संस्मरण: मेरे मन्नू भाई उर्फ प्रकाश मनु

रमेश तैलंग

रमेश तैलंग


प्रख्यात कवि, कथाकार, आलोचक तथा बाल साहित्यकार डॉ. प्रकाश मनु से मेरी मुलाकात 1989 के आसपास कस्तूरबा गाँधी मार्ग, नई दिल्ली स्थित हिंदुस्तान टाइम्स हाउस के तृतीय तल पर हुई थी, और वह भी मेरे वरिष्ठ साहित्यकार मित्र देवेंद्र कुमार (‘नंदन’ पत्रिका के तत्कालीन सहायक संपादक) के माध्यम से। तीनों के मिलने का नतीजा था, ‘हिदी के नए बालगीत’, जिसमें हम तीनों मित्र कवियों की चुनी हुई बाल कविताएँ शामिल थीं। इसका प्रकाशन हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा दी गई अनुदान राशि से संभव हुआ था और इस पुस्तक के आवरण सहित सभी मनमोहक चित्र प्रख्यात चित्रकार, लेखक हरिपाल त्यागी ने बनाए थे।
त्यागी जी के सादतपुर निवास पर जाने के लिए प्रकाश मनु के साथ तब मैने काफी पदयात्रा की थी। हालाँकि त्यागी जी से हमारी यह पहली मुलाकात थी, पर उन जैसे सरलचित्त कलाकार से मिलकर हमें बहुत अच्छा लगा था। उन्होंने अपनी कुछ कलाकृतियाँ भी हमें दिखाई थीं और दाल-रोटी का स्वादिष्ट देसी भोजन भी कराया था। यह एक संयोग ही था कि उस दिन वहाँ बाबा नागार्जुन भी आ गए थे और उनसे सभी की बतकही शुरू हो गई थी। मैंने अपनी डायरी उनके सामने रखते हुए कहा था, “बाबा, आप इसमें अपनी हस्तलिपि में कुछ लिख दीजिए”, तो उन्होंने स्नेहवश अपनी एक मशहूर कविता की तीन पंक्तियाँ लिख दीं, “अगर कीर्ति का फल चखना है, कलाकार ने फिर-फिर सोचा, आलोचक को खुश रखना है।”

प्रकाश मनु
कुल मिलाकर यह एक सुखद दिन बीता था। प्रकाश मनु से हुई एक-दो मुलाकातों में ही मुझे लगने लगा था कि मनु अतिवादी व्यक्ति हैं। मेरी यह धारणा आज भी कमोबेश बरकरार है। चाहे लिखने की ऊर्जा हो या फिर बोलने की, चाहे आक्रोश की मुद्रा हो या फिर विनम्रता की, चाहे फकीराना वेशभूषा हो या फिर शाहाना (शाहाना शब्द से यहाँ ‘जिसको कछु नहीं चाहिए, वह है शहंशाह’ वाला भाव ग्रहण करें तो आसानी होगी!), मनु अपनी उपस्थिति का अहसास सामने वाले को अवश्य कराते रहते हैं। आज के तथाकथित भद्र समाज में करीब-करीब ‘मिसफिट’ मनु देखने-दाखने में सचमुच ‘फिट’ लगते हैं, पर उनके पूरे व्यक्तित्व को समझना टेढ़ी खीर है। वे क्षणे तुष्टा, क्षणे रुष्टा की मुद्रा साधे रहते है। आक्रोश निकालते हैं तो सामने वाले को बोलने भी नहीं देते और विनम्र होते हैं तो उन्हें खोजने के लिए सूक्ष्मदर्शी की जरूरत पड़ती है।

मनु ने उपन्यास, कहानी, कविता, आलोचना, और बाल साहित्य सभी विधाओं में विपुल लेखन किया है। पर मेरी अपनी दृष्टि में, उनका गद्य उनकी कविताओं से ज्यादा प्रभावित करता है। इसका यह अर्थ नहीं कि उनकी कविताएँ सामान्य स्तर की हैं। पर गद्य में वे कविताओं से ज्यादा खुलते है, खासकर अपनी तेज-तर्रार समीक्षाओं में, जिनके कारण उन्होंने न जाने कितने स्वनामधन्य साहित्यकारों को कुपित किया। समीक्षा-कर्म कोई बहुत भला काम नहीं। अच्छी-बुरी, हलकी-भारी सभी तरह की रचनाओं को पढ़ना पड़ता है और स्वयं की रचनात्मकता की भी बलि देनी पड़ती है।

