एक अद्भुत लोकनर्तक की महागाथा

डॉ. सुनीता

सुनीता

संजीव हिंदी के जाने-माने कथाकार हैं, जिनकी कहानी और उपन्यासों ने हिंदी कथा साहित्य में बहुत कुछ नया जोड़ा है। खासकर उनका हर उपन्यास एक लंबी खोज-यात्रा से निकला है। संजीव अपने हर उपन्यास में एक नई जमीन उठाते हैं, एकदम नया और अजाना क्षेत्र। और उपन्यास लिखने से पहले वे उसके एक-एक पहलू की इतनी सघन पड़ताल करते हैं, कि एक विश्वसनीय उपन्यास लिख पाने की उनकी तैयारी, उनकी जी तोड़ मेहनत और होमवर्क, और साथ ही, कुछ नया रचने की लगन देखकर हम हैरान रह जाते हैं।
यों तो संजीव के सभी उपन्यास अनूठे और पठनीय हैं। पाठकों के दिल में उतरने का जादू वे जानते हैं, जिससे पाठक पहले पन्ने से ही उने कथा-प्रवाह में बँधा हुआ, साथ-साथ बहने लगता है। पर संजीव का ‘सूत्रधार’ तो ऐसा अद्भुत उपन्यास है, कि उसे कितनी ही बार पढ़ो, मन नहीं भरता। बिहार के अद्भुत लोकनर्तक भिखारी ठाकुर पर लिखा गया ‘सूत्रधार’ ऐसा उपन्यास है जिसका शब्द-शब्द कथा-रस में पगा हुआ है। इसलिए इसका शब्द-शब्द पढ़ने को न्योतता है। अपठनीयता को रचना का आदर्श बना देने वाले महान कलावंतों के इस जमाने में, संजीव ने भिखारी ठाकुर पर ऐसा रसमय, तरल और भावपूर्ण उपन्यास लिखा, यह खुद में किसी अचरज से कम नहीं है।

उन्नीसवीं सदी के आखिरी चरण में एक गरीब नाई परिवार में जनमे भिखारी ठाकुर को कदम-कदम पर जिस भीषण जातिवादी राक्षस का सामना करना पड़ा, उसकी गाथा मर्माहत कर देने वाली है। संजीव ने ‘सूत्रधार’ में इसका जैसा कारुणिक और विश्वसनीय चित्रण किया है, वह हृदय को बेधता है। बचपन से लेकर अपनी लोकप्रियता के चरम उत्कर्ष पर भी भिखारी ठाकुर जैसा असाधारण कलाकार इससे मुक्ति नहीं पा सका। और यहीं, यह समझ में आता है कि एक गरीब नाई परिवार में जनमा भिखारी नाम का एक बच्चा, जिसे स्कूल में नाई होने के कारण दूसरे बच्चे चिढ़ाते थे और जो थक-हारकर फिर ढोर-डगर चराने का काम करने लगा, जिसे नाई के पेशेगत काम से अरुचि थी और जातिगत अपमानों की तिलमिलाहट जिसे हर क्षण दग्ध करती थी, वह कैसे इस सबके जवाब में कला की सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ, बिहार का एक सच्चा ‘कला-पुरुष’ बन गया।

लोकप्रियता के जिस शिखर पर वह पहुँचा, वहा चारों ओर उसके रचे ‘बिदेसिया’ की धूम थी और बड़े-बड़े विद्वानों और कला-संस्थाओं ने उसे ‘नट सम्राट’ की उपाधि से विभूषित किया। यहाँ तक कि महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने भिखारी ठाकुर को सीवान में हुए एक सम्मेलन में ‘भोजपुरी का शेक्सपियर’ कहा। यह दीगर बात है कि भिखारी ठाकुर इतने भोले थे कि उन्हें पता ही नहीं था कि शेक्सपियर आखिर कौन है? और एक बिडंबना तो यह कि कुछ कुपढ़ किस्म के बुद्धिजीवी उस सीधे-सरल कलाकार भिखारी ठाकुर की नृत्य-नाटिकाओं पर फाउस्ट और ब्रेख्त के प्रभाव का आरोप जड़ रहे थे, जिस बेचारे ने इनके नाम तक नहीं सुने थे। इससे पता चलता है कि एक सीधे-सादे शख्स भिखारी ठाकुर की जीवन-गाथा उतनी सीधी तो हरगिज नहीं है, जितनी ऊपर से नजर आती है। उसमें करुणा और विडंबना की बड़ी अजीबोगरीब अंतःधाराएँ हैं, जिन्होंने अंत तक भिखारी ठाकुर का पीछा नहीं छोड़ा।

