विपरीत ध्रुवों के सामंजस्य का साहित्यकार, तेजेन्द्र शर्मा

पुस्तक समीक्षा: सुशील उपाध्याय


पुस्तक: प्रवासी साहित्यकार तेजेन्द्र शर्मा: साक्षात्कार के आईने में
संपादक: डॉ. नूतन पाण्डेय, डॉ. दीपक पाण्डेय
प्रकाशक: स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली 110002    
                     

तेजेन्द्र शर्मा समकालीन हिंदी लेखन के सर्वाधिक प्रतिष्ठित नामों में से एक हैं। उन्होंने हिंदी की रचनाधर्मिता को वैश्विक फलक तक पहुँचने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। उनके व्यक्तित्व के पहलू इतने विविधतापूर्ण है कि उन्हें किसी एक खांचे या फ्रेम में रखकर समझना अथवा मूल्यांकित करना आसान कार्य नहीं है। तेजेन्द्र शर्मा की रचनाधर्मिता की विविधता को विस्तार देने में उनकी भाषिक और भौगोलिक पृष्ठभूमि, दोनों ने उल्लेखनीय भूमिका अदा की है। वे जन्मतः पंजाबीभाषी हैं, अध्ययन की दृष्टि से अंग्रेजी के व्यक्ति हैं, लेकिन लेखन की दुनिया में हिंदी के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके जीवन का भूगोल भारत से लेकर यूरोप तक फैला हुआ है। विरुद्धों के बीच संतुलन और सामंजस्य ने ही तेजेन्द्र शर्मा के साहित्यिक व्यक्तित्व को गढ़ा है। उनके गढ़े जाने की इस प्रक्रिया को डॉ. नूतन पाण्डेय और डॉ. दीपक पाण्डेय ने अपनी किताब (प्रवासी साहित्यकार तेजेन्द्र शर्मा: साक्षात्कार के आईने में) में बहुत विस्तृत फलक पर प्रस्तुत और परिभाषित किया है। डॉ. नूतन पाण्डेय और दीपक पाण्डेय लंबे समय तक भारत के बाहर रहकर हिंदी के लिए कार्य कर चुके हैं और प्रतिष्ठित लेखक हैं। दोनों का लेखकीय अनुभव तेजेन्द्र शर्मा की साहित्यिक, मनोगत और प्रस्तुतिगत क्षमताओं को परखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस संपादित किताब में 10 प्रतिष्ठित रचनाधर्मियों व समालोचकों द्वारा लिए गए साक्षात्कारों को सम्मिलित किया गया है।

नूतन पाण्डेय
इन साक्षात्कारों को पढ़े जाने की प्रक्रिया के दौरान डॉ. तेजेन्द्र शर्मा की साहित्यिक, सांस्कृतिक व कलात्मक अभिरुचियों, जीवन को देखने के दार्शनिक एवं भौतिक आधारों, साहित्य के काव्यशास्त्रीय पहलुओं, लेखन की प्रेरणाओं, साहित्यकर्म एवं निजी जिंदगी में संतुलन के तौर-तरीकों और उनकी निगाह में आम जीवन पर मीडिया के प्रभाव आदि का उद्घाटन होता है।

इस किताब की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तेजेन्द्र शर्मा विभिन्न प्रश्नों के उत्तर देते समय ऐसे अनेक संदर्भों का उल्लेख करते हैं जो हिंदी के सामान्य पाठक के लिए हर प्रकार से नए हैं। वे अपने उत्तरों में साहित्य और राजनीतिक वैचारिकी, अपने इंग्लैंड प्रवास की विशिष्टताओं-चुनौतियों, साहित्य और फिल्मों के अंतर्संबंध, साहित्य पर मीडिया के प्रभाव, अंग्रेजी और हिंदी साहित्य की प्रस्तुति शैली के अंतर आदि को बहुत ही तार्किकता और प्रभाव के साथ प्रस्तुत करते हैं। इन 10 साक्षात्कारों में दर्ज लगभग 100 सवाल साहित्यकार तेजेन्द्र शर्मा के जीवन के प्रायः सभी पहलुओं को प्रभावपूर्ण ढंग से उद्घाटित करने में सफल साबित हुए हैं।

