उदय प्रकाश की कहानी ‘मोहनदास’ का सिने रूपांतरण

प्रदीप कुमार सिंह

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साहित्य और सिनेमा कलात्मक अभिव्यक्ति के दो माध्यम है। यह दोनों ही रूप लोक और उसके जीवन से जुड़ते हैं। क्योंकि साहित्य और सिनेमा दोनों ही भावों एवं विचारों की अभिव्यक्ति के दो सशक्त माध्यम हैं तथा दोनों ही परिवर्तन के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सिनेमा के सन्दर्भ में डॉ.राही मासूम रज़ा का मानना है, “सिनेमा उन लोगों तक पहुँच जाता है जो लिखना-पढ़ना नहीं जानते। भारत जैसे अशिक्षित देश में सिनेमा की कला के महत्त्व को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। साहित्य जहाँ व्यक्तिगत होता है तो वहीं सिनेमा व्यक्तिगत न होकर सामूहिक होता है। लिखित साहित्य का अपना एक अलग पाठक वर्ग होता है। यही कारण है कि साहित्य अपने लिखित रूप में आमजन तक एक सीमित रूप में ही पहुँच पाता है, जबकि सिनेमा व्यापक जनसमूह के रूप में।”1 साहित्य और सिनेमा के अंतर को स्पष्ट करते हुए इकबाल रिज़वी कहते हैं, “फ़िल्म एक लोक विधा है। साहित्य शिक्षितों की विधा है। फ़िल्म तो रामलीला और लोकनाटय की तरह आम जनता तक अपनी बात पहुँचाती है, उसका उद्देश्य मनोरंजन है चाहे उसके दर्शक अनपढ़ हों या पढ़े लिखे।”2

उदय प्रकाश
सिनेमा अभिव्यक्ति का एक कलात्मक रूप है जो प्रकाश, बिम्ब, छाया, ध्वनि, संगीत, नृत्य आदि के माध्यम से हमारे सामने एक पूरी दुनिया का निर्माण करता है। इसमें व्यक्त कथा काल्पनिक होकर भी यथार्थ लगने लगती है जबकि साहित्य शब्दों के माध्यम से रूप एवं आकार ग्रहण करता है, साथ ही पाठक के लिए यहाँ कल्पना की अपार सम्भावनाएँ होती हैं, जबकि सिनेमा परदे पर उतर कर व्यक्त होता है और दर्शकों की कल्पना को एक निश्चित रूप में बाँधकर सीमित कर देता है। राही मासूम रज़ा के मतानुसार, “सिनेमा की विशेषता यह है कि उसका दर्शक, दर्शकों का हिस्सा भी है और अकेला दर्शक भी। वह सामूहिक रूप से भी फ़िल्म देख रहा है और व्यक्तिगत रूप से भी। वह सबके साथ हँसता है सबके साथ तालियाँ बजाता है, सबके साथ विलन को गाली देता है। दुनिया की कोई किताब उससे तालियाँ नहीं बजवा सकती, उससे कहकहा नहीं लगवा सकती, उससे गालियाँ नहीं बकवा सकती। ये चीजें सामूहिक प्रतिक्रिया का हिस्सा हैं।”3 जब किसी कथा साहित्य का सिनेमा में रूपांतरण होता है तो उसकी कथा यथावत् नहीं रहती है। फ़िल्मकार आवश्यकता अनुसार उसमें फेरबदल करता है। जब कोई पाठक कथा साहित्य का सिनेमा रूपांतरण देखता है तो उसके मन में यह जिज्ञासा बनी रहती है कि कथा के सिनेमा रूपांतरण में बदलाव क्यों किया गया है? इन बदलावों के पीछे क्या कारण हो सकते हैं? कथा साहित्य के सिनेमा रूपांतरण में बदलाव के कई कारण हो सकते हैं। जैसे:- फ़िल्मकार की दृष्टि, विधा के परिवर्तन होने के कारण, मनोरंजन की दृष्टि से, बड़ी संख्या में दर्शकों को आकर्षित करने के लिए, रचनाकार के सन्देश को स्पष्ट करने के लिए, कृतिकार के सन्देश को विस्तार देने के लिए इत्यादि। ‘मोहनदास’ ‘उदय प्रकाश’ की एक चर्चित कहानी है जिस पर ‘मजहर कामरान’ ने ‘मोहनदास’ नाम से ही एक फ़िल्म भी बनाई। ‘मोहनदास’ कहानी एवं फ़िल्म की तुलना कथानक, पात्र एवं चरित्र-चित्रण, संवाद, वातावरण, प्रस्तुतीकरण तथा उद्देश्य के आधार पर की जा सकती है। मोहनदास कहानी और मोहनदास सिनेमा की तुलना करने से पहले कथा-साहित्य और सिनेमा के अंत: सम्बन्ध को समझना अत्यंत आवश्यक है।

