नगरी-नगरी, द्वारे-द्वारे...!

प्रकाश मनु
धरती की गंध से सराबोर यात्रा-वृत्तांत

यात्रा-वृत्तांत साहित्य की बड़ी जीवंत विधा है। खासी जानदार विधा, जिसमें पहाड़ों की गूँज, नदियों की कल-कल और पक्षियों की मीठी चह-चह की तरह जीवन और जीवन-रस छलछलाता नजर आता है। उनमें हमारा समय है तो मानव आस्था की सुदीर्घ परंपरा भी। हजारों बरस पुरानी सभ्यता, संस्कृति है तो आज का जीवन यथार्थ भी। और साथ ही प्रेम और संवेदना का वह सुरीला परस भी, जिससे हमारे जीने के मानी हैं, और हमारा मनुष्य होना चरितार्थ होता है।
यही वजह है कि यात्रा-वृत्तांतों का जादू देर तक मन में रहता है, और वे एक दुनिया से दूसरी दुनिया में हमें ले जाते हैं। कोई अच्छा यात्रा-वृत्तांत न सिर्फ हमें पूरी तरह अपने में लीन कर देता है, बल्कि उसे पढ़ने पर, रोजमर्रा के जीवन की जड़ता और एकरसता टूटती है, और हम बिना पंखों के भी उड़ते हुए, एक अपरिचित दुनिया में जा पहुँचते हैं, जमाने के नए-नए रंगों से परचते हैं। 
फिर यात्रा-वृत्तांत एक तरह से कालदेवता की अभ्यर्थना भी हैं, जो पल में हमें कल से आज और आज से कल तक हमारों बरसों की यात्रा कराके, एकदम ताजा और पुनर्नवा कर देते हैं। उनमें कविता की उड़ान है तो कहानी का रस और आत्म-संस्मरणों की सी मधुराई भी। इसलिए यात्रा-वृत्तांत अगर रमकर लिखे जाएँ तो वे किसी रोचक किस्से की तरह आपको अपने साथ बहा न ले जाएँ, ऐसा हो नहीं सकता। उनमें इतिहास भी है, भूगोल भी, और एक ऐसा आत्मिक आनंद भी, जो आपको सीमित परिधियों से बाहर आकर सृष्टि के महाकार से एकमेक होने के लिए पुकारता सा जान पड़ता है। 
शायद यही कारण है कि अच्छे यात्रा-वृत्तांत पढ़कर मुझे हमेशा एक पवित्र गंगास्नान की सी अनुभूति होती है, जिससे मन कुछ और निर्मल हो जाता है, चेतना पर पड़े हुए मैले आवरण हट जाते हैं, और भीतर आत्मा में एक दीया सा जल उठता है। 
प्रेमपाल शर्मा
पर अफसोस, हिंदी में अच्छे यात्रा-वृत्तांत बहुत अधिक नहीं लिखे गए। साहित्य की यह जीवंत विधा प्रारंभ से ही कुछ उपेक्षित सी रही है। ऐसे बड़े लेखक कम ही हैं, जिनके यात्रा-वृत्तांतों में रस है, जीवन है, सुंदर भावों की अंतःसलिला, सौंदर्य और आस्था का औदात्य और यथार्थ की जमीन भी है। ऐसे में घुमंतू यायावर देवेंद्र सत्यार्थी के हदय रस से सराबोर कर देने वाले संस्मरण जरूर याद आते हैं, और यह भी कि वे भाव और अनुभूति रस के सहारे हमें किस ऊँचाई पर ले जाते हैं। महापंडित राहुल सांकृत्यायन, काका कालेलकर, विष्णु प्रभाकर और अज्ञेय के सुंदर यात्रा-वृत्तांतों में भी हमें यही पुकार और अनुभूति रस नजर आता है। 
मैंने रामदरश जी, विश्वनाथप्रसाद तिवारी और गोविंद मिश्र के भी बहुत भावमय यात्रा-वृत्तांत पढ़े हैं, जो मन में एक लहर सी पैदा कर देते हैं, और उन्हें पढ़कर हम एक व्यक्तित्वांतर से गुजरते हैं। पिछले कुछ अरसे में लिखे गए प्रताप सहगल और सुरेश्वर के संस्मरण भी मुझे प्रिय हैं, जिनमें निजता और अंतरंगता है। प्रताप सहगल का सैलानी भाव और सुरेश्वर की प्राकृतिक सौंदर्य और भाँति-भाँति के परिंदों के बीच रहने और उन्हें अपने कैमरे में उतारने की दीवानगी मुझे मोहती है। 
इधर अखबारी लेखों की तरह हड़बड़ी में लिखे जा रहे बहुतेरे यात्रा-वृत्तांत, जिनमें यात्रा में आने-जाने के ब्योरों के साथ स्थानों के स्थूल विवरण ज्यादा होते हैं, मुझे नहीं रुचते। ऐसे यात्रा-वृत्तांतों में न लेखक अपनी देह और निजत्व की परिधियों से बाहर आ पाता है, और न पाठक ही। पर कहना न होगा कि अभी हाल में इस क्षेत्र में कुछ नई खिड़कियाँ और गवाक्ष खुले हैं। इन नए और ताजगी से भरे लेखकों में प्रेमपाल शर्मा का नाम सबसे पहले मेरे होंठों पर आता है। 
पिछले कुछ बरसों में प्रेमपाल जी के यात्रा-वृत्तांत मेरे मन में एक खास जगह बनाते जा रहे हैं, और अब तो पाठकों को भावमग्न कर देने वाले उनके यात्रा-वृत्तांतों की पुस्तक ‘नगरी-नगरी, द्वारे-द्वारे’ प्रभात प्रकाशन से बड़े ही सुंदर कलेवर में छप चुकी है। ऐसे में उस पर दो शब्द लिखना मेरे लिए किसी बड़े सुख से कम नहीं।
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यहाँ प्रेमपाल जी के बारे में दो बातें कहने का मन है। आज से कोई नौ-दस बरस पहले बाऊजी (स्व. श्यामसुंदर जी) और भाई प्रभात जी के आग्रह पर मैंने साहित्यिक पत्रिका ‘साहित्य अमृत’ के संपादन का दायित्व सँभाला। मैं संयुक्त संपादक ही था, पर पत्रिका के आगामी अंकों की योजना बनाने की पूरी स्वतंत्रता प्रभात जी ने मुझे दी थी। मन में बहुत सारे सपने थे कि एक साहित्यिक पत्रिका को क्या हम लोकप्रियता के शिखर पर नहीं ले जा सकते। सामग्री साहित्यिक ही हो, पर हम पाठकों की रुचि और पठनीयता का भी खयाल रखें, तो क्या कुछ नहीं हो सकता! 
इस लिहाज से हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकारों के साथ ही नए लेखकों की भी चुनिंदा कविता, कहानी और अच्छे लेखों को पत्रिका में सम्मानपूर्ण स्थान मिला। हर अंक को एक विशेषांक के रूप में देने की योजना बनी, और उसी के अनुरूप लेख लिखवाए भी गए। बाकी सामग्री का संयोजन भी वैसा ही। पर इसके साथ ही हिंदी के बड़े साहित्यिकों के रोचक संस्मरण और यात्रा-वृत्तांत काफी छापे गए और पाठकों ने भी बड़ी उदारता से उन्हें सराहा। ‘साहित्य अमृत’ का जो एक आदर्श रूप मेरे मन में था, वह अब साकार हो रहा था।
उन्हीं दिनों प्रेमपाल जी का एक बड़ा ही सुंदर और आत्मीयता से विभोर कर देने वाला यात्रा-वर्णन पढ़ने को मिला। वे हाल में ही जगन्नाथ पुरी की यात्रा करके लौटे थे। उन्होंने पूरी तल्लीनता के साथ अपनी इस सुखद यात्रा के बारे में लिखा था। मैं कभी पुरी गया नहीं। पर प्रेमपाल जी का वह सुंदर यात्रा-वर्णन पढ़ते हुए लगा, मैं भी उनके साथ-साथ पुरी की यात्रा कर रहा हूँ। एक ऐसी भावमय यात्रा, जिससे हमारा अंतःकरण उदार और व्यापक होता है, और मनुष्य होना सफल जान पड़ता है। इस यात्रा-वृत्तांत की खास बात यह थी कि इसमें पुरी यात्रा के एक-एक लम्हे का जिक्र था। यहाँ तक कि रास्ते में जीवन-जगत् की जो-जो रम्य झाँकियाँ उन्होंने देखीं, उनका भी उसी रस और संवेदना के साथ जिक्र किया गया था। इसमें यात्रा के दौरान अपने सहयोगियों के साथ हुई मनोरम वार्ताएँ और उनकी मनोदशाओं का तो वर्णन था ही, साथ ही रास्ते में जो मामूली लोग मिले, उनके भी बड़े सजीव, हाव-भावपूर्ण पोर्ट्रेट जुड़ते गए थे। 
इसे पढ़कर मुझे किसी कहानी जैसे रस की अनुभूति हुई, जिसमें कथाकार अपने जिए हुए एक-एक क्षण का एकदम लीन होकर वर्णन करता है। प्रस्थान-बिंदु से लेकर यात्रा की समाप्ति तक लेखक हमारे साथ रहता है। कहीं एक क्षण के लिए भी उसका साथ नहीं छूटता। जाहिर है, इससे यात्रा-वृत्तांतों की विश्वसनीयता पर पाठकों को भरोसा होने लगता है। साथ ही एक अदितीय अनुभव की तरह वे उसे हमेशा के लिए अपने मन में सँजोकर रख लेते हैं।
कहीं-कहीं भाषा और अभिव्यक्ति की अनगढ़ता के बावजूद यह एक बेमिसाल यात्रा-वृत्तांत था। मैंने उसे हलका सा टच करके पत्रिका में छापा, तो उस पर सराहना करने वाले पत्रों का अंबार लग गया। प्रेमपाल जी के और संस्मरण पढ़ने की लालसा मन में थी। बरसों पहले वे अयोध्या यात्रा पर गए थे। उसकी स्मृतियाँ उनके मन में थीं। मेरे आग्रह पर उन्होंने उसी तल्लीनता और भावमयता के साथ अपनी अयोध्या-यात्रा पर लिखा। वह भी इतना रस से सराबोर करने वाला यात्रा-वृत्तांत था कि पढ़ते हुए मैं विभोर हो गया। लगा, अरे प्रेमपाल जी में तो एक छिपी हुई प्रतिभा है, उसे उभारना चाहिए। 
मैंने आगह किया, “प्रेमपाल जी, आप यात्रा-वृत्तांत बड़े सुंदर लिखते हैं। आप ऐसे और भी सुंदर यात्रा-वर्णन लिखिए, और जो कुछ भी लिखें वह मुझे पढ़ने को अवश्य दें।” और प्रेमपाल जी ने मुझे निराश नहीं किया।

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कुछ समय बाद अस्वस्थता के कारण मैं ‘साहित्य अमृत’ के संपादन दाय से मुक्त हुआ, पर प्रेमपाल जी और उनके यात्रा-वृत्तांतों का साथ अनवरत बना रहा और आज भी बना हुआ है। आज भी वे कहीं यात्रा पर जाते हैं और लौटकर वहाँ के बारे में लिखते हैं तो उसकी एक प्रति मुझे भेजना नहीं भूलते। वह कब छपता है, कब नहीं, यह अलग बात है, पर मेरे मन और स्मृतियों के विशाल पन्ने पर तो वह तत्काल छप ही जाता है।
प्रेमपाल जी के प्रायः सभी संस्मरण पहलेपहल मुझे पढ़ने को मिले, इसे मैं अपना सौभाग्य ही कहूँगा। इसलिए कि उनके संस्मरण पढ़ते हुए, एक दुर्लभ रस की अनुभूति होती है, जिससे मन निर्मल और आत्मा निमज्जित होती है। वे सच ही भावमग्न कर देने वाले संस्मरण हैं, जो बहुत सी सच्चे अंतःकरण से लिखे गए हैं। और इसीलिए, उन्हें पढ़ते हुए मन में सद्भावनाओं एक दीया सा जल उठता है।
फिर प्रेमपाल जी के यात्रा-वृत्तांत इसलिए भी मुझे मोहते हैं कि वे बनावटी आभिजात्य से मन को आतंकित नहीं करते, और अमूर्त्त भी नहीं हैं। उनमें हर क्षण जीवन छलछलाता है। उनमें लोग हैं, बल्कि लोगों की बड़ी ही सघन उपस्थिति। इनमें ज्यादातर एकदम मामूली लोग, पर उनके हृदय बड़े हैं, और उनकी भावनाओं की दुनिया इतनी निष्कलुष कि उसके निकट जाते ही आप मुग्ध हो उठते हैं। 
प्रेमपाल जी जिन साथियों के साथ यात्रा पर निकलते हैं, उनकी मन, भाव और वचन से निरंतर उपस्थिति इन यात्रा-वृत्तांतों में महसूस होती है, और उनके सुख-दुख संवेदन की एक समांतर कथा बीच-बीच में पाठकों को मोहती चलती है। फिर जिस दर्शनीय स्थल पर वे जाते हैं, उसकी प्रामाणिक जानकारी भी बड़े मनोयोग से वे जुटाते हैं। उसे जब वे अपने यात्रा-अनुभवों के साथ जोड़कर प्रस्तुत करते हैं तो लगता है, सचमुच हमने वहाँ की दैहिक, मानसिक, आत्मिक यात्रा कर ली। उनके शब्दों में उभरा वह सुरम्य यात्रा-स्थल अपनी पूरी प्राकृतिक सुंदरता, भव्यता और ऐतिहासिक गौरव के साथ हमारी स्मृतियों में बस जाता है।
