी जी को आगबबूला होते देखा। इस संपादकीय में राजेंद्र यादव ने पुराने लेखकों की तुलना गलित, क्षरित, बुढ़ियाई हुई अभिनेत्रियों से की है—दर्शक जिन्हें इस रूप में परदे पर बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। फिर इस पर यह टीप भी है कि हालाँकि कुछ लेखकों को यह तुलना बुरी लग सकती है, मगर इसमें गलत क्या है? 
राजेंद्र यादव की इस टिप्पणी से तिलमिलाकर मटियानी जी कह रहे थे—यह ऐसा ही है जैसे किसी को घूँसा मारने के बाद कहा जाए—लो, लग गईं मिरचें! कुछ देर बाद खुद पर थोड़ा काबू पाकर उन्होंने कहा—
“किसी और भाषा में ऐसा होता—लेखकों के स्वाभिमान पर चोट पहुँचती तो क्या वे यह बर्दाश्त करते? सभी मिलकर पत्रिका का बायकाट कर देते और जब तक संपादक माफी न माँगता, कोई प्रतिष्ठित लेखक उसमें लिखने के लिए तैयार न होता। पर हिंदी में लेखक स्वाभिमन से कोरे हैं, उन्हें कुछ महसूस ही नहीं होता।” 
फिर बोले, “मैंने आज सुबह ही राजेंद्र भाई को फोन पर कहा था—भाई साहब, आप 'हंस’ के दफ्तर के बाहर एक ब्यूटी सैलून खुलवा दें, ताकि जो बूढ़े, चुसे हुए लेखक-लेखिकाएँ हैं, क्रीम-पाउडर लगवाने के बाद आप तक आएँ। आपको उनकी बदबू बर्दाश्त न करनी पड़े। ...वैसे आप एक नजर कृपापूर्वक खुद पर भी डालिए न। आप खुद भी कौन ऐसे खूबसूरत हैं! मौका मिले तो अपनी भी प्लास्टिक सर्जरी करवा डालिए!” 
किसी संपादक से ऐसी खरी बात कहने का साहस रखने वाला लेखक हिंदी में शैलेश मटियानी ही हो सकता है।

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मटियानी जी के आखिरी वर्षों में उनके लेख ज्यादा पढ़ने को मिल रहे थे, कहानियाँ नहीं। हर बार मिलने पर वे अपने किसी नए लिखे गए या अभी हाल में छपे या छपने जा रहे लेख की चर्चा करते। कोई एक मुद्दा जो उनके मन में छा जाता, उस पर एक के बाद एक लेख लिखते जाते। ये स्वतंत्र लेख होते हुए भी लेखों की एक शृंखला का आभास कराते। कभी-कभी मैं हँसकर कहता, “आप लेख, टिप्पणियाँ कुछ भी लिखिए, लेकिन आपको जाना तो एक कहानीकार के रूप में ही जाएगा।” 
इस पर वे भी हँस देते। पर एक दफा काफी गंभीर होकर उन्होंने कहा, “ठीक है मनु, आपकी बात मैं मान लेता हूँ। यह सब नहीं लिखता, लेकिन फिर कहानी लिखने के लिए जो अनुभव चाहिए, वे कहाँ से आएँगे? यह जो बहसों में शामिल होना है, साफ, खरी बात कहना और दूसरों को भी प्रतिक्रियाएँ देने के लिए आमंत्रित करना है, इन्हीं के बीच से वह ऊर्जा मिलती है जो आगे नया लिखने को प्रेरित करती है। फिर लेख तुरंत छप जाते हैं...पैसा भी मिल जाता है जिससे घर चलता है। कहानियाँ लिखने पर आजकल तो छपने का ही संकट है, पारिश्रमिक तो बाद की बात है।” 
फिर कुछ रुककर बोले, “कोई एडवांस पैसा दे तो जितनी चाहे कहानियाँ, उपन्यास लिखवा ले। असल में तो कितनी ही कहानियों, उपन्यासों के प्लाट दिमाग में तैरते रहते हैं। थोड़ा सा मौका मिले, थोड़ी सी शांति, थोड़ी सी आर्थिक सुरक्षा तो वह सब लिखा जा सकता है, मगर अब तो भागमभाग है। देखिए, उम्मीद रखिए, अभी तो बहुत-कुछ लिखना है। लेकिन अब छोटी रचना लिख पाना मेरे बस की बात नहीं रह गई। कुछ बड़ी और सघन रचनाएँ ही लिखी जाएँगी। उन्हें लिखने के लिए अब भी मेरे पास बहुत शक्ति है।” 
तभी मुझे याद आया कि ‘हंस’ में मटियानी जी का 'बंबई: खराद पर’ वाला संस्मरणों का सिलसिला बहुत अच्छा जा रहा था, फिर वह अचानक बंद हो गया। भला क्यों? पूछने पर उन्होंने कहा—
“मनु, शुरू से ही मुझे आशंका थी कि ऐसा होगा। पाठकों के खूब पत्र और अच्छी प्रतिक्रियाएँ आ रही थीं। पर राजेंद्र यह कैसे पसंद कर सकते हैं? उन्होंने संपादकीय में मेरे खिलाफ टिप्पणी लिखी। ये तमाम तरीके थे मुझे निरस्त करने के। आखिर मैंने फैसला किया कि नहीं लिखूँगा।” 
कहते हुए एक अनबुझी कड़वाहट उनकी आवाज में नजर आती है। उससे कुछ उबरकर बोले, “यह अब आएगा कभी आत्मकथा की शक्ल में। तैयारी चल रही है—देखिए कब तक हो पाता है?” कहते हुए मटियानी जी के चेहरे पर पस्ती नजर आती है। 
मुझे 'सारिका’ के 'गर्दिश के दिन’ के लिए लिखी गई उनकी टिप्पणी 'लेखक की हैसियत से’ याद आती है जिसमें उन्होंने दूसरों की तरह आत्मदया से ग्रस्त होकर अपने अतीत के दुखों को ग्लोरीफाई नहीं किया। इसके बजाय उन्होंने अपने भीतर की उस ताकत के बारे में लिखा है जो बुरे से बुरे हालात में उन्हें लड़ने की ताकत देती रही। साथ ही उनके संघर्षपूर्ण जीवन के भीतर तक थरथरा देने वाले बड़े कारुणिक चित्र उसमें हैं, जिन्हें मटियानी जी ने बिना किसी आत्मदया के, एक गहरी निस्संगता के साथ लिखा है—
“मुंबा देवी के मंदिर के सामने भिखारियों की कतार है और अन्न की प्रतीक्षा है?... चर्च गेट, बोरिवली या बोरीबंदर से कुरला थाना तक की बिना टिकट यात्राएँ हैं और अन्न की प्रतीक्षा है। ...और इस अन्न की तलाश में भिखारियों की पंगत में बैठने से लेकर जान-बूझकर 'दफा चौवन’ में भारत सरकार की शरण में जाना और जूते-चप्पलों तक का चुराना ही शामिल नहीं, राष्ट्रीय बेंतों और सामाजिक जूते-चप्पलों से पिटना भी शामिल है। ...”
और मैं सोचता हूँ, काश! मटियानी अपने उस दौर के अनुभवों पर विस्तार से कलम चलाएँ, ताकि वह 'महाभारत’ जिससे वे निकलकर आए हैं और जो समय की ओट है, वह हम सबके सामने आ सके। वह किसी उपन्यास से ज्यादा सजीव और रोमांचक होगा। पर क्या मटियानी सब ओर से खुद को समेटकर लिख पाएँगे वह?

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अब तक मन बन गया था कि मटियानी जी का एक लंबा इंटरव्यू लिया जाए? इतने बीहड़ आदमी को अपने सामने इतनी अंतरंगता के साथ खुलते देखकर बार-बार लगता था—मैं उनके गहरे अंतर्द्वंद्व का गवाह हूँ। उसे लिखना मेरी जिम्मेदारी है!
