संस्कृत और वैदिक धर्म: श्रीमद्भगवद्गीता के विशेष सन्दर्भ में

पद्मश्री डॉ. रवीन्द्र कुमार

रवीन्द्र कुमार

पद्मश्री और सरदार पटेल राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित डॉ0 रवीन्द्र कुमार भारतीय शिक्षाशास्त्री एवं मेरठ विश्वविद्यलय, मेरठ (उत्तर प्रदेश) के पूर्व कुलपति हैं।

वैदिक धर्म, वास्तव में, सनातन धर्म है। शब्दार्थ और स्वयं में निहित मूल भावना, दोनों के दृष्टिकोण से शाश्वत, अर्थात् सदा स्थापित व्यवस्था – बिना प्रारम्भ के तथा अन्त-रहित एवं सदैव प्रवहमान नियम ही सनातन धर्म है। सनातन धर्म, चर-अचर एवं दृश्य-अदृश्यमान ब्रह्माण्ड –जगत के एक ही व्यवस्थापक, नियंत्रक और संचालक –ईश्वर, परमेश्वर, परमात्मा, प्रभु आदि असंख्य नामों से सम्बोधित एकमात्र शाश्वत सत्ता (जो परमसत्य है एवं एक ही सार्वभौमिक तथा निरन्तर प्रवहमान नियम द्वारा दृश्य-अदृश्य व चल-अचल ब्रह्माण्ड का स्वयं सञ्चालन भी करती है) के निमित्त (अथवा उसी पर निर्भर) सार्वभौमिक एकता की वास्तविकता को समर्पित है। सनातन धर्म, शाश्वत परिवर्तन नियम की सत्यता को अंगीकार कर सर्वकल्याण के उद्देश्य से अनुकूल परिस्थितियों का अपने परम कर्त्तव्य के रूप में निर्माण करने एवं अस्तित्व की प्रत्याभूति, प्रगति और लक्ष्य-प्राप्ति हेतु अपरिहार्य वृहद् सजातीय सहयोग व सामंजस्य हेतु अहिंसा को, इसकी दो सर्वोत्कृष्ट तथा व्यावहारिक अभिव्यक्तियों सहिष्णुता और सहनशीलता के साथ, दैनिक गतिविधियों और परस्पर सम्बन्धों का आधार बनाने का मानव का आह्वान करता है।