यह बेहद सुकून की बात है कि कथाकार संजीव ने ‘सूत्रधार’ लिखते हुए न सिर्फ भिखारी ठाकुर के जीवन की इन विडंबनाओं को उघाड़ा है, बल्कि उनकी भीतरी तह तक जाकर उन मर्मांतक क्षणों का साक्षात्कार भी किया है, जिससे भिखारी ठाकुर सच में भिखारी ठाकुर बने।

‘सूत्रधार’ में भिखारी ठाकुर के बचपन से लेकर उनके किशोर काल और तरुणाई के जिज्ञासु मन, एक कलाकार की सी फक्कड़ी और सामाजिक विडंबनाओं के प्रति गहरे, तीखे असंतोष का चित्रण बहुत विस्तार से किया गया है। ये वे पन्ने हैं जिनमें भिखारी ठाकुर के लोक नर्तक होने की भूमिका अंदर ही अंदर बन रही थी। सबसे पहला नृत्य-नाटक उन्होंने घरेलू स्वांग देखा। उस घर से लड़के की बारात गई थी और पीछे औरतें मन बहलाव के लिए यह स्वाँग कर रही थीं। उन्हीं में एक औरत आदमी के कपड़े पहनकर आ जाती है और पति की नकल उतारने लगती है। भिखारी को यह बड़ा अद्भुत लगा कि अरे, कपड़े बदल लेने भर से एक औरत भी पुरुष बन सकती है! और उसी की तरह बोल-बतिया सकती है! 

यहीं से उनके मन में नाटक के बीज पड़े। संजीव ने ‘सूत्रधार’ में डोमकच और जलुआ कहे जाने वाले स्त्रियों के घरेलू नाटकों के जो रसमय चित्र खींचे हैं और भिखारी ठाकुर की उनके प्रति जैसी ललक दर्शाई है, उसी से पता चलता है कि भिखारी के भीतर पालथी मारकर बैठा कलाकार किस जमीन और मिजाज का है। यह अलग बात है कि भिखारी ठाकुर की सारी नृत्य नाटिकाएँ आसपास की सामाजिक स्थितियों और लोक जीवन से ही जन्म लेती हैं, लेकिन करुणा का उद्रेक उन्हें बहुत ऊपर उठा देता है।

इस बीच पारिवारिक रंगमंच पर भी बहुत कुछ हो रहा था, जिसने भिखारी ठाकुर के भीतर एक हड़कंप-सा मचा दिया था। अनिच्छा से पेशेगत काम यानी नाईगीरी का काम सीखना पड़ा। उस्तरा चलाना भिखारी को अच्छा नहीं लगता था, हालाँकि कलाकार भिखारी को यह जरूर रोमांचकारी लगता था कि हजामत होते ही आदमी की शक्ल कैसे एकदम बदल जाती है। फिर विवाह हुआ। अभी गौना भी नहीं हुआ था कि पत्नी के गुजरने का समाचार मिला। यही विडंबना दूसरे विवाह के साथ भी हुई। दूसरी पत्नी बीमार पड़ी और चल बसी। साथ ही छोटा-सा बेटा भी चला गया। भिखारी अंदर ही अंदर आँसू पी रहे हैं और अपने बाल मित्र रामानंद सिह के साथ शिव मंदिर बनाने में लीन हैं। फिर मानपुरा की बेटी मनतुरना देवी से तीसरा ब्याह हुआ। आर्थिक तंगी और रास्ता खोजने की बेचैनी के चलते यहाँ-वहाँ की घुमक्कड़ी। इसी घुमक्कड़ी में उन्हें परमानिक दा मिले, जिन्होंने बांग्ला के ‘जात्रा’ नाटक के बारे में बताया। परमानिक दा के साथ ही भिखारी ठाकुर ने जगन्नाथपुरी की यात्रा की और जीवन में पहली बार समंदर देखा। कलकत्ता (आज का कोलकाता) में बाबूलाल ठाकुर की नाच पार्टी देखी और मन में सपना सँजोया कि ऐसा तो हम भी कर सकते हैं। बल्कि इससे कुछ बेहतर ही कर सकते हैं।

