भारतीय संस्कृति के अद्भुत व्याख्याकार थे रामविलास शर्मा

प्रकाश मनु

प्रकाश मनु

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डॉ. रामविलास शर्मा हमारी सदी के एक दिग्गज आलोचक तो हैं ही, अपने जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने आलोचना-कर्म का विस्तार करके उसे अपने समय और समाज की ‘सभ्यता समीक्षा’ से भी जोड़ दिया। इस लिहाज से उन्होंने भारतीय संस्कृति के उन सवालों को गंभीरता से उठाया है, जिन्हें छूने का साहस ज्यादातर लोग कर ही नहीं पाते। इसलिए संस्कृति की जटिलताओं और अंतर्विरोधों से आँख मिलाने का साहस किए बगैर कुछ सरलीकृत निष्कर्षों के जरिए इनसे निजात पा ली जाती है। दुर्भाग्य से प्रगतिशील आलोचना में भी तात्कालिकता के दबाव में संस्कृति के प्रश्न न सिर्फ हाशिए पर चले गए हैं, बल्कि संस्कृति पर विचार करने का अर्थ सांप्रदायिक और पुराणपंथी हो जाना समझ लिया गया।

डॉ. रामविलास शर्मा
हालाँकि इस बात को नकारना आसान नहीं है कि कोई भी समाज अपनी संस्कृति के प्रश्नों और हर काल में उनका जवाब देने की चुनौतियों से ही आत्मिक बल और एक तरह की गतिमानता प्राप्त करता है। संस्कृति पर विचार किए बिना न हम सामाजिक समस्याओं को व्यापक संदर्भों में देख और परख सकते हैं और न कला और साहित्य से जुड़े सवालों पर गंभीरता से बात हो सकती है। लेकिन हमारे समाज और खासकर साहित्यिकों में संस्कृति के प्रश्नों को लेकर जिस तरह की उपेक्षा नजर आती है, वह हैरानी पैदा करती है। गौर से देखा जाए तो शायद अपनी वैचारिक अक्षमता को ही हमने हिकारत का रूप दे दिया है। असल में तो हम संस्कृति-चिंता के खतरों से भागते हैं।

इसमें एक खतरा तो यही है कि अपनी संस्कृति में हमें कुछ भी मूल्यवान नजर आएगा और हम उसकी तारीफ करेंगे, तो झट से ‘पुरातनपंथियों’ में हमारी गिनती होने लगेगी। दूसरा खतरा यह है कि संस्कृति के प्रश्नों की गहराई में उतरने के लिए बहुत समय, बहुत ऊर्जा, बहुत गंभीर अध्ययन तथा निरंतर चिंतन और अध्यवसाय की दरकार है। यह काम कम से कम सुविधाजनक दायरों में रहने वाले ऐसे आलोचकों के बस का नहीं है जो टुकड़ों-टुकड़ों में सोचते और किसी व्यापक सोच के तहत हिम्मत से अपनी बात कहने से डरते हैं।

डॉ. रामविलास शर्मा
(10 अक्टूबर 1912 – 30 मई 2000)
ऐसे आलोचक संस्कृति के प्रश्नों से दो-चार होने के बजाय, समूची सांस्कृतिक चिंता को ही पिछड़ा मान लें, तो इसमें ताज्जुब क्या? लेकिन यह बात अपनी जगह सच है कि जब तक मार्क्सवाद या कोई भी अन्य वाद भारतीय दर्शन और संस्कृति के प्रश्नों से ईमानदारी से जूझता नहीं है या संस्कृति की पुनर्व्याख्या की चुनौती को स्वीकार नहीं करता, तब तक वह पूरी तरह भारतीय जमीन और लोगों से नहीं जुड़ सकता।

बहरहाल यह बात खुद में कम रोमांचक नहीं है कि इन दोहरी-तिहरी चुनौतियों को स्वीकार करने का साहस सत्तासी वर्ष की अवस्था में मार्क्सवादी चिंतक डॉ. रामविलास शर्मा ने किया। उनकी पुस्तक ‘भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश’ (1999) अपने ढंग की एक अभूतपूर्व पुस्तक है, जिसके पीछे रामविलास जी का लंबा श्रम और मेहनत साफ नजर आती है।

यह पुस्तक दो खंडों में संयोजित है। पहले खंड में ऋग्वेद से कालिदास तक और दूसरे खंड में विद्यापति से निराला तक के सांस्कृतिक इतिहास तथा उसके जटिल प्रश्नों की व्याख्या है। इससे पता चलता है कि रामविलास जी की दृष्टि कितनी व्यापक रही है तथा प्राचीन काल से लेकर मौजूदा समय तक तमाम परिवर्तनों और गहरी उथल-पुथल के वावजूद वे भारतीय संस्कृति की एक अविच्छिन्न धारा देख पा रहे हैं। इतना ही नहीं, भारतीय संस्कृति को वे निरंतर विकासात्मक दिशा में बढ़ते और उत्तरोत्तर अधिक यथार्थवादी रूप ग्रहण करते देखते हैं।

पुस्तक का पहला खंड ऋग्वेद की पुनर्व्याख्या से प्रारंभ होता है और उपनिषद, महाभारत, भागवद् गीता, श्रीमद्भागवत तथा कालिदास के काव्य-संसार, खासकर उसके सांस्कृतिक पहलुओं को समेटकर आगे चलता है। इनमें जाहिर है, रामविलास जी ऋग्वेद को सर्वाधिक महत्त्व देते हैं। इसलिए कि यह संसार का प्राचीनतम ग्रंथ है और इसके बगैर भारतीय संस्कृति के मूल प्रश्नों पर विचार ही नहीं किया जा सकता। उपनिषदों ही नहीं, आगे चलकर रामायण, महाभारत पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ा। और कुल मिलाकर यह परंपरा कालिदास और निराला से होती हुई अब तक चली आती है। रामविलास जी को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने ऋग्वेद को महज धार्मिक अंधविश्वासों और कर्मकांड वाले घेरे से बाहर निकालकर एक विराट सांस्कृतिक पीठिका पर स्थापित किया है। इस मामले में वे कहीं न कहीं स्वामी दयानंद के काम को ही अधिक तर्कसंगत ढंग से आगे बढ़ा रहे प्रतीत होते हैं। पुस्तक की भूमिका में उन्होंने लिखा है:
“संसार का प्राचीनतम ग्रंथ हमारे देश का ऋग्वेद है। ऋग्वेद से पहले काव्य, दर्शन और इतिहास की एक सुदीर्घ परंपरा थी। इसके प्रमाण ऋग्वेद में ही मिल जाते हैं। रामायण और महाभारत—इन प्रसिद्ध महाकाव्यों का संबंध ऋग्वेद से है। उपनिषदों की विचारधारा ऋग्वेद की स्थापनाओं को आधार बनाकर ही आगे बढ़ती है। कालिदास और भवभूति जैसे महाकवि रामायण और महाभारत से सामग्री लेकर उसे नया रूप देते हैं। काव्य और दर्शन की इस सुदीर्घ परंपरा से रवींद्रनाथ ठाकुर, सुब्रह्मण्य भारती, निराला जैसे समर्थ कवि जुड़े हुए हैं। कोई भी विद्वान इस प्राचीन संस्कृति की उपेक्षा करके इन महाकवियों का अध्ययन पूरा नहीं कर सकता।” (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश, पहला खंड, पृष्ठ 5)

रामविलास जी ऋग्वेद के बारे में फैले हुए बहुत से अंधविश्वासों, रूढ़ियों और गलत धारणाओं का भी दृढ़ता से खंडन करते हैं। बहुत से लोगों का मानना है कि ऋग्वेदकालीन आर्य घुमंतू जीवन बिताते थे। वे मुख्य रूप से कबीलाई जीवन जीते थे तथा उनका मुख्य धंधा पशुपालन था। रामविलास जी बहुत दृढ़ता से तथा तर्कसंगत ढंग से इस तरह की धारणाओं का खंडन करते हैं। वे ऋग्वेद की ऋचाओं का उदाहरण देते हुए साबित करते हैं कि ऋग्वेदकालीन आर्य बहुत उन्नत सभ्यता के लोग थे। वे खेती करते थे, हलों के फाल बनाना जानते थे। बढ़िया कारीगर थे। विज्ञान और चिकित्सा के बारे में उनका ज्ञान अद्भुत था। वे पारिवारिक जीवन जीते थे। गृह-निर्माण कौशल की उन्हें अच्छी जानकारी थी और वे सुंदर, सुव्यवस्थित घरों में रहते थे। उनके जीवन और कल्पनाओं में एक तरह की ऊँचाई और पूर्णता है।

ऋग्वेद की ऋचाओं की भाषा, विचार और कल्पनाओं की बड़ी सूक्ष्म और विशद व्याख्या करते हुए रामविलास शर्मा यह दिखाते हैं कि ये ‘गड़रियों के गीत’ नहीं हैं, जैसा कि कुछ पश्चिमी विद्वान इन्हें बहुत दंभ और हिकारत भरी दृष्टि से साबित करने की कोशिश करते हैं। और अनेक भारतीय विज्ञान भी उनका अनुसरण करते हैं। इसके बजाय यहाँ काव्य का ऐसा सहज स्फुरण, पूर्णता और ऊँचाई है और उसके पीछे एक ऐसी नवनवोन्मेषशालिनी प्रतिभा है कि उन्हें पढ़ने के बाद आज हम स्वयं चकित होते हैं कि हजारों साल पहले लिखे गए इस काव्य में कैसी ताजगी है। उसमें अनूठी कल्पना और विचारों की समृद्धि है। इसके पीछे एक समुन्नत सभ्यता का होना सहज ही सिद्ध है, जिस कारण ऋग्वेद का प्रभाव हमारी सभ्यता पर इतनी दूर तक पड़ा कि आज भी वह कहीं न कहीं हमारे चिंतन और विचारों को प्रभावित और संयोजित करता नजर आता है।