मनु ने एक बार बताया था कि शैलेश मटियानी की भारी-भरकम किताब ‘बर्फ की चट्टानें’ पर समीक्षा लिखने के लिए एक प्रतिष्ठित पत्र ने (जो दुर्भाग्य से अब बंद हो चुका है) सिर्फ पचहत्तर रुपए भेजे थे। एक किताब, जिसको पचाने में मनु ने अपनी तीन रातें जलाकर खाक कर दीं, उसका पारिश्रमिक एक संपन्न घराने के पत्र द्वारा पचहत्तर रुपए आँकना आश्चर्य में डालता है। पर एक तरह से यह उन पत्रों से ठीक था, जो संसाधनों तथा आर्थिक स्रोत के होते हुए भी लेखक के पारिश्रमिक को दबा जाते हैं। खैर, यह एक इतर विषय है और इस पर चर्चा करना यहाँ समीचीन नहीं है।


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मनु के बारे में, उनके अंतरंग मित्रों की धारणा है कि वे किसी काम पर जुटते हैं तो धुनी की तरह जुटते हैं। देवेंद्र सत्यार्थी पर किया गया उनका काम इसका प्रमाण है। कहने को सत्यार्थी जी पर प्रकाशित उनकी अनेक पुस्तकें संपादित हैं, पर उनमें लिखी गईं लंबी-लंबी भूमिकाएँ स्वयं में एक किताब से कम नहीं, जो सत्यार्थी जी के अंतरंग जीवन की कितनी ही अँधेरी-उजली परतें उघाड़ती हैं। हालाँकि मनु ऐसा कोई दावा नहीं करते, पर देवेंद्र सत्यार्थी के साहित्य को पुनर्जीवित करने में निश्चित रूप से उनकी बहुत बड़ी भूमिका रही है। एक बार जब उनसे पूछा गया कि वे सत्यार्थी जी पर कब तक लिखते रहेंगे, तो उनका कृतज्ञ भाव से भरा उत्तर था, “जीवन भर!”

मनु को उनके वयस्क साहित्य तथा बाल साहित्य दोनों के लिए अनेक शीर्ष पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है, पर आरंभ से ही वे पुरस्कारों से (खासकर सरकारी संस्थाओं के या फिर उन गैर-सरकारी संस्थाओं के, जो आदान-प्रदान की छद्म नीति की आड़ में पुरस्कृत करते हैं) बचते रहे हैं! उनकी काव्यकृति ‘छूटता हुआ घर’ को जब स्व. गिरिजाकुमार माथुर की स्मृति में स्थापित प्रथम पुरस्कार के लिए चुना गया, तो मनु को यों लगा, जैसे पुरस्कार के लिए उन्हें घेर लिया गया हो। आनन-फानन में उन्होंने घोषणा कर डाली कि वे इस पुरस्कार की संपूर्ण राशि का उपयोग अभी तक उपेक्षित रहे, दबे-पिसे, संघर्षशील नए कवियों के काव्य-संकलन को प्रकाशित करने के लिए करेंगे, और उन्होंने ‘सदी के आखिरी दौर में’ (जो कोई दर्जन भर नए, लगभग अनजान कवियों की कविताओं का संकलन था) निकालकर ऐसा किया भी।

मनु का पहला उपन्यास ‘यह जो दिल्ली है’ जब लिखा जा रहा था तो उनसे उपन्यास की विषयवस्तु, पात्रों तथा उपन्यास के परिवेश पर घंटों का संवाद मेरी स्मृति में अभी भी ताजा है। ‘दिल्ली में सत्यकाम’, ‘राजधानी प्रेस’ और न जाने कितने नामों की सीढ़ियाँ लाँघता अंत में ‘यह जो दिल्ली है’ पर आकर अटक गया यह उपन्यास। धराशायी होते पत्रकारिता के मूल्यों और मानदंडों पर लिखा गया यह एक विवादास्पद उपन्यास साहित्यिक अखाड़ेवाजी में उस तरह चर्चित नहीं हुआ, जिस तरह होना चाहिए था।

