खमीर (पंजाबी कहानी): देवेंद्र सत्यार्थी

धरोहर
डॉ. सुनीता

हिंदी अनुवाद: डॉ. सुनीता


“आदलगढ़ के बूढ़े सैयद का खत रास्ते में ही कहीं रह गया?” वह हर रोज अपनी पत्नी से पूछता और उसकी मुसकराहट फीकी पड़ जाती। “आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद ने तुझे कैसे भुला दिया?” वह हर रोज अपनी बेटी से पूछता तो लाजवंती सिर झुकाए चुपचाप बैठी रहती।
हो सकता है, यह डाकखाने वालों की शरारत हो, वह बार-बार सोचता। पर यह गुत्थी सुलझती हुई दिखाई नहीं देती थी।
दिन भर ताँगा चलाने के बाद वह रात में तांगा खोलता और लपककर अपनी पत्नी से पूछता, “आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद का खत आज तो जरूर आया होगा। कहाँ रखा है आदलगढ़ के बूढ़े सैयद का खत?”
उसकी पत्नी चुपचाप बैठी रहती, जैसे खेत में किसी पौधे को पाला मार गया हो। लाजवंती के होंठ भी न हिलते और वह खुद भी चुप साधकर बैठा हुआ हुक्के के कश लगाता रहता। “आया हो तो बता दे लाजवंती की माँ!” वह सूरज की पहली किरण को बड़ी व्याकुलता से छूकर कहता। अब जो चीज मौजूद न हो, उसे कैसे प्राप्त कैसे किया जाता? पास से गुजरती लाजवंती भी कुछ न बोलती और उसकी पत्नी भी कोई जवाब न देती। सवेरे और शाम यही चिंता रहती। जैसे बारिश पिछड़ जाने से किसान उदास हो जाता है, कुछ ऐसी उदासी उसे भी घेरे रहती।
देवेंद्र सत्यार्थी व गुरुदेव
पहले तो हर हफ्ते आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद का खत आ जाता, और जिस दिन यह खत आ जाता, घर में खुशी की लहर दौड़ जाती। आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद की जो तसवीर उसने अपनी कल्पना के कलाभवन में बना रखी थी, उसके रंग लाजवंती से पूछ-पूछकर लगाए गए थे। एक कम न एक ज्यादा। पूरे दो साल, दस महीने और दस दिन लाजवंती आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद के घर में रही। आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद ने किस तरह लाजवंती की सुख-सुविधा का खयाल रखा, किस तरह उसका हर आँसू पोंछने के लिए उसका हाथ तैयार रहता, एक-एक विवरण लाजवंती से पूछ-पूछकर इस तसवीर के रंग चुने गए थे।
इस तसवीर पर उसे गर्व था। इस तसवीर को वह अपनी सर्वश्रेष्ठ रचना समझता था। आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद का चेहरा इस तसवीर में बहुत ही सचाई से भरपूर नजर आता है। उतनी ही सचाई के साथ उसने यह तसवीर अपने कलाभवन में उकेरी थी। इस तसवीर में इतनी जान नजर आ रही थी कि कभी-कभी उसे यों महसूस होता कि वह तसवीर उससे बातें कर रही है। फिर यह कैसे हुआ कि आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद का खत आना बंद हो गया। इनसान इतनी जल्दी कैसे बदल सकता है?
