ग्वालियर के तोमर शासनकालीन ऐतिहासिक महल

डॉ. आनन्द कुमार शर्मा

आनन्द कुमार शर्मा

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ग्वालियर के तोमर राजवंश की स्थापना चौदहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुई। वीरसिंहदेव ने ग्वालियर के तोमर राजवंश की स्थापना की थी। ग्वालियर के तोमर राजवंश के सर्वाधिक प्रतापी शासक डुंगरसिंह एवं मानसिंह तोमर थे। ग्वालियर के तोमर राजवंश का अंतिम शासक विक्रमादित्य 1526 ई॰ में पानीपत के प्रथम युद्ध में मारा गया। इस प्रकार ग्वालियर के तोमर राजवंश का ग्वालियर क्षेत्र पर सोलहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक शासन रहा। ग्वालियर के तोमर शासनकालीन ऐतिहासिक महलों में मान मंदिर, गूजरी महल, विक्रम महल एवं कर्ण महल है। ग्वालियर के तोमर राजवंश में ऐतिहासिक महलों के निर्माण का श्रेय सर्वप्रथमतः मानसिंह तोमर को जाता है। मानसिंह तोमर ने मान मंदिर एवं गूजरी महल जैसे राजमहलों का निर्माण करवाया। जोकि, हिंदू स्थापत्य कला के अद्वितीय नगीने है। विक्रम महल का निर्माण राजा मानसिंह तोमर के पुत्र विक्रमादित्य ने करवाया था। कर्ण महल का निर्माण ग्वालियर के तोमर शासन कीर्ति सिंह द्वारा करवाया गया था।1

मान मंदिर:-
ग्वालियर के किले पर स्थित मान मंदिर अपने अद्भुत शिल्प और स्थापत्य के लिए जाना जाता है। इसका निर्माण मानसिंह तोमर ने करवाया था। मान मंदिर ग्वालियर के शासक मानसिंह तोमर का राजप्रासाद था। मान मंदिर चार मंजिला भवन है, जिसमें दो मंजिलें भूमिगत है। महल आयताकार है, इसकी लम्बाई उत्तर से दक्षिण की ओर 300 फीट व चौड़ाई पूर्व से पश्चिम की ओर 160 फीट लगभग है। इसके पूर्वी एवं दक्षिणी भाग की दीवारों को तराशे हुए प्रस्तरों की सहायता से निर्मित किया गया है। दीवारों के मध्य को अर्धगोलाकार मीनारों, गवाक्षों, छज्जों, जलियों, झिलमिली, तोरणों, छतरियों व गोखों से सज्जित किया गया है।2

मान मंदिर की मीनारों के शीर्ष पर बनी छतरियों के गोल गुम्मदाकार छत को मानसिंह द्वारा तांबे की पतरों से ढका गया था, जिस पर स्वर्ण पत्र लगे हुए थे, दूर से ये स्वर्णमयी आभा देने वाले मंदिर के स्वर्ण कलशों का आभास देते थे, यही कारण है, कि इसे मान महल न कहकर मानमंदिर कहना जनसाधारण को रूचिकर लगा होगा। मानमंदिर की सम्पूर्ण बाहरी एवं आन्तरिक दीवारों को पत्थर की खुदाई कर कई प्रकार की आकृतियों, पृष्पाकृति बनाई गई थी, जिनमें रंग बिरंगा मीना भरा गया था। विशेषतः बाहरी दीवारों पर तोरण, स्तम्भ, केले के वृक्ष, हाथी, सिंह, मयूर, हंस, वानर, चवंरधारी आदि आकृतियों को पत्थर में उकेर कर लाल, हरे, पीले, नीले, सफेद एवं काले मीने के रंगों से सजाया गया था, आज लगभग पाँच सौ वर्ष बीत जाने के बाद यहाँ मौजूद रंग उतने ही चटक एवं भव्य हैं।3
मान मंदिर के भवन के भीतरी भाग में दो विशाल चौक हैं, जिनके चारों ओर दो मंजिले कक्ष बने हुए हैं, ऊपर का कक्ष गवाक्ष व जालियों युक्त हैं, जो संभवतः रानियों के आवास के रूप में प्रयुक्त किये जाते रहे होंगे। महल के आन्तरिक कक्ष स्थापत्य कला एवं प्रयोगात्मक प्रकृति के उच्चकोटि के उदाहरण प्रस्तुत करते है। भवन के निचले भाग में एक मन्जिल को ’हिड़ोला कक्ष’ कहते हैं, व दूसरे तल को ’जौहर कक्ष’ कहा जाता है, प्रथम कक्ष आमोद प्रमोद हेतु तथा दूसरा राजकीय महिलाओं के जौहर, सामूहिक अग्निदाह के प्रयोग हेतु था। मानसिंह के शासन के उपरान्त इन तलघरों का प्रयोग मुगल काल में राजनैतिक कैदियों को कैद करने व फाँसी देने हेतु किया जाता रहा था। मानसिंह के प्रत्येक कक्ष व तल पर शुद्ध एवं ताजी हवा एवं प्रकाश की उत्तम व्यवस्था की गई है।
भवन की जल प्रदाय एवं निकासी प्रणाली भी अद्भुत है, जो उस समय के उच्च कोटि के भवन स्थापत्य व विज्ञान का सुंदर संगम है। मानमंदिर के प्रत्येक कक्ष व तल पर शुद्ध एवं ताजी हवा एवं प्रकाश की उत्तम व्यवस्था की गई है। भवन की जल प्रदाय एवं निकासी प्रणाली भी अद्भुत है, जो उस समय के उच्च कोटि के भवन स्थापत्य व विज्ञान का सुंदर संगम है। वर्तमान में यहाँ पर सायंकाल में आयोजित ध्वनि एवं प्रकाश कार्यक्रम के दौरान कई रंगों में जब प्रकाश किया जाता है, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो राजा मानसिंह की कल्पना स्वप्न लोक में विचरण कर ही है।4