इस लिहाज से, अपनी पुरी यात्रा के दौरान प्रेमपाल जी ने उड़ीसा के आम जन-जीवन जो आँखों देखा वर्णन किया, उसकी एक झलक यहाँ मैं पाठकों के आगे रखना चाहूंगा—
“प्रात: जब जागे तो झाबुआ रोड स्टेशन था, मौसम बड़ा सुहावना हो रहा था, हलकी बरसात हुई थी। रेलमार्ग के दोनों ओर नारियल के वृक्ष अपने मस्तक हिला-हिलाकर मानो हमारा स्वागत कर रहे थे। उड़ीसा की न्यारी छवि दिखाई देने लगी थी। रास्ते के दोनों ओर चार-छह झोंपड़ियों वाले गाँव। निकट ही नारियल और केले के वृक्ष। साथ ही पानी का पोखरा, जिसमें स्नान-मज्जन करते हुए स्त्री-पुरुष। उड़ीसा के रास्ते में कहीं कोई कुआँ या चापाकाल दिखाई नहीं दिया। ये छोटे तालाब ही इन लोगों के पानी की सब जरूरतों को पूरा करते हैं। गरीबी के साथ सादगी के दर्शन, प्रकृति के पहलू में निवास करते आडंबरहीन लोग।”
अब पुरी तीर्थ का अंदरूनी रूप देखें, जहाँ सदियों से चलते आए उसके कुशल प्रबंधन और ठेठ पारंपरिक व्यवस्था पर हमारा ध्यान जाए बिना नहीं रहता--
“हमारे पंडा सूरज पतवारियाजी, जो पहले मठ की सेवा में थे, ने बताया कि भगवान् जगन्नाथ का धाम ही एक ऐसा धाम है, जहाँ भगवान् को छह बार भोग लगता है। लगभग साठ क्विंटल चावल रोज पकता है। मंदिर की पाकशाला भी दर्शनीय है। जिसमें एक चूल्हे के ऊपर एक साथ सात मटकों में एक के ऊपर एक मटका रखकर चावल पकाया जाता है। इस रसोई में नौ चूल्हे जलते हैं। छप्पन भोग में लड्डू, खाजा, खीर, दाल-चावल, मिश्रित सब्जी, पुआ, पूरी, पकौड़ी आदि सभी प्रकार का भोजन शामिल होता है। इस मंदिर में पाँच सौ से अध्कि पुजारी हैं, जो भगवान् जगन्नाथ के शृंगार, आरती, भोग के कार्य को देखते हैं, परंतु जगन्नाथ यात्रा के समय इनकी संख्या हजारों तक पहुँच जाती है।”
प्रेमपाल जी की अयोध्या यात्रा का यह अनुभूति क्षण तो मानो हर किसी को एक ऐसी भाव-समाधि में ले जाता है, जहाँ हमें देह का कुछ बोध नहीं रहता—
“अब हम राम जन्मभूमि पर पहुँच गए हैं। मन में हर्षातिरेक की तरंगें उठ रही हैं। मन बार-बार पुलकित और रोमांचित हो रहा है। अहा! यही वह स्थान है, जहाँ दीनदयाला, कौसल्या हितकारी ने धरती को पाप के भार से मुक्त करने के लिए जन्म लिया। परंतु हाय रे अभाग्य! विवादित स्थल होने के कारण यहाँ मुख्य द्वार पर ताला पड़ा हुआ है। (इसे बाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने खुलवाया।) जन्मभूमि के बाहर अखंड कीर्तन चल रहा है। यात्री रामलला के सम्मान में मत्था टेक रहे हैं। हमने भी दंडवत् किया, थोड़ा कीर्तन में बैठ प्रभु का नाम-स्मरण किया।”
अब प्रेमपाल जी के शब्दों में बिछलती द्वारकाधीश भगवान जी की यह भव्य और सम्मोहक झाँकी भी देख लीजिए—
“हम लोग दक्षिण की ओर से दर्शनार्थ पंक्तिबद्ध हो गए हैं। द्वारकाधीश भगवान् की भव्य-दिव्य झाँकी नेत्रों के सामने है। कतारबद्ध दर्शनार्थी द्वारकाधीश की जय-जयकार कर रहे हैं। दर्शन करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। हम लोग किनारे की पहली पंक्ति में हैं। समय जैसे ठहर गया है। अपनी चार भुजाओं में शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए द्वारकानाथ की अलौकिक छवि में हम अपनी सुध-बुध खो बैठे हैं। शरीर पुलकित हो रहा है, बार-बार रोमांच हो आता है। दर्शन की प्यास शांत नहीं हो रही है, नेत्र प्रभु के आकर्षण में बँध गए हैं। मन की स्थिति विचित्र हो गई है, कंगाल को जैसे अकूत खजाना मिल गया हो, और वह सब प्रयत्नों के बाद भी उसे सहेज न पा रहा हो। इस दिव्य आनंद का, इस प्राप्य का, इस उपलब्धि का वर्णन वाणी से कर पाना संभव नहीं। यह तो गूँगे का गुड़ है। इसका स्वाद बताया नहीं जा सकता, केवल अनुभव किया जा सकता है।”
