राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020: अध्यापक शिक्षा में बहुभाषिकता का विश्लेषणात्मक अध्ययन

आनन्द दास

आनन्द दास

शोध सारांश:
                     भारत एक ‘बहुभाषिक’ और ‘बहुसांस्कृतिक’ देश है, जिसे हमें एक विरासत के रूप में मिला है। ‘राष्ट्रीय नीति 2020’ के माध्यम से ‘बहुभाषिकता’ के साथ न्याय-अमल करना एक चुनौती पूर्ण प्रस्ताव रहेगा। यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति किसी एक भाषा और संस्कृति की ओर ध्यान केन्द्रित न करके ‘बहुभाषिकता’ पर ज़ोर दिया गया है। ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’ में ‘बहुभाषिकता’ के महत्व को इस बात से समझा जा सकता है कि इस प्रारूप में ‘भाषा नीति’ को लेकर दो सौ छः बार भाषा शब्द का व्यवहार किया है। भारत में प्रयुक्त होने वाली भाषाओं के कई स्तर हैं, जो राजभाषा, त्रिभाषा, आठवीं अनुसूची की भाषा तक ही अपना स्थान बना पाईं थीं, लेकिन इस ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’ में ‘बहुभाषिकता’ नीतिगत दस्तावेज़ के रूप में उभरकर पहली बार सामने आया है। ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’ में अध्यापक शिक्षा हेतु ‘बहुभाषिकता’ की स्थिति प्रायः व्यक्ति, राष्ट्र एवं समाज के संदर्भ में की जा रही है। बहुभाषिकता के इस ताने-बाने की तुलना एक बहुरंगी व बहुतंतुनुमा वस्त्र से की जा सकती है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के जरिए ‘बहुभाषिकता’ अध्यापक शिक्षा के क्षेत्र में संज्ञानात्मकता, सामाजिकता, चिन्तनशीलता व बौद्धिक क्षमताओं को निपुण बनाने में विशेष सहयोग कर सकती है; जिसे हम व्याख्या, विश्लेषण के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे। कई शोध या अनुसंधान के माध्यम से यह पता चला है कि भारत सहित विश्वभर के देशों में बहुभाषिक अध्यापक शिक्षा अपवाद नहीं बल्कि आदर्श हैं। सभी भाषाएँ और उनमें निहित ज्ञान समान रूप से फले-फूले,  इस शिक्षा-नीति की चुनौती या कहें तो परीक्षा हो सकती है; जिसे हम अध्ययन-विश्लेषण के माध्यम से समझने का प्रयत्न करेंगे। प्रस्तुत शोध पत्र के माध्यम से ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’ में ‘बहुभाषिकता’ के बहुआयामी रंगों को समझने एवं परखने का प्रयास रहेगा। बहुभाषिकता को व्याख्या,विश्लेषण व आलोचना विधि या पद्धति के माध्यम से नए तथ्यों व पक्षों को प्रस्तुत करने का लक्ष्य रहेगा।

बीज शब्द: बहुभाषिकता, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, अध्यापक शिक्षा ।

उद्देश्य:
  • ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति  2020’ में ‘बहुभाषिकता’ के पहलुओं को समझने का प्रयास करेंगे।
  • बहुभाषिकता की परिभाषा एवं सिद्धांत के महत्व को समझ सकेंगे।
  • ‘बहुभाषिकता’ के बहुआयामी रंगों को समझने एवं परखने का प्रयास रहेगा। 
  • संज्ञानात्मकता, चिन्तनशीलता व बौद्धिक क्षमताओं को निपुण बनाने का प्रयास किया जाएगा।
  • भाषा के शक्ति-गतिकी को समझ पायेंगे।
  • भाषा सम्बंधित द्वन्द को समझ सकेंगे।