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निराला और रामविलास शर्मा
मैकडनल और कीथ सरीखे वेदों के अधिकारी विद्वानों ने इस दिशा में बहुत काम किया है। उन्होंने ‘वेदिक इंडेक्स’ पुस्तक निकाली, जिसमें वेदों में प्रयुक्त हुए शब्दों को समझाया गया है। उस पुस्तक में उन्होंने ऋग्वेद में ऐसे कई सूक्त ढूँढ़ निकाले, जिनमें शरीर के अंगों का बहुत सही, वैज्ञानिक और सांगोपांग वर्णन है। और यह परंपरा ऋग्वेद से यजुर्वेद होती हुई अथर्ववेद तक पहुँची और आगे चरक और सुश्रुत में देखी जा सकती है। शरीर के अंगों और उनसे जुड़ी ओषधियों के नाम इन ग्रंथों में बहुत कुछ मिलते-जुलते हैं। इससे प्राचीन भारत में ज्ञान के निरंतर प्रवाह का पता चलता है और यह भी कि समय के साथ वह निरंतर विकासमान था। रामविलास जी ‘भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश’ पुस्तक के पहले खंड की भूमिका में इस बात की काफी विस्तार से चर्चा करते हैं— 
“ऋग्वेद में एक पूरा सूक्त शरीर के अंगों पर है और वह अथर्ववेद के कवियों को इतना प्रिय था कि उन्होंने थोड़े-से परिवर्तन के साथ उसे एक से अधिक बार दोहराया है। एक संहिता में शिष्य ने गुरु से पूछा—वैद्यों का वेद कौन-सा है? गुरु ने उत्तर दिया—हमारा वेद अथर्ववेद है। चिकित्सा विज्ञान की परंपरा अथर्ववेद से चली आ रही है। इस वेद के प्रति पुराने लोग सचेत थे। अथर्ववेद और चरकसंहिता में बहुत से अंगों के नाम, बहुत से रोगों के नाम, इनके साथ बहुत सी ओषधियों के नाम सामान्य है। इनमें अनेक नाम ऋग्वेद और अथर्ववेद में सामान्य हैं। रस, रक्त और ओज सब शरीर में प्रवहमान है। प्रवाह का माध्यम धमनी, स्रोत और सिरा हैं।” (वही, पृष्ठ 6)

रामविलास शर्मा पूछते हैं कि शरीर का इस तरह का सांगोपांग वर्णन करने वाले लोग भला संसार को मिथ्या कैसे समझेंगे? बल्कि यह तो भारत की प्राचीनतम वैज्ञानिक परंपरा की गवाही देता है। यहाँ किसी किस्म का मिथ्यावाद या मायावाद नहीं है। यह कल्पना-विलास नहीं, जीवन का यथार्थ ज्ञान है। रामविलास जी उचित ही अपनी तर्क-सरणियों से भारत की इस प्राचीन यथार्थवादी चेतना की पुष्टि करते हैं, “यदि संसार मिथ्या है, तो शरीर मिथ्या है, उसके रोग मिथ्या हैं। रोगों के उपचार के लिए जिस धरती से जड़ी-बूटियाँ एकत्र की जाती हैं, वह धरती मिथ्या है और जड़ी-बूटियाँ भी मिथ्या हैं। ऐसा मिथ्यावाद ऋग्वेद और अथर्ववेद में नहीं है, यह निश्चित है।” (वही, पृष्ठ 6)
इसके अलावा रामविलास जी भारतीय संस्कृति को ठीक-ठीक समझने के लिए एक महत्त्वपूर्ण सूत्र और देते हैं। उनका कहना है कि ज्ञान-विज्ञान, परंपरा और संस्कृति का विकास इकहरा नहीं, बल्कि हमेशा द्वंद्वात्मक रीति से होता है। भारतीय संस्कृति की गहराई से पड़ताल करें तो वहाँ भी प्रगतिशील और प्रगति-विरोधी या रूढ़िवादी धारणाओं का गहरा द्वंद्व नजर आएगा। हालाँकि लोक से गहरी संपृक्ति के कारण वह हमेशा विकासात्मक राह पर ही आगे बढ़ती रही। रामविलास जी मानो भारतीय संस्कृति के बहुत से उलझावों की गाँठें खोलते हुए कहते हैं, “भारतीय संस्कृति का इतिहास लोकविरोधी रूढ़ियों और प्रगतिशील विचारधाराओं के सतत संघर्ष का इतिहास है। उस इतिहास का अध्ययन इसलिए आवश्यक है कि हम लोकविरोधी रूढ़ियों को भारतीय संस्कृति का सारतत्व न समझ लें, वरन् प्रगतिशील विचारधाराओं से कुछ सीखकर उनके आधार पर, नई संस्कृति का विकास करें।” 
फिर एक प्रश्न यह है कि प्राचीन भारतीय संस्कृति के बारे में वैज्ञानिक ढंग से निष्कर्ष निकालने के लिए भला हमारे पास आवश्यक साक्ष्य कहाँ हैं, जो देश-काल के निर्धारण में सहायक हों? इस पर भी गंभीरता से विचार करते हुए, रामविलास जी सरस्वती नदी को भारत का सर्वाधिक प्राचीन प्राकृतिक साक्ष्य मानते हैं। उनका कहना हैं—
“भारतीय संस्कृति का विकास देशकाल की सीमों के भीतर हुआ है। इन सीमाओं को निर्धारित करने के लिए हमारे यहाँ मिस्र के मंदिरों और समाधिस्थानों जैसे प्राचीन स्मारक नहीं हैं। परंतु हमारे यहाँ एक अत्यंत प्राचीन प्राकृतिक स्मारक सरस्वती के रूप में है। इसी नदी के तट पर अधिकांश वेदों की रचना हुई। फिर यह नदी जलविहीन हो गई। कुरुक्षेत्र से पूर्वी पंजाब और राजस्थान की सीमाओं को छूता हुआ, सिंधु प्रदेश की पूर्वी सीमा निर्धारित करता हुआ, इसका मार्ग समुद तक पहुँचता है। कालनिर्धारण के लिए यही हमारा प्राकृतिक स्मारक है। ऋग्वेद में यही नदी जल से भरी हुई थी। यजुर्वेद में भी यह वैसे ही जल से भरी हुई थी। हड़प्पा सभ्यता के ह्रासकाल में, 1700 ईसा-पूर्व के आसपास वह जलहीन हो गई थी। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि ऋग्वेद और यजुर्वेद की रचना हड़प्पा सभ्यता के ह्रासकाल से पहले हुई थी। उस सभ्यता के अवशेष सरस्वती के तटवर्ती प्रदेश में आज भी बने हुए हैं। हड़प्पा सभ्यता की घनी बस्तियाँ कुरुक्षेत्र में हैं, उस प्रदेश में हैं जहाँ भरतजन रहते थे।...इसलिए कुछ विद्वानों ने सरस्वती की तटवर्ती बस्तियों के विचार से हड़प्पा सभ्यता को सारस्वत सभ्यता कहा है। वास्तव में इस सभ्यता के विकास में जितना योगदान सिंधु नदी का है, उससे कहीं अधिक सरस्वती का है।” (वही, पृष्ठ 8-9)

ऋग्वैदिक आर्यों के बारे में राहुल सांकृत्यायन का मानना है कि “मोएञ्जोदड़ो और हड़प्पा तथा ऐसे कितने नगरों के संहार के बाद सप्तसिंधु की विजित भूमि को पशुपाल आर्यजनों ने बाँटकर उसे गोचर भूमि में परिणत कर दिया।” (वही, पृष्ठ 17) यानी राहुल जी मोएञ्जोदड़ो और हड़प्पा की सभ्यता को बहुत उन्नत सभ्यता मानते हैं, जबकि उनका कहना है कि आर्य कबीलाई जीवन जीते थे, बर्बर और असभ्य लोग थे। इन बर्बर और असभ्य आर्यों ने मोएञ्जोदड़ो और हड़प्पा की विकसित सभ्यता का संहार किया। उनकी जमीन को आपस में बाँट लिया तथा वहाँ पशु चराने लगे, क्योंकि यही काम उन्हें आता था। इसके पीछे मूल धारणा यही है कि आर्य बाहर से आए थे, आक्रमणकारी थे और उन्होंने यहाँ की मूल सभ्यता को नष्ट किया।... 

रामविलास जी बहुत स्पष्टता और दृढ़ता से इन मिथ्या धारणाओं का खंडन करते हुए यह साबित करते हैं कि आर्य कहीं बाहर से नहीं आए थे, वे यहीं के मूल निवासी थे। उन्होंने किसी विकसित सभ्यता को नहीं उजाड़ा था। बल्कि मोएञ्जोदड़ो और हड़प्पा की जिस विकसित सभ्यता की बात की जाती है, वह मूलत: आर्य सभ्यता ही थी। वे अनेक प्रमाणों से यह साबित करते हैं कि मोएञ्जोदड़ो और हड़प्पा की सभ्यता ही मुख्य रूप से आर्य सभ्यता है। यह इसलिए कि ये दोनों बहुत ही उन्नत सभ्यताएँ हैं, एक ही कालखंड की हैं और उन्हें आपस में जोड़ने वाले तमाम संबंध-सूत्र अब प्रकट हो चुके हैं।