कथा-साहित्य और सिनेमा का अन्तः सम्बंध

सिनेमा का साहित्य से सम्बन्ध शुरू से ही रहा है। शुरूआती दौर में सिनेमा का समाज के प्रति अपना एक अलग दायित्व रहा। फ़िल्मकार का उद्देश्य ख़ालिस मनोरंजन ही नहीं था जैसा कि आज प्राय: देखने को मिलता है। भारतीय सिनेमा आरम्भ से ही भारतीय समाज का आईना रहा है, जो समाज की गतिविधियों को रेखांकित करता आया है। सिनेमा और साहित्य के सम्बन्ध के बारे में आदित्य विक्रम सिंह का मानना है, “सिनेमा और साहित्य के बीच रिश्ते की शुरुआत सिनेमा के जन्म के साथ ही शुरू हो जाती है। शुरूआती दौर में उसको विकसित बनाने में साहित्य की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। आरंभिक दिनों में प्राय: फ़िल्मकार साहित्यिक कृतियों का सहारा लेते रहें। उसका कारण था कि फ़िल्म निर्माण के पीछे सिर्फ मनोरंजन नहीं था बल्कि समाज को कुछ सार्थक सन्देश देना भी उनका लक्ष्य होता था। इसलिए हम देखते हैं कि शुरू के दिनों में कला फ़िल्मों की बहुलता थी।”4 साहित्य और सिनेमा का अंत: सम्बंध अत्यंत गहरा है अमरेन्द्र कुमार के शब्दों में, “साहित्य वह ज़मीन है, जहाँ सिनेमा बार-बार लौटता है।”5