इस घुमक्कड़ी से वापस घर लौटे तो वही नाई का घर-घर न्योतने का काम उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। इस बीच एक सुखद परिवर्तन यह था कि रघु पांडे ने राम-जानकी की झाँकी निकाली तो रामानंद सिह राम बने और भिखारी बने सीता। अब मुसीबत यह शुरू हुई कि लोग ‘सीतामाई’ कहकर उन्हें चिढ़ाते। पिता दलसिंगार ठाकुर अलग नाराज रहते और मन लगाकर अपना रोजी-रोटी का काम करने को कहते। उनका कहना था कि आखिर जिंदगानी तो इसी से चलनी है। लेकिन भिखारी ठाकुर के मन में तो वही साधु बाबा बसे हुए थे, जिन्हें उन्होंने मेले में मगन होकर सूरदास के रस भीने पद गाते हुए देखा था। उन्हीं के सुर मानो उन्हें खींच रहे थे और चेता रहे थे, ‘भिखारी ठाकुर अपनी राह पहचानो!...भिखारी ठाकुर तुम जिंदगी में क्या करने आए हो, भूलना मत!’

आखिर भिखारी ठाकुर अपने बाल मित्र रामानंद के सुझाव पर अगराहित यादव के नाचदल में गए, यह सोचकर कि जीवन का रास्ता शायद यहीं से निकले। पर ‘हमर जोबना पे आइल बहार राजा’ जैसे छिछले गीतों से वे जल्दी ही ऊब गए और फिर बाहर आ गए। अब उन्होंने साफ-साफ अपने मन की चाहत को पहचान लिया था, “हम दूसरे ढंग का नाच चाहते हैं, जिसमें रस-रंग तो हो, लेकिन मरजाद न टूटे।” यानी ऐसे नाच, जिन्हें लोग अपने परिवार के साथ देखें। ऐसे नाच, जिनमें कलात्मक मनोरंजन तो हो, पर साथ ही लोगों को अपने देश-समाज, अपने धर्म, और कर्तव्य की याद दिलाई जा सके। ताकि हमारा समाज एक अच्छा समाज बने। लोगों में हमदर्दी पैदा हो और वे एक-दूसरे का दुख-दर्द समझें। एक का दुख देखकर दूसरे की आँख में आँसू आ जाएँ। एक की खुशी में दूसरा खुशी से नाचे। ऐसा भला समाज बनाना भिखारी ठाकुर का सपना था।

आखिर उन्होंने ‘बिरहा बहार’ और ‘कलजुग प्रेम’ जैसी नृत्य-नाटिकाएँ तैयार कीं और पत्नी की अनुमति लेकर मुजफ्फरपुर के सर्वमस्तपुर में पहली बार अपनी नृत्य-नाटिका का प्रदर्शन किया। दिल में भय, रोमांच और धुकधुकी थी, पर प्रदर्शन कुछ बुरा नहीं रहा। आने-जाने के खर्च के अलावा पच्चीस रुपए मिले।
इसके बाद तो झिझक छोड़कर भिखारी ठाकुर एक अंतहीन रास्ते की ओर बढ़ चले, जिसकी मंजिल उनके लिए अज्ञात थी। उन्हीं दिनों बाबूलाल नाम के व्यक्ति ने उन्हें ‘प्यारी सुंदरी वियोग’ नाम की किताब दी और कहा कि नाटक में “ऐसी पीर होनी चाहिए, जो कलेजा निकालकर रख दे!” 