गूजरी महल:-
ग्वालियर के किले में निर्मित गूजरी महल मध्यकालीन हिन्दू स्थापत्य कला की अद्भुत इमारत है। गूजरी महल का निर्माण राजा मानसिंह (1486 - 1516 ई0) ने 1494 ई॰ में  करवाया था। गूजरी महल लगभग 300 फीट लम्बा और 230 फीट चौड़ा है। मानसिंह तोमर ने गूजरी महल का निर्माण अपनी प्रिय रानी मृगनयनी के लिए करवाया था। चूँकि रानी गुर्जर जाति से थी, इसीलिए उन्हें गूजरी कहते थे और उनके लिए बनवायी गयी इमारत ’गूजरी महल’ कहलायी। ग्वालियर के किले में गूजरी महल पूर्व की दिशा में किले के बादलगढ़ प्रवेश द्वार के पास स्थित है। गूजरी महल की तीन मंजिला आकार की विशाल इमारत है। गूजरी महल में प्रवेश कर सीड़ियों द्वारा ऊपर चढ़ने के बाद आयताकार विशाल खुला प्रांगण है, जिसके चारों ओर विभिन्न आकार-प्रकार के कक्ष बने हुए हैं।
गूजरी महल की बाहरी दीवारें तराशे हुए प्रस्तर खण्डों से निर्मित हैं, जिन पर कई प्रकार की पच्चीकारी की गई है, इन दीवारों पर दो मन्जिले गवाक्ष युक्त कक्ष बने हुए हैं, जिनकी बाहरी दीवारों को विभिन्न प्रकार की रंगों की मीनाकारी से सजाया गया है। गुजरी महल के उत्तरी एवं दक्षिणी द्वारों को वृहत आकार के पत्थर के हाथियों से सजाया गया है। दक्षिण दिशा के सभी कक्ष विशिष्ट स्थापत्य शैली के हैं, अतः ऐसा प्रतीत होता है, कि संभवत ये कक्ष राज परिवार के प्रयोग में लाये जाते होंगे, व शेष अन्य परिचारिकाओं हेतु रहे होगें।5 वर्तमान में गूजरी महल ’राज्य संग्रहालय’ बना हुआ है।

विक्रम महल:-
ग्वालियर के किले में निर्मित विक्रम महल मध्यकालीन हिन्दू स्थापत्य कला की शानदार इमारत है। विक्रम महल ग्वालियर के किले में मान मंदिर के पास स्थित हैं। दो मंजिला विक्रम महल का निर्माण राजा मानसिंह तोमर के पुत्र विक्रमादित्य ने करवाया था। राजा मानसिंह के ज्येष्ठ पुत्र विक्रमादित्य का निवास होने और विक्रमादित्य द्वारा निर्मित होने के कारण यह महल विक्रम महल के नाम से विख्यात हो गया। विक्रम महल लगभग 212 है। विक्रम महल में 12 द्वारों का खुला बरामदा है। विक्रम महल दो मंजिला है, ऊपरी कक्ष की छत गुम्बदाकार है, जिसके शीर्ष पर एक चौकोर छतरी बनी है व इसके चारों कोनों पर चार अन्य लघु आकार की छतरियाँ बनाई गई हैं, भवन के शीर्ष भाग को इस प्रकार की छतरियों से सज्जित करना ग्वालियर स्थापत्य की एक प्रमुख विशेषता है।6
प्रथम तल पर एक विशाल कक्ष बना है, जिसके दोनों छोरों पर दो मध्यम आकार के कक्ष बने हैं। भवन का स्थापत्य अत्यधिक सादगी पूर्ण है। इस भवन का उल्लेख बाबर ने अपनी आत्म जीवनी ’’बाबर नामा’’ में किया है, वह लिखता है, कि इस अंधकार युक्त भवन में उसने रौशनी हेतु कई सुधार करने के निर्देश भी दिये थे। वह आगे लिखता है, कि यह भवन एक गुप्त मार्ग से मानमंदिर से मिला हुआ था।7