यही नहीं, रामविलास जी ऋग्वेद के समय तथा परवर्ती काल में भारत के स्थापत्य और भवन-निर्माण कला से भी अभिभूत हैं। उस कालखंड में नगरों के विकास और बहुत समृद्ध स्थापत्य की एक झलक प्रस्तुत करते हुए वे कहते हैं—
“ऋग्वेद के ऋषि घर बनाते हैं, पुर बसाते हैं, वे खेत नापते हैं और उनके देवता पृथ्वी और आकाश नापते हैं। नापने का काम ज्यामिति के प्रारंभिक विकास के बिना संभव नहीं है। जहाँ तक हड़प्पा और मोएञ्जोदड़ो के अवशेषों का संबंध है, इन नगरों का नपा-तुला परिमाण ज्यामिति के विकास का स्पष्ट प्रमाण है। दूर-दूर तक एक ही नाप की ईंटों का प्रयोग, दूर-दूर तक एक ही तौल के बाँटों का उपयोग, गणित और ज्यामिति के साथ हड़प्पावासियों की योजनाबद्ध विकासक्षमता का परिचायक है। महाभारत और रामायण में सभागारों और बड़े-बड़े भवनों का वर्णन है। वे हड़प्पा सभ्यता के अवशेषों में प्रत्यक्ष हैं। पाटलिपुत्र एक बड़े साम्राज्य की राजधानी बना। वहाँ के भवन चीनी यात्री फाहियान ने देखे तो उसने सोचा, ये मनुष्यों के नहीं, देवों के बनाए हुए होंगे। पाटलिपुत्र, काशी, मथुरा और उज्जयिनी, ये भारत के प्रचीन नगर हैं जिनका इतिहास अब तक अटूट चला आ रहा है। भारतीय संस्कृति का बहुत गहरा संबंध इन चार महानगरों से है। इन नगरों पर ध्यान देते ही यह प्रचलित धारणा खंडित हो जाती है कि भारत ग्राम-समाजों का देश है, यहाँ के लोग कला-कौशल में पिछड़े हुए थे और हमें उन्हीं ग्राम-समाजों की ओर लौट जाना चाहिए। ये चारों महानगर विभिन्न युगों से व्यापारिक संबंधों से परस्पर जुड़े रहे हैं।...इन नगरों के द्वारा हिंदी प्रदेश के जनपद प्राचीन काल से परस्पर संबद्ध हुए और दक्षिण भारत से उन्होंने अपना संबंध जोड़ा। इसलिए भारत राष्ट्र के निर्माण में और भारतीय संस्कृति के विकास में हिंदी प्रदेश की निर्णायक भूमिका स्वीकार करनी चाहिए।” (वही, पृष्ठ 9) 

ऋग्वेद की सभ्यता कृषि सभ्यता थी, लिहाजा इसमें खेती का भी बड़ा सुंदर वर्णन है। खेती के तरीके और उपकरणों की तो प्रामाणिक जानकारी वहाँ है ही, साथ ही खेती से जुड़े उपमानों और कल्पनाओं का वहाँ बाहुल्य है। इससे ऋग्वेद काल के लोगों की सांस्कृतिक समृद्धि को समझने की सही राह मिलती है। पर दुर्भाग्य से हुआ उलटा ही। यह मान लिया गया कि आर्यों के आक्रमण से पहले हड़प्पा सभ्यता उन्नत थी। वे लोग खेती करना जानते थे। पर आर्यों के आक्रमण के बाद सब कुछ चौपट हो गया।... 

ऐसा मानने वालों में दामोदर धर्मानंद कोसांबी भी हैं। वे आर्यों की सांस्कृतिक समृद्धि नहीं, उनके क्रूर आक्रांता होने का जिक्र करते हैं। रामविलास जी बड़ी कुशलता से उनके तर्कों का खंडन करते हुए कहते हैं—
“दामोदर धर्मानंद कोसांबी ने अपनी पुस्तक ‘इंट्रोडक्शन टु द स्टडी ऑव इंडियन हिस्ट्री’ में आर्यों को घुमंतू और बर्बर मानकर कल्पना की है कि भारत पर उनके आक्रमण से पहले हड़प्पा सभ्यता में लोग नदियों पर बाँध बनाकर खेती करते थे। तरीका उनकी समझ में यह था कि अस्थायी बाँध बना देने से नदियों में जल भर जाता था और किनारे की जमीन पर फैल जाता था। उस उपजाऊ जमीन पर वे बीज फैला देते थे और फसल काटते थे। आर्यों ने इस बाँध-व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया और इस तरह सारे प्रदेश की कृषि का नाश कर दिया। अब नगरों का आबाद बना रहना असंभव हो गया।...विडंबना यह है कि जो लोग उत्तर भारत में कृषि का विकास कर रहे थे, उन्हें कोसांबी ने उसका विनाशक मान लिया है। खेतों के जोतने, बोने, फसल काटने, देवों को जौ, पुए आदि की भेंट चढ़ाने की तरफ वे ध्यान देते तो खेती का महत्त्व आसानी से समझ आ जाता। खेती के जितने प्रमाण ऋग्वेद में हैं, उनको एक तरफ हटा दिया है। हड़प्पा सभ्यता ऋग्वेद से पहले है, आर्यों ने आकर उसका विनाश किया, यह आत्मगत कल्पना उन्होंने तथ्यों पर आरोपित कर दी है।” (वही, पृष्ठ 25) 
 

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सचमुच ऋग्वेद पर रामविलास जी का काम प्रामाणिक ही नहीं, बल्कि अचरज भरा है और एक लंबे अध्यवसाय का नतीजा है। उन्होंने यह भी साबित किया है कि “ऋग्वेद का समाज आदिम साम्यवादी समाज नहीं है। वह इस व्यवस्था से बाहर निकाल आया है। व्यक्तिगत संपत्ति यहाँ दृढ़ता से स्थापित है।” (वही, पृष्ठ 11) 

एक और महत्त्वपूर्ण बात रामविलास जी यह बताते हैं कि ऋग्वेदकालीन आर्यों में ‘विचारों का लोकतंत्र’ मौजूद है। उनके अनुसार, “ऋग्वेद में वैचारिक विविधता है। देवोपासक हैं, देवोपासना के विरोधी भी। आदि तत्त्व की खोज करने वाले हैं। असत् से सत् की उत्पत्ति मानने वाले भी हैं। इस विविधता में एक धारा अद्वैतवाद की है। उसे किसी नाम से पुकारें, परमसत्ता एक ही है। यह ऋग्वेद की श्रेष्ठ दार्शनिक उपलब्धि है।”

इसी तरह ऋग्वेद की परंपरा के रूप में उपनिषदों की चर्चा करते हुए रामविलास जी एक दिलचस्प बात की ओर हमारा ध्यान दिलाते हैं। उपनिषदकारों में इस बात की जैसे होड़-सी लगी है या मानो वहाँ शताब्दियों लंबी एक बहस छिड़ी हुई है कि सृष्टि का मूल तत्त्व क्या है? कोई अग्नि को मूल तत्त्व बताता है, तो कोई वायु को। और कोई अन्न-जल आदि तत्त्वों को। इस बारे में छांदोग्य उपनिषद में आया श्वेतकेतु का किस्सा दिलचस्प है। श्वेतकेतु के पिता ने उन्हें पंद्रह दिन तक भूखे-प्यासे रहने के लिए कहा। उसके बाद कहा, “कुछ वेद-मंत्र सुनाओ।” श्वेतकेतु को कुछ भी याद नहीं आया। तब पिता ने कहा, “हे सौम्य, तेरी सोलह कलाओं में से एक कला बच रही है। अब खाकर आओ।” और आश्चर्य! भोजन करने के बाद उन्हें फिर से वेद स्मरण हो जाए। इससे मालूम पड़ता है कि उपनिषदकालीन सभ्यता कोई जड़ सभ्यता नहीं थी। वहाँ निरंतर प्रयोग और वैचारिक विकास हो रहा था तथा वे मूलत: तत्त्वदर्शी लोग हैं।

शंकर ने उपनिषदों के विद्वत्तापूर्ण भाष्य लिखकर वेदांत को दूर-दूर तक फैलाया। रामविलास जी उसकी विशेषता यह बताते हैं कि शंकर का वेदांत लोक की भूमि पर प्रतिष्ठित है। इसीलिए जन-जन ने उसे स्वीकार किया और शंकर को समूची भारतभूमि पर इतनी व्यापक मान्यता मिली, इतना मान-सम्मान मिला। वे कहते हैं—
“उपनिषदों की और शंकर की यह परम उपलब्धि है कि वे मनुष्य में परमेश्वर को प्रतिष्ठित करते हैं, परमेश्वर और मनुष्य की भिन्नता समाप्त कर देते हैं। जहाँ इस भिन्नता का आभास होता है, उसे वे भ्रांति कहते हैं।...उपनिषद और उसके भाष्यकार शंकर मनुष्य को जैसी गरिमा प्रदान करते हैं, वैसी गरिमा संसार का कोई भी धर्म मनुष्य को प्रदान नहीं करता। संसार के धर्मों के आपसी लड़ाई-झगड़े परमसत्ता के स्वरूप को लेकर उतने नहीं होते, जितना नाम-रूप और उपाधिभेद के कारण होते हैं। इन धर्मों में नामरूप और उपाधिभेद मिटा दिए जाएँ तो जो बचेगा, वह परम सत्ता का स्वरूप होगा और उसके कारण मार-काट की नौबत न आएगी। इसलिए जब शंकर ने उपाधिभेद की आलोचना की, तब उन्होंने धार्मिक भेदभाव की जड़ पर प्रहार किया और यह उनके चिंतन का क्रांतिकारी पक्ष है।” (वही, पृष्ठ 403)

इसी तरह उपनिषदों के ब्रह्म की इस विशेषता का जिक्र रामविलास जी करते हैं कि वह जितना अलौकिक है, उतना ही लौकिक भी है और प्रकृति से एकमेक है। इसीलिए उपनिषद लोक से दूर नहीं जा सके। रामविलास जी की यह एकदम मौलिक और बड़ी महत्त्वपूर्ण स्थापना है—
“उपनिषदों का ब्रह्म जितना अलौकिक है, उतना ही लौकिक है। वह प्रकृति से इतनी गहराई से जुड़ा हुआ है कि दोनों को अलग करना प्रायः असंभव है। शंकर ब्रह्म को प्रकृति से, लोक से अलग करने के लिए जितना ही प्रयत्न करते हैं, उतना ही लोक उनका पीछा करता जाता है। कभी उपनिषदों के आधार पर और कभी सामान्य जीवन के अनुभवों के आधार पर वह इस लोकजीवन की बराबर चर्चा करते हैं।” (वही, पृष्ठ 409)

