नाटकीयता, खिलंदड़ेपन एवं जिंदादिली का अनुपम तोहफा

समीक्षक: श्यामपलट पांडेय

पुस्तक: प्रकाश मनु के श्रेष्ठ बाल नाटक
लेखक: प्रकाश मनु
प्रकाशक: लिटिल बर्ड पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
संस्करण: प्रथम, 2023
पृष्ठ: 159, मूल्य: ₹ 200.00 रुपए
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साहित्य आत्मा का दिव्य प्रकाश है, जो रचनाकार के सृजन-पथ को अपनी आभा से निरंतर आलोकित करता रहता है। प्रकाश मनु जी के सुंदर और बहुरंगे बाल नाटकों की पुस्तक ‘प्रकाश मनु के श्रेष्ठ बाल नाटक’ में उस दिव्य प्रकाश को अनुभूति के धरातल पर यत्र-तत्र-सर्वत्र देखा जा सकता है। बाल साहित्यकार को सृजन के क्षणों में एक बच्चा बन जाना पड़ता है। तभी वह बाल रुचि, बाल प्रकृति और बाल परिकल्पना के अनुकूल उत्कृष्ट मनोरंजक और संदेशपरक साहित्य की रचना कर सकता है, जिसे पढ़कर बच्चे आनंदित होते हैं, और उसे बार-बार पढ़ना चाहते हैं।

प्रकाश मनु
यहीं इस बात का जिक्र किया जा सकता है कि बाल साहित्य की दुनिया बड़ी अनूठी है। यहाँ बच्चे वही रचनाएँ पढ़ना पसन्द करते हैं जिनमें उन्हें अपनी छवि दिखाई देती हो। प्रकाश मनु जी बाल मनोविज्ञान को गहराई से समझते हैं, इसलिए बच्चे उनकी रचनाओं को बड़ी रुचि से पढ़ते और सराहते हैं।

अभी हाल में छपी बाल साहित्य की जिन पुस्तकों ने बच्चों के दिलों और बाल साहित्य जगत में अपनी छाप छोड़ी है, उनमें बच्चों के शिखरस्थ रचनाकार प्रकाश मनु की कृति, ‘प्रकाश मनु के श्रेष्ठ बालनाटक’ का स्थान सर्वोपरि है। इस कृति में प्रकाश मनु जी ने अपने श्रेष्ठ ग्यारह नाटकों का संचयन किया है। पुस्तक की भूमिका में बच्चों को संबोधित करते हुए वे लिखते हैं—
“लो बच्चो, तुम्हारे लिए एक से एक मजेदार, खिलंदड़े और रंग-बिरंगे नाटकों का यह खूबसूरत गुलदस्ता, जिसमें तुम्हारी जि़ंदगी के अजब-अनोखे रंग बिखरे हुए हैं, और ऐसी मस्ती भी कि उन्हें पढ़ते हुए तुम्हारे होंठों पर एक मीठी सी चुलबुली मुसकान आ जाएगी।”

साथ ही पुस्तक की भूमिका में मनु जी ने प्रत्येक नाटक की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए, अपनी संक्षिप्त विश्लेषणात्मक टिप्पणी भी दी है, जिसे पढ़कर बाल पाठकों के मन में इन नाटकों को पढ़ने की गहरी उत्सुकता पैदा हो जाती है। मनु जी के ये नाटक कैसे लिखे गए और किस तरह इनमें उन्होंने कहीं न कहीं अपने आपको भी पिरो दिया है, यह इस भूमिका को पढ़कर समझ में आ जाता है।

