स्वास्थ्य: घुटने का दर्द

डॉ. गोविंद माधव

डॉ. गोविंद माधव, एम. डी.


घुटनों के दर्द से हर घर में कोई न कोई पीड़ित होगा ही। उम्र में चालीस का आंकड़ा पार करते ही यह तकलीफ आपके मेडिकल रिकॉर्ड मे शामिल होने के लिए तैयार रहती है। और इससे सामना होते ही इन्सान को उठने बैठने, घरेलू कामकाज में और व्यावसाय में परेशानी होने लगती है। इस तकलीफ को गठिया भी कहते हैं।

‘गठिया’ शब्द के साथ एक बात समझना जरूरी है। दो हड्डियाँ जहाँ पर मिलती हैं उस स्थान को ‘जोड़’ या ‘गाँठ’ कहा जाता है। जोड़ों में होने वाली किसी भी समस्या को आम भाषा में ‘गठिया’ कहा जाता है। जॉइंट या जोड़ के लिए एक और शब्द है 'arthron' जिससे बनते हैं दो महत्वपूर्ण मेडिकल शब्द – ‘आर्थ्रोपैथी’ और ‘आर्थराइटिस’। जोड़ या गाँठ की किसी भी समस्या को आर्थ्रोपैथी यानी गठिया कहते हैं। पर जोड़ की समस्या यदि सूजन या इन्फ़्लेमेशन के साथ है तो ही इसे आर्थराइटिस कहते हैं। यानि आर्थराइटिस भी आर्थ्रोपैथी या गठिया का एक प्रकार है। दरअसल चिकित्सा विज्ञान की भाषा में बीमारी के नामकरण में सुविधा के लिए जिस अंग में इन्फ़्लेमेशन होता है उस अंग के नाम में ‘आइटिस’ प्रत्यय जोड़ दिया जाता है। जैसे नाक की सूजन रायनाइटिस, साइनस की साइनोसाइटिस और जोड़ों में हो तो आर्थराइटिस।

घुटने हमारे शरीर के सबसे महत्वपूर्ण जोड़ हैं, इनकी सहायता से समूचे शरीर का वजन पैरों पर पड़ता है, और इस प्रकार हम सीधे खड़े होकर चल पाते हैं। चौपाये जानवरों से दोपाए मनुष्य तक के सफर में इस जोड़ मे सबसे अधिक परिवर्तन हुए हैं। इसीलिए यह जोड़ सूक्ष्म चोट से भी बहुत प्रभावित हो जाता है। उम्र के साथ जमा होते जाते चोटों के अवशेष जब गठिया का रूप ले लेते हैं तब इन्हे ' ओस्टियो-आर्थराइटिस' कहा जाता है। इस बार हम घुटनों के ओस्टियो-आर्थराइटिस के बारे में बात करने वाले हैं।

ढलते उम्र की निशानी समझे जाने वाली इस बीमारी को लेकर काफी शोध हुए। शोधकर्ताओं को एक बात समझ नहीं आ रही थी कि अगर यह बुढ़ापा का एक लक्षण मात्र है तो फिर हर किसी को क्यों नहीं होता? किसी को कम उम्र में ही तो किसी को बहुत बाद में क्यों? किसी को हलकी फुलकी परेशानी तो किसी को इतनी असह्य पीड़ा कि चलना फिरना भी मुश्किल? किसी को मामूली दवाई से ही राहत तो किसी को ऑपरेशन की नौबत क्यों? इन सवालों के जवाब जानने के लिए हमें एक और मेडिकल टर्म को समझना होगा - ‘रिस्क फैक्टर’।

‘रिस्क फैक्टर’ यानि वे कारण जिनके मौजूद होने से किसी व्यक्ति में खास बीमारी के होने का खतरा बढ़ जाता है। ओस्टियो-आर्थराइटिस के मामले में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले रिस्क फैक्टर्स हैं - बढ़ा हुआ वजन, नित्य व्यायाम की कमी, मॉडर्न लाइफस्टाइल, धूम्रपान, खाने में पोषक तत्वों की कमी, किसी भी दुर्घटना से लगने वाली चोट, बेडौल जूते, असामान्य चाल और कुछ वैसे काम जिसमे घुटनों पर ज्यादा भार पड़ता है। इनमें से सबसे अधिक दुष्प्रभाव डालने वाला कारण है वजन। ऐसा हो ही नहीं सकता कि प्रौढावस्था को पार कर रहे या पार कर चुके, मोटापे के शिकार व्यक्ति को घुटने में परेशानी न हो। हालाँकि कभी-कभार छरहरे बदन के व्यक्ति में भी ओस्टियो-आर्थराइटिस हो सकता है तभी जब उस व्यक्ति में अन्य रिस्क फैक्टर्स भी मौजूद हों।