ऐसा नहीं कि मनु को इस सबसे पीड़ा नहीं होती, पर वे इसे प्रकट न करते हुए एक मुकाम पर पहुँचने के बाद दूसरे की खोज में निकल पड़ते हैं। यही कारण है कि लाख निराशाओं के बीच घिरे रहने के बावजूद वे हताश नहीं होते।
उनके बाद के दो उपन्यास ‘कथा सर्कस’, और ‘पापा के जाने के बाद’ भी, जो क्रमश: साहित्य एवं कला-जगत में व्याप्त अनेक चालाकियों पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी तथा एक संघर्षशील कलाकार के स्वाभिमान तथा मृत्यु-उपरांत उसकी पारिवारिक पीड़ा को मार्मिकता से अभिव्यक्त करते है, आज लगभग गुमनामी का दंश झेल रहे हैं।

मनु ने अपनी साहित्यिक यात्रा के बीच अनेक नामी-गिरामी साहित्यकारों के साक्षात्कार लिए हैं, जो मणिका मोहिनी के संपादन में निकली पत्रिका ‘वैचारिकी संकलन’ में प्रकाशित हुए थे। बाद में इनका प्रकाशन ‘मुलाकात’ नाम से अभिरुचि प्रकाशन द्वारा पुस्तक रूप में भी हुआ। इनमें से कुछ मुलाकातों में मैं भी मनु का सहभागी और साक्षी रहा। मुझे याद है, एक बार सन् 1996 में हम दोनों जगदीश चतुर्वेदी का साक्षात्कार लेने उनके लारेंस रोड, नई दिल्ली स्थित उनके निवास पर गए थे। पूरा दिन बिताकर जब हम शाम को पाँच बजे उठे तो सोचा, चलो, अब हम दोनों ठीक समय पर अपने-अपने घर पहुँच जाएँगे। लेकिन मनु जी कमरे से निकलते-निकलते भी दरवाजे पर ही घंटों बतियाते रहे और मेरी टोका-टोकी को नजरअंदाज करते रहे।

समय निकलता गया और जब हम चतुर्वेदी जी के निवास से बाहर आए तो मनु जी को चिंता लगी कि हजरत निजामुद्दीन पहुँचने तक उनकी फरीदाबाद जाने वाली आखिरी लोकल ट्रेन भी कहीं न निकल जाए। और फिर हुआ भी वही। अब उन्हें अपनी पत्नी सुनीता तथा दो बच्चियों के घर पर अकेले होने की चिंता लग गई। आखिर अपने आग्रह पर मैं उन्हें उस रात्रि, यह आश्वस्ति देकर कि सुबह-सुबह मैं उन्हें फरीदाबाद की पहली गाड़ी पकड़ा दूँगा, अपने घर शकरपुर ले आया।

भोजनोपरांत जब हम बिस्तर पर पड़े तो मनु जी शायद ही पूरी रात सो सके हों। सुनीता का बच्चियों के साथ अकेले रहना उन्हें लगातार चिंतित कर रहा था। ठंड का मौसम था। सुबह कोहरा बना हुआ था, पर मनु जी ने मुझे ठीक पाँच बजे उठा दिया। हाथ-मुँह धोकर मैं उन्हें वेस्पा स्कूटर पर बैठाकर मिंटो ब्रिज स्टेशन के लिए निकल पड़ा। सर्दी के कारण हाथ लकड़ी की तरह अकड़े जा रहे थे। राउज एवेन्यू (दीनदयाल उपाध्याय मार्ग) पर सड़क के बीच मैनहोल सतह से नीचे होने के कारण स्कूटर कई बार उछलता जा रहा था, और आसपास कुछ वाचाल कुत्ते भी भूँक रहे थे। बहरहाल, हम किसी तरह गंतव्य पर पहुँचे और मनु जी ने सुबह-सुबह की अपनी गाड़ी पकड़ी। इस बात का हमें संतोष हुआ था, पर सर्दी के कारण उस कोहरीली सुबह में मेरी जो हालत हुई थी, उसके लिए मैं मनु जी को आज भी कुछ कोफ्त के साथ याद करता हूँ।

