बचपन में ही मुझमें अक्षरों के जरिए अपने आसपास की दुनिया को जानने की ललक पैदा हुई!

अशोक बैरागी

साक्षात्कारकर्ता: अशोक बैरागी

वरिष्ठ बाल साहित्यकार प्रकाश मनु से अशोक बैरागी की बातचीत

अशोक बैरागी: आदरणीय, सर्वप्रथम मैं आपको सादर प्रणाम करता हूँ और धन्यवाद देता हूँ कि आपने मुझे यह सुअवसर दिया। मेरा प्रथम प्रश्न यह है कि आपने बाल साहित्य को हर दृष्टि से संपन्न किया है या यों कहें, बाल साहित्य को आप श्वास-श्वास जी रहे हैं। तो सबसे पहले आप अपने जीवन की कुछ मधुर स्मृतियाँ बताइए।
प्रकाश मनु: अशोक जी, मैं बचपन में बहुत अलग तरह का, शांत और अपने में ही लीन रहने वाला एकांतप्रिय बालक हुआ करता था। यानी अकेला, बैठे-बैठे सोचने वाला बुद्धू-सा बच्चा। अधिक दुनियादार या होशियार नहीं था। बचपन की बहुत छोटी-छोटी घटनाएँ मुझे याद आती हैं। एक बार मैं माँ के साथ तालाब पर गया था। माँ साथिनों के साथ सप्ताह में एकाध बार वहाँ कपड़े धोने जाती थीं। कपड़ों का एक बड़ा-सा गट्ठर माँ ने उठा रखा था और एक छोटी-सी पोटली मैंने भी पकड़ी हुई थी। तालाब बड़ा था और वहाँ आसपास बड़ा खुला विस्तार था प्रकृति का। दूर-दूर तक पीले-पीले फूलों वाले सरसों के खेत और जंगली झाड़ियाँ थीं। उनमें पीले बेशर्म के फूल खिले हुए थे।...

जीवन-संगिनी डॉ. सुनीता के साथ प्रकाश मनु
मनु जी अपनी रौ में थे, पर बीच में ही उनकी पत्नी सुनीता जी बोल पड़ती हैं, “देखो, आम तौर से जिसे गुलबाँसा कहा जाता है, उसे ही ये बेशर्म के फूल कहते हैं।...”

प्रकाश मनु: हाँ, तो प्रकृति के अनमोल उपहार की तरह उगे ये पीले-पीले सुंदर फूल मुझे बहुत अच्छे लगे। वहाँ आकर मैंने देखा कि प्रकृति कितनी सुंदर और विस्तृत है। दूर-दूर तक खेतों और हरियाली का विस्तार...! वहाँ सर्दियों की धूप और दूर-दूर तक सरसों के खेत थे, जिनमें पीले फूल खिले हुए थे। वहाँ एक शिशु ने पहली बार प्रकृति की सुंदरता और अनंतता का अनुभव किया। तब तक मैं कविता का क, ख, ग, भी नहीं जानता था। पर लगता था, जाने-अनजाने मैंने शायद पहली दफा कविता की-सी अनुभूति की, जिसमें मैंने जीवन की मुक्त लय और अनंतता को महसूस किया।
थोड़ा और बड़ा हुआ तो मैं पढ़ने में खासी रुचि लेने लगा और मुझमें अक्षरों के जरिए अपने आसपास की दुनिया को जानने की रुचि पैदा हुई। जैसे ही मैंने अक्षर जोड़-जोड़ कर पढ़ना सीखा, मैंने किताबें पढ़नी शुरू कर दीं। घर में अखबार के अलावा किताबें भी बहुत थीं। पाँचवीं-छठी तक मैंने प्रेमचंद, शरतचंद्र और रवींद्रनाथ ठाकुर जैसे बड़े-बड़े साहित्यकारों को पढ़ लिया था। कुछ समझ में आता था, कुछ नहीं भी। पर जो समझ में आता था, उसके जरिए उस सबका भी अर्थ खुलने लगा था, जो शुरू में मेरे लिए अबूझ था।
उन दिनों अखबारी कागज के लिफाफे चलते थे। उन्हीं में घर में दाल, चीनी, चावल और दूसरी जरूरत की चीजें आती थीं। बाद में जब वे खाली हो जाते, तो मैं उन्हें झपट लेता। उन्हें खोलकर सीधा करके पढ़ता था। उनमें कभी कोई लेख, कभी कविता-कहानी, कभी कोई अखबारी टिप्पणी या समाचार होता। पर मैं अखबार के उस टुकड़े में लेख या रचना के जिस हिस्से को पढ़ रहा होता, उनका न वहाँ आदि होता था, न अंत। केवल बीच का हिस्सा होता था। पर उसी से मैं प्रारंभ और अंत का अनुमान लगा लेता, और कल्पना में उस रचना को पूरा कर लेता। इन क्षणों में मुझे ऐसा लगता था, जैसे उन छपे हुए अक्षरों से मेरे अंदर रोशनी हो रही है। मन में एक उजाला सा फूट रहा है। किसी दुख और करुणा से भरी कहानी को पढ़कर मैं बड़ा द्रवित होता था। एक हाथ से किताब पकड़े, दूसरे से आँसू पोंछता रहता था, पर किताब हाथ से छूटती नहीं थी।
छुटपन में ही प्रेमचंद को पढ़ा, निराला को पढ़ा तो मुझे लगा, ये इतने बड़े साहित्यकार हैं कि इनकी रचनाएँ पढ़ते ही दिल पर नक्श हो जाती हैं। तभी पहलेपहल अहसास हुआ कि प्रेमचंद और निराला से बड़ा कोई साहित्यकार नहीं हैं, क्योंकि इनकी कोई भी रचना पढ़ो, ये जैसे दिल पर राज्य करते हैं।

अशोक बैरागी: आपने अपने बचपन को बड़ी संजीदगी से जिया है। लगता है, बचपन में सुनी कहानियों ने ही आपको आगे चलकर बच्चों के लिए लिखने की प्रेरणा दी...!