भिखारी ठाकुर चौंके। लगा, किसी ने उन्हें कला का मर्म समझा दिया है। फिर ‘सुंदरी बाई’ और ‘दुनिया बाई’ नाटकों को देखने वे लखनऊ, मीरगंज गए तो वहाँ एक बुजुर्ग ब्राह्मण ने उन्हें नृत्य और नाटक का मर्म समझाते हुए, दुनिया के सारे साहित्य और कलाओं का निचोड़ यह बताया कि “दूसरे की पीड़ को अपनी पीड़ बनाने के लिए परकाया-प्रवेश करना पड़ता है। जो यह सीख लेता है, वही सफल होता है।” 

भिखारी ने ‘परकाया प्रवेश’ के इस मंत्र को गाँठ बांध लिया। और जीवन भर यही उनके लिए अभिनय का मूलमंत्र रहा।
*


धीरे-धीरे भिखारी ठाकुर की लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि उनके लिए सभी लोगों की मांग को पूरा करना मुश्किल हो गया। जिसके यहाँ न जा पाते, वही गुस्से में धमकियाँ देने लगता। खासकर बड़ी जाति के लोगों के मुँह पर तो ये शब्द धरे रहते कि “बहुते सनक गइल बा भिखरिया!” 

यहाँ तक कि बड़ी जाति के कई लोग भिखारी ठाकुर के सम्मान को सहन नहीं कर पाते थे। ईर्ष्या से जल-भुनकर कहते, ”आखिर है तो नाई ही ना! उसके हाथ में उस्तरा ही शोभा देगा।” 

भिखारी ठाकुर जब कहीं से कार्यक्रम करके आते तो ऐसे लोग जान-बूझकर हजामत बनवाने पहुँच जाते। मानो जातिगत दंश देकर वे उसे छोटा करना चाहते हों। मगर यह चीज भिखारी ठाकुर की आत्मा को जितना कचोटती, वे उतनी ही नृत्य और कला की ऊचाइयों तक पहुँचते गए। वे जन-जन के कलाकार हो गए। एक ऐसे ‘नट-सम्राट’ जिसकी आत्मा में बस नाच ही नाच समाया था। संजीव ने भिखारी ठाकुर की इस मनोवेदना का उपन्यास में जगह-जगह इतना सजीव चित्रण किया है कि ‘सूत्रधार’ पढ़ते हुए लगता है मानो भिखारी ठाकुर हमारी आत्मा में आ बसे हों।

इसी तरह उपन्यास में संजीव ने भिखारी ठाकुर की कला-दृष्टि और बारीकी के कई स्मरणीय चित्र प्रस्तुत किए हैं। बहुत से लोग लोकप्रियता के नाम पर अश्लीलता और फूहड़पन के हिमायती थे। उनका तर्क यह था कि लोग नाच के नाम यही देखना चाहते हैं, तो हम क्यों न करें? लेकिन भिखारी के लिए यह जीने-मरने का प्रश्न था। फूहड़पन से निजात दिलाकर वे नाच को आगे बढ़ाना चाहते थे, जहाँ नृत्य-नाटिका अपनी पूरी लय और तरन्नुम में आए और लोगों के रोजमर्रा के जीवन से भी जुड़े। खुद भिखारी का पूरा शरीर एक लयात्मक भंगिमा में ढल गया था और मंच पर उनके आते ही भीड़ पर एक सम्मोहन तारी हो जाता। 