लेकिन उनका आभारी भी हूँ कि साहित्य की दुनिया में थोड़े-बहुत पैर जमाने में जिन शख्सियतों ने मेरी मदद की, उनमें देवेंद्र कुमार और प्रकाश मनु दो मित्रों का बहुत बड़ा हाथ रहा है। हम तीनों ने हिंदुस्तान टाइम्स हाउस के आसपास एक साथ इतनी दोपहरें और शामें बिताई हैं कि हमारा आत्मिक संबंध अनेक अंतर्विरोधों के बावजूद आज भी यथावत अटूट बना हुआ है।


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देवेंद्र सत्यार्थी मनु के कथागुरु रहे हैं और मनु उनके स्नेहभाजन भी। मनु के जरिए ही मेरी भी सत्यार्थी जी से उनके जीवन काल में यदा-कदा भेंट हुई है। एक बार दुर्ग से प्रकाशित ‘सापेक्ष’ पत्रिका के संपादक महावीर अग्रवाल के आग्रह पर मुझे सत्यार्थी जी से ‘कबीर’ पर साक्षात्कार लेना था। जाहिर है कि यह कार्य मनु के सहयोग से ही संपन्न हो सका था। उन्होंने सलाह दी थी कि सत्यार्थी जी से सीधे-सीधे सवाल-जवाब की आशा मत रखना, बल्कि उन्हें अपने आप ही बोलने देना। फिर उसी में से सवाल-जवाब बना लेंगे। मनु जी की बात को ध्यान में रखते हुए मैं सत्यार्थी जी के रोहतक रोड स्थित निवास पर जा पहुँचा।

सत्यार्थी जी उस समय बीमार चल रहे थे और उन्हें ज्यादा बोलने में भी तकलीफ हो रही थी। उनकी पत्नी श्रीमती शांति सत्यार्थी, जो लोकमाता के नाम से प्रसिद्ध थीं, उनकी सेवा-सुश्रूषा में लगी थीं। ऐसे माहौल में वह साक्षात्कार शुरू हुआ और मनु जी की चेतावनी भी वहीं सच हो गई। बीच-बीच में बोलते हुए वे पटरी से उतरते रहे और कबीर की जगह मुझे लाहौर की अनारकली की सैर कराते रहे, डॉ. इकबाल और साहिर के किस्सों के बीच घुमाते रहे। जब मैंने उन्हें कबीर के बारे में चेताया तो बोले, “हाँ, मै उन्हीं के बारे में ही कह रहा था...!” और फिर यह अनोखा साक्षात्कार आदिग्रंथ तथा खुशवंत सिंह के संदर्भों के साथ संपन्न हुआ।

इस बीच वे बार-बार पूछ्ते रहे, “मनु के क्या हालचाल हैं?...आप हिंदुस्तान टाइम्स हाउस की किस मंजिल में बैठते हैं?...मेरी तबीयत आजकल ठीक नहीं रहती है। क्या आपके पास भीष्म साहनी की नाट्य रचना ‘कबिरा खड़ा बाजार में’ की कॉपी है? हो तो भिजवा देना। मैं उसे पढ़ना चाह्ता हूँ।”

मनु के ऊपर देवेंद्र सत्यार्थी और शैलेश मटियानी के व्यक्तित्व का काफी प्रभाव पड़ा है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। ‘यह जो दिल्ली’ है के नायकीय चरित्र सत्यकाम में कुछ हिस्सा सत्यार्थी जी के चरित्र का भी रहा हो तो आश्चर्य नहीं, हालाँकि कथा-साहित्य में सृजित चरित्र बहुत ही संश्लिष्ट होते हैं और उनमें किसी व्यक्ति का आरोपण करना दूर की कौड़ी फेंकने से ज्यादा नहीं होता।


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एक और घटना याद आ रही है, जब मनु, मैं और शैलेंद्र चौहान कथापुरुष शैलेश मटियानी से दिल्ली के गोविंद बल्लभ पंत अस्पताल में बातचीत करने गए थे। यह शायद जगदीश चतुर्वेदी से लिए गए साक्षात्कार के लगभग एक महीने पहले का समय रहा होगा। यानी नवंबर, 1996 का कोई दिन।

