पुस्तक समीक्षा: राम का जीवन या जीवन में राम

समीक्षक: प्रकाश रानडे
(सहयोग: नयना आरती कानिटकर)

पुस्तक: राम का जीवन या जीवन में राम

लेखिका: अनघा जोगळेकर
प्रकाशक: प्रेरणा पब्लिकेशन भोपाल
मूल्य: ₹ 249/- रुपये
ISBN: 978819307994


अनघा जोगळेकर की 'राम का जीवन या जीवन में राम' यह पुस्तक अनघा जी द्वारा लिखित 'अश्वत्थामा -यातना का अमरत्व' से पहले मेरे पास आयी थी। इसी बीच मेरे पिताजी का निवास कुछ समय के लिए मेरे घर पर था तो वे उसका पाठन कर मुझसे चर्चा किया करते थे। किंतु मैं तब अपना पठन समय इस पुस्तक को संपूर्ण रुप से नहीं दे पायी थी। वक्त मिलते ही इस पुस्तक को उठाया और दो दिन के अंतराल में ही इसे पढ़कर पूरा किया। इस पुस्तक पर मेरे विचारों पर मेरे पिता का प्रभाव ज्यादा है। उनसे तब हुई गहन चर्चा को मद्देनज़र रख दोनों के मिश्रित या कहे तो अधिकतर पिताजी के  विचारों को शब्द देने का काम मैंने किया है।

       रामायण-रामकथा जो मुझे बचपन से सुनने को मिली उसमें रामकथा का सार 'आदौ राम तपोवनादि गमनम, हत्वा मृग कांचनम, वैदेही हरणम जटायू मरणम, सुग्रीव संभाषण, बाली निर्दलनम, समुद्र तरणम, लंकापुरी दहनम, पश्चात रावण-कुंभकर्ण हननम - एतद्य रामायणम' जैसे अति अल्प रामायण से लेकर ऋषि वाल्मीकि कृत रामायण के अनुवाद, मराठी में एकनाथ, रामदास, ग. दी. माडगूळकर के मराठी गीत रामायण सहित दूरदर्शन के रामायण तक सुनने-देखने का अवसर मिलने के कारण रामकथा का सम्यक ज्ञान था परंतु तुलसी की रामचरित मानस के दोहे पूर्ण रुप से समझ के बाहर होने के बावजूद भी ग्रामीण जीवन में 'रामायण पाठ' मैं गाती व सुनती रही।
          रामायण का दैनिक जीवन में भी अनुभव रहा।
'जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी' यह भी जीवन में उतारा।
             लेकिन 'राम' को वैज्ञानिक आधार पर एक अभियंता (अनघा जी इंजीनयर हैं) द्वारा लिखित 'रामायण' पढकर उस पर प्रतिक्रिया का मोह होना स्वाभाविक है।

अनघा जोगलेकर
क्रमवार अवलोकन -

1) हमारे वैदिक ज्ञान भंडार के अनुसार एक महत्वपूर्ण 'काल निर्णय' हेतु स्थापित सूर्य सिद्धांत के अनुसार ही एस धरातल पर धर्मस्थापनाएँ तीन आदि देव अर्थात 'ब्रह्मा-विष्णु-महेश' की कल्पना कर ब्रह्मा को निर्माता, विष्णु को पालनकर्ता और महेश को संहारकर्ता के रुप में देखा गया है और सृष्टि की रचना 'मत्स्यकूर्म वराहंच वामनंच जनार्दनं' इस प्रकार सृष्टि निर्माण की कल्पना कर इस धरा पर पहले जलचर, उभयचर (जल व स्थल), नभचर, धराचल वग़ैरह का निर्माण हुआ जो आधुनिक वैज्ञानिक आधार पर सत्यापित है।
             लेखिका ने यही आधार 'राम' को देखने-समझने के लिए लिया है जो अपने लेखन द्वारा सत्य सिद्ध भी किया है।