प्रकाश मनु: हाँ, आपने ठीक कहा। शायद माँ और नानी से सुनी कहानियाँ ही मुझे जाने-अनजाने लेखक बना रही थीं। माँ मुझे बहुत प्यार करती थीं। उनसे अधकू की कहानी सुनता तो मुझे लगता था, जैसे अधकू की कहानी मेरी अपनी ही कहानी है। मैं भी तो जैसे एक हड्डी का और बड़ा कमजोर-सा था। मेरे भी सात भाई थे। मेरी माँ या पिता जी ने पीटना तो दूर, कभी डाँटा तक नहीं था। माँ ने तो कभी फूल से भी नहीं मारा। पर हाँ, पिता कभी गुस्से में होते तो उनके चेहरे या उनकी कही किसी छोटी सी बात से भी यह पता चल जाता था। “कुक्कू, यह क्या किया तुमने...?” अगर वे तनिक गुस्से में या ऊँची आवाज में कहते तो हमारे लिए इतना ही काफी था।
हाँ, बड़े भाई जरूर कभी-कभी डाँट देते थे। सात भाई और दो बहनों का बड़ा परिवार था हमारा। यानी कुल नौ भाई-बहन। मैं आठवें नंबर का था। मुझसे छोटा बस सत था, मेरा छोटा भाई। कमलेश दीदी मुझसे कोई दो बरस बड़ी थीं, और हम लोग बचपन में मिलकर खेलते थे। इसी तरह श्याम भाई साहब मुझसे कोई तीन, साढ़े तीन बरस बड़े थे। बाकी भाई-बहन काफी बड़े थे।
बचपन की एक घटना मुझे याद आती है। उन दिनों हमारा मकान बन रहा था और मैं छज्जे पर खड़ा था। छज्जे की मुँडेर अभी बनी नहीं थी। तभी तेज आँधी के साथ बरसात शुरू हो गई। खूब ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी। ऐसे में नहाने का मजा ही कुछ और था। मैंने कुरता उतारा और नीचे फेंका, ताकि मजे में नहा सकूँ। पर यह क्या...? मैं छज्जे से झुककर कुरता फेंक रहा था कि तभी अचानक कुरते के साथ ही मैं खुद भी धड़ा...म! मैं नीचे पक्के फर्श पर गिरा और पता नहीं कैसे आलती-पालथी मारकर बैठ गया। मुझे चोट तो नहीं लगी, पर सारे घर में बड़ा हो-हल्ला, बल्कि हड़कंप मच गया, “हाय! कुक्कू, छत से गिर गया, कुक्कू छत से गिर गया...!” फौरन हमारे पारिवारिक डॉक्टर भटनागर जी को बुलाया। उन्होंने चेकअप किया। बोले, “बाहर से तो कोई खास चोट नहीं लगी, पर भीतर कोई गुम चोट हो सकती है। कुछ दिन यह पूरी तरह आराम करे। मैं बीच-बीच में आकर देखता रहूँगा।” इसके बाद कुछ दवाएँ देकर वे चले गए।
अब तो सारे घर के छोटे-बड़े लोग आ-आकर मुझसे पूछते कि अरे कुक्कू, तू गिरा कैसे? सबका खूब प्यार और दुलार मिल रहा था। कई दिनों तक मेरी खूब सेवा हुई, हल्दी का दूध पिलाया गया। खाने को बढ़िया-बढ़िया फल। उस समय मुझे बड़ा मजा आया। मुझे लेकर खूब हल्ला मचा है, सेवा हो रही है, दूध दिया जा रहा है। मैं जैसे वी.आई.पी. हो गया हूँ। कमलेश दीदी स्कूल जातीं। लौटकर पूछतीं, “कुक्कू कुछ चाहिए तुम्हें?” एक दिन मैंने कहा, “तुम एक कहानी लिखो कि एक दिन कुक्कू छत पर नहा रहा था। तभी आँधी आई और वह छत से गिर पड़ा...! मैं इसके बदले तुम्हें एक पैसा दूँगा।”
दीदी ने एक कागज पर चार टेढ़ी-मेढी लाइनें लिखीं और मैंने उन्हें एक पैसा दे दिया। वह कागज मैंने आहिस्ता से तकिए के नीचे रख लिया। आखिर वह कागज का टुकड़ा, जिस पर कुक्कू की कहानी लिखी गई थी, मेरे लिए अनमोल खजाने जैसा था। मेरे कहने पर बहुत बार उन्होंने यह कहानी लिखी। हर बार मैंने उन्हें बदले में एक पैसा दिया और वे कागज के टुकड़े सँभालकर रख लिए। मेरे लिए वे सचमुच अनमोल थे। अनमोल खजाने की तरह।...शायद उस छोटी सी उम्र में ही मैंने जान लिया था, कि साहित्य या कोई रचना अनमोल होती है। उसकी कोई कीमत नहीं होती। यहाँ तक कि लिखा हुआ कागज भी जैसे कोई पवित्र चीज हो। तो चेतन या अवचेतन में शायद भाव यह था।

अशोक बैरागी: बाल साहित्य का कुछ अंश साहित्यकारों के व्यक्तिगत जीवन से भी निर्मित होता है। क्या आपने भी ऐसा किया? कुक्कू छत से गिरा, यह प्रसंग क्या आपकी किसी कहानी में आया है?

प्रकाश मनु: हाँ अशोक जी, आपकी यह बात ठीक है कि अक्सर ऐसा होता है। साहित्य बड़ों का हो या बच्चों का, उसमें लेखक के निजी जीवन के बिंब, घटनाएँ और अनुभव आते ही हैं। मैंने अपने जीवन की बहुत सी तकलीफों, त्रासद अनुभवों और विड़ंबनाओं को, ‘यह जो दिल्ली है’ और ‘कथा सर्कस’ उपन्यासों में किसी न किसी रूप में लिखा है, आप उन्हें पढ़ सकते हैं। बच्चों के साहित्य में भी ऐसा हुआ है। बचपन में कुक्कू के साथ घटी यह घटना सीधे-सीधे तो कहानी में नहीं आई। पर मैं सोचता हूँ कि इसे किसी कहानी में लाना चाहिए। हो सकता है, कभी आ ही जाए। हालाँकि बहुत सोचकर या तय करके ऐसा नहीं हो पाता। लेखन में चीजें अनायास होती हैं। हाँ, मैंने अपनी आत्मकथा में इस घटना का बहुत विस्तार से वर्णन किया है।
वैसे तो कुक्कू की कई कहानियाँ हैं, जिनका नायक बचपन का वही भोला और मासूम सा कुक्कू है, जो अपनी आँखों से जीवन के तमाम रंग-रूप पहली बार देख रहा था। अभी कुछ समय पहले बच्चों के लिए लिखी गई मेरी बड़ी ही रोचक और रसपूर्ण कहानियों की किताब आई है, ‘चश्मे वाले मास्टर जी’।’ इसमें मेरी बहुत सी पसंदीदा कहानियाँ हैं। इस संग्रह की शीर्षक कथा ‘चश्मे वाले मास्टर जी’ मेरे जीवन की वास्तविक घटना पर आधारित है। इसमें जिन चश्मे वाले मास्टर जी का जिक्र है, वे वाकई थे और उन्होंने मुझे कच्ची कक्षा में पढ़ाया था। जिसे आज नर्सरी कहते हैं, उसी को हमारे समय में कच्ची क्लास कहा जाता था। दाखिला होने पर पहले बच्चे कच्ची में पढ़ते थे, फिर पहली कक्षा में जाते थे।
तो उसमें सच्चा किस्सा है, उस समय का, जब मैं पहले दिन स्कूल गया। कमलेश दीदी मुझसे दो साल बड़ी थीं। वे फ्रॅाक पहन, रिबन लगाए और हाथ में छोटा सा बस्ता और तख्ती लिए रोज स्कूल जाती थीं। हर रोज स्कूल से आने के बाद वे खूब सारी मजेदार बातें बताती थीं कि आज स्कूल में ऐसा हुआ, ऐसा हुआ। और मैं बुद्धू की तरह आँखें फाड़े देखता। उसकी बातें सुनकर मुझे बड़ा अच्छा लगता था। सोचता था, अरे वाह, स्कूल तो सचमुच बड़ी मजेदार चीज है। रोज सुबह-सुबह वे हाथ में काली तख्ती और बुदक्का लेकर सहेलियों के साथ जाती थीं और मैं हैरानी से उन्हें देखा करता था।

अशोक बैरागी: बुदक्का? यानी?