दीपक पाण्डेय
यह किताब संपादित है इसलिए संपादकों पर यह दायित्व आरोपित नहीं किया जा सकता कि उन्होंने ऐसे अनेक सवाल छोड़ दिए हैं, जिन्हें पूछा जाना चाहिए था। यह संभव है कि तेजेन्द्र शर्मा के अन्य साक्षात्कारों में उन प्रश्नों को भी समाहित किया गया होगा जो यहाँ रह गए हैं। यह भी ध्यातव्य है कि साक्षात्कारकर्ता के प्रश्नों और उसके प्रश्नों की सीमाओं का निर्धारण किसी भी समालोचक (या संपादक) द्वारा नहीं किया जा सकता। (वैसे, भगवान बुद्ध के सहायक आनंद को पहली बौद्ध संगीति के वक्त इस बात के लिए दण्डित किया गया था कि उन्होंने बुद्ध से सही समय पर सही प्रश्न नहीं पूछे थे।) सामान्यतः कई बार साक्षात्कारकर्ता लेखक के आभामंडल से प्रभावित होता है और अक्सर ही उनके लेखन की प्रक्रिया को जांचने-परखने के दौरान उसे प्रतिस्थापित करने के लिए भी तत्पर रहता है इसलिए कोई भी साक्षात्कार न तो अपने आप में पूर्ण होता और न ही अपूर्ण होता है। यह बात इस किताब के साक्षात्कारों पर भी यथावत लागू होती है। समय-काल की दृष्टि से देखें तो तेजेन्द्र शर्मा का लेखन लगभग पांच दशक की सुदीर्घ अवधि में फैला हुआ है। हालांकि उनकी पहली कहानी अब से 44 साल पहले 1980 में प्रकाशित हुई थी, लेकिन इससे कई साल पहले से ही वे अंग्रेजी में लिख रहे थे और प्रकाशित हो रहे थे। जिस लेखक का रचनाकाल 50 साल लंबी काल-अवधि में फैला हो उसके साक्षात्कार की प्रक्रिया यदि नई पीढ़ी के लेखक या लेखकों के माध्यम से संपन्न होगी तो जीवन के अंतर-विरोधों, बाह्य परिस्थितियों (विशेष रूप से राजनीतिक सत्ता परिवर्तन) के कारण होने वाले वैचारिक बदलाव और हिंदी साहित्य जगत में सरकारी तंत्र के दखल आदि के प्रश्न पृष्ठभूमि में चले जाते हैं।

इस किताब में कुछ साक्षात्कार, जैसे दिलबाग सिंह विर्क का तेजेन्द्र शर्मा से संवाद औसत श्रेणी का है, लेकिन संजय सिंह, डॉ. दीपक पाण्डेय, कमला नरवरिया और योग्यता भार्गव ने गंभीर प्रश्नों के माध्यम से लेखक को परखने (उनके टेक्स्ट को उजागर करने) का कार्य किया है। आनंद राय द्वारा लिया गया साक्षात्कार भी तेजेन्द्र शर्मा की कहानी लेखन प्रक्रिया, संवेदनाओं, भावनाओं, मानसिक संत्रास, जीवन की उठापटक आदि को समझने में मदद करता है। एक अच्छी बात यह है कि प्राय: सभी साक्षात्कारकर्ताओं ने तेजेन्द्र शर्मा के साहित्य को व्यापक रूप से पढ़ा है। कह सकते हैं कि यह साक्षात्कार ऐसे लोगों द्वारा लिए गए हैं जो बहुपठित हैं और वे न केवल साहित्य, बल्कि साहित्य की रचना प्रक्रिया (टेक्नीक) और काव्य शास्त्रीय पहलुओं से भी व्यापक रूप से भिज्ञ हैं। इस कारण ज्यादातर प्रश्न अपने फलक को बढ़ाते हुए जागरूक एवं सचेत पाठकों के अपने प्रश्न बन जाते हैं।

इस किताब की भूमिका में डॉ. नूतन पाण्डेय और डॉ. दीपक पाण्डेय ने तेजेन्द्र शर्मा के कथा साहित्य को सामने रखकर उनकी कथा प्रस्तुति की शैली, कथ्य की संप्रेषणीयता, पात्रों के चयन, पात्रों की भावनात्मक स्थितियों, मनुष्य जीवन के संत्रास और कहानियों के समापन के अनूठे अंदाज को विशेष रूप से समालोचित किया है। भूमिका के आखिरी हिस्से में तेजेन्द्र शर्मा की पत्रकारिता और उनकी आलोचनात्मक दृष्टि पर भी संक्षिप्त टिप्पणी की गई है। इस भूमिका को थोड़ा और विस्तार दिया जाना चाहिए था क्योंकि किताब में संकलित साक्षात्कार केवल तेजेन्द्र शर्मा के कथा साहित्य तक सीमित नहीं हैं, बल्कि समकालीन समय के ऐसे प्रामाणिक कथन हैं जिनकी पुष्टि तथ्यों से होती है। फ़िलहाल यह आशा की जा सकती है कि लेखकद्वय उनके अन्य साक्षात्कारों को अपनी अगली पुस्तक में प्रस्तुत करेंगे और तब वे सभी अवशेष पहलू भी स्थान पा सकेंगे जो इस किताब का हिस्सा नहीं बन सके हैं। विभिन्न साक्षात्कारों में कुछ तथ्यात्मक बातों, विशेष रूप से तेजेन्द्र शर्मा की पारिवारिक पृष्ठभूमि एवं जीवन क्रम का बार-बार उल्लेख आया है। इस दोहराव को संपादक द्वय दूर कर सकते थे, लेकिन संभव है कि साक्षात्कारों के मूल स्वरूप को परिवर्तित न करने की इच्छा की वजह से उन्होंने इस पुनरावृत्ति को यथावत रहने दिया हो। अब सवाल यह है कि इस किताब को क्यों पढ़ा जाना चाहिए। इसका सहज उत्तर ये है कि यदि समकालीन हिंदी साहित्य, और उसमें भी विशेष रूप से कथा साहित्य एवं प्रवासी साहित्य को अच्छी प्रकार से समझना हो तो यह किताब मौजूदा समय की बेहतरीन किताबों में से एक है। भाषा प्रवाह पूर्ण है। शैली में प्रौढ़ता, प्रवाह और अर्थपन बहुत अच्छी प्रकार से घटित हुआ है।