शंकर के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने भारत में बौद्ध मत को निर्मूल कर दिया। पर रामविलास जी शंकर के वेदांत और बौद्ध मत में आश्चर्यजनक समता ढूँढ़ निकालते हैं। उनके अनुसार शंकर का वेदांत हो या बौद्ध मत, दोनों संसार को अनित्य और मिथ्या मानते हैं तथा दोनों का विरोध यथार्थवाद से है। रामविलास शर्मा बड़े तर्कपूर्ण ढंग से अपनी बात साबित करते हैं—
“शंकर के बारे में प्रसिद्ध है, उन्होंने बौद्ध मत को निर्मूल किया। बौद्ध धर्म के साथ उन्होंने भारतीय दर्शन की यथार्थवादी धारा को भी निर्मूल करने का प्रयत्न किया। 500-600 सालों तक बौद्ध मतवादियों ने भी इस धारा का विरोध किया था, पर वे इसे निर्मूल नहीं कर पाए। बौद्धों का जितना विरोध आत्मवादियों से था, उससे अधिक विरोध उनका भौतिकवादियों से था। इसी तरह शंकर का जितना विरोध बौद्धों से था, उतना ही लोकायतवादियों, सांख्य, वैशेषिक आदि के अनुयायियों से था। वास्तव में नागार्जुन की शून्यवादी और शंकर की मायावादी धाराएँ सामान्य सामाजिक अंतर्विरोधों से उत्पन्न हई थीं। संपत्तिशाली वर्गों के हित में उन्होंने दार्शनिक स्तर पर जीवन की समस्याओं को हल करने का प्रयत्न किया था। बौद्धों के लिए संसार अनित्य था, दुख का काण था। वैसे ही शंकर के लिए संसार अनित्य था और दुख का कारण था। भारतीय दर्शन की यथार्थवादी धारा महाभारत के रचनाकाल में पूरी शक्ति से प्रवाहित थी। इसके अनेक प्रमाण उस ग्रंथ में हैं। शंकर के समय में भी वह धारा सूखी नहीं थी। उनके मायावाद को चुनौती देने के लिए वह विद्यमान थी।” (वही, पृष्ठ 429)

खास बात यह है कि प्राचीन संस्कृति की व्याख्या करते हुए भी रामविलास शर्मा यथार्थ की डोर को अपने हाथ से छूटने नहीं देते। उनके सांस्कृतिक चिंतन की यह बड़ी विशेषता है।

 
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रामविलास जी ने महाभारतकालीन समाज की भी पुनर्व्याख्या की है और उस समाज को मूलत: गण-समाज कहा है। हालाँकि उनका यह विचार विवादों से परे नहीं है कि “महाभारत का समाज एक ओर ऋग्वेद के समाज से, और दूसरी ओर रामायण के समाज से पिछड़ा हुआ है।”

महाभारत में राजनीति की जितनी बारीक चालें और जटिलताएँ हैं, व्यक्तित्व जितने उलझे हुए, अंतर्विरोधपूर्ण और पेचीदे हैं, कूटनीति और बौद्धिक सामर्थ्य का जो मेल है, वह रामायण की सीधी-सादी समाज-व्यवस्था को देखते हुए, कहीं अधिक बाद की, ज्यादा जटिल और बौद्धिक रूप से विकसित सभ्यता लगती है। लेकिन रामविलास जी पांडवों और कौरवों के जन्म की चमत्कारपूर्ण कथाओं के आधार पर महाभारतकालीन समाज को मातृसत्तात्मक व्यवस्था से जोड़ देते हैं। उनके अनुसार कायदे से तो पांडव और कौरव वंश कुंती और गांधारी के थे, पांडु और धृतराष्ट्र के नहीं। फिर महाभारतकालीन व्यवस्था को वे एक ऐसे संक्रमण के रूप में भी देखते हैं, जब पुरानी गण-व्यवस्था टूट रही थी और उसकी नैतिकता संकट में थी।

द्रौपदी के चीरहरण प्रसंग की लंबी व्याख्या करते हुए रामविलास जी यह सिद्ध करते हैं कि चाहे बहुमत दुर्योधन के खिलाफ था, लेकिन उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। हुआ वही, जो दुर्योधन ने चाहा। इससे वे यह साबित करते हैं कि पुरानी गण-व्यवस्था यहाँ तक आते-आते निस्तेज हो गई थीं। द्रौपदी के चरित्र, उसकी प्रतिशोध ज्वाला और तेजस्विता की भी बहुत बारीक व्याख्या रामविलास जी ने की है और कहीं-कहीं तो उनके वाक्य ‘भावमय’ होते-होते एकदम ‘काव्यमय’ हो गए हैं। वे लिखते हैं:
“महाभारत में बड़े-बड़े कुशल वक्ता हैं, पर जैसा उदात्त, मार्मिक भाषण यहाँ द्रौपदी का है, वैसा इस महाकाव्य में अन्यत्र किसी दूसरे का नहीं है। जो कुछ द्रौपदी चाहती है, उसे कार्यरूप में परिणत करने वाले कृष्ण हैं। द्रौपदी महाभारत की विराट भावशक्ति है। कृष्ण महाभारत की अपराजेय कर्मशक्ति हैं। इन दोनों के देखते अर्जुन आदि वीर वास्तव में निमित्त मात्र हैं।”

महाभारत में धृष्टद्युम्न ने द्रोणाचार्य को जिस क्रूरता के साथ मारा, अभिमन्यु को जिस बेरहमी से मारा गया, भीम ने जिस तरह दु:शासन की छाती फाड़कर उसका गरम रक्त पिया, या फिर कर्ण या दुर्योधन के वध के लिए जिस तरह धर्म और युद्ध के नियमों का परित्याग कर दिया गया, उसे देखते हुए रामविलास जी महाभारतकालीन समाज को कहीं अधिक पिछड़ा हुआ या या अविकसित समाज घोषित करते हैं। उनके अनुसार, “यह गण-समाजों का युग है। प्रतिहिंसा यहाँ का नियम है। प्रतिहिंसा की भावना को शांत करने के लिए क्रूरता की कोई सीमा निर्धारित नहीं है।” 
इसी क्रूरता और बर्बरता के सर्वोच्च उदाहरण के रूप में रामविलास जी यदुवंशियों के परस्पर युद्ध और भयंकर आत्मविनाश का उदाहरण देते हैं, जो अपने ढंग का एक अलग ही उदाहरण है। वे कृष्ण के चरित्र और व्यक्तित्व की उन चमत्कारपूर्ण खूबियों की ओर भी हमारा ध्यान दिलाते हैं, जिससे महाभारत में हर नैतिक द्वंद्व और ऊहापोह के क्षण में कृष्ण हमें उपस्थित नजर आते हैं और अपनी निर्णायक भूमिका से उसे एक दिशा देते प्रतीत होते हैं। रामविलास जी के अनुसार, उस जर्जर गण-व्यवस्था को नष्ट करके एक विराट, शक्तिशाली राज्य की स्थापना करना उनका उद्देश्य था। हालाँकि वे यह कहना भी नहीं भूलते कि “इस अति मानवीय द्वारिकावासी कृष्ण और गीता के अलौकिक ईश्वर कृष्ण में बड़ा अंतर है।”

‘महाभारत में गीता’ अध्याय में गीता की दार्शनिक पीठिका की पुनर्व्याख्या करते हुए रामविलास जी इस बात की ओर हमारा ध्यान दिलाते हैं कि गीता संन्यास पर नहीं, कर्म पर जोर देने वाला ग्रंथ है। गीता में योग और सांख्य को जितना महत्त्व मिला है, वह भी अकारण नहीं है। यह एक प्रकार से बुद्धि की ही प्रतिष्ठा है। यह बुद्धि जो नैतिक-अनैतिक तथा विवेक-अविवेक के बीच फर्क करती है। 

गीता में संसार-रूपी कल्पवृक्ष का बड़े विस्तार से वर्णन है। यह ऐसा वृक्ष है जिसकी जड़ आकाश में है तथा यह नीचे धरती पर फलता-फूलता है। गीता में इसे ‘सनातन’ कहा गया है। रामविलास जी कल्पवृक्ष की इसी पूरी कल्पना की मीमांसा करते हुए कहते हैं कि यहाँ संसार को एकदम माया या मिथ्या नहीं माना गया, क्योंकि माया पर प्रहार करने का मतलब है, इस अनेक रंगों, रागों और विविधताओं वाले संसार-वृक्ष पर प्रहार करना! और पेड़ को नष्ट करना है, तो उसकी जड़ पर प्रहार करना चाहिए, शाखाओं पर नहीं। लेकिन जड़ पर कैसे प्रहार किया जाए? वह तो ब्रह्म है। इस तरह वे साबित करते हैं कि संसार-रूपी कल्पवृक्ष की पूरी अवधारणा संसार को मिथ्या साबित करने के लिए नहीं है, बल्कि संसार का महत्त्व प्रतिपादित करने के लिए है।

