साक्षात्कार: ललित कुमार की वार्ता मृदुल कीर्ति से

हिंदी साहित्य के सबसे बड़े प्रकल्पों में से एक, कविताकोश के संस्थापक ललित कुमार दिल्ली निवासी हैं। कविहृदय ललित कुमार एक दृढ़निश्चयी व्यक्ति हैं। सेतु के लिये डॉ. मृदुल कीर्ति ने उनसे एक संक्षिप्त वार्ता की जिसका सार यहाँ प्रस्तुत है।

ललित कुमार
मृदुल कीर्ति: जिज्ञासु और सत्यान्वेषी मन कभी सतह पर नहीं रुकता, तहों तक जाने का उपक्रम उसका स्वभाव है। उसी स्वभाव के सन्दर्भ में ललित जी आपसे प्रश्नायित हूँ ---

कविताकोश जैसी हिंदी साहित्यिक परिकल्पना का अति प्रथम विचार आपकी मनोभूमि में कब, क्यों और कैसे हुआ? कोई भी कार्य बिना कारण नहीं होता बिना बीज के वृक्ष नहीं होता। आरंभिक रूप के उस अति प्रथम विचार बीज के प्रति जिज्ञासु हूँ। क्या इसके मूल में कोई कारण अथवा घटना विशेष भी है?

ललित कुमार: कविता कोश से पहले हिन्दी काव्य का कोई ऑनलाइन विश्वकोश उपलब्ध नहीं था। ऑनलाइन उपलब्ध सारी सामग्री जहाँ-तहाँ बिखरी हुई थी और पाठकों के पास कोई एक ऐसा ऑनलाइन ठिकाना नहीं था जहाँ उन्हें प्रचुर मात्रा में भारतीय काव्य सुव्यवस्थित रूप में मिल जाए। मुझे इस तरह के ऑनलाइन विश्वकोश की कमी बहुत खटकती थी। यही वजह थी कि मैंने कविता कोश के रूप में भारतीय साहित्य का प्रथम ऑनलाइन विश्वकोश बनाने के बारे में सोचा।

मृदुल कीर्ति: कविता कोश का विस्तार देखो तो लगता है किसी वट वृक्ष के तले आ गए। इस वट वृक्ष का बीज से विस्तार तक पसारा अद्भुत और बृहद है। क्या कविता कोश के इतने विस्तृत और विराट स्वरूप की परिकल्पना आपके मानस में थी?

ललित कुमार: मैं कविता कोश को एक विश्वकोश के रूप में उन्नत करना चाहता था -- इसलिए इसे विशाल तो होना ही था -- लेकिन आरम्भ में मैंने ऐसा नहीं सोचा था कि यह वास्तव में एक वटवृक्ष की भांति हो जाएगा जिसकी शाखाएँ भी एक वृक्ष का रूप ले लेंगी।

मृदुल कीर्ति
मृदुल कीर्ति: सामान्यतः अपनी आजीविका में व्यस्त लोग सामाजिक ईमेल पढ़ने या उत्तर देने तक का समय नहीं निकाल पाते अथवा रुचि नहीं रखते। आप भी तो उसी युग की विडंबनाओं और उलझनों को झेल रहे हैं। इन सब के बीच हिंदी का इतना सबल और प्रबल मंच समाज को दे पाने का समय, परिश्रम और लगन की ऊर्जा का स्रोत कौन सी प्रेरणा रही है?

ललित कुमार: आजीविका कमाना आवश्यक है लेकिन मुझे लगता है कि हम सभी को आजीविका से आगे बढ़कर भी समाज के लिए निस्वार्थ कुछ करने के बारे में सोचना चाहिए। आजीविका कमा कर हम अपना भरण-पोषण कर लेते हैं। आजीविका कमाते हुए हम समाज में कुछ योगदान भी देते हैं लेकिन समाज को इससे कहीं अधिक की आवश्यकता है। यदि हम चाहते हैं कि हमारा विश्व सुंदर, सगुण और समता चाहने वाला बने, तो हमें निस्वार्थ भी बहुत कुछ करना होगा। निस्वार्थ स्वयंसेवा की भावना ही कविता कोश का आधार है।

मृदुल कीर्ति: इतने ही बृहत स्वरूप की परिकल्पना आपके चित्त में थी अथवा जनप्रिय होने पर कड़ियाँ जुड़ती चली गयी। सच कहूँ तो यह एक जुनून सा लगता है क्या आप इस जुनून शब्द का समर्थन करेंगे?

ललित कुमार: जी बिल्कुल। कविता कोश एक जुनून ही है। जैसे-जैसे इस परियोजना को निस्वार्थ जुनूनी स्वयंसेवक मिलते गए -- इसकी भावी परिकल्पना व स्वरूप अधिकाधिक वृहद होते चले गए। कविता कोश समाज की सम्पत्ति है और यह सभी के लिए खुला है। हमसे जुड़ें और अपना योगदान दें।

मृदुल कीर्ति: हिंदी दिवस, विश्व हिंदी सम्मेलन, हिंदी समितियाँ, संस्कृति विकास की अनेक विधाएँ और उपक्रम आदि जिस लक्ष्य के लिए बनी हैं उन सबके लक्ष्यों की पूर्ति इसी कविताकोश में पूरी होती सी दिखाई पड़ती है, क्या मेरी इस सोच के प्रत्युत्तर में आप कुछ कहना चाहेंगे?

ललित कुमार: इसके बारे में मैं क्या कहूँ... जो है वह सबके सामने है। साहित्य व भाषा के विकास के नाम पर तमाम किस्म के उपक्रम चलते रहे हैं लेकिन किस उपक्रम से क्या लाभ हुआ है यह मुझे बताने की आवश्यकता नहीं है। मैं बस इतना ही कहना चाहूँगा कि जब तक हम ठोस परिणामों की मांग नहीं करेंगे तब तक साहित्य व भाषा के नाम पर ये उपक्रम चंद लोगों को लाभान्वित करते हुए यूँ ही चलते रहेंगे।

मृदुल कीर्ति: इतने बड़े संकल्प निर्बाध हो जाएँ, ऐसा कम ही होता है। आपको जिन बाधाओं और समस्याओं का सामना करना पड़ा उनका सामना और समाधान कैसे किया? यह आपकी दृढ़ता और संकल्पित चित्त का परिचय होगा, जिसे जान पाने की जिज्ञासा है।

ललित कुमार: बाधाएँ तो बहुत आईं लेकिन यदि आप डटे रहें और समाज आपका साथ दे तो कोई न कोई समाधान निकल ही आता है। कविता कोश के पास साधनों की कमी हमेशा से रही है इसलिए हमने उपलब्ध साधनों के सर्वोत्तम प्रयोग की नीति अपनाई। साधनों की कमी के कारण कविता कोश परियोजना कभी भी खुल कर साँस नहीं ले पाई, पर हम स्वयंसेवक हैं... कम में ही गुज़र कर लेते हैं।

मृदुल कीर्ति: क्षमा मांगते हुए आपके दैहिक संवेदित बिंदु को छू रही हूँ और उस सराहनीय आत्म-बल के प्रति नमित हूँ जिसमें बलशाली भी आत्म-बल खो देते हैं किन्तु आप जैसे तो सृजन का बीज बो देते हैं। ऐसी आंतरिक ऊर्जा और प्रबल आत्म विश्वास का स्रोत क्या है? देह के प्रति हुए दैवीय विडंबनाओं से आत्म-बल और आत्म-विश्वास कैसे जीत गया? इस प्रेरक सत्य को कृपया विस्तार से उजागर करें जिससे ज्वलंत उदाहरण और सन्देश समाज को मिले।

ललित कुमार: मुझे चार वर्ष की आयु में पोलियो हो गया था और तब से ही मैं बैसाखियों के सहारे चल रहा हूँ। बकौल ग़ालिब, मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं... जब लगातार मुश्किलों से सामना होता है तो हमें मुश्किलों का हल खोजने की आदत ख़ुद ही हो जाती है। इस बारे में और अधिक जानकारी मेरे शीघ्र-प्रकाश्य संस्मरण में उपलब्ध होगी।

मृदुल कीर्ति: आपके जीवन, परिवार, परिवेश, जीवन में घटित घटना, शिक्षा, परिवेश, व्यवसाय, विदेश और नौकरी के विषय में भी जान पाने का कौतूहल है।

ललित कुमार: पोलियो के साथ जीवन विषय पर शीघ्र ही मेरा एक संस्मरण प्रकाशित होने वाला है -- उसमें यह सब जानकारी विस्तार से दी गई है। संक्षेप में कहूँ तो मैं दिल्ली के एक ग्रामीण इलाके में जन्मा और पला-बढ़ा साधारण इंसान हूँ। दैहिक, मानसिक, आर्थिक और सामाजिक समस्याओं से जूझते हुए मैंने एक ऐसा जीवन जीने की कोशिश की है जो किसी के काम आए।

मृदुल कीर्ति: कदाचित 2010 की बात है जब आपसे मेरा फ़ोन पर परिचय हुआ था, तब आप ब्रिटेन में थे फिर कुछ समय बाद आप कनाडा में थे। इतने ठंडे प्रदेशों में किस लक्ष्य को लेकर गए थे? लोग तो बुखार आने पर ही यात्रायें टाल देते हैं।

ललित कुमार: विदेश में मैं कुछ वर्ष पढ़ाई और कार्य के लिए रहा। विदेश प्रवास के दौरान मेरी कुछ दिक्कतें बढ़ गईं लेकिन सभी का कुछ न कुछ हल निकालते हुए मैंने अपनी पढ़ाई व कार्य पूरे कर लिए। 2009 में मैं भारत लौट आया।

मृदुल कीर्ति: कविताकोश में संलग्न करने के लिए लेखकों और रचनाओं की विषय-वस्तु के लिए क्या विशेष नियमावली है? आप किस आधार पर रचना और रचनाकार का चयन करते हैं?

ललित कुमार: कविता कोश में किसी रचनाकार के नाम को शामिल किए जाने के बारे में निर्णय कविता कोश टीम करती है और चयन का एकमात्र मापदंड साहित्य की गुणवत्ता है। किसी समय विशेष में जिस टीम को चयन का अधिकार दिया जाता है उसका निर्णय सभी को मान्य होता है। आजकल कविता कोश "आमंत्रण मोड" में है... इसका अर्थ यह कि हम आवेदन स्वीकार नहीं कर रहे हैं बल्कि हम स्वयं ही उन रचनाकारों को आमंत्रित करते हैं जिनकी रचनाएँ हमारी टीम कोश में संजोना चाहती है।

मृदुल कीर्ति: आज की बीमार मानसिकता में प्रतिस्पर्धा और स्वयं को ही उजागर करने की अंधी दौड़ है, लोग दूसरों को कुचल कर भी आगे जाने में संकोच नहीं करते। किन्तु आपने तो छोटे बड़े सभी रचनाकारों को उजागर किया है।  किसी की सत्ता और इयत्ता को स्वीकार कर उजागर करना बहुत ही स्वस्थ और ऊँची मानसिकता का प्रतीक है। इस विषय में आप क्या कहते हैं?

ललित कुमार: मैं हमेशा कहता हूँ कि कविता की गुणवत्ता एक सापेक्षिक चीज़ है। एक ही कविता के बारे में अलग-अलग लोग अलग-अलग राय रख सकते हैं। इसलिए यह ज़रूरी है कि हम तथाकथित "छोटे-बड़े" के फेर में न पड़ कर गुणवत्ता को ही आधार बनाए। भाषा व साहित्य के क्षेत्र में स्वार्थसिद्धि हेतु बहुत कुछ होता है... यदि हम भी वही सब करेंगे तो हम उनसे अलग और बेहतर कैसे हो पाएंगे?

मृदुल कीर्ति: कविता कोश आज प्रांतीय भाषायी सरहदें पार कर, भारत के सभी प्रांतों की रचनाओं का एक सुरभित गुलदस्ता सा लगने लगा है। अंतर्राज्यीय से यात्रा अंतर्राष्ट्रीय हो रही है, यह सब कैसे संभव किया?

ललित कुमार: कविता कोश सभी भाषाओं को अपने में समाहित कर रहा है। इस समय कोश में अंगिका, राजस्थानी, नेपाली, भोजपुरी, सिंधी, अवधी, मैथिली, गुजराती जैसी अनेक भारतीय भाषाओं के अलग व सम्पन्न विभाग मौजूद हैं। हमें जिस भी भाषा के लिए स्वयंसेवकों की टीम कार्य करने हेतु मिल जाती है -- हम उस भाषा में कार्य करना आरंभ कर देते हैं। मूल भाषा में साहित्य के अलावा कोश में भारतीय व विदेशी भाषाओं से अनूदित साहित्य का भी भंडार है।

मृदुल कीर्ति: कविता कोश साहित्य की एक विशेष विधा को ध्वनित करता है किन्तु आपके बहुमुखी और उदार दृष्टिकोण ने इसमें गद्य का समावेश कर गद्य कोश भी बना दिया। कविता कोश/ गद्य कोश-- गद्य और अनुवादों के समावेश के पीछे आपकी क्या सोच रही है?

ललित कुमार: कविता कोश भारतीय साहित्य का एक महासंकलन है जो धीरे-धीरे विस्तृत हुआ है। आरम्भ में केवल कविताओं को ही संजोने का इरादा था इसलिए मैंने इसका नाम "कविता कोश" रख दिया था। लेकिन नाम में आखिर क्या रखा है! समय के साथ कविता कोश में न केवल काव्य की अन्य विधाएँ बल्कि अनेक भाषाएँ और गद्य साहित्य का भी संकलन किया जाने लगा। आज कविता कोश में सवा लाख के लगभग पन्ने हैं और गद्य कोश में करीब बीस हज़ार पन्नों में फैला साहित्य संकलित है।

मृदुल कीर्ति: आपके इस संकल्प का एक विशेष प्रशंसनीय भाग है कि - आपने कवित्त की सभी विधाओं को स्थान दिया है जैसे, शाश्वत काव्य में शाश्वत ग्रंथों और उनके काव्यानुवादों, कालजयी कवियों की मूल रचनाएँ, भजन, लोकगीत, गजल, कवित्त आदि। इस तरह आप मानवीय संवेदनाओं के सभी पक्षों को पोषित करते हैं अतः इतनी औदार्यमयी सर्वांगीण संस्कारित भावनाओं के स्तोत्र क्या हैं?

ललित कुमार: कुछ तो मुझे ही सभी तरह की विधाओं का काव्य पसंद है --- एक वजह यह भी है कि आरम्भ के बाद कुछ महीनों में ही कविता कोश में विविध विधाओं का संकलन होने लगा था। फिर यह बात भी है कि कविता कोश समाज की धरोहर है -- सो, इसमें सबके लिए कुछ न कुछ होना चाहिए। कविता कोश व गद्य कोश शोधार्थियों द्वारा भी बहुत प्रयोग किए जाते हैं --- इसलिए इन परियोजनाओं की प्रकृति का समावेशी होना अति-आवश्यक हो जाता है।

मृदुल कीर्ति: जिन लोगों ने आपके इस निजी संकल्प में साथ दिया और 'समाज सेवी संस्था' का प्रारूप दिया उनके निःस्वार्थ सेवा, समय, आर्थिक सहयोग और प्रयत्न को उजागर होना ही चाहिए। उनके लिए मेरा भी कृतज्ञ भाव और आप इस संकल्प के विस्तार में उनकी कितनी भागीदारी मानते हैं?

ललित कुमार: कविता कोश आज इस वृहद रूप में समाज के योगदान के कारण ही उपस्थित है। भारत और विश्व के विभिन्न कोनों से अलग-अलग रूपों में सहयोग देने वाले स्वयंसेवक यदि न होते तो कविता कोश भी नहीं होता। इसलिए कविता कोश की सफलता का सारा श्रेय स्वयंसेवकों को ही जाता है। मैंने इस परियोजना को आरम्भ अवश्य किया था --- लेकिन जन्म देने वाले से पोषण करने वाले का स्थान सदैव ऊँचा होता है।

मृदुल कीर्ति: सफलता दूसरों से आंकलित होती है। लाखों पाठकों द्वारा कविताकोश को देखा जाना तो स्वयं ही इसका प्रमाण है किन्तु इसका दूसरा पक्ष भी है --- संतोष स्वयं से आंकलित होता है, कृपया बताएँ आप कितने संतुष्ट है?

ललित कुमार: इस परियोजना के वर्तमान स्वरूप से मैं संतुष्ट हूँ, प्रसन्न हूँ --- हालांकि अभी असीम काम बाकी है। हमें लगातार नए स्वयंसेवकों और संसाधनों की आवश्यकता पड़ती रहती है। इसलिए संतोष तो है लेकिन विश्राम नहीं है। अभी हम सबको मिलकर इस परियोजना को बहुत आगे ले जाना है।

मृदुल कीर्ति: जब आप केवल ललित थे और आज ... अच्छा वह 'कविताकोश वाले ललित' से जाने जाते हैं। दोनों में कुछ अंतर है क्या?

ललित कुमार: सच कहूँ तो मुझे "कविता कोश वाले ललित" के तौर पर पहचान अच्छी नहीं लगती। इसका कारण यह है कि कविता कोश बहुत से स्वयंसेवकों के योगदान से बना है --- सो इस परियोजना के साथ मेरा नाम जोड़ा जाना ठीक नहीं है। मैं "ललित" ही ठीक हूँ :-)

2 comments :

  1. प्रेरणादायक वार्ता

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  2. विदुषी डॉ. मृदुल कीर्ति जी ने अत्यंत सामयिक एवं सारगर्भित प्रश्न रखे हैं -
    जिनके उत्तर में कर्मठ व विविध आयामी प्रवृत्तियों में सजगता से कार्यरत
    श्री ललित भाई ने उचित बातों से हमें उनके कार्यों से अवगत करवाया है।
    अतः दोनों का सादर अभिवादन करते हुए इन सच्चे साहित्य साधकों को,
    मननशील रचनाकारों को हमारे नमन। जितनी प्रशंशा करें , कम है।
    सेतु पत्रिका के सम्पादक मंडल को शुभकामनाएं

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