कहानी: माँ की वे डबडबाई आँखें

प्रकाश मनु

प्रकाश मनु

वह दिन कुछ अलग ही था। कालीपुर के प्रसिद्ध साहित्यकार वसंतदेव जी को सरस्वती सम्मान से सम्मानित किया जा रहा था। भला कालीपुर के लोगों के लिए इससे बड़ा खुशी का मौका और कौन सा हो सकता था।
असल में तो वसंतदेव जी का ही नहीं, यह पूरे कालीपुर का सम्मान था। कालीपुर जो अपने लाड़ले साहित्यकार पर जान छिड़कता था। वहाँ के लोगों के लिए वसंतदेव अपने, बहुत अपने थे। इसलिए कालीपुर के लोग उन्हें हमेशा घेरे रहते थे। वे जब-तब उनके पास जाकर बतियाते। कभी-कभी तो घंटों गप-सड़ाका होता। बीच-बीच में किस्से-कहानियाँ भी।
वैसे भी वसंतदेव जी में लेखकों वाला कोई अभिमान नहीं था। सीधे-सरल आदमी। लंबा-चौड़ा घर का दालान था। उसमें लोगों की भीड़ लग जाती। खासकर शाम के समय।...दिन भर वे अपना लिखने-पढ़ने का काम करते। पर शाम को आने-जाने वालों से खूब धधाकर मिलते। सबसे दिल खोलकर बातें करते, जैसे वे भी उनके घर-परिवार के ही सहस्य हों। सबसे उनका सुख-दुख पूछते। और कहीं न कहीं इसी में कविता-कहानियाँ भी खोज लेते। पर जब वे अपने अंदाज में लिखते तो उनमें जान पड़ जाती थी। एक छोटी सी बात बेजोड़ कहानी का रूप ले जाती। लोग पढ़ते तो चकित होते। अहा, कैसे अलबेले साहित्कार हैं हमारे वसंतदेव जी! अहा, लेखक हो तो ऐसा! शब्दों में मानो सरस्वती बहती है।
फिर बच्चों के साथ बतियाने में तो उन्हें खूब रस आता। बच्चों से बातें करते तो खूब हँसते और हँसाते भी थे। कभी-कभी अपनी जिंदगी की सच्ची कहानियाँ भी सुनाते। इसीलिए कालीपुर के सब बच्चों के वे प्यारे कहानी बाबा थे, जिनसे नई-निराली मजेदार कहानियाँ सुनने वे दौड़-दौड़कर जाते। और हर बार कुछ न कुछ अमोल खजाना लेकर लौटते।
यही कारण था कि वसंतदेव जी को अपनी साहित्य-साधना के लिए सरस्वती सम्मान मिला, तो उनके स्वागत-समारोह में जनता टूट पड़ी। इतने लोग उन्हें सुनने आए थे कि उस विशाल सभा-कक्ष में चप्पा भर जमीन भी खाली नहीं थी। बहुत से लोग बाहर भी खड़े थे और उनकी बातें सुनने के लिए उत्सुक थे।
शुरू में सभा के संयोजक हरि भाई ने बड़े आदर-मान के साथ वसंतदेव जी और उनके साहित्य के बारे में चंद बातें कहीं। बोलते-बोलते वे भावुक हो गए। बोले, “मुझे खुशी है कि वसंतदेव कालीपुर के हैं और पूरा कालीपुर उनका। इसलिए कि उनके शब्द-शब्द में कालीपुर बसा हुआ है। इससे पहले कालीपुर को भला कितने लोग जानते थे! पर अब तो उनके हर किस्से-कहानी में कालीपुर और यहाँ के लोगों की कोई न कोई मोहक छवि है। वसंतदेव जी ने कालीपुर का नाम गाँव-गाँव, शहर-शहर पहुँचा दिया। यहाँ तक कि पूरी दुनिया आज कालीपुर को जान गई है। यही कारण है कि पूरे कालीपुर को अपने इस प्यारे साहित्यकार पर अभिमान है।”
सुनकर लोगों ने खूब तालियाँ बजाईं। पूरा सभाकक्ष तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।
इसके बाद कुछ बच्चों ने आकर अपने प्यारे कहानी बाबा को पुष्पमालाएँ पहनाईं, गुलदस्ता भेंट किया। वसंतदेव जी के मित्रों और कुछ प्रसिद्ध साहित्यकारों ने उनसे जुड़े संस्मरण सुनाए। कुछ खट्टे, कुछ मीठे। पुरानी यादों का सिलसिला चल निकला। जैसे रस की वर्षा हो रही हो।
सुनने वाले मुग्ध थे। लगा, आज जीवन धन्य गया!