डॉ॰ सुनीता: – (बीच में अचानक...) बुदक्का यानी मिट्टी की छोटी सी कुलिया, जिसमें खड़िया घोलकर रखी जाती थी। हम लोग जिस तरह तख्ती को मुल्तानी मिट्टी से पोतते हैं। ये तवे की कालोंच से पोतते थे और फिर सफेद खड़िया में कलम डुबो-डुबोकर उस पर लिखते हैं।

प्रकाश मनु: तवे की वह कालोंच कपड़ों पर न लगे, इसके लिए उसे एक घोटने से घोटना होता था, जिससे वह खूब चिकनी और चमकीली हो जाती थी। फिर सफेद खड़िया में कलम डुबो-डुबोकर उससे लिखते थे। काली तख्ती पर वे सफेद अक्षर एकदम मोतियों जैसे चमकते थे। खैर...! तो हुआ यह कि एक दिन दीदी के कहने पर मैं भी उनकी उँगली पकड़कर स्कूल गया। वे कच्ची वाली क्लास में मुझे बैठाकर, अपनी क्लास में चली गईं। कहा, देख “कुक्कू, वहाँ मेरी क्लास है, कोई बात हो तो बता देना।” तो मैं अपनी क्लास में एकदम पीछे टाट पर जाकर बैठ गया। वहाँ चश्मा पहने एक मास्टर जी बच्चों को कहानी सुना रहे थे। कहानी मजेदार थी। इसलिए मैं भी सुनकर मजे-मजे में गर्दन हिला रहा था। मैं सबसे पीछे बैठा था, पर उनकी सतर्क निगाहों की पकड़ में आ गया। उन्होंने कहा, “अरे, यह कौन नया लड़का आया है?” फिर उँगली का इशारा करते हुए कहा, “जरा आगे आओ, भई।”
मैं घबरा गया। पता नहीं, जाने अब क्या होगा? पास गया तो उन्होंने हँसते हुए पूछा, “नए आए हो?” मैंने गर्दन हिलाकर ‘हाँ’ कहा। उन्होंने पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है?” “कुक्कू...!” मैंने कहा। पर सुनते ही मास्टर जी की तो आँखें फैल गईं। “घुग्घू?” उन्होंने बड़ी-बड़ी आँखें करके पूछा। “नहीं मास्टर जी, कुक्कू”। मैंने कहा। “हाँ, वही तो कह रहा हूँ, घुग्घू! घुग्घू...!! अरे, यह कैसा नाम है?” उन्होंने बड़ी हैरानी से कहा। जब दो-तीन बार यही किस्सा हुआ तो मैंने कहा, “रुको।” मैं दौड़ा-दौड़ा कमलेश दीदी की क्लास में गया और हाथ पकड़कर उन्हें बुलाकर लाया। कमलेश दीदी ने पूछा, “क्या बात है?” मैंने कहा, “जरा मास्टर जी को मेरा नाम बता दो।” कमलेश दीदी बोलीं, “तू अपना नाम नहीं बता सकता था?” मैंने कहा, “मैंने बताया तो था, पर उनकी समझ में ही नहीं आ रहा।” “क्या बताया था तूने?” उन्होंने पूछा। “कुक्कू।” मैंने कहा। इस पर दीदी बोलीं, “अरे, यह तो घर का नाम है। स्कूल का नाम बताना चाहिए था।”
खैर, दीदी को साथ लेकर मैं मास्टर जी के पास पहुँचा। उन्हें देखते ही मास्टर जी ने पूछा, “तुम इसकी बहन हो?” उनके हाँ करते ही पूछा, “क्या नाम है इसका? यह तो पता नहीं, क्या बता रहा है, घुग्घू!” इस पर कमलेश दीदी ने मेरी गलती सुधारते हुए कहा, “मास्टर जी, इसने गलती से घर वाला नाम बता दिया। इसका स्कूल वाला नाम तो चंद्रप्रकाश हैं।” पर इस बार भी फड़कती मूँछों वाले चश्माधारी मास्टर ने पहले की तरह अपने होंठों को खूब फैलाकर, जोर से हँसते हुए कहा, “क्या कहा, संटपरकास....! यह कैसा नाम है?”
इस पर हम दोनों बहन-भाई और सभी बच्चे खूब हँस रहे थे। खैर, थोड़ी देर उन्होंने कहा, “अच्छा मैं समझ गया, चंद्रप्रकाश.....!” फिर मुझसे कहा, “शाबाश, बैठ जाओ।” दीदी अपनी क्लास में चली गईं। कुछ दिनों बाद मैंने अनुभव किया कि यही चश्मे वाले मास्टर जी मुझे सबसे ज्यादा प्यार करते हैं। और शुरू-शुरू में जो हँसी—मजाक उन्होंने किया, उसका मकसद शायद बच्चे को खोलना, उसे हँसाना और बोलकर उसकी हिचक दूर करना था। अलबत्ता मेरी इस कहानी के साथ-साथ ऐसी ही कुछ और आत्मकथात्मक बाल कहानियों का संग्रह ‘चश्मे वाले मास्टर जी’ कुछ अरसा पहले प्रभात प्रकाशन से छपकर आया है। इनमें अधिकतर बचपन की कहानियाँ हैं। कई तो एकदम शिशु अवस्था की कहानियाँ हैं।

अशोक बैरागी: प्रारंभ में आपको लिखने की प्रेरणा कब और कहाँ से मिली?

प्रकाश मनु: ऐसा है अशोक जी, फूल, पेड़, पौधे, हरे-भरे खेत, दूर तक फैले मैदान, यानी प्रकृति का सौंदर्य और उसका विस्तार शुरू से ही मुझे खूब लुभाता था। मुझे उसके साहचर्य में आनंद मिलता था और मैं अपने में खो-सा जाता था। कविता की मेरी पहली अनुभूति शायद यही रही हो। उससे भी बहुत पहले कहानियाँ सुनना मुझे बहुत प्रिय लगता था। बचपन में माँ और नानी से मैंने एक से एक रसपूर्ण कहानियाँ सुनीं, जिनका प्रभाव मुझ पर अब भी है, और उन कहानियों का जिक्र मैंने जगह-जगह किया है। फिर जीवन की विषमता, दुख और तकलीफें। घर में तो मैंने अभाव या गरीबी नहीं देखी थी। बल्कि कहना चाहिए, संपन्नता ही थी। अच्छा खाता-पीता परिवार था। लेकिन एक करुणा थी मन में कि देखो, हमारे पास तो ये सब चीजें हैं, पर ये उन लोगों के पास क्यों नहीं हैं जो हमारे आसपास हैं? वे कैसे और किन मुश्किलों से जी रहे हैं? उनके पास अच्छे कपड़े-लत्ते और ठीक से खाने को भी नहीं है। यह क्या हालत है! क्यों है?...तो ये भाव मन में रहता था।
इसके साथ जब प्रेमचंद, शरत, निराला और दिनकर आदि को पढ़ता तो मन पर उनकी करुणा और संवेदना का एक भावात्मक दबाव-सा रहता था। तब तक यह तो बहुत साफ नहीं था कि मैं भी आगे चलकर लिखूँगा। फिर भी इन सबसे अंतर्मन में एक प्रकाश, एक उजाला तो फैल ही रहा था।
फिर एक बात और। छोटी क्लासों में भी मैं हिंदी की पाठ्य पुस्तकों के प्रश्नों का जवाब बड़े सुंदर ढंग से लिखता था। जो भी पढ़ूँ, भीतर रस जाता था। उन दिनों छठी, सातवीं, आठवीं में हिंदी की एक सहायक पुस्तक चलती थी, ‘हमारे पूर्वज’। हर कक्षा के लिए उसके अलग-अलग खंड थे, जिनमें भारत के महापुरुषों की जीवनियाँ होती थीं। उसमें राम, भरत, शिवाजी, राणा प्रताप आदि के साथ-साथ स्वाधीनता सेनानी और क्रांतिकारियों की भी जीवनियाँ थीं। उन्हें पढ़ना मुझे बहुत अच्छा लगता था। कमलेश दीदी तब शायद छठी में थीं। उनकी पुस्तक ‘हमारे पूर्वज’ में एक पाठ भरत का था। एक बार दीदी ने कहा, “कुक्कू, मेरी किताब में भरत का पाठ है। उसके प्रश्न-उत्तर लिखकर ले जाने हैं। पर मेरी समझ में नहीं आ रहा, कैसे लिखूँ?” तब मैंने एक बार ध्यान से पूरा पाठ पढ़कर उन्हें उत्तर लिखवा दिए। वे उस कॉपी को क्लास में ले गईं तो क्लास टीचर में उनकी बहुत प्रशंसा की। दीदी स्कूल से लौटकर आईं तो खुश थीं। बोलीं, “कुक्कू, तूने बड़े अच्छे जवाब लिखवाए। मेरी हिंदी की मैडम ने बड़ी तारीफ की और क्लास में सबको मेरी कापी दिखाई।”...तब एक पल के लिए एक तृप्ति का उजाला मेरे चेहरे पर आया। मुझे लगा कि मेरे अंदर कुछ है।
वैसे मैं बहुत गैर-दुनियादार और अव्यावहारिक-सा था। दुनियावी तौर से बहुत होशियार नहीं था। पर मुझे लगा, इसकी प्रतिपूर्ति साहित्य में हो सकती है। मेरे पास कुछ है, जो सबमें नहीं है। मेरा यही खजाना है। फिर तो साहित्य पढ़ने के साथ-साथ जब-तब कुछ लिखने भी लगा। भले ही वह तुकबंदी रही हो, पर मुझे इसमें आनंद आता। शुरू में मैंने बच्चों के लिए कविताएँ नहीं लिखी थीं, बल्कि देशप्रेम की कविताएँ लिखी थीं। सन् 1962 में चीन के हमले ने मुझे अंदर-अंदर भावाकुल कर दिया था। मन में एक छटपटाहट सी थी। उसी मानसिक स्थिति में ये कविताएँ लिखी गई थीं। फिर आगे चलकर तरुणाई में मजदूरों के दर्द, तकलीफों और गरीबी को लेकर कविताएँ लिखीं। उनमें मैंने उनका जो दुख देखा और महसूस किया था, वह सीधे-सीधे फूट पड़ा था। कहना चाहिए, अभिधा में एकदम सीधी-सीधी बातें, जो मन को व्यातुल कर रही थीं।