प्रस्तावना:  
                   भारत एक ‘बहुभाषिक’ और ‘बहुसांस्कृतिक’ देश है, जिसे हमें एक विरासत के रूप में मिला है। ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’ किसी एक भाषा और संस्कृति की ओर ध्यान केन्द्रित न करके ‘बहुभाषिकता पर ज़ोर दिया गया है। 'बहुभाषिकता' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है 'बहु'+'भाषिकता'। 'बहु' शब्द से आशय है अधिक या बहुत सारी और 'भाषिकता' शब्द से आशय भाषाओं का प्रयोग। 'बहुभाषिकता' शब्द का अंग्रेजी पर्याय ‘Multilingualism’ है। 'बहुभाषिकता' शब्द बहुभाषावाद, बहुभाषीयता, बहुभाष्यता, बहुभाषिता, भाषा बहुलवाद, मल्टीलिंगुअलिस्म तथा विविध भाषीयता आदि जैसे समानार्थी शब्द के रूप में प्रयोग किया जाता है। जब कोई व्यक्ति एक से अधिक यानी दो भाषा का प्रयोग करता है, तो वह द्विभाषिकता या द्विभाषावाद या द्विभाषी के नाम से अभिहित किया जाता है। वहीं बहुभाषिकता में जब कोई व्यक्ति अथवा समुदाय दो या दो से अधिक भाषाओं का प्रयोग करता है तब उसे बहुभाषिकता या बहुभाषी कहते हैं। ब्लूम फील्ड के अनुसार – ‘‘बहुभाषिकता की स्थिति तब पैदा होती है जब व्यक्ति किसी ऐसे समाज में रहता है जो उसकी मातृभाषा से अलग भाषा बोलता है और उस समाज में रहते हुए वह उस अन्य भाषा में इतना पारंगत हो जाता है कि उस भाषा का प्रयोग मातृभाषा की तरह कर सकता है।’’1 आगे चलकर रमाकान्त अग्निहोत्री लिखते हैं - “बहुभाषिकता केवल साक्षरता में ही नहीं, अपितु भाषा शिक्षण में भी बहुत मददगार हो सकती है। वास्तव में हमारे लिए तो जरुरी है कि हम ऐसे तरीके निकाले जिनका आधार बहुभाषिकता ही हो। दुर्भाग्यवश हम निरंतर एक भाषी देशों में बनाये गये तरीकों व सामग्री का उपयोग अपने देश में करते रहे हैं।”2 इस प्रकार एक से अधिक भाषाओं की जानकारी एवं प्रयोग बहुभाषिकता की स्थिति है। बहुभाषिकता किसी भी व्यक्ति के विकास के लिए बहुत उपयोगी है। बहुभाषी लोग कई भाषाओं के शब्दों या वाक्यों का व्यवहार अपनी अभिव्यक्ति में करते हैं। वे परिस्थिति के अनुरूप अपनी भाषा बदल लेते हैं। साधारणतः ऐसा माना जाता है कि बहुभाषा जानने वाले लोग अन्य लोगों की तुलना में बुद्धिलब्धि अधिक होती है, उसमें अत्यधिक लचीलापन तथा रचनात्मक प्रवृत्ति अधिक मात्रा में पाई जाती है। साधारण तौर पर दो या दो से अधिक भाषाओं का प्रयोग करने वाले व्यक्ति समान भाषिक दक्षता नहीं रखते हैं, परंतु कुछ व्यक्ति दो या दो से अधिक भाषाओं का प्रयोग बड़ी दक्षता व कुशलता के साथ करते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’  में ‘बहुभाषिकता’ नीतिगत दस्तावेज़ के रूप में उभरकर पहली बार सामने आया है।