चूँकि, तेजेन्द्र शर्मा इंग्लैंड में रहते हैं और रोजमर्रा की जिंदगी में अंग्रेजी का प्रयोग करते हैं इसलिए विभिन्न साक्षात्कारों में अंग्रेजी के शब्दों का सहज रूप से प्रयोग हुआ है। जैसे डॉ. भूपेंद्र हरदेनिया द्वारा लिए गए साक्षात्कार में इंटेलेक्चुअल, होलसेल, अटैक, लाइसेंस, स्पॉन्टेनियस, ब्रिलियंट, टाइट, आइडियलिस्टिक रियलिज्म, विजन, फंडा, प्राइज आदि शब्द बहुत सहज प्रवाह में आए हैं। तेजेन्द्र शर्मा अक्सर इस बात का संकेत करते हैं कि वे हिंदी में राजेंद्र यादव के लेखन, विशेष रूप से भाषा से प्रभावित हैं। तेजेन्द्र शर्मा की भाषा की तुलना यदि राजेंद्र यादव की भाषा से करें तो उन पर राजेंद्र यादव का काफी प्रभाव दिखाई देता है। दोनों ही अंग्रेजी के पारिभाषिक और प्रभावपूर्ण शब्दों को सायास-अनायास अपनी भाषा में ले आते हैं। इस किताब में संकलित साक्षात्कारों में न केवल हिंदी साहित्य की मौजूदा दुनिया, बल्कि अंग्रेजी साहित्य की पद्धतियों, प्रवृत्तियों, वैचारिक फलकों एवं टेक्निक्स की भी झलक दिखती है। साथ ही, तेजेन्द्र शर्मा फिल्मों के प्रति अपने आकर्षण और फिल्मी लेखन की परंपरा एवं चुनौतियों का भी जिक्र करते चलते हैं। वस्तुतः इस किताब के सभी साक्षात्कार अनेक दिशाओं को एक बिंदु पर लेकर आते हैं और वह बिंदु है- तेजेन्द्र शर्मा की साहित्यिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक समझ को प्रस्तुत करना।

साररूप में कहा जा सकता है कि डॉ. दीपक पाण्डेय और डॉ. नूतन पाण्डेय की  यह किताब तेजेन्द्र शर्मा की जिंदगी के अच्छे या मुश्किल पलों और उनके बीच से ढूंढे गए रास्ते को आम पाठकों के सामने प्रस्तुत करती है। इस किताब के जरिए केवल आम पाठक ही नहीं, बल्कि युवा लेखक और शोधार्थी भी उनके व्यक्तित्व और कृतित्व, दोनों के विषय में व्यापक समझ विकसित कर सकते हैं। वस्तुतः किसी भी व्यक्ति का जीवन अनेक जटिलताओं अथवा विरुद्धों से मिलकर बना होता है। उन्हीं में से अनेक विरुद्धों और उनके बीच के सामंजस्य को लेखक तेजेन्द्र शर्मा सहजता से प्रस्तुत करते हैं। वे गंगा से टेम्स के बीच की दूरी (सामाजिक, सांस्कृतिक, दार्शनिक स्तर पर) को अपनी रचनाधर्मिता के माध्यम से पाटने की जो कोशिश कर रहे हैं, उनकी इसी कोशिश के कुछ अच्छे हिस्सों को यह किताब पाठकों के सामने प्रस्तुत करती है।
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डॉ. सुशील उपाध्याय
प्राचार्य, चमनलाल स्नातकोत्तर महाविद्यालय, लंढौरा,हरिद्वार (उत्तराखंड) 
चलभाष: 9997998050

2 comments :

  1. आभार, हालाँकि थोड़ा झटका लगा लेकिन मैं प्रवास पर शोध कर रहा था इसलिए मेरा उद्देश्य सिर्फ़ प्रवास के बारे में प्रश्न करना था। यह साक्षात्कार किसी पुस्तक का हिस्सा बनेगा इसकी मुझे जानकारी नहीं थी। फिर भी आपने मेरे साक्षात्कार का ज़िक्र किया इसके लिए पुन: आभार

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  2. बहुत सार्थक और विषद विवेचना की है। एक बात अच्छी लगी कि सिर्फ़ प्रशंसा ही नहीं खामियों को भी लिखा है। बधाई

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