सम्पूर्ण एकता –अविभाज्य समग्रता की सत्यता और एक ही सार्वभौमिक सत्ता ब्रह्म की वास्तविकता के प्रकटकर्ता वेद – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद, सनातन धर्म के आदिकालीन व आधारभूत ग्रन्थ हैं, मूल व्याख्याता हैं। वेद, विश्व की प्राचीनतम तथा अत्यन्त ही परिमार्जित एवं वैज्ञानिक व्याकरण की धनी संस्कृत भाषा में, (जो हिन्दी, सिन्धी, बांग्ला, मराठी, पंजाबी, गुजराती, उड़िया, असमिया आदि सहित अधिकांश आधुनिक भारतीय भाषाओं के साथ ही नेपाली भाषा की भी जननी है तथा जिसका अन्य भारतीय भाषाओं –मलयालम, तेलुगु, तमिल तथा कन्नड़ पर गहन एवं कई एशियाई-यूरोपीय भाषाओं पर भी, न्यूनाधिक, प्रभाव है), रचित हैं। अन्य लगभग सभी आधारभूत वैदिक धर्म ग्रन्थ भी संस्कृत भाषा में ही रचित हैं। संस्कृत में ही रचित उपनिषद् वैदिक वाङ्मय के अभिन्न भाग हैं। अर्थात्, वेदों के भाग हैं और वे, इसीलिए, वेदान्त भी कहलाते हैं। वेदों की मूल भावना के अनुसार ही ब्रह्म –परमात्मा, सार्वभौमिकता, आत्मा, अध्यात्म आदि सहित समस्त मूल मानवीय विषयों से सम्बन्धित ग्राह्य परम ज्ञान अद्वितीय गुरु-शिष्य परम्परा के माध्यम से उपनिषदों द्वारा निरूपित है। प्रमुखतः वेदों और उनके अभिन्न भाग उपनिषदों द्वारा व्याख्यायित और  प्रसारित होने के कारण ही सनातन धर्म को वैदिक धर्म भी कहा जाता है।  
चूँकि वैदिक धर्म के मूल –आधारभूत ग्रन्थ संस्कृत में हैं; अन्य प्रमुख ग्रन्थ –स्मृतियाँ, संहिताएँ, वेदांग, पुराण, आरण्यक सहित ब्रह्म, जीव और जगत-ज्ञान के व्याख्याता उपनिषद् आदि भी इसी भाषा (वैदिक और लौकिक संस्कृत) में हैं, संस्कृत भाषा में प्रकट वैदिक मंत्रों और इसी में रचित अन्य ग्रन्थों के श्लोकों के माध्यम से वैदिक धर्म के मूल सिद्धान्तों की विवेचना-व्याख्या हुई है, इसलिए वैदिक धर्म और संस्कृत एक-दूसरे से घनिष्ठतः सम्बद्ध हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता, वेदों में प्रकट सार्वभौमिकता और ब्रह्मवाद तथा उपनिषदों के अध्यात्म –ग्राह्य परम ज्ञान को अपने में समाहित करती है। तदनुसार, मानव का उसकी जीवन सार्थकता के परमोद्देश्य से मार्गदर्शन करती है। इस प्रकार, श्रीमद्भगवद्गीता स्वयं सनातन –वैदिक धर्म के एक मूल, अति प्रभावशाली एवं अनुकरणीय ग्रन्थ के रूप में उभरती है। वैदिक धर्म की मूल भावना को, स्वयं धर्म की श्रेष्ठतम व्याख्या करते हुए और धर्म को मानव-कर्त्तव्य के रूप में प्रतिष्ठापित करते हुए, प्रस्तुत करती है। जगत-स्वरूप के सम्बन्ध में अश्वत्थ विद्या, ब्रह्म के सन्दर्भ में अव्ययपुरुष विद्या, परा प्रकृति-जीव के विषय में अक्षरपुरुष विद्या, अपरा प्रकृति-भौतिक जगत के सम्बन्ध में क्षरपुरुष विद्या का सूक्षमता, स्पष्टता तथा निष्पक्षता से विश्लेषण, एवं साथ ही, योगशास्त्र, ‘कर्मयोग’ –“योगः कर्मसु कौशलम्” द्वारा मानवतावाद के प्रकटकर्ता पवित्र और ग्राह्य सन्देश श्रीमद्भगवद्गीता को अध्यात्म क्षेत्र की एक अद्वितीय और शीर्षस्थ कृति के रूप में स्थापित करता है। "योगः कर्मसु कौशलम्" का वासुदेव श्रीकृष्ण का आह्वान प्रत्येक मनुष्य के लिए है। श्रीमद्भगवद्गीता किसी भी प्रकार के भेदभाव के बिना प्रत्येक मानव का तदनुसार मार्गदर्शन करते हुए संशयों, द्वन्द्व और असमंजस की स्थिति से बाहर निकालकर उसे सुकर्मों की ओर अग्रसर करती है।

श्रीमद्भगवद्गीता (18 अध्यायों में 700 श्लोकों को समाहितकर्ता व मूल रूप से महाभारत के भीष्मपर्व के भाग से निर्गत ग्रन्थ) वेदों एवं उपनिषदों की ही भाँति मूलतः संस्कृत भाषा में स्थापित एक ऐसा अति उत्कृष्ट ग्रन्थ है, जिसने सैंकड़ों वर्षों से भारत ही नहीं, अपितु विश्वभर के विद्वानों, चिन्तकों और मानवतावादियों के विचारों और कार्यों को गहनता से प्रभावित किया है।