इसके बाद वसंतदेव जी से कहा गया कि वे अपने पचास बरस लंबे साहित्यिक सफर के बारे में कुछ कहें।
इस पर वसंतदेव खड़े हुए तो उनकी आँखें भरी हुईं थी। बोले, “माफ करें, इस मौके पर क्या कहूँ, क्या नहीं, मुझे तो कुछ सूझ नहीं रहा। हाँ, मुझे बस एक चीज याद है, मेरी माँ की वे डबडबाई आँखें!...”
कहते-कहते अचानक उनका गला रुँध गया। जैसे आवाज गले में फँस गई हो। किसी तरह खुद को सँभालकर बोले, “हाँ, वे माँ की डबडबाई आँखें ही थीं।...बस, वहीं से मुझे राह मिली। मैं तो एकदम आवारा लड़का था, पढ़ने-लिखने से मेरा वैर था। किताबें देखते ही दूर भागता था, पर मेरी माँ...!”
वसंतदेव जी बोलते-बोलते रुक गए, जैसे उन्हें शब्द न मिल पा रहे हों। उनका स्वर कुछ भीग सा गया था।
फिर कुछ सोचते हुए उन्होंने कहा, “अच्छा तो सुनिए, मैं आपको एक कहानी सुनाता हूँ। सच्ची कहानी। एक शरारती बच्चे वसंत की कहानी। अब यह बताने की तो जरूरत तो नहीं कि वह शरारती बच्चा कोई और नहीं, मैं ही था जो आज वसंतदेव बना बैठा हूँ और जिसे आप जैसे लोगों का इतना प्यार मिल रहा है। पता नहीं, मैं उसके काबिल हूँ भी या नहीं। खैर, सुनिए यह कहानी। आज सुना ही देता हूँ, वरना मेरी छाती पर बहुत बोझ रहेगा। बहुत बोझ...!”
सभा में इस कदर चुप्पी थी कि साँस की आवाज भी सुनाई देती थी। इधर वसंतदेव की कहानी शुरू हो चुकी थी—
हाँ, तो मित्रो! कहानी सुनाता हूँ वसंत की।...कालीपुर के एक बड़े जमीदार का बेटा था वसंत, इसीलिए मारे लाड़ के कुछ बिगड़ भी गया था। सारे दिन दोस्तों के साथ खेलकूद, तमाशे, आवारागर्दी। सुबह का गया कब घर लौटेगा, किसी को पता नहीं। कई बार वसंत के पिता गदाधर बाबू इस बात से परेशान हो उठते। उन्हें यह चिंता खाए जा रही थी कि वसंत अगर पढ़ेगा-लिखेगा नहीं, तो भला कालीपुर की इतनी लंबी-चौड़ी जमीदारी कैसे सँभालेगा?
उन्होंने एकाध बार वसंत को डाँटा, फटकारा और चेताया भी। पर हमेशा वसंत की माँ सीतादेवी बीच में आ जाती थीं। वसंत को छाती से लगाकर कहतीं, “अभी तो खेलने-खाने और शरारतें करने के दिन है मेरे लाल के। अभी से इसे...!”