लोग देश के बँटवारे के किस्से छेड़ देते और लहूलुहान धरती की तसवीरें खींचने लगते और हिसाब लगाकर बताते कि इधर उतना खून नही बहा, जितना उस तरफ, तो पुरानी दिल्ली का नया ताँगे वाला दिल ही दिल में हँस पड़ता और उस समय की कल्पना के कलाभवन में पुकार-पुकारकर कहता, “मैं लाजवंती को हमेशा अपनी मुँहबोली बेटी समझता रहा।”
अब उसे हैरानी थी तो यही कि पिछले छह महीनों से आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद का खत क्यों नहीं मिला।
उधर से इधर आने वालों को कुछ कम कशमकश नहीं झेलनी पड़ी। अब तो ये लोग जम चुके थे, उनकी जड़ें धरती में गहरे जम गई थीं। कई बार ऐसा भी होता कि छह फुट का पौधा डेढ़ इंच गहरी जड़ों पर खड़ा रहता और आँधी-तूफान का मुकाबला करने के लिए तैयार नजर आता। शरणार्थी कहलाए जाने वाले इनसान इस बात पर तुल गए थे कि उन्हें पुरुषार्थी कहा जाए, क्योंकि वे बराबर अपने पैरों पर खड़े होने के लिए खून-पसीना एक करते रहे थे।
पुरानी दिल्ली का नया ताँगे वाला सोचता कि यह फिजूल की बहस है, क्योंकि इनसान को तो हमेशा अपने लिए खुद ही दरवाजा खोलना पड़ता है, खुद ही सड़क तैयार करनी पड़ती है। ताँगा चलाते-चलाते वह सामने सड़क की ओर देखता और महसूस करता कि यह सड़क उसने अपने हाथों से तैयार की है।
*

लाजवंती अब काफी सयानी हो गई थी। एक वक्त वह था कि लाजवंती अपने पिता के गालों पर अपना सुंदर मींडियों वाला सिर रगड़ने का आनंद लेती थी, जब वह दूर से विवाह के लिए ढोल की आवाज सुनकर नाचने लगती थी, पर अब तो वह स्वयं दुलहन बनने जा रही थी। लाजवंती का पिता कई बार लाजवंती की माँ को कह चुका था कि जब तक बेटी उनके दरवाजे पर बैठी है, वह ताँगा चलाने का काम छोड़कर एक घंटे के लिए भी पुरुषार्थी सभा के जलसे में नहीं जा सकता।
लाजवंती की माँ वह गीत गुनगुनाने लगती जिसमें कहा गया था कि किसी ने भी तो सिर नहीं झुकाया, फिर पहाड़ों के राजा का सिर क्यों झुक गया? बेटी के पिता का सिर क्यों झुक गया? घर में बेटी ने जन्म लिया, पिता का सिर झुक गया। अब जब लाजवंती का विवाह नजदीक आ रहा था, उसका सिर खुद-ब-खुद झुकने लग जाता। आदिलगढ़ का बूढ़ा सैयद उसकी कल्पना के कलाभवन से पुकारने लगता, “लाजवंती तो मेरी भी उतनी ही बेटी है, जितनी तेरी, और तेरे साथ मैं भी शामिल हूँ सिर झुकाने में। इसलिए आधा-आधा सिर झुकाने से ही काम चल जाएगा।”
जब लोग दरिंदगी को तराजू में तोल-तोलकर साबित करने का यत्न करते कि इधर औरतों की इतनी बेइज्जती नहीं की गई, जितनी उधर तो लाजवंती का पिता कह उठता, “अब ये किस्से बंद करो। कोई अच्छी-सी बात करो। कोई इनसानियत की बात करो। दरिंदों में भी तो सारे दरिंदे नहीं होते, कुछ शरीफ भी होते हैं। शराफत पर ही तो सचाई टिकी हुई है, जैसे बैल के सींगों पर धरती टिकी हुई है। जब बैल धरती का भार एक सींग से दूसरे सींग पर रखता है तो भूचाल आता है। शराफत भी तो सींग बदलती है। उस समय थोड़ा भूचाल आ भी जाए तो क्या उसे सारी उम्र याद करते रहना चाहिए? अगर बैठे दरिंदगी के ही किस्से सुनते-सुनाते रहो तो इनसानियत की बेल कैसे ऊपर चढ़ सकती है?”
