सङ्गीतोपयोगी स्वर-वर्णों की सार्थकता

वागीशा शर्मा
(vsipdlin@gmail.com) इन्द्रप्रस्थ महाविद्यालय, दिल्ली

सम्बंधित शोध आलेख: सङ्गीतोपयोगी स्वर - एक अन्य दृष्टिकोण

सारांश
सर्वविदित ही है कि सङ्गीतोपयोगी सात स्वर हैं - सा, रे,,,,, नि। अपने शोधपत्र [5] में लेखिका ने सङ्गीत में प्रयुक्त वर्णों को व्यञ्जन होते हुए भी स्वर नाम देने के विषय पर चर्चा करने का दुस्साहस किया था। प्रस्तुत शोधपत्र इसी विषय-वस्तु को आगे बढ़ाते हुये जहाँ स्वरों की महत्ता को और सशक्त करता है वहीं सङ्गीतोपयोगी स्वरों के लिए प्रयुक्त व्यञ्जनों के चयन की सार्थकता को भी प्रामाणिकता से प्रतिपादित करने को प्रतिबद्ध है। मातृकाओं यानि वर्णों के उद्गम से चर्चा का प्रारम्भ करके शरीर के अवयवों का विभिन्न वर्णों से सम्बन्ध स्थापित करते हुए चयनित वर्णों की सार्थकता पर विचार रखना इस शोधपत्र की संक्षिप्त रूपरेखा समझी जा सकती है।  

शब्द-सूत्र – षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत, निषाद, स्वर, वर्ण, शिव-शक्ति, तन्त्र, त्रिक्-दर्शन

वर्णों का उद्गम
शब्द अन्तःस्थल में अनाहत नाद के रूप में उपस्थित है। अभिघात के फलस्वरूप यही अनाहत नाद कृत्रिम-स्वरूप यानि वैखरी में परिवर्तित हो जाता है जो कि लोकव्यवहार में विचार-विनिमय का एक सशक्त माध्यम है [5]। यहाँ स्वाभाविक प्रश्न है कि यह अन्तः-स्थल क्या है? एक-समान अर्थात् एक ही प्रकार की प्राण-वायु, जो श्वास-प्रश्वास का ही रूप है, के अभिघात से अनेकों मनोनुकूल तथा विचारानुकूल शब्द कैसे बन जाते हैं? माहेश्वर सूत्रों में निबद्ध ये वर्ण अन्तःस्थल स्थित शब्द से कैसे सम्बन्धित हैं? आदि-आदि। ज्ञानी जनों के लिए इन प्रश्नों का कोई औचित्य नहीं परन्तु एक सामान्य बुद्धि के लिए यह अनूठा रहस्य हो सकता है।

श्वास-प्रश्वास शरीर का नियम है। फलतः शरीर में प्राण-वायु का वहन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। प्राण-वायु का शरीर से प्रस्थान, अङ्गों-प्रत्यङ्गों का यथावत् उपस्थित रहने के बावजूद भी शरीर को निर्जीव मिट्टी का लौंदा बना कर रख देता है। यह प्राणवायु-वहन मानव-शरीर में अनेकों वाहिकाओं के रूप में होता है। ये वाहिकाएँ मानव शरीर में एक अत्यन्त जटिल तन्त्र बना कर रख देती हैं। यह तन्त्र सूक्ष्म-शरीर का अंश होने से अनुभव-जन्य तो है परन्तु आधुनिक विज्ञान के लिए लगभग अदृश्य ही है। आयुर्वेद में यह तन्त्र नाड़ी-तन्त्र के नाम से जाना जाता है। आधुनिक विज्ञान इसकी जटिलता को समझने के लिए जी-जान से शोध-संलग्न है परन्तु अभी तक अणु-मात्र ही सफल हो पाया है। ये वाहिकाएँ स्थूल रूप से बनी नाड़ियाँ नहीं हैं अपितु प्राण-वायु के गतिमान होने से उत्पन्न तरङ्ग-प्रवाह हैं। ये वाहिकाएँ शरीर में सर्वत्र यानि सभी दिशाओं में, सभी अङ्गों-प्रत्यङ्गों में फैल कर शरीर को ऊर्जावान् बनाती हैं। इस सर्व-दिशा गमन के परिणामस्वरूप कभी ये एक दूसरे को काटती हुई सी दीखती हैं तो कभी मिलकर एक होती हुई, कभी एक दूसरे का सानिध्य लिए साथ-साथ प्रवाहित होती रहती हैं तो कभी मिलकर अस्तित्व ही खो देती हैं, आदि-आदि। अलग-अलग अनुभवों और कल्पनाओं ने अनेकानेक चित्र खींचने के प्रयास किए हैं जो अन्तर्जाल की दुनिया में सुगमता से उपलब्ध हैं। आयुर्वेद में ऐसी दो प्राण-वायु-वाहिकाओं के मिलन के स्थान को सन्धि-स्थान, तीन के मिलन को मर्म-स्थान तथा तीन से अधिक के मिलन को चक्र-स्थान कहा गया है। प्राण-वायु-तरङ्गों के इस मिलन, टकराव, सानिध्य और बिखराव आदि के कारण विशिष्ट प्रकार की आकृतियाँ बनती-बिगड़ती रहती हैं और अनेकों ध्वनियाँ भी उत्पन्न होती हैं जो ध्वनि-विज्ञान के अनुसार स्वाभाविक प्रक्रिया है। इन आकृतियों को दल या पद्म का नाम दिया गया है और ये अभिघात-प्रणीत ध्वनियाँ ही वर्णों की कारक हैं। इन नाड़ी-गुल्मों से ही अनेकों यौगिक-चक्रों का निर्माण होता है। इन चक्रों में से सुषुम्ना नाड़ी सम्बन्धित सात चक्र - मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्रार चक्र विशेष हैं और वर्णों से इनका सम्बन्ध भी अतिविशिष्ट है।

