अच्छाई और अहिंसा

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

पीठाचार्य, डॉ. आम्बेडकर पीठ (मानवाधिकार व पर्यावरण मूल्य) 
पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, भटिंडा
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लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं एवं सेतु संपादन मंडल के सम्मानित सदस्य हैं। आप अहिंसा आयोग के समर्थक एवं अहिंसक सभ्यता के पैरोकार भी हैं।


अच्छा हो, ऐसा सब चाहते हैं। अच्छी जीवन की शुरुआत और अच्छे से जीवन का विकास, सब चाहते हैं। पर हमारी चाहत ही पर्याय है, ऐसा नहीं है। इसके लिए कुछ करना भी आवश्यक होता है। अच्छा तो तभी होगा न जब हमारे मन, वचन और कर्म में अच्छे गुण प्रतिष्ठित होंगे। कहते हैं कि हमारा धरती पर अस्तित्व इसलिए बचा हुआ है क्योंकि इस धरती पर अच्छे लोग भी हैं। हमारी धरती पर हमारे अस्तित्व के लिए इसलिए आज़ अच्छाई के अभियान का होना भी अत्यंत आवश्यक लगता है। अच्छाई का स्वप्न भी हो और अच्छाई का यत्न भी। अच्छाई का कर्म भी हो और अच्छाई का अभिनन्दन करने का आत्मबल भी। अच्छाई निभाने की निष्ठा हो और अच्छाई के साथ जीवन जीने की संस्कृति सृजित करने की शक्ति भी।

महाराष्ट्र अनेक संतों की पावन भूमि है। यहाँ की संत परंपरा अहिंसक सभ्यता की संवाहक रही है। हर जिले में संत हैं। संतों की तपस्थली है महाराष्ट्र। भारत की यह पवित्र भूमि संत ज्ञानेश्वर को सदैव स्मरण करती है। संत तुकाराम, राष्ट्र संत टुकड़ो जी महाराज, गजानन जी महाराज, विनोबा भावे तक ऐसे अनेक महान लोगों ने इस पवित्र भूमि में बहुत ही श्रेष्ठ जीवन जीने की पद्धति विकसित की। महाराष्ट्र में मराठों की वीरता से जाना जाता है। संतों की सदाचारिता के लिए जाना जाता है। सम्यक आचार-विचार की बौद्ध परंपरा आज़ भी सबसे अधिक महाराष्ट्र में विकसित हुई। भारत का सौभाग्य है कि इस पूरी परंपरा में अहिंसा और प्रेम का, सौहार्द और शांति का, स्वत्व की खोज में भी सहायता का संचार होता है। इस सकारात्मक ऊर्जा का संचार जहाँ भी पृथ्वी पर हो रहा है, वह पृथ्वी धन्य है। इसमें निःसंदेह एक ऐसे सामाजिक ताने-बाने को स्थान मिलता है जिसमें दिव्यता ही दिव्यता होती है। अहिंसा की सभ्यता में इसे ही मनुष्य खोजता भी है। एक ऐसे सकारात्मक स्पंदन को खोजता है जो मनुष्यता में विश्वास करे। एक ऐसे अभियान की व्यक्ति खोज करता है जो सबके मंगल के लिए कामना करती हो। हिंदुस्तान में बहुत से उतार-चढ़ाव आए, लेकिन इसने अपनी अच्छाई को नहीं छोड़ा। सत्य का दामन थामकर मनुष्य और प्रकृति की सतत गरिमा के लिए कार्य किया। यह सब कुछ मनुष्यों द्वारा किया गया। यह सब सकारात्मक सोच वालों ने किया।

अच्छाई के अभियान के पन्हाला कॉन्क्लेव कार्यक्रम में महाराष्ट्र के कोल्हापुर गया था। यह अभियान पूर्व विदेश सचिव और वर्तमान में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के माननीय सदस्य डॉ. ज्ञानेश्वर मुले द्वारा आयोजित था। पूरे देश में अच्छाई के अभियान के जनक ज्ञानेश्वर मुले हैं। उन्होंने उन सकारात्मक ऊर्जा के धनी लोगों को पन्हाला में एकत्रित किया, जो स्वयं में स्वतंत्र सोच रखते हैं, पर एक उनकी सामूहिक प्रतिबद्धताएं-कलेक्टिव कमिटमेंट ‘अच्छाई के अभियान’ के साथ हैं।