अपने अनोखे लोक नाटकों के लिए भिखारी ठाकुर ऐसे कलाकारों की तलाश में रहते थे, जिनके अंदर बीज-रूप में उस लय की थिरकन मौजूद हो। अगर यह नहीं है तो कितनी ही ऊपरी लीपापोती करो, सब बेकार है। यहाँ तक कि एक युवक रामचन्नर को उन्होंने गारे को पैरों से मथते देखा, तो आनंद की लहरों में डूब गए। सिर्फ उस युवक की पीठ देखकर उन्होंने मन ही मन कहा कि अहा, इसे तो नाच-मंडली में लाना ही है, राधा के रूप में इसका कोई जोड़ नहीं होगा! और फिर वैसा उन्होंने करके भी दिखाया।

एक सच्चे कलाकार का दिल कैसा होता है और कला किस तरह उसके रोम-रोम में बसी होती है, यह भिखारी ठाकुर को देखकर समझा जा सकता था।

यही कारण है कि उन दिनों हालत यह थी कि भिखारी ठाकुर की नृत्य-मंडली उम्दा लोक नर्तकों को आश्रयस्थली बन गई थी। यहाँ तक कि बहुत से पढ़े-लिखे युवक भी दौड़-दौड़कर उन तक आते और कला की इस अनोखी राह के पथिक बनने को लालायित रहते। यह अलग बात है कि उनके पिता और परिवार के लोग भिखारी के पिता दलसिंगार ठाकुर के पास आकर शिकायत करते कि “तुम्हारा बेटा हमारे बेटों को बिगाड़ रहा है!”

इस पर दलसिंगार ठाकुर भुनभुनाते, पर माँ चुप रहती थीं। उन्हें इस बात का विश्वास था कि उनका बेटा कुछ गलत नहीं कर सकता। धीरे-धीरे हालत यह हुई कि अंग्रेज सरकार जिन्हें ‘राय साहब’ और ‘राय बहादुर’ की उपाधियाँ प्रदान करती, उनसे ज्यादा सम्मान जनता अपने इस अनोखे नट-सम्राट का करने लगी, जो बात ही बात में हजारों लोगों का दिल जीत लेता था। वे जन-जन के हृदय सम्राट बन गए, जिनके आगे बड़े से बड़े पद और सरकारी सम्मान बेकार थे।

भिखारी ठाकुर जैसे कला की साक्षात मूर्ति हों। वे जहाँ कहीं जाते, उससे पहले उनका नाम पहुँच जाता और लोगों के मन में उत्साह छा जाता। उन्हें लगता, कोई है जो उनके मन की बात कहता है, उनकी समस्याओं को कला में ढालकर इस तरह  पेश करता है कि देखने वाले अश-अश कर उठते हैं। अब तो बड़े-बड़े विद्वान और बुद्धिजीवी लोग भी भिखारी ठाकुर की कला के जादू को समझने के लिए उनकी नृत्य-नाटिकाओं को देखने पहुँचते। दरसिंगार ठाकुर और माँ शिवकली देवी के मन से अब अपने बेटे के ‘नचनिया’ होने की हीनता निकल चुकी थी। उन्होंने माना कि “उनका बेटा सिर्फ नचनिया नहीं, वह तो व्यास है, व्यास!” 

यह एक नए जमाने का महाभारत था, और उसका व्यास भी लोगों के दिलों में राज करने वाला भिखारी ठाकुर जैसा लोक कलाकार ही हो सकता था।

उस समय के एक बड़े संत मिरचइया बाबा के सामने भिखारी ठाकुर के दल का नाच हुआ, तो उन्होंने गद्गद होकर कि भिखारी ठाकुर तो संत-महात्मा हैं। असल में संत मिरचइया बाबा औरों की तरह भिखारी ठाकुर की जाति नहीं, उनकी आत्मा का सच्चा प्रकाश देख रहे थे, जिसमें सारी दुनिया की भलाई का सपना था। भिखारी ठाकुर की आत्मा एक कलाकार के साथ-साथ संत-महात्मा की आत्मा भी थी। पूरे समाज की मुक्ति में ही उऩ्हें अपनी मुक्ति नजर आती थी। इसी तरह उन्होंने अपने सुख-दुख को पूरे समाज के सुख-दुख के साथ एकाकार कर लिया था। ऐसा आदमी एक सच्चा संत नहीं तो और क्या हो सकता था?
*