एक दिन बात करते-करते बीच में टोककर अपनी इच्छा कही तो बोले, “हाँ, इच्छा मेरी भी है...लेकिन वह आप बाद में कभी करें। उसके लिए टेपरिकार्डर होना जरूरी है। एक-एक शब्द टेप हो, फिर लिखा जाए। और कुछ मुद्दे तय कर लिए जाएँ। वे साहित्य के हो सकते हैं, लेखक और समाज के संबंध में या लेखक और सत्ता के संबंध में हो सकते हैं। मेरी रचनाओं पर भी अलग से बात ही सकती है, आज के लेखक के सामने खड़े संकट पर बात हो सकती है। रचना और पुरस्कार तथा रचना और पारिश्रमिक को लेकर भी बात हो सकती है। ...ऐसे ही और भी विषय लिए जा सकते हैं। कोई हफ्ता या पंद्रह दिन यह सिलसिला चले। फिर इस पर चाहे तो एक किताब ही हो सकती है। शर्त यह है कि उसकी रॉयल्टी आधी-आधी रहेगी!” 
इस शर्त को मानने में तो भला क्या आपत्ति हो सकती थी? लेकिन उनकी इतनी बड़ी योजना सुनकर मैं भीतर से कुछ हिल गया। योजना मुझे बुरी नहीं लगी थी, लेकिन इसके पूरा होने की उम्मीद बहुत कम नजर आती थी। खासकर जिस तरह वे भागते हुए आते, भागते हुए जाते थे और तीन-चार घंटे का समय मुश्किल से मिलता था, उससे यह सपना भी देख पाना कि मटियानी जी कोई हफ्ता, पंद्रह दिन मेरे यहाँ आकर ठहरेंगे, असंभव लगने लगा था। और फिर अगली मुलाकात तो अनिश्चित होती ही थी!
तो हारकर एक तकरीब मैंने निकाली। जब-जब वे मिलते, मैं उनके जीवन-इतिहास का कोई पन्ना खोल देता और वे बताना शुरू करते तो बताते चले जाते। इसी सिलसिले में उनके परिवार की पृष्ठभूमि का पता चला।
मटियानी जी ने बताया कि उनका बचपन घोर नरक जैसी गरीबी में बीता। स्कूल की फीस एक-दो आने होती थी, लेकिन उतना देने को भी घर में पैसे नहीं थे। माता-पिता छोटी उम्र में अनाथ छोड़कर गुजर गए थे। चाचा के पास पल रहे थे। चाचा खिला रहे थे तो काम भला कैसे न लेते? लिहाजा मटियानी बकरियाँ चराने के लिए जाते तो एक स्कूल के सामने एक पेड़ के नीचे बैठ जाते। बच्चों को साफ कपड़े पहने स्कूल में जाते देखते रहते, लालसा भरी करुण आँखों से। स्कूल के बच्चों की गिनती-पहाड़े याद करने की आवाजें आतीं तो वे पेड़ के नीचे बैठे-बैठे दोहराते जाते। इस तरह उन्होंने वर्णमाला, गिनती और पहाड़े थोड़े-थोड़े सीख लिए। 
एक दिन स्कूल के म गैलाकोटी जी बाहर निकले। बालक से पूछा, “क्यों...पढ़ोगे?” और बालक की आँखों में आँसुओं का झरना फूट पड़ा। वह बिलख-बिलखकर रोया। 
मटियानी जी इस प्रसंग को सुनाते हुए बहुत भावुक हो गए थे। खुद मेरी हालत यह थी कि वह रोता हुआ बच्चा आज मेरे अवचेतन का एक जरूरी हिस्सा हो गया है। फिर उन्होंने भागकर मुंबई चले जाने और एक होटल में बैरागीरी करने की 'कथा’ सुनाई। वहीं होटल में 'छोटू’ की भूमिका निभाते हुए, मैले बरतन घिसने के साथ-साथ उन्होंने कहानियाँ लिखीं। एक कहानी 'धर्मयुग’ में छपने भेज दी और साथ में अपनी हालत भी बयान कर दी। 
'धर्मयुग’ संपादक सत्यकाम विद्यालंकार ने पत्र पढ़ा तो वे अपने सहयोगियों के साथ उस अनोखे बालक से मिलने के लिए आए। किशोर मटियानी ने चाय पिलाई और बाद में बात चलने पर उसे 'धर्मयुग’ संपादकीय परिवार में लिए जाने की भी चर्चा चली। लेकिन रमेश मटियानी 'शैलेश’ हाईस्कूल पास भी नहीं था, जो संपादकीय परिवार में शामिल किए जाने की न्यूनतम शर्त थी। तो भी उसकी रचनाएँ 'धर्मयुग’ में स्थान पाने लगीं। मटियानी ने अपने जीवन की वह पहली और आखिरी नौकरी छोड़ दी और रचनाओं के पारिश्रमिक के आधार पर अपना गुजर-बसर करने लगे। फिर तो धीरे-धीरे यह हुआ कि उनकी कहानियों की धूम मच गई और पाठकों ने उन्हें इतना पसंद किया कि देखते ही देखते वे हिंदी के पहली कोटि के कहानीकारों की पाँत में आ गए। 
लेकिन हिंदी कहानी में उनका यह स्थान बना तो आलोचकों के बल पर नहीं, पाठकों के बल पर। आलोचकों से उनको निरंतर निर्लज्ज उपेक्षा ही मिली और आलोचना जगत में उनकी किसी कहानी की कुछ खास चर्चा रही हो, उन्हें याद नहीं आता। 
मटियानी जी के पाठकों को यह सुनकर थोड़ा अचरज होगा कि पहले वे कविताएँ भी लिखा करते हैं। बल्कि उनके लेखन की शुरुआत कविताओं से ही हुई। फिर धीरे-धीरे कविताएँ छूट गई और वह कहानीकार के रूप में ही ख्याति पाते चले गए। मटियानी जब यह बता रहे थे तो मैंने पूछा—“क्यों...क्यों?” इस पर अपनी 'भव्य’ काया की ओर इशारा करके वे बड़े जोर से हँसे—
“भई, एक तर्क तो शरीर का तर्क भी था...कि इतने बड़े शरीर वाले आदमी को कुछ जरा जमकर बड़ी रचनाएँ लिखनी चाहिए। सोलह-बीस पंक्तियों की कविता लिखते शर्म आती थी।”
इतना बड़ा जीवन उन्होंने बगैर नौकरी के कैसे निकाल दिया? कैसे उनके घर-परिवार का खर्च चला? जीवन में उन्हें क्या-क्या मुसीबतें, कैसे-कैसे अपमान झेलने पड़े? इसे शायद ही किसी ने समझने, जानने की कोशिश की हो। “एक फ्रीलांस राइटर के लिए डाकिए का क्या महत्त्व होता है?” मटियानी एक बार बता रहे थे, “इसे कोई दूसरा जान ही नहीं सकता। कई बार तो हालत यह होती है कि घर में एक दाना तक नहीं है। पैसे के नाम पर एक फूटी चवन्नी तक नहीं और घर में कोई मेहमान आया बैठा है। आप बाहर सड़क पर चहलकदमी कर रहे हैं कि शायद डाकिया आए और मनीआर्डर लेकर आए। उस वक्त कभी-कभी तो यह हालत होती है मनु, कि अगर डाकिया खाली हाथ आता दिखाई दे तो इच्छा होती है कि इसका सिर फोड़ दिया जाए!” 