सच पूछिए तो हृदय-राग से पूरित ऐसे क्षणों में प्रेमपाल जी के शब्द भी मानो पारदर्शी होने लगते हैं। उनमें भावों का झरना फूट पड़ता है, और पाठक भावमग्न होकर उनके साथ-साथ बहने लगता है।

प्रेमपाल जी ने अधिकतर धार्मिक स्थलों की यात्राएँ की हैं। पर यहाँ यह बताना जरूरी है कि वे परम आस्थावान जरूर हैं, पर अंधविश्वासी कतई नहीं। और कूपमंडूकता तो उनमें दूर-दूर तक नहीं है। इसलिए उनके यात्रा-वृत्तातों में मानो हृदय-रस बहता है, और एक मनुष्य के रूप में वे हमारे मन, भावों और अनुभूतियों को उच्चाशयता देने वाले सुंदर आलेख हैं, जिनमें हृदयराग की प्रमुखता है। जहाँ भी प्रेमपाल जी जाते हैं, वहाँ का प्रकृति सौंदर्य, पर्यावरण, पेड़-पौधे, साफ-सफाई, लोगों का रहन-सहन, जीवन-शैली और आचरण सभी पर उनकी नजर पड़ती है और वे बड़ी रुचि से उनका वर्णन करते हैं। 
शुरू में ही इस बात पर मेरा ध्यान गया कि भाषा पर उनका अधिकार है, और अब तो प्रेमपाल जी की भाषा बहुत मँज गई है। फिर जो कुछ भी लिखें, वे बहुत रमकर लिखते हैं। धार्मिक पर्यटन भारतीय जीवन का बहुत महत्त्वपूर्ण अंग है। इन स्थलों की इतनी सटीक जानकारी और भावपरक व्याख्या एक साथ और कहाँ मिलेगी? इसलिए हजारों लोग उनके इन यात्रा-वर्णनों के मुरीद हैं। नई पीढ़ी के बहुत से लोग इन स्थलों पर धार्मिक आस्था से कम, बल्कि वहाँ की ऐतिहासिकता, प्राचीन स्थापत्य, प्रकृति की मनोहर छवियों और जीवन के विविध रूपों को करीब से देखने और उनका आनंद लेने के लिए जाते हैं। ऐसे लोगों को भी इन यात्रा-वर्णनों से बहुत कुछ नया और मूल्यवान मिलेगा। प्रेमपाल जी के यात्रा-वर्णन पढ़कर लगता है कि वे एक प्रसन्न गाइड की तरह हर क्षण उनके साथ हैं, और बहुत कुछ नया बता रहे हैं। यों प्रेमपाल शर्मा के यात्रा-वृत्तांतों का एक अलग प्रीतिकर रंग है, जो दिनोंदिन और ज्यादा गाढ़ा होता जाता है। वर्तमान दौर के सुप्रसिद्ध यात्रा-वृत्तांत लेखकों में उनकी उपस्थिति महत्त्वपूर्ण है, और सच तो यह है कि उनके यात्रा-वृत्तांतों का उल्लेख किए बिना इस विषय पर कुछ भी लिखना संभव नहीं है।
फिर प्रेमपाल जी के यात्रा-वृत्तांतों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे मन को बाँध लेते हैं। यह संभव ही नहीं है कि पाठक उन्हें पढ़ना शुरू करे, और पूरा किए बिना रख दे। उनमें रस है, विश्वसनीयता है और एक दुर्वह आकर्षण भी। इसलिए चाहे चित्रा मुद्गल सरीखी सुविख्यात कथाकार हों, या फिर बालकवि बैरागी सरीखे हिंदी के सार्थवाह, सभी ने इन्हें पढ़ा, जी भरकर सराहा, और फिर विशेष रूप से फोन करके प्रेमपाल जी को बधाई दी। उनसे निरंतर आगे लिखते रहने का आग्रह किया। चित्रा जी का कहना था—“तुम लिखते रहो, रुकना नहीं, लिखना मत छोड़ना...।” और बालकवि बैरागी ने तो अभिभूत होकर कहा, “भाई, मैं तीन बार द्वारका गया हूँ—अकेला और परिवार के साथ भी। पर मेरी आँखें वह सब नहीं देख पाईं, जो तुम देख पाए।...”
