सिख धर्म में अहिंसा की पड़ताल

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी
- डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

अहिंसा से सम्बंधित इस शृंखला की पिछली कड़ियों में आपने पढा: अहिंसा का अनुबंध और जीवन के आग्रहअहिंसा की अवधारणा; बौद्ध धर्म में अहिंसा के सोपान ; जैन धर्म में अहिंसा के संकल्प; तथा ईसा की मूल प्रेरणा, अहिंसा
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भारत तो बहुत से धर्मों की ज़िन्दगी एक साथ जीता है। इसकी विशालता इसके इसी एकीकरण के कारण ज्यादा प्रशंसित रही। आत्मसातीकरण में भी भारत दूसरे संस्कृतियों को अब पीछे छोड़ चुका है। अनेक सभ्यताओं ने यहाँ अपना विस्तार पाया। इसके साथ ही भारत कई प्रकार से कई नई विधाओं का उद्गम स्थल बना। उसमें भारतीय ज़मीन पर जन्मे सिख धर्म का भी अपना अलग इतिहास है जिसने विश्व में अपनी एक अलग पहचान कायम की है। केश, कंघा, कच्छ, कृपाण और कड़ाधारी सिखों के बारे में बहुत सी बातें दुनिया भर में प्रचारित की गयीं लेकिन सच है इस संप्रदाय के गुरुओं के वचन यदि सुने जायें तो यह पता चल जाता है कि यह धर्म किसी भी धर्म से अपनी तुलना न करते हुए एक स्थापित सभ्यता का स्रोत हुआ, गुरुग्रंथ साहिब भक्ति के दोहों। छंदों और शबद से इस प्रकार आबध्द हुए हैं कि उसमें जो एक बार डूब जाए तो उसे खुद का एहसास न हो। सच में देखा जाये तो सिख गुरु मानवता के लिए और परमेश्वर की भक्ति के लिए पूर्णतः समर्पित रहे। उनके प्रवचन भी उस आध्यात्मिक सामाजिकी को गढ़ते रहे जिससे मनुष्य जाति का, प्रकृति का और जीव-जंतुओं का उद्धार हो। आपसी सद्भाव, मनुष्य और ईश्वर दोनों के प्रति प्रेम तथा अंधविश्वासों से मुक्ति के क्रम में सिख गुरुओं के अवदान निश्चित रूप से प्रेरणा के स्रोत रहे हैं।

सबसे बड़ी बात यह है कि सिख समुदाय न्यायपूर्ण समाज-व्यवस्था में विश्वास करता है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि न्याय के बिना अहिंसक सभ्यता संभव ही नहीं है। अपने अहिंसक व्यवहार में प्रेम और न्याय तो समस्त प्राणियों के लिए आवश्यक हैं। सिख धर्म की यह वृत्ति इस बात का सबूत है कि अप्रिय न होने देने के प्रति कहीं न कहीं उनकी प्रतिबद्धता है। अपनी संपत्ति को सदा निर्धन और निर्बल के साथ बांटने की अद्भुत कामना सिख धर्म सिखाता है। निर्बल और निर्धन के बीच यह चाह किसी भी व्यवस्था को अहिंसक होने के लिए प्रेरित करती है।

इसके दसवें गुरु ने खालसा पंथ की स्थापना कि। यह हम सभी जानते हैं लेकिन सबसे रोचक बात यही है कि यह पंथ सेवा और परिश्रम की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। सेवा भी उम्दा अहिंसा व्रत है। सेवा से मनुष्य न केवल अपने आत्म को पवित्र करता है अपितु उस कर्म से दूसरे को भी प्रेरणा प्रदान करता है कि सेवा से सुख प्रदान करके मनुष्य अपने आत्म को पवित्र कर सकता है। सेवा से एक बात और स्थापित होती है कि वहां न तो घृणा के भाव बचाते हैं और न ही कभी असुरक्षा की भावना आती है। इस भावना का उदय होना एक ऐसे वातावरण की प्रतिस्थापना है जिसमें मनुष्य अपने मन का स्वराज ढूँढकर जी सकता है और सुख महसूस कर सकता है।

गुरु नानकदेव जी, गुरु अंगददेव जी, गुरु अमरदास साहिब जी, गुरु रामदास साहिब जी, गुरु अर्जुनदेव जी, गुरु हरगोबिंद साहब जी, गुरु हरराय साहिब जी, गुरु तेगबहादुर साहिब जी, और गुरु गोबिंदसिंह जी ये सिखों के दस गुरु हुए। आप इनकी गाथा पढ़ें तो यह लगेगा कि इसमें सभी एक जैसे नहीं थे। इनमें से युद्ध के लिए भी सिख गुरु प्रसिद्ध हुए हैं। सिखों के प्रायः यह कहा जाता है कि इनके गुरु लड़ाकू रहे हैं लेकिन इनकी लड़ाई किसके बरक्स रही और क्यों रही इसे भी जानना जरूरी है।