रामविलास जी का मानना है कि महाभारत और पुराणों में कई धाराओँ का मेल है। उसमें संसार को मिथ्या कहने वाली प्रवृत्ति भी है, हालाँकि यह पुराणों की मुख्य धारा नहीं है और लगता है, इसे बाद में कभी उनमें प्रविष्ट कराया गया। रामविलास जी बड़ी दृढ़ता के साथ कहते हैं—
“संसार को मिथ्या कहने वाली प्रवृत्ति पुराणों की मुख्यधारा नहीं है, परंतु वह भी पुराणों में है, इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता। वह शंकर के प्रभाव से उत्पन्न हुई हो, ऐसा प्रतीत नहीं होता। क्षीण धारा के रूप में वह गीता में है और उसका पूरा प्रवाह ब्रह्मसूत्रों में दिखाई देता है। संसार को मिथ्या कहने वाली विचारधारा के जन्मदाता शंकर नहीं थे, परंतु वह उसके पोषक अवश्य थे। उन्होंने और उनके अनुयायियों ने से अपने प्रचार से इसे व्यापक रूप दिया। महाभारत की तरह पुराणों का वेदांतीकरण हुआ। उनके आदि रूप में वेदांत बिल्कुल न रहा हो, यह बात नहीं है। वेदांत के एक विशेष रूप का उनमें प्रवेश कराया गया। यह रूप उपनिषदों की तरह ब्रहम को और प्रकति को परस्पर संबद्ध ने मानकर दोनों को अलग करता था और ब्रहम को प्रकृति से परे बताता था। महाभारत की तरह पुराणों का वैष्णवीकरण भी हुआ। महाभारत में वैष्णवीकरण की यह प्रकिया स्पष्ट देखी जा सकती है। कृष्ण का एक रूप वह है, जहाँ वे ईश्वर नहीं हैं, दूसरा वह है जहाँ वे ईश्वर के अवतार हैं। यह बहुत संभव है, राजवंशी काव्य की तरह पुराणों में वीरों के चरित्र का वर्णन किया गया हो, आगे चलकर इस वर्णन में अवतारों की कथा जोड़ी गई हो। राजवंशों का इतिहास लिखने की परंपरा, लौकिक घटनाओं का विवरण देने की परंपरा पुराणों में बराबर बनी रही। यही इनकी मूल विशेषता ज्ञात होती है।” (वही, पृष्ठ 439)

हालाँकि पुराणों की कुछ सीमाएँ ऐसी हैं, जिन्हें प्रायः सभी स्वीकार करते हैं। पुराणों की अति कल्पनाएँ कई बार अरुचिकर लगती हैं, जिससे उनका प्रभाव विरल होने लगता है। रामविलास जी इस ओर इशारा करते हुए लिखते हैं, “परंतु पुराण अपनी अति कल्पना के लिए बदनाम हैं। हजारों साल तक जीवित रहना, हजारों पुत्र उत्पन्न करना, हजारों साल तक तपस्या करना, ऐसी असंभव घटनों का वृत्तांत भी पुराणों में है। इस यथार्थविरोधी पौराणिकता का प्रवेश भी पुराणों में कराया गया। इतिहास-तत्व कम होता गया और अतिरंजित अतिमानवाय घटनाओं की बाढ़ आ गई। इससे पुराणों का मूल चरित्र ही बदल गया।” (वही, पृष्ठ 439) 
 

[5]

भारत में भक्ति की परंपरा बहुत प्राचीन काल से रही है, वेद-पुराणों से चली उसकी भावधारा हजारों बरसों से भारतीय समाज को आप्लावित करती रही है। यहाँ तक कि लोकभाषाओं में भी वह भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट हुई और उसने पढ़े-लिखे हों या अनपढ़, लाखों लोगों के दिलों को निमज्जित किया। रामविलास जी इस निर्मल भक्तिधारा की गहनता से पड़ताल करते हैं। 

‘भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश’ पुस्तक का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय है, ‘वेद, पुराण और धर्मशास्त्र : भक्ति और सदाचार’। इसमें रामविलास जी ने भक्ति की प्रगतिशील भूमिका को रेखांकित किया है। इस भक्ति के तीव्र प्रवाह में धर्म के अनेक अंधविश्वास और कर्मकांड टूटने लगते हैं। छोटे-बड़े का भेद खत्म होता है और स्त्रियों को भी एक तरह से बराबरी का दर्जा मिलता है। वे अपने पतियों से अलग भी निर्णय ले सकती हैं। इस संदर्भ में रामविलास जी भागवत के दसवें स्कंध की एक रोचक कथा की ओर हमारा ध्यान खींचते हैं। एक बार यमुना किनारे कृष्ण ग्वालों के साथ गायें चरा रहे थे। ग्वालों को भूख लगी। कृष्ण ने उनसे कहा, “यहाँ से थोड़ी दूर पर कुछ वेदपाठी ब्राह्मण स्वर्ग की कामना से आंगिरस नाम का यज्ञ कर रहे हैं। तुम उनसे मेरा और मेरे भाई बलराम का नाम लेकर भात माँग लाओ।”

ग्वाले गए, लेकिन वहाँ अन्न न पाकर भूखे ही कृष्ण के पास लौट आए। तब कृष्ण ने उनसे कहा, “इस बार तुम लोग उनकी पत्नियों के पास जाओ और उनसे कहो कि राम और श्याम यहाँ आए हैं। तुम जितना चाहोगे, उतना भोजन तुम्हें देंगी। वे मुझसे बड़ा प्रेम करती हैं। उनका मन सदा-सर्वदा मुझमें लगा रहता है।”

और सचमुच ग्वालों के वहाँ जाकर भोजन माँगने पर ब्राह्मण पत्नियों ने उन्हें भोजन तो दिया ही, उनके साथ चलने के लिए भी तैयार हो गईं। पुरुषों ने रोका, पर वे किसी की बात सुनने को तैयार नहीं हुईं।

रामविलास जी बाइबिल के ‘न्यू टेस्टामेंट’ यानी ‘नया धर्म नियम’ की भजन-संहिता के कुछ उदाहरण देते हैं, श्रीमद्भागवत से जिनका सादृश्य चकित करने वाला है। उन्हीं के शब्दों में :
“निष्कर्ष यह है कि भक्ति की परंपरा भारत में बहुत पुरानी है। आधुनिक भाषाओं में जिस भक्ति साहित्य का विकास हुआ, उसमें और ईसाई भक्ति साहित्य में अनेक समानताएँ अवश्य हैं।...प्राचीन अभिलेखों से भारतीय आर्य सामंतों का अस्तित्व पश्चिम एशिया में प्रमाणित है। इसलिए यह निष्कर्ष तर्कसंगत है कि ऋग्वेद और बाइबिल के पुराने अंश में जो समानताएँ दिखाई देती हैं, वे वैदिक संस्कृति के प्रभाव का परिणाम हैं। यह प्रभाव यहूदी संस्कृति के माध्यम से उत्तरकालीन ईसाई भक्ति में भी चला आया है।” (वही, पृष्ठ 454)

चरकसंहिता चिकित्सा का ग्रंथ है, पर उसमें ऐसा बहुत कुछ है जिससे उस काल के समाज के साथ-साथ प्रकृति और संसार को देखने की एक अलग और यथार्थवादी दृष्टि भी है। नदियों का जल लाभकारी है। पर किस नदी का जल कितना लाभकारी है, चरकसंहिता में बताया गया है। रामविलास जी चरकसंहिता की वैज्ञानिक दृष्टि की एक झलक प्रस्तुत करते हैं— 
“चरकसंहिता में जो बातें नदियों के जल के बारे में कही गई हैं, वे बहुत रोचक हैं। उनसे पता चलता है कि देश का कौन-सा भाग, मुख्य रूप से चरक संहिता के निर्माता या निर्माताओं के सामने था। जो नदियाँ हिमालय से निकलती हैं, उनका जल पत्थरों से टकराकर आगे बढ़ता है। इन नदियों का जल सभी प्राणियों के लिए पथ्य होता है। 

मलयाचल से निकली नदी का जल स्वच्छ और अमृत के समान मीठा होता है।...यहाँ सिद्धांत यह मालूम होता है कि नदी तेजी से बहे तो उसका जल हितकारी होगा और धीमे बहे तो उसका जल भारी होगा, किंतु गंगा हरिद्वार तक एक ढंग से बहती है, हरिद्वार से प्रयाग तक दूसरे ढंग से और प्रयाग से बंगसागर तक तीसरे ढंग से। उसके समांतर बहने वाली और प्रयाग में उससे मिल जाने वाली यमुना का जल भारी होता है और उसकी तुलना में गंगा का जल बहुत ही लाभकारी है, ऐसा लोग कहते हैं।” (वही, पृष्ठ 541) 

इसी तरह रामविलास जी भारतीय दार्शनिक यथार्थवाद की आधारपीठिका की बहुत गंभीरता से व्यापक चर्चा करते हैं। उनका कहना है कि भक्ति, योग, वैराग्य आदि के बावजूद भारतीय समाज यथार्थ से कटा हुआ समाज नहीं है, बल्कि मूलतः यथार्थवादी ही है। इसी तरह संन्यास को वे भारतीय परंपरा नहीं मानते। उनका कहना है कि हमारे यहाँ गृहस्थ आश्रम पर बहुत जोर दिया गया है और उसे ही सबका मूल माना गया है, जिसके जरिए धर्म और पुरुषार्थ दोनों ही अच्छी तरह किए जा सकते हैं और उसी से यह संसार भी टिका है। 

‘दार्शनिक यथार्थवाद और चरक’, ‘योग, वैराग्य और गौतम बुद्ध’ तथा ‘दार्शनिक यथार्थवाद, कौटिल्य, और कालिदास’ अध्यायों में रामविलास जी यह सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं कि माया, अध्यात्म और संन्यास की प्रचुर चर्चा के बावजूद भारतीय संस्कृति की मूलधारा यथार्थवादी है, जिसमें जीवन का व्यापक स्वीकार है। इसीलिए चिकित्सा विज्ञान की हमारे यहाँ एक अत्यंत प्राचीन और समुन्नत परंपरा है, जहाँ शरीर के अवयवों का वस्तुपरक वर्णन नहीं हुआ, बल्कि वृक्षों और औषधियों के बारे में भी बहुत विस्तृत वर्णन मिलते हैं। वे सिद्ध करते हैं कि यह चिकित्सा विज्ञान के प्रादुर्भाव का नहीं, बल्कि चिकित्सा विज्ञान के ‘विशेषीकरण’ का दौर था। 