मोहनदास कहानी एवं फ़िल्म का अध्ययन

मोहनदास उदय प्रकाश की एक बहुचर्चित कहानी है। इस पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला चूका है। कुछ लोग इसे लघु उपन्यास मानते हैं। तो कुछ लोग इसे लम्बी कहानी। ‘मोहनदास’ शीर्षक से उदय प्रकाश की यह लम्बी कहानी ‘हंस’ (अगस्त 2005) में सीरियल में छपने के बाद वाणी प्रकाशन द्वारा पुस्तक के रूप में छपकर आयी। इस कहानी पर कई प्रतिष्ठित थियेटर ने मंचन भी किया। साथ ही कहानी कई भाषाओं में अनूदित भी हुई, “21 मार्च 2006 को पटना में ‘हीरावल’ ने 29 मार्च को जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली की इप्टा इकाइयों ने इसका मंचन किया।”6 मराठी, उर्दू, पंजाबी और अंग्रेजी भाषा में इसका अनुवाद भी हो चुका है। 
मोहनदास नाम से ही मज़हर कामरान ने एक फीचर फ़िल्म (मोहनदास 2008) का निर्माण किया। कहानी और फ़िल्म दोनों में (flash back) शैली का प्रयोग हुआ है। फ़िल्म में ‘मोहनदास’ कहानी की कथा में बदलाव देखने को मिलता है। कहानी की शुरुआत में जहाँ मोहनदास अपने पहचान को मिटाने के लिए सबके सामने हाथ फैला रहा है वहीं फ़िल्म की शुरुआत में मोहनदास यह कहते हुए दिखाई पड़ता है कि मैं ही मोहनदास हूँ। फ़िल्मकार कहानी को प्रभावी रूप से दिखाने के लिए कहानी को दिल्ली तक ले जाता है जबकि असल में कहानी पुरबनरा गाँव तक सीमित है। फ़िल्म में जनमत समाचार चैनल की रिपोर्टर ‘मेघना सेन गुप्ता’ के माध्यम से मोहनदास की पीड़ा, उसके साथ हुए जालसाजी और धोखाधड़ी को दिखाया गया है। मज़हर कामरान ने सिनेमाई छूट लेते हुए मूल कहानी में कुछ किरदार और प्रसंग जोड़े हैं। अनिल यादव कोल माइंस के एक व्यक्ति से बात करने के दौरान मोहनदास की पिटाई को देखता है और उसे कैमरे में कैद कर लेता है। मोहनदास से मिलने के बाद अनिल यादव कहानी को टेप बनाकर दिल्ली के जनमत टी.वी. चैनल को भेजता है। मोहनदास की कहानी को टी.वी. चैनल में कार्यरत मेघना सेन गुप्ता देखती है, उसके लिए यह कहानी हैरतअंगेज कर देने वाली होती है। मेघना सेन गुप्ता इस कहानी की छानबीन करने अनूपपुर आती है। मोहनदास की माँ से मिलती है। पुतलीबाई, मोहनदास की पढ़ाई के प्रति लगन, ईमानदारी को बयाँ करती है। कस्तूरी से मिलने के बाद मेघना सेन गुप्ता को मोहनदास से सम्बंधित और सूचनाएँ प्राप्त होती है।

मेघना सेनगुप्ता, हर्षवर्धन सोनी, शकील के अथकप्रयासों के बावजूद फैसला मोहनदास के खिलाफ आता है। फ़िल्म का दुखद अंत यही होता है जहाँ मोहनदास, मेघना से यह कह कर किवाड़ बंद कर देता है कि, “आप शायद गलत जगह पर आईं हैं। यहाँ मोहनदास नाम का कोई आदमी नहीं रहता।”7 यानी वह खुद अपने आप को अलग कर देता है। कहानी में न्यायधीश मुक्तिबोध की मौत ब्रेन हेमरेज की वजह से हो जाती है जबकि फ़िल्म में वकील हर्षवर्धन की मौत ट्रक के टकराने से होती है। शायद दर्शकों की उत्सुकता (suspense) बढ़ाने के लिए ऐसा किया गया है। क्योंकि हर्षवर्धन ही मोहनदास का केस लड़ रहा होता है। फ़िल्मकार ने कहानी के एक महत्त्वपूर्ण दृश्य को छोड़ दिया गया है, जिसमें कस्तूरी और अन्य महिलाएँ दिशा-फिरात करने जाती है और बिसनाथ उसे छुप-छुप कर देखता है। इस तरह का व्यवहार आज भी पिछड़े वर्ग की स्त्रियों के साथ होता है। बहुत सारे बदलाव करने के बावजूद फ़िल्म कहानी के सन्देश को प्रभावी रूप से दर्शकों तक पहुँचाने में असक्षम है, इसीलिए पाठकों को यह फ़िल्म उतना प्रभावित नहीं करती है।