गुरु हरगोबिन्द जी के बारे में ऐसा कहा जाता है कि वह गुरु अर्जुनदेव जी के पुत्र थे उनका मानना था कि किसी भी चीज की अति ठीक नहीं है। चरम अहिंसा और अति-शांतिवाद बुराई की ओर ले जाते हैं। इसीलिए वे मीरी-पीरी के सिद्धांत के लिए मशहूर हुए। इसी प्रकार गुरु हरराय जी के बारे में कहा जाता है कि व्यक्तिगत जीवन में वे अहिंसा को मानते थे लेकिन आत्मरक्षा में शस्त्र उठाने के लिए कहते थे। इससे शायद लोग सिख धर्म में अहिंसा की स्वीकारोक्ति नहीं मानें क्योंकि ये पूर्ण तरह से अहिंसा तो नहीं है। और यह भी कहा जाता है कि अहिंसा के लिए हिंसा का त्याग आवश्यक है। हिंसा से तो हिंसा को बढ़ावा मिलेगा लेकिन यदि इसके सन्दर्भ को आत्मरक्षा से जोड़कर देखेंगे तो सिखों के इन गुरुओं की बात कहीं न कहीं अधिकाँश जन-मनोवृत्ति में स्वीकार होते हुए मिलेगी।

यदि इस बात में सचाई हो कि सिख धर्म हिन्दुओं की रक्षा करने के लिए बना तो यह बात कही जा सकती है कि अधिकतम लोगों के लिए किये गए जीवन-रक्षक कार्य स्थायी शान्ति की प्रक्रिया है और इसमें हिंसा के भाव शून्य हो जाते हैं और अहिंसा के व्यापकता को अंगीकार किया जाता है। सिख धर्म के व्रत और क्रियाकलाप हम प्रश्नांकित नहीं कर सकते हैं।

तारन सिंह की कृति ‘गुरु नानक चिंतन ते कला’ का यदि आप अवलोकन करें तो उसमें यह बताया गया है कि संगीत से इन गुरुओं का बहुत गहरा संबंध रहा है। रागों को लेकर इन गुरुओं ने काफी गहरी रूचि दिखाई। बत्तीस राग का जिक्र इस पुस्तक में किया गया है। गुरु अंगद देव के बारे में कहते हैं कि उनकी दस रागों में तिरसठ रचनाएं काफी चर्चित रहीं। गुरु नानकदेव ने तो लोक शैलियों और लोक गीतों को खूब महत्त्व दिया। ये संगीत किसी भी धर्म को अहिंसक सभ्यता से बांधती है। निःसंदेह उनके लड़ाकू स्वभाव के साथ यदि और विधाओं में उनके प्रेम को हम देखेंगे तो यह पाते हैं कि सिख धर्म की अन्य कार्यसंस्कृति तो एक सभ्य समाज की ही पोषक रही है। गुरबाणी में रचनाकार द्वारा पग-पग पर संसारी बातों पर तर्क किया गया है। प्रत्येक मत की कमियों को उजागर करके उसका समाधान भी साथ -साथ ही सुझाया गया है।

आत्मालोचन की यह बात अगर किसी धर्म या संप्रदाय में हो तो वह निःसंदेह न्याय और गरिमा की ही बात करेगा।

लख मण सुइना लख मण रूपा लख साहा सिरि साह।।
लख लसकर लख बाजे नेजे लखी घोड़ी पातिसाह।।
जिथै साइरु लंघणा अगनि पाणी असगाह।।
कंधी दिसि न आवई धाही पवै कहाह।।
नानक ओथै जाणीअहि साह केई पातिसाह।।

गुरु नानकदेव की इस बाणी के विस्तार में जाएँ तो यह स्वतः बोध हो जाता है कि मन से त्याग भावना ज़रूरी है। इस प्रकार की भावना से व्यक्ति की वृत्ति में परिवर्तन आते हैं।

हम जानते हैं कि मनुष्य शरीर की पाँच कर्मेन्द्रियाँ जो संसारी या दुनियावी या उसे भौतिकवादी कह लें, कार्यों को करने में इस्तेमाल होती हैं इसके भी ऊपर अपना नियंत्रण करने के लिए गुरुओं ने समय-समय पर अपना सन्देश दिया। वे प्रायः इस बात पर जोर देते रहे हैं कि गुरमत में यदि अपनी मर्जी जोड़ दी जाए तो वह मनमत बन जाती है, इसलिए मनुष्य को उसी मार्ग को अपनाना चाहिए जिससे संसार से और अध्यात्म से खुद तालमेल बनाने में सक्षम हों।

अहिंसा का प्रस्फुटन वास्तव में अपनी वृत्तियों, चित्त और अभिलाषाओं के सही ज्ञान से संभव है। सिख धर्म में, उसके धर्मग्रन्थ में इस बात पर जोर दिया गया है कि मनुष्य को प्रेम के नियम पर ही चलकर। सेवा से ही सत्कर्म की ओर बढ़ा जा सकता है। इसलिए सिख धर्म के दुनिया भर में अनुयायियों की सेवाधार्मिता आज भी सराहनीय है। गुरूद्वारे हों या लंगर उसमें जाने वाले लोग सिख धर्म के दस्तावेजी ज्ञान को चाहे जीवन भर न समझ सकें लेकिन उसमें सेवा-संस्कार से यह अवश्य समझ जाते हैं कि अहिंसा का यह सर्वोत्तम जीवन आचरण है।

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी
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