ऐसे ही गौतम बुद्ध के बारे में रामविलास जी का मानना है कि वे केवल धर्म और संन्यास के बारे में ही नहीं सोचते, बल्कि वे गरीबी के दुख और मानवीय करुणा से भीतर तक आप्लावित होते हैं। उनका संन्यास भी कर्महीन संन्यास न होकर इस जीवन से कहीं गहरे जुड़ा है। और सबसे बड़ी बात तो यह है कि बौद्ध दर्शन बुद्धि और विवेक का रास्ता नहीं छोड़ता, बल्कि उसी को अंतत: निर्णायक भी मानता है। 

रामविलास जी इस बात के लिए बौद्ध धर्म की खुलकर प्रशंसा करते हैं। उनके शब्दों में—
“बुद्ध की सबसे शानदार घोषणा यह है कि किसी ने कहा, इसलिए मान लिया, किसी पुस्तक में लिखा है, इसलिए मान लिया, श्रद्धावश मान लिया, ऐसा न करना चाहिए। अपने विवेक से काम लेना चाहिए और विवेक से बढ़कर अपने अनुभव से देखना चाहिए कि यह बात सही है या गलत।” 

इसी तरह बुद्ध का महत्त्व प्रतिपादित करने के लिए गढ़ी गई अनेक कथाओं का वर्णन करने के बाद रामविलास जी लिखते हैं, “चमत्कारों से भरी इन बौद्ध कहानियों में एक यथार्थवाद की अंतर्धारा है, जिससे उस समय के समाज के बारे में बहुत सी बातें जानी जा सकती हैं।” 

कौटिल्य का ‘अर्थशास्त्र’ तो खैर, बहुत अधिक यथार्थवादी तथा जीवन को ठोस तर्कणा के आधार पर परखने वाली कृति है ही। पर रामविलास जी घोर रोमांटिक भावबोध के कवि समझे जाने वाले कालिदास की रचनाओं की भी यथार्थवादी व्याख्या कर दिखाते हैं। उनके इस मत का आधार यह है कि कालिदास की रचनाओं में अनेक विविधताओं से भरे इस देश की प्रकृति और सौंदर्य के अत्यंत सजीव चित्र, सजीव भाषा में ढलकर सामने आते हैं। 

 
[6]

यही परंपरा आगे चलकर हिंदी साहित्य में ढलती दिखाई देती है। हिंदी के भक्तिकालीन कवियों के संबंध में रामविलास जी की यह स्थापना बहुत महत्त्वपूर्ण है कि भक्तिकालीन कवियों ने ऊपर से अनगढ़ नजर आती लोकभाषा और लोक-शैलियों का सहारा जात-पाँत तोड़ने और समाज-सुधार की जो मुहिम शुरू की, उसका हिंदी पट्टी पर जबरदस्त प्रभाव पड़ा। इससे बहुत से अंधविश्वासों और रूढ़ियों की दीवारें हिल गईं और भारतीय समाज बहुत तरह की संकीर्णताओं से बाहर निकलकर मानव-समता के आदर्श की ओर बढ़ा। लिहाजा धर्म और अध्यात्म का संदेश देने के बावजूद, अपने समय में भक्तिकालीन कवियों की भूमिका प्रगतिशील ही कही जाएगी। 

भक्तिकाल से पहले का समय रीतिकाल का है, जब सामंतवाद का प्रभुत्व था। हर जगह भक्तिकाल से पहले का दौर रीतिकाव्य का रहा है, जिसमें सामंतों की वीरता और वैभव आदि का बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया जाता था। सामंतवाद की बहुत सी सीमाएँ हैं। रामविलास जी उनकी ओर इशारा करते हुए कहते हैं, “भारत के विभिन्न प्रदेशों में सामंतवाद का विकास एक ही गति से नहीं हुआ और एक ही समय में नहीं हुआ। दक्षिण भारत में ही कर्णाटक, आंध्र प्रदेश की परिस्थितियों में तथा तमिलनाडु की परिस्थितियों में यथेष्ट अंतर था। महाभारत को आधार बनाकर वीर काव्य रचने की जैसी आवश्यकता कर्णाटक और आंध्रप्रदेश के राजकवियों के लिए थी, वैसी आवश्यकता तमिलनाडु के राजकवियों के लिए नहीं थी। परंतु तीनों ही प्रदेशों में भक्तिकाव्य से पहले रीतिकाव्य रचा गया था, यह निश्चित है।” (वही, पृष्ठ 66)

साहित्य में वीरगाथाकाल सामंती युद्धों का समय है जबकि चारण-काव्य बहुलता से लिखा गया, जिनमें सामंतों की वीरता का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया गया है। रामविलास जी संस्कृति और साहित्य के विकास का काल इसे नहीं मानते। उनका कहना है—
“वीरगाथाकाल का संबंध सामंतों के आपसी युद्धों से है। इऩ युद्धों के बिना उनके वीर रस की कल्पना नहीं की जा सकती है, परंतु यह वीर रस भाषा और साहित्य के विकास के लिए घातक भी था। जहाँ सामंत छोटे-छोटे राज्यों में बँटे रहेंगे, आपस में युद्ध करते रहेंगे, वहाँ जनपदीय बोलियों के क्षेत्र भी एक-दूसरे से अलग रहेंगे, मंडियाँ आबाद न होंगी, व्यापारिक संबंधों का विकास न होगा, साहित्य में मानक भाषा की प्रतिष्ठा दुष्कर होगी। हर प्रदेश के साहित्य के प्रारंभिक दौर में भाषा और बोलियों की विविधता दिखाई देती है, इसी से लोग पुरानी बांग्ला, पुरानी मराठी, पुरानी हिंदी जैसे शब्दबंधों का प्रयोग करते हैं।” (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश, दूसरा खंड, पृष्ठ 67) 

बाद में मुसलिम इस देश में आए। वे आक्रांता बनकर आए थे, पर इस देश और समाज की मुख्य धारा में घुल-मिल गए। इससे भारतीयों का रहन-सहन और संस्कृति दोनों की प्रभावित हुए। हिंदू और मुसलमानों की साझी विरासत को लेकर रामविलास जी की दृष्टि समावेशी रही है। इसलिए भारत में इस्लाम के प्रवेश को वे अन्य संस्कृति-चिंतकों की तरह सारे अनर्थ की जड़ नहीं मानते और हिंदी तथा मुसलिम संस्कृति के मेल से जन्म लेने वाली साझा हिंदुस्तानी संस्कृति को वे बहुत आशा भरी दृष्टि से देखते हैं तथा उसके बहुत से प्रगतिवादी तत्वों को रेखांकित करते हैं— 
“कुछ इतिहासकार भारत में इस्लाम के प्रवेश को सारे अनिष्ट की जड़ मानते हैं। इनके अनुसार शताब्दियों से हिंदू समाज वर्ण-व्यवस्था के अंतर्गत फल-फूल रहा था। इस्लाम के साथ नई जीवनपद्धति आई और इससे हिंदू संस्कृति को भारी धक्का लगा।...जिन ग्रंथों में मुसलमानों के शासनकाल को अंधकार युग कहा जाता है, उन्हीं में इस अंधकार के भीतर से नई भाषाओं और साहित्य का प्रकाश भी फैलता दिखाया जाता है। प्रारंभिक लूटमार के बाद यहाँ का आर्थिक जीवन निर्बाध गति से चलता रहा। इसी से यहाँ जातीय संस्कृतियों के विकास का ठोस भौतिक आधार मिला, इसी से तुर्क आक्रमणकारी अपना तुर्कपन खोकर यहाँ की प्रादेशिक जातियों में घुल-मिल गए।” (वही, पृष्ठ 5-6)

बाद में अंग्रेजों का काल आया, जिन्होंने छल-छद्म से यहाँ की जनता को लूटा और यहाँ के फलते-फूलते उद्योग-धंधों को चौपट किया। भारत के दम पर इंग्लैंड फलता-फूलता गया और भारत भूख, गरीबी और दैन्य की हालत में आ गया। जनता उनके उत्पीड़न और अत्याचारों से दुखी थी। हालाँकि ऐसे समय में भी समाज में जागृति का शंखनाद करने वाले तेजस्वी महानायकों ने इस देश में जन्म लिया। उन्हीं में बंकिम, रवींद्रनाथ ठाकुर और विवेकानंद भी थे। उन्होंने जागृति का की लहर पैदा करके सोई हुई भारतीय जनता को जगाया। उन्हें अपने गौरवपूर्ण अतीत और सांस्कृतिक परंपराओं पर गर्व करना सिखाया।

देउस्कर ने अपनी पुस्तक में अंग्रेजी राज के उत्पीड़न की जो तसवीर खींची है, रामविलास जी उसे पूरी तरह सही मानते हैं। उनका कहना है, “देउस्कर की इस आलोचना की कुछ विशेषताएँ ध्यान देने योग्य हैं। अंग्रेजी राज में भारत का पैसा कैसे विलायत जाता है, और यह देश दिन-पर-दिन निर्धन होता जाता है, कैसे यहाँ के उदयोग-व्यापार का नाश अंग्रेजों ने किया, इसका विस्तार से वर्णन किया गया है। इस तरह के विवेचन से सहज ही यह निष्कर्ष निकलता है, कि जब तक भारत आर्थिक रूप से अपने पैरों पर खड़ा न होगा, तब तक वह स्वाधीन नहीं हो सकता। देउस्कर ने स्वदेशी आंदोलन का जोरों से समर्थन किया है। वे बंगाल की जातीय एकता के भी प्रबल समर्थक थे। बंगाल का विभाजन होने पर उसे खत्म करने के लिए जो आंदोलन चला, उसका भी वे समर्थन करते थे। उनका रास्ता मध्यवर्गीय क्रातिकारियों का रास्ता नहीं है। कुछ लोग वीरता के काम करके, शस्त्रों का इस्तेमाल करके, अंग्रेजी राज खत्म कर देंगे, यह धारणा उनकी पुस्तक में कहीं भी नहीं है।...” 