पात्र एवं चरित्र-चित्रण - कहानी में पात्रों की संख्या लगभग 48 है। मुख्य पात्रों में मोहनदास, कस्तूरी, काबादास, पुतलीबाई, गोपाल, हर्षवर्धन सोनी, मुक्तिबोध, बिसनाथ, विजय तिवारी हैं। फ़िल्म में कुल 49 पात्र हैं। जिसमें मोहनदास अनिल यादव, मेघना सेन गुप्ता, गोपाल, मुक्तिबोध, हर्षवर्धन, बिसनाथ, विजय तिवारी आदि प्रमुख हैं। फ़िल्म में मोहनदास (नकुल वैद), कस्तूरी (शरबनी मुखर्जी), मेघना सेन गुप्ता (सोनाली कुलकर्णी), बिसनाथ (सुशांत सिंह), मुक्तिबोध (गोविन्द नामदेव) तथा हर्षवर्धन (आदित्य श्रीवास्तव ) ने अभिनय किया है। कहानी की तुलना में फ़िल्म में पात्रों की संख्या ज़्यादा है। माध्यम के बदल जाने के कारण ऐसा देखने को मिलता है। फ़िल्म और कहानी की तुलना करें तो फ़िल्म के पात्र प्रभावी रूप से दर्शकों पर छाप छोड़ने में उतने सफल नहीं हुए हैं। मोहनदास किसी भी तरह से पुरबनरा का मोहनदास नहीं लगता। फ़िल्म देखने के बाद ऐसा लगता है कि यह कहानी निम्नवर्ग की कहानी न होकर मध्यवर्ग की कहानी है। जबकि असल में कहानी निम्नवर्गीय हाशिये पर जी रहे परिवार की है। भला दरी-कम्बल बुनने वाले का कपड़ा इतना सफ़ेद झकाझक कैसे हो सकता है। कहानी में मोहनदास के पास कपड़े नहीं है। जो है वह फटे हुए हैं जिस पर कस्तूरी अपने पुराने ब्लाउज से पैबंद लगाती है, “उसकी नीली पैंट घुटनों के पास फट चुकी थी। पीछे भी घिस कर वह तार-तार थी लेकिन कस्तूरी ने उन जगहों पर मेल खाते रंग के पैबंद टांक दिए थे, जो या तो उसकी पुरानी ब्लाउज से निकाले गये थे, या पुरानी चादरों में से।”8 मोहनदास जिस स्कूल में पढ़ाई करता है, वह कहीं से पुरबनरा गाँव का नहीं लगता। जैसा कि कहानी पढ़ते समय पाठकों के सामने जिस स्कूल का चित्र खींचता है, वह एक ऐसा स्कूल है जो बांस-बल्ली से निर्मित, टूटे हुए छप्पड़ जिसमें साज-सज्जा ना के बराबर है। नकुल वैद मोहनदास की बैचेनी, तड़प, पागलपन, बदहवासी, डर को अपने अभिनय में पूरी तरह उतार नहीं पाए हैं। 

फ़िल्म में काबादास कुछ-एक दृश्यों में दिखाई पड़ते हैं। वहीं कहानी में मोहनदास की गरीबी को परिलक्षित करते हैं। मोहनदास अपनी गरीबी की वज़ह से काबादास का इलाज नहीं करा पाता है। कहानी के आगे बढ़ने के साथ ही काबादास खांसते-खांसते खून की उल्टियाँ करता हुआ मर जाता है। मोहनदास की माँ पुतलीबाई भी फ़िल्म में मामूली भूमिका निभाते हुए दिखाई गई है। जबकि कहानी में बेहद रचनात्मकता के साथ पुतलीबाई उपस्थित हुई है। उसका संवेदनशील हृदय अलोपी मैना के साथ जुड़ा है। जब मैना का घोसला देखती है तो इसे अपने सुख के आने का संकेत मानती है, वह गाती है, “टरबा-पुतऊ की कोठरिया माझे अलोपी मइना खोंथा डारिस हबै। भाग आइस, कलेस गइस...!! किसमत जागिस...दलिद्दर भागिस....!.. जय हो मलइहा माई...! तोर ल गोड़ लागों सतगुरु महराज...!! जै हो... जै हो...।”9 फ़िल्म में मोहनदास की बेटी शारदा का कहीं भी जिक्र नहीं किया गया है साथ ही देवदास के चरित्र को भी विस्तृत रूप से नहीं दिखाया गया है।