इसी तरह प्रेमपाल जी ने दिल्ली पर यात्रा-वृत्तांत लिखा तो देश के एक बड़े चिकित्सक न सिर्फ उसे पढ़कर प्रभावित हुए, बल्कि उन्होंने बहुत विनयपूर्वक मनुहार की—“प्रेमपालजी, क्या आप मुझे अपनी दिल्ली-दर्शन वाले आलेख का लिंक भेज सकते हैं? मैं गरमियों की छुट्टियों में अपने बेटे-पोते के पास ऑस्ट्रेलिया जा रहा हूँ। एक-दो महीने उनके साथ रहूँगा। दिल्ली और अपने भारत के बारे में उनकी धारणा अच्छी नहीं है। मैं उनको वह लेख पढ़वाना चाहता हूँ। मेरी नजर में दिल्ली को जानने के लिए उससे अच्छा लेख कोई और नहीं हो सकता।” 
और यही नहीं, कुछ रोज बाद ऑस्ट्रेलिया से उन सज्जन का फोन आया। बड़े आनंदित स्वर में उन्होंने कहा—“प्रेमपालजी, आपको पुन: बधाई। मेरा पोता अब दिल्ली देखना चाहता है। बेटा सपरिवार इंडिया आने के लिए तैयार हो गया है।...”
एक लेखक की इससे बड़ी खुशी, आनंद और सार्थकता की क्या आप कल्पना कर सकते हैं?
यात्रा-वृत्तांतों को अकसर यात्रा-वर्णन भी कहा जाता है। पर सच पूछिए तो मुझे ये दोनों ही नाम पसंद नहीं हैं। मैं इन्हें यात्रा-संस्मरण कहता हूँ। और मेरा निश्चित मत है कि कोई यात्रा-वृत्तांत जब तक संस्मरण नहीं बनता, वह मन को बाँध नहीं पाता। किसी यात्रा-वृत्तांत की सबसे बड़ी चरितार्थता यात्रा-संस्मरण हो जाना है। और प्रेमपाल जी के यहाँ मैं शुरू से ही यह देखता और महसूस करता रहा हूँ। यही कारण है कि एक पाठक के रूप में वे मुझे इतना मोहते हैं।
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प्रेमपाल जी सरल व्यक्ति हैं, सरल लेखक भी, और यही सरलता उनके यात्रा-वृत्तांतों में भी है, जो उन्हें प्रेमचंद की कहानियों सरीखा मोहक बनाती है। और ऐसा नहीं कि प्रेमपाल जी ने सिर्फ यात्रा-वृत्तांत ही लिखे हों। मैंने उनके लिखे लेख, संस्मरण, समीक्षाएँ और आलोचनात्मक लेख भी पढ़े हैं। सभी में उनके सरल प्रीतिमय व्यक्तित्व की झलक है और हृदय की यही सरलता है, जो पाठक के मन में पैठ जाती है। और आप उनकी चीजों को एक बार पढ़कर कभी नहीं भूल पाते। 
कुछ अरसा पहले प्रेमपाल जी ने अभी हाल में ही गुजरे अपनी प्यारे और लाड़ले कुत्ते रफ्तार के बारे में एक सुंदर सा रेखाचित्र लिखा। वह इतना मार्मिक था कि उसे पढ़ते हुए मेरी आँखें भीग गईं। और एक अजब बात यह थी कि लिखा तो उन्होंने अपनी लाड़ले कुत्ते रफ्तार के बारे में था, पर मुझे उसमें उनके बच्चों, और पूरे परिवार की आत्मीय छवि दिखाई दे गई, और मैं मानो उनमें से एक-एक को पहचान पा रहा था। यह बिटिया ऋचा, यह पीयूष बेटा, और ये रहीं श्रीमती प्रेमपाल। 
असल में प्रेमपाल जी जब किसी पर लिखते हैं, तो उसमें सिर्फ वही नहीं, बल्कि वे सब उपस्थित होते हैं, जिनसे उसकी समूची अस्मिता उभरती है। और यह तय है कि अकेले-अकेले हम कुछ नहीं। सबके साथ होकर ही हम पूरे होते हैं। सो उनके घर में रफ्तार को कौन, कितनी शिद्दत से चाहता था, ये सतरें मैं पढ़ रहा था, तो मानो किसी अज्ञात कैमरे से खिंचा पूरे परिवार का एक साझा फोटो खुद-ब-खुद मेरी आँखों के आगे बन रहा था।