व्यायाम करने से हमारी मांसपेशियाँ (मसल्स) मजबूत होती हैं। रेगुलर ‘जिम’ जानेवाले लोग व्यायाम कर के अपनी मांसपेशियों को सुदृढ़ और सुडौल बनाते हैं। हर मांसपेशी के लिए अलग-अलग तरह के खास व्यायाम होते हैं। घुटनों के इर्द-गिर्द जो मांसपेशियाँ हैं उनके नाम हैं- क्वाड्रीसेप्स और हैमस्ट्रिंग्स। अगर ये मसल्स मजबूत हैं तो हमारे शरीर का बोझ आसानी से पैरों पर ट्रांसमिट हो जाता है। मगर इनके कमजोर रहने पर पूरा भार घुटनों से होते हुए पैरों पर ट्रान्सफर होता है। नतीजा धीरे धीरे घुटने की दो हड्डियाँ फीमर और टिबिया एक दूसरे के नजदीक आने लगते हैं। आइये पहले हम घुटनों के बनावट को समझें।

घुटने का जोड़ ‘फीमर’ और ‘टिबिया’ नाम की दो हड्डियों के मिलने से बनता है। साथ लगे चित्र में आप देखें कि ऊपर फीमर और नीचे टिबिया है। लेकिन दोनों हड्डियाँ एकदम से सटी हुई नहीं हैं। दोनों के बिच में गैप है, इसे ‘जॉइंट-स्पेस’ कहते हैं। इस स्पेस में एक खास तरह का लुब्रिकेंट भरा हुआ होता है जिसे ‘साइनोवियल-फ्लूइड’ कहते हैं। हड्डियाँ, मांसपेशियाँ और साइनोवियल द्रव- ये सब मिलकर किसी हाइड्रोलिक सिस्टम की तरह काम करते हैं। यानी शरीर का बोझ सीधे एक हड्डी से दूसरी हड्डी पर नहीं जाता बल्कि ऊपर वाली हड्डी से बीच में स्थित द्रव पर और तब नीचे वाली हड्डी पर पड़ता है। इस व्यवस्था से एक तो घर्षण कम होता है, दूसरा हड्डियों को पोषण भी मिलता रहता है और उनमें होने वाली मामूली टूट-फ़ूट की मरम्मत भी होती रहती है।

अब जरा सोचिये कि अगर किसी व्यक्ति का वजन बहुत बढ़ जाए तो घुटनों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? क्या सीमा से अधिक बोझ पड़ने पर भी यह हाइड्रोलिक सिस्टम ठीक से काम कर पायेगा? क्या दोनों हड्डियों के बीच का जॉइंट-स्पेस यथावत बना रहेगा या कम होता जायेगा? क्या हो अगर यह स्पेस काफी कम हो जाये जिससे ऊपर और नीचे की हड्डियाँ काफी नजदीक आ जाएँ और आपस में टकराने लगें? क्या तब भी घुटनों पर होनेवाली हरकत (मूवमेंट; घुटनों का मुड़ना या सीधा होना) स्मूथ बनी रहेगी या घर्षण के कारण बाधित या सीमित होने लगेगी? क्या धीरे धीरे जॉइंट्स स्पेस में मौजूद सिनोविअल द्रव कम नहीं होने लगेगा? क्या अब घर्षण के चलते हड्डियाँ आपस में रगड़ खा कर घिसने-टूटने नहीं लगेंगी?