विश्लेषण:
                      वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बहुभाषिकता की महत्वपूर्ण भूमिका है जिसका सीधा प्रभाव अध्यापक शिक्षा में सफलता-असफलता पर पड़ता है। अक्सर यह देखा जाता है कि एक बालक की घर की भाषा और अध्यापक शिक्षा में प्रयोग की जाने वाली भाषा में अंतर होता है। जिसकी वजह से अध्यापक शिक्षा की भाषा अपने अनौपचारिक तौर पर सीखने में असमर्थ महसूस करता है। इस प्रकार वह बालक अपने अनौपचारिक स्थान घर पर विद्यालय की भाषा नहीं सीख पाता है अतः उसे विद्यालय में हेय दृष्टि से देखा जाता है इसका सीधा प्रभाव बालक की शैक्षिक निष्पत्ति पर पड़ता है। इस परिस्थिति में शिक्षकों से यह अपेक्षा की जा सकती है कि
 वह अपने कक्षा-कक्ष में ऐसा परिवेश सृजित करें जिससे कि बालक का रचनात्मक और संवेगात्मक विकास हो सके। बहुभाषिकता किसी भी कक्षा-कक्ष में सम्प्रेषण और संवाद की भाषा पर निर्भर करता है। बहुभाषिकता से तात्पर्य अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त कक्षा-कक्ष में अन्य भाषाओं को सीखने से लगाया जाता है। इतिहास गवाह है कि अगर प्राचीन युग के विद्वानों ने उस समय के ज्ञान-विज्ञान, संस्कृति, साहित्य, ग्रन्थों आदि का अनुवाद न किया होता तो आज हम ज्ञान-विज्ञान तथा भाषा-साहित्य से वंचित रह जाते। ये अनुवाद वही विद्वान कर पाते थे जो दो या दो से अधिक भाषाओं के ज्ञाता होते थे तथा इन्हें बहुभाषी भी कहा जाता था। बहुभाषिकता विद्यालयों या समूहों के बीच विचारों के आदान-प्रदान में अहम भूमिका निभाती है। बहुभाषिकता हमारी शिक्षा व्यवस्था को दूरदर्शी बनाने में सहयोग करती है। 
                              भाषायी और सांस्कृतिक विभिन्नता भारत की विशिष्ट पहचान और शक्ति है। भारत में अनेक विविधताओं के बावजूद अनेक भाषिक एवं सांस्कृतिक तत्व भारत को सदियों से एकता के सूत्र में बांधे है। हमारे देश की बहुसांस्कृतिकता में बहुभाषिकता निहित है। किसी भी समाज में भाषायी विभिन्नता होने पर ही उस समाज को बहुभाषिक समाज माना जाता है। कई भाषाविदों/भाषा वैज्ञानिकों का यह मानना है कि विभिन्न कारणों से अलग-अलग भाषा बोलने वाले व्यक्तियों का सम्पर्क एक-दूसरे से हुआ। वे बोलने, समझने तथा व्यवहारिक प्रयोग के अनुरूप एक-दूसरे की भाषा को अपनाते चले गये। इस प्रकार बहुभाषिकता का उदय हुआ और आज बहुभाषी लोगों की संख्या पूरी दुनिया में एकभाषी की तुलना में बहुत ज़्यादा है। बहुभाषिकता हमारे देश की एक प्राचीनतम यथार्थ है। भारत में मुख्यतः पाँच भाषा परिवार हैं- 1.हिन्द आर्य भाषा परिवार 2.द्रविड़ भाषा परिवार 3.आस्ट्रो-एशियाटिक भाषा परिवार 4.चीनी-तिब्बती भाषा परिवार 5.