विमर्श: प्रेमचंद मुंशी क्यों?

- अनुराग शर्मा


आलेख का शीर्षक देखकर चौंकिये मत। उसे पढ़ते ही आपको लगा होगा कि यह तो कोई सवाल नहीं हुआ। इसी तर्ज़ पर कल को लोग पूछने लगेंगे कि नेहरू पण्डित क्यों, चरण सिंह चौधरी क्यों, लाजपत राय लाला क्यों, या फिर जमनादास, बालमुकुंद गुप्त, दयानारायण निगम, या नवलकिशोर मुंशी ही क्यों, आदि आदि। यह सच है कि शीर्षक बेतुका है। विश्वास कीजिये कि आपकी तरह ही हम भी इस प्रश्न को अटपटा ही मानते हैं कि प्रेमचंद के नाम से पहले मुंशी क्यों लगा।

मुंशी प्रेमचंद स्मारक, लमही
लेकिन फ़ेक न्यूज़, नकली-शोध, और कट-पेस्ट-फ़ॉरवर्ड के आधुनिक युग में अफ़वाहों की समाप्ति के पावन उद्देश्य के लिये भी कई बार अटपटे प्रश्नों को संज्ञान में लेना आवश्यक हो जाता है। अन्यथा नये लोग बार-बार पुरानी अफ़वाहों को नया शोधकार्य बताकर जनसामान्य का मनोरञ्जन करते रहते हैं। बात मनोरञ्जन तक ही रुक जाये तो कोई हानि नहीं है, लेकिन दुर्भाग्य से हिंदी पाठकों का एक बड़ा वर्ग ऐसी बातों को किसी अनूठे रहस्य का उद्घाटन समझकर उसे आगे फैलाने में जुट जाता है। जिससे एक असत्य की स्थापना को बल मिलता है, जिसे रोकना हम सब का कर्तव्य है। अफ़वाहों का शोर होता है, जबकि शांति की कोई आवाज़ नहीं होती इसलिये अफ़वाहें तीव्रगति से फैलती हैं। अच्छा यही है कि दूसरा पक्ष सामने रख दिया जाये। कोई उसे पढ़ना या समझना चाहे या नहीं यह उसकी इच्छा।

मुंशी प्रेमचंद सपत्नीक (ज़माना से)
प्रेमचंद के नाम में मुंशी जुड़ने को एक आश्चर्यजनक घटना बताने वाले कई लेख देखने में आये हैं। अद्भुत निष्कर्षों वाले ऐसे लेख सामान्यतः निम्न मान्यताओं पर आधारित हैं कि -
1. प्रेमचंद के नाम में मुंशी जुड़ना एक चमत्कार है।
2. हंस पत्रिका के मुखपृष्ठ पर कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी और प्रेमचंद के नाम 'मुंशी, प्रेमचंद' या 'मुंशी प्रेमचंद' जैसे लिखे जाते थे जिसके कारण हंस पत्रिका, और हिंदी साहित्य के विद्वान पाठक उन्हें दो व्यक्ति न मानकर मुंशी प्रेमचंद नामक एक ही व्यक्ति मानने लगे।
3. दो लोगों का नाम एक हो जाने के इस चमत्कार ने किसी कारणवश दोनों सम्पादकों में से एक (प्रेमचंद) को ही प्रभावित किया, दूसरे (क. मा. मुंशी) इससे अछूते रहे।
4. स्पष्ट है कि सारे पाठक तो दो सम्पादकों को एक व्यक्ति समझने के इस भ्रम में नहीं ही पड़े होंगे। परंतु कुछेक पाठकों का यह अज्ञान किसी जादू की तरह प्रकाशकों तथा प्रेमचंद के परिचितों के सिर चढ़ गया और उन सबने अचानक ही प्रेमचंद के नाम से पहले मुंशी ऐसी ज़बर्दस्ती से जोड़ा कि वह उनका नाम ही बन गया। 

विषय की गहराई में जाने से पहले आइये ऐसे आलेखों के कुछ उदाहरणों पर दृष्टिपात करें। नीचे दिये चित्रों पर क्लिक करके उनका बड़ा रूप देखा जा सकता है। वैसे तो ये सभी आलेख पब्लिक हैं, तो भी लेखकों की निजता के सम्मान में इन चित्रों में उनके नाम अस्पष्ट कर दिये गये हैं, या हटा दिये गये हैं।