श्यामपलट पांडेय
‘पप्पू बन गया दादा जी’ संग्रह का पहला नाटक है। तीन दृश्यों का सुंदर, रोचक एवं बाल मनभावन नाटक। छह-सात बरस का बच्चा पप्पू, दादा जी की लाजवाब एक्टिंग करता है। देखकर हर कोई हैरान रह जाता है। खुद दादा जी उसका यह नया रूप देख ठगे से रह जाते हैं। साथ ही वे पप्पू की एक्टिंग की खूब तारीफ भी करते हैं। यह एकांकी सुंदर, उत्फुल्ल, नैसर्गिक एवं बाल मनभावन हास्य का सृजन करता है। इसमें मस्ती, विनोद और चुहल भी है। पात्रों के हाव-भाव तथा उनके चेहरों पर आई हुई सूक्ष्म भाव-रेखाओं का अद्भुत चित्रण हुआ है। नाटक का कथ्य हमारे घर-परिवार का चिरपरिचित सत्य है।

‘खेल-खेल में नाटक’ संग्रह का दूसरा एकांकी है जो हमारे समक्ष चार दृश्य लेकर उपस्थित होता है। इसमें मध्यमवर्गीय परिवार के आपस में खेलते बच्चों के स्वाभाविक दृश्यों का चित्रांकन हुआ है। बाल मनोविज्ञान का इतना अनुपम दृश्यांकन शायद ही आपको अन्यत्र मिले। बच्चों में खेल भी है, झगड़ा भी है और शीघ्र ही मेल-मिलाप हो जाता है। नाटक का अंत इस सुंदर बालगीत के साथ होता है—
खेल-खेल में नाटक है
नाटक कितना प्यारा है, 
नाटक में भी नाटक है
किस्सा यही हमारा है। 
कल झगड़े थे, रूठ गए, 
आज हँसे हैं खी-खी-खी, 
बिना बात की रूठा-रूठी
बिना बात की ही-ही-ही।

‘बार-बार आए पिंकी का जन्मदिन’ इस संग्रह का तीसरा नाटक है जो तीन दृश्यों को अपने में समेटे हुए है। यह नाटक अपनी परिकल्पना एवं प्रस्तुति में अनूठा है। जन्मदिन बच्चों का सबसे प्यारा उत्सव होता है और उसके आने की प्रतीक्षा वे पूरे वर्ष करते रहते हैं। माँ-बाप दोनों नौकरीपेशा हैं और उनके पास अपनी दस-ग्यारह साल की बेटी पिंकी का जन्मदिन मनाने का समय नहीं है। वे एक दिन की छुट्टी भी नहीं ले सकते, यह आज के समय की बड़ी अजब विडंबना है।

ऐसे में पिंकी की सहेलियाँ उसे सरप्राइज देते हुए उसके घर आकर खूब उल्लास और उमंग के साथ उसका जन्मदिन मनाती हैं। यह नाटक न केवल आज के माता-पिता की संवेदनहीनता पर करारी चोट करता है अपितु जन्मदिन मनाने का एक नया मॉडल भी प्रस्तुत करता है। कुल मिलाकर ‘बार-बार आए पिंकी का जन्मदिन’ एक अद्भुत, उदात्त एवं अभिनव कल्पना से भरपूर, बच्चों के मानसपटल पर अपनी छाप अंकित करनेवाला एकांकी है। 
‘भुलक्कड़राम’ एकांकी एक अलग भाव-भूमि लेकर हमें अनुरंजित करता है। इसकी मुख्य पात्र शीनू आठ-नौ साल की छोटी सी लड़की है, जिसके पिता बचपन में हद दर्जे के भुलक्कड़ थे। एक दिन बेटी को उदास देखकर वे हँसते-हँसते अपनी भुलक्कड़ी का किस्सा बेटी को सुनाते हैं। एकांकी के बीच में 'भालू का तमाशा' उसमें नई जान फूँक देता है।

शीनू पापा की कहानी बड़े गौर से सुनती है। फिर वह स्कूल की पत्रिका में छपने के लिए, ‘भुलक्कड़ पापा’ नाम से एक कहानी लिखकर क्लास टीचर को दे देती है। क्लास टीचर कहानी पढ़कर पूरी कक्षा में सारे बच्चों को सुनाती है। सभी दिल खोलकर हँसते हैं। इस कहानी में 'भीतर की आवाज' नाम के पात्र का भी प्रवेश होता है, जो कि एक नया प्रयोग है। इस नाटक की विशेषता है सुंदर, स्वस्थ और बाल मनभावन हास्य का सृजन, जिससे बच्चे इसे पढ़ने के साथ-साथ खेलना भी चाहेंगे।