इस पर गदाधर बाबू क्या कहते! वे चुप हो जाते, पर अंदर ही अंदर घुलते जाते थे।
पर जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया, गदाधर बाबू की मुसीबतें भी बढ़ती गईं। उनकी उम्र ढल रही थी और शरीर अब साथ नहीं देता था। उनका इकलौता बेटा था वसंत, जिस पर उनकी सारी उम्मीदें टिकी थी। सोचते थे, वसंत लायक बनेगा और कुल का नाम ऊँचा करेगा। पर उसकी आदतों में जरा भी सुधार नहीं हुआ। उलटे बड़े होने के साथ उसकी आवारागर्दी बढ़ती गई। अब तो माँ सीतादेवी भी परेशान थीं और कभी-कभी वसंत को टोककर कहतीं, “बेटे, जरा अपने पिता की भी चिंता कर। वे रात-दिन तेरे दुख में घुलते जा रहे हैं।”
आखिर गदाधर बाबू बुरी तरह बीमार पड़ गए। चारपाई पर पड़े-पड़े सोचते, “वसंतदेव कुछ सयाना होता तो मुझे चिंता किस बात की थी? पर अब तो शायद मरकर ही चैन पड़े।” और दुख से जर्जर हो चुके गदाधर बाबू कुछ ही दिनों में चल बसे।
माँ सीतादेवी की हालत भी अब खराब थी। कई बार वे खुद को ही पति की मृत्यु के लिए जिम्मेदार ठहरातीं। सोचतीं कि आखिर मेरे ही कारण उनका दुख बढ़ा। मुझे वसंत को शुरू से ही समझाना चाहिए था।
अब तक वसंतदेव के दोस्तों का अच्छा-खास गुट बन गया था। उनका बस एक ही काम था। सुबह से शाम तक यहाँ से वहाँ घुमक्कड़ी करना। गपबाजी और मजाक। कभी-कभी तीतर लड़ाने का खेल चलता तो कभी दिन भर पतंगबाजी। रोज पिकनिक मनती और उसके लिए न जाने किन-किन किसानों की फसलें बर्बाद हो जाती। ढेर सारे फल और सब्जियाँ तोड़ ली जातीं। उनमें से जितनी खाई जातीं, उनसे ज्यादा बर्बाद होतीं। किसान शिकायत करने की बात करते, तो उलटे उन्हें धमकी मिल जाती। फिर भी सीतादेवी तक यह बात जैसे-तैसे पहुँच ही जाती और उनका दिल टूक-टूक हो जाता। सोचतीं, ‘हाय, विधाता ने यह कैसे बेटा मुझे दिया, जिसने मेरा सारा सुख-चैन हर लिया!’
आखिर उन्होंने थोड़ी कड़ाई शुरू की। वसंत को बुलाकर सीधे-सीधे कहा, “अब तुम बड़े हो गए हो बेटे, मेरी सारी आशाएँ तुम पर टिकी हैं। तुम खेलो-घूमो, सब करो, पर पढ़ाई-लिखाई का भी खयाल करो।”
अब वसंत को घर पर पढ़ाने के लिए एक बुजुर्ग अध्यापक सुधाकर जी भी आने लगे थे। सुधाकर जी बड़े गुणी और धैर्यवान अध्यापक थे। दूर-दूर तक उनका नाम था। लोग उनकी योग्यता का सम्मान करते। उनका सबसे बड़ा गुण तो यह था कि जो बच्चे पढ़ाई से जी चुराते थे, उन्हें भी वे इतने प्रेम से पढ़ाते कि धीरे-धीरे उन्हें भी पढ़ाई में रस आने लगता और वे लायक बन जाते।