कुण्डलिनी शक्ति तथा वर्ण
आद्य-ग्रन्थों के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और शिव स्वयम्भू हैं अर्थात् उनकी उत्पत्ति स्वयं से ही है जबकि अन्य सभी देवी-देवता इस त्रिमूर्ति के कारण ही अस्तित्व में आए हैं। सृष्टि की परिकल्पना के समय ब्रह्मा ने सङ्कल्प लिया एकोsहं बहु स्याम् – मैं अकेला हूँ बहुत हो जाऊँ। अपनी इसी सङ्कल्प शक्ति के कारण इस विचित्र विश्व की रचना करके उसमें पुरुष और प्रकृति के रूप में ब्रह्मा ने ही प्रवेश कर लिया – तत् सृष्ट्वा तदनु प्राविशत् [9]। यहाँ पुरुष से तात्पर्य लिङ्ग-भेद सम्बन्धी पुरुष से नहीं है अपितु पुरिशेते अर्थात जो काया रूपी बन्धन में कञ्चुकों (आवरणों) में विवश पड़ा है, वह पुरुष है [2]। प्रकृति, माया अर्थात् शक्ति की द्योतक है। ये पुरुष और प्रकृति वास्तव में शिव और शक्ति के ही प्रतीक हैं। ब्रह्मा भी शिव का ही अन्य रूप है। इसीलिए मनुष्य-देह भी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के रूप में शिव-शक्ति की ही प्रतिच्छाया मानी जाती है। भगवान् परमशिव स्वयं संसाररूपी क्रीड़ा करने के लिए अपनी समस्त शक्तियों को सङ्कुचित करके मनुष्य-देह का आश्रयण करते हैं। इस शक्ति-सङ्कुचन से विह्वल तथा सांसारिक बन्धनों से सन्तप्त जीवात्मा परमतत्व परमात्मा में लीन होने के लिए प्रयत्नशील रहता है। प्राणी का अपने अनुरूप ही एक नए जीव को जन्म दे पाना इस ईश्वरीय शक्ति का ही प्रमाण है। मानव-शरीर में यह सृजकता मूलाधार में कुण्डलिनी के रूप में स्थापित की गई है। यही सृजन-शक्ति सुषुम्ना नाड़ी में प्रवाहित प्राण-ऊर्जा के रूप में सहस्रार में निवसित परम-ब्रहम/ परमशिव/ प्रणव/ ॐकार/ नादब्रहम/ शब्दब्रह्म/ इत्यादि से मिलकर जीवात्मा को आत्मबोध कराती है। यही वर्णों के उद्गम की भी कारक है।  
       “कुण्डलिनी की गति ऊर्ध्वोन्मुखी होती है, जो श्वास-प्रश्वास, प्राण-अपान को गति प्रदान करती है। ...     मध्यनाड़ी में स्थित बिना क्रम के स्वाभाविक रूप से उच्चरित होने वाली यह प्राण-शक्ति ही अनच्क कला कहलाती है।... जिस प्राण-वायु का अपान अनुवर्तन करता है उसकी गति हकार की लिखावट की ही तरह टेढ़ी-मेढ़ी होती है। .... प्राणशक्ति का एक लपेटा वामनाड़ी इड़ा में तथा दूसरा लपेटा दक्षिण      नाड़ी पिङ्गला में रहता है” [10]।
यहाँ अनच्क से तात्पर्य है ककार, हकार इत्यादि का बिना स्वर के उच्चारण करना यानि क्, ह्, प् इत्यादि का उच्चारण। यही अनच्क शिव-रूपी कार का सानिध्य पाकर क,, प इत्यादि वर्णों का रूप लेते हैं [5]। मध्य नाड़ी सुषुम्ना है। यहाँ वर्णित दक्षिण-नाड़ी पिङ्गला है जो वाम नासिका में मिलती है। वाम-नाड़ी इड़ा है जो दक्षिण नासिका में श्वास-प्रश्वास को गति देती है। इस व्यवस्था के परिणामस्वरूप ये नाड़ियाँ कुछ-कुछ की आकृति बना लेती हैं। इसी मूलार्ण से वैदिक तथा तान्त्रिक मन्त्र और इन मन्त्रों के प्रयोग की विधियाँ निष्पन्न होती हैं। इसी पराशक्ति कुण्डलिनी को हृल्लेखा या परावाक् भी कहा जाता है। यह पराशक्ति कुण्डलिनी सुषुम्ना (मध्य-नाड़ी) के भीतर ही तीन, चार, पाँच, छह, सात, आठ, दस, बारह तथा पचास दलों वाले पद्मों का या चक्रादि के रूप में अपना विस्तार करती है [3]। यही प्राण-ऊर्जा रूपी कुण्डलिनी शक्ति जीवात्मा का चैतन्य (consciousness) है। यही चैतन्य शरीर में ओज अर्थात ऊर्जा का सञ्चार करता है। इसी ओज के सौजन्य से शरीर की समस्त मानसिक तथा भौतिक प्रक्रियाएँ क्रियमाण हैं।

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् [1], प्रपञ्चसार तन्त्रम् ([3],[4]), रुद्रयामल तन्त्रम् [10], परात्रीशिका [18], विज्ञान-भैरव [22], इत्यादि ग्रन्थ इन्हीं प्राण-ऊर्जा जनित वर्णों को ही पञ्च महाभूतों, छत्तीस शैव-तत्वों, साङ्ख्य के पच्चीस तत्वों, छः ऋतुओं, सत्ताईस नक्षत्रों, सोलह चन्दकलाओं, बारह सूर्यादित्यों, बारह राशियों, बारह मास, कृष्ण-शुक्ल पक्ष भेद, वैयाकरणिक सिद्धान्तों जैसे प्रथम, मध्यम और उत्तम पुरुष, पुल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग; ज्योतिष सिद्धान्तों जैसे नाड़ी-दोष, ग्रह-नक्षत्रों के प्रभाव, नामाक्षर, नवांश, जन्म-कुण्डली इत्यादि सभी सृष्ट्यात्मक कार्यकलापों का कारक मानते हैं। यही परावाक् वाणी के अन्य तीनों रूपों पश्यंती, मध्यमा और वैखरी में व्याप्त है। सङ्गीतोपयोगी सात स्वरों का उद्गम भी इसी से है:
       “सप्तगुणित होकर यह हृल्लेखा ॐ (ओ३म्) के अ,,, बिन्दु, नाद, शक्ति तथा शान्त और ह्री̊ के हकार, रेफ, इकार, बिन्दु, नाद, शक्ति तथा शान्त रूप अपने सातों अङ्ग-भेदों से स्वरों सहित सूर्य, कवर्ग सहित मंगल, चवर्ग सहित शुक्र, टवर्ग सहित बुद्ध, तवर्ग सहित बृहस्पति, पवर्ग सहित शनि तथा यवर्ग सहित चन्द्र को जन्म देती है। …. षडज्, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत तथा निषध नामक सात स्वरों; त्वचा, रुधिर, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा तथा रेतस् नामक सात धातुओं सहित सृष्टि के सात वर्गों वाले जो भी हैं, उन सबके रूप में अभिव्यक्त होती है। .... दशगुणित होकर दस नाड़ियों ... को जन्म देती है। .... द्वादश गुणित होकर बारह राशियों.... तथा अकारादि बारह स्वरों में अभिव्यक्त होती है। ..... इसी प्रकार पराशक्ति कुण्डलिनी स्वयं को पचास कुण्डलों से कुण्डलित कर, मूलाधार में अपने अधिष्ठान रूप पुरुष तत्व से दिव्यभाव प्राप्त कर नाद (हकार) के साथ सुषुम्ना के मार्ग से कण्ठ आदि स्थानों का स्पर्श करती हुई अ से क्ष तक के पचास वर्णों के रूप में अभिव्यक्त होती है” [3]

इस कुण्डलिनी शक्ति को कार रूपी माना गया है क्योंकि मूलाधार से उठकर सहस्रार तक पहुँचते हुए इस की आकृति कार समान हो जाती है। इसे ही परमशिव की आद्या-शक्ति माना गया है। इस कार रूपी कुण्डलिनी शक्ति के महात्म्य का प्रमाण यह है कि इसके बिना तो शिव भी शव ही है।

आर्ष ग्रन्थों के अनुसार मानवशरीर में चक्रों, दलों और उनके देवताओं, पञ्चभूतों तथा वर्णों की स्थिति इस प्रकार मानी गई है:
चक्र
दल
वर्ण
बीजवर्ण
देवता
पञ्चभूत
सहस्रार
1000

-
परमशिव
चित्त
आज्ञा
2
, क्ष
शम्भू
मानस
विशुद्ध
16
,,,,,,,,लृ,,,,,,अं,अः
हं
सदाशिव
आकाश
अनाहत
12
,,,,,,,,,,,
यं
ईश्वर
वायु
मणिपूर
10
,,,,,,,,,
रं
रूद्र
अग्नि
स्वाधिष्ठान
6
,,,,,
वं
विष्णु
जल
मूलाधार
4
,,,
लं
ब्रह्मा
पृथ्वी

