समीक्षा: सबका अपना-अपना पाप और पुण्य

पुस्तक का नाम: चित्रलेखा
लेखक: भगवतीचरण वर्मा
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन
ISBN: 978-81-267-1585-5

समीक्षक: - अज़ीज़ राय


जिन परिवारों या समाज में बहुत अधिक कर्मकांडों या उनकी चर्चाओं पर ज़ोर दिया जाता है, स्वाभाविक रूप से वहाँ पाप और पुण्य को निर्धारित करने के असफल प्रयास किए जाने लगते हैं। जिसे निश्चित रूप से किया जाना चाहिए उसे पुण्य कहा जाने लगता है और जिसे निश्चित रूप से नहीं किया जाना चाहिए उसे पाप कहा जाने लगता है। पाप-पुण्य को निर्धारित करने के खेल में समस्या और प्रश्न तब उत्पन्न हो जाते हैं, जब इन्हें धार्मिक शास्त्रों से जुड़ा हुआ बताया जाने लगता है या बहुत अधिक पुण्य करने से पापों के प्रभावों को कम या पूर्णतः समाप्त किया जा सकता है, का दावा किया जाता है।

पाप-पुण्य के निर्धारण को समाज या परिवारों में जितनी स्पष्टता के साथ प्रचारित-प्रसारित किया जाता है संबंधित भ्रमों को उजागर करने के लिए लेखक ने भी पाप-पुण्य पर उतनी ही स्पष्टता के साथ उपन्यास लिखा है। लेखक यदि उपन्यास में प्रत्येक पात्र के दृष्टिकोण आधारित पाप-पुण्य की चर्चा करता तो शायद पाप-पुण्य का व्यक्तिगत दृष्टिकोण आधारित होना सिद्ध नहीं हो पाता। इसके लिए लेखक ने अपनी रचना में उन दो पात्रों को दो भिन्न दुनियाओं में पाप-पुण्य को जानने-समझने और अनुभव करने के लिए भेजा, जिनके मन में अध्ययन के दौरान स्वाभाविक रूप से पाप-पुण्य को जानने की इच्छा उत्पन्न हुई थी।

उपन्यास में एक अनुभव आधारित तो दूसरी विचार आधारित भिन्न दुनियाओं का मंचन है। अनुभव आधारित दुनिया में भोग-विलास, त्याग और प्रेम की प्रधानता है तो वहीं विचार आधारित दुनिया में साधना, ज्ञान और शक्ति की प्रधानता है। इन दोनों दुनियाओं में स्पष्ट भिन्नता है इसलिए भी लेखक पाप-पुण्य संबंधी प्रस्थापनाएँ स्थापित कर पाए। एक दुनिया का प्रतिनिधित्व बीजगुप्त कर रहा है तो दूसरी दुनिया का प्रतिनिधित्व योगी कुमारगिरि कर रहा है परंतु इन दोनों भिन्न दुनियाओं को जोड़ने में सेतु का कार्य एक प्रयोग के रूप में चित्रलेखा ने किया है। संभवतः इसीलिए लेखक ने केंद्रीय पात्र के नाम पर उपन्यास का नाम चित्रलेखा रखा है।

इस पूरे उपन्यास में चित्रलेखा समय-समय पर कइयों बार सामंत बीजगुप्त तथा योगी कुमारगिरि के साथ आध्यात्मिक संवाद स्थापित करती है। ये चर्चाएँ केवल पाप-पुण्य के बारे में नहीं होती हैं बल्कि माया और ब्रह्म, प्रमाण और भ्रम, सत्य-असत्य, जीवन-मृत्यु, सुख-दुःख, अनुराग-विराग, आत्मा-परमात्मा, जय-पराजय, अंधकार-प्रकाश, विश्वास-अंधविश्वास आदि के विषय में की गई होती हैं।

एक चर्चा के दौरान श्वेतांक को समझाते हुए बीजगुप्त कहता है कि गलत कार्यों का केवल विचार करने से कोई अपराधी नहीं हो जाता है। अपराधी के लिए विचारों का कार्य के रूप में परिणित होना आवश्यक होता है। बेशक हमारे कार्यों का आधार हमारे विचार होते हैं, परंतु विचारों का गलत होने का बोध हो जाने से संबंधित विचार कार्य के रूप में परिणित नहीं हो पाते हैं, इसलिए केवल विचार या दावा करने से कोई भी व्यक्ति अपराधी नहीं हो जाता है।

