ईसा की मूल प्रेरणा अहिंसा ही है

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी
- डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

पिछले अंकों में आपने पढा: अहिंसा का अनुबंध और जीवन के आग्रहअहिंसा की अवधारणा; बौद्ध धर्म में अहिंसा के सोपान ; तथा जैन धर्म में अहिंसा के संकल्प
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विविधता की अपनी खूबी होती है. प्रकृति में इस विविधता की विपुलता ने इसीलिए आज भी उन रहस्यों को कायम रखा है जिसकी वजह से उसे हम प्रत्येक पल जानने का प्रयास करते हैं. शायद यह विविधता न होती तो प्रकृति के प्रति हमारा मोह कब का समाप्त हो गया होता. मनुष्य योनि में भी उसी विपुल विविधता के विम्ब हमें देखने को मिलते हैं. उसके समझ, आचरण और नैतिकी, स्वाभाव, धर्म, संस्कृति और सभ्यता की पड़ताल करें तो पाएंगे कि पाँच हज़ार साल से अधिक की सभ्यता हमें उन इतिहास और दर्शन से जोड़ती है जो कभी एक सी थी ही नहीं. उसमें नानाप्रकार के अंतर मिलते हैं. इंसानों के इस इतिहास को टटोलें तो अहिंसा की संस्कृति हमें उन सभी भू-भागों, संस्कृतियों में भी मिलती है जिसे प्रायः हम हिंसक, बर्बर और अतिक्रमणकारी कहते आये हैं. यह शायद इसलिए है क्योंकि ‘प्रेम’ से विरत कोई समाज आज तक अस्तित्व में नहीं रहा है. उस प्रेम के स्वरूप भले भिन्न रहे हों. प्रेम का होना ही अहिंसा का होना है.

भारत में सनातन धर्म या जैन, बौद्ध परम्परा के ऐतिहासिक दस्तावेज़ जिस प्रकार अहिंसक संस्कृति, आचार-व्यवहार की बात करते हैं ठीक उसी प्रकार ईसाई लोगों की बाइबल का, उसकी सभ्यता परम्परा का हम अवलोकन करें तो वहां प्रेम के लिए पर्याप्त पृष्ठभूमि देखने को मिलती है. वहां भी अहिंसक समाज की प्रतिष्ठा है. बाइबल में ही यह कहा गया है कि  'क्या आप यह नहीं जानते कि आपका शरीर पवित्र आत्मा का मंदिर है. वह आप में निवास करता है और आपको ईश्वर से मिला है. ' उपनिषदों की तरह बाइबल में भी ऐसा माना गया है कि अपने पड़ोसी को अपने ही समान प्रेम करो. अराजकतावादी विचारकों में ताल्स्तॉय का महत्त्व इसलिए ज्यादा है क्योंकि वह व्यक्ति के नैतिक जीवन पर अधिक जोर देते हैं. उनके अनुसार एक सच्चा ईसाई कभी हिंसा का सहारा नहीं ले सकता, जबकि राज्य का तो आधार ही हिंसा पर टिकी हैं. वह मानते हैं कि ईश्वर का राज्य हमारे भीतर है, इसलिए उसे किसी बाहरी राज्य की आवश्यकता ही नहीं है. ईसाई समाज की यह व्याख्या निश्चितरूप से उस व्यवस्था के प्रति असंतोष को प्रकट करता है जिससे हिंसा फलती-फूलती है. वस्तुतः राज्य बल पर ही आधारातित व्यवस्था चलाते हैं जिसमें उसकी मदद सेनाएं किया करती हैं ताल्स्तॉय की इस बल आधारित व्यवस्था से प्रतिकार और नैतिक नियमों पर आधारित व्यवस्था के आत्मसातीकरण की संकल्पना अहिंसक व्यवस्था की संकल्पना को दर्शाती है.