ये बीजवर्ण अनुनासिक मकारान्त होने से ओ३म् के ही प्रारूप हैं। तन्त्रलोक के अनुसार एक ही वर्ण अर्थात ॐ (ओ३म्) की ही सत्ता है, वही अनाहत नाद है और वही अविभाजित रूप में सभी वर्णों में उपस्थित रहता है:
              एको नादात्मको वर्णः सर्ववर्णाविभागवान्।
              सोsनस्तममितरुपत्वादनाहतः इहोदितः॥ [22 से उद्धृत]
मूलाधार से आज्ञा चक्र तक 50 दलों (4+6+10+12+16+2=50) से 50 वर्णों की उत्पत्ति के बाद सहस्रार चक्र जिसमें 1000 दलों की स्थिति की मान्यता है, में परमशिव और कुण्डलिनी-शक्ति का सायुज्य माना जाता है। वहाँ परमशिव स्वयं विराजिते हैं। सौन्दर्य-लहरी [7] में 51 वां वर्ण लिया गया है, जबकि अधिकांशतः यह ॐ ही माना गया है, जिसकी स्थिति सहस्रार में बताई गई है। माँ काली के गले में प्रतिष्ठित मुण्ड-माल का तादात्म्य वर्णमाला के इन्हीं 51 वर्णों से बैठाते हुए सर वुडरौफ ने तो इस मुण्ड-माल को ही गारलैंड ऑफ वर्णमालाकह डाला।

वैयाकरणिकों ने इन वर्णों को माहेश्वर सूत्रों (शिव-सूत्रों) के रूप में पहचाना है [5]। तो क्या ये माहेश्वर-सूत्र और कुण्डलिनी-शक्ति एक ही हैं? स्वामी विष्णु तीर्थ [7] के अनुसार:
       “शिवजी के ताण्डव नृत्य.... डमरू में दो विपरीत दिशाओं से शिव-शक्त्यात्मक दोनों ही प्रकार के शब्द ताल दिया करते हैं। जिनसे सरस्वती देवी अ-क-च-ट-त-प-य-श के वर्ण-वर्गों की वर्णमाला की शिक्षा ग्रहण करके समस्त वैखरी वाणी की सृष्टि करती है। ...... ताण्डव की तालों से निकालने वाली शिव-शक्त्यात्मक ध्वनि ही शङ्कर का डमरू वाद्य है, जिसको उनके चिदाकाशरूपी देह की स्पन्द-ध्वनि का वाचिक-व्यञ्जक अभिनय कह सकते हैं।“

वस्तुतः डमरू शिव और शक्ति के परिचायक दो त्रिकोणों के जोड़ से बना है। उपरोक्त त्रिकोण को शिव (लिङ्ग) और नीचे वाले त्रिकोण को शक्ति (योनि) माना गया है और इस सायुज्य से उत्पन्न स्पन्दन ही ध्वन्यात्मक वर्णों का स्रोत है। कुण्डलिनी का स्थान भी मूलाधार है। यहाँ आद्य-शक्ति रूपी कुण्डलिनी मेरु-प्रस्तर रूपी शिव के इर्द-गिर्द साढ़े-तीन वलयों के रूप में स्थित रहती है। यही सुषुम्ना-मार्ग से प्रवाहित होती हुई वर्णोत्पत्ति की कारक बनती है और इसीलिए माहेश्वर-सूत्रों की भी कारक है। अतः स्पष्ट है कि वर्णों का स्रोत परमशिव और उसकी शक्ति ही हैं।   

मातृका स्थान तथा नाड़ी तन्त्र
शिव-सूत्र में उपरोक्त वर्णों को मातृका कहा गया है [21]। मातृका माता या जननी के लिए प्रयुक्त होता है। ये वर्णमाला समस्त वाङ्मय की जननी मानी गई है। मातृका को ही अक्षर भी कहा जाता है क्योंकि समस्त संसार अक्ष’, यानि से क्ष पर्यन्त, से वाच्य है। अक्षर का अन्तिम वर्ण अग्निबीज होने से अर्थ प्रकाशित करने का स्वभाव लिए है। इसी अक्षरात्मिका पराशक्ति को सरस्वती या शारदा कहा गया है जिसका शरीर अर्थात् प्रतिच्छाया रूपी मानव-शरीर ही मातृकामय है और अवर्ग आदि सात वर्गों में विभक्त 51 मातृकाओं से निर्मित है [3]। सङ्गीत स्वरों की शरीर में स्थिति इस प्रकार मानी गई है [3]:
स्वर
शरीर में स्थान
हृदय से लेकर दाएँ पैर का अन्त
मुखमण्डल
दायाँ कन्धा
अधर
दाहिनी बाहु का मणिबन्ध
उदर
दायाँ पार्श्व
बाएँ पैर का अङ्गुलिमूल
बाएँ पैर की अङ्गुलियों के अग्रभाग
इ/ई
दोनों नयन

आयुर्वेद में वर्णित मुख्य नाड़ियों से इन मातृका स्थानों का विशेष सम्बन्ध देखने को मिलता है। शिशु-निर्माण प्रक्रिया में सबसे पहले वृषणों का ही निर्माण होता है जो कि बाद में स्त्री-शरीर में अव्यक्त और पुरुष-देह में व्यक्त रूप में रहते हैं। तत्पश्चात् सुषुम्ना नाड़ी का आविर्भाव होता है जो ऊर्ध्वमुखी होने के साथ–साथ अधोमुखी भी होती है। लगभग एक माह में इस नाड़ी के दोनों पार्श्वों में इड़ा (वामभागस्थ) और पिङ्गला (दक्षिणभागस्थ) नामक दो अन्य नाड़ियाँ उत्पन्न होती हैं और फिर समय बीतने के साथ इनसे सम्बन्धित सात अन्य नाड़ियाँ – गान्धारी, हस्तिजिह्विका, पुषा, अलम्बुषा, यशस्विनी, शङ्खिनी तथा कुहु का आविर्भाव होता है। कुछेक विद्वानों ने इन दस नाड़ियों के साथ-साथ सरस्वती, विश्वोदरी, पयस्विनि और वारुणी को भी मुख्य नाड़ियों में गिनकर इनकी सङ्ख्या चौदह मानी है। परन्तु अधिकांश पहली दस पर ही एकमत हैं क्योंकि ये चार भी परोक्ष रूप से पहली दस में ही समाहित हो जाती हैं। ये दस प्रवाहिकाएँ शरीर स्थित दस द्वारों अथवा रन्ध्रों – दो कर्ण रन्ध्र, दो नेत्र रन्ध्र, दो नासिका रन्ध्र, एक मुख रन्ध्र, गुदा, मूत्राशय और जननांग से संबन्धित होने से विशेष महत्व रखती हैं [12]। इन चौदह वाहिकाओं में से पिङ्गला, इड़ा, पूषा, गान्धारी, पयस्विनि तथा शङ्खिनी तृतीय नेत्र यानि आज्ञा-चक्र से ज्ञानेन्द्रियों को जोड़ती हैं। हस्तिजिह्विका तथा यशस्विनी भुजाओं और टाँगों में प्राण-ऊर्जा वहन का दायित्व निभाती हैं। अलम्बुषा, कुहु, सरस्वती, विश्वोदरी, वारुणी तथा सुषुम्ना सहस्रार के अतिरिक्त अन्य छह यौगिक-चक्रों से सम्बन्ध स्थापित करती हैं ([19],[8])। उपरोक्त सारणी में बताए गए मातृका-स्थान सुषुम्ना, इड़ा, तथा पिङ्गला के अतिरिक्त शेष सात नाड़ियों पर ही स्थित हैं [15]। सुषुम्ना नाड़ी से लगभग साढ़े तीन लाख से भी अधिक शिराएँ या नाड़ियाँ जन्म लेती हैं जिनके माध्यम से होने वाला प्राण-वायु-सञ्चरण शरीर को ऊर्जावान् बनाता है। ये सभी नाड़ियाँ नाभी के मूल में बँधी हैं और सभी दिशाओं में इनकी गति है।