शरीर में जहाँ कहीं भी टूट-फुट हो वहाँ हमारा इम्यून सिस्टम यानि रोग-प्रतिरोधी तंत्र एक्टिव हो जाता है और मरम्मत का काम चालू कर देता है। मगर यहाँ तो टूट-फूट की प्रक्रिया काफी लम्बी चलने वाली है या शायद अब कभी भी रुकने वाली ही नहीं है। ऐसे में मरम्मत प्रभावी नहीं होगी, उल्टे वहाँ सूजन को बढ़ावा देगी, क्योंकि मरम्मत का कार्य तो पहले मलबे को हटाने के बाद ही शुरू होता है न। मलबे को तोड़ने, उसे द्रवित कर के बहा ले जाने और मरम्मत के ‘कारीगर-कोशिकाओं’ को बुलाने की प्रक्रिया जब अनियंत्रित होने लगे तो इस स्थिति को ही इन्फ़्लेमेशन कहते हैं। इन्फ़्लेमेशन के पांच परिचायक होते हैं- दर्द, लालिमा, ताप, फूलना और कार्यक्षमता में गिरावट। शरीर में जहाँ कहीं भी इन्फ़्लेमेशन हो ये पाँचो विद्यमान होते हैं। अब आप समझ गए होंगे कि घुटनों के ओस्टियोआर्थराइटिस में घुटनों में दर्द, चलने फिरने में परेशानी, उतकों का फूलना और कभी-कभी हल्की लालिमा रहेगी।

नीचे के चित्र में ध्यान से देखें। बाएँ तरफ स्वस्थ और दाहिने में रुग्ण घुटने की तस्वीर है। साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि ओस्टियोआर्थराइटिस से ग्रसित घुटने में हड्डियों की सतह में विकृति आ गयी है, जॉइंट-स्पेस कम हो गया है, साइनोवियल द्रव कम हो गया है, अलाइनमेंट त्रुटिपूर्ण है। ठीक इसी स्थिति को संलग्न एक्सरे में भी देखा और समझा जा सकता है।


जिस प्रकार मोटापा घुटनों पर अधिक बोझ डालकर उसे हानि पहुँचता है, बाकी के रिस्क फैक्टर भी कमोबेश वैसे ही घुटनों को प्रभावित करते हैं। कमजोर मांसपेशियाँ शरीर के वजन को पैरों पर ठीक से ट्रांसमिट नहीं कर पाती हैं और न ही हड्डियों को सीधा रख पाती हैं, नतीजतन हर गतिविधि के साथ जोड़ के बनावट में थोड़ी-थोड़ी गड़बड़ी होने लगती है और एक समय के बाद यह आर्थराइटिस का रूप ले लेती है। अगर व्यक्ति की चाल त्रुटिपूर्ण हो, पोषक तत्वों की कमी या धूम्रपान के कारण हड्डियाँ कमजोर पड़ गयी हों या व्यक्ति का व्यवसाय ऐसा हो जिसमें लगातार घुटनों पर ज्यादा जोर पड़ता हो अथवा किसी दुर्घटना के कारण घुटने चोटिल हुए हों और उनके संरचना में गड़बड़ी रह गयी हो – ये सब मिलकर धीरे-धीरे आर्थराइटिस का रूप ले लेंगे। ऊँची हील वाले सैंडल भी घुटनों को कम नुकसान नहीं पहुँचाते।

अब तक आपने घुटनों की बनावट और सामान्य कार्यप्रणाली को समझा। घुटनों पर मोटापे के दुष्प्रभाव को भी आपने विस्तृत रूप से समझा और यह भी समझ लिया कि ओस्टियो-आर्थराइटिस से ग्रसित घुटने में क्या परिवर्तन आयेंगे और इनसे क्या परेशानी होगी।

किसी भी समस्या का सबसे सटीक निदान होता है - उस समस्या को पैदा होने से ही रोक देना। घुटनों के दर्द के बारे में भी यह सूत्र अपनाना ही सर्वोतम उपाय है। अगर अब तक लेख को आपने ध्यानपूर्वक पढ़ा है तो यह समझने में आपको कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए कि ओस्टियोआर्थराइटिस को पनपने से कैसे रोका जा सकता है – रिस्क फैक्टर्स को दूर करके! जी हाँ! शरीर के वजन को नियंत्रित करके, नियमित व्यायाम कर के, पोषक तत्वों से युक्त स्वस्थ-स्वच्छ-संतुलित भोजन करके और गलत आदतों से दूर रहकर घुटनों को जल्दी बूढ़ा और बीमार होने से बचाया जा सकता है। अगर आपके घुटने रोग से ग्रसित हो भी गए हों तो इन तरीकों के सहारे आप बीमारी को बढ़ने से रोक सकते है और कुछ हद तक वापस सामान्य हालत में पहुँचा सकते हैं। ध्यान रहे, मैंने कहा कुछ हद तक! अभी तक किसी भी चिकित्सा पद्धति में ऐसी किसी औषधि या उपचार का आविष्कार नहीं हुआ है जो बूढ़े को जवान बना दे। ठीक उसी तरह जल्दी बूढ़े हो गए ओस्टियोआर्थराइटिस से ग्रसित घुटनों को किसी भी तरीके से वापस जवान या एकदम स्वस्थ नहीं किया जा सकता है। अगर कोई चिकित्सक ऐसा दावा कर रहा है तो वह सिर्फ और सिर्फ आपको दिग्भ्रमित कर के पैसे ठग रहा है और अन्धविश्वास फैला रहा है।