“हालाँकि चिट्ठी लाना क्या उसके बस की बात है?” मैं कहता हूँ तो हँस पड़ते हैं और कहते वक्त चेहरे पर इकट्ठा हुआ तनाव बिखर जाता है। 
इतना सब करने के बाद भी मटियानी जी को आखिर क्या मिला—पूरा जीवन साहित्य के लिए झोंक देने के बाद भी? मैं सोचता हूँ और थरथराया उठता हूँ। 
“और साहित्य की दुनिया में भी मैं कहाँ हूँ?” कभी-कभी निराश होकर वे कहते थे, “मुझे कहाँ रहने दिया गया? इनका बस चलता तो मुझे मिटा ही डालते।” 
थोड़ी देर से समझ में आता है कि 'इनका’ से मटियानी जी की मुराद आलोचकों से है—
“आलोचना की हालत बहुत बुरी है। इतनी किताबें मेरी छपी हैं, लेकिन मेरी शायद ही किसी किताब पर आपने कोई समीक्षात्मक लेख या टिप्पणी देखी होगी। किसी की रुचि इसमें नहीं है कि मैं जिंदा रहूँ। मैं तो खत्म ही हो जाता, बस किसी तरह अपनी इच्छा-शक्ति के सहारे जी रहा हूँ? स्थितियाँ मुझे लगातार खत्म करने पर तुली हैं। मुझे खुद ताज्जुब होता है, मैं जीवित कैसे हूँ।”

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इसी बीच सचिन प्रकाशन ने मटियानी जी के चार उपन्यासों को एक जिल्द में छापने का निर्णय किया। मटियानी जी का आग्रह था कि उपन्यास चुनने का निर्णय मुझे करना है और उस पुस्तक में एक विस्तृत भूमिका लिखनी है। मेरे लिए यह एक सुखकर कार्य था, क्योंकि इस बहाने मटियानी जी के संपूर्ण उपन्यासों से गुजरने का मौका मिल रहा था। 
अलबत्ता इस संचयन के लिए उनके जो चार उपन्यास मैंने चुने, वे थे, ‘मुठभेड़’, 'बावन नदियों का संगम’, 'गोपुली गफूरन’ और 'रामकली’। कई रोज की मेहनत के बाद भूमिका के रूप में जाने वाला लेख लिखा गया। कोई साठ पेज लंबा। लेकिन वह इन चार उपन्यासों के बारे में ही न था। मटियानी जी के सभी उपन्यासों की व्यापक छानबीन इसमें की गई थी। लिखने के बाद मुझे सचमुच संतोष मिला। मटियानी जी के दूसरे उपन्यासों की तुलना में 'मुठभेड़’ और 'बावन नदियों का संगम’ मुझे अलग ढंग के, बेहतरीन उपन्यास लगे और आज भी लगते हैं। इसी तरह 'गोपुली गफूरन’ में उस स्त्री की मन:स्थिति है, स्थितियाँ जिसे मुसलमान होने को मजबूर कर देती है लेकिन उसका मन नहीं बदलता और अपने परिवार के लोगों के लिए जिसकी तड़प नहीं जाती। 
एक ही स्त्री के इन दोनों पहलुओं को इतने असरदार ढंग से और इतनी पूर्णता के साथ उभार पाना मटियानी जैसे किसी 'महाप्राण’ लेखक के बस की ही बात थी। इसकी तुलना में 'रामकली’ उपन्यास हलका सा कमजोर लग सकता है, पर उसके केंद्रीय पात्र रामकली के चरित्र में मौलिकता गजब की है। 
ये उपन्यास किसी ऐसे लेखक के होते जिसके साथ 'वाद’ और उसे वाद के पुछल्ले में बँधे सौ-पचास 'जुलूस निकालने वाले’ लोग होते, तो आज हिंदी में इन उपन्यासों का हल्ला होता। मगर मटियानी बिल्कुल दूसरी मिट्टी के लेखक हैं। दुश्मन बनाने की ऐसी गजब की विशेषज्ञता हिंदी में उनके सिवा शायद ही किसी और में हो। इस मामले में वे अकेले हैं—नितांत अकेले और अपनी मिसाल खुद हैं।
अगली बार मटियानी जी मिले तो मैं लेख की एक प्रति लेकर गया। उन्होंने देखकर रख लिया। कहा, “पढूँगा, थोड़ी फुर्सत होगी तब।”
असल में तब तक मटियानी जी के जीवन में एक 'प्रलय’ आ चुकी थी। उनका जबान बेटा एक दुर्घटना में गुजर गया था और वे बुरी तरह टूटे हुए और अवसादग्रस्त थे। कुछ-कुछ मानसिक विक्षेप जैसी हालत। सिर में हर वक्त रहने वाला भीषण, असहनीय दर्द।...पर इस हालत में भी उन्होंने लेख पढ़ने के लिए समय निकाला।
कुछ रोज बाद उनका लंबा पत्र मिला। गहरे प्रेम से छलकता हुआ। उन्होंने लिखा, “मनु, पहली बार मेरे उपन्यासों पर किसी ने इतना जमकर लिखा है...!”
लेकिन वह पुस्तक किसी कारण छपी नहीं। मैंने सोचा, किसी साहित्यिक पत्रिका में ही वह लेख थोड़े संक्षिप्त रूप में आ गए। इस सिलसिले में एक साहित्यिक पत्रिका के संपादक जी से बात हो रही थी। मैंने उनसे आग्रह किया, “मटियानी जी के उपन्यासों पर खासी मेहनत से मैंने लिखा है। अगर आप चाहें तो...!” 
इस पर वे चमककर बोले, “मटियानी की कहानियाँ तो जबरदस्त है, बल्कि हिंदी कहानी में उनका कद सबसे बड़ा है। पर उपन्यास?...उपन्यास तो उनके बहुत सस्ते हैं!”
“आपने उनका 'मुठभेड़’ पढ़ा है?...'बावन नदियों का संगम’ पढ़ा है, 'गोपुल गफूरन’ पढ़ा है? 'चंद औरतों का शहर’ पढ़ा है?” मैंने गंभीर होकर पूछा। 
“नहीं, लेकिन बोरीवली से बोरीबंदर...!” 
“वह उनका शुरुआती उपन्यास है, आप बाकी की चीजें भी पढ़िए।” मैंने कहा, “खासकर 'मुठभेड़’, जो पुलिस के आतंक की कथा है कि विरोधियों को कैसे झूठे एनकाउंटर में खत्म किया जाता है। ऐसे ही 'बावन नदियों का संगम’ वेश्याओं की दुनिया पर लिखा गया एक बिल्कुल अलग ढंग का उपन्यास हैं। 'गोपुली गफूरन’ में विपरीत स्थितियों में घिर गई एक दबंग औरत का चरित्र है। 'चंद औरतों का शहर’ औरतों की भीतरी दुनिया पर एक बिल्कुल अलग ढंग का कथा-प्रयोग है। आप इन्हें एक बार पढि़ए तो सही। अगर हम किसी को एक 'इमेज’ में बाँधकर रख दें और उससे अलग कुछ सोचें ही नहीं, तो यह तो अत्याचार है।”
उन सज्जन को इस पर बगलें झाँकते देखना मेरे जीवन का एक अजीब सा अनुभव था। न कहने योग्य। न उन्होंने पढ़ा था, और न पढ़ने की उनकी कोई इच्छा थी। 
दुखी और खिन्न होकर मैं सोच रहा था कि हिंदी में एक ओर बेजान और नीरस रचनाओं को खींच-खाँचकर लंबा किया जाता है, ताकि उस पर किसी बड़ी संस्था का पूर्वनियोजित पुरस्कार मिल जाए, और दूसरी ओर मटियानी की जीवन भर की साधना को—उनकी कड़ियल जिंदगी के निरंतर संघर्षों के बीच से निकली दुर्लभ रचनाओं को फूँक मारकर उड़ाने की कोशिश की जाती है। मटियानी की असफलताओं को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कहा जाता रहा है, बिना यह समझे कि किन आर्थिक मजबूरियों के बीच वे लिख रहे हैं, और अपने लेखन से मिलने वाले गिनती के चार पैसों से ही वे जिंदा हैं। उनके स्वाभिमान और खुद्दारी को 'झगड़ालूपन’ कहकर प्रचारित किया जाता रहा है और उनकी उपलब्धियों का मजाक उड़ाया जाता रहा है। उफ, यह कैसा दुर्भाग्य है हिंदी के एक दिग्गज कथाकार का! कोई और भाषा होती तो लोग उन्हें सिर पर उठाकर रखते, पर हमारे यहाँ...?
दुख और ग्लानि से मेरा हृदय फटा जा रहा था, और मैं सोच रहा था—क्या मटियानी जी के टूटने-बिखरने और मानसिक विक्षेप में इन चीजों का भी हाथ नहीं है। 
यह विचित्र संयोग है कि इलाहाबाद में रहते हुए मटियानी जी निराला की ही तरह मानसिक विक्षोभों को सहते हुए, लगभग निराला जैसी ही नियति को प्राप्त हुए!