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ऐसे कुछ आलेखों में कुछ तथ्यात्मक त्रुटियाँ भी हैं, जैसे कि एक आलेख में कहा गया था कि 'हंस' पत्रिका अपने शुरुआती दौर के दो-तीन वर्ष तक 'प्रेमचंद' एवं 'कन्हैयालाल माणिक लाल मुंशी' के सह संपादन मे निकलती थी। जबकि सत्य यह है कि कन्हैयालाल मुंशी हंस से अक्टूबर 1935 में जुड़े थे। उससे पहले हंस पर स्पष्ट शब्दों में 'सम्पादक - प्रेमचंद' लिखा होता था।

सच यह है कि हंस के आरम्भ में कन्हैयालाल माणेकलाल मुंशी का पत्रिका से कोई सम्बंध नहीं था। हंस का सम्पादक पूर्णरूप से प्रेमचंद के हाथ में था। कन्हैयालाल मुंशी पत्रिका से 1935 में जुड़े थे, और 1936 में पत्रिका बंद हो गई थी। इसलिये उनका नाम हंस में होना एक अत्यल्पकालीन घटना थी। प्रेमचंद के जीवन के अंतिम वर्ष के कुछ महीनों का यह समय हिंदी और उर्दू के उनके  लम्बे और सुदृढ़ साहित्यिक जीवन में नगण्य था

यद्यपि हंस में प्रेमचंद के नाम से पहले 'मुंशी' शब्द का प्रयोग नहीं होता था। लेकिन प्रेमचंद केवल हंस से ही जुड़े नहीं थे। ज़माना, माधुरी, और सरस्वती सहित वे लगभग सभी साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रहे थे। आश्चर्य नहीं कि लमही में उनके स्मारक पर बड़े-बड़े अक्षरों में मुंशी प्रेमचंद स्मारक, लमही ही लिखा है (चित्र देखें)।

यह असत्य है कि हंस के संयुक्त सम्पादकत्व वाले अंकों में कन्हैयालाल मुंशी और प्रेमचंद का नाम मिलाकर 'मुंशी प्रेमचंद' या 'मुंशी, प्रेमचंद' लिख दिया जाता था। उस समय की साहित्यिक पत्रिका के लिये ऐसी कोई मजबूरी नहीं समझ आती है कि मुखपृष्ठ पर दो सम्पादकों के नाम तो लिखे जायें, लेकिन इतने अस्पष्ट कि पाठक कुछ का कुछ समझ लें। थोड़ा प्रयास करने पर मुझे हंस के एक ऐसे अंक के मुखपृष्ठ का चित्र इंटरनैट पर मिला है जिसमें दोनों सम्पादकों के नाम लिखे हैं, और वह एक पंक्ति में मुंशी प्रेमचंद जैसा न होकर दो अलग-अलग पंक्तियों में लिखे हैं जिसमें कन्हैयालाल माणेकलाल मुंशी का नाम स्पष्ट रूप से कन्हैयालाल मुनशी लिखा है, और प्रेमचंद का नाम उनसे एक पंक्ति पहले लिखा है। सम्पादकों के नाम जैसे लिखे हैं, उससे स्पष्ट है कि सबसे भोले पाठक को भी दोनों नामों को एक समझने की भूल करने की कोई गुंजाइश नहीं है।

सम्पादक
प्रेमचंद
कन्हैयालाल मुनशी

तो जब हंस पर प्रेमचंद का नाम मुंशी नहीं लिखा है तो फिर वे मुंशी प्रेमचंद कैसे बने? मुंशी शब्द सम्मान सूचक है। यह बात सही है कि वे अध्यापक थे और यह भी सच है कि कई क्षेत्रों में कायस्थों को शिक्षा और लिखाई-पढ़ाई से सम्बंधित कार्यों के कारण आदरवश मुंशी कहा जाता रहा है।

मुंशी प्रेमचंद का अंतिम चित्र (ज़माना से)
लेकिन सच यह भी है कि प्रेमचंद, हंस के आरम्भ से कहीं पहले से मुंशी पुकारे जाते थे। हिंदी के पाठकों के लिये यह जानना बहुत महत्त्वपूर्ण है कि वे प्रेमचंद बाद में बने लेकिन मुंशी पहले से थे। आइये देखें कि इस सम्बंध में साक्ष्य क्या कहते हैं।
आखिरी तोहफ़ा (1939) पुस्तक पर लेखक का नाम मुन्शी प्रेमचंद छपा है 

हिंदी के अधिकांश पाठक जानते हैं कि मुन्शी प्रेमचंद का वास्तविक नाम धनपतराय था। अनेक पाठक यह भी जानते हैं कि उन्होंने हिंदी के अतिरिक्त उर्दू में भी साहित्य-सृजन किया है। लेकिन बहुत से पाठक यह नहीं जानते कि उन्होंने लेखन का आरम्भ हिंदी में नहीं, बल्कि उर्दू में किया था जहाँ उनका छद्मनाम नवाब राय था। जैसा कि 1912 की पुस्तक के निम्न चित्र से स्पष्ट है। इन पुस्तकों में उनका नाम मुंशी नवाब राय छपा है। ज्ञातव्य है कि इस समय तक न तो प्रेमचंद हिंदी में लिखते थे, और न ही उनका प्रेमचंद छद्मनाम अस्तित्व में आया था। मुंशी नवाब राय की अनेक उर्दू रचनाएँ बाद में हिंदी में प्रेमचंद के नाम से भी प्रकाशित हुईं। बाद की हिंदी और उर्दू पुस्तकों में से कुछ में नाम से पहले मुंशी लगा है कुछ में नहीं। हंस में उनके हस्ताक्षर 'प्रेमचंद' ही होते थे लेकिन यह अंतर ठीक वैसा ही है जैसे जवाहरलाल नेहरू के हस्ताक्षरों में पण्डित न लिखा होना, कहलाते वे पण्डित नेहरू ही थे।
जलवा ए इसर (1912) - मुंशी नवाब राय 
मूल नाम: धनपत राय
उर्दू लेखन में छद्मनाम: मुंशी नवाबराय
हिंदी लेखन में छद्मनाम: प्रेमचंद, तथा मुंशी प्रेमचंद

चौगान ए हस्ती (1935) - मुंशी प्रेमचंद

ग़बन (1939) - मुंशी प्रेमचंद
इस आलेख में उर्दू शीर्षकों के साथ छपे दोनों चित्र 1936 में मुंशी प्रेमचंद के देहावसान के बाद निकले ज़माना पत्रिका के श्रद्धाञ्जलि अंक से लिये गये हैं। फटे जूते वाला चित्र सोशल मीडिया पर चर्चित रहा है। इन चित्रों में भी उनका नाम मुंशी प्रेमचंद ही लिखा है, अलबत्ता है उर्दू में।  मुंशी नवाब राय की पाँच कहानियों के उर्दू संग्रह 'सोज़े वतन' में भारत के तत्कालीन ब्रिटिश शासकों को राजद्रोह सा दिखाई दिया। लगभग वही समय था जब मुंशी नवाबराय का रूपांतरण मुंशी प्रेमचंद में हुआ था।
1912 में प्रकाशित जलवा ए इसर के बाद के संस्करण में
मुंशी नवाब राय के स्थान पर मुंशी प्रेमचंद आ गया
क्योंकि तब तक मुंशी जी का नया नाम प्रेमचंद प्रसिद्ध हो चुका था। 
सत्य यही है कि धनपतराय मुंशी प्रेमचंद बनने से बहुत पहले ही मुंशी नवाबराय के नाम से प्रसिद्ध हो चुके थे और हंस पत्रिका का इस पूरे प्रकरण से कोई सम्बंध नहीं है। आशा है कि यह आलेख मुंशी प्रेमचंद के नाम के विषय में फैली धुंध हटाने में सफल हुआ होगा और सम्पूर्ण स्थिति आपके सामने स्पष्ट हो गई होगी।
(सभी अधिकारों का आदर करते हुये, लेखक और सम्पादक की ओर से, अंतर्जाल से लिये गये सभी चित्रों के लिये उनके मूल अपलोडकर्ताओं का हार्दिक आभार)

2 comments :

  1. बेहतरीन आलेख

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  2. आप का लेख बडा रोचक और प्रामाणिक जानकारियों से सम्पन्न है । हंस के सम्पादन से कन्हैया लाल माणिक लाल मुन्शी का जुडना ज्यादा विख्यात नहीं है , पर इस बात की जानकारी नयी और रोचक है । मेरी बधाई लें ।

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