सुधाकर जी ने सोचा था, वसंत खासा बिगड़ा हुआ बच्चा है, फिर भी महीने-दो महीने में तो उसे राह पर ले ही आऊँगा। पर उन्हें नहीं पता था कि वसंत घर बैठे या बाहर घुमक्कड़ी कर रहा हो, उसका मन तो शरारतें करने में ही लगता है।
यही वजह थी कि रोज शाम के समय सुधाकर जी पढ़ाने आते, तो वसंत कभी घर के बाहर वाले बगीचे में छिप जाता, तो कभी छत पर जाकर पड़छत्ती पर रखे सामान के पीछे दुबक जाता। कभी किसी पेड़ की ऊँची डाली पर जा बैठता और उल्लुओं या तीतर जैसी आवाजें निकालने लगता। कभी बाघ की आवाज तो कभी गधे का ढेंचू राग। सुधाकर जी सब समझ जाते और वसंत की शैतानियों पर मन ही मन हँसते। फिर उसे प्यार से पढ़ाने की कोशिशों में जुट जाते।
एकाध बार तो यह भी हुआ कि जैसे ही सुधाकर जी पढ़ाने के लिए कमरे में आए, वसंत झट चारपाई के नीचे जा दुबका। सुधाकर जी थोड़ी देर हैरानी से इधर-उधर देखते रहे, कि अरे, वसंत कहाँ गायब हो गया? अभी तो थोड़ी देर पहले यहीं था। कहीं वह किसी खिड़की से तो नहीं कूद गया? तब उसके साँस लेने और खुदर-खुदर हँसने से पता चलता कि अरे, वह तो चारपाई के नीचे छिपा हुआ है।
सुधाकर जी कानों को हाथ लगाते। हे राम, वे किस जंजाल में आ फँसे!
*
वसंत की शरारतें रोज-रोज बढ़ती ही जातीं। आखिर एक दिन सुधाकर जी इतने परेशान हो गए कि बोले, “अच्छा, रहने दो वसंत। नहीं पढ़ना चाहते तो न सही, लेकिन कम से कम मुझे देखकर चारपाई के नीचे तो मत छिपो। यह मेरा ही नहीं, विद्या का भी अपमान है।”
वसंत बोला, “मास्टर जी, सच्ची कहूँ? पढ़ना मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। पर हाँ, अगर आप रोज कहानी सुनाएँ, तो मैं जरूर सुनूँगा।”
अब सुधाकर जी को नया तरीका मिल गया। उन्होंने सोचा, ‘वसंत को रोज नई-नई कहानियाँ सुनाऊँगा। कहानियों में ही कुछ ऐसी अच्छी बातें भी सिखा दूँगा कि धीरे-धीरे इसका मन पढ़ाई में लगने लगेगा।’
इसके बाद नया सिलसिला शुरू हुआ। रोज सुधाकर जी आते और एक से एक दिलचस्प कहानियाँ सुनाते। हर बार अपनी कहानी में वे कोई ऐसी बात बताते जो जीवन में काम आती। एक बार उन्होंने आसमान के तारों की कहानी सुनाई तो सोचा कि इसी बहाने थोड़ा गणित का जोड़-बाकी भी सिखा दिया जाए। उन्होंने कहा, ‘सुनो वसंत, एक था पुंपू। बड़ा ही अच्छा, प्यारा बच्चा। उसे तारे अच्छे लगते थे। एक दिन उसने आसमान में देखा, दो तारे थे। देखकर पुंपू बड़ा खुश हुआ। थोड़ी देर बाद दो तारे और उग आए। वह सोचने लगा, अरे वाह, ये तो दो और दो यानी चार तारे हो गए। उसने यह बात अपनी बहन पुनपुन को बताई। पुनपुन बोली, हाँ, मुझे तो पता है कि दो और दो मिलकर चार होते हैं।...’