जप, पूजा और सङ्गीत
सङ्गीत को प्रार्थना-उपासना का एक अभिन्न अङ्ग माना गया है। स्वरबद्ध वर्ण-समूहों का सीधा-सीधा प्रभाव प्राणवाहिकाओं के स्पन्दन के फलस्वरूप चित्त पर पड़ता है। यही कारण है कि मन्दिरों और गिरजों में बजते घण्टे, गुरुद्वारों में चलने वाला सतत शब्द-कीर्तन, मस्जिदों में तार सप्तक पर गाई जाने वाली आयतें - ये सभी प्रकार की स्वरलहरियाँ मन-मस्तिष्क में कुछ ऐसा जादू चला देती हैं कि अत्यन्त व्याकुल आर्त-चित्त भी शान्त हो जाता है और कभी-कभी तो द्रवित भी हो उठता है। पर वहीं कुछ व्यक्तियों के लिए ये सिर्फ शोरगुल है। कोई साथ-साथ में गाने लगता है तो कोई सुनकर भी उसे नहीं सुनता। इसी प्रकार सिनेमा-सङ्गीत भी कुछ को बहुत रोचक लगता है तो कोई उसे व्यर्थ रेंकना समझकर खारिज कर देता है। कभी-कभी तो सिनेमा तथा नाटकों में पार्श्व-सङ्गीत अव्यक्त को व्यक्त करने के लिए ही प्रयुक्त होता है। इन सभी में सङ्गीत के तो वही सात स्वर हैं पर उनका प्रभाव अलग-अलग क्यों होता है? सन्त तुलसीदास रामचरितमानस में लिखते हैं जाकि रही भावना जैसी प्रभु-मूरत देखी तीन तैसी। तो बात भावना पर आकर टिक जाती है। ये भावनाएँ हमारे मानस और चित्त से प्रेरित हैं। इसी मानस और चैतन्य को सन्मार्ग पर प्रवृत्त करना, बल्कि बनाए रखना ही प्राणिमात्र का ध्येय है। इसलिए सङ्गीत-साधना लौकिक से अलौकिक संसार को जोड़ने का एक सशक्त माध्यम माना गया है। हर पूजा के आरम्भ में अङ्ग-न्यास का प्रावधान किया गया है ताकि अङ्ग-स्पर्श द्वारा चैतन्य को जागृत किया जा सके। तान्त्रिक पूजाओं में तो केवल विशेष वर्ण-निर्मित बीज मन्त्रों के जप का ही प्रावधान है। परन्तु तन्त्र-साधना का रत्ती-भर भी गलत प्रयोग मृत्युकारक फल देता है। इसीलिए तन्त्र-साधना को आज भी अति गुह्य-ज्ञान के रूप में सँजो कर रखा गया है और जनसाधारण के लिए पूरी तरह वर्जित बताया गया है। सामान्य जन के लिए तो देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना, उपासना या जप ही सुनिश्चित किए गए हैं जो सभी मुख्यतः गेय रूप में ही रहते हैं ताकि वे रुचिकर बने रहें। सङ्गीत को इसीलिए विशिष्ट सुरों में सजाया सँवारा गया है ताकि सरसगान के माध्यम से इष्ट की उपासना के साथ-साथ अभीष्ट मन्त्र का भी जप हो सके।
 
विदित ही है कि शरीर-स्थित सभी वर्ण प्राणवायु-स्पन्दन के अभिघात से जीवन्त होकर विचारानुकूल वैखरी के रूप में मुखादि विभिन्न अङ्गों के सहयोग से उच्चरित होते हैं। संस्कृत शब्द अहम् जो कि मैं का पर्याय है, से तक के सभी वर्णों का मैं अर्थात् शरीर में ही समाहित होने का प्रमाण है। श्वास-प्रश्वास (प्राण का अन्दर और बाहर आना-जाना) से उत्पन्न ध्वनि ‘(अ)हं+सः=हंसः अर्थात् मैं वह हूँ तथा प्रश्वास-श्वास (प्राण के बाहर और अन्दर आना-जाना) की ध्वनि सः+अहम् = सोsहम् अर्थात् वह मैं हूँ के रूप में ही सुनाई देती है। यह जीवात्मा और परमात्मा की अभिन्नता को दर्शाता है। सोsहम् या हंस मन्त्र की आवृत्ति एक सामान्य व्यक्ति में एक मिनट में १५ बार होती है। अतः एक दिन में इस की आवृत्ति की सङ्ख्या १५ x ६० x २४ = २१६०० बार है [22]। यह जप, न चाहते हुए भी, हर वक्त, हर जीवात्मा करता ही रहता है अतः इसे अजपी मन्त्र कहा जाता है। इन अर्थों में कोई भी व्यक्ति ईश्वर की सत्ता और सङ्गीत से अनभिज्ञ होने का दावा नहीं कर सकता और न ही इनके महत्व को नकार सकता है।

सङ्गीत के स्वरों की सार्थकता
सङ्गीत के स्वरों से सम्बन्धित मातृकाएँ (व्यञ्जन) स,,,,, ध तथा न हैं। इनमें स, र और न के स्थान पर  के साथ मिलकर सा’, र के साथ जोड़कर रे और न के साथ इ/ई स्वरों के मेल से नि या नी का प्रचलन है। अधिकांशतः सङ्गीत सम्बद्ध आर्ष ग्रन्थ रे के स्थान पर रि या री का प्रयोग करते हैं और इन दोनों ही प्रयोगों का तादात्मय ऋषभ नाम के प्रथमाक्षर से अधिक सटीक बैठता है बजाय के रे के। पर यह ऋषभ कब अपभ्रंश हो कर रे बन गया इसका कोई प्रमाण लेखिका को अभी तक प्राप्त नहीं हो सका है। 

सामान्य जन के लिए, सतही तौर पर, सङ्गीत के सात स्वरों का समूह यानि सप्तक सृष्टि के आदि से अन्त तक के कालचक्र का प्रतीक माना जा सकता है। सा ब्रह्मा की सृष्टि के निर्माण की सङ्कल्प शक्ति का द्योतक है। इस सङ्कल्प के तहत सबसे पहले ऋषियों का आविर्भाव होने से दूसरा स्वर या रि बना। उसके बाद गन्धर्व अस्तित्व में आए जो के प्रतीकार्थ हैं। देवताओं का स्थान उनके बाद आया है जिनका अधिपति मलय अर्थात इन्द्र होने से का अस्तित्व प्रमाणित होता है। देवताओं की प्रजा होना सुनिश्चित हुआ तो का स्थान बना। प्रजा के सुचारू जीवन-यापन के लिए धर्म की स्थापना हुई जिसका प्रतीक को बनाया गया है। यहाँ धर्म से अभिप्राय हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई इत्यादि सम्प्रदायों से नहीं है अपितु कर्तव्यपरायणता से है, दश-लाक्षणिक धर्म धृतिक्षमादमस्तेयशौचमिन्द्रियनिग्रहः धीविद्याबुद्धिः सत्यमक्रोधः एषः धर्मस्य दशलक्षणम् से है। अपने धर्म का पालन करते हुए प्राणिमात्र भौतिक संसार से निवृत्त होकर विरक्ति का मार्ग अपनाए और निर्वाण प्राप्ति के लिए तत्पर रहे अतः निवृत्ति या निर्वाण सूचक नि पर सप्तक का अन्त किया गया।