चित्रलेखा सुंदर थी और योगी ज्ञानी था। वे चर्चाओं के दौरान एक-दूसरे से इसीलिए आकर्षित हुए क्योंकि चित्रलेखा को योगी में साधना से निर्मित सुंदरता दिखी तो वहीं योगी को चित्रलेखा में तर्क से उपजा ज्ञान दिखा। यह प्रेम नहीं केवल आकर्षण था। जिसे योगी और चित्रलेखा दोनों ही एक समय तक प्रेम समझ बैठे थे। चित्रलेखा को इस प्रेम की वास्तविकता को समझने में समय नहीं लगा क्योंकि साधना से उपजी योगी की सुंदरता कुछ दिनों में ही विकृत हो चुकी थी मुख-मंडल का तेज एक रात को निस्तेज हो गया था। हालाँकि योगी के व्यवहार से चित्रलेखा यह पहले ही समझ चुकी थी कि वह उसका दास बन चुका है इसलिए अब उससे प्रेम करना संभव नहीं होगा। इसके बावजूद वह एक दिन बीजगुप्त के प्रेम के नाम पर तिलमिलाई और योगी के जाल में फंस गई।

बीजगुप्त द्वारा यशोधरा के सामने दिये गए अकाट्य तर्कों ने भी सोचने के लिए मगन किया। जब बीजगुप्त कहता है कि प्रकृति में कोई सुंदरता नहीं है बल्कि वह तो कुरूप, निर्दयी और अपूर्ण है। कुरूप इसलिए, क्योंकि उसने कीड़े-मकोड़ों को भी जन्म दिया। निर्दयी इसलिए, क्योंकि सुगंधित फूल काटों के बीच उगे। तथा अपूर्ण इसलिए, क्योंकि मनुष्य को कृत्रिम चीजों का सहारा लेना पड़ा।

चित्रलेखा की समकालीन स्थिति, तीखे तर्कों और व्यंग्यात्मक प्रतिक्रियाओं ने जातिवाद, पुरुष-प्रधानता और अंधविश्वास जैसी सामाजिक बुराइयों पर प्रहार किया है। व्यक्तिगत रूप से पुरुषों की कमी को स्त्रियों की शारीरिक निर्बलता बता देने की मानसिकता को भी खरोंचा गया है। विवाह के लिए दो लोगों के बीच परिचय निकल जाने से लाभ प्रतीत होता है परंतु श्वेतांक का यशोधरा के बारे में यह सोचना कि ‘बहुत अच्छा है कि मेरे और यशोधरा दोनों के पिता गुरु-भाई हैं।’ इससे भी संबंधित सामाजिक बुराई को ठेस पहुँचती है।

भगवतीचरण वर्मा का सन् 1934 ई. में प्रकाशित यह पहला उपन्यास लगभग 2,300 वर्ष पुराने पाटलिपुत्र की पृष्ठभूमि में लिखा गया है। जिसके सभी पात्रों के नाम बोलने और सुनने में मधुर मालूम होते हैं। सत्तर के दशक तक इस उपन्यास पर आधारित दो फ़िल्में बनाई जा चुकी हैं। इसकी लोकप्रियता का कारण केवल लेखन-शैली नहीं बल्कि मुख्य कारण उपन्यास की विषय-वस्तु है। जैसा कि एक परिच्छेद में प्रेम के प्रकारों के साथ ही प्रेम और वासना के भेद को उजागर किया गया है। प्रेम में रहने वाले व्यक्ति की हर क्षण बदलती मनोस्थिति पर गहराई से लिखा गया है। आकर्षण से लेकर प्रेमी तक का त्याग कर देने के चरण और उसके कारणों पर चर्चा की गई है। ऐसा ही एक दूसरा उदाहरण भी है, जब सभा में महामंत्री चाणक्य नीतिशास्त्र के धर्म के अंतर्गत होने या न होने पर अपने विचार रखते हैं।

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