‘झटपट सिंह फटफट सिंह’ नौ दृश्यों का एक रोचक नाटक है। इसमें भी 'भीतर की आवाज' एक पात्र बनकर संवाद करती है। एकांकी का मुख्य पात्र 'आशु उर्फ झटपट सिंह' हर काम झटपट करना चाहता है। उसमें विचित्र हड़बड़ियापन है। इस कारण हर जगह उसका खूब मजाक उड़ता है। बाद में चलकर वह धीरे-धीरे अपने को सुधार लेता है और बड़ा होकर एक सॉफ्टवेयर कंपनी में इंजीनियर बन जाता है। पर उसकी पुरानी आदतें दोस्तों को भूलती नहीं हैं, इसलिए सब उसे आज भी ‘झटपट सिंह’ कहकर ही पुकारते हैं। नाटक के चुस्त संवाद उसकी रोचकता में आसाधारण वृद्धि करते हैं। किसी नाटक में बाल मन के हड़बड़िएपन का इससे उत्कृष्ट चित्रांकन अन्यत्र मिल पाना दुर्लभ है। एकांकी की कथाभूमि बिल्कुल नई है, जो बच्चों को भाएगी।

‘गोलू-मोलू गप्पू खाँ’ एकांकी छह दृश्यों में फैला है। हर दृश्य अपने में अनूठा है। एकांकी का मुख्य पात्र गोलू एक नटखट लड़का है। मजाक में सारे बच्चे उसे गोलू-मोलू भी कहकर पुकारते हैं। मनु जी ने इस नाटक में 'नीली चिड़िया' को एक पात्र के रूप में प्रवेश कराया है। गपोड़ी बच्चे कैसे सुधर सकते हैं, इसका सार्थक संदेश देता यह बड़ा रोचक एकांकी है। नाटक में रहस्य और रोचकता का पुट देने के लिए 'नीली चिड़िया' पात्र का प्रवेश कराना एक अद्भुत प्रयोग है। नीली चिड़िया गोलू जैसे एक गप्पी लड़के को केवल नई राह ही नहीं दिखाती, अपितु उसमें जीने की नई चाह भी पैदा कर देती है और वह पूरी तरह बदल जाता है। कुल मिलाकर यह एक मनोरंजक, संदेशपरक एवं उत्कृष्ट एकांकी है।

‘जब मीशा ने ढूँढ़ें रसगुल्ले’ नाटक बाल-मन की एक अलग उलझन लेकर हमारे समक्ष आता है। मीशा कोई चौदह-पंद्रह बरस की नटखट लड़की है। मनु जी लिखते हैं, “यह किस्सा है मीशा का। नहीं-नहीं, मीशा के रसगुल्लों का।” मीशा क्लास में फर्स्ट आई है। माँ का उसे रसगुल्ले खिलाने का वादा है। माँ, रसगुल्ले मँगवाती भी है, पर उसे केवल दो ही रसगुल्ले देती है। लेकिन मीशा का मन नहीं भरा। अभी वह एक-दो रसगुल्ले और खाना चाहती है। और फिर इसी कोशिश में वह धरती-आसमान एक कर देती है। नाटक में मीशा घर में कहाँ-कहाँ रसगुल्ले ढूँढ़ने की कोशिश करती है, और फिर तमाम जतन करके आखिर ढूँढ़ ही लेती है, इसका बड़ा ही लाजवाब चित्रण हुआ है। 
‘मुनमुन का छुट्टी क्लब’ एकांकी बच्चों की सृजनात्मक प्रतिभा को अंकुरित, पल्लवित और पुष्पित करने का एक अनूठा मॉडल प्रस्तुत करता है। नाटक के आरंभ में अधिकतर संवाद कविता के रूप में हैं, जो बड़े रोचक लगते हैं। मुनमुन बड़े सपने देखने वाली एक समझदार लड़की है और नाटक की मुख्य पात्र भी। शोभा दीदी मुहल्ले के बच्चों की प्यारी, हँसमुख दीदी है। बच्चों के प्रति उनके ये उद्गार मानसपटल पर अपनी अमिट छाप छोड़ जाते हैं—
“(कुछ काव्यात्मक लहजे में) जानते हैं विनायक दा, नन्हे-नन्हे सपनों और जिम्मेदारियों को पूरा करने में लगे इन बच्चों को देखकर मुझे क्या लगता है? जैसे ये बच्चे न हों, जगुनू हों, जुगुनू! हर क्षण प्रकाश उगलते नन्हे-नन्हे जुगनू.......!”