2) हमारे देवताओं के विभिन्न रूपों को जैसे ब्रह्मा के चार मुख, विष्णु का नील वर्ण, शिवराज का नटराज रुप को मानव के रुप से भिन्न बतलाकर, मानव के रुप में जन्म लेने को लेखिका ने अपने तथ्यों से सिद्ध किया है।
           साथ ही मानव से ऋषि बने सप्तऋषि योगसाधना अर्थात वैज्ञानिक तकनीक से धरा पर होने वाले सामाजिक परिवर्तन का अग्रिम भाष्य अथवा भविष्य में होने वाली भयावह घटनाओं को रोकने के लिए किये जा सकने वाले योग्य प्रयत्नों का पूर्व संकेत देकर 'राम' के  मानव से देवता में रूपांतरित होने के प्रयासों का वर्णन भी किया है, जो प्रवाह लिए हुए है।

समीक्षक: नयना कानिटकर
3) अहल्या का उद्धार भी एकदम सही तथ्य लिए हुए  है कि मानव का पाषाण रुप में परिवर्तित होना असंभव है परंतु मानव की भावनाएँ व अकर्मण्यता 'पाषाण' जैसी सहज संभव है।

4) शिवधनुष को परमाणुअस्त्र के रुप में एक अभियंता ही देख सकता है। आज के युग में हम जिसे रॉकेट कहते हैं वे एक प्रकार के 'धनुष ही हैं जिससे दूरसंचार हेतु अथवा चंद्र-मंगल आदि ग्रहों पर संशोधन हेतु आजकल प्रयोग में लाया जा रहा है।
            'शिव' को एक वैज्ञानिक रुप में देखना और फिर हमारे 12 ज्योतिर्लिंगों को 12 परमाणुअस्त्र-केन्द्र मानना भी तथ्यात्मक रुप से उद्धृत गया है।

5) दशरथ की सबसे छोटी परंतु योद्धा पत्नी कैकेयी द्वारा स्त्री/माता के  सहज स्वभाव के अनुसार भरत के लिए युवराज पद की मांग करना स्वाभाविक लगता है।
             पृथ्वी पर फैली 'राक्षस' संस्कृति/प्रवृत्ति को समाप्त करने के लिए तत्कालीन ऋषियों का कैकेयी को साथ लेकर  'राम' को चौदह वर्षों का वनवास, एक सुनियोजित षडयंत्र था, जो लेखिका ने प्रकृति द्वारा निर्धारित पूर्व नियोजित योजना के रुप में दर्शाया है।

6) खरदूषण से युद्ध के लिए या 14 वर्ष के वनवास के लिए राम अपने साथ शस्त्र भंडार लेकर गए यह लेखिका की कल्पना है। साथ ही राम भी शस्त्र निर्माण जानते थे, जो उनके द्वारा जनसामान्य को सिखलायी गई, यह एक नवीन सोच है। क्योंकि किसी भी रामायण में राम के साथ चौथे आदमी का वनवास में साथ नहीं दिखलाया गया है।
  हाँ! रावण से युद्ध के समय राम को रथ व अस्त्रों की सहायता देवों द्वारा की गई थी ऐसा कुछ कथाओं में वर्णित है। राम ने चित्रकूट में सैन्य संघटन किया था यह लेखिका की नई कल्पना है।

7) वनवास के दौरान राम ने जनस्थानों पर सामान्यजन के साथ-साथ स्त्रियों को भी आत्मरक्षा की शिक्षा दी यह आज के परिप्रेक्ष में ठीक लगता भी हो परंतु उस समय की सामाजिक स्थिति में स्त्री अबला ही थी किंतु यहाँ लेखिका का दृष्टिकोण स्त्री को स्वयंसिद्धा बतलाना प्रशंसनीय है।
          राम ने सीता को युद्ध करना सिखाया, यदि यह सही है तो उसका रावण के साथ दो-दो हाथ करना भी दिखाया जा सकता है, जो लेखिका ने सीताहरण प्रसंग में आंशिक रूप से दर्शाया है।

8) खरदूषण से राम के युद्ध के पूर्व 'शूर्पणखा प्रसंग' भी  अच्छा चित्रित हुआ है।

9) सीताहरण प्रकरण में सीता का हरण दंडकारण्य से बतलाया है जबकि सीता का हरण नासिक से हुआ था ऐसा कइयों का मानना है।
          दूसरा उनके निवास के पास स्वर्ण खदानें बतलाने के लिए मारीच का  राम को दूर ले जाना भी कुछ संगत नहीं जान पड़ता  क्योंकि नासिक के पास स्वर्ण खदाने नहीं हैं। हाँ वे किष्किंधा (कर्नाटक) के पास बता सकती थीं।