अशोक बैरागी: मतलब आपने प्रारंभ में देशप्रेम, समाज के वर्ग-संघर्ष, गरीबी और अभाव को लेकर लिखा या यों कहें कि हाशिये पर पड़े, उपेक्षित, दलित, अभावजनित, व्यक्ति की चिंता व सरोकारों से जुड़े। फिर जैसे-जैसे ज्ञान, समझ और अनुभव का विस्तार हुआ, वैसे ही लेखन में विस्तार आता चला गया।

प्रकाश मनु: हाँ, इन्हीं आंतरिक दबावों और अंतःप्रेरणाओं से मैंने लिखना शुरू किया। और शुरू क्या किया, बस फिर तो मैं दौड़ पड़ा।

अशोक बैरागी: किन-किन साहित्यकारों को आप अपना आदर्श मानते हैं या जो आपको प्रिय हैं?

प्रकाश मनु: शुरू में मुझे प्रेमचंद, निराला, मैथिलीशरण गुप्त, दिनकर और हरिऔध सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ बहुत अच्छे लगते थे। हमारी एक सहायक पुस्तक थी, ‘भाषा भास्कर’ जो छठी कक्षा से शुरू हो जाती थी। इसमें साहित्यकारों के जीवन, व्यक्तित्व और भाषा-शैली के बारे में बड़े सुंदर ढंग से बताया गया था। उसे हमारे ही पालीवाल इंटर कालेज के विद्वान अध्यापक शांतिस्वरूप दीक्षित जी ने लिखा था। किताब बड़ी सुंदर और रोचक थी। मुझे वह इतनी पसंद थी कि मैं रोज सुबह उठकर उसे पढ़ता था। इसके उद्धरण बहुत अच्छे लगते थे और मैं जोर-जोर से बोलकर उन्हें याद किया करता था।
तो उस पुस्तक से मुझे साहित्य के अगाध समंदर की पहचान हुई। उसकी दो-चार बूँदें चखीं, तो मैं आनंद में निमग्न हो गया। मन करता था, और पढ़ूँ, और पढ़ूँ, और पढ़ूँ। जैसे मुझे एक नया संसार मिल गया और लगा, जैसे भी हो, जहाँ से भी मिले, इनके बारे में और अधिक जान लूँ। मुझे आज भी याद है कि दिनकर और बालकृष्ण शर्मा नवीन की कविताओं के ओजपूर्ण उद्धरण पढ़कर मेरी मुठिठ्याँ तन जाती थीं। मन में बड़ा उत्साह और जोश भर जाता था। दिनकर की “दूध-दूध, ओ वत्स तुम्हारा दूध अभी लाते हैं” या “पापी महलों का अहंकार तब देता मुझको आमंत्रण...!” पंक्तियाँ पढ़कर नसें फड़कती थीं। ऐसे ही नवीन जी की कविता थी, “लपक चाटते जूठे पत्ते जिस दिन देखा मैंने नर को,/ उस दिन सोचा क्यों न लगा दूँ आग आज इस दुनिया भर को,/ यह भी सोचा, क्यों न टेंटुआ घोंटा जाए स्वयं जगपति का/ जिसने अपने ही स्वरूप को रूप दिया इस घृणित विकृति का...!”
मैं समझता हूँ, मेरे भीतर समाज की विषमता और साथ ही देशराग की कविताएँ लिखने की पृष्ठभूमि यहाँ से भी तैयार हुई। यही जोश, यही उबाल किसी और रूप में सामने आया। फिर कुछ बड़ा हुआ तो छायावादी कवि अच्छे लगने लगे। पंत, प्रसाद निराला, महादेवी वर्मा के गीत और रागात्मक कविताएँ मोहती थीं। जब मैं कुरुक्षेत्र आया, तब हर वक्त इसी दुनिया में रमा रहता था। वह गीतों और कविताओं का रागात्मक संसार था। राह चलते हवा में भी जैसे उँगलियों से भी मैं कविताएँ लिखता चलता था। एक आत्म-सम्मोहन की हालत थी। उस दौर में मैंने बहुत गीत लिखे जो बाद में ‘सरिता’ और ‘मुक्ता’ में छपे। फिर आगे चलकर बहुत कुछ नया पढ़ने जानने को मिला तो कविता की एक अलग समझ बनी। अज्ञेय अच्छे लगने लगे। धर्मवीर भारती और सर्वेश्वरदयाल सक्सेना अच्छे लगने लगे। इसके बाद धूमिल और मुक्तिबोध को पढ़ा तो एक बिल्कुल नई दुनिया सामने आई। मुक्तिबोध, धूमिल कहना चाहिए, मुझ पर छा गए। यह वह दौर था, जब मैंने प्रगतिशील कविता के सौंदर्य और ताकत को महसूस किया था। जीवन यथार्थ की कविताएँ मुझे कहीं अधिक अच्छी लगने लगीं। उनका मन पर कुछ अलग ही असर पड़ता था।
यही वह दौर था, जब मैंने महसूस किया कि प्रगतिशील साहित्य कर्म-सौंदर्य का साहित्य है, जीवन-संघर्ष का सौंदर्य है। इसीलिए दुख, संघर्ष में वह आपका साथ देता है। ताकत देता है, और बुरे समय में सहारा बन जाता है। जबकि छायावादी सौंदर्य यहाँ पीछे छूट जाता है। आपके दुख और लडाइयों में वह साथ नहीं आता। वह दुख और पीड़ा की बहुत चर्चा के बावजूद सुखवादी साहित्य है, दुख, अभाव और संघर्षों का नहीं। जबकि यह दौर थी, जब मैंने अपने जीवन में भी कई चोटें खाईं, काफी कष्ट और तकलीफें महसूस कीं। तो कुरुक्षेत्र आने के बाद मेरे लिखने की धारा में फिर एक बड़ा बदलाव आया।
उसके बाद जब दिल्ली आया और लोक साहित्य के फकीर देवेंद्र सत्यार्थी जी के संपर्क में आया तो उनके काम और जीवन ने मुझे बहुत प्रभावित किया। कुछ अरसे बाद रामविलास शर्मा जी के निकट आया। जब मैं एम.ए. कर रहा था तो ‘निराला की साहित्य साधना’ को मैंने किसी मर्मस्पर्शी उपन्यास की तरह पढ़ा था, जिसका शब्द-शब्द मेरे भीतर उतरता गया था। तब पहली बार मैंने निराला को भीतर से जाना था, रामविलास शर्मा के होने को जाना था। बाद में उनसे बहुत बार मिला तो उन्हें और भी निकट से जाना। प्रगतिशील साहित्यकार होते हुए भी उनके भीतर जो गहरा देशराग है, वह मुझे मुग्ध करता था। और सच ही रामविलास केवल प्रगतिशील साहित्यकार के फ्रेम में कैद नहीं रहे। उनका कद बहुत बड़ा है। सच पूछिए तो उनकी रचनाएँ हिंदी पट्टी के लोगों में स्वाभिमान पैदा करती थी। इसी तरह शैलेश मटियानी कहानीकार के रूप में मेरे आदर्श रहे हैं। विष्णु खरे की कविताएँ मुझे बहुत प्रिय हैं। और मैंने इन सब पर बहुत विस्तार से लिखा भी है।