यहाँ एकत्रित लोगों के एक से बढ़कर एक विचार सुनने के बाद जो वैचारिक एकात्मकता प्रवाहित हो रही थी, वह अद्भुत थी। सब संतों की भाषा बोल रहे थे। सब ऋषियों की भाषा बोल रहे थे। सब इंसान थे लेकिन सब केवल सहयोग की भाषा को बोल रहे थे। यह अभिव्यक्ति देखकर ऐसा लगा कि इसके पीछे जो डॉ. ज्ञानेश्वर मुले ने चेतना विकसित कर रखी है, उसमें उनकी कड़ी मेहनत भी है, और उनकी खुद की अच्छी सोच है। सभी को आज के समय में आपाधापी की ज़िंदगी जीनी, उसकी अपनी निजी समस्या और मजबूरी बन गयी है। ऐसे समय में अपना वक़्त निकालकर यहाँ जो लोग इकट्ठा हुए थे वे अपने-अपने तरीके से सेवा, प्रेम, करुणा, दया और सौहार्द के वशीभूत हों जैसे। सबके मन में सकारात्मकता के साथ जीने की निष्ठा दैवीय हो, ऐसा देखने को मिला। कोई वृद्धों की सेवा में रुचि लेता है, कोई बच्चों की शिक्षा और विकास के लिए जीवन समर्पित कर रखा है, कोई महिलाओं की सशक्तीकरण में जुटा है तो कोई पर्याप्त भोजन की व्यवस्था कर भूख के खिलाफ खड़ा है। सभी आत्मीय सहयोग कर रहे हैं। यह है-अच्छाई का अभियान। हमारे संतों ने ऐसे सेवा-सुश्रुषा की चेतना के लिए भले काम पहले किया हो लेकिन ज्ञानेश्वर मुले ने अच्छाई का अभियान महाराष्ट्र के लिए और इस पूरी धरती के लिए जो अपने जीवन कर्म में सम्मिलित कर रखा है, उसके सहारे इस पृथ्वी पर प्रेम की गाढ़ी रेखा मुझे दिखती है। वह हर राज्यों में ऐसे सकारात्मक वैचारिकी वाले लोगों को एकजुट करने में जुटे हैं।

संभव है दो वर्ष में अच्छाई का अभियान सबकी जुबां पर हो। संभव है इससे एक नई जीवन-रेखा का सूत्र मिले। कोई भी कार्य शुरू में हमें बहुत मामूली लगता है लेकिन कुछ अरसा बीतने के बाद हमारे लिए वही मिसाल सा लगने लगता है। संभव है कि यह अच्छाई का अभियान हमारे देश से दुनिया के अन्य हिस्सों में जाए। संभव है यह बुद्ध के बाद कि एक नई लौ उठ रही हो, जो आने वाले समय में एशिया और अन्य महाद्वीपों में फैल जाए।
सकारात्मक सोच के लिए केवल सकारात्मक मन में सोचते रहने से काम नहीं बनता, एक बात तो यहाँ से दिखी। बल्कि इसके लिए संकल्प के साथ दूसरों के मन में भी ऐसी ही ज्योति जलाकर इसका विस्तार किया जा सकता है। संत कबीर, रैदास, मीरा और संत ज्ञानेश्वर ने भक्ति का मार्ग अच्छाई के लिए प्रशस्त किया था किंतु इसमें भक्ति शामिल थी, अच्छाई का अभियान थोड़ा अलग हटकर अपनी परिभाषा गढ़ रहा है। इसमें भक्ति की जगह आत्मशक्ति ने ले लिया है। यह आत्मशक्ति तो धरती पर रहने वाले प्रत्येक मनुष्य में विद्यमान है, बस यह सही से जाग जाए। सब सबके लिए रौशनी लेकर खड़े हो जाएँ बस वहाँ अंधेरा टिकेगा नहीं और उजाला रुकेगा नहीं।
अहिंसक होने की शर्त ही प्रेम पर टिकी हुई है। इस शर्त से तो मनुष्य के भीतर से मानवता के तत्व को बाहर निकाला जा सकता है। अच्छाई आप दिन-रात करें तो भला कौन ऐसा है जो आपको घृणा करेगा। यह सनातन सभ्यता में छुपा एक मंत्र है। अभिमंत्रित करने वाले ने सोच लिया तो वह तो मूर्ति में भी प्राण प्रतिष्ठा कर देता है। पात्र लोग यदि इसमें सम्मिलित होकर इसकी ऊष्मा को स्वतः महसूस करें और उसे दूसरों में संचारित करते रहें तो इसकी बारंबारता से जो ऊर्जा निकलेगी, जो शंखनाद होगी, उसकी ध्वनि चहुँओर होगी।