10) राम-हनुमान मिलन के प्रसंग कई रामायणों में राम के बाल्यकाल से ही बतलाए गये हैं और तदनुसार तभी से हनुमान-राम बालसखा हैं। यहाँ लेखिका द्वारा लिखा गया तथ्य कि सीताहरण की जानकारी देते हुए जब राम लक्ष्मण नासिक पंचवटी से दक्षिण दिशा में आगे बढे तब हनुमान से परिचय हुआ, सही लगता है।

11) लेखिका ने सीता के आभूषण घास के होना दिखाया है वह ठीक नहीं लगता क्योंकि यदि घास के आभूषण सीता द्वारा विमान से फेंके गये होते तो वे जंगल में प्राप्त करना असंभव लगता है। वे आभूषण निश्चित रुप से स्वर्ण के ही रहे होंगे ऐसा मेरा मानना है।

12) सीता की खोज के लिए सुग्रीव ने चारों दिशाओं मे वानर दल भेजे जबकि जटायु ने स्पष्ट कहा था कि रावण उन्हें दक्षिण दिशा में ले गया है। हनुमान का दल दक्षिण में समुद्र तक पहुँच जाता है और हनुमान तैरकर समुद्र पार करते हैं ऐसा लेखिका का कहना है।
             परंतु हनुमान को उड़ान भरना आता था और बचपन में उनके द्वारा उड़कर सूर्य को पकड़ने की कथा सुश्रुत है। मुझे यह लगता है कि जन्मजात मिले इस गुण को उन्होंने योग के द्वारा विकसित करते हुए समुद्र के बीच-बीच में स्थित पत्थरों के टापुओं पर कूदते समुद्र पार किया। समुद्र को तैरकर पार करने पर मेरी किंचित असहमति है जिसे मैं पाठकों पर छोडती हूँ। अगर वे कोई नया तथ्य जानते हैं तो उसे साझा करते हुए लेखिका तथा मेरे ज्ञान वृद्धि में सहयोग करे।
       
13) राम सेतु के निर्माण में लेखिका के विचारों पर सहमति नहीं बन पा रही क्योंकि - सेतु का निर्माण उस काल के प्रख्यात अभियंता नल-नील द्वारा किया गया था। समुद्र में सागवान की लकडी के प्रयोग पर सहमति नहीं बन पा रही। हाँ! पत्थरों का प्रयोग ही ठीक लगता है।
      ज्वालामुखी द्वारा उगले गये लावा से तैरने वाले छिद्रित पत्थर बन सकते हैं।  हो सकता है उस समय नीलगिरी में वैसे पत्थरों के पहाड़ रहे हो। ऐसे मेरे विचार हैं लेकिन मैंने इस विषय पर लेखिका से गहन चर्चा की तथा उनके तथ्य मुझे योग्य लगे कि केवल तैरते पत्थर से पूल का निर्माण संभव नहीं था उस समय रामेश्वर के पास के जंगलों में प्रचुर मात्रा में सागौन के पेड़ थे. उनका उपयोग करते हुए नल-नील के सुझाव पर सेतु निर्माण हुआ। जो मुझे तथ्यात्मक लगा।

14) लेखिका ने राम-रावण युद्ध के प्रसंग, हनुमान द्वारा संजीवनी लाना, गरुड़ विमान सेवा वगैरह प्रसंग अत्यंत स्वल्प लेखन द्वारा समाप्त किए हैं। वे इन प्रसंगो पर एक वृहद किताब लिख सकती हैं ऐसा मेरा  विश्वास है।

पुस्तक के नवीन विचारों के लिए अभिनंदन के साथ-साथ 'आगे बढ़ो' का अह्वान करती  हूँ।
अनेकानेक शुभकामनाएँ!

सह-समीक्षक: नयना (आरती) कानिटकर
nayana.kanitkar@gmail.com
शिक्षा:- एम.एस.सी, एल.एल.बी
संप्रति:- पति की चार्टड अकाउँटंट फ़र्म मे पूर्ण कालावधि सहयोग
रुचि:- हर वह रचनात्मक कार्य जो मन को सूकून दे, यथा: पठन, पाठन, गायन, सिलाई-कढाई आदि

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