अशोक बैरागी: मनु जी, लगता है कि आपने अपने समय के प्रतिनिधि साहित्यकारों को पढ़ा। उनसे प्रेरित हुए तो वैसे ही साहित्यिक संस्कार आपमें निर्मित होते चले गए और इसी कारण आपके सृजन में विविधताएँ आती रहीं।

प्रकाश मनु: हाँ, आप कह सकते हैं। और जहाँ तक बाल साहित्य की बात है, तो वह तो मैंने कुछ बाद में शुरू किया। उससे मन एक अलग ही आनंद में रमता चला गया।

अशोक बैरागी: प्रारंभ में जब आपने लिखना शुरू किया तो उसके प्रकाशन और लेखन की क्या स्थिति रहती थी?

प्रकाश मनु: कविताओं में मैं भाषा और लय को लेकर बहुत सजग था। एक-एक रचना को दस-दस बार पढ़ता था। बार-बार उसे काटकर सुधारता था, जब तक मन को पूरी तसल्ली न हो जाए। यों कोई एक कविता महीनों तक भी चल सकती थी। फिर जब छपने के लिए भेजता था तो ग्यारहवीं बार उसे फिर से पढ़कर भेजता था। इसलिए छपने में ज्यादा दिक्कत नहीं आई। हाँ, रचना कहीं भेजने में मैं बड़ा संकोची था। मित्र पढ़कर कहते थे कि रचना अच्छी है, छपने के लिए भेजो। फिर इक्का-दुक्का रचनाएँ जहाँ भी भेजता था, वहीं छप जाती थीं। पर जैसा कुछ मन में घुमड़ रहा है, वही कविता में आए, ज्यों का त्यों आए, यह कहीं बड़ी चुनौती थी।
तो उस समय बस लिखने का ही पागलपन था, छपने का नहीं। जो भी लिखा, वह सारा का सारा छपे, ऐसी इच्छा भी नहीं थी। लिखने के बाद भी एक अंतःसंघर्ष चलता था कि मैंने क्या लिखा है? इसके कुछ मानी भी हैं? क्या यह सचमुच रचना है? फिर दूसरों से उसकी तुलना करता था कि मैंने कैसा लिखा है और मेरी रचना वैसी क्यों नहीं बनी, जैसी मैं चाहता था। बार-बार पढ़ता और सुधार करता था। आज भी ऐसे ही करता हूँ। तो जहाँ तक छपने की बात है, जो लिखा वही छप गया, और अगर कुछ नहीं भी छपा, तो उसका अधिक मलाल नहीं है।...मगर मुश्किल तो लिखना है। जैसा मैं चाहूँ, ठीक वैसा लिख पाना। और वह मुश्किल तो आज भी है।

अशोक बैरागी: आपके बाल साहित्य लेखन की शुरूआत कैसे और किन परिस्थितियों में हुई?

प्रकाश मनु: तरुणाई के दौर में, जब मैं बी.एस-सी. कर रहा था, मैं काफी तेजी से लिखने लगा था। बहुत बेचैनी थी भीतर, जो लिखवाती थी। और ऐसा नहीं है कि मैंने शुरू से ही बच्चों के लिए लिखा हो। मैंने आपको बताया कि सन् 1962 में जब मैं 11-12 साल का था तो उन्हीं दिनों हमारे देश पर चीन ने हमला किया। उस समय ऐसा लग रहा था, जैसे उसने पूरे देश की पीठ में छुरा घोंप दिया हो। मैं बहुत आवेश में रहता था। मुझे ऐसा लगता था कि सीमाओं पर जाकर लड़ूँ और चीन से बदला लूँ। एक तरह से पूरे देश के तरुणों और युवाओं की मानसिकता यही थी। उस समय लोगों में एकता और स्वाभिमान बहुत था। सारा देश एक था।
मुझे याद है, हमारे शहर में बहुत बड़ा जुलूस निकला था। तब मैं पालीवाल इंटर कॉलेज में पढ़ता था और हमारे कॉलेज के ही एक वरिष्ठ अध्यापक हरिश्चंद्र पालीवाल उसका नेतृत्व कर रहे थे। यह जुलूस पूरे शहर में घूमा था। तब ‘चाऊ एन लाई, हाय! हाय!’ के नारे लगे थे।...तो मैं ग्यारह-बारह साल का ही रहा होऊँगा, जब मैंने चीन के हमले से व्यथित होकर देशभक्ति की कविताएँ लिखी थीं। राणा प्रताप, शिवाजी और सुभाषचंद्र बोस पर लिखी कविताओं की मुझे अब भी याद है। हालाँकि ये कोरी तुकबंदियाँ थीं, पर एक शुरुआत तो हो ही गई थी। भीतरी आवेग को मैंने कविताओं में ढालने का सुख जान लिया था। उसके बाद तरुणाई में गरीबी और अभाव, उत्पीड़न और समाज की विषमताओं को लेकर आवेगपूर्ण कविताएँ लिखी। कुछ अरसे बाद बच्चों के लिए लिखना शुरू किया तो कुछ देशराग की कविताओं के अलावा बच्चे के आसपास के संसार पर लिखा। इसी दौर में प्रकृति को लेकर कुछ बाल कविताएँ लिखी गईं। चिड़िया और चाँद पर कुछ अलग सी कविताएँ लिखीं।

डॉ॰ सुनीता: बच्चों के लिए कविताएँ लिखने का सिलसिला एक बार चला तो फिर रुका नहीं। इनकी भाषा और लय बड़ी सुंदर होती थी। बच्चों को लुभा लेने वाली। उनमें काफी नयापन भी था...