लाजवंती की माँ कहती, “आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद जैसा शरीफ आदमी तो हमने दिल्ली में भी नहीं देखा।” पर अब आश्चर्य था तो यह कि आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद का खत छह महीनों से नहीं आया था और लाजवंती के विवाह का समय नजदीक आ रहा था।
उसे मुल्तान छोड़कर भागना पड़ा था। रास्ते में बड़ी से बड़ी मुसीबत आई। मुल्तान की याद तो आज भी आती थी। जैसे मुल्तान आज भी यह तकाजा कर रहा था, कि लाजवंती का विवाह खाँटी मुल्तानी रस्मों के साथ किया जाए। कभी-कभी वह सोचने लगता कि लाजवंती जीवित बच भी गई थी तो क्यों दोबारा उसके विवाह का भार उसके कंधों पर आ पड़ा।
ताँगा उसका अपना नहीं था। मुल्तान में तो उसने भूलकर भी अपनी गिनती गरीबों में नहीं की थी। वहाँ लाजवंती का विवाह जिस शानो-शौकत से किया जाता, उसका खयाल भी उसे परेशान कर रहा था। लाजवंती की माँ कहती थी कि बड़े-बड़े राजा लोग भी अपनी बेटियों को अपने दरवाजे पर नहीं बैठा सकते। समय खराब था। जितनी जल्दी लड़की के हाथ पीले कर दिए जाएँ और उसे उसके घर पहुँचा दिया जाए, उतना ही ठीक था।
सारे रुपए रास्ते में ही लूट लिए गए। लाजवंती की माँ कैसे अपने सोने के कंगन बचा लाई थी, उसके लिए आज भी यह एक पहेली थी। गक्खड़ रेलवे स्टेशन के पास जब रेलगाड़ी पर हमला हुआ तो उसकी पत्नी ने बाँहों से सोने के कंगन उतारकर पता नहीं कहाँ छिपा लिए थे? उनके डब्बे पर भी हमला हुआ। लाशों के नीचे दो जिंदा लाशें सिसकती रहीं, गाड़ी अमृतसर पहुँची तो इन जिंदा लाशों को फिर से खुली हवा में साँस लेने का मौका मिला।
लाजवंती का किसी को कुछ पता नहीं था। उसे यह सोचकर तसल्ली हो गई कि अगर लाजवंती बच गई है तो उसे किसी ने कुछ नहीं कहा होगा। सात सालों की बच्ची को कोई कह भी क्या सकता था? फिर एक दिन पता लगा कि लाजवंती जीवित है। किस्सा यों हुआ कि आदिलगढ़ में जो लड़कियाँ ले जाई गईं, उनमें तीन बच्चियाँ भी थीं। उन तीन बच्चियों में लाजवंती भी थी। आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद ने अपनी घरवाली से कहा, “देख, सैयदजादी, अल्लाह की अमानत लाया हूँ। तीन लड़कियाँ घर में पहले ही थीं। ये तीन अल्लाह की भेजी हुई और सही। लाजवंती को तो अपनी चौथी बेटी बना ले, क्योंकि इस बेचारी को तो अपने माँ-बाप का नाम भी याद नहीं।” और अब वह यह सोचकर हैरान हो रहा था कि आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद ने लाजवंती को कैसे भुला दिया?
सात महीने पहले जब लाजवंती के लिए लड़का तलाश किया गया तो आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद की सलाह से यह रिश्ता तय किया गया। आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद ने लिखा था कि वह लाजवंती के विवाह पर जरूर पहुँचेगा। अब तो लाजवंती का विवाह बहुत नजदीक था। उसकी कल्पना के कलाभवन में आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद का चेहरा कितना मासूम नजर आता था। उसकी सफेद दाढ़ी ऐसे उभरती, जैसे इनसानियत का नया इतिहास लिखा जा रहा हो।
कभी-कभी पुरानी दिल्ली का यह नया ताँगे वाला, जो किसी जमाने में मुल्तान की नहर पर पनसाल नवीस था और दो भैंसों का मालिक था, अपनी आँखों में मुरव्वत और हमदर्दी भरकर कहता, “मुझे वह समय कभी नहीं भूल सकता, जब मुझे एक दिन खबर मिली कि हमारी लाजवंती अभी तक जीवित है और वह हमें वापस मिल जाएगी। लाजवती की माँ, तू जानती है कि हमें कैसे एक दिन लाजवंती की खबर मिली। दूसरी दोनों लड़कियाँ उस देश के उस पार से इधर आने में कामयाब हो गईं तो उनके द्वारा यह पता चला कि हमारी लाजवंती अभी जीवित है और आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद के घर में मौजूद है। वह वहाँ इसलिए टिकी रही कि उसे बूढ़े सैयद की बेटियों से प्यार हो गया था। लाजवंती तो जिस घर में रहेगी, वहीं की हो जाएगी। मैं पहले से जानता हूँ।...