इसी तरह एक बार मैंने उन्हें बाल साहित्य की पत्रिका ‘बालवाटिका’ के लिए अपने बचपन और गुरुजनों के बारे में लिखने को कहा तो उन्होंने संस्मरण लिखते हुए मानो एक पूरा वातावरण निर्मित कर दिया। उनके बचपन में बहुत कुछ ऐसा था, जिसे पढ़ते हुए मुझे खुद अपने बचपन की याद आई। लगा कि मैं उनके साथ-साथ, मैं खुद अपने अपने बचपन की नदी में गोते खा रहा हूँ और भाव-विभोर हो रहा हूँ।
इस संस्मरण में प्रेमपाल जी ने अपने बचपन के दुख-सुख और मार्मिक अनुभवों के बारे में लिखा, तो उनका गाँव ही नहीं, वह पूरा का पूरा समय आँखों के आगे आ खड़ा हुआ। इसी तरह प्रेमपाल अपने कर्त्तव्यनिष्ठ और धुनी अध्यापकों को याद करते हैं, तो उन्हें वे सुमधुर गीत और लंबी कविताएँ तक याद आ जाती हैं, जो उन्होंने छुटपन में अपने अध्यापकों से सुनी थीं। आज कई दशकों बाद भी वे उन्हें इस तरह उकेर रहे थे, जैसे यह कल की ही बात हो। मैंने पढ़ा तो अवाक् रह गया। विस्मित!
शायद प्रेमपाल जी की यही श्रद्धा और साहित्य के लिए निर्व्याज समर्पण ही था, जो बरसोंबरस अंतसलिला की तरह उनमें बहता रहा, और आज इतने सुंदर और भावमय स्मृति-चित्रों के रूप में हमारे सामने आया। 
यों आज भी प्रेमपाल जी से मिलने पर हर बार उनकी विनय, उनका समर्पण, उनका जिज्ञासा भाव इस कदर मन को बाँध लेता है, कि लगता है, आप उनसे मुक्त हो ही नहीं सकते। वे आपके भीतर बहने लगते हैं। सच पूछिए तो प्रेमपाल जी की ये दुर्लभ मानवीय विशेषताएँ उनके व्यक्तित्व में कस्तूरी गंध की बसी हैं, और इन गुणों ने ही उन्हें एक समर्थ लेखक, और इससे भी बढ़कर एक सच्चा इनसान बनाया। 
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मैं लोक यायावर देवेंद्र सत्यार्थी के साथ-साथ रामविलास जी, शैलेश मटियानी, रामदरश मिश्र और विष्णु खरे सरीखे बड़े-बड़े उस्तादों का शिष्य रहा हूँ, और मुझे इस बात का कम गर्व नहीं है। मैं भले ही एक छोटा सा लेखक हूँ, पर बड़े-बड़ों का स्नेहपूर्ण आशीष मुझे मिला है, जिन्होंने मुझे भीतर-बाहर से रचा और सँवारा है। और शायद उन्होंने ही बड़े से बड़े दुर्दिनों में भी मुझे टूटने नहीं दिया। अपने गुरुओं का यह प्रीतिकर स्पर्श मैं कभी नहीं भूलता। और इतने बड़े-बड़े उस्तादों का शिष्य हूँ, इसे मैं अपने जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य मानता हूँ। उनसे मैंने बहुत कुछ पाया भी है। और जो कुछ हासिल किया, उसे अपने बाद वाली पीढ़ी को दोनों हाथ भर-भरकर बाँटना मुझे अच्छा लगता है।
शायद इसीलिए अपने बाद वाली पीढ़ी के बहुत सारे लेखकों से मेरी निकटता और गहरी आत्मीयता रही है। इनमें कुछ ऐसे भी हैं, जो खुद को मेरा शिष्य मानते हैं और कहते भी हैं कि उन्होंने मुझसे कुछ सीखा है। इसे भी अपना सौभाग्य कैसे न कहूँ? पर मेरे शिष्यों में प्रेमपाल जी ने जितनी तेजी से सीखा है और थोड़े समय में ही जिस ऊँचाई पर वे पहुँचे हैं, वैसा शायद कोई नहीं है। मैं निःसंकोच कह सकता हूँ कि मेरे वे सर्वाधिक योग्य, मेहनती और प्रतिभावान शिष्य हैं तथा जो आदर और समर्पण भाव उनमें है, वह तो सचमुच ही दुर्लभ है।