बिसनाथ फ़िल्म की अपेक्षा कहानी में अधिक विष उगलता है। फ़िल्म में उसका चरित्र पूरी तरह से सामने नहीं आ पाता है जबकि कहानी में बिसनाथ का परिचय बहुत ही भयानक है, लोग उसके पीठ पीछे कहते हैं, “असल करैत है, बिसनाथ। गजब का बिसधारी। किसी को फूंक मार दे तो समझो कि टे...! बाप नागनाथ तो बेटा सांपनाथ...! अगर तुमको देखकर मुस्किया रहा है और गुड़ लपेट कर बोल रहा है, तो हुसियार हो जाओ! डंसने की पूरी तैयारी है।... वह खुद कहता है। एक केर टोपी दुसर के मुड़ मा टांगै वाली हेरा फेरी मा जउन आनंद है भईया, ओकर सामने आन केर मेहरारू का जांघ के नीचे दाबै वाला मजा बहुत छोटा चीज आय...!...हा...हा...हा...।”10 फ़िल्म में दारोगा विजय तिवारी, कहीं से दारोगा नहीं लगता। एक तो ढीली कद-काठी ऊपर से अंगोछा ओढ़े मरियल-सा। मेघना सेन गुप्ता फ़िल्म की प्रमुख पात्र है। पात्रों के चयन में भी असावधानियाँ बरती गईं हैं। अनिल यादव, मुक्तिबोध, अमिता, नगेन्द्रनाथ तथा एस. के. सिंह को छोड़कर शेष सभी पात्र आरोपित लगते हैं। इस तरह कहा जा सकता है कि पात्र एवं चरित्र-चित्रण के आधार पर फ़िल्म कमजोर दिखाई पड़ती है।

कथोपकथन/संवाद - मोहनदास कहानी और फ़िल्म के संवादों में भी भिन्नता देखने को मिलती है। पात्रों के जुड़ने के कारण अतिरिक्त संवाद जोड़े गये हैं। जैसा कि हम जानते हैं सिनेमा का दर्शक असीमित होता है। सिनेमा का दर्शक शिक्षित भी होता है और अशिक्षित भी यही कारण है कि सिनेमा के संवादों में सरलता के साथ-साथ गतिशीलता होती है। जैसा कि मोहनदास फ़िल्म में देखने को मिलता है। जांच-पड़ताल अधिकारी ए.के श्रीवास्तव जब पुछताछ करने के लिए बिसनाथ के घर जाता है तो नगेन्द्रनाथ कहता है, “हमारा नाम है काबादास। ये तुलसी की माला जब से धारण किये, तबसे तुलसीदास की चौपाइयै हमारा ओढ़ना-विछोना है। दास नाम हम तभी से जोड़ रखे हैं।”11 जबकि फ़िल्म में नगेन्द्रनाथ रामचरितमानस की एक चौपाई को बोलते हुए ए.के.श्रीवास्तव के समक्ष आते हैं। इसी तरह मोहनदास कहानी में कमल किशोर कहता है कि, “अरे आप लोगों का हुकुम हम कभी टालेंगे भला?.... इतने एमाउंट में तो हम ससुर....मूस को हाथी, खेत को सड़क अउर छक्का को छह बच्चों की अम्मां बना दें।”12 जब कि मोहनदास फ़िल्म में कमल किशोर कहता है, “अरे इतनी रकम में तो हम राई को पर्वत, मूस को हाथी और छह बच्चों के बाप को छक्का बना सकते हैं।”13 जब किसी साहित्यिक कृति का सिनेमा रूपांतरण होता है तो उसमें अतिरिक्त संवाद जोड़ने के अलावा संवाद में बदलाव भी किया जाता है। जैसा कि हमें मोहनदास फ़िल्म में भी देखने को मिलता है। संवाद के परिप्रेक्ष्य में कहानी का फलक जितना मजबूत है; फ़िल्म का उतना ही कमजोर है।