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अलबत्ता मटियानी जी का मानसिक विक्षेप है थरथरा देने वाली घटना। यों उसके बाद भी उनकी जद्दोजहद एक क्षण के लिए भी रुकी नहीं। बेहोशी के दौरे पड़ते थे...सिर में मर्मातक पीड़ा, जैसे कोई सिर पर हथौड़े चला रहा हो। लेकिन होश में आते ही फिर हाथ में कलम लेकर डट जाते। इसी हालत में बीच-बीच में कई अविस्मरणीय मुलाकतें हुईं और गोविंद बल्लभ पंत अस्पताल में ही कई घंटे चला एक अद्भुत इंटरव्यू जिसमें मटियानी जी ने सवालों के ऐसे सधे हुए जवाब दिए कि मैं ही नहीं, मेरे साथ पहुँचे दोस्त रमेश तैलंग और शैलेंद्र चौहान भी स्तब्ध और सम्मोहित थे। एक यादगार इंटरव्यू, जो मन की बहुत उदात्त स्थितियों से निकला होगा। ऐसे मटियानी को भला कौन पागल कहेगा?
मटियानी जी उन लेखकों में से हैं जिन्हें समय ने साबित किया है। उन्हें आलोचकों ने नहीं, पाठकों ने बनाया है और वे हैं तो इसलिए कि हिंदी के पाठकों ने लंबे अरसे से उन्हें अपने दिल में जगह दी है। मटियानी जी को यहाँ जो प्यार और सम्मान मिला है, वह शायद ही हिंदी के किसी और लेखक को मिला हो। यों तो उनकी कहानियों की धमक सन् 1961 में छपे उनके पहले कहानी-संग्रह 'मेरी तेंतीस कहानियाँ’ के छपकर आने के साथ ही सुनाई देने लगी थी। इस संग्रह में 'वह तू ही था’, 'एक कप चाय दो खारी बिस्कुट’, 'कालिका अवतार’, 'पोस्टमैन’, 'गरीबुल्ला’, 'कीर्तन की धुन’ सरीखी उनकी ऐसी कहानियाँ शामिल हैं, जिनकी उनकी कथा-यात्रा में अंत तक चर्चा होती रहेगी। 
सच तो यह है कि मटियानी के कथाकार-व्यक्तित्व की बनावट और शक्ति-केंद्र को समझने में इन कहानियों से बड़ी मदद मिलती है। 'वह तू ही था’ और 'पोस्टमैन’ में अगर पहाड़ के सीधे-सादे लोक जीवन और वहाँ के दैन्य और विवशताओं का चित्रण है, तो 'एक कोप या दो खारी बिस्कुट’ और 'कीर्तन की धुन’ जैसी कहानियाँ मुंबई के महानगरीय जिंदगी के ढोंग को हमारे आगे खोलकर रख देती हैं। यानी ये कहानियाँ पहाड़ और मुंबई दोनों जगहों के मटियानी के दोहरे संघर्ष की अलग-अलग स्तरों पर अभिव्यक्ति हैं। 
कोई आश्चर्य नहीं कि मटियानी जी के यहाँ पहाड़ एकदम ठोस रूप में सामने आता है, जिसमें पहाड़ की स्त्रियों और विवश लोगों की पहाड़ जैसी जिंदगी की भूख और दैन्य का पसारा है। इस लिहाज से निर्मल वर्मा के 'पहाड़’ और शैलेश मटियानी के 'पहाड़’ की तुलना दिलचस्प हो सकती है। इसलिए कि मटियानी जी के यहाँ पहाड़ अमूर्त नहीं है। वह अपने सुख-दुख, दैन्य, अभाव और सुंदरता के साथ एकदम ठोस रूप में है और उसकी सुंदरता ऐसी है कि वह भीतर उतरती है, तो हमारी आत्मा जगमगाने लगती है। शायद यही वजह है कि मटियानी जी के यहाँ पहाड़ के साथ-साथ लोक जीवन और लाककथाओं की शैली समांतर चलती है। 
'मेरी तेंतीस कहानियाँ’ की भूमिका तो गजब की है, जिसमें मटियानी जी ने खुलकर अपने 'गर्दिश के दिनों के बारे में लिखा है। उनके शब्द हैं—
“दैनिक हिंदुस्तान के भाई ब्रजमोहन जी शर्मा से पाँच रुपए उधार लेकर अपने एक पहाड़ी साथी के साथ बिना टिकट मुंबई के लिए रवना हुआ।...और एक दिन मैंने पाया, कि चारों ओर महानगरी मुंबई की विशाल अट्टालिकाएँ हैं और नीचे फुटपाथ, जिनमें मैंने अब शरण लेनी है।...और मुझे यह स्वीकारते संकोच नहीं कि मुंबई के फुटपाथों ने, उन फुटपाथों पर पलने-पनपने वाले कुलियों, मजदूरों, भिखमंगों, उचक्कों, उठाईगीरों और गुंडों ने मुझे जो आत्मीयता दी, जो सहारा दिया और श्रम करते हुए जीने की जो दिशा-दृष्टि दी, वह साहित्यकारों के यहाँ उपलब्ध नहीं होती। उन साहित्यकारों के यहाँ, जो 'मानवेतर-साहित्यकार’ यानी महान् साहित्यकार होते हैं।”

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इसके बाद छपे मटियानी के संग्रह 'दो दुखों का एक सुख’ की तो खासी धूम रही। इस संग्रह में भी उनकी सर्वाधिक चर्चित और यादगार कहानी 'दो दुखों का एक सुख’ के अलावा 'प्यास’, 'असमर्थ’, 'रहमतुल्ला’, 'चुनाव’, 'मिसेज ग्रीनवुड’, 'प्रेतमुक्ति’ जैसी कहानियाँ शामिल हैं। इनमें 'प्यास’ एक जेबकतरे पर लिखी गई बेहद मार्मिक कहानी है। भीड़ और पुलिस से पिटने और भरपूर लात-घूँसे खाने के बाद लगभग बेहोशी की हालत में कल्पना में उसे अपनी माँ दिखाई पड़ती है और जोर से प्यास लगने की अनुभूति होती है। शायद यह हिंदी की अकेली कहानी है जो किसी जेबकतरे की पीड़ा को इतनी गहरी सहानुभूति और शिद्दत से सामने रखती है। इसी तरह 'रहमतुल्ला’ एक ऐसे गरीब बच्चे की कहानी है, जो हिंदू और मुसलमान दोनों धर्मों के मसीहाओं के चरित्र पर सवालिया निशान लगाता है, क्योंकि गरीब से उन्हें बदबू आती है और वे 'दुर-दुर’ करके उसे दूर भगाते हैं। तब आखिर एक कसाई के यहाँ उसे शरण मिलती है। 
मटियानी जी की कहानियों के दूसरे चरण में एक ओर 'सफर पर जाने से पहले’, 'असुविधा’, 'तीसरा सुख’ जैसी प्रेम और पारिवारिक विडंबना की कहानियाँ हैं तो दूसरी ओर 'इब्बू मलंग’, 'घोड़े’ और 'ब्राह्मण’ जैसी कहानियाँ लिखकर उन्होंने धर्म के आडंबरों को जैसे गहरी चुनौती दी हो! इनमें 'इब्बूमलंग’ तो अद्वितीय कहानी है। ऊपर से मैला, गलीका, नशेड़ी दिखाई देने वाला एक शख्स, जिसे जबरन पीर बना दिया गया है। असंख्य लोग उसके पास मन्नतें माँगने आते हैं। हर ओर उसका जय-जयकार है, पर एक स्त्री की पीड़ा और उसके साथ हुआ अन्याय उसे इस कदर मर्माहत कर देता है कि पीर का बाना एक तरफ फेंककर वह विद्रोह कर उठता है। उसके भीतर से एक ऐसा आदमी निकलकर आता है, जिसकी आत्मा बेहद उज्जवल है!
मटियानी जी की कहानियों का तीसरा चरण सन् 1975 में छपे 'महाभोज’ में शुरू होता है, जिसमें आगे चलकर 'कोहरा’ (1980), 'अहिंसा’ (1987), 'नाच, जमूरे नाच’ (1989) जैसे संग्रहों की एकदम अलग ढंग की कहानियाँ आ जुड़ती हैं। यह मटियानी जी की कहानियों का शिखर-काल है जिसमें एक ओर वे ‘मैमूद’, 'भविष्य’, 'मिट्टी’, 'चील’, 'वृत्ति’, 'अहिंसा’ जैसी निचले और दबे-कुचले वर्ग की पीड़ा से लथपथ कहानियाँ लिख रहे थे, तो दूसरी ओर 'अर्धांगिनी’ और 'छाक’ जैसी प्रेम की अपूर्व सिद्धि की कहानियाँ भी, जिनमें प्रेम की अनंत छवियाँ हैं। और वे इतने गहरे स्तर पर संक्रमित होती हैं कि पाठक का मन एकदम उदात्त धरातल पर पहुँच जाता है। 
हिंदी में प्रेम-कथाएँ तो बहुत लिखी गई, लेकिन दांपत्य प्रेम की सरलता और ऊँचाई को लेकर जैसी सघन अनुभूतियों और कथा-रस से भरपूर, प्रभावशाली कहानियाँ मटियानी जी ने लिखीं, वैसी शायद ही कोई और लिख पाया हो!
आखिरी चरण में मटियानी जी की 'नदी किनारे का गाँव’ की वे कहानियाँ आती हैं, जिनमें एक ओर वे अपनी पारिवारिक दुरवस्था और विक्षेप से लड़ रहे थे और दूसरी ओर आकंठ लेखन में डूबे थे। इस दौर की 'नदी के किनारे गाँव’, 'उपरांत’ जैसी उनकी कहानियाँ खासी चर्चित हुईं और इससे उनके उस जीवट का भी पता चलता है, जिसमें सब तरह के बाहरी दबावों और असंतुलन के बावजूद उनका लेखन एक गहरे संतुलन और ऊँचाई तक पहुँचा। यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इन कहानियों को लिखने में मटियानी को कितनी गहरी पीड़ा और आत्मसंघर्ष से गुजरना पड़ा होगा।

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सच तो यह है कि हिंदी कथा-लेखन में अलग-अलग दौर में चाहे जो भी कहानीकार महत्त्व पा गए हों, या पाते रहे हों, पर अगर हम यह सवाल इस ढंग से पूछें कि प्रेमचंद के बाद किस कहानीकार ने सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण और शक्तिशाली कहानियाँ दीं, किसकी कहानियों में जीवन के अदेखे क्षेत्रों के बीहड़ और विविध किस्म के अनुभव सबसे अधिक मिलते हैं तथा किसकी कहानियाँ बार-बार हमें जीवन के एक तरह के अनुभूति-विस्तार से जोड़ देती हैं, तो मटियानी से बराबरी कर सकने वाले बहुत कम कहानीकार हिंदी में होंगे, यह तय है। 
मटियानी जी भीषण जीवन-संघर्षों का ताप, भूख और अपमान सहकर एक लेखक का जीवन जीते हुए, दुख-अभाव की जिस भट्ठी में तपे हैं। और निम्न वर्ग के पात्रों की पीड़ा में पूरी तरह खुद को सानकर मैले-कुचैले भिखारियों, मजदूरों, यहाँ तक कि जेबकतरों और अपराधियों तक की जो कहानियाँ उन्होंने लिखी हैं और जिस तरह 'सतह के नीचे’ की जिंदगी के अंधेरों को खँगालकर, वहाँ छिपे हुए जीवन के उज्ज्वल चरित्रों को वह देखते-दिखाते हैं, वैसा हिंदी के बहुत कम कहानीकार कर पाए हैं। यहाँ मटियानी जी का दुस्साहस अजेय है और उनकी सामर्थ्य की कोई सीमा नहीं है।
अगर कोढ़ियों, भिखारियों और जीवन की तलछट में पड़े मैले-कुचैले, घिनाते लोगों की जिंदगी पर अपार सहानुभूति से भरकर वे 'दो दुखों का एक सुख’, 'मिट्टी’, 'प्यास’, 'चील’, 'रहमतुल्ला’ जैसी एक साथ करुणा और सिहरन पैदा करने वाली यादगार कहानियाँ लिखते हैं, तो पहाड़ के जीवन पर लिखी गई उनकी ऐसी कहानियाँ भी हैं जिनमें जीवन का प्रेम-राग किसी निर्मल नदी की धारा का सा बहता है और जिनमें लोक का सुख-दुख एक अजब तरह का महाकाव्यात्मक विस्तार पा लेता है।
इसी तरह दलित चेतना को लेकर मटियानी जी 'सतजुगिया’ जैसी स्तब्ध कर देने वाली सटीक कहानी लिखते हैं तो शहरी जमीन पर गरीब के साथ हो रहे निरंतर 'धनपशुओं के बलात्कार’ और हिंस्र मजाक पर 'अंहिसा’ जैसी जबरदस्त कहानी लिख देते हैं, जिसे पढ़ने के बाद भीतर एक थरथराहट सी भर जाती है। ऐसे ही धार्मिक शोषण की भीतरी करुण तसवीर पेश करते हुए वे 'इब्बू मलंग’ जैसा लगभग ऐतिहासिक महत्त्व रखने वाला हिंदी कथा साहित्य का एक अमर पात्र गढ़ देते हैं। दूसरी ओर, पारिवारिक जीवन के दुख-अभावों के भीतर बहते रस को मटियानी कहने पर आते हैं तो 'छाक’ और 'अर्धांगिनी’ जैसी शिखरस्थ कहानियाँ लिखते हैं, जिनके बारे में मेरा पक्का यकीन है कि इन्हें मटियानी और सिर्फ मटियानी ही लिख सकते थे। ऐसी कहानियाँ जिनके लिए मेरे पास एक ही शब्द है, ‘ये महान हैं, सिंपली ग्रेट!’ 
शैलेश मटियानी उन कहानीकारों में से हैं जिन्होंने एक तरह से कहानी कला की 'सिद्धावस्था’ प्राप्त कर ली है। इसीलिए तमाम लोग शब्दों की 'किसिम किसम की बाजीगरी’ से जो नहीं कर पाते, उसे वे कभी-कभी तो बोलचाल की बड़ी भदेस सी भाषा और बेहद मामूली शब्दों में कर दिखाते हैं। मटियानी जी की कहानियाँ पढ़ते हुए एक बात जो बार-बार मन में कौंधती है, वह यह कि कोई कहानीकार जब जिंदगी और आदमी के हड्डियों को कँपकँपाते संघर्षों से गुजरता है, तो न मालूम कितनी 'जिंदगी’ वह अपने शब्दों में कैद कर लेता है कि पृष्ठ-दर-पृष्ठ वह कितने-कितने रूपों में अपनी झलक दिखाती है! 