मटियानी जी उस समय भयंकर मानसिक पीड़ा के आघात से थोड़ा-सा उबरे थे और बातचीत करने के लिए उन्होंने मनु को शायद स्वयं ही आमंत्रित कर लिया था। इसलिए यह साक्षात्कार उस सुखद माहौल में नहीं हुआ था, जैसी सुखद स्थिति चतुर्वेदी जी के साक्षात्कार के समय रही थी।...कारण स्पष्ट थे। चतुर्वेदी जी के साथ गुजरा दिन ठहाकों से भरा था और मटियानी जी के साथ का समय उत्तेजनाओं तथा कुछ-कुछ विषाद में लिपटा हुआ। मटियानी जी को अस्पताल में जो कमरा मिला था, उसमें उनकी पत्नी नीला जी तथा बेटा राकेश भी साथ थे।

मटियानी जी ने उस साक्षात्कार में अपनी रचनाओं तथा साहित्यिक अनुभवों के साथ-साथ अपनी जानलेवा बीमारी एवं जीवन के कुछ अछूते निजी प्रसंग हम सब से साझा किए थे। मनु तथा शैलेंद्र चौहान की तो शायद मटियानी जी से मुलाकात पहले भी हो चुकी थी, पर मेरी उनसे यह पहली मुलाकात थी और उसी दिन मुझे पता चला था कि मनु को वे कितना अगाध स्नेह और सम्मान देते थे। बचपन से ही संघर्ष और पलायन की विपदा झेलने वाले शैलेश मटियानी, जो अपने रचना-कर्म के बल पर (आत्मश्लाघावश नहीं) स्वयं को प्रेमचंद के बाद का सबसे बड़ा कहानीकार मानते थे, से मिलना हमारे लिए एक विरल अनुभव था। हालाँकि देवेंद्र सत्यार्थी, नागार्जुन आदि की तरह मटियानी जी द्वारा की गई परिवार की उपेक्षा से उनकी पत्नी तथा पुत्र दोनों ही दुखी दिखे, लेकिन पंत अस्पताल में बीत रहे वे दिन सेवा करने के दिन थे, गिले-शिकवे करने के नहीं।

मनु स्वयं बहुत भावुक हैं। और हम दोनों भी इसके अपवाद नहीं थे, इसलिए मटियानी जी जब भी अपनी विक्षिप्तावस्था, असहनीय मानसिक पीड़ा तथा पारिवारिक चिंताओं की चर्चा करते तो हम सबकी आँखें भर आतीं!
विपरीत परिस्थितियों में हमारी सहभागिता सहित मनु द्वारा लिया गया मटियानी जी का यह साक्षात्कार उनके द्वारा लिए गए साक्षात्कारों में सबसे अधिक लंबा था। ‘मुलाकात’ पुस्तक के 57-58 प्रष्ठ घेरे थे उसने। यह वह समय था जब प्रकाश मनु द्वारा लिए गए साहित्यकारों के लंबे-लंबे साक्षात्कार, वह भी बिना रेकार्ड किए, काफी चर्चा का विषय बन चुके थे और जिनसे मनु की एक अलग ही पहचान बनी थी।

एक-दो साक्षात्कारों पर विवाद भी खड़ा हुआ था। एक बड़े साहित्यकार ने तो अपने साक्षात्कार में कही गई कुछ बातों को सिरे से नकार दिया था और सारा दोष मनु की भंग-स्मृति पर डालकर मुक्त हो गए थे। इससे मनु कुछ दिनों तक काफी विचलित रहे थे। इस संदर्भ में मुझे कन्हैयालाल ‘नंदन’ द्वारा लिए गए जैनेंद्र कुमार के एक साक्षात्कार का स्मरण भी आ रहा था, जिसमें जैनेंद्र जी द्वारा नकारी गईं कुछ बातों का प्रमाण ‘नंदन’ जी ने जैनेंद्र जी द्वारा हस्ताक्षरित पांडुलिपि को प्रकाशित कर के दिया था। जबकि मनु ने ऐसी सावधानी शायद कभी नही बरती और न ही उनके किसी साहित्यकार से प्रकटत: जरूरत से ज्यादा कटु संबंध बने।

