अनुवाद: श्री कनक धारा स्तोत्र

आदि शंकराचार्य विरचित श्री कनकधारा स्तोत्र का काव्यानुवाद

- मृदुल कीर्ति

मृदुल कीर्ति

अष्ट सिद्धि प्रदाता।
अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वासित्व अष्ट लक्ष्मी।
आरोग्य, कीर्ति, संतान, विजय, धन-धान्य, मोक्ष, सौभाग्य, शांति।

जय जयति जय हरि! अंग तो, आनंद भूषण शोभिता,
यहि रूप लखि हरि का मनोहर, लक्ष्मी श्री! अस मोहिता,
जस भृंग मोहित मुकुल पुंज, तमाल के जो अधखिले,
तस ही कृपा मम मंगलम, विष्णु प्रिया से नित मिले। (1)

पुनि-पुनि निहारे मुग्ध, चितवन, मुख मुरारे! नीरजा,
निरखतीं संकोच से, सिद्धि, पयोदधि जन्मजा,
मधु मृच्छिका जस नील नीरज, के मधुर रस को गहे,
तस वही हरिवल्ल्भी शुभ, दृष्टि, धन वर्षित महे। (2)

अर्द्ध निमलित नयन से, अनिमेष तकतीं मुकुंद को,
सकुचात, मन मुदिता रमा, श्री परम आनंदकंद को।
नंद आनन, बंद नयना, भुजग शयनम नाथ श्री,
हे पद्मिनी! देना मुझे, धन, अनवरत ऐश्वर्य श्री। (3)

कौस्तुभं आभूषणं, मणि हार नीलम शोभितं,
त्रैलोक्य स्वामी, मधु विजित, हे रमापति! प्रिय वरं,
प्रेम पूरित, भाव भावित, श्री हरि! को भगवती,
कमलालया, देना यथा, धन-धान्य मुझको सम्पत्ति। (4)

शुभ श्याम वक्षस्थल विशाला, पद्मिनी जस दामिनी,
घन तिमिर में तड़ित मानहुँ, शोभिता पद्मासिनी,
हे! जगतमातु! महीयसी, हे! वर महिम भार्गव सुता,
हे! शुभ प्रदा, देना मुझे, धन, अनवरत श्री अच्युता। (5)

वरदानमय, आशीषमय, कृपारूप शुभांगिनी
रमा की सामर्थ्य मधुजित, की बने वामांगिनी .
करुणामयी, प्रेमस्वरूपा, स्नेहविगलित दृष्टि जो
से करो प्लावित मुझे, दो, याचना माँ! अभीष्ट जो। (6)

जय जयति जय माँ भगवती, की निमिष करुणा दृष्टि से,
इन्द्र भी देवेश 'मधुजित', हों दया की वृष्टि से
आनंद मय आनंदरूपा, सिद्धि वाची यशस्विनी
नील वारिज नयन से, मुझे देख माँ! पद्मासिनी। (7)

स्वर्ग पद दुर्लभ, सुलभ, माँ की कृपा शुभ दृष्टि से,
पा सकें, इष्टा विशिष्टा, निमिष करुणा वृष्टि से,
दीप्तिमय शुभ दृष्टि दो, जो पूर्ण विकसित कमल सी,
सर्व मंगल,काम्य दात्री, मंगला माँ! विमल सी। (8)

द्रविण अम्बु धार की, मुझ दीन हित वर्षा करो,
विहग शिशु चातक अकिंचन, तृषित, माँ तृष्णा हरो,
पवन सी विस्तृत दयालु, अघ, हरो नारायणी,
सघन घन सम नयन चारु, माँ! कृपा कल्यायणी। (9)

ज्ञानेश्वरी, हे महाकाली!, तुम गरुणध्वज की प्रिया,
सृष्टि, स्थिति, प्रलय काले, संस्थिता, संसृति क्रिया।
भगवती! त्रैलोक्य पूज्या, आदि माँ परमेश्वरी,
मम नमन उस जगत माँ को, साधना सिद्धेश्वरी। (10)

कर्मफलशुभ दायिनी, वेदोक्त माँ! कोटिक नमन,
रमणीय गुण युक्ता रति!, हे शुभ्र! माँ! कोटिक नमन,
शतपत्र के कमलालये, हे शक्ति! माँ कोटिक नमन,
विष्णु प्रिया हरि वल्ल्भा, हे पुष्टि! माँ कोटिक नमन। (11)

पूर्ण विकसित कमल सम, सौंदर्य, माँ! कोटिक नमन,
वाची, पयोदधि जन्मजा, सुरभि, माँ! कोटिक नमन,
अमिय सोम सहोदराया, विभा माँ! कोटिक नमन,
श्री नारायण वल्ल्भा, श्री निधि माँ! कोटिक नमन। (12)

कनक पद्मासिनी हिरण्या, स्वधा माँ! कोटिक नमन
नायिका ब्रह्माण्ड सर्वं, प्रकृति माँ! कोटिक नमन,
दयामय देवादि पर भी, आद्या माँ! कोटिक नमन,
शारंग आयुध वल्ल्भाये, शुभा माँ! कोटिक नमन। (13)

भृगु आत्मजा, देवी सुकन्या, जया माँ! कोटिक नमन,
श्री विष्णु के वक्षस्थले, रमति माँ! कोटिक नमन,
कमलजा कमलालयै, कमला माँ! कोटिक नमन,
श्री दामोदर वल्लभा, देवी माँ! कोटिक नमन। (14)

कमल की कांति है कमला, कान्ति माँ! कोटिक नमन,
भूमि और, भू मातु भी, हे भूमि माँ! कोटिक नमन,
देवताओं से भी पूजित, श्रेय माँ! कोटिक नमन,
नन्द आत्मज वल्ल्भायै, आद्या माँ! कोटिक नमन। (15)

बहुल धन-संपत्ति दात्री, इन्द्रियों के सुख सभी,
हे सरोजाक्षी! प्रदात्री, राज को साम्राज्य भी,
द्वन्द दुरितानि त्वरित, माँ लक्ष्मी! सारे हरो,
हे! मातु श्री वन्दन नमन, स्वीकार माँ मेरे करो। (16)

जो कटाक्ष उपासना के, विधि विधान से युक्त हो,
श्री, सम्पदा, ऐश्वर्य, धन से, भक्त वह संयुक्त हो,
कोटि वंदन नमन पुनि-पुनि, मन वचन और कर्म से,
श्री मुरारी की प्रिया श्री, लक्ष्मी को, हिय मर्म से। (17)

पद्मिनी पद्मासिनी, शुभ पद्म हस्ते पावनी,
धवल वस्त्रा, शुभ्र सुरभित माल मलयज भावनी,
भगवती! हरिवल्लभा, मन मुदित आनंदित करे,
त्रिभुवन विभूति श्रीमयी, वह माँ मुझे प्रमुदित करे। (18)

कनक कुंभ से अष्ट कुंजर, गंगाजल दिशि पावनी,
करें प्रक्षालन, जो गंगा, रमा हित स्वर्ग वाहिनी,
प्रातर्नमामि जगत जननी, श्रीधरः, गृहस्वामिनी
जलधि तनया, अमिय दात्री, लक्ष्मी, स्वस्ति, पद्मिनी। (19)

कमल नयनं वल्लभे, हे!, कमल, हे करुणामयी,
अवलोक मेरी ओर किंचित, मातु श्री ममतामयी।
मैं दीन से भी दीन, माँ, तेरी दया का पात्र हूँ,
अति-अति प्रथम करना दया, माँ! दीन हूँ अति आर्त हूँ। (20)

जगदीश्वरी ब्रह्माण्ड की, रक्षा नियंत्रण कर रहीं,
कल्याण रूपा, कमल नयना, सृष्टि संचालक मही
दारिद्र्य भय से आप्त हिय, शरण में हूँ आपकी,
दया दृष्टि अनवरत माँ!, चाह तेरे प्रताप की। (21)

वेदस्वरूपा भगवती का, ध्यान हिय से नित करे
वही त्रिभुवन श्रीमयी माँ, लक्ष्मी प्रमुदित करे,
भाग्य, श्री, ऐश्वर्य, सद्गुण, ज्ञान निश्चय ही मिले,
ज्ञानियों से मान, भव वैभव, श्री कृपा माँ की मिले
श्री कृपा माँ की मिले।

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