कहानी सुनते-सुनते वसंत कुढ़कर बोला, “मास्टर जी, यह तो आप गणित पढ़ा रहे हैं। मैं पढ़ूँगा नहीं, आप तो बस कहानी ही सुनाइए।” और खिड़की से छलाँग लगाकर बाहर भाग गया।
इस पर सुधाकर बाबू इतने दुखी हुए कि उसी दिन उन्होंने सीतादेवी के पास जाकर कहा, “माफ कीजिए, मैं अपनी हार मानता हूँ। मैंने एक से एक बिगड़े बच्चों को सँभाला है, उनमें पढ़ने-लिखने की लौ पैदा की है। ऐसा कभी नहीं हुआ कि मुझे हार माननी पड़ी हो। पर वसंत जैसा बच्चा मैंने कोई और देखा नहीं। मुझे नहीं लगता कि यह कभी सँभल पाएगा। अब आप मुझे इजाजत दीजिए, कल से मैं इसे पढ़ाने नहीं आऊँगा।”
कहते हुए सुधाकर जी के चेहरे पर इतनी पीड़ा थी कि सीतादेवी भौचक रह गईं। उनके मुँह से कोई बोल तक नहीं निकला।
पर तभी से खुद सीतादेवी की यह हालत हो गई कि जैसे अंदर ही अंदर कोई घुन उन्हें खा रहा हो। उनकी हालत बिल्कुल बीमारों जैसी हो गई। मुँह पीला पड़ गया। धीरे-धीरे शरीर सूखता गया, वे बस हड्डियों का ढाँचा भर रह गईं।
वसंत माँ की यह हालत देखता, पर अनदेखा कर देता। एक दिन शाम के समय वह बाहर से आया तो घर के पुराने नौकर रामुल काका ने बताया कि “बाबू, अम्माँ जी बुला रही हैं।”
वसंत के हाथ-पैरों में मिट्टी लगी थी। आज कुश्ती लड़ने की प्रतियोगिता में उसने कई बड़े-बड़े धींगड़ पहलवानों को पछाड़ा था। अगली बारी में लौटकर उसे कुछ और दावँ आजमाने थे। वह जल्दी से माँ के पास गया और बोला, “अम्माँ, क्या बात है?”
सीतादेवी बहुत कुछ कहना चाहती थीं। वे सोच रही थीं, क्या कहूँ, क्या नहीं? पर वसंत को जल्दी थी। उतावलेपन से बोला, “जल्दी कहो न माँ, क्या बात है?”
सीतादेवी चुप, एकदम चुप। जैसे सारे शब्द चुक गए हो। वे अपलक बेटे को देखे जा रही थीं, जिसने उनकी सारी आशाओं को धूल-धूल कर दिया था। फिर भी यह नहीं समझ पा रहा था कि उसके कारण माँ कैसा पहाड़ जैसा दुख झेल रही हैं।
आखिर कुछ न कहा गया, तो उन्होंने बड़ी निरीह दृष्टि से वसंत को देखा और रो पड़ीं। रोते-रोते बोलीं, “अरे वसंत, मेरे लाल, तू पढ़ता क्यों नहीं है, बेटे? क्या तू बिल्कुल नहीं पढ़ेगा, कभी नहीं? तेरे पिता तो इसी चिंता में घुल-घुलकर मर गए। लगता है मैं भी...अब मैं भी नहीं बचूँगी। फिर याद करते रहना माँ को। बड़ा आया माँ का लाड़ला!”
कहते-कहते माँ की आँखों से धाराधार आँसू बहने लगे। इन दिनों चिंता-फिक्र के मारे वे इतनी कमजोर हो गई थीं कि लगा, अभी बेहोश होकर गिर पड़ेंगी।
वसंत को अब समझ में आया कि कितना बड़ा अनर्थ उससे हुआ है। माँ जिन्हें वह सबसे ज्यादा प्यार करता है, वे भी शायद उसे छोड़कर चली जाएँगी। और उसका सब कुछ नष्ट हो जाएगा, सब कुछ। उसकी हँसी-खुशी की सारी दुनिया भरभराकर गिर पड़ेगी। और तब...?