बीस-पच्चीस बरस पहले के और आज के प्रकाश मनु को देखता हूँ तो मुझे दोनों में काफी कुछ परिवर्तन नजर आता है। ज्यों-ज्यों मनु का रचनात्मक कद बढा है, उनके अंदर की विध्वंसात्मक ऊर्ज़ा शांत होती गई है। एक परिवर्तन यह भी आया है कि वे जबसे बाल साहित्य सृजन की ओर उन्मुख हुए हैं, उन्होंने अपने आप को बाल साहित्य की धारा में ही संपूर्णत: बहा दिया है।

बाल साहित्य की लगभग सभी विधाओं में मनु ने विपुल मात्रा में लेखन किया है और अभी भी कर रहे हैं। आलोचना के क्षेत्र में ‘हिंदी बाल कविता का इतिहास’, ‘हिंदी बाल साहित्य : नई चुनौतियाँ और संभावनाएँ’ जैसी गंभीर विवेचनात्मक कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं और अभी कुछ अरसा पहले उनके द्वारा कई वर्षों के श्रम से लिखा गया ‘हिदी बाल साहित्य का इतिहास’ भी पाठकों के सामने आ चुका है।

मनु की अथक रचनात्मक ऊर्जा के पीछे उनकी लेखिका पत्नी डॉ. सुनीता की सतत शक्ति रही है, और मनु की रचनाओं की सबसे पहली पाठक और आलोचक भी वे ही रही हैं। मनु की रचनाओं की तुलना में सुनीता की प्रकाशित कृतियाँ कम हैं, पर उनमें जो गँवई महक और पारिवारिक जीवन के आत्मीय संबंधों की झलक है, वह मनु की रचनाओं में मुझे कम दिखती है। एक में अनुभवों की समृद्धि का आधिक्य है तो दूसरे में अनुभूतियों की सघनता का।

मनु अब तक जीवन के 74 वसंत देख चुके हैं और वय में वे मुझसे लगभग तीन-चार वर्ष छोटे हैं। पर वे (और डॉ. सुनीता भी) मुझे हमेशा छोटा भाई मानकर ही व्यवहार करते हैं और इसमें सचमुच मुझे सबसे बड़ा सुख मिलता है। उम्र जैसे-जैसे बढती जाती है, वैसे-वैसे आत्मीयजनों और अपनी चीजों से मोह भी बढ़ता जाता है, जबकि ऐसा होना नहीं चाहिए। बच्चन जी ने शायद ऐसी ही मनःस्थिति में कभी लिखा होगा, “अंगड़-खंगड़ मोह सभी से, क्या बाँधूँ, क्या छोड़ूँ रे, जिसका सारा माल-मता है उससे नाता जोड़ूँ रे!”


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कुछ अरसा पहले मनु जी की दो आत्मकथात्मक पुस्तकें आई थीं। उनकी आत्मकथा का पहला खंड ‘मेरी आत्मकथा : रास्ते और पगडंडियाँ’ और ‘मेरे कुछ आत्म-संस्मरण’। इन्हें पढ़कर मैं उन्हें पत्र लिखे बिना न रह सका। यहाँ उस पत्र को देने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ—

“प्रिय मन्नू भाई, उर्फ प्रकाश मनु,

‘मेरी आत्मकथा : रास्ते और पगडंडियाँ’ के लगभग सभी पन्ने कुछ सरसरी तौर पर और कुछ गंभीरतापूर्वक पढ़ गया हूँ। इस पुस्तक के माध्यम से आपने अपने परिजनों और अपने निजी जीवन के किशोरावस्था तक के प्रसंगों को बहुत ही आत्मीयता और रोचकता के साथ हम पाठकों के साथ साझा किया है।

मेरा अपना मानना है, आत्मकथा कोई भी हो, वह केवल आत्म तक ही सीमित नहीं रहती, उसमें परकथा भी साथ-साथ चलती रहती है। नाम के लिए यह परकथा होती है, लेकिन वह आत्म के साथ इस तरह बिंधी होती है जैसे माला के साथ मोती। 35 अध्यायों मे आपने अपने पूर्वजों, माँ, पिता, भाई-बहन, मित्र सभी की इतनी घनी स्मृतियाँ उकेरी हैं कि मैं अभिभूत हूँ पढ़कर। बचपन में भावुक होना, जिद पर अड़ना, और माँ, नानी से सुनी कहानी-किस्सों में खोकर अपना खुद का काल्पनिक संसार रचना, घर छोडकर भाग जाना और आए दिन डाँट-डपट, मार-पिटाई से रूबरू होना, ये सब ऐसी घटनाएँ हैं, जिनसे होकर आपकी तरह हम भी गुज़रे हैं। यही कारण है कि ये सब प्रसंग आपके निजी होकर भी हमारे लगते हैं। शायद यही वह सूत्र है जो आपकी आत्मकथा को पढ़ते हुए हमें चौंकाता है, हँसाता है, रुलाता है। एकाएक हमें लगने लगता है कि अरे, यह तो हमारे ही बचपन और किशोर वय की बात की जा रही है, ऐसा तो हमारे साथ भी घट चुका है।