अंडमानी भाषा परिवार। भारत में जितनी भी भाषाएं हैं इन परिवारों के अंतर्गत आती है। आज सबसे अधिक हिन्द आर्य भाषा परिवार (इंडो-यूरोपियन परिवार) की भाषाएँ दुनिया की लगभग आधी आबादी के द्वारा बोली जाती है। जिस प्रकार पूरी दुनिया में विभिन्न सभ्यता-संस्कृति का उदय एवं विकास हुआ, ठीक उसी प्रकार भारत में भी विभिन्न भाषाओं का उदय एवं विकास हुआ। आर्यों ने प्राचीन काल में वेद, पुराण, उपनिषद्, महाभारत आदि रचनाओं के माध्यम संस्कृत भाषा को प्रतिष्ठित किया। आर्यों ने संस्कृत भाषा को ज्ञान-विज्ञान की भाषा बनाया। आगे चलकर पालि, प्राकृत जैसी भाषाएँ जनभाषा के रूप में प्रचलित हुई। भारत में धर्म प्रचारकों तथा विदेशी आक्रमणकारियों का जब हस्तक्षेप बढ़ा तो वे भी अपनी भाषा फारसी, उर्दू तथा अंग्रेजी को यहाँ लाने एवं प्रतिष्ठित करने में सफल रहे, जिसकी वजह से बहुभाषा का आगमन हुआ। आगे चलकर भारत में ब्रिटिश हुकूमत आने के बाद धीरे-धीरे भारतीय भाषाओं के साथ अंग्रेजी भाषा का प्रयोग होने लगा। इसका परिणाम यह हुआ कि अंग्रेजी का राजकाज की भाषा के साथ-साथ ज्ञान-विज्ञान या उच्च शिक्षा (खासकर विज्ञान विषयों) की भाषा बन गया। कई युगों से भारत में विभिन्न भाषाओं का आधार इतना मजबूत था कि स्वतंत्रता प्राप्त होने से पहले ही भाषा एवं संस्कृति के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की माँग होने लगी थी। 1 अक्टूबर, 1953 में भाषा के आधार पर ही सर्वप्रथम आन्ध्रप्रदेश ने कर्नूल को अपनी राजधानी के साथ राज्य का दर्जा हासिल किया। पुनः राज्य पुनर्गठन कानून, 1956 (States Reorganisation Act, 1956) के पारित होने से राज्यों या केन्द्रशासित राज्यों की सीमाओं को तय करने वाला सबसे बड़ा कारक भाषा बन गया। इसके पीछे सबसे बड़ा तर्क दिया गया था कि एक भाषा बोलने वाले लोगों को एक प्रशासनिक इकाई के तहत रखा जाएगा तो कामकाज (राजकाज) में सुविधा होगी। हालांकि इसके बाद भी भारत में भाषा संबंधी समस्याएं बढ़ती रही, फलस्वरूप भारत सरकार भाषिक समस्याओं के निदान के लिए कभी 'द्विभाषा सूत्र' तथा 'त्रिभाषा सूत्र' या 'बहुभाषा सूत्र' को प्रस्तुत किया गया। फिर भी कोठारी आयोग (1964-66) या नई शिक्षा नीति (1986) की बात करें तो शिक्षा आयोगों ने भारत के बहुभाषिक संरचना को मजबूत करने की अनुशंसा करते हुए 'त्रिभाषा सूत्र' का समर्थन किया। राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की रूपरेखा 2005 (NCF, 2005) में भी भाषा पाठ्यचर्या की चर्चा करते हुए स्वीकार किया गया है कि द्विभाषिकता या बहुभाषिकता से निश्चित संज्ञानात्मक लाभ होते हैं। औपचारिक शिक्षा में सबसे पहले वुड के घोषणा पत्र (सन् 1854) में अन्य भाषा (बांग्ला, संस्कृत, अरबी, फारसी) को पाठ्यक्रम में स्थान दिया गया है। इस घोषणा पत्र में प्राथमिक शिक्षा का माध्यम देशी व अंग्रेजी भाषा तथा उच्च शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी को ही बनाया