“माँ-माँ, मैं पढू़ँगा। माँ, मैं अब तुम्हें कभी शिकायत का मौका नहीं दूँगा। मुझे माफ कर दो माँ!” कहकर आगे बढ़कर उसने माँ को सहारा दिया।
दुर्बल माँ की आँखों में एक क्षीण सी चमक दिखाई पड़ी, जैसे वे धीरे से मुसकराई हों। पर वे इतनी कमजोर हो गई थीं कि एकाएक चारपाई पर गिर पड़ीं। उनकी साँस जोर-जोर से चल रही थी।
वसंत ने जल्दी से दौड़कर माँ को पानी पिलाया और उनका माथा दबाने लगा। इतने में रामुल काका दौड़कर वैद्य जी को बुला लाए। वैद्य पुरंदरलाल बड़े अनुभवी थे। उन्होंने आकर नब्ज देखी। फिर दवा देकर कहा, “कोई गहरा सदमा लगा है इन्हें। खुश रहेंगी और ठीक से खाने-पीने लगेंगी, तो ठीक हो जाएँगी। पर अभी इन्हें दो-तीन महीने सेवा की बड़ी जरूरत है वसंत बेटे।”
अब तो वसंत का एक ही काम था। माँ की इच्छा को दौड़-दौड़कर पूरा करना। कभी उन्हें दवा पिला रहा है, कभी उन्हें खुद अपने हाथ से काटकर फल खिलाकर रहा है, कभी उनके मन बहलाव के लिए बातें कर रहा है।
अँधेरी रात गई, नया दिन उग आया था...
*
कहते-कहते वसंतदेव जी कुछ देर के लिए रुके। उनका पूरा शरीर उस समय भावनाओं से झनझना रहा था। खुद पर काबू पाना उन्हें मुश्किल लग रहा था।
उन्होंने हाथ से कुछ इशारा किया। हरिदेव जी ने झट सामने पड़ा पानी का गिलास उठाया और वसंतदेव जी के हाथों में पकड़ा दिया।
वसंतदेव जी ने थोड़ा पानी पिया। हलके से माथे पर हाथ फेरा, और पूरे सभाकक्ष पर एक नजर डाली। सभी की निगाहें इस समय उन्हीं पर टिकी थीं। एकाएक फिर से वे अपने सुर में आ गए। रुकी हुई कहानी आगे चल पड़ी...
हाँ, तो मित्रो, बात वसंत की दुखी, व्याकुल माँ सीताबाई की हो रही थी।...माँ कुछ ठीक हुईं, तो वसंत ने कहा, “माँ-माँ, मैं सुधाकर जी के घर जाऊँ? उनसे जाकर माफी माँगूँगा।” सीतादेवी ने खुशी से भरकर बेटे को देखा और उसका मुँह चुमकार लिया।
उसी समय वसंत दौड़ा-दौड़ा सुधाकर जी के घर पहुँचा। और जैसे ही सुधाकर जी घर से बाहर आए, वह उनके पैरों पर गिर पड़ा। बोला, “क्षमा करें गुरु जी, मैं अब पढू़ँगा। आपको कोई शिकायत का मौका नहीं दूँगा। आप पहले की तरह पढ़ाने के लिए मेरे घर आएँ। अगर मेरा कोई भी व्यवहार आपको बुरा लगे, तो आप चाहे जो सजा दें।”
सुधाकर जी हैरान, अरे, क्या यही वह वसंत है जिसके बारे में उन्होंने कहा था कि कभी सँभल नहीं पाएगा।
अगले दिन सुधाकर जी वसंत को पढ़ाने घर आए तो वसंत तो खुश था ही, उसकी माँ सीतादेवी उससे भी अधिक खुश थीं। और खुद सुधाकर बाबू! वे तो जैसे अचंभे में थे कि यह जादू हुआ कैसे?