प्रकाश मनु: (हँसकर) अब आप देखिए, चाँद को अक्सर मामा कहा जाता है। पर मैंने जो बालगीत लिखे, उनमें बहुत कुछ नया और लीक से हटकर है। मैंने चाँद को मामा नहीं, छोटा बच्चा यानी भैया कहकर संबोधित किया है। उस गीत की पंक्तियाँ हैं, “जल्दी आओ, भैया चाँद, ले लो एक रूपैया चाँद, ...आओ पाँ-पाँ पइयाँ चाँद!” ऐसे ही चिड़िया पर लिखी गई कविता ‘धीरे से मुस्कराती चिड़िया’ भी मुझे बहुत अच्छी लगती थी। ‘धर्मयुग’ में उन दिनों बच्चों के पन्ने बहुत अच्छे निकलते थे। इसमें दामोदर अग्रवाल, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, धर्मवीर भारती, कन्हैयालाल मत्त जैसे कवियों की रचनाएँ छपती थी। मैं इन पन्नों को काटकर डायरी में चिपका लेता था। घर-परिवार और आस-पड़ोस के बच्चों को एक जगह बैठाकर सुनाता था। बच्चों को सुनकर बहुत अच्छा लगता था। इससे बच्चों के लिए लगातार कुछ न कुछ कुछ लिखते रहने का मन हुआ। तो काफी कुछ लिखा भी। हिंदी के बहुत-सी पत्र-पत्रिकाओं में मेरी कविताएँ प्रमुखता से छपने लगीं। बच्चों के लिए लिखी गई कविताओँ में मेरी एक कथात्मक कविता ‘क्रिकेट’ साप्ताहिक हिंदुस्तान में छपी थी, और इसे बहुत पसंद किया गया।

अशोक बैरागी: बड़ों के लिखे गए साहित्य और बाल साहित्य में भाव और शिल्प को लेकर कुछ अंतर तो अवश्य होता हैं। आपके विचार से दोनों की रचनात्मक प्रक्रिया में क्या अंतर हैं?

प्रकाश मनु: देखिए, साहित्य तो साहित्य है, वह बड़ों का हो या बच्चों का। उसमें आप कुछ न कुछ नयापन, कुछ न कुछ अनूठापन लाने की कोशिश करते हैं। यानी उसमें भावों और कल्पना का अनूठापन है तो वह साहित्य है, वरना नहीं। इसी के साथ उसमें एक तरह की अद्वितीयता और पूर्णता होती है। और यह चीज आती कैसे है? सीधे-सादे लफ्जों में कहूँ तो जब आपके मन में कुछ लिखने का खयाल आता है तो आप शब्दों की एक समाधि में डूब जाते हैं। पूरी तरह उस भावना में खो जाते हैं। वह बच्चों का साहित्य हो या बड़ों का, लेखक के हिस्से का सच तो यही है। उसे हर बार उसी अहसास से गुजरना पड़ता है। वही खुद में डूबी-डूबी सी हालत। तभी उसमें यह प्रभाव आता है कि वह कविता या कहानी सीधे पाठकों के दिल में उतर जाती है।...वैसे बड़ों के साहित्य और बच्चों के साहित्य में ये अंतर रहा है कि बड़ों के जीवन में विडंबनाएँ बहुत अधिक होती हैं। उनमें से बहुत सी तो खुद मैंने झेली हैं। कदम-कदम पर भ्रष्टाचार, अभाव, गरीबी और षड्यंत्र...! यह भी एक सच्चाई है हमारी व्यवस्था की।
तो मैं भी एक समय कुछ विद्रोही किस्म का था। थोड़ा लड़ाका भी। बात-बात पर खीजने और झुँझलाने वाला बेचैन शख्स। यानी आप कह सकते हैं, सिर से पैर तक एक जलता हुआ ज्वालामुखी। इस समय मैंने जो झेला था, वह अकथनीय कथा है, उसे पढ़ना चाहें तो आप ‘यह जो दिल्ली हैं और ‘कथा सर्कस’ में पढ़ सकते हैं। इन उपन्यासों को लिखते समय मैं हर पल भीतर ही भीतर टूटता, खीजता और छटपटाता सा रहता था, क्योंकि उन्हीं परिस्थतियों को दोबारा जीना, उन नारकीय तकलीफों से फिर से गुजरना बहुत पीड़ादायक था।

अशोक बैरागी: सर, बिल्कुल सही कहा। स्वयं को पुनः उसी भट्ठी में जलाना और तिल-तिल गलाने जैसा अंतर्द्वंद्व बहुत तकलीफदेह होता हैं।

प्रकाश मनु: तो बड़ों के लिए लिखना इस मानी में थोड़ा असहज कर देने वाला था कि मुझे बार-बार फिर उन्हीं विकलता भरे अनुभवों से गुजरना पड़ता था। वही तकलीफें बार-बार झेलनी होती थीं। लेकिन मैंने महसूस किया कि बच्चों के लिए लिखते समय मेरा मन कुछ और निर्मल होता है, शांत होता है। ‘नंदन’ बाल पत्रिका में आकर मैंने बच्चों के लिए बहुत लिखा। ‘नंदन’ सन् 64 में निकलना शुरू हुआ। 31 जनवरी 1986 को मैं ‘नंदन’ के संपादन विभाग में आया। वहाँ जब कभी फुरसत मिलती थी तो मैं ‘नंदन’ की पुरानी फाइलें उलटने-पलटने लगता था, जिनमें हिंदी के एक से एक बड़े और दिग्गज साहित्यकारों बच्चों के लिए लिखी गई रचनाएँ पढ़ने को मिल जाती थीं। उन्हें पढ़ते हुए खुद-ब-खुद लिखने की इच्छा होती थी। कुछ लीक से हटकर लिखने की इच्छा होती थी, जो बच्चों के मन को आनंदित करे।
मुझे लगता था, बच्चों के लिए लिखने का आनंद ही कुछ और है। और सच ही, आज भी बच्चों के लिए लिखते समय मुझे ऐसा लगता है, जैसे मैं ईश्वर का ही अधूरा कार्य पूरा कर रहा हूँ।...लगता है, जैसे मेरी आत्मा थोड़ी निर्मल हो गई। मन को एक सुकून मिलता हैं।

अशोक बैरागी: अपनी श्रेष्ठ रचनाओं और पात्रों के विषय में कुछ बताइए?