यदि दार्शनिक गहराईयों में उतरा जाए तो भी संक्षेपतः यही अर्थ मान्य हैं परन्तु फिर भी विभिन्न उद्धरणों से प्रतिपादित विषय को और सशक्त रूप देना अधिक तर्कसंगत रहेगा।

ऋग्वेदीय अक्षमालिकोपनिषत् [11] जपनी (जप में प्रयुक्त माला) में अक्षर-प्रतिस्थापन प्रक्रिया के सन्दर्भ में प्रत्येक वर्ण/अक्षर की शक्ति की परिचर्चा करता है। एकाक्षरकोष [16], मन्त्राभिधानम् [16], मातृकाकोश [16], मातृकानिघण्टु [9], वर्णबीजकोश [16], परात्रीशिका [18], प्रत्याभिज्ञाहृदयम् [1], रुद्रयामलतन्त्रम् [10], प्रपञ्चसारतन्त्रम् ([3],[4]) इत्यादि सभी आर्ष ग्रन्थ हर वर्ण को मन्त्र के रूप में प्रस्तुत करते हुये हर एक वर्ण के साथ एक विशेष भाव संलग्न करते हैं। हर वर्ण का देवता भी निर्धारित किया गया है। देवता अपनी शक्ति के बिना अपूर्ण ही रहते हैं अतः सम्बद्ध देवता की शक्ति को उस वर्ण की अधिष्ठात्री देवी का स्थान भी दिया गया है। शक्ति-पीठों के रूप में इन देवियों की संसार में बहुत मान्यता है। अगले कुछ पन्नों में इन्हीं सन्दर्भों में सङ्गीतोपयोगी स्वरों के लिए प्रयुक्त वर्णों के चयन का औचित्य स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है।
   
शिव की प्रमुख पाँच शक्तियाँ मानी गई हैं – चित्त, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया। इन शक्तियों की प्रतिच्छायाएँ ही कवर्ग आदि वर्णमाला के अक्षर हैं। चित्त शक्ति का द्योतक, आनन्द का, और इच्छा शक्ति का प्रतीक हैं। तथा ज्ञान शक्ति और ’, ’, ’, सभी क्रिया शक्ति के प्रतिबिम्ब हैं [21]। परात्रीशिका [18] में को ईषणा के प्रतीकार्थ में माना गया है जो की इच्छा शक्ति का ही एक अन्य रूप है। इन स्वरों का महात्म्य तो अवर्णनीय है क्योंकि इन स्वरों की मात्राओं के सायुज्य का ही प्रतिफल है कि मात्र 51 वर्ण ही अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम अर्थात् भाषा के रूप में लौकिक जगत में पुष्पित-पल्लवित हैं। शिव-पार्वती संवाद रूपक शिवस्वरोदय [14] इस महात्म्य का एक अच्छा उद्धरण है। स्वरों की इन्हीं विशेषताओं के कारण, संसार के समस्त वैभवों की जननी देवी महालक्ष्मी को इस अवर्ग (अ, आ इत्यादि सभी 16 स्वरों के वर्ग) की अधिष्ठात्री-देवी स्वीकारा गया है ([1],[10])। अक्षरों के अक्षय-स्वरूप के लिए उनमें की विद्यमानता तो अवश्यम्भावी है ही इसलिए से लेकर तक के सभी वर्ण शिव-शक्ति के सायुज्य के परिचायक बन जाते हैं। निष्कर्षतः सङ्गीत के भी सभी स्वर ईश्वरीय शक्ति के द्योतक हुए या यों कहिए कि परमात्मा के ही अनेक नाम हैं।

कार यवर्ग (य,,,,,,,ह) का सदस्य है। यवर्ग व्यापक वर्णों का समूह माना गया है क्योंकि इस वर्ग के सदस्य ही शरीर स्थित यौगिक चक्रों के बीजवर्ण निर्धारित किए गए हैं। हकार के विषय में तो पहले ही चर्चा की जा चुकी है। यामल ग्रन्थ, त्रिक-दर्शन, द्वैत-अद्वैत दर्शन, आगम ग्रन्थ इत्यादि सभी मत श्वास-प्रश्वास की ध्वनि में कार का अस्तित्व देखते हैं। क्योंकि श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया अर्थात प्राण-ऊर्जा ही समस्त वर्णमाला की कारक है अतः कार को अन्य छह सङ्गीतोपयोगी स्वरों का जन्मदाता होने से षड्ज नाम प्राप्त है। श्वास-प्रश्वास प्रक्रियोत्पन्न सोsहम् या हंसः ध्वनि प्रणव (ॐ) का प्रतीक चिन्ह है। नादबिन्दु उपनिषद् [13] मायावी संसार से बन्धन-मुक्ति के लिए ॐकार रूपी हंस के ही चिन्तन की प्रेरणा देता है। ज्ञान से विवेक का आविर्भाव होता है इसलिए इस नीर-क्षीर विवेकी श्वेत-हंस को ज्ञान की प्रतीक देवी सरस्वती का वाहन बनाया गया है। इस तरह कार हंस का समानार्थक होने से ज्ञान का प्रतीक भी बन जाता है। सत् (truth) का प्रथमाक्षर होने से कार को अमृतबीज की संज्ञा भी दी गई है [18]। ब्रह्मपञ्चकों – श,,,,क्ष – में तीसरा स्थान होने से इसे तृतीय ब्रह्म भी माना गया है। वर्णबीजकोश [16] सप्तर्षियों में से महर्षि भृगु, जो शिव या श्रीकृष्ण का अवतार माने गए हैं, को का प्रतीक मानते है।
सङ्गीत में के साथ कार का भी सायुज्य देखने को मिलता है। परात्रीशिका [18] को पृथिवी, प्रकृति और माया तीनों को परिवेशित करने वाली परावाक् मानती है। अतः शक्ति स्वरूप दीर्घ स्वर का योग सा को परावाक्-शक्ति का रूप दे देता है जो समस्त वैखरी की जननी है। जहाँ एक ओर त्रिक-दर्शन इसे परमशिव की आद्यशक्ति का परिचायक मानता है वहीं संस्कृत शब्दकोश [17] इसी सा को देवी लक्ष्मी का पर्याय बताते हैं। अक्षमालिकोपनिषद् [11] जहाँ को सार्ववर्णिक अर्थात् सभी वर्णों का कारक तथा सर्वकारण यानि सभी क्रियाओं का कारक बताता है वहीं को आकर्षणात्मक मानता हुआ कार में आनन्द (bliss) को मूर्तिमान करता है। अतः इन सभी अर्थों में  स्वर सा सर्वकारक, ज्ञान का परिचायक और आनन्दकारक होने के साथ-साथ समस्त वैखरी और निष्कर्षतः सङ्गीतोपयोगी अन्य छह स्वरों का जन्मदाता होने से षड्ज नाम पाकर सप्तक में मूर्धन्य स्थान पर विराजित है। इसी विशेष स्वभाव के कारण सप्त धातुओं में से वीर्य नामक धातु, जो पिंडोत्पत्ति का मूल बीज है, को स्वर सा से जोड़ा गया है [20]। इसका उद्गम-स्थान भी जीवात्मा का केंद्र-बिन्दु अर्थात् ब्रह्मग्रन्थि ही है। इसके उच्चारण के लिए छह अङ्गों के प्रयोग होने से भी इसका षड्ज नाम सार्थक है।