सरमन ऑन दि माउंट अब इसी क्रम में देखें. उसकी दार्शनिकता में जायेंगे तो यह मिलता है कि सरमन ऑन दि माऊंट ईसाइयत में अहिंसा की व्याख्या है. ओल्ड टेस्टमेंट के दस आदेश (जिसे टेन कंमांडमेंट्स के रूप में जाना जाता है) भी नैतिक सिद्धांतों पर आधारित हैं. सरमन ऑन दि माउंट के प्रथम आठ आशीर्वचन न्यू टेस्टामेंट में प्रेम की आध्यात्मिकता को प्रकट करते हैं. ईसा के ये आशीर्वचन केवल वर्तमान परिस्थितियों, मुश्किलों और भविष्य के शानदार यथार्थ का विरोध ही नहीं प्रकट करते, अपितु अपने अनुयायियों के लिए मौलिक रूप से कुछ नई आध्यात्मिक-संकल्पना का संदेश भी देते हैं, जिसके अनुसार अपने अस्तित्व का प्रयोजन दूसरे के लिए है. यदि प्रत्येक व्यक्ति को शांति का आचरण करने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है,  तो ऐसा नहीं है की उसे जबरिया उसमें शामिल किया जा रहा है अपितु देखें तो इसे प्रत्येक के दैवीय कर्त्तव्य के रूप में देखा गया है. इसी प्रकार सरमन ऑन दि माउंट में सभी अनुयायियों को अहिंसक कर्म की प्रेरणा दी गई है, जिससे यह दुनिया बेहतर बन सके, ख़ूबसूरत बन सके. मैथ्यू 5:5-12 में यह मिलता है कि विनम्र लोग कृपापात्र हैं, क्योंकि उन्हें पृथ्वी प्राप्त होगी..... वे कृपापात्र हैं, जिन्हें भले कामों के लिए दंडित किया जाता है, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं को मिलेगा.....आदि-आदि. यह विनम्रता, प्रेम, नैतिकी और शांति-आधारित आचार-विचार की अभिप्रेरणा से ओत-प्रोत ईसाई समाज की अहिंसक संकल्पना एक तरीके से मनुष्यता की स्थापना है जो निश्चितरूप से सतत शान्ति की प्रक्रिया का आह्वान है. इस प्रकार वास्तव में देखें तो न्यू टेस्टामेंट में ईसाइयत की वास्तविक संकल्पना के अनुसार अहिंसा न केवल एक बलवती-शक्ति है अपितु मनुष्य और समाज के भविष्य का एकमात्र सही दिशा है. हिंसा के जरिये दुनिया को बदलने का सपना ध्वस्त हो चुका है. वह यह मान चुकी है कि असत्य, हिंसा, अमानवीय-व्यवहार या अनुचित रास्तों को अपनाना उस सत्य के साथ ही छल करना होगा, जिसे न्याय हम सिद्ध हम करना चाहते हैं. ईसाइयत के बुनियादी सद्गुण आशाएवं विश्वास और प्रेम एवं विनम्रता अविभाज्य हैं. मनुष्यता का आशावादी ईसाई संकल्प इस बात की अभिव्यक्ति है जिससे प्रेम का प्राकट्य हो. ईसाई अहिंसा यह मानती है कि सत्य के लिए संघर्ष के तरीके के अनुसार ही सत्य उद्घाटित होगा. इसलिए हमारे संस्कार, आचरण प्रेम के नियम पर ही आधारित हों. न्यू टेस्टामेंट के इस ईसाई संकल्प को किसी मिथक के रूप में न देखें बल्कि इसे तो मनुष्य के जीवनचर्या के साथ जोड़कर देखा जाएगा. प्रायः इसे एक कोरी कल्पना भी सिद्ध करने की कोशिश हो सकती है लेकिन सत्य के इस उद्घाटन को चाहे समाज में जो भी समय-समय पर तब्दीली आये उसके आचरण के साथ ही जोड़कर देखा जाएगा. हिन्दू सनातन धर्म के विविध आख्यान के मिथक को भी देखें तो वहां दी गयी शिक्षा को किस प्रकार लेते हैं, किसी कथा के भीतर उसमें छुपे सन्देश को किस प्रकार हम लेते हैं यह महत्त्वपूर्ण है क्योंकि किसी स्तर पर किसी भी चीज को नकारा जा सकता है. फिलहाल न्यू टेस्टामेंट हो या किसी भी धर्म का धर्मशास्त्र उसमें मनुष्य-बोध, मानवीय-नैतिकता वे सदैव आत्मसात किए जायेंगे. उससे मनुष्य समाज को अलग नहीं किया जा सकता. निहितार्थ उसका यह भी है कि ईश्वर के सभी कुछ का आधार होने के कारण जो कुछ भी अस्तित्व में है, वह एक शून्य में से उत्पन्न है. यदि स्वयंभू ईश्वर सब कुछ का आधार है तो जो कुछ रचा गया है, वह उसने शून्य में से रचा है और अस्तित्व में बने रहने के लिए उनकी ईश्वर के अस्तित्व में सहभागिता अनिवार्य नियम है. मतलब सृष्टि की रचना ही उदारता की कसौटी है और उसे ईश्वर ने रची है जिसकी रचना ही प्रेम और अहिंसा के सत्व से संभव हुई है. अतः यहाँ इस प्रेम और अहिंसक सृष्टि के जीवन में शामिल होना ही ईश्वर में शामिल होने जैसा है जो यूनिवर्स में समादृत होना है. इस अहिंसा की व्याख्या किस पैमाने पर हो सकती है. अतः मेरी दृष्टि में यह बात बार-बार आती है की ईसाइयत की अहिंसा अदभुत है.