प्रकाश मनु: किसी भी लेखक के लिए उसकी रचनाएँ बिल्कुल उसके बच्चों की तरह होती हैं। उनमें कौन सी कमतर है, कौन सी अच्छी, इसका चुनाव करना तो बहुत मुश्किल है। फिर भी अगर बच्चों के लिए लिखी गई कविताओं की बात करें तो ‘चिट्ठी’, ‘मटर का दाना’, ‘वह कविता रच जाओ तुम’, ‘नीम का पेड़’, ‘अपना घर भी चिड़ियाघर’ मेरी प्रिय रचनाएँ है। यों कविताएँ तो और भी हैं, पर किस-किस का नाम लूँ। बच्चों के लिए कविताएँ लिखते हुए लगा कि बहुत कुछ है जो इनमें अँट नहीं रहा। और तब बच्चों के लिए कहानियाँ लिखने का सिलसिला शुरू हुआ। मैंने ‘चुनमुन’, ‘निक्का’, ‘कुक्कू’ जैसे बाल पात्रों के साथ ‘गोगो’ और खुशी जैसी बालिका पात्रों को लेकर भी कहानियाँ लिखी हैं। इनमें कुक्कू तो मेरे अपने ही जीवन से आया है। मैंने अपने बचपन की जो कहानियाँ लिखी हैं, उनमें कुक्कू हर कहानी में है। यानी हर कहानी कुक्कू की कहानी है।
फिर कुछ कहानियों में मेरे बचपन के साथ-साथ इधर के बचपन की जो छवियाँ मेरे मन में, उस सबको मिलाकर कुछ लिखा गया। इनमें ठीक मेरे बचपन के ही किस्से न था। आज के बचपन के भी बहुत से अक्स थे। इन कहानियों का मात्र पात्र निक्का है, या फिर कुप्पू। तो खैर, मुझे बचपन की इन भोली और नटखट कहानियों को लिखने में रस आने लगा। इनमें हास्य भी है, नटखटपन भी, और बहुत बेमालूम ढंग से, खेल-खेल में दी गई कोई अच्छी सीख भी। इसी तरह कुछ कहानियों में बच्चे के मन और सपने हैं, उसकी एकदम अनछुई दुनिया है, जिसकी ओर झाँकने की कोशिश कोई करता ही नहीं।

अशोक बैरागी: बाल साहित्य में कल्पना और यथार्थ दोनों जरूरी हैं। आप किसको अधिक महत्त्व देते हैं और क्यों?

प्रकाश मनु: कल्पना और यथार्थ जैसी ये चीजें तो बहुत बाद की हैं। पहली चीज तो आपका मन और भावना है। आप बच्चे को देखते कैसे हैं और उसके बारे में आपकी सोच कैसी है, यह चीज कहीं अधिक जरूरी है। जैसे छोटे बच्चों को अगर कोई अध्यापक पढ़ा रहा है, तो मेरी नजर में अच्छा अध्यापक वह होगा, जो बच्चों का दोस्त बनकर उन्हें पढ़ाएगा। उस पर रोब डालने और डाँटने-फटकारने वाला अध्यापक मेरी नजरों में घटिया होगा। यहाँ तक कि अगर आप सोचते हैं कि बच्चे अज्ञानी हैं और आप उन्हें ज्ञान सिखाने के लिए आए हैं, तो भी आप अच्छे अध्यापक नहीं हो सकते। अच्छा अध्यापक होने के लिए आपको अपने और बच्चे के बीच फिजूल की दीवारों को तोड़ना पड़ेगा। ऐसे ही बच्चे के लिए लिखना है तो आपको पहले एक अबोध बच्चा बनना चाहिए। आप अपने बचपन में पहुँच जाइए और अपने ज्ञान का सारा बोझा किसी गहरे गड्ढे में डाल दीजिए। और फिर बच्चा बनने पर आप जो, जैसा अनुभव करते हैं, उस अहसास के साथ लिखिए। वही एक आदर्श बाल कविता या कहानी होगी।...
मुझे कन्हैयालाल मत्त की बात याद आती है। एक बार उनसे बात हुई तो मैंने पूछा था कि आपके ख्याल से एक अच्छी बाल कविता कैसी होनी चाहिए? इस पर उनका जो जवाब था, वह मुझे कभी नहीं भूलता। उन्होंने कहा था कि, “मनु जी, मेरी नजरों में अच्छी बाल कविता तो वही हो सकती है, जिसे पढ़कर या सुनकर बच्चे के मन की कली खिल जाए।” और यह बात तो मेरे खयाल से पूरे बाल साहित्य के लिए कही जा सकती है। यानी जिसे पढ़ या सुनकर बच्चे के मन की कली खिल जाए, वही बच्चे के लिए आदर्श कविता, कहानी या उपन्यास है। बच्चे को सीधे-सीधे उपदेश देने की कोशिश तो हमें कभी करनी ही नहीं चाहिए। बच्चा खेल-खेल में सीखे और खुद अच्छी चीजें ग्रहण हो। यही होना चाहिए। इसके बजाय ‘बच्चो, तुम्हें यह करना चाहिए, वैसा करना चाहिए’ ये ऐसी चीजें हैं जिनसे बच्चा दूर भागता है। यह ‘चाहिए’ जैसा शब्द तो साहित्य में आना ही नहीं चाहिए। ऐसे उपदेशात्मक बाल साहित्य को मैं सबसे घटिया मानता हूँ।

अशोक बैरागी: मतलब यह कि किसी कविता या कहानी को पढ़कर बच्चा स्वयं वैसा करे, या वैसा ही बनने के लिए प्रेरित हो, यह अच्छे बाल साहत्य की कसौटी है, न कि किसी बाहरी डर या दबाव में उसे वैसा बनाने का प्रयास किया जाए।

प्रकाश मनु: हाँ-हाँ, बिल्कुल। होना तो यह चाहिए कि किसी आदर्श नायक की कहानी पढ़ते समय बच्चा अपने अंदर वैसा ही बनने की एक गहरी तड़प महसूस करे। और वैसा बने बगैर वह रह न पाए। उसे लगे कि मैं ऐसा ही करूँगा, ऐसा ही बनूँगा। फिर चाहे इसमें कितनी ही परेशानियाँ आएँ...! लेकिन जब कहानी लिखते-लिखते आप यह कहते हैं कि बच्चो ऐसा करो, ऐसा बनो, तो कहानी का प्रभाव वहीं खत्म हो जाता है। हमारा काम बच्चे को आनंदित करके चुपके से, या कहिए, एकदम बेमालूम ढंग से कोई अच्छी दिशा दे देना है। पर यह चीज बहुत हलके संकेतों के रूप में होनी चाहिए। बच्चे पर अपनी ओर से कुछ थोपना गलत है।

अशोक बैरागी: आपका मतलब है कि लेखक को ऐसा परिवेश, कथानक और चरित्र चित्रण करना चाहिए, जिनसे बच्चा एक तरह का अपनापन या जुड़ाव महसूस करे। तभी अच्छी कविता या कहानी बनेगी। बच्चा कहानी के नायक की दुख-तकलीफे, हँसी-खुशी स्वयं अनुभव करे। फिर इसमें कल्पना या यथार्थ चाहे जिस अनुपात में आ जाएँ।

प्रकाश मनु: जी, बिल्कुल।

अशोक बैरागी: बाल मन को प्रभावित करने वाले कारकों के विषय में बताइए?