कर्ण महल:-
ग्वालियर के किले में निर्मित कर्ण महल मध्यकालीन हिन्दू स्थापत्य कला की शानदार इमारत है। कर्ण महल ग्वालियर के किले में मान मंदिर के पास पश्चिम की ओर स्थित हैं। कर्ण महल को कर्ण मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। कर्ण महल का निर्माण ग्वालियर के तोमर शासन कीर्ति सिंह द्वारा करवाया गया था। कीर्ति सिंह का दूसरा नाम कर्ण सिंह था। इसीलिए इस भवन को कर्ण महल की संज्ञा दी गयी।8 यह एक विशाल चार मंजिला भवन है, भवन का स्थापत्य किसी भी दृष्टि से किसी आधुनिक भवन स्थापत्य शैली से कम नहीं है, जो इस बात का प्रतीक है, कि उस काल में स्थापत्य विज्ञान बहुत अधिक विकसित था। कर्ण महल लगभग 200 फीट लम्बा और 35 फीट चौड़ा है।9
कर्ण महल में सभी सुख - सुविधाओं का ध्यान रखा गया है। मान मंदिर के विपरीत इसकी आन्तरिक एवं बाहरी दीवारों पर मोटे चूने का पलस्टर किया गया है, जिसमें कहीं कही सुंदर रंगों की मीनाकारी भी की गई है। भवन की सुंदरता को बढ़ाने हेतु लाल पत्थर के कलात्मक पैनलों का प्रयोग भी किया गया है। इस भवन में ग्वालियर झिलमिली, झरोखों, छतरियों आदि का यथा स्थान प्रयोग कर इसकी सुंदरता को बढ़ाने के प्रयास किये गये हैं। भवन का स्थापत्य बहु आयामी है।10



सन्दर्भ ग्रंथ सूची

1. सिंधिया, बलबंत राव भैयासाहेब - हिस्ट्री ऑफ दि फोट्र्रेस ऑफ ग्वालियर, बंबई, 1892, पृष्ठ 17, शर्मा, आर॰ के॰ - मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ के पुरातत्व का संदर्भ ग्रंथ, भोपाल, 2010, पृ॰ 117 -119
2. चक्रवर्ती, के॰ के॰ - ग्वालियर फोर्ट, नई दिल्ली, 1984, पृष्ठ 33-35, द्विवेदी, एस॰ के॰ एवं मधुबाला कुलश्रेष्ठ - ग्वालियर, भोपाल, 2011, पृष्ठ 385
3. चक्रवर्ती, के॰ के॰ - ग्वालियर फोर्ट, नई दिल्ली, 1984, पृष्ठ 33-35, मजपुरिया, संजय - ग्वालियर का इतिहास और दर्शनीय स्थान, ग्वालियर, 1991, पृष्ठ 05 - 09
4. चक्रवर्ती, के॰ के॰ - ग्वालियर फोर्ट, नई दिल्ली, 1984, पृष्ठ 33-35, मजपुरिया, संजय - ग्वालियर का इतिहास और दर्शनीय स्थान, ग्वालियर, 1991, पृष्ठ 05 - 09
5. शर्मा, वी॰ के॰ - ग्वालियर एवं पश्चिमी बुंदेलखण्ड के दुर्ग एवं गढ़ियाँ, बरेली, 2013, पृष्ठ 58, द्विवेदी, एस॰ के॰ एवं मधुबाला कुलश्रेष्ठ - ग्वालियर, भोपाल, 2011, पृष्ठ 407 - 10
6. चक्रवर्ती, के॰ के॰ - ग्वालियर फोर्ट, नई दिल्ली, 1984, पृष्ठ 28-29
7. शर्मा, वी॰ के॰ - ग्वालियर एवं पश्चिमी बुंदेलखण्ड के दुर्ग एवं गढ़ियाँ, बरेली, 2013, पृष्ठ 59, द्विवेदी, एस॰ के॰ एवं मधुबाला कुलश्रेष्ठ - ग्वालियर, भोपाल, 2011, पृष्ठ 386
8. सक्सेना, