समीक्षा: बाजीराव बल्लाळ एक अद्वितीय योद्धा

समीक्षक: अभय अरविंद बेडेकर

पुस्तक: बाजीराव बल्लाळ - एक अद्वितीय योद्धा

लेखिका: अनघा जोगळेकर
प्रकाशक: नोशन प्रेस, चेन्नई
मूल्य: ₹ 249/- रुपये
पृष्ठ: 164, पेपरबैक
ISBN: 978-1945825774


      इस पुस्तक की समीक्षा लिखने के पहले मैं इसके मुख्य पात्र 'पेशवा बाजीराव' पर अपने विचार रखना चाहता हूँ।
          गोरा रंग, तेज नाक नक्श, बड़ी-बड़ी निर्भीक आँखे, कान में कुंडल, गले में श्वेत मोतियों की माला, 6 फ़ीट ऊँचा कद, चौड़ा सीना, 19 वर्ष की कोमल आयु लेकिन ऊँचे भाल पर लगा तिलक और चेहरे पर दृढ़ता लिए, मराठा साम्राज्य के छत्रपति शाहू महाराज के सामने खड़े नवयुवक ही थे बाजीराव बल्लाळ ।
       अपने पिता के चिता की राख मुट्ठी में पकडे, पिता से विरासत में मिली वीरता और शौर्य को माथे पर धारण किये, अपने पिता की अकाल मृत्यु के कारण, उनके मराठा साम्राज्य के प्रति अधूरे दायित्व का निर्वाह करने और शिवाजी महाराज के पूर्ण स्वराज्य के सपने को पूरा करने, शाहू महाराज के दरबार में निडरता की मूर्ति बने खड़े नवयुवक ही थे बाजीराव बल्लाळ।
        मात्र 19 वर्ष की आयु में पेशवा के दायित्वपूर्ण पद को ग्रहण करने की क्षमता रखने वाले नवयुवक, वो भी उस समय जब मुग़ल लगभग आधे से ज्यादा भारत को अपने शिकंजे में कस चुके थे, ऐसे मुग़लों को परास्त करने और भारत को एक सूत्र में बांधने की शपथ लेने वाले नवयुवक ही थे बाजीराव बल्लाळ।
         न तो मात्र नाम, न ही मात्र व्यक्ति बल्कि मराठाओं की वीरता और शौर्यगाथा का प्रतीक ही थे बाजीराव बल्लाळ।
          जिस समय मराठा साम्राज्‍य मुगलों के सामने कमजोर पड गया था उस समय अटक से कटक तक साम्राज्‍य विस्‍तार के मंत्र को आगे बढ़ाने हेतु प्रतिबद्ध थे बाजीराव बल्‍लाळ।
अनघा जोगळेकर
           ‘छत्रपति’ से अधिक शक्ति एकत्र करने के बाद भी छत्रपति के समक्ष जाकर सातारा में सर झुकाने वाले अद्वितीय स्‍वामिभक्‍त थे बाजीराव बल्‍लाळ।
          मुगल शासन में दिल्‍ली को 3 दिन तक अपने नियंत्रण में रखने वाले और लाल किले को अपनी गिरफ्त में रखने वाले विकट वीर थे बाजीराव बल्‍लाळ।
           6 वर्ष की आयु से जिन्होंने रणभूमि को ही अपना घर और हथियारों को ही अपना सखा माना, जिन्होंने अपने 20 वर्षों के कार्यकाल में 40 लड़ाइयाँ लड़ीं और आजिंक्य योद्धा कहलाए, जिन्होंने अपना पूरा जीवन भारत वर्ष के नाम लिख दिया, जिनकी युधनीतियां आज भी सेना के जवानों को सिखाई जाती हैं, जिनकी युद्धनीति द्वितीय विश्व युद्ध में अपनाई गई, जिन्होंने हैदराबाद के निज़ाम के मुँह का पानी सुखा दिया, जिन्होंने बंगश जैसे क्रूर आक्रमणकारी को हराकर संधि करने पर मजबूर कर दिया, जिन्होंने दिल्ली के तत्कालीन बादशाह को लालकिले में छुपने को बाध्य कर दिया, जिन्होंने मात्र प्रान्त जीते ही नहीं बल्कि उन्हें पुनः बसाने के लिए उचित सरदारों को नियुक्त किया।

अभय अरविंद बेडेकर
        ऐसे वीर की शौर्यगाथा ही है यह पुस्तक, "बाजीराव बल्लाळ एक अद्वितीय योद्धा"
          इस पुस्तक में जहाँ लेखिका अनघा ने पेशवा बाजीराव द्वारा लड़े गए युद्धों का विस्तृत वर्णन किया है वहीं उनके जीवन के नाजुक लम्हों को भी पूर्णता दी है। गद्य के साथ ही पद्य और अपने द्वारा बनाए गए रेखाचित्रों का सम्मिश्रण इस पुस्तक की विशेषता है।
           इतिहास के पन्नो में गुम हो चुके वीरों को अपनी कलम से पुनः एक बार जीवित करना ही अनघा का उद्देश्य है और वे अपने उद्देश्य में सफल होती प्रतीत होती हैं।
           एमेजॉन पर उपलब्ध इस पुस्तक का प्रिंट और मुखपृष्ठ भी आकर्षक है। यह पुस्तक निश्चित ही पठनीय व संग्रहणीय है।
          यहाँ मैं यह अवश्य कहना चाहूँगा कि जहाँ इस पुस्तक में मात्र 5 प्रमुख युद्धों को समाहित किया गया है वहीं इसके आने वाले संस्करणों में पाठकों को और भी युद्धों के बारे में जानने को मिले ऐसी आशा करता हूँ।
           मैं अनघा जी को उनकी इस पुस्तक के लिए बधाई और उनकी आने वाली पुस्तकों के लिए शुभकामनाएँ देता हूँ।

समीक्षक परिचय: डॉ. अभय अरविंद बेडेकर, अपर कलेक्टर (प्रशासन अकादमी, मध्य प्रदेश शासन), भोपाल में विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं। अर्थशास्त्र सम्बंधित दो पुस्तकों के अतिरिक्त उनकी शायरी, तथा लघुकथाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं।

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