सच पूछिए तो मटियानी जी ने हिंदी कहानी को शक्ल देने में खुद को समूचा झोंक दिया। फिर चाहे सारी जिंदगी उन्हें गर्दिश में बितानी पड़ी हो। साहित्य और पाठक वर्ग के बीच अपनी स्वीकृति के लिए वे किन्हीं दिग्गज आलोचकों के सर्टीफिकट के कभी मोहताज नहीं रहे। और देश के कोने-कोने में फैले पाठकों का जितना प्यार उन्हें मिला है, वह बिरले ही लेखकों को नसीब होता है। 
और सिर्फ मटियानी जी की कहानियाँ ही नहीं, खासा व्यापक केनवस लिए हुए उनके उपन्यास भी ऐसे हैं, जिन्हें पढ़ते हुए हम उस जमीन, उन चट्टानों और झाड़-झंखाड़ों को जरूर जान सकते हैं, जहाँ से गुजरते हुए उनके पैर लहूलुहान हुए, मगर जीवन का रस कहीं सूखा नहीं। शायद इसीलिए कुमाऊँनी परिवेश की कहानियाँ लिखने में उनका मन कहीं अधिक रमता है। शैलेश मटियानी ने पहाड़ के दर्द को जाना है और उसे इतनी तरह से अभिव्यक्त किया है कि पहाड़ लगभग बोलता हुआ नजर आने लगता है। खासकर लोक साहित्य और लोक शैली की विशेषताओं को रचा-बसाकर मटियानी भाषा में वह अद्भुत लचक और जिंदादिली पैदा कर लेते हैं जिससे मामूली से मामूली प्रसंग भी अर्थवान हो उठता है। 
एक बात ध्यान देने की है, मटियानी जी को विचार और आधुनिकता से गुरेज नहीं है, लेकिन उन्हें रस मिलता है लोक संस्कृति में। पहाड़ों की सांस्कृतिक विरासत जैसे उनके भीतर साँस ले रही हो। बार-बार वे उस महासागर में डुबकियाँ लगाकर तरोताजा होते हैं। 
अपनी कहानियों में वे अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों छोरों पर नजर गड़ाए मिलते हैं, लेकिन टिकते अंतत: वर्तमान पर ही हैं। न वे अतीतजीवी हैं और न भविष्यवादी होना चाहते हैं। कुल मिलाकर उनका उत्कट लगाव मामूली आदमी के साथ है, उसकी मामूली चिंताओं और मामूली तकलीफों के साथ है। यही उनकी मुश्किल है और यही उनकी मुश्किलों का हल भी, जिसके जरिए वे तमाम-तमाम ऊबवादी, नफरतवादी कहानीकारों की भीड़ में शामिल होने से खुद को बचा लेते हैं। और उनकी कहानियाँ एक ही वक्त में हम सबकी अपनी अमर और यादगार कहानियाँ बन जाती हैं।

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बेशक मटियानी जी की सबसे खूबसूरत कहानियाँ वे हैं, जिनमें उन्होंने पहाड़ों के दर्द को छुआ है और उसकी अनगूँज के साथ-साथ बहे हैं। यह आकस्मिक नहीं कि इन कहानियों में स्त्री का दर्द, उसकी करुणा फूट पड़ी है। 
लोक शैली के रंग में सराबोर 'पोस्टमैन’ कहानी इस लिहाज से बेमिसाल है जिसमें भाषा की लचक और जिंदादिली देखते ही बनती है। 'पोस्टमैन’ की आँखों में लाम पर जाने वाले सैनिकों की पत्नियों का अजीब करुण चित्र खिंच आया है। पोस्टमैन का आना उनमें उत्सुकता पैदा करता है, लेकिन इसके भी अलग-अलग अर्थ हैं। 
जब वह चिट्ठी लाता है तो ऐसी हर औरत हिरनी की-सी आँखें और खरगोश के से कान बना लेती है, जैसे वह लाम से आया कोई फरिश्ता हो। 'लियो पोस्टमैन सैप’ कहकर खूब चीनी मिला दूध गिलास में भरकर पिलाया जाता है। मगर वही जब-जब 'तार’ लेकर आता है, तो किसी न किसी स्त्री का सुहाग उजड़ता है और शामत आती है बेचारे पोस्टमैन की, “मर जाए पोस्टमैन, तेरा पालने-पोसने वाला, जिसने तुझे ऐसे कुकरम सिखाए!...अरे, तेरे गोठ का बैल, गाँव का प्रधान मर जाए! मेरे बालकों को अनाथ कर गया तू। जैसा जैहिंदी तार तूने मेरे घर पहुँचाया, गोल्ल देवता के थान में बकरे काटूँ जो कोई तेरे घर भी ऐसा ही तार पहुँचा आवे...!” 
मटियानी जी ने फौजियों को लेकर बहुत सी कहानियाँ लिखी हैं—एक दर्जन से भी अधिक। इनमें दारिद्र्य की गहरी पीड़ा और कसक है कि बार-बार आँखें भीगती हैं। यह एक मार्मिक तथ्य है कि जब आप पहाड़ को छूते हैं तो जैसे लोक संस्कृति की गूँज को अनसुना नहीं कर सकते, वैसे ही इस मौजूदा सच्चाई को! देश की रक्षा का संकल्प करके लोग लाम पर जाते हैं। ये सैनिक तो जो झेलते हैं, वह झेलते ही हैं, लेकिन उनके पीछे पत्नी, बच्चे और परिवार को जो कुछ झेलना पड़ता है, वह एक 'अकथ कथा’ है। इस तकलीफ को ओर बढ़ा देते हैं रतन सेठ जैसे लोग जो मौका पाते ही क्रूर, लिजलिजे मजाक करने से नहीं चूकते। 'बर्फ की चट्टानें’ में ऐसे ही एक सैनिक की तकलीफ और संवाद मेरे भीतर अब भी गूँज रहे हैं। 
ऐसा ही स्थितियों में कहीं 'चिट्ठी के चार आखर’ जैसी गहरी पीड़ा से सनी, बेहद सरल और मासूम प्रेम कहानियाँ पनपती हैं, और कहीं 'सीने में धँसी आवाज’ की कमला सूबेदारनी का डब-डब करता चेहरा आँखों के आगे आ जाता है। और इसी परिवेश से मटियानी जी 'अर्धांगिनी’ जैसी खूबसूरत कहानी उठाते हैं, जिसके जोड़ की दांपत्य प्रेम की कहानियाँ पूरे हिंदी कथा-संसार में शायद उँगलियों पर गिनी जा सकती है। 'अर्धांगिनी’ असल में बगैर कहानी की कहानी है। मगर इतनी मार्मिक कि एक कँपकँपाता अहसास देर तक साथ-साथ चलता है। नैनसिंह सूबेदार घर में छुट्टियाँ काटकर वापस मोर्चे पर लौट रहा है। आगे-आगे सूबेदार, पीछे सिर पर सामान लादे सूबेदारनी चल रही है। गाँव का छोर आया, तो एक-एक रुपए के नोटों की नई गड्डी जरसी से निकालकर सूबेदारनी के हाथ में थमाई नैना सूबेदार ने। सूबेदारनी हँस पड़ी, “इतनी ज्यादा रकम दे रहे मजदूरी में, अगली बार भी हम ही लाएँगी साहब का सामान...!” 