‘हमारा नंदू जिंदाबाद’ छह दृश्यों का बड़ा ही रोचक एकांकी है, जिसमें जगह-जगह हास्य-विनोद की छटाएँ हैं। द्विवेदी युग के प्रसिद्ध कवि रामनरेश त्रिपाठी की कालजयी बाल कविता, ‘नंदू की छींक’ को विस्तार देता यह सुंदर एकांकी है, जिसमें बड़े मजेदार दृश्य और मस्ती भरे संवाद हैं। नाटककार ने एक छोटी सी कविता का संदर्भ देते हुए हँसा-हँसाकर लोटपोट कर देने वाले सुंदर, रोचक और बाल मनभावन नाटक का सृजन किया है। एकांकी में रचनाकार के अद्भुत रचना कौशल के दर्शन होते हैं। यह हँसी के फव्वारे छोड़ता ऐसा नाटक है, जो हर बच्चे को लुभाता है। ऐसे ही ‘निठल्लूपुर का राजा’ एकांकी एकदम हँसी का खजाना है। यह कुछ-कुछ ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ नाटक की याद दिलाता है। सात दृश्यों का यह नाटक अपनी प्रस्तुति में बेजोड़ है।

संग्रह का अंतिम नाटक ‘पेड़ लगाओ, पेड़ लगाओ रे!’ बालमन को बेहद रिझाने वाला नाटक है। गाँव का सबसे आलसी लड़का संतू कैसे अपना आलस त्याग कर, इतने बड़े-बड़े काम कर जाता है कि देखते ही देखते वह एक ‘सेलेब्रिटी’ बन जाता है। ‘हरियाली परी’ की उपस्थिति पूरे नाटक को एक अभिनव ऊर्जा से भर देती है। यों ‘पेड़ लगाओ, पेड़ लगाओ रे!’ सुंदर, सार्थक एवं बाल मनभावन संदेश देता श्रेष्ठ नाटक है।

आलोच्य पुस्तक के रचनाकार प्रकाश मनु जी सदैव लीक से हटकर साहित्य का सृजन करते हैं। वे ऐसे शिखरस्थ साहित्यकार हैं, जो बाल साहित्य-सृजन को एक नई दिशा देते आ रहे हैं। इन नाटकों में भी उन्होंने गागर में सागर भरने का सफल प्रयास किया है। हर एकांकी हमारे जीवन की एक सुंदर झाँकी उपस्थित करता है।

ये नाटक बच्चों को गुदगुदाते हैं। वे इन्हें पढ़कर हँसते-हँसते लोटपोट हो जाते हैं और इन्हें बार-बार पढ़ना चाहते हैं। साथ ही ये नाटक खेल-खेल में नया संदेश भी दे जाते हैं। इनकी एक अन्य प्रमुख विशेषता यह है कि इन्हें सरलता से मंच पर खेला जा सकता है। मंचन के उपयोग में आने वाली पृष्ठभूमि भी नाटककार ने हर दृश्य के साथ संक्षेप में दे दी है। नाटकों को पढ़ते हुए ऐसा लगता है, मानो एक रंगमंच हमारे सामने खड़ा हो गया हो और एकांकी के पात्र पूरे हाव-भाव एवं संवाद आदि के साथ साक्षात अभिनय कर रहे हों।