देशकाल एवं वातावरण - मोहनदास कहानी ‘हंस’ पत्रिका (2005) में क्रमबद्ध रूप में प्रकाशित हुई है तथा मोहनदास फ़िल्म (2009) में प्रदर्शित हुई है। दोनों के प्रकाशन के बीच चार साल का अंतराल है। इन चार सालों में सामाजिक तथा राजनीतिक स्तर पर कई बदलाव हुए है। यह बदलाव हमे फ़िल्म में भी देखने को मिलता है। फ़िल्म की कहानी को आगे बढ़ाने के लिए टीवी चैनल का सहयोग इसका बेहतर उदाहरण है। इन चार सालों में हाशिये पर जी रहे मनुष्यों के रहन-सहन तथा पहनावे में काफी अंतर आया। शायद इसलिए मज़हर कामरान ने फ़िल्म में मोहनदास के पहनावे तथा वहाँ के स्कूल को आधुनिक दिखाया है।

प्रस्तुतीकरण - जैसा कि हम जानते हैं फ़िल्म को उबाऊपन से बचाने के लिए गीत, नृत्य तथा संगीत इत्यादि कलाओं का प्रयोग किया जाता है। मोहनदास फ़िल्म में कुल तीन गीत हैं और सभी गीत अच्छे हैं। सभी गीत पात्रों की स्थिति, परिस्थिति को भली-भांति व्यक्त करते हैं। फ़िल्म का पहला गीत, “नदी में ये चन्दा किसे देखता है, किसे देखता है किसे ढूंढता है, तुम्हारी अदा रात में चांदनी-सी, तुम्हारी हँसी दिल की है रौशनी-सी”14 बहुत ही रोमांटिक गीत है। जो कि मन को खूब भाता है। इस गीत को अलका याज्ञनिक तथा शान ने उम्दा तरीके से गाया है। इस गीत को यश मालवीय ने लिखा है। मोहनदास फ़िल्म का दूसरा गीत, “अपनी खोई हुई पहचान कहाँ से लाऊ, इक वक्त जिस्म है अब जान कहाँ से लाऊ”15 इस गीत को कैलास खेर ने गाया है तथा इस गीत को वी. के सोनोकिया ने लिखा है। यह गीत मोहनदास की परेशानी को बखूबी दर्शाता है। फ़िल्म का तीसरा गीत, “बोल तू कौन है बे तेरी पहचान है क्या, माजरा सब को बता अब तेरा नाम है क्या, कौन है कौन है तू कुछ तो बतला दे हमें, कैसी उलझन है तेरी कुछ तो समझा दे हमें”16 यह गीत फ़िल्म में दो बार प्रयोग किया गया है। एक बार तो मूल रूप में तथा दूसरी बार रिमिक्स रूप में है। वी. के. सोनोकिया द्वारा लिखित इस गीत को कुणाल गांजावाला ने गाया है। नृत्य, गीत एवं संगीत का प्रयोग कहानी की तुलना में फ़िल्म में अच्छे तरीके से हुआ है।

उद्देश्य - मोहनदास कहानी तथा फ़िल्म दोनों का उद्देश्य समाज में हाशिये पर जी रहे मनुष्य तथा पिछड़े वर्ग की समस्या को उद्घाटित करना है। समाज में किस प्रकार समृद्ध लोगों द्वारा इनका शोषण किया जाता है तथा सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर करना ही दोनों का लक्ष्य है। सरकारी तंत्र-व्यवस्था में पुलिस से लेकर कचहरी तक, पटवारी से लेकर तहसील तक के कर्मचारी किस प्रकार भ्रष्टाचार के शिकंजे में जकड़े हुए हैं। प्रतीकात्मक रूप में उदयप्रकाश, अलोपी मैना के माध्यम से समाज और सत्ता के यथार्थ को व्यक्त करते हुए कहते हैं, “सत्ता और पूँजी से जुड़ी ताकते अचानक किसी बाज की तरह झपट्टा मारकर अलोपी मैना के घोंसलें को उजाड़ देती हैं और बाहर दिखाई देते हैं चिड़ियों के नन्हें-नन्हें छौनी के पंख और खून के धब्बे। ये धब्बे किसी भी पार्टी की सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा लिखवाए गए इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में कभी नहीं दिखाई देते। क्योंकि इतिहासकार का पेशा ही है। अपने समय की सत्ता के दामन के दाग-धब्बों को छिपाना।"17 यह कहानी आजादी के अस्सी साल बाद के हालातों को मार्मिक ढंग से व्यक्त करती है। जिस मार्मिकता के साथ कहानी अपने उद्देश्य को व्यक्त करती है उस मार्मिकता को व्यक्त करने में मोहनदास फ़िल्म असफल दिखाई पड़ती है।