भरे-पूरे परिवार में पारंपरिक व्यवसाय छोडकर कलम को पकड लेना किसी विद्रोह से कम नहीं। ऐसा जिद्दी बच्चा फिर चाहे वह कुक्कू हो या कोई और, इस बात की परवाह नहीं करता कि उसकी ज़िद, उसके निर्णय को परिवार में किससे समर्थन मिलेगा और किससे नहीं। लेखक बनना कुक्कू की जिद भी है और सपना भी। यह जिद ही उसे बड़ा लेखक बनाती है। उम्रदराज माँ, बाप, पाँच भाइयों और दो बहनों के बीच अनेक तरह के संघर्षों के बीच उठने-गिरने और फिर अपना मुकम्मल रास्ता चुनने की मार्मिक कहानी कही है आपने इस आत्मकथा में। एक तरह से यह जीवन की विलोम यात्रा भी है, जिसमें कितने रास्ते और कितनी पगडंडियाँ आपको पार करने पड़े हैं। 

कृष्ण भाईसाब और श्याम भैया की स्मृतियाँ और धीरे-धीरे उनका असामयिक विछोह सचमुच आँखें भिगो देता है। बचपन की कथा दोहराते हुए आपने जिन पंजाबी जबान के गीतों को उद्धृत किया है वे अंदर तक छूते हैं। वहाँ भाषा बाधा नहीं बनती, बल्कि उनमें व्यक्त किया गया भाव मर्मस्थल को सीधे छूता है। कोई साठ पार की अवस्था में अपने अतीत के इतने पीछे जाना और उन्हें शब्दों में बाँधना सबके बस की बात नहीं। शैशव से लेकर तरुणाई तक आपकी जीवन-यात्रा के अनेक मार्मिक प्रसंग इस आत्मकथा के प्रथम भाग मे बिखरे पड़े हैं, जिन्हें मुक्त रूप से बिना किसी तारतम्य के भी पढ़ा जा सकता है, और उनका आनंद लिया जा सकता है। यह एक ऐसा आनंद है जिसमें ठेठ देसीपन की ठसक, गमक और चमक है जो विदेशी आत्मकथाओं मे कम से कम हमारे जैसे पाठकों को दुर्लभ है। इसकी एक झलक आपकी दूसरी पुस्तक ‘मेरे कुछ आत्म संस्मरण’ में पहले देख चुका हूँ।

ये दोनों पुस्तकें हिंदी साहित्य मे कितना स्थान बनाएँगी, कह नहीं सकता, पर जहाँ तक मेरा अपना सवाल है, आपकी समस्त श्रमसाध्य पुस्तकें मेरी अपनी निजी धरोहर हैं, जिन्हें जब तलब होती है, उठा लेता हूँ। फिलहाल इतना ही...!

डॉ सुनीता जी को मेरा सादर नमस्कार। अगर वे न होतीं तो आपका अफसाना अधूरा ही रहता।”

अंत में बस, इतना ही कि मनु जी की कहानी अभी पूरी नहीं हुई। उसके कई पड़ाव अभी आने हैं, जिनमें जाने हुए प्रकाश मनु के साथ ही न जाने हुए प्रकाश मनु की भी शायद कई बहुरंगी छवियाँ हमें देखने को मिलेंगी।
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रमेश तैलंग
फ्लैट नं. 101, संकल्प सोसाइटी, प्लॉट 50, खारघर, नवी मुंबई-410210 (महाराष्ट्र)
चलभाष: 09211688748

2 comments :

  1. मनु जी का बढ़िया संस्मरण. बधाई रमेश जी.

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  2. बहुत अच्छा।

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