“हाँ तो लाजवंती की माँ, मुझे वह दिन कभी नहीं भूलेगा जब मेरे खत के जवाब में आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद ने लिखा कि वह वाघा की सीमा तक लाजवंती को लेकर आने के लिए तैयार है। और लाजवंती की माँ, जिस दिन आपस में तय करने के बाद मैं वाघा की सीमा पर पहुँचा, तो मैंने देखा कि हमारी लाजवंती आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद की तीनों बेटियों के साथ खड़ी मुसकरा रही है। लाजवंती की माँ, मुझे लाजवंती की वह मुसकराहट कभी नहीं भूलेगी।”
लाजवंती की माँ सिर झुकाए खड़ी रहती, जैसे उससे कोई गुनाह हो गया हो, जैसे उसने इनसानियत के माथे पर की सचाई को झूठ समझने की गलती की हो। आखिर दुनिया में आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद जैसे इनसान भी मौजूद हैं, जो अपनी तीनों बेटियों के साथ तीन मुँहबोली छोटी बच्चियों का पालन-पोषण करने का फर्ज भी निभा सकें। भले ही ऐसे इनसान आटे में नमक के बराबर ही सही।
कभी-कभी पुरानी दिल्ली का यह नया ताँगे वला कहता, “काश! तूने आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद को देखा होता, लाजवंती की माँ! काश! तूने उसकी तीनों बेटियों को देखा होता। आदिलगढ़ का बूढ़ा सैयद मेरी ओर ऐसे बढ़ा, जैसे एक फरिश्ता एक इनसान से मिलता है। उसने अपनी तीनों बेटियों से मेरा परिचय करवाया। एक का नाम था बानो, जो सबसे बड़ी थी, यही कोई तेरह-चौदह साल की थी। मँझली बेटी शबनम, ठीक हमारी लाजवंती की हमउम्र थी। अब तो हमारी लाजवंती भी तेरहवें साल में है। शबनम भी तेरहवें साल में होगी। बानो का तो विवाह भी हो गया। आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद ने हमें बुलाया भी था। पर हम वहाँ कैसे जाते? जाना तो चाहते थे, लाजवंती की माँ! आदिलगढ़ के बूढ़े की सबसे छोटी बेटी भी हमारी लाजवंती के साथ वाघा की सीमा पर आई थी। वही जीनत, जो कोई पाँचेक साल की थी। अब तो वह भी बड़ी हो गई होगी...!”
बस, ऐसे ही बूढ़े का किस्सा हवा में लहराता रहता, पर हैरानी थी तो यही कि आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद ने खत लिखना क्यों छोड़ दिया।
*

एक दिन लाजवंती का पिता बोला, “अब थोड़ा कर्ज लेना ही पड़ेगा।”
“मैं कहती हूँ कि कर्ज बहत ज्यादा न लिया जाए।” लाजवंती की माँ ने नाक सिकोड़कर कहा।
“दुनिया क्या कहेगी? और अगर आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद को पता लगा कि हमने लाजवंती का विवाह पूरी शान से नहीं किया तो उसका दिल टूट जाएगा।”
“यह बात है तो आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद ने खत लिखना क्यों छोड़ दिया?”