प्रेमपाल जी को पढ़ते हुए बार-बार पिछली यादें मुझे गुहराती हैं। ‘साहित्य अमृत’ के संपादन के दौरान मैंने उन्हें पाया था। जो काम मैं उन्हें सौपकर जाता था, वे उसे याद रखते थे, पूरे समर्पण और तन-मन से पूरा करते थे, ताकि मुझे कोई शिकायत का मौका न मिले। उन पर मैं पूरा भरोसा कर सकता था। मेरा ‘साहित्य अमृत’ का संपादन-काल बहुत बड़ा नहीं है। मुश्किल से एक-डेढ़ बरस ही वह रहा होगा। और उसे बीते बहुत बरस हो गए हैं। पर न प्रेमपाल जी मुझसे दूर हुए, और न उनका समर्पण जरा भी कम हआ। वे हर क्षण मुझे अपने मन और आत्मा के नजदीक महसूस होते हैं। 
और सच कहूँ तो ‘साहित्य अमृत’ के संपादन के दौरान मैंने शायद बहुत कुछ पाया। बहुत से बड़े साहित्यकारों के साथ-साथ नए लेखकों से मित्रता। बहुतों का आत्मीय प्रेम। कुछ अच्छे और स्मरणीय विशेषांक भी उस दौर में निकले, जिन्हें भुला पाना मेरे लिए मुश्किल है। बहुत से साहित्यिकों और आत्मीय मित्रों से आज भी उन पर चर्चा होती है। पर अगर आज कोई मुझसे पूछे कि मनु जी, उन एक-डेढ़ बरसों की आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है तो मैं कहूँगा—प्रेमपाल शर्मा।
उस दौर में मैंने उजले मन और उजली आत्मा वाला एक सच्चा शिष्य पाया, एक गुरु के रूप में इससे बड़ा सौभाग्य शायद मेरा कुछ और नहीं। एक सच्चा शिष्य आपको तार देता है, और आप इस दुनिया से जाने के बाद भी उसके मन और चित्त में हमेशा-हमेशा के लिए बसे रहते हैं।
मेरे लिए इससे बढ़कर आनंद की बात कुछ और नहीं हो सकती कि प्रेमपाल शर्मा जी के यात्रा-वृत्तांतों की पुस्तक अब छप रही है। जो एक नन्हा सा पौधा मैंने लगाया था, वह आज बड़ा होकर बहुतों को सुवासित कर रहा है। इन सुखद क्षणों में अपने अंतर्मन के नेह और सद्भावनाओं के साथ मैं यही दुआ कर सकता हूँ कि वे लिखें, निरंतर लिखें, और खूब अच्छा लिखें, जिससे दूसरों के दिलों में भी उजास पैदा हो, और यह दुनिया थोड़ी सी ज्यादा उजली और सुंदर हो जाए!
मैं बेहिचक कह सकता हूँ कि प्रेमपाल जी के यात्रा-संस्मरणों की इस पुस्तक में भी यही रोशनी, आत्मीयता और उजास है, जो एक सुंदर दुनिया रचती है। इसलिए एक बार पढ़ना शुरू करें तो पाठक उसे छोड़ नहीं पाएँगे। और एक बार पढ़ने के बाद कभी भूलेंगे भी नहीं। प्रेमपाल जी और लिखें, इसी तरह रमकर लिखें, उन्हें मेरी स्नेहपूर्ण शुभकामनाएँ और आशीष!
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प्रकाश मनु
545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
चलभाष: 0981060232,
ईमेल: prakashmanu334@gmail.com

2 comments :

  1. प्रेमपाल शर्मा जी के यात्रा संस्मरणों की यह समीक्षा भी अद्भुत और रोचक है। सुन्दर। बधाई।

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