मगर इस बात से अत्यधिक निराश होने की आवश्यकता नहीं है। मेरा उद्देश्य आपको भयभीत करना नहीं है, बल्कि सत्यापित वैज्ञानिक तथ्यों की सहायता से आपको जागरूक करना है। तो क्या ओस्टियोआर्थराइटिस से ग्रसित घुटनों का कोई उपचार नहीं है? उपचार है लेकिन  ‘क्योर’ यानि जड़ से ‘मुक्ति’ नहीं है। उपचार, बचाव और मुक्ति – इन शब्दों के बीच के अंतर को समझिये। बचाव के बारे में हम बात कर चुके हैं। अब आते हैं उपचार पर। दर्द में आराम और बीमारी को बढ़ने से रोकने के लिए कुछ उपाय उपलब्ध हैं, मगर इनका प्रयोग किसी हड्डी रोग या गठिया रोग विशेषज्ञ (ओर्थोपेडिक या र्युमाटोलोजिस्ट) के समुचित सलाह पर ही करें। सेल्फ मेडिकेशन से आपको फायदे की बजाय गंभीर नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। यह बात व्यायाम और मालिश के लिए भी लागू है। इसीलिए व्यायाम किसी फिजियोथेरेपिस्ट की देखरेख में सही तकनीक को समझने के बाद ही करें।

दर्द और सूजन को कम करने के लिए कुछ दवाइयाँ आती हैं, मगर लम्बे समय तक इनके सेवन से किडनी, लिवर आदि अंगों को नुकसान पहुँचने का खतरा रहता है। वृद्ध व्यक्तियों में तो यह खतरा और भी बढ़ जाता है। हालाँकि दर्द निवारक तेल, स्प्रे, लोशन या मरहम से ऐसा खतरा कम होता है। कुछ विटामिन्स और पोषक तत्व आपकी मांसपेशियों और हड्डियों को मजबूत बनाने में मददगार हो सकते हैं। ‘नीकैप’ की मदद से घुटनों पर पड़ने वाले बोझ को कम किया जा सकता है। पर रोग के कारण विकृत हो चुके घुटनों को सर्जरी की भी आवश्यकता पड़ सकती है। शुरूआती अवस्था में दूरबीन से होने वाली छोटी प्रक्रिया (अर्थ्रोस्कोपी) से भी काम चल सकता है। पर गंभीरतम परिस्थिति में घुटने के प्रत्यारोपण (नी ट्रांसप्लांट) की आवश्यकता पड़ सकती है जिसमे कृत्रिम घुटने (प्रोस्थेटिक नी) लगाये जाते हैं।

अंत में एक बात याद रखें - शरीर का वजन नियंत्रित रखना घुटनों के ओस्टियोआर्थराइटिस से बचाव और उपचार दोनों के लिए ही सबसे सार्थक उपाय है। और इसके लिए किसी विशेष चिकित्सकीय सलाह की आवश्यकता नहीं है।
सम्पादकीय नोट: रांची, झारखण्ड निवासी डॉ. गोविंद माधव, एमबीबीएस, एमडी (मेडिसिन) द्वारा आरम्भ किया गया यह नया स्तम्भ सेतु के पाठकों को स्वास्थ्य, सुरक्षा सम्बन्धी जानकारी देने के उद्देश्य से सेतु के आगामी अंकों का स्थायी अंग होगा। शिक्षा और व्यवसाय से चिकित्सक डॉ. माधव साहित्यकार भी हैं।

1 comment :

  1. Seems very useful. Thanks sir.

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।