पर सुधाकर जी जब वसंत को पढ़ाने बैठे, तो समझ गए कि यह वह पहले वाला वसंत हरगिज नहीं। उनके सामने तो एक अलग ही वसंत बैठा हुआ है, जिसमें पढ़ने की बड़ी गहरी ललक है।
सुधाकर जी ने पढ़ाना शुरू किया तो समझ गए कि वसंत शरारती भले ही हो, बुद्धू हरगिज नहीं है। सुधाकर जी जो कुछ बताते, उसे वह एक बार में ही इस कदर दिमाग में बैठा लेता कि फिर उसे दोबारा पढ़ने की जरूरत ही न होती। फिर साहित्य, कला और इतिहास की तो इसे अच्छी-खासी जानकारी भी थी। हाँ, गणित और विज्ञान में वह ज्यादा होशियार नहीं था। पर सुधाकर जी विज्ञान को भी रोचक कथाओं की शक्ल में सुनाते। बड़ी-बड़ी वैज्ञानिक खोजें कैसे हुईं और उसके लिए वैज्ञानिकों ने कितनी तकलीफें सहीं। यह सब सुनकर वसंत रोमांचित हो उठता और उसके मन में भी कुछ नया करने और कुछ बनने की ललक पैदा होती।
इसी तरह सुधाकर जी गणित को भी रोचक शैली में, छोटे-छोटे सवालों और मजेदार पहेलियों के रूप में उसके सामने रखते, तो वसंत को बड़ा मजा आता। झटपट इन सवालों का जवाब देते-देते उसका दिमाग इतना तेज हो गया कि गणित के बड़े-बड़े सवालों को भी वह मुँहजुबानी हल कर देता।
कुछ समय बाद सुधाकर जी ने सीतादेवी को सलाह दी कि अब वसंत का स्कूल में नाम लिखा दिया जाए।
शुरू में वसंत को इस पर झेंप आई। उसकी उम्र काफी अधिक हो गई थी। इस उम्र में छोटे-छोटे बच्चों के साथ पढ़ना उसे शर्म की बात लगती थी। पर फिर उसने सोचा, ‘अगर स्कूल में जाकर ज्ञान मिलता है, तो फिर इस बात की ज्यादा परवाह क्यों की जाए?’
और वाकई यही हुआ। शुरू में बच्चे अपने से काफी बड़ी उम्र के वसंत को अपने बीच बैठा हुआ देखकर हँसते। पर फिर धीरे-धीरे वसंत के व्यक्तित्व का ऐसा असर पड़ा कि सभी उसका आदर करने लगे। यहाँ तक कि बच्चों को जो भी मुश्किल आती, उसके बारे में वे अकसर वसंत से ही पूछ लेते। इससे वसंत की अच्छी-खासी धाक जम गई थी।
इसके बाद स्कूल के सालाना जलसे में कविता सुनाने और नाटक का प्रोग्राम हुआ, तो वसंत की प्रतिभा का कमाल सबने देखा। वह हर काम में सबसे अव्वल था। और खासकर एक कंजूस सेठ लच्छूमल पर लिखा गया उसका हँसी-मजाक वाला नाटक ‘सेठ लच्छूमल जलेबी वाले’ तो ऐसा जमा कि हर घड़ी लोग ठहाके लगाते। उसकी कविताओं को भी लोगों ने सराहा। उनमें देश और समय की पुकार थी और जनता का सच्चा दर्द भी।
अब वसंतदेव पूरे स्कूल का हीरो बन चुका था। यहाँ तक कि अध्यापक भी उसकी इज्जत करने लगे थे।
कुछ समय बीता। फिर एक बार की बात, स्कूल में एक बड़े स्वाधीनता सेनानी देवधर जी को आना था। प्रधानाचार्य देशदीपक जी ने वसंत को बुलाकर कहा, ‘इस मौके पर तुम कोई अच्छा सा नाटक दिखाओ।”
वसंत हाँ कहकर घर चला आया और सोचने लगा कि आखिर कौन सा नाटक दिखाया जाए? काफी सोचकर उसने खुद ही एक नाटक लिखा, जिसका नाम था, ‘माँ की वे डबडबाई आँखें’। इसमें वसंत ने नाटक के रूप में अपनी ही कहानी लिख दी थी। एकदम सच्ची कहानी, जिसमें उसके दिल का दर्द था, आँसू भी।...