“उसे जरूर कोई तकलीफ हो गई होगी।”
“बस, रहने भी दो। यह सब दुनिया का झूठ-सच ढका ही रहे तो अच्छा है। मैं पूछती हूँ, कौन किसी मुँहबोली बेटी के ब्याह पर दान-दहेज देने का खर्च उठा सकता है?”
माँ-बाप के बीच यह नोक-झोंक सुनकर लाजवंती मन मसोसकर रह जाती।
कर्ज लिए बिना लाजवंती के विवाह का खर्च पूरा नहीं हो सकता था। लाजवंती की माँ के सोने के कंगन बेचकर जो रुपए प्राप्त किए गए, वे तो कपड़े बनवाने में ही खर्च हो गए थे। माँ के झुमके लाजवंती को देने का फैसला हो चुका था। और ये झुमके लाजवंती को पसंद भी थे। माँ ने अपनी अँगूठी भी लाजवंती के हाथ में पहना दी थी। सोने की पतली-पतली दो चूड़ियाँ भी उसने जैसे जमीन खोदकर निकाल ली हों।
पिता की खुशी का ठिकाना न रहा, जब उसने देखा कि लाजवंती के हाथों के लिए भी आभूषण मिल गया। अब बाकी सारे खर्च के लिए पाँच सौ रुपए की जरूरत थी।
“पाँच सौ रुपए का इंतजाम होता दिखाई नहीं देता।” एक दिन पुरानी दिल्ली के नए ताँगे वाले ने कहा।
“तो कितने रुपए का प्रबंध हो सकता है?”
“तीन सौ का।”
“ब्याज कितना देना पड़ेगा?”
“ब्याज कोई नहीं होगा।”
“ब्याज तो होगा। बिना ब्याज के कौन रुपए देगा?”
“हमारा मालिक ही तैयार हो गया। बात दरअसल यों हुई कि मैंने उसे आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद का किस्सा सुनाया कि कैसे उसने हमारी लाजवंती को मुँहबोली बेटी बनाकर रखा और कैसे वह वाघा की सरहद तक लाजवंती को छोड़ने आया। कैसे वह रो रहा था, जब उसने लाजवंती को मेरे हवाले किया और कैसे आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद की कहानी ने हमारे मालिक के दिल पर जादू-सा असर किया। उसने तुरंत ही यह फैसला कर लिया कि वह हमारी लाजवंती को मुँहबोली बेटी समझेगा। वह कहता है कि ढाई सौ रुपए वह हमें बिना ब्याज के देगा और पचास रुपए अपनी तरफ से देगा। मेरी आमदनी में से वह दस रुपए महीना काटता रहेगा, जब तक ढाई सौ रुपए पूरे नहीं हो जाएँगे।”
“मुझे तो यकीन ही नहीं आता कि हमारा मालिक हमारी मदद करेगा।”
“तुझे तो आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद पर भी यकीन नहीं आता था।”
“हे भगवान, तेरी लीला अपरंपार है। दुनिया में नेक बंदे अभी तक मौजूद हैं।”
विवाह में पंद्रह दिन रह गए तो लाजवंती के पिता ने आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद को लिखा, “लाजवंती के विवाह का पूरा इंतजाम हो चुका है और अब किसी भी चीज की कमी नहीं रही। कमी तो यही कि अपनी मुँहबोली बेटी के लिए आदिलगढ़ के सैयद की दुआ हासिल हो जाए, जो वैसे तो हमेशा हासिल रही है।”
इस खत का भी कोई जवाब नहीं आया।
लाजवंती बहुत उदास रहती थी। सचमुच उसकी उदासी का बड़ा कारण यही था कि वह अपने मुँहबोले बाप से मिले बिना ही ससुराल चली जाएगी। वाघा की सरहद पर आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद ने साफ-साफ शब्दों में कहा था, “लाजवंती, मैं तेरे विवाह पर खुद आऊँगा। कोशिश करूँगा कि तेरी तीनों बहनों को भी लेकर आऊँ।”

“अपनी बेटियों को आदिलगढ़ का बूढ़ा सैयद कैसे ला सकता है, लाजवंती?”