हम उन सन्दर्भों और अर्थों को सही रूप में देखने की भूल ही करते है जिसके कारण हमारे अर्थ-सन्दर्भ भी बदल जाते हैं. यदि हमारा मन सृष्टि की रचना के इस सत्य को समझ सके कि सभी कुछ एक-दूसरे से अविभाज्य रूप से आध्यात्मिक एवं तात्त्विक स्तर पर जुड़े हैं, अंतर्विन्यस्त हैं तो किसी भी प्रकार की हिंसा, ईर्ष्या मनुष्यों के बीच ही नहीं, मनुष्यों और मनुष्येतर के बीच भी-सृष्टि के नियम के प्रतिकूल लगेंगे. हमारे भीतर के अन्धकार दूर हो जायेंगे. यह ईसाई अहिंसा संस्कृति है. यह ईसाई अहिंसा के मूलाधार हैं. सेंट थॉमस एक्विनास (1225-1274 ई०) मध्यकाल के वह दार्शनिक हैं जिन्होंने ईसाई धर्मशास्त्रीय अवधारणाओं को अरस्तू-पद्धति से पुष्ट करने का प्रयास किया था, का मानना था कि यह जगत क्योंकि ईश्वरीय शुभ (सत्य) का प्राकट्य है, इसलिए इस शुभ की उपलब्धि ही जगत का प्रयोजन है. यदि इसमें कुछ अशुभ है तो वह ईश्वरकृत नहीं है, पर ईश्वर उसकी अनुमति देता है ताकि हम अपनी स्वतंत्र इच्छा के आधार पर उसमें से गुजरते हुए परम शुभ तक पहुंच सकें. इस जगत की रचना का प्रयोजन सृष्टि में ईश्वर के शुभत्व का प्राकट्य है, अतः प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का प्रयोजन इस शुभत्व की साधना के परिणामस्वरूप अपने जीवन में इस परम शुभत्व की अनुभूति है. अब यदि शुभत्व के इस अनुभूति को अगर कोई समझ ले तो अधिकांश समकालीन समस्याएं जिसमें शोषण, उपनिवेशवाद, उपभोक्तावाद, युद्ध, उग्रवाद, भ्रष्टाचार आदि-हमारे अंतस को न समझ पाने एवं ईश्वर द्वारा निर्देशित मार्ग पर न चल पाने के कारण के रूप में दिखेंगे. किसी भी रूप में हिंसा सृष्टि की ईसाई संकल्पना के बुनियादी सिद्धांत के विरूद्ध है. अशुभ हैं. थॉमस एक्विनास ने निरपेक्ष प्रेम के प्राकट्य को ही जगत रचना की प्रेरणा और प्रेमानुभूति की ओर ले जाने वाले आचरण को ही ईश्वरीय आदेश माना है. इस प्रकार जो ईसाई समाज में अंतस का विस्तार सेंट थॉमस एक्विनास मानते हैं उसकी गंभीरता को अगर समझ लिया जाए तो अशुभ के लिए ईसाई समाज में जगह नहीं है. वहां तो अहिंसा के लिए सदैव मार्ग प्रशस्त है क्योंकि एक्विनास द्वारा प्रेम को ईश्वर का स्वरूप मानने तथा सारे मानवीय रिश्तों में इस प्रेम को ही मूल प्रेरणा और अंतिम कसौटी के रूप में स्वीकार करने के कारण खुद ही अहिंसा का सिद्धांत एक मानव-मूल्य के रूप में स्थापित हो जाता है.

मूल टेक्स्ट बाइबल में संग्रह किए गए ईसा मसीह के उपदेश पढ़कर किसी भी इंसान के मन का अंधेरा दूर हो सकता है. ये महज कोरे उपदेश नहीं हैं, बल्‍कि तर्क की कसौटी पर भी एकदम खरा उतरते हैं. महत्वपूर्ण यह है कि ईसाईयों ने खुद अपनी उस पवित्र पुस्तक या महान संतों को कितना माना. उन्हें प्रतिद्वंदिता, उपभोग और अतिरेक में जीने की प्रवृत्ति ने मुक्त न होने दिया. इसलिए दुनिया के इतिहास इस बात के प्रमाण हैं कि युद्ध और हिंसा में शामिल ईसाई समाज के लोग ज्यादा आक्रामक ही माने गए. दुनिया कि किसी भी सभ्यता को लोग उसके अच्छे चीजों से जानें इसके लिए उस सभ्यता के प्रत्येक व्यक्तियों को यह चाहिए कि वे अपनी संस्कृति को इस प्रकार बनायें जिसमें अनुराग और अहिंसा की व्याप्ति हो. वही लोग अपनी सभ्यता और संस्कृति के साथ न्याय कर पाते हैं. हिंसा चाहे सूक्ष्म हो या चाहे जैसी भी हो हिंसा तो हिंसा होती है वह मनुष्य के शुभ और अशुभ का निर्धारण करती है और उसके चरित्र को प्रकट भी करती है. इसलिए उस समाज के अहिंसक लोग ही अपनी सभ्यता के विस्तारक के रूप में सच्छे मायने में याद किए जाते हैं. ईसाई लोगों में अहिंसा के उदार स्वरुप को भी हम उन्हीं के माध्यम से जान पा रहे हैं. अतः क्यों न एक बेहतर भविष्य एवं मनुष्यता का स्वप्न ईसाई सभ्यता को मानने वाले लोग अहिंसक हो जाने में देखें. इससे उनके इतिहास निःसंदेह करुणा, प्रेम एवं दया के विस्तार के रूप में देखे जायेंगे बजाय इसके कि उन्हें हिंसा के विस्तारक के रूप में ही लोग जानें जबकि वे जानते हैं कि ईसा की मूल प्रेरणा अहिंसा ही है.

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर/निदेशक
यूजीसी-एचआरडीसी,
डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय,
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