गया है। भारतीय शिक्षा आयोग-1882 (हण्टर कमीशन), कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग-1917 (सैडलर आयोग), वर्धा शिक्षा योजना-1937 (बुनियादी शिक्षा), खेर समिति (1938-39), विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग (राधाकृष्णन आयोग 1948-49), माध्यमिक शिक्षा आयोग- 1952-53 (मुदालियर आयोग), राष्ट्रीय शिक्षा आयोग (1964-66) कोठारी कमीशन, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1979, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986, राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की रूपरेखा 2005 (NCF, 2005), राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 आदि जैसे आयोगों व नीतियों ने  पाठ्यचर्या में भाषा पर चर्चा करते हुए द्विभाषिकता या बहुभाषिकता को संज्ञानात्मक लाभ के नजरिए से देखा है। “2006 में भी बहुभाषावाद को grassroot level के साथ व्यक्ति की मातृभाषा के साथ शुरू करने को कहा गया।”3 भारतीय संविधान के अनुच्छेद के माध्यम से भारत की भाषागत स्थितियों, चुनौतियों तथा अवसरों को संबोधित करने का प्रयास किया गया है। भारत की भाषायी स्थिति को देखते हुए संविधान के अनुच्छेद 29 (1) के तहत भारत में हरेक नागरिक को अपनी मातृभाषा के अध्ययन व संरक्षण का मौलिक अधिकार प्रदान किया गया है। अनुच्छेद 350ए के अनुसार राज्य व स्थानीय निकायों को स्थानीय भाषा में भाषाई अल्पसंख्यकों को प्राथमिक शिक्षा उनकी मातृभाषा में उपलब्ध कराने का जिम्मा सौंपा गया है। भारत में अंग्रेजी भाषा के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में संवैधानिक मान्यता मिली। संविधान की आठवीं अनुसूची में निम्नलिखित 22 भाषाएँ शामिल हैं: असमिया, बांग्ला, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, ओडिया, पंजाबी, संस्कृत, सिंधी, तमिल, तेलुगू, उर्दू, बोडो, संथाली, मैथिली और डोगरी। भारतीय संविधान ने विभिन्न जाति, विभिन्न भाषा, विभिन्न धर्म तथा विभिन्न संस्कृति की अस्मिताओं के सम्मान को स्वस्थ लोकतन्त्र की बुनियादी जरूरत के रूप में स्वीकारा है, जिसकी वजह से आज हम भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में इतनी सारी भाषाओं को संवैधानिक दर्जा प्राप्त करते हुए देखते हैं। बहुभाषिकता को वैश्विक संदर्भ में विचार-विमर्श करने पर पश्चिमी देशों का जिक्र होना स्वाभाविक प्रतीत होता है। पश्चिमी देशों की तुलना में भारत में बहुभाषिकता के संदर्भ व मायने भिन्न है। पश्चिमी देशों में पाठ्यचर्या के तहत बहुभाषिकता की जरूरत एकभाषी देशों की जरूरतों को मद्देनजर रखकर विकसित की गई। वहीं भारत में बहुभाषिक एवं बहुसांस्कृतिक देश है, इन्हीं बिन्दुओं को केंद्र में रखकर अध्ययन-अध्यापन में बहुभाषिकता की अवधारणा को विकसित किया गया।