एक पनीला सा मजाक है पति-पत्नी के बीच, जो जितना हँसाता है, उससे ज्यादा वियोग के दाह को उभार जाता है। और नैना सूबेदार की मन: स्थिति! भीतर जाने क्या कुछ फूट पड़ा है—
“सूबेदारनी हँस रही थी, हाथों को अलग करना कठिन हो गया। बेल लिपटी जान पड़ती है। एकाएक अराड़ी के जंगल में न्योली गाते समय का परिहास छा गया। भीतर कोई फूट-सा पड़ा—छोड़ो यार, सूबेदार! सारा बोरा-बिस्तर भूल जाओ यहीं सड़क पर। यों ही हाथ फँसाए, सूबेदारनी को ले उड़ो, खेत, घाटी, जंगल, नदी—सबको उलाँघते चले जाओ। जब थक जाओ, सूबेदारनी की गोद में सिर रखे आँचल ऊपर उठा दो और पड़े रहो।”
सचमुच पहाड़ की निर्मल जिंदगी के इतने सुंदर अक्स हैं 'अर्धांगिनी’ कहानी में कि मन इस कहानी को पढ़कर भरता ही नहीं है। जितनी बार भी इस कहानी को पढ़ें, हर बार सुंदरता के नए-नए अक्स और जीवन का एक नया ही रस मिलता है।

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पहाड़ के जीवन पर लिखी मटियानी जी की बहुतेरी कहानियाँ ऐसी हैं, जिनमें राष्ट्र प्रेम का संदेश सीधे-सीधे भी आ गया है, लेकिन मटियानी जी उसे अपनी कहानी में इस खूबसूरती से गूँथ देते हैं कि कहानी की संश्लिष्ट रचना में बिलाकर वह कहानी का अविभाज्य हिस्सा लगता है। और ये कहानियाँ सीधे-सीधे संदेशवाची या प्रचारात्मक कहानियाँ नहीं लगतीं। 
इस लिहाज से मटियानी जी की 'लोकदेवता’ कहानी के बलभद्दर थोकदार का तो जवाब ही नहीं। कहानी का नाम 'लोकदेवता’ है। मगर यह लोकदेवता कोई मिट्टी की प्रतिमा नहीं है। यह लोकदेवता, थोकदार बलभद्दर सिंह का वह आदमकद रूप ही है जो चीन के आक्रमण के समय पूरे गाँव और आस-पास के इलाके में देशभक्ति और जागृति की लहर पैदा किए दे रहा था। हवाओं में मानो बलभद्दर थोकदार के वीरतापूर्ण उद्गार समा गए हैं—
“सुनो रे मेरे जवान छोकरो! ये अपनी खून भरी आँखें मुझ बूढ़े को क्या तरेरते हो। जाओ रणछेत्तर में और दुश्मन की फौजों को दिखाओ और उनका संहार करके धरती माता का उद्धार करो...! तुम लोगों ने दिखा दिया अपने इन पितरों के ही जैसा पौरुष-पराक्रम तो आने वाली पीढ़ियों की संतानें तुम्हें देवताओं के रूप में पूजेंगी। और आज जैसे इस गाँव की धरती में महाबली पितर लोक देवता हरू राजा की वीरगाथा गाई जा रही है...एक दिन इसी गाँव की धरती धूनी में तुम्हारी संतानें तुम्हारी वीर गाथाएँ गा-गाकर तुम्हें पूजेंगी और तुम्हें उत्तराखंड में देव चोला प्राप्त होगा। और यदि कायर बनकर गाँव में पड़े रहोगे, तो तुम्हारी गाथा तो गाने को बाकी रहेगी नहीं, तन की मिट्टी भी शेष नहीं रहेगी।” 
ये ऐसे सीधे-सहज, लेकिन भीतर तक झिंझोड़ने वाले शब्द हैं कि पढ़कर रोमांच होता है, और थोड़ी देर के लिए देह की कोई सुध-बुध नहीं रहती।

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इसी तरह मटियानी जी की आँख जब यथार्थ को भेदती है तो वह खाली वर्तमान को ही नहीं, उसके आर-पार भी बहुत कुछ देख लेती है। 'मिट्टी’, 'अहिंसा’, 'चील’, 'प्यास’, 'मैमूद’, 'दो दुखों का एक सुख’ उनकी ऐसी यथार्थपरक कहानियाँ हैं जिन्हें पढ़ना 'सतह के नीचे’ की जिंदगी के कठोर और हिला देने वाले साक्षात्कार का सामना करना है। यथार्थ के जिन गहरे और निपट अँधेरे खाई-खड्डों में उतरकर मटियानी जी ने इन्हें लिखा है, हिंदी के ज्यादातर 'कुलीन’ लेखक तो वहाँ झाँकते हुए भी डरेंगे। इसीलिए यह सिर्फ मटियानी ही हैं जो जानते हैं कि भिखमंगों और कोढ़ियों के दुर्गंधाते नरक जैसे लगते जीवन के बीच भी प्रेम किस तरह जगमगाता है, या अपराध की काली दुनिया में रहकर बड़े हुए किसी जेबकतरे की जिंदगी का भी कोई दर्द होता है जो आपके भीतर 'मानवता की आकुल पुकार’ की तरह उतर जाता है। 
वे ही जानते और कह पाते हैं कि किसी बकरे को बेटे की तरह मानने वाली किसी औरत के लिए उस बकरे को मारकर मेहमानों के लिए 'मीट’ बना लिए जाने का दर्द क्या होता है...या कि किसी मिरदुला कानी और भिखारी सूरदास के साझे दुख में भी सुख और तृप्तियों की कैसी-कैसी 'दिव्य’ और लोकोत्तर झाँइयाँ हैं!... 
ये असल में कहानियाँ नहीं, हिंदी कहानी का 'लाइट हाउस’ हैं, जिनसे पता चलता है कि हिंदी कहानी क्या है और क्या हो सकती है। उसकी आंतरिक शक्ति और विस्तार कहाँ तक है! और इसीलिए अगर आप मुझसे इस बीत चुकी बीसवीं शताब्दी की हिंदी की सर्वश्रेष्ठ कहानियों की बात करें, तो मुझे इन कहानियों का ध्यान आएगा और अगर आप पूछें कि अच्छी कहानी क्या होती है या हो सकती है, तो मैं कहूँगा कि इसकी नीरस परिभाषा करने से बेहतर है कि मैं कुछ अच्छी कहानियाँ बता दूँ, जिन्हें पढ़कर मन में अच्छी कहानी की छवि कौंधती है या जिनसे अच्छी कहानी के प्रतिमान तलाशे जा सकते हैं। और तब क्षमा करें—फिर मुझे इन्हीं कहानियों का ध्यान आएगा। 
दूसरी ओर प्रेम की गहरी तन्मयता और सघन अनुभूति वाली जैसी कहानियाँ मटियानी जी के यहाँ हैं, वैसी शायद ही कहीं और मिलें। इनमें 'छाक’ तो लाजवाब कहानी है। 'छाक’ में एक कोण पर किशन मास्टर हैं तो दूसरे दो कोणों पर उमा और गीता मास्टरनी। पर इसे प्रेम की त्रिकोणात्मक कहानी मानकर आप नहीं चल सकते। इस रूप में इसका पाठ शायद हो ही नहीं सकता। इसलिए कि ये तीनों कोण अपनी उदात्त छवि में मिलकर इस कदर एकाकार से हैं कि लगता है, उसमें से सिर्फ एक ही सुर निकल रहा है जिसे प्रेम का अपार्थित, अदैहिक और कुछ आर्द्र किस्म का आत्मिक सुर कहा जा सकता है। कहानी में कोई कुंठा, कोई दुराव, कोई छिपाव नहीं। भाषा का कोई अनावश्यक कुहर-जाल नहीं। लेकिन साधारण शब्दों में ही जैसे कोई आसाधारण द्युति-सी फूट पड़ी है। इसलिए कि ये मन के भीतर के उस सच्चे निश्छल प्रेम की कथा है जिसे शब्दों की दरकार नहीं। 
किशन मास्टर ओर उमा का दांपत्य जीवन सुख भरा और प्रेमपूरित रहा है। किशन मास्टर अब तिरेसठ की उम्र में हैं। और अपने समूचे जीवन को उन्होंने इस कदर सच्चाई और निरभिमानता से जिया है कि उनके प्रति खुद-ब-खुद एक आदर सा पैदा होता है। इन्हीं किशन मास्टर के भीतर बरसों पुराने प्रेम की खुशबू एक यात्रा के रूप में समाई हुई है। तब किशन मास्टर मिरतोला और जागेश्वर घूमने गए थे और साथ में थीं गीता मास्टरनी। उस यात्रा में गीता मास्टरनी का होना कुछ ऐसा था कि तिरेसठ की उम्र में भी आज वे उसे अपने रोएँ-रोएँ में महसूस करते हैं। कुछ सीधे-सादे शब्द, सीधी सादी बातें। लेकिन उनका प्रभाव यह था, जैसे चंद्रमा की रोशनी मन और आँखों पर दीपित हो रही हो। 