देउस्कर के पाँव यथार्थ की जमीन पर हैं और वे जोर देकर यह बात कहते हैं कि नौजवानों को गाँवों में जाकर काम करना चाहिए। रामविलास जी देउस्कर के इस विचार का पूरी तरह समर्थन करते हैं। उनका कहना है कि “वास्तव में 19वीं सदी में बंगाल में कुछ ऐसे बुद्धिजीवी भी थे जो गाँवों में जाकर किसानों को उनकी दशा के बारे में बताते थे। बंकिमचंद्र और उनके समकालीन बुद्धिजावियों ने यह जमीन तैयार कर ली थी कि लोगों को बंगाली जातीयता का बोध हो। यदि उनके जातीय प्रदेश का विभाजन हो तो उनके हृदय को ठेस लगे और वे उसके विरुद्ध लड़ने-मरने को तैयार हो जाएँ।” (वही, पृष्ठ 329)

बंकिमचंद्र चटर्जी की तरह ही रामविलास जी स्वामी विवेकानंद के देशभक्तिपूर्ण तेजस्वी व्यक्तित्व की चर्चा भी बड़े आदर से करते हैं, जिसने पूरे देश को झकझोर डाला। उन्होंने भारतवासियों को अपने महान देश और महान संस्कृति पर गर्व करना सिखाया। रामविलास जी बड़े भावपूर्ण ढंग से विवेकानंद के ओजस्वी व्यक्तित्व और वैचारिक ऊर्जा का स्मरण करते हुए, देश के सांस्कृतिक जागरण में उनकी भूमिका को रेखांकित करते हैं—
“बंगाल के विचारकों में बहुत ऊँचा स्थान विवेकानंद का है। उन्होंने बंगाल में और बंगाल के बाहर अपने समय में और उसके बाद भी, जितने नौजवानों को प्रभावित किया, उतने लोगों को बंगाल के किसी और विचारक ने प्रभावित नहीं किया। ब्राह्म समाज में बहुत से जमींदार थे, लेकिन रामकृष्ण मिशन और स्वामी विवेकानंद से जुड़े हुए लोग अधिकतर मध्यवर्ग के थे। स्वामी विवेकानंद को अंग्रेजी राज की देन कैसे कहा जा सकता है? उनकी प्रेरणा के समस्त स्रोत भारतीय हैं। इस देश के दर्शन और यहाँ की संस्कृति में लोगों को जगाने की क्षमता थी। यह स्वामी विवेकानंद के उदाहरण से स्पष्ट होता है। सुशोभन सरकार सही कहते हैं, सामान्य जातीय उभार निस्संदेह राजनीतिक चेतना और आंदोलन तक सीमित नहीं था। जातीय शक्ति, आत्मविश्वास, ऊर्जा और अभिमान स्वामी विवेकानंद में साकार दिखाई देते हैं।” 

बंगाल के चिंतक और इतिहासकार सुशोभन सरकार विवेकानंद समेत उस दौर की समूची चिंतनधारा पर अंग्रेजी संस्कृति की छाप देखते हैं। रामविलास जी इसका सख्ती से खंडन करते हुए कहते हैं कि स्वामी विवेकानंद में अपार तेजस्विता, देशभक्ति और जातीय अभिमान था, पर वह उन्हें भारत और भारतीय वेदांत से प्राप्त हुआ था, अंग्रेजों से नहीं। वे थोड़ा आवेग भरे स्वर में पूछते हैं—
“क्या उसे स्वामी विवेकानंद ने अंग्रेजों से प्राप्त किया था? क्या उन्होंने अपनी देशभक्ति अंग्रेजों से सीखी थी? क्या उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस अंग्रेजी राज की देन थे? अपने निबंध के आरंभ में सुशोभन सरकार ने जो स्थापना की है, वह स्वामी विवेकानंद का नाम लेते ही ध्वस्त हो जाती है।” (वही, पृष्ठ 320) 

 
[7]

रामविलास जी भारतीय संस्कृति पर विचार करते हुए भाषा और संस्कृति के गहरे संबंध की भी व्याख्या करते हैं। उनका कहना है, “जातीय चेतना की अभिव्यक्ति का माध्यम प्रादेशिक भाषा होती है। रवींद्रनाथ ठाकुर, सुब्रह्मण्य भारती, निराला के साहित्य में बांग्ला, तमिल और हिंदी के प्रति उत्कट प्रेम देखा जा सकता है। ये भाषाएँ ही उनके राष्ट्रवाद और मानवतावाद की अभिव्यक्ति का माध्यम हैं। जातीय चेतना वह उत्स है जिससे देशप्रेम और मानवप्रेम की धाराएँ फूटती हैं। बंगभंग के विरोध ने जातीय चेतना को, उसके साथ राष्ट्रीय चेतना को समृद्ध किया। जातीय चेतना केवल भाषागत, प्रदेशगत चेतना नहीं है। उसमें साम्राज्य-विरोध, सामंती रूढ़ियों का विरोध तथा समाज को पुनर्गठित करने की धारणाएँ शामिल हैं।” (वही, पृष्ठ 7)

उस समय के प्रायः सभी चिंतकों ने राष्ट्र-रचना में हिंदी की बड़ी भूमिका की चर्चा की है। बंकिमचंद्र चटर्जी भी हिंदी के महत्त्व को बड़े आदर के साथ स्वीकार करते हैं। साथ ही लोगों का आह्वान करते हैं कि वे हिंदी बोलें और हिंदी में जनता को संबोधित करें, क्योंकि हिंदी के जरिए समूचे देश की जनता से संवाद हो सकता है। बंग-दर्शन में बंकिम हिंदी के महत्त्व पर एक लंबा लेख लिखकर उसे अपनाने का आह्वान करते हैं। बांग्ला में लिखे गए अपने लेख के अंत में उन्होंने देवनागरी अक्षरों में लिखकर अपना यह संदेश प्रचारित किया—
“अंग्रेजी भाषा द्वारा जो भी हो जाए, किंतु हिंदी शिक्षा न पाने पर काम बनेगा नहीं। हिंदी भाषा में पुस्तकें और वक्तृता द्वारा वे भारत के अधिकांश स्थानों का मंगल-साधन करेंगे, केवल बांग्ला और अंग्रेजी की चर्चा से काम न चलेगा। पूरे भारत की जनसंख्या को देखते हुए बांग्ला और अंग्रेजी बोलने और समझने वाले कितने लोग हैं। बांग्ला की तरह हिंदी की उन्नति नहीं होती, यह देश का दुर्भाग्य है। (बांग्लार न्याय जे हिंदीर उन्नति होइतेछे ना, इहा देशेर दुर्भाग्येर विषय।) हिंदी भाषा की सहायता से भारत वर्ष के विभिन्न प्रदेशों के बीच जो ऐक्य-बंधन स्थापित कर सकेंगे, वही लोग वास्तविक भारत-बंधु नाम के अधिकारी होंगे। सभी लोग चेष्टा करें, यत्न करें, जितने भी दिन लगें, मनोरथ पूर्ण होगा।” (वही, पृष्ठ 340)

भाषा और संस्कृति परस्पर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। एक को दूसरे से काटकर नहीं देखा जा सकता। रामविलास जी स्वीकार करते हैं कि भाषा और संस्कृति के इस अन्योन्याश्रित संबंध के कारण ही उनके मन में ‘भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश’ पुस्तक लिखने का खयाल आया। बरसों पहले धीरेंद्र वर्मा की पुस्तक ‘हिंदी राष्ट्र और सूबा हिंदुस्तान’ आई थी। उसमें उन्होंने भाषा, राष्ट्र और संस्कृति के अविच्छिन्न आपसी संबंध की ओर इशारा करते हुए हिंदी राष्ट्र के विशाल इतिहास के लेखन की जरूरत को रेकांकित किया। उनका कहना था, “हिंदी में हिंदी राष्ट्र के विशाल इतिहास की अभी कल्पना भी नहीं हो पाई है।” 

रामविलास जी की महत्वाकांक्षी कृति ‘भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश’ मानो उसी का मुकम्मल जवाब है। हालाँकि पुस्तक की भूमिका में वे बहुत विनम्रता से कहते हैं, “मेरी यह किताब उस कल्पना को साकार करने का प्रारंभिक प्रयास मात्र है।” (वही, पृष्ठ 8) 

बेशक रामविलास जी के संस्कृति चिंतन को लेकर मन में बहुत सवाल भी उठ सकते हैं। उठने चाहिए भी। इस तरह के सवाल और शंकाएँ अपनी जगह हैं लेकिन उसके बावजूद अपनी उम्र की नवीं दहाई में ‘भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश’ किताब लिखने में रामविलास जी ने जितना श्रम किया है, वह खुद में एक इतिहास है। इस बड़े और दस्तावेजी काम के पीछे उनकी जो प्रखर मेधा और अध्यवसाय है और संस्कृति के कठिन प्रश्नों और चुनौतियों से उलझने का जो साहस उन्होंने किया है, उसके आगे नतमस्तक होना पड़ता है।

अपने अंतिम समय तक संस्कृति के क्षेत्र में रामविलास जी की यह शोध-यात्रा जारी रही। अपनी घोर अस्वस्थता के क्षणों में भी अपने अधूरे काम को पूरा करने के लिए वे किस कदर विकल थे, इसका गवाह मैं ही नहीं, बहुत से लेखक होंगे। मुझसे वे कहा करते थे कि “चारपाई पर पड़ा-पड़ा मैं तुलसीदास वाली किताब को पूरा करने के लिए नक्शा बनाया करता हूँ!...” 