बहुभाषिकता की प्रकृति व विशेषताएँ (Nature & Characteristics of Multilingualism)

                          बहुभाषिता और विविधता मानव अस्तित्व का एक अंग है। बहुभाषिकता उत्‍कृष्‍ठ सामाजिक गठन, शिक्षा के ऊर्ध्वाधर विकास और सामाजिक असमानताओं को समझने की कुंजी है। बहुभाषिकता की स्थिति प्रायः व्यक्ति, राष्ट्र एवं समाज के संदर्भ में की जाती है। जन्म लेने के बाद एक बालक बोलना सीखता है, तब वह अन्य लोगों के सम्पर्क में आता है और उनके साथ अंतःक्रिया करने लगता है। उसमें बहुभाषिकता और भाषा की विविधता का गुण धीरे-धीरे विकसित होने लगती है। जब एक बालक में किसी एक भाषा के कौशलों को विकसित कर दिया जाता है तो इन कौशलों को दूसरी भाषाओं में भी स्थानांतरित किया जा सकता है। इसलिए एक भाषा सीखने के बाद अन्य भाषाएँ सीखना आसाना हो जाता है। बहुभाषिकता विभिन्न प्रकार के ज्ञान को सीखने में सहायता प्रदान करता है। एक बालक बहुभाषिकता में अधिक निपुणता प्राप्त कर सकता है। किसी भी व्यक्ति के लिए भाषायी पहचान उसकी आधारभूत पहचान मानी जाती है, क्योंकि उसकी कई पहचान भाषाई पहचान के माध्यम से समझी या पारखी जा सकती है। व्यक्ति अपने खान-पान, रहन-सहन, पोशाक-श्रृंगार, पूजा-पाठ, विवाहों आदि जैसे रीति-रिवाजों को अपनी पहचान के रूप में जीवंत रखते हैं। ठीक इसी प्रकार एक व्यक्ति अपनी बहुभाषिकता को अपनी भाषायी पहचान के रूप में जीवित रखने का प्रयास करता है।
                       किसी भी राष्ट्र के लिए बहुभाषिकता बहुमूल्य संपत्ति माना जाता है। बहुत लंबे समय से बहुभाषिकता को लेकर यह अपवाद चली आ रही थी कि बहुभाषिकता का संज्ञानात्मक और शैक्षिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। लेकिन कई शोध व अनुसंधान के माध्यम से यह पता चला है कि भारत सहित विश्वभर के देशों में बहुभाषिक छात्र-छात्राएं अपवाद नहीं बल्कि आदर्श हैं। बहुभाषिकता के माध्यम से छात्र-छात्राओं का संज्ञानात्मकता, सामाजिकता, चिन्तनशीलता व बौद्धिक क्षमताओं का विकास सहज ही किया जा सकता है। जिस प्रकार जैविक विविधता किसी जंगल को उन्नत बनाती है, उसी प्रकार बहुभाषिकता भी किसी व्यक्ति या समुदाय की बौद्धिक शक्तियों को बढ़ाती है। “भाषाई परिस्थिति में संतुलन बना रहे इस हेतु शिक्षकों को विषेशरूप से बहुभाषिकता समझ होनी चाहिए और विद्यालय में विद्यार्थियों द्वारा किसी भी भाषा के प्रयोग के प्रति उदार होना चाहिए।”4 इस प्रकार बहुभाषिकता ज्ञान, अध्यापन और शिक्षण का अद्भुत साधन है। संज्ञानात्मक विकास और शैक्षिक उपलब्धियों में बहुभाषिकता एक सकारात्मक भूमिका अदा करती है। भारत में बहुभाषावाद ऐतिहासिक संपत्ति है और विविध संस्कृतियों का प्रतिबिंब है। बहुभाषिकता बनाए रखने और इसकी प्रकृति को समझने में एक स्कूल या शिक्षण संस्थानों की विशिष्ट भूमिका होती है। शिक्षा में बहुभाषिकता सांस्कृतिक जागरूकता का निर्माण करती है और रचनात्मकता को बढ़ावा देती है। बहुभाषी छात्र-छात्राएं न केवल कुछ भाषाओं पर नियंत्रण रखते हैं बल्कि वे कहीं अधिक शैक्षिक रूप से सृजनात्मक होते हैं। बहुभाषी बच्चों में अन्यों की अपेक्षा अधिक सामाजिक सहिष्णुता पायी जाती है। बहुभाषी होने के कारण वे विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों में अपना समायोजन कर पाते हैं। इसलिए स्कूली पाठ्यक्रम में बहुभाषिता को विकसित करना अतिआवश्यक प्रतीत होता है। 
                           बहुभाषिकता और बहुसंस्कृतिवाद सम्प्रत्यय लगभग एक ही वस्तुस्थिति को चित्रित करता है। विभिन्न भाषाओं का प्रयोग सांस्कृतिक आदान-प्रदान का प्रमुख माध्यम है। विद्यालय में विविध प्रकार की भाषाओं के साथ कई छात्र-छात्राएं आते हैं और उनकी इन भाषाओं से जुड़ी अलग-अलग संस्कृतियां भी होती है। इससे आपस में कई प्रकार की संस्कृतियों का आदान-प्रदान होता है। जब कभी हम बहुभाषिकता की बात करते हैं तो हम बहुसंस्कृतिवाद को अलग नहीं कर सकते हैं। किसी भी संस्कृति को समझने के लिए उस संस्कृति विशेष की भाषा को समझना अति आवश्यक है क्योंकि भाषा किसी भी संस्कृति का एक विशेष और अनिवार्य अंग होता है। बहुभाषिक होने और बहुसांस्कृतिक क्षमता होने से ऐसे शब्दों और वाक्यांशों को चयन करने में सहजता मिलती है जो स्थिति का सबसे अच्छा वर्णन करते हैं, जो दोनों भाषाओं और संस्कृतियों के मिश्रित संदर्भ के बिना संभव नहीं होगा। विभिन्न परिस्थितियों में संस्कृति को समझने और उपयोग करने की क्षमता बहुभाषी समाज में व्यक्तियों के लिए एक मूल्यवान कौशल है। बहुभाषिकता अपने आप में बहुसांस्कृतिकता को आलिप्त करती है अर्थात् बहुभाषिकता में बहुसंस्कृतिवाद निहित हैं। अतः शिक्षा में बहुभाषिकता छात्र-छात्राओं में सांस्कृतिक जागरूकता का निर्माण करती है और रचनात्मकता को बढ़ावा देती है।