इन नाटकों की एक विशेषता यह भी है कि इनमें अधिकतर नायक छोटे बच्चे ही हैं। इसलिए जो भी बच्चे इन्हें पढ़ेंगे या मंचित होते देखेंगे, उन्हें इनमें कहीं न कहीं अपनी छवि अवश्य नजर आएगी। फिर इन नाटकों में सहज, सरल एवं बाल मनभावन शब्दावली का प्रयोग हुआ है जो बालमन में सीधे उतर जाती है। नए एवं ध्वन्यात्मक शब्दों का प्रयोग करके मनु जी ने कहीं-कहीं ऐसे ध्वनि-बिंबों का सृजन किया है जो बच्चों को बहुत आकर्षित करते हैं, जैसे-अटरम-पटरम, खुदर-खुदर, बिटर-बिटर आदि। ऐसे ही एक जगह आया है, “एक हुड़कचुल्लू तो बाकी सब घुड़कचुल्लू!” इससे समझा जा सकता है कि ये नाटक कितनी जिंदादिली से भरे हुए हैं।

कहीं-कहीं पात्रों के नाम भी खूब हँसाते और गुदगुदी पैदा करते हैं, जैसे ‘निठल्लूपुर का राजा’ में मोटाराम, लोटाराम, सोटाराम, घसीटानंद, पपोटानंद, ढचरूमल, पोलाराम वगैरह दरबारियों का होना एक अजब हास्य की सृष्टि करता है। प्रकाश मनु जी बाल मनोविज्ञान के कुशल चितेरे हैं। उनके नाटकों में सुंदर, स्वस्थ एवं संदेशपरक हास्य का सृजन हुआ है, जो कि पाठक की संवेदना के सूक्ष्म तारों को झंकृत ही नहीं करता, अपितु उन्हें जीवन में आगे बढ़ने के लिए नई राह भी दिखाता है।

इन नाटकों में बालमन के सारे प्रमुख मनोभाव हैं। इनमें रहस्य है, रोमांच है, उल्लास है, उमंग है, जिज्ञासा है और कौतूहल भी। विषयों की विविधता, ताजगी एवं नए तथा अछूते विषयों का चयन इन नाटकों की एक अन्य प्रमुख विशेषता है। ‘भुलक्कड़राम’, ‘गोलू-मोलू गप्पू खाँ’, ‘हमारा नंदू जिंदबाद!’ ऐसे ही मजेदार नाटक हैं। नाटक के शीर्षक इतने चुस्त-दुरुस्त और अनोखे रखे गए हैं कि वे पाठक के लिए एक अलग चुंबकीय आकर्षण पैदा करते हैं। ऐसे ही चुस्त, चुटीले और दमदार संवाद नाटक को नई गति प्रदान करते हैं।

सच पूछिए तो नाट्य लेखन एक अलग सृजनात्मक प्रतिभा एवं रचना कौशल की माँग करता है, जो कि बहुत कम हिंदी-लेखकों के पास है। इसलिए हिंदी बाल साहित्य में उम्दा नाटक बहुत अधिक नहीं लिखे गए। इस लिहाज से ‘प्रकाश मनु के श्रेष्ठ बाल नाटक’ पुस्तक में शामिल नाटकों के लेखन में रचनाकार की सृजनात्मक प्रतिभा एवं रचना कौशल के सर्वोत्कृष्ट रूप को देखा जा सकता है।

कुल मिलाकर कथ्य, शिल्प एवं मंचन, तीनों दृष्टियों से ये नाटक अद्वितीय हैं। विश्वास है कि इन नाटकों का हमारे साहित्य-जगत में मुक्त हृदय से स्वागत होगा और इनका भरपूर मंचन भी होगा। सुंदर, रंगीन एवं आकर्षक कलेवर से सुसज्जित नाटकों का यह गुलदस्ता बच्चों, पाठकों, रचनाकारों और विद्वान समीक्षकों, सभी को खूब पसंद आएगा। 
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श्यामपलट पांडेय
907, पंचतीर्थ अपार्टमेंट, जोधपुर चार रास्ता, सेटेलाइट, अहमदाबाद-380015
चलभाष: 9638430340

 

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