ऐसी लगन रोमांच पैदा करती है। 


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डा. रामविलास शर्मा के निधन से कुछ समय पहले हुई लंबी बातचीत में भी उनके सांस्कृतिक चिंतन को लेकर बहुत बातें हुईं और रामविलास जी ने मेरी शंकाओं का समाधान करने की कोशिश की। उन्होंने भारतीय संस्कृति को लेकर अपनी स्थापनाओं और उऩके पीछे के तर्क और विचार-सरणियों को स्पष्ट करने की कोशिश की। 
मेरे इस सवाल पर कि कहीं वृद्धावस्था में वे धार्मिकता की छाया में तो नहीं आ गए, रामविलास जी का जवाब है, “मुझे लगता है, इतिहास और राजनीति ही नहीं, संस्कृति के प्रश्न भी जरूरी हैं, जिनकी तरफ ध्यान दिया जाना चाहिए। बुढ़ापे या उम्र वगैरह के असर की कोई बात नहीं है।”

मैंने कहा, “पर डॉक्टर साहब, धर्म की बुराइयों या बुरे अंश पर उस तरह की चोट मुझे यहाँ नहीं मिली, जिस तरह की मैं अपेक्षा करता था। शायद आपकी नजर भारतीय संस्कृति के मूल रूप पर ही रही, बाद में उसमें आए प्रदूषणों और विकारों पर इतनी नहीं?”

इस पर रामविलास जी का कहना था कि विकार तो आगे चलकर क्रिश्चिएनिटी में भी आए। गाँधी दर्शन का लोगों ने आगे चलकर क्या हाल बना दिया? कौन-सी चीज है, जो आगे चलकर अपने उसी शुद्ध रूप में रही। लेकिन इस पुस्तक में उनका प्रयत्न भारतीय संस्कृति के मूल उत्स की खोज ही रहा और बहुत से चिंतकों के विचारों को उन्होंने बीच-बीच में उद्धृत करके अपनी बात को आगे बढ़ाया है। काणे ने पाँच खंडों में जो धर्मशास्त्र का इतिहास लिखा है, उसमें मठों और मठाधीशों की तीव्र आलोचना है। रामविलास जी ने कई स्थलों पर उनकी स्थापनाओं को उद्धृत किया है। वे कहते हैं—
“जिन लोगों ने पहले से काम किया है, उनके विचारों को उद्धृत कर देने से मेरी बहुत सी मेहनत बच गई। इस तरह जहाँ तक स्वामी दयानंद के विचारों या अंधविश्वासों के खंडन की है, मैं स्वयं दयानंद का समर्थक हूँ और मानता हूँ कि वे अस्सी प्रतिशत सही थे।”

रामविलास जी दयानंद के विचार और कामों से किस कदर प्रभावित थे, इसका उल्लेख भी उन्होंने इस बातचीत में किया है। वे कहते हैं, “अपनी नई पुस्तक शूद्र, मुसलमान और भारत की जातीय समस्या में मैं एक अध्याय लिखने (या बोलने) जा रहा हूँ ‘संस्कृति का पुनर्मूल्यांकन और संन्यासी दयानंद की परंपरा’। मेरा यह मानना है कि धार्मिक अंधविश्वासों और रूढ़ियों को जैसा धक्का स्वामी दयानंद ने दिया, वैसा सारे सुधारक मिलकर नहीं दे पाए। वैसे भी आर्यसमाजियों का चिंतन तर्क पर आधारित है। इसी कारण मार्क्सवाद की स्थापनाएँ उन्हें समझाई जा सकती हैं। हमारे स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में लीजिए, लाला लाजपतराय आर्य समाज के प्रभाव में थे; श्रद्धानंद, जो आर्य समाज के प्रमुख स्तंभ हैं, पहले मुंशीराम थे और बाद में संन्यासी हुए तो उनका नाम श्रद्धानंद पड़ गया। भगतसिंह के परिवार में भी आर्य समाजी प्रभाव था और वे आर्य समाज की जमीन से ही मार्क्सवाद तक पहुँचे।...”

यही नहीं, रामविलास जी की पुस्तक ‘स्वाधीनता संग्राम के बदलते परिप्रेक्ष्य’ में भी संन्यासियों के संघर्ष को लेकर पूरा एक अध्याय है। उनका कहना है कि ‘आनंदमठ’ उस हिसाब से कोई कल्पित कृति नहीं है। इसके पीछे सच्ची घटना है। संन्यासियों ने अंगेजों के खिलाफ हथियारबंद लड़ाई लड़ी थी और यह लड़ाई काफी लंबी चली थी। उसी परंपरा पर बंकिम ने ‘आनंदमठ’ की रचना की। उसी में ‘वंदेमातरम्’ गीत है, जिस पर अंग्रेजों ने पाबंदी लगा दी थी। 

आगे वे इस लड़ाई के दूसरे चरण की चर्चा करते हैं, जिसमें दयानंद ने भी भाग लिया था—
“फिर इस लड़ाई का दूसरा चरण...! कहा जाता है कि 1857 में स्वामी दयानंद ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह में भाग लिया। एक विद्वान की पुस्तक है, ‘सन् 1857 में स्वामी विरजानंद’। विरजानंद दयानंद के गुरु थे। इनके बारे में आपको पता होगा, ये मथुरा के थे और अद्भुत आदमी थे। उनके पेट में भयानक दर्द रहता था। आँखों से दिखाई नहीं देता था। लेकिन 1857 में विद्रोहियों की एक सभा हुई थी, उसमें उन्होंने व्याख्यान दिया था, किसी मुसलमान ने उसे नोट कर लिया और उसके द्वारा नोट किया गया भाषण बाद में छापा गया।”

दयानंद के अंग्रेजी राज के बारे में क्या विचार थे और किस तरह उन्होंने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा देने वाले गुजरात के आदिवासियों की भूरि-भूरि प्रशंसा की है, इसका जिक्र करते हुए रामविलास शर्मा कहते हैं—
“फिर जहाँ तक दयानंद की बात है, ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में मूर्तिपूजा का विरोध करते हुए उन्होंने गुजरात के आदिवासियों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि आपकी मूर्ति तो मक्खी की टाँग भी नहीं तोड़ सकी जबकि उन लोगों ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए। इतना तो ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में लिखा हुआ प्रमाण मिलता है जिससे अंग्रेजों के प्रति उनकी विद्रोही भावना पता चलती है। वैसे ऐसा बहुत लोगों का मानना है कि 1857-58 में स्वामी दयानंद गुप्त रूप से कहीं काम कर रहे थे। वे कहाँ थे, इसका कुछ ठीक-ठीक पता नहीं है लेकिन बहुत लोगों का मानना है कि 1857 के स्वाधीनता संग्राम में उनका योगदान रहा है और उसमें भाग लेने के लिए ही वे कहीं छिप गए थे।” 

 
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रामविलास जी बरसों से ऋग्वेद और भारतीय संस्कृति के प्रश्नों पर विचार कर रहे थे। ‘भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश’ वे अपने चिंतन के शिखर पर दिखाई देते हैं। हालाँकि दुर्भाग्य से उनके चिंतन और कामों पर जान-बूझकर धूल डालने और उस पर फब्तियाँ कसने की कोशिशें भी हुईं। इसकी एक छोटी-सी मिसाल देना अप्रासंगिक न होगा।

रामविलास जी के आखिरी वर्षों में उनसे लिए गए इंटरव्यूज में एक इंटरव्यू ऐसा भी है, जिसमें नामवर सिंह तथा कुछ और प्रगतिशील विचारक युगीन प्रश्नों को लेकर उनसे बात करने पहुँचे। उसी इंटरव्यू में नामवर सिंह एक सवाल रामविलास जी से पूछते हैं। यह सवाल वेदों के बारे में है। नामवर सिंह पूछते हैं कि “...आपने वेद के बारे में लिखा और लिख रहे हैं। लेकिन स्वयं उस वेद को हमने उनके हवाले कर दिया कि वे लोग ‘वेद अध्ययन मंडल’ उसकी चीजें कायम करेंगे, लेकिन हम मान बैठे हं कि वेद का नाम लेना एक तरह से...” 

इस पर रामविलास जी नामवर सिंह को बड़ा मजेदार जवाब देते हैं, जिसमें बड़ा तीखा व्यंग्य भी है। वे कहते हैं, “नामवर सिंह, तुम एक ‘अध्ययन मंडल’ कायम करो वेद का और मैं उसका पहला सदस्य बनूँगा...!” और यह जवाब सुनने वालों को भौचक कर जाता है। इसलिए कि रामविलास जी सिर्फ सवालों के ही जवाब नहीं देते, यह भी जान लेते हैं कि सामने वाले की नीयत क्या है और वे सवाल क्या सचमुच ईमानदारी से पूछे जा रहे हैं?
नामवर जी का वह सवाल लगता है, ईमानदार नीयत से नहीं किया गया था। इसी का सबूत यह है कि रामविलास जी के निधन के बाद वे भारतीय संस्कृति के प्रश्नों का सामना करने के बजाय, उलटे अपने लेख में रामविलास जी पर कटाक्ष करते नजर आते हैं कि देखिए, रामविलास जी कहाँ से चलकर कहाँ पहुँचे...? नामवर जी को यह विचारों के शीर्षासन सरीखा लगता है।

आश्चर्य, रामविलास जी के कामों के महत्त्व को समझने के बजाय, उलटा उन्हें अवमूल्यित करने की कोशिशें बहुत हुईं। पर इसके बावजूद एक बड़े संस्कृति-चिंतक के रूप में रामविलास जी का कद निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। वे मानो देखते ही देखते पूरी हिंदी जाति के गौरव और अभिमान के प्रतीक बन गए। उनसे बहुतों ने रोशनी ली और उसे कुछ और आगे फैलाया। उनसे दिशा और वैचारिक ऊर्जा लेकर काम करने वालों का भी एक बड़ा कारवाँ है। यों अपने उदात्त सांस्कृतिक चिंतन के कारण रामविलास जी रोशनी की एक ऐसी भव्य मीनार बन गए हैं, जिससे आगे आने वाली सदियाँ भी प्रेरणा लेंगी।
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प्रकाश मनु, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
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