बहुभाषिकता के लाभ (Advantages of Multilingualism)

                  बहुभाषिक शिक्षा  अध्यापक शिक्षा में एक बढ़ता हुआ कदम है। बहुभाषिकता एक प्राकृतिक शक्ति है जो प्रत्येक व्यक्ति में सामान्यत: देखी जा सकती है। एक से अधिक भाषाओं को जानने-समझने की योग्यता मनुष्य की जन्मजात क्षमता होती है। बहुभाषिकता और विभिन्नता मानव अस्तित्व का एक भाग है। बहुभाषिकता अलग-अलग भाषाओं का सह-अस्तित्व ज्ञान है जबकि बहुभाषावाद कई भाषाओं का परस्पर ज्ञान है। कई भाषाओं के ज्ञान के साथ-साथ विभिन्न संस्कृतियों की समझ बेहतर संचार कौशल की अनुमति देता है। बहुभाषिकता शिक्षा के लाभ का एक बढ़ता हुआ कदम है जिसे निम्नलिखित रूप में देख सकते हैं - 
1. छात्र-छात्राओं के सर्वांगीण विकास में 'बहुभाषिकता' सकारात्मक प्रभाव डालती है। अभिप्रेरणा की दृष्टि से बहुभाषिकता उपकरणवादी एवं समग्रतावादी रूप में परिभाषित है।
2. बहुभाषिकता छात्र-छात्राओं में संज्ञानात्मक वृद्धि, विस्तृत चिंतन और बौद्धिक उपलब्धियों के   स्तर को बढ़ाती है तथा मानसिक योग्यता को सन्तुलित बनाए रखने में सहयोग करती है।
3. शिक्षार्थियों में बहुभाषिकता आत्मविश्वास, तार्किक क्षमता, विश्लेषण क्षमता तथा सकारात्मक दृष्टिकोण पैदा करती है।
4. बहुभाषिकता बच्चों में न केवल बहुभाषाओं पर नियंत्रण रखना सिखाती है बल्कि कहीं अधिक शैक्षिक रूप से सृजनात्मक बनने में भी विशेष भूमिका अदा करती है। बहुभाषी बच्चों में अपसारी चिंतन पाया जाता है।
5. बहुभाषिकता ज्ञान क्षेत्र का, कार्य क्षेत्र का, सम्पर्क क्षेत्र का तथा विभिन्न क्षेत्रों की संभावनाओं का दायरा बढ़ाती है।
6. शिक्षार्थियों के स्मृति, बोध व चिंतन स्तर को विकसित करने में बहुभाषिकता सहयोग करती है। बहुभाषिकता मस्तिष्क और सोचने-विचारने की क्षमता को और अधिक लचीला बना देती है।
7. बहुभाषी बच्चों में अन्य छात्र-छात्राओं की अपेक्षा अधिक सामाजिक सहिष्णुता पायी जाती है। बहुभाषिक होने से भाषा को लेकर उत्पन्न होने वाले तनाव या संघर्ष से भी बचा जा सकता है। 
8. बहुभाषिकता शिक्षार्थियों के लिए अनेक प्रकार के रोजगार, व्यापार एवं नौकरियों के उपयुक्त अवसर को पैदा किया है।
9. सामाजिक संरचना के बारे में धारणा, अनगिनत मौलिक एहसास और मुकम्मल समझ को जगाने में बहुभाषिकता सहायक सिद्ध होती है। बहुभाषी होने के कारण वे विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों में समायोजन करने की क्षमता अधिक होती है। 
10. वैश्वीकृत दुनिया में बहुभाषिकता अधिक प्रतिस्पर्धी तथा अत्याधुनिक होने की क्षमताओं का विकास करती है।
11. बहुभाषिकता संस्कृति के उदारीकरण / फैलाव/ बाजारवाद व वैश्वीकरण की आवश्यकता को पूरा करने में सहायक होती है।
12. बहुभाषिक व्यक्तियों की अन्तःक्रिया अधिक से अधिक व्यक्तियों से होती है। बहुभाषिक व्यक्ति अधिक से अधिक व्यक्तियों को बातचीत से सन्तुष्ट कर पाने की क्षमता हो सकती है।
13. बहुभाषिकता विद्यार्थियों के संज्ञानात्मक, भावात्मक तथा क्रियात्मक पक्षों को विकसित करने में सहायता करती है।
14. अन्य भाषा को सीखने में सरलता होती है। अन्य भाषाओं की सूचनाओं व अन्य तथ्यों को जानने में मदद बहुभाषिकता करती है, साथ ही अन्य भाषा और साहित्य का रसास्वादन करने का अवसर प्रदान करती है।
15. विज्ञान और तकनीकी के विकास एवं सूचना-संचार के साधनों में बहुभाषिकता की अग्रणी भूमिका होती है।
संभवत: शिक्षा एक-समतावादी सामाजिक और आर्थिक स्तरीकरण में सबसे मौलिक तत्व है। भाषा, भाषा के उपयोग, उत्‍कृष्‍ठ सामाजिक गठन और शिक्षा के ऊर्ध्वाधर विकास, असमान अवसरों और अधिक सामाजिक और आर्थिक असमानता के बीच पारस्परिक रूप से मजबूत संबंधों को समझने की कुंजी है।