ऋषभ का या रि या री क्रियाशक्ति के प्रथम सोपान अर्थात तेजस् का प्रतीक है। रि या री में इकार/ ईकार की विद्यमानता इच्छा-शक्ति और ईषणा-शक्ति दोनों को ही समाहित कर लेता है। इच्छा और ईषणा का अनाश्रित-शिव अर्थात शून्य से सायुज्य इसी तेजस् के माध्यम से होता है [18]। धातु रूप में क्रिया का द्योतक है। को अग्नि-बीज या इन्द्रिय-बीज भी माना जाता है। कार का स्वभाव प्रकाशित करना है [3]। तत्वों में इसका सम्बन्ध विद्या तत्व से है जो ज्ञानार्जन से बुद्धि को प्रकाशित करने की सामर्थ्य लिए है। और के योग से बना कार परमशिव की इच्छा, ईषणा शक्ति को दर्शाता है। अतः ऋषभ का प्रचलित रूप रे भी तेजस् का ही प्रतीक बन जाता है। अक्षमालिकोपनिषद् [11] कार को विकृतियों का दाहकर तथा कार को सर्ववश्यकर शुद्धसत्व मानता है। सारांशतः रे/ रि/ री सभी ऋषभ के ही रूप हैं और इस रूप में वह जीवात्मा को आत्मसंयम के द्वारा विकृतियों का दहन करके उस परम-शिव के भाव को प्रकाशित करने की ओर प्रेरित करता है जो वास्तविक सत्य है। एकाक्षरकोष तथा मन्त्राभिधानम् [16] भी इस विचार से सहमत हैं। मज्जा नामक धातु से सम्बन्धित करते हुए रि को नाभि स्थान से उद्गमित माना गया है। शरीर को संक्रामक रोगों से बचाने वाली सफ़ेद कोशिकाओं के निर्माण के लिए उत्तरदायी मज्जा (marrow) दूसरे शब्दों में (भौतिक) शारीरिक विकृतियों के दहन की ही तो कारक हुआ। व्युत्पत्तिपरक अर्थों में ऋषभ ऋष् धातु का रूप है जो कि जाने या गतिमान के अर्थ में प्रयुक्त होती है [20]। यह परिभाषा भी ऋषभ के उपरोक्त अर्थों के अनुकूल ही है क्योंकि तेजस् सम्पूर्ण शरीर में गतिमान रहकर ऊर्जा प्रदान करता है। आँखों की चमक, मुखमण्डल की सौम्यता, शरीर की स्फूर्ति इत्यादि तेजस् के ही रूप हैं। विज्ञान-भैरव [22] कार को रवण यानि संसार के पालक के रूप में प्रस्तुत करता है जो कार को विष्णु का रूप देता है। विष्णु का ही एक रूप श्रीकृष्ण भी हैं।  इसी मत का समर्थन नारदकृत पञ्चमसार संहिता और सङ्गीतदामोदर [6] में भी मिलता है।
              हावर्णे तु गणाध्यक्षो रीवर्णे केशवः स्वयम्।
              तेवर्ण संस्थितो ब्रहमा नावर्णे च शिवः स्वयेम्॥ (पञ्चमसार संहिता)
अर्थात् – हवर्ण में गणेश, री वर्ण में स्वयं विष्णु, ते वर्ण में ब्रह्मदेव, ना वर्ण में शिव स्वयं हैं।
              आवर्णस्तु गणेशस्य रि वर्णः कंसवैरिणः।
              लावर्णे संस्थितो ब्रह्मा नावर्णः शंकरः स्वयम्॥ (सङ्गीतदामोदर)
अर्थात् – आ वर्ण गणेश का, रि वर्ण कंस के वैरी (श्रीकृष्ण) का, ला वर्ण ब्रह्मा का अधिष्ठान है, ना वर्ण में स्वयं महादेव हैं।

यामलग्रन्थ [10] रि को ऋद्धिदायी बताते हैं तथा इस वर्ण की अधिष्ठात्री देवी के रूप में अनलमुखी और कार के लिए इन्द्राणी और इला की उपासना के लिए प्रेरित करते हैं। अतः रि’, ’, री सभी रूपों में भगवती के उस रूप की उपासना है जो दुख–दारिद्य से उत्पन्न विकृतियों के भय का हरण करके रिद्धि (ऋद्धि)-सिद्धि देने वाली है। रे स्वर के उच्चारण में ऋषभ की आवाज़ की सी ध्वनि होने से भी इस स्वर को ऋषभ नाम देना उपयुक्त ही है [20]।

कार को पञ्चतत्वों में अग्नि-तत्व यानि क्रिया-शक्ति का पर्याय समझा जाता है। कार गति के भाव का भी द्योतक है। अक्षमालिकोपनिषद् [11] कार को सर्वविघ्नशमनकारक बताता है। ज्ञान और बुद्धि के प्रयोग से महत्तर आपदाओं में भी सही मार्ग पर गतिशील रहना ही प्राणिमात्र का ध्येय है और कार इसी सङ्कल्प का प्रतीक है। एकाक्षरकोष [16] को गणपति अर्थात गणों (समूहों) के पालक के रूप में प्रतिस्थापित करता है। कार शार्ङ्गी अर्थात् भगवान् विष्णु का भी पर्याय है [9]। वर्ण की अधिष्ठात्री देवी का स्थान तीनों जगतों की पालन-कर्त्री गायत्री को देकर यामल ग्रन्थ [10] भी इसी मत का समर्थन करते हैं। गायत्री (मन्त्र) का जप (गान) तो सर्व-सिद्धिदायक माना गया है। कहीं-कहीं को धूम्रा से भी जोड़ा जाता है जो माया और अज्ञान रूपी धूम्र से मुक्ति की प्रेरक है। गन्धर्व समुदाय का भी द्योतक है जो गान विद्या में प्रवीण माने जाते हैं। सम्भवतः इसी कारण को गान्धार नाम दिया गया होगा। श्रृंगी [20] भी इस से सहमति रखते हैं- गानं धार्यते इति गान्धारःकार का उद्गम स्थान हृदय है। इसे अस्थि (bones) नामक धातु से जोड़ा जाता है जो शरीर के आधारभूत ढाँचे को परिभाषित करती है।
    