कहानी का नायक एक ऐसा आवारा किस्म का बच्चा था, जो इतना बिगड़ा हुआ था कि उसके कारण पूरा घर परेशान था। पिता गुजर गए, माँ भी बदहाल थीं। अच्छी-खासी जमीदारी बर्बादी के कगार पर आ गई, पर उस आवारा लड़के को परवाह ही नहीं थी। एक दिन रोती हुई माँ की आँखों में उसने ऐसी करुणा देखी कि वह दहल गया। उन आँखों ने ही उसे भटकाव से बचाकर रास्ता बता दिया। वह बच्चा बड़ा होकर लेखक बना, पर जीवन भर माँ की उन आँखों को नहीं भूल पाया।
सचमुच बड़ा करुण नाटक लिखा था वसंत ने। लिखते समय उसकी आँखों से आँसू झर रहे थे, और शब्द किसी नदी की तरह बहते जा रहे थे। बाद में स्कूल में वह नाटक खेला गया तो जिसने भी देखा, उसकी आँखें नम हो गई। खुद देवधर जी ने उठकर वसंत के सिर पर हाथ फेरा और उसे बड़ा होकर नामी लेखक होने का आशीर्वाद दिया।...
*
कहते-कहते वसंतदेव कुछ देर साँस लेने के लिए रुके। सभाकक्ष में चारों तरफ नजर दौड़ाई। फिर बोले—
“तो साहिबान, यही मेरा पहला नाटक था। मेरी पहली रचना, ‘माँ की वे डबडबाई आँखें’ और यही मेरे लिखने की शुरुआत थी। सचमुच माँ की वे डबडबाई आँखें ही थीं जिन्होंने मुझे जीवन का सही अर्थ बताया और सही राह दिखा दी। माँ ही मेरी सच्ची गुरु थीं, जिन्होंने मेरे मन के अंधकार को दूर करके ज्ञान का पहला दीया जलाया। उसके बाद तो मैं लिखता गया और बढ़ता गया। धीरे-धीरे मेरी किताबें छपीं, बड़ा नाम हुआ, बड़े पुरस्कार मिले। और आज मुझे साहित्य का सबसे बड़ा सम्मान सरस्वती सम्मान मिला, जिस मौके पर आप सब लोग आए और मुझे इतना प्यार, इतना आदर दिया।...
“पर यह सब कुछ न होता...कतई न होता, अगर उस दिन माँ की आँखों ने मुझे जीवन का सच्चा पाठ न पढ़ाया होता। वे आज भी मेरे भीतर जस की तस गड़ी हुई हैं। लिहाजा इस पुरस्कार पर मेरा नहीं, मेरी माँ का हक है जो चाहे अनपढ़ सही, पर मुझसे ज्यादा जिन्होंने जीवन के मर्म को समझा है। यह पुरस्कार मैं अपनी उन्हीं माँ को समर्पित करता हूँ जिनके कारण एक बिगड़ा हुआ बच्चा वसंत आखिर आप सबका लाड़ला वसंतदेव बन गया।”
कहकर वसंतदेव उठे और सभा की अगली कतार में बैठीं पचासी बरस की बूढ़ी माँ सीतादेवी की झोली में मानपत्र रख दिया। बोले, “माँ, तुमने उस दिन रोते-रोते कहा था न कि बेटा, तू पढ़ता क्यों नहीं है? मैं कभी तेरी वे डबडबाई आँखें नहीं भूल पाया और आज तक जो कुछ मैंने लिखा, उसके पीछे तेरी उन्हीं आँखों का गहरा दर्द है।” कहते-कहते उन्होंने माँ के चरणों की धूल सिर पर लगा ली।
सीतादेवी की आँखों में उस समय अनोखी चमक थी। उन्होंने बड़े प्यार से बेटे के सिर पर हाथ फेरकर आशीर्वाद दिया।
कुछ ही देर में वसंतदेव उन्हें सहारा देकर सभा से बाहर ले जा रहे थे। और सारी सभा आदर से भरकर अपलक उन्हें देख रही थी।
***

प्रकाश मनु
545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008
चलभाष: + 91 981 060 2327 
ईमेल: prakashmanu333@gmail.com

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