निष्कर्ष:
               दूसरे देशों की तुलना में भारत में बहुभाषिकता के संदर्भ व मायने भिन्न है। पश्चिमी देशों में पाठ्यचर्या के तहत बहुभाषिकता की जरूरत एकभाषी देशों की जरूरतों को मद्देनजर रखकर विकसित की गई। वहीं भारत में बहुभाषिक एवं बहुसांस्कृतिक देश है, इन्हीं बिन्दुओं को केंद्र में रखकर ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’ में अध्यापक शिक्षा हेतु बहुभाषिकता को प्रतिष्ठापित करने का प्रयास किया गया।

संदर्भ ग्रंथ: 
2. पाठ्यक्रम में भाषा, वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय, कोटा, बीएड – 103, उत्पादन वर्ष - 2015, पृष्ठ संख्या - 57
3. सिंगल उषा,अंजू (2019), पाठ्यचर्या में भाषा,रोहतक, ठाकुर पब्लिशर्स।
4. तिवारी कुमार प्रवीण(सं) (2017),पाठ्यचर्या में व्याप्त भाषा, उत्तराखंड, उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय।

सहायक संदर्भ ग्रंथ:
1. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, भारत सरकार।


आनन्द दास मूलत: भारत के हिन्दीभाषी प्रदेश से हैं पर उनका जन्म कोलकाता में हुआ। उन्होंने प्रारम्भिक शिक्षा राष्ट्रभाषा विद्यालय, सर्वोदय विद्यालय तथा एस. बी. मॉडर्न हाई स्कूल से प्राप्त की हैं। उन्होंने कोलकाता के ऐतिहासिक और विश्व विख्यात प्रेसिडेंसी कॉलेज (प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय) से हिन्दी में स्नातक की हैं। उन्होंने हिन्दी में स्नातकोत्तर कलकत्ता विश्वविद्यालय से तथा शिक्षाशास्त्र में स्नातकोत्तर सी.डी.एल.यू.,सिरसा से की हैं। इसके अलावा यू.जी.सी. नेट(हिंदी) और स्नातकोत्तर डिप्लोमा (अनुवाद) इग्नू से की हैं। कोलकाता के ए.जे.सी. बोस कॉलेज (बी.एड. विभाग) में अतिथि प्रवक्ता के तौर पर कार्य कर चुके हैं। पश्चिमबंग प्राथमिक शिक्षा पर्षद द्वारा संचालित प्रशिक्षण (प्राथमिक कार्यरत शिक्षकों के लिए) कार्यक्रम में बतौर प्रशिक्षक भी कार्य कर चुके हैं। वर्तमान में श्री रामकृष्ण बी. टी. कॉलेज (Govt. aided.), दार्जिलिंग में सहायक प्राध्यापक हैं। आनन्द दास की हिन्दी में तीन संपादित पुस्तक 'हिंदी कविता - राष्ट्रीय चेतना एवं संस्कृति', 'राष्ट्रवाद और हिंदी साहित्य', ‘हरिऔध साहित्य के विविध आयाम’ तथा अन्य कई पुस्तकों में शोध लेख प्रकाशित है। साथ ही हिन्दी के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में आनन्द दास की रचनाएँ निरन्तर प्रकाशित होती हैं।
संपर्क: 4 मुरारी पुकुर लेन, कोलकाता-700067 
ईमेल: anandpcdas@gmail.com
चलभाष: 9804551685, 9382918401.

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