प्रकाश मनु: असल में बच्चा दुनिया का सबसे सरल प्राणी है। उसे इस दुनिया में सच्चाई, अच्छाई और ऐसी ही दूसरी बातें अच्छी लगती हैं। उसे खराब, चालाक और बेईमान लोग अच्छे नहीं लगते। उसे निर्मल, भले और कुछ कर गुजरने वाले लोग अच्छे लगते हैं। इस लिहाज से उनके लिए लिखा जाने वाला साहित्य भी वैसा ही होना चाहिए, जो उनमें लीक से अलग हटकर कुछ करने का जोश और उत्साह पैदा करे, और जो उसमें एक बेहतर मनुष्य होने की जिद पैदा करे। ऐसा साहित्य ही बच्चों का प्रिय साहित्य हो सकता है, जिसके साथ वे एक तरह का जुड़ाव महसूस करेंगे।...इसी तरह बच्चों में यह गहरी अंतःप्रेरणा होती है कि वे फौरन झूठ पकड़ लेते हैं और एकदम सीधी-सच्ची बात कहते हैं। वे किंतु-परंतु के बजाय एकदम सीधी और दिल को छू लेने वाली बात कहते हैं, जबकि बड़े होने पर हम बात को दाएँ-बाएँ घुमाने की कला या चालाकी सीख लेते हैं। और तब हम यह कहने लगते हैं कि हाँ, यह सही है, पर वह भी तो हो सकता है।
बच्चे जब तक छोटे होते हैं, वे एकदम सरल और निष्पाप होते हैं। पर बड़े होकर हम औरों की तरह छल-कपट और चालाकियाँ सीख लेते हैं। साथ ही हम खुद को समझा लेते हैं कि कोई बात नहीं, अगर हमने ऐसा कर भी लिया तो। अगर हम ऐसा न करते तो वैसा हो जाता। या कि चलो, उसने थोड़ी-बहुत चालाकी कर भी ली तो कोई बात नहीं। लेकिन बच्चे तुरंत कहते हैं कि नहीं-नहीं, यह तो गलत बात है। क्यों, उसने ऐसा गलत काम क्यों किया? और वे सीधे-सीधे कहते हैं कि पापा, वह गंदा आदमी है, आप उससे मत मिलना! क्योंकि बच्चा फौरन सच जान लेता है और उसे बेहिचक कहता भी है। बड़ा होने पर हमीं उसे किंतु-परंतु, या ऐसा, वैसा सिखाते हैं। तो बच्चे को झूठा उपदेश देने के बजाय हमें उसे समझने की कोशिश करनी चाहिए।

डॉ॰ सुनीता: देखो भाई, मैं एक छोटी सी बात बताती हूँ। हमारी बड़ी बेटी ऋचा कोई ढाई साल की थी, तब हम दिल्ली में रहते थे, शास्त्री नगर में। अकसर शाम के समय हम लोग पार्क में घूमने जाते थे। वहाँ फूल उसे बहुत सुंदर लगते थे। वह उन्हें बड़ी ललक के साथ छूते हुई चलती तो मैं कहती थी, “बेटे, फूल नहीं तोड़ना। ऐसे ही दूर से अच्छे लगते हैं ना!...तोड़ना नहीं।” वह रोज-रोज यह बात मेरे मुँह से सुनती थी। इसका नतीजा यह हुआ कि फिर वह हमारे साथ चलते हुए खुद ही फूलों को हाथ लगाकर कहने लगी, ‘मम्मी, फूल नईं तोड़ना! ऐसे ही दूर से अच्छा लगता है ना।’ सुनकर हम जोर से हँस पड़ते।

प्रकाश मनु: यानी यहाँ एक बच्चे के अंदर द्वंद्व शुरू हुआ कि फूल अच्छा तो है, पर उसे तोड़ना नहीं है। भले ही उसके भीतर कहीं फूल को तोड़ने की इच्छा भी होगी। पर मम्मी से सुन-सुनकर उसके मन में यह बात घर कर गई है कि फूल तोड़ना गलत बात है। तो यह एक बच्चे का नन्हा विवेक है। उसे पता है कि फूल न तोड़ने पर मम्मी की आँखों में मेरे लिए प्रशंसा या सराहना का भाव आएगा। वह उसे भी प्रिय है। तो वह फूल इसलिए भी नहीं तोड़ेगी कि माँ को बुरा लगेगा। कहीं न कहीं उसमें यह समझ आ गई है। बाल साहित्य भी मोटे तौर से बच्चे में यही समझ पैदा करता है।

अशोक बैरागी: नाटक को आपने ‘जीवन का बहुरंगी उत्सव’ कहा है। तो क्या साहित्य की जो अन्य विधाएँ हैं, वे बच्चों को संस्कारित करने में अपेक्षाकृत कम प्रभावी हैं...?

प्रकाश मनु: देखिए, बाल साहित्य की सभी विधाएँ बच्चों को खेल-खेल में सिखाने या कहीं भीतर से संस्कारित करने का ही माध्यम हैं। पर इसके साथ ही जरूरी है कि वह बच्चों को आनंदित करे, नहीं तो वह बच्चों का साहित्य तो हो ही नहीं सकता। अभी कुछ देर पहले चर्चा हुई थी कि एक अच्छी कविता, कहानी और नाटक वही है, जो बच्चे के मन की कली खिला दे, उसे थोड़ी खुशी और आनंद दे, और उसमें कुछ कर गुजरने की जिद पैदा करे। तो बेशक बच्चों के लिए लिखी गई रचनाओं का मुख्य उद्देश्य बच्चे को रंजित करना है। फिर चाहे रचना किसी भी विधा की हो। वह कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, संस्मरण कुछ भी हो सकता है। पर यह सब निर्भर करता है लिखने के जादू पर।
यह नाटक में भी हो सकता है। नाटक के संवादों में नाटकीयता, पात्रों के सरस संवाद और अभिनय से बच्चे के मन-मस्तिष्क पर सीधा और जल्दी असर पड़ता है। नाटक दृश्यात्मक विधा है और उसका एक-एक दृश्य बच्चा बिल्कुल साँस रोककर देखता और सुनता है। यहाँ तक कि जो उस नाटक का नायक या केंद्रीय पात्र है, बच्चा उसके साथ-साथ हँसता है, साथ-साथ रोता है। वह पूरी तरह उसके साथ एकाकार हो जाता है। और नाटक में बच्चे हों, तो बच्चे का उसके साथ तादात्म्य कहीं अधिक होता है। बच्चे को लगता है कि काश, नाटक में इतने दुख उठाने और मुश्किलों से जूझने वाला बच्चा जीत जाए। वह साँस रोककर उसे देखता और सुनता है। और जब वह जीतता है, और नाटक अपने चरम पर पहुँचता है तो बच्चे को बड़ी गहरी तृप्ति मिलती है। यही वह क्षण है, जब बच्चे के मन में आता है कि मैं भी वैसा ही बनूँगा। चाहे कितनी ही मुश्किलें आएँ, पर मैं वह मंजिल हासिल करके रहूँगा। यानी बगैर किसी सीख या उपदेश के, बच्चे में यह भाव खुद-ब-खुद आता है। यही अच्छे बाल साहित्य की निशानी है।...
यों नाटक सहित सभी विधाओं का असर अलग-अलग होते हुए भी उद्देश्य कुल मिलाकर एक ही है। और वह है, बच्चे को भीतर-बाहर से निखारकर, एक मुकम्मल शख्सियत देना। उसे कहीं अधिक जिम्मेदार और संवेदनशील शख्स बनाना, जिससे कि वह दूसरों के दुख को भी अपनी तरह महसूस कर सके, और उसके लिए उसके मन में कुछ करने की भावना हो। इसे मैं बच्चे का रचनात्मक और संपूर्ण विकास कहता हूँ, जिसमें उसे भीतर से आर्द्र और संवेदनशील बनाना भी शामिल है, जिससे सारी दुनिया उसे अपनी लगे। मैं समझता हूँ, यह काम अच्छा बाल साहित्य ही कर सकता है, कोई और नहीं। और यहाँ उसकी बहुत बड़ी भूमिका है।

अशोक बैरागी: परम आदरणीय, आपने इतना समय दिया और आपसे जो स्नेह मिला मैं उसके लिए कृतज्ञ हूँ। बहुत-बहुत धन्यवाद।

प्रकाश मनु: आपसे भी बात करके अच्छा लगा। आपका भी धन्यवाद।
***

अशोक बैरागी: हिंदी प्राध्यापक, राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, टयोंठा, तहसील पुंडरी, जिला कैथल, हरियाणा, पिन-136026, चलभाष: 09466549394
प्रकाश मनु, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
चलभाष: 09810602327,
ईमेल – prakashmanu334@gmail.com

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