होते-होते भिखारी ठाकुर का ‘बिदेसिया’ इस कदर लोकप्रिय हुआ कि उसके गीत भारत ही नहीं, देश के बाहर भी, त्रिनिडाड, मारीशस, गुआना, फिजी तथा अन्य देशों में जहाँ-जहाँ पूरबी भारतीय हैं, हवा की तरंगों पर बहते हुए पहुँच गए। फिल्म वालों ने बिदेसिया नाटक पर फिल्म बनाने के लिए भिखारी ठाकुर को मुंबई आमत्रित किया। यह अलग बात है कि वहाँ उन्हें एक धर्मशाला में एक कैदी की तरह रखा गया और फिर सिर्फ 50 रुपए तथा रेल का थर्ड क्लास का टिकट देकर बिहार रवाना कर दिया गया। भिखारी ठाकुर को दुख हुआ, पर उसे परे झटककर वे फिर से अपने काम में जुट गए, जिसमें पैसा भले ही ज्यादा न हो, पर सब ओर से आनंद ही आनंद बरसता था। वे हजारों दिलों के सच्चे नायक बन चुके थे।

सच तो यह है कि भिखारी ठाकुर का पूरा जीवन एक ऐसे महान कलाकार के नवोत्कर्ष और अद्भुत सफलता की कहानी है, जिसे सही मायनों में धरती का बेटा कहा जा सकता है। चौरासी वर्ष की उम्र में इस अद्भुत लोक कलाकार की जीवन-लीला समाप्त हुई, तो तेज बारिश हो रही थी। हर तरफ पानी ही पानी। गीली लकड़ियों से भला लाश कैसे जले? यहाँ संजीव के शब्द मानो आँसुओं से भीग गए हैं, “जलेगी कैसे? कितना रस था (इस देह में)—रस का अक्षय, अनंत स्रोत। किसी भी अग्नि में इतनी तपन कहाँ कि इतनी जल्दी सोख ले सारा रस? वह रस वहाँ की माटी का था।...”

संवेदनशील कथाकार संजीव ने मानो समाधिस्थ होकर भिखारी ठाकुर पर ऐसा उपन्यास लिखा है, जिसे भुला पाना असंभव है। भिखारी ठाकुर की नृत्य-नाटिका का मर्म संजीव ने यह बताया कि वे ‘परकाया-प्रवेश’ कर सकते थे। लगता है, ‘सूत्रधार’ उपन्यास लिखने के लिए संजीव ने भी मानो भिखारी ठाकुर के भीतर परकाया प्रवेश किया है। भिखारी ठाकुर कितनी ऊबड़-खाबड़ सीढ़ियाँ चढ़कर भिखारी ठाकुर बने थे, कितने दंश और तकलीफें झेलकर वे लोकमानस के भीतर नृत्य-सम्राट का अक्षय पद पाने में सफल हुए। जानना हो तो सूत्रधार का एक-एक अक्षर बाँचना होगा। ‘सूत्रधार’ का हर शब्द मानो आत्मीय ढंग से इसका बखान कर रहा है कि धरती का एक मामूली बेटा भी चाहे तो आकाश को छू सकता है। बस, उसमें भिखारी ठाकुर की सी सच्ची ललक होनी चाहिए। 

संजीव बिरले कथाकार हैं, जिनका हर उपन्यास मानो नई जमीन तोड़कर उगता है। ‘सूत्रधार’ लिखकर उन्होंने मानो एक बार फिर से भिखारी ठाकुर को हमारी आखों के आगे मूर्तिमान कर दिया है। इससे भिखारी ठाकुर तो अपनी सच्ची तेजस्विता के साथ सामने आए ही, पर साथ ही संजीव का कद भी एक उपन्यासकार के रूप में निश्चय ही बहुत ऊँचा उठ गया है।
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डॉ. सुनीता
545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008
चलभाष: 09910862380,
ईमेल: drsunita2011@gmail.com

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