मोहनदास कहानी के सिनेमाई रूपांतरण में काफी बदलाव करने के वाबजूद फ़िल्म की कहानी पूर्ण रूप से दर्शकों तक पहुँचाने में असक्षम ही है। यद्यपि जिन्होंने कहानी को पढ़ा नहीं होगा उनको फ़िल्म प्रभावित कर सकती है, परन्तु जिन्होंने कहानी को पढ़ा होगा उनको फ़िल्म संतुष्ट नहीं कर पाती है। जब किसी साहित्यिक कृति का सिनेमाई रुपान्तरण होता है, तो वह केवल सीमित वर्ग तक नहीं रहता। यही कारण है कि निर्देशक दर्शकों की समझ, उसकी पसंद को ध्यान में रखते हुए फ़िल्म का निर्माण करता है। इसी वजह से कृति के कुछ अंश को छोड़ता है, उसमें फेरबदल करता है। साथ ही निर्देशक की समझ, संवेदना तथा सहनशीलता पर भी यह निर्भर करता है कि वह कृति को कितना समझा है। जब हम किसी कृति का पाठ करते हैं तो पढ़ते समय हम उस दृश्य को कल्पना के सहारे निर्मित करने के लिए स्वतंत्र होते हैं। जबकि उसी दृश्य को जब परदे पर उतारा दिया जाता है तो वहाँ कल्पना के लिए कोई जगह शेष नहीं रह जाती है। यही कारण है कि पर्दे पर घटित चित्र हमे कभी-कभी प्रभावित नहीं करते, क्योंकि प्रत्येक पाठक की कल्पना एक-दूसरे से भिन्न होती है।


सन्दर्भ ग्रंथ:-

1. सं. प्रो. सिंह, कुबेरपाल, ‘सिनेमा और संस्कृति’, प्रथम संस्करण, 2007, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ संख्या-58 
2. रिज़वी, इकबाल, ‘सिनेमा और हिन्दी साहित्य’, हिन्दीसमय.कॉम
3. सं. प्रो. सिंह, कुबेरपाल, ‘सिनेमा और संस्कृति’, प्रथम संस्करण, 2007, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ संख्या-75 
4. सहजै, रहिबा, क्षमा, ‘सहजै रहिबा ब्लॉगस्पॉट.कॉम’, 1 जुलाई 2014
5. रंजन, प्रतीक्षा, ‘साहित्य और सिनेमा के रिश्ते’, जानकीपुल.कॉम, 3 मार्च 2013
6. प्रकाश, उदय, ‘मोहनदास’, तृतीय संस्करण, 2003, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ संख्या-23 
7. कामरान, मज़हर, ‘मोहनदास  (फिल्म)’, 28 सितम्बर 2009
8. प्रकाश, उदय, ‘मोहनदास’, तृतीय संस्करण, 2003, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ संख्या-117 
9. वही, पृष्ठ संख्या-63 
10. वही, पृष्ठ संख्या-86 
11. वही, पृष्ठ संख्या-59 
12. वही, पृष्ठ संख्या-88 
13. कामरान, मज़हर, ‘मोहनदास (फिल्म)’, 28 सितम्बर 2009
14. कामरान, मज़हर, ‘मोहनदास (फिल्म)’, 28 सितम्बर 2009
15. कामरान, मज़हर, ‘मोहनदास (फिल्म)’, 28 सितम्बर 2009
16. कामरान, मज़हर, ‘मोहनदास (फिल्म)’, 28 सितम्बर 2009
17. प्रकाश, उदय, ‘मोहनदास’, तृतीय संस्करण, 2003, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ संख्या-122 

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