ऐसा नहीं कि उमा यह सब जानती न हो। बहुत कुछ उमा को खुद उन्होंने बताया भी था। और जो शब्दों में उतर नहीं सका था, उसे उमा अपने स्त्री सुलभ ज्ञान से खुद-ब-खुद जान गई थी। यहाँ तक कि एक बार तो उमा ने हँसते-हँसते कह ही दिया था—
“तुमको तो 'क्लास’ लग गई, बोलने का मौका मिलते ही, गुरु बन जाते हो।... मगर मत भूलो, कि मैं भी स्त्री हूँ और स्त्री के चित्त को जितना मैं जान सकती हूँ, तुम नहीं जान सकोगो। और देखो, प्रेम को जो पाप कहता है, खुद के डर में कहता है। नहीं तो यह निर्झर सबमें बहता है।” 
कहना न होगा कि गीता मास्टरनी और किशन मास्टर के अद्भुत प्रेम की यह कथा उमा के इस निर्मल अहसास और साझेदारी के कारण ही शिखर तक पहुँचती है। 
मटियानी जी की कहानियों को महाकाव्यात्मक यों ही नहीं कहा गया। मेरे खयाल से उनकी सबसे बड़ी खूबी भी यही है, जिससे वे जीवन के पछाड़ें खाते और थिराए सभी रूपों को इतनी विविधता से शब्दों में बाँध पाए। आप मटियानी जी की कहानियों के एक-एक पात्र को देखिए। यह बात खुद साफ हो जाती है। जीवन से सीधे आए हुए जितने विविधि किस्म के पात्र मटियानी जी की पकड़ में आए हैं, वैसे शायद ही कहीं और देखने को मिलें। 'छाक’ की मास्टरनी ओर 'अर्धांगिनी’ की सूबेदारनी एक छोर पर हैं तो दूसरे पर गोपुली गफूरन, रामकली या सुरजो बाई। तीसरे छोर पर मिसेज ग्रीनवुड, चौथे पर मिरदुला कानी और सूरदास। कुसमी, सावित्री, लाटी, कमला सूबेदारनी, पुरोहित, बिजूका, दशरथ का पार्ट कर रहे चंद्रबल्लभ पांडे, 'सुहागिनी’ की पद्मावती, 'रुका हुआ रास्ता’ की गोमती, 'भस्मासुर’ का ब्रह्मानंद, 'अहिंसा’ का जगेसर, 'असमर्थ’ का टुंडा, 'इब्बू मलंग’ कहानी का विचित्र नायक इब्बू मलंग, 'प्यास’ का जेबकतरा शंकरिया—एक से एक विचित्र लगने वाले औघड़ किस्म के पात्र मटियानी जी की कहानियों के महानद से निकल-निकलकर आपका पीछा करते हैं और उनसे पिंड छुड़ाना मुश्किल हो जाता है। 
यह आकस्मिक नहीं कि मटियानी जी की ज्यादातर कहानियाँ संशय से शुरू होकर एक निश्चयात्मकता तक जाती हैं। वे भीतर-बाहरी दोनों तरह के संघर्षों से गुजरती हैं। मगर रास्ता भी निकालती नजर आती हैं। जीवन जैसा भी है, चाहे जितना उजाड़ और खूंखार हो, वे उसमें जीने लायक एक चप्पा जमीन तो खोज ही लेती हैं और आखिर तक उम्मीद नहीं छोड़तीं। 'असमर्थ’ का टुंडा बहादुर भी इस मामले में असमर्थ नहीं। 'दो दुखों का एक सुख’ की मिरदुला कानी और अंधा सूरदास भी नहीं। यहाँ तक कि 'मिट्टी’ की भीख माँगने वाली गनेसी भी नहीं। और ‘वृत्ति’ की सुरजो बाई तो खैर इतनी ऊँची, इतनी धाकड़ लगती है कि भले ही वेश्या हो, पर वह अपनी तेजी और सच कहने की ताब में जैसे कोई रानी-महारानी नजर आती है। ऐसे ही 'नंगा’ की दीन-हीन गोमती को भी पता है कि वह सच कहने पर अड़ जाए तो प्रभुतासंपन्नों का सिंहासन तो एकबारगी हिलेगा ही।

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सच पूछिए तो शैलेश मटियानी ने 'होल टाइमर’ लेखक के सारे खतरे उठाते हुए, अकेले दस लेखकों के बराबर लिखा था। उन्होंने हिंदी में दर्जनों 'कालजयी’ कहानियाँ ही नहीं, बहुत से बेजोड़ उपन्यास भी लिखे हैं और उनके उपन्यासों को किसी भी तरह कमतर आँकना भूल होगी। उनके 'मुठभेड़’, 'बावन नदियों का संगम’, 'आकाश कितना अनंत है’, 'गोपुली गफूरन’, 'मुख सरोवर के हंस’, 'चंद औरतों का शहर’ जैसे कोई आधा दर्जन उपन्यास जिस ऊँचाई पर हैं, उसे छू पाना बहुत कम उपन्यासकारों के लिए ही संभव हो पाता है। इसी तरह राष्ट्र भाषा हिंदी पर लिखे गए उनके लेख इतने चुनौतीभरे और विचारोत्तेजक हैं कि उन्हें कभी भुलाया ही नहीं जा सकता। 'राष्ट्र भाषा का सवाल’ (1998) इस लिहाज से हिंदी भाषा के वर्तमान और उससे जुड़े मसलों को लेकर लिखी गई एक अनूठी किताब है, जिसे पढ़कर मटियानी के ईमानदार चिंतन के साहस का पता चलता है। 
साहित्य और लेखकीय अस्मिता से जुड़े बहुतेरे मुद्दों पर भी उन्होंने खूब खुलकर कलम चलाई। 'लेखक और संवेदना’ (1983), 'जनता और साहित्य’ (1976), 'मुख्यधारा का सवाल’ (1985), 'कभी-कभार’ (1993), 'यदा कदा’ (1996) उनके खरे-खरे साहित्यिक चिंतन-मनन की ऐसी किताबें हैं जिनके पीछे उनके दुर्धर्ष व्यक्तित्व और कठोर जीवनानुभवों का बल है। मोटे तौर से लेखकीय संवेदना और स्वाभिमान तथा लेखक और सामाजिक सरोकार उनके ऐसे लेखों की केंद्रीय भूमि रही है। और यहाँ उनकी लेखकीय ईमानदारी और गहरी अंतर्दृष्टि देखते ही बनती है। इसी तरह 'विकल्प’ और 'जनपक्ष’ पत्रिकाओं के माध्यम से मटियानी जी ने सचमुच साहित्यिक पत्रकारिता का आदर्श कायम किया। 'विकल्प’ पत्रिका के केवल नौ ही अंक निकले, लेकिन उनकी खासी धूम रही। 
यों उसमें शक नहीं कि मूलत: मटियानी जी कथाकार थे और उनके पास पहाड़ जैसे अनुभवों का इतना विशाल खजाना था कि उन पर कहानियाँ, उपन्यास लिखकर ही वे मुक्त हो सकते थे। इसी तरह बच्चों के लिए उन्होंने एक से एक असाधारण रचनाएँ लिखीं। इनमें 'माँ तुम आओ’ तथा 'हाथी और चींटी की लड़ाई’ गजब के उपन्यास हैं, जिन्हें बच्चों को ही नहीं, बड़ों को भी पढ़ना चाहिए। साथ ही उन्होंने लोककथाओं के पुर्नलेखन का चुनौतीभरा काम भी किया और इतने सृजनात्मक ढंग से गढ़वाल और कुमाऊँ की लोककथाओं को प्रस्तुत किया कि लगता है, इस क्षेत्र के लोक जीवन को समझने की बुनियादी कुंजी इन लोककथाओं में है। 
सच तो यह है कि एक बड़ी प्रतिभा का बड़ा लेखक जब साहित्य की विभिन्न विधाओं में कलम चलाता है तो उसकी विस्फोटक प्रतिभा की चौंध और धमक हर जगह सुनाई देती है। मटियानी जी का संपूर्ण साहित्य इसका बेहतरीन उदाहरण है। हालाँकि उनके इस भव्य लेखकीय प्रासाद का सर्वोच्च शिखर निश्चित रूप से उनका असाधारण कथा साहित्य ही है। 
मुझे पूरा यकीन है कि आज के आपाधापी और साहित्यिक फैशनों की चकाचौंध के दौर में, जब हिंदुस्तानी कथा-लेखन के अपने मिजाज और जड़ों की तलाश का समय जब आएगा, तब मटियानी जी का कथा-साहित्य हमें कहीं अधिक जरूरी और मूल्यवान लगेगा। इसलिए कि उसमें हमारा और हमारे समाज का चेहरा ही नहीं, हमारे भीतर-बाहर आए बदलावों का बेहद जरूरी ऐतिहासिक साक्ष्य भी है, जिससे इन कहानियों को पढ़ते हुए हमारे समय की पूरी दास्तान आँखों के आगे आ जाती है।
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प्रकाश मनु
545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
चलभाष: + 91 981 060 2327,
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