अहिंसा की सत्ता है यह। सत्ता कहने में थोड़ी सी गुरेज है मुझे। अहिंसा का विह्वल कर देने वाली चादर है यह। इसे जो ओढ़ेगा उसके माध्यम से मनुष्य क्या, प्रकृति भी विभूषित हो जाएगी।  इसमें किसी तरह का क्रोध भाव नहीं है, प्रेम भाव है। घृणा ला अभाव है, करुणा का प्रभाव है। हम जब यह चाहते हैं कि सब हमसे प्रेम करें और हम सबसे मोहब्बत करें बिना किसी इच्छा के तो वहाँ तो प्रेम का ही अधिनायकत्व होगा। प्रेम संतों की भाषा है। प्रेम करुणा की भाषा है। इसमें हर व्यक्ति का स्वयं के साथ सबका पर्याप्त ध्यान रखने का गुरु है। सबकी देखरेख से ही तो हमारे त्याग की भावना परिलक्षित होती है। इसे अहिंसा कहते हैं। इसमें सबके अधिकार तो सुरक्षित हो ही रहे हैं लेकिन जो कर्तव्यबोध उभर कर सामने आ रहा है, वह आने वाली पीढ़ी के लिए एक ऐसी सीख देने वाला है, जिससे वे पीढियाँ अपने आने वाली पीढ़ी का भविष्य संवारेगी।

हम पृथक्करण से बचेंगे, एकीकरण की ओर बढ़ेंगे। यह अच्छाई के अभियान का सामर्थ्य मनुष्य के लिए एक नया सामर्थ्य तैयार करेगा। एक ऐसा सामर्थ्य जिसमें हम पृथ्वी पर रह रहे केवल मनुष्यों नहीं बल्कि समस्त जीवों, वनस्पतियों और प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से विद्यमान का सुनहरा भविष्य तय करेंगे। यह जो आज़ दुनिया सतत विकास के लक्ष्य के लिए माथापच्ची कर रही है, पूरी चिंता पर चिंता किए जा रही है, वह इसका आकलन करके लगता है कि उनकी चिंता व्यर्थ है, सब अच्छाई के अभियान के साथ आओ और। इस धरती को ही खुशियों से भर दो। पंडित ज्ञानेश्वर मुले समाज विज्ञान को शायद बखूबी जानते हैं क्योंकि अच्छाई का अभियान यदि उनकी चेतना की उपज है तो इस अवधारणा से कठिन से कठिन चुनौतियों का सामना करना बहुत ही आसान है। सभी समस्याओं का हल है इसमें। सभी को शांति पहुंचाने वाला मंत्र है इस अवधारणा में।

भारत में ऐसे अनेक लोगों का एकीकरण हो। दुनिया में ऐसे अनेक लोगों का एकीकरण हो तो आता हुआ अंधेरा भी हमसे कोसों दूर भागेगा। अच्छाई का अभिप्राय यही है कि बुराई का सामान हो जाए। अच्छाई का अस्तित्व तभी है जब सबके भीतर अंतःकरण में अच्छाई इस प्रकार पैठ जाए जैसे कोई व्यक्ति अपनी लक्ष्मी की हिफाजत करता है और उन्हें संचित करने का यत्न करता है। यह होगा, बहुत ज्यादा होगा लेकिन इसके लिए आत्मानुशासन और त्याग को अपने जीवन का हिस्सा बनाना पड़ेगा। यह होगा, यदि हम विश्वास को जीत लेंगे और आत्मविश्वास के साथ दूसरों पर विश्वास करेंगे। यदि दुनिया का इतिहास खंगालेंगे तो कुछ ऐसा ही मिलेगा कि हर कठिन कर्म को पुरुषार्थियों ने सिद्ध करके दिखाया है फिर यह अच्छाई का मार्ग तो बहुत ही पुनीत और गौरव देने वाला है। आशा है कि इस अच्छे प्रयत्न का ऐतिहासिक मिसाल आने वाले भविष्य में देखने को मिलेगी और ऐसा संभव है कि यह हमारे जीवन-धर्म के रूप में प्रतिष्ठित हो जाये। 

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