एक दिन लाजवंती की माँ ने अपनी बेटी को समझाया, “देख बेटी, हमें दुनिया से बहुत ज्यादा आस नहीं करनी चाहिए। इतना कम है कि आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद ने तुझे आराम से अपने घर में रखा। लाजवंती, दो साल सात महीने और दस दिन कुछ कम तो नहीं होते। इतने दिन आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद ने तुझे अपनी बेटी बनाकर रखा।”
*

आखिरकार विवाह का दिन आ गया। आदिलगढ़ का बूढ़ा सैयद इस मौके पर हाजिर न हो सका। लाजवंती के पिता ने अपनी पत्नी को समझाया, “कोई बात नहीं, हमारी बेटी का मुँहबोला बाप नहीं आ सका, पर उसका खत जरूर आएगा।”
“अब आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद के खत का इंतजार छोड़ दो।”
“यह तू क्या कह रही है?”
“मैं सच कहती हूँ। यकीन न हो तो लाजवंती से पूछ लो।”
लाजवंती सिर झुकाए बैठी रही, जैसे वह माँ की हाँ में हाँ मिला रही हो। माँ ने ठीक ही तो कहा था, “कौन इतने लंबे रिश्ते निभा सकता है? लंबे दरियाओं जैसे रिश्ते निभाना हर किसी का काम नहीं। इनसानियत के रिश्ते वैसे तो कभी खत्म न होंगे। पर दुनिया की तकलीफें भी तो कभी खत्म न होंगी। इनसान ने इनसान को पहचानना भी छोड़ दिया है।” और उसने कहा था, “माँ, आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद से इनसान सबक लेगा तो उसे अपनी मंजिल नजर आने लगेगी।”
आखिर लाजवंती के विवाह के ढोल बजने लगे। शहनाइयों ने अलग रंग बाँध दिया। लाजवंती के हाथ पीले कर दिए गए। आग के चारों तरफ छह फेरे अपने दूल्हे के  पीछे और सातवीं बार दूल्हे के आगे लगकर चक्कर लगाए। यह विवाह की अंतिम मोहर थी। जब यह मोहर लग गई तो विवाह की शहनाइयों ने नाज और नखरे सहित वातावरण में अपने बोल गुँजा दिए।
लाजवंती का दूल्हा लाजवंती को साथ लेकर विदा हो गया। न आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद का खत आया और न वह खुद आया।
*

लाजवंती के विवाह को अभी पाँचेक दिन ही बीते थे, जब रात के बारह बजे किसी ने पुरानी दिल्ली के नए ताँगे वाले का दरवाजा खटखटाया। लाजवंती के पिता ने दरवाजा खोलने से पहले सहमकर खिड़की से झाँककर देखा।
कंबल में लिपटे हुए एक इनसान की शक्ल उसकी कल्पना के तार हिला गई। यह धुँधली-सी सूरत किसी पतझड़ की याद ताजा करा गई। उसने लपककर दरवाजा खोला और कंबल में लिपटी हुई सूरत को बाँहों में बाँध लिया। उस समय उसकी कल्पना के कलाभवन से आदिलगढ़ के बूढ़े सैयद की तसवीर ऊँची आवाज में बोल पड़ी, “आखिर इनसान का विश्वास अभी तक कायम है।”
आदिलगढ़ का बूढ़ा सैयद जैसे उसकी कल्पना के कलाभवन में अपनी तसवीर देखने के लिए आ गया था। उसने अपने कंबल के नीचे बहुत बड़ी पोटली छिपा रखी थी और उसकी जेब भी तो अपनी मुँहबोली बेटी के लिए कुछ कम भारी नहीं थी।
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पंजाबी से अनुवाद – डॉ. सुनीता
545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008
चलभाष: 09810602327

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