त्रिक-दर्शन के त्रिक शिव, शक्ति और पुरुष में से पुरुष को कार माना गया है [18]। यहाँ कार रूपी पुरुष जीवात्मा का द्योतक होने से मायावेष्टित है। संस्कृत शब्दकोश के अनुसार [17] का एक अर्थ विष भी है जो जीवात्मा के सन्दर्भ में माया का ही पर्याय है। प्रणव अर्थात ओ३म् प्रणीत होने से क्योंकि सृष्टि की हर ध्वनि कार मिश्रित ही है अतः मकार समस्त ब्रह्माण्ड का पर्याय तो है ही साथ ही साथ नाद या ध्वनि के आकाश-तत्व होने से यह नभ का भी द्योतक बनता है। कार वैकुण्ठ, विष्णु, भानु तथा सूर्य भी है [9]। चन्द्रमा भी कार ही है। एकाक्षरकोष [16] के इन सभी रूपों से सहमति रखता है। अक्षमालिकोपनिषद् [11] कार को मोह-माया तथा ऐंद्रजालिक अनुभूतियों का हरण करने वाला मानता है। जीवात्मा की विवेक-शक्ति और प्रबुद्धता को बनाए रखने के अर्थ में ही यामल ग्रन्थ [10] कार की अधिष्ठात्री देवी महामाया की उपासना का प्रावधान करते हैं। धातुओं में कार का सम्बन्ध वसा (fats) से है। जिस प्रकार शरीर में वसा की विकृत अवस्था विभिन्न रोगों की कारक है और स्वस्थ रहने के लिए इस की स्थिति को नियन्त्रित करना परमावश्यक है उसी प्रकार कार भी विषैली मोह-माया रूपी विकृतियों से दूषित मानसिक स्थिति को नियन्त्रित करता हुआ प्रबुद्धता और अन्तर्बोध के सञ्चरण का प्रतीक है। इसका उद्गम स्थान प्रमस्तिष्क माना गया है जो सहस्रार चक्र का स्थान है अर्थात् परमशिव-धाम है। सप्तक में कार स्वर से ऊपर और नीचे तीन-तीन स्वरों की उपस्थिति इसे मध्यम स्वर बनाती है।  
 
वर्णमाला का वर्ग ज्ञानशक्ति का परिचायक है। मनस्, अहंकार, बुद्धि, प्रकृति और पुरुष को पवर्ग से जोड़ा गया है [18]। इस क्रम से कार मनस् का पर्याय बना। सभी प्रकार के विकारों, सुविचारों, कुविचारों तथा विकृतियों का जनक तो मानव-मन यानि मनस् ही है। मन्त्राभिधानम् [16] कार को लोहित अर्थात रक्तवर्ण का प्रतीकार्थ लेता है। रक्तवर्ण जहाँ एक ओर शूरता का परिचायक है वहीं दूसरी ओर सौन्दर्य-बोधक भी और दोनों ही भाव मानसिक ही हैं। एकाक्षरकोष [16] के अनुसार कार कुबेर अर्थात् समृद्धि का दूसरा नाम है। देवी पार्वती जो कि आत्मनिर्भरता और दृढ़ इच्छाशक्ति की प्रतीक हैं, कार की अधिष्ठात्री हैं। इन अर्थों में स्वर की सप्तक में निश्चित की गई अचलता परिलक्षित होती है। अक्षमालिकोपनिषद् [11] कार को विषविघ्ननाशक होने से उपास्य मानता है। पञ्चम नाम पाकर चतुरता, सुन्दरता और बुद्धिमत्ता का पर्याय भी बन जाता है [17] जो कि फिर से मनस्-जनित भाव ही हैं। सारांशतः कार विषैली, ऐंद्रजालिक और भ्रामक मानसिक परिस्थितियों से उत्पन्न विघ्न-बाधाओं से उबरने की दृढ़शक्ति का प्रतीक है। धातुओं में इसे माँस से सम्बन्धित रखा गया है जो कि अपने अस्तित्व से शरीर के आन्तरिक कोमल और नाजुक भागों को अनेकानेक कष्टों से बचाता है। दाँत, गला, होंठ, तालु और प्रमस्तिष्क – पाँचों स्थान से सम्मिलित रूप से उच्चरित होने से कार का पञ्चम नाम सार्थक है। सप्तक में पाँचवाँ स्वर होने से भी इसका नाम पञ्चम है। पच् और मी के योग से बना होने से पञ्चम स्वर सप्तक में से अन्य स्वरों के श्रुति-मापक होने का भी परिचायक है [20]। इस अर्थ में भी कार की अचलता ही परिलक्षित होती है।

एकाक्षरकोष [16] को धन-धान्य का प्रतीक मानता है। अक्षमालिकोपनिषद् [11] भी विकार-रहित और विपुल धन-धान्य अर्थात् समृद्धि के प्रतीक रूप में ही कार को जपी में प्रतिस्थापित करता है। धारण अर्थ से कार को धात्री अर्थात् धरा रूप में भी देखा जा सकता है क्योंकि धरा बीज धारण करके संसार में धन-धान्य और समृद्धि की पोषक होने का धर्म निभाती है। धर्म के निरूपण और धारण में भी कार का ही स्थान है। ज्ञानेन्द्रियों के प्रतीक तवर्ग [18] का सदस्य होने से कार को स्पर्श की ज्ञानेन्द्रिय त्वक् (त्वचा) से सम्बन्धित माना गया है। कार पवित्रता और प्रीति का समानार्थक भी समझा जाता है [9]। दोनों ही भाव कुछ सीमा  तक स्पर्श-प्रबोधित भाव ही हैं। धीमतामयं धैवतः अर्थात् धर्म सम्मत रूप से जगत का नियमन और निर्वहन करने वाले बुद्धिमान धैवत हैं। सम्भवतः धैवत नाम की सार्थकता भी इसी में है। कार प्रमस्तिष्क से उद्गमित माना जाता है।

कार में कार का समावेश नि को जन्म देता है। तवर्ग का सदस्य होने से कार ज्ञानेन्द्रियों में श्रोत्र से सम्बन्धित है [18]। वैखरी के रूप में निस्सृत शब्दों का उचित श्रवण और उपयुक्त अर्थ-विश्लेषण ही ज्ञानप्राप्ति का माध्यम है इसलिए ज्ञानार्जन में श्रोत्र रूपी कार की भूमिका अहं है। नि विनम्रता का परिचायक भी है। अक्षमालिकोपनिषद् [11] और एकाक्षरकोष [16] नि को निर्वाण का समानार्थक मानते हैं। इस मायावी संसार से मुक्ति पाने के लिए प्राणी हरदम प्रयत्न करता रहता है और यह कार इच्छाशक्ति रूपी कार के साथ मिलकर अपने नि रूप में उपासित होता हुआ उसे सत्कर्मों की ओर प्रेरित करता है जो निर्वाण की प्रथम सीढ़ी है। काराधिष्ठात्री देवी की उपासना के फलस्वरूप ही जीवात्मा भुक्ति-मुक्तिप्रद शान्ति को प्राप्त करता है। मन्त्राभिधानम् [16] में कार को मेषसंज्ञक कहा गया है। मेष इन्द्र के लिए प्रयुक्त होता है। इन्द्र का देवताओं में मूर्धन्य स्थान है और स्वर्गलोक का भाव लिए है। जीवन की अन्तिम परिणिति भी योगियों के लिए निर्वाण और भोगियों के लिए स्वर्गप्राप्ति ही है। कार को सहस्रार से उद्गमित माना जाता है जो शिव-स्थान है। अतः कार संयुक्त कार की उपासना साक्षात् शिव-शक्ति की उपासना ही है। सङ्गीतदामोदर और पञ्चमसार संहिता [6] भी इसी विचार के समर्थक हैं। आचार्य शार्ङ्गदेव [20] तो कार को प्राण का समानार्थक ही कहते हैं। इस तरह नि प्राण-शक्ति अर्थात् कुण्डलिनी-शक्ति का परिचायक हुआ। संस्कृत भाषा में निषध अन्त के लिए प्रयुक्त होता है और नि सप्तक का अन्तिम स्वर है इसलिए ये निषध कहलाता है। निषध का ही अपभ्रंश रूप निषाद वर्तमान में प्रचलित है। इससे श्रृङ्गी [20] भी सहमत हैं।