लौकिक संस्कृत में रचित श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता की एक अति उत्कृष्ट विशेषता है। इसने सैंकड़ों वर्षों से देश-विदेश के परम विद्वानों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। परिणामस्वरूप, इसके मूल संस्कृत पाठ का विश्वभर की पचास से भी अधिक भाषाओं में अनुवाद हुआ है। प्राचीन से आधुनिककाल तक के अनेकानेक ऋषितुल्य भारतीय सन्तों-चिन्तकों, विशेषकर आदि शंकराचार्य (जीवनकाल: 788-820 ईसवीं), रामानुजाचार्य (जीवनकाल: 1017-1137 ईसवीं), मध्वाचार्य (जीवनकाल: 1238-1317 ईसवीं; एक अन्य मतानुसार 1199-1278 ईसवीं), वल्लभाचार्य (जीवनकाल: 1479–1531 ईसवीं), ज्ञानेश्वर (जीवनकाल: 1275-1296 ईसवीं), बाल गंगाधर तिलक, अरविन्द घोष, स्वामी विवेकानन्द, महात्मा गाँधी, परमहंस योगानन्द (जीवनकाल: 1893-1952 ईसवीं) व भक्ति वेदान्त प्रभुपाद (जीवनकाल: 1896-1977 ईसवीं) के साथ ही सेनार्ट (जीवनकाल: 1847-1928 ईसवीं), जी0 थिबॉट (जीवनकाल: 1848-1914 ईसवीं), एडगर्टन (जीवनकाल: 1885-1963 ईसवीं), हरमन/हेरमान कार्ल हेस/हेस्से (जीवनकाल: 1877-1962 ईसवीं) एवं थिओडोर (जन्म 1959 ईसवीं में) जैसे अग्रिम पंक्ति के विदेशी विद्वानों ने भी इस पर, इसमें प्रमुखता से उभरे विषय को केन्द्र में रखते हुए, भाष्य-टीकाएँ लिखीं।

वैदिक धर्म के मूल सिद्धान्तों के साथ ही, विशेष रूप से श्रीमद्भगवद्गीता में प्रकट निष्कामकर्मयोग –स्वाभाविक कर्मों में संलग्न रहते हुए और ब्रह्माण्ड के स्वामी –जगतपति परमेश्वराधीन रहकर ही निःश्रेयस प्राप्ति –जीवन सार्थकता का सिद्धान्त, जैसा कि हम सभी जानते हैं, इनमें सर्वप्रमुख रहा है। इस रूप में श्रीमद्भगवद्गीता, निस्सन्देह, विश्वभर के गिने-चुने धर्म ग्रन्थों में से एक है। इस ग्रन्थ की समानता करने वाला कोई और धर्म ग्रन्थ, कदाचित्, पूरे विश्व में नहीं है। परमात्मा के अनादि, सर्वमूल –तेज, बुद्धि, शक्ति और सत्य के स्रोत एवं जगत कारक होने की वास्तविकता को प्रकट करते श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय सात के तीन (6, 7 तथा 10) अति मूल्यवान और लोकप्रिय श्लोकों का उल्लेख यहाँ प्रासंगिक होगा: 
“एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय/ 
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा// 
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय/ 
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव// 
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्/ 
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्//”

संक्षेप में, सार्वभौमिक एकता, सर्वसमानता और सत्य की पराकाष्ठा (निरन्तर प्रवहमान सार्वभौमिक नियम रूप) सर्वशक्तिमान परमेश्वर –ब्रह्म सहित, वैदिक धर्म के मूल सिद्धान्तों की अतिश्रेष्ठ व्याख्या व तत्वज्ञान का लौकिक संस्कृत –सुसंस्कृत काव्यशैली में वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता की विलक्षणता है। इसी के साथ श्रीमद्भगवद्गीता वैदिक धर्म और संस्कृत भाषा की घनिष्ठता का एक बेजोड़ एवं अतिश्रेष्ठ उदाहरण भी है।

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