शारङ्गदेव [20] धातुओं में धैवत को रक्त से सम्बन्धित बताते हैं और निषध को त्वक् से जो कि हमारे प्रतिपाद्य से कुछ वैषम्य रखता है।

वैयाकरणिक व्युत्पत्तियों के विभिन्न रूपों को विश्लेषित करते हुए इन स्वरों के अनेकों अन्य अर्थ भी लिए जा सकते हैं। ऐसा हो भी क्यों न, संस्कृत भाषा का यही तो सौन्दर्य है। इसीलिए यह भाषा देवभाषा या गुह्य भाषा का स्थान प्राप्त किए है।  

निष्कर्षतः
आद्याशक्ति के प्रतीक षड्ज अर्थात् सा से आरम्भ होकर निषध के प्रतीक नि अर्थात् परमशिव में लय होने के साथ सप्तक का अन्त, सृष्टि के आदि से अन्त तक के कालचक्र का एक संक्षिप्त परिचय है। इसीलिए सङ्गीत की साधना परमपिता परमात्मा से लय लगाने का एक उत्तम माध्यम है। सङ्गीत के इन सारगर्भित सात स्वरों की साधना अपने-आप में ही सर्वशक्तिमान की उपासना है। इसका स्पष्ट प्रमाण तुलसीदास, हरिदास, कबीर, सूरदास जैसे सन्त, फ़कीर, सङ्गीतज्ञ तथा कवि हैं। सङ्गीत साधना तो परमात्मा से सीधा-सीधा संवाद ही है। आलापों और तानों को स्वरों की अपेक्षा सटीकता से कार या/ और कार में प्रस्तुत करना सङ्गीतज्ञ  की निपुणता का परिचायक इसीलिए माना जाता है क्योंकि अवर्ग का और कार क्रमशः शक्ति और शिव के पर्याय हैं और इस शिव-शक्ति का सायुज्य कण्ठवासिनी देवी सरस्वती के प्रति समर्पण और उत्तम साधना के परिणामस्वरूप ही सम्भव है। सङ्गीत के इन सात स्वरों का स्पन्दन व्यक्ति के दहराकाश स्थित अनाहत नाद को अभिघात-प्रणीत नाद में परिवर्तित करके वैखरी द्वारा आकाश-तत्व में फिर से विलीन करता हुआ सृष्टयात्मक कालचक्र को गतिमान बनाए रखता है और अनायास ही ईश्वरोपासना का माध्यम बन जाता है।  

अतः सङ्गीत के सात स्वर अत्यन्त सार्थक, प्रयोजनमूलक, सात्विक, सारगर्भित और उपास्य हैं।

आभार: प्रस्तुत शोध पत्र तथा पिछले शोधपत्र [5] दोनों के लिए ही लेखिका दो उत्कृष्ट विद्वानों डॉ॰ पुनीता शर्मा तथा श्री पी॰ डी॰ शर्मा के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करती है जिनके साथ समय-समय पर की गई परिचर्चाएँ इन दोनों शोधपत्रों के प्रतिपाद्य को सँवारने और सशक्त बनाने में सहयोगी बनीं हैं।

सन्दर्भ-सूची
[1]     जयदेव सिंह: प्रत्यभिज्ञाहृद्यम्, मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली, 2016
[2]     नीलकण्ठ गुरुटू: पराप्रवेशिका, https://archive.org/details/ParaPraveshikaNeelKanthGurtoo
[3]     डॉ॰ रामचन्द्र पुरी: श्रीमदाद्यशंकराचार्य विरचितिं श्रीप्रपञ्चसारतन्त्रम्-प्रथमो भागः, चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली, 2012 
[4]     डॉ॰ रामचन्द्र पुरी: श्रीमदाद्यशंकराचार्य विरचितिं श्रीप्रपञ्चसारतन्त्रम्-द्वितीयो भागः, चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली, 2012 
[5]     वागीशा शर्मा: सङ्गीतोपयोगी स्वर - एक अन्य दृष्टिकोण, सेतु (हिन्दी), वर्ष 2, अङ्क 6, http:// www.setumag.com /2017/11/vagisha-Sharma-music-notes.html
[6]     गुरु विपिन सिंह (सम्पादक), नारदकृत पञ्चमसारसंहिता तथा दामोदरसेन कृत सङ्गीतदामोदर: मणिपुरी नर्तनालय, कलकत्ता, 1984.
[7]     स्वामी विष्णुतीर्थ महाराज: श्रीमत् परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री 1008 शङ्करभगवत्पाद विरचित सौन्दर्य-लहरी: https://pdfbooks.ourhindi.com/2016/12/saundarya-lahri-vishnutirtha-mah -araj -shankrach- arya.html
[8]     पं॰ श्रीराम शर्मा आचार्य: कुण्डलिनी महाशक्ति और उसकी संसिद्धि, http://literature. awgp.org/ book/Kundalini_Mahashakti_Evam_Usaki_Sansiddhi/v2
[9]     डॉ॰ सुधाकर मालवीय: श्रीमन्महीधरविरचित मन्त्रमहोदधिः, चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली, 2017
[10]   डॉ॰ सुधाकर मालवीय (सम्पादक एवं व्याख्याकार): रुद्रयामलम् (उत्तरतन्त्रम्)-प्रथमो भागः, चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली, 2017
[11]   अक्षमालिकोपनिषद्: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/akshamalika.- pdf
[13]   नादबिन्दूपनिषद्: https://sanskritdocuments.org/docupanishhat/nadabindu.html
[15]   Aja: Mantra - The Power of Sound, ATMA, Oregon, 1998.   
[16]   Arthur Avalon: Tantrik Texts Vol.1, (Editor) Panchaanan Bhattaacharya, 1937,
[17]   Vaman Shivram Apte: The Practical Sanskrit-English Dictionary, Motilal Banarsidass Publishers Pvt. Ltd., Delhi, 1965
[18]   Bettina Bäumer (Editor): Parā-trīśikā-Vivaran͎a–The Secrets of Tantric Mysticism, Motilal Banarasidass Publishers Pvt. Ltd., Delhi, 2017
[19]   Dr. David Frawley, Dr. Subhaash Ranade and Dr. Avinash Lele: Ayurveda and Marma Therapy, Chaukhamba Sanskrit Pratishthaan, Delhi, 2009
[20]   R.K. Shringy and Prem Lata Sharma- Sañgītaratnākara of Śārñgdeva-Vol.1, Munshiram Manoharlal, Delhi, 2013
[21]   Jaidev Singh: Śiva Sūtra – Motilal Banarsidass Publishers Pvt. Ltd., Delhi, 2012
[22]   Jaidev Singh: Viānabhairava, Motilal Banarasi Dass, Delhi, https://archive.org/ details/jaidevaSinghVijnanabhairavaOrDivineConsciousnessATreasuryOf112TypesOfYoga

2 comments :

  1. Ek aur behtareen lekh ke liye sadhuvad Bahudha du

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  2. डॉ शशि भारद्वाजJuly 25, 2018 at 3:28 AM

    गूढ़ विषय की तार्किक मीमांसा,सशक्त अभिव्यक्ति सच्चे अर्थों में सार्थक शोध-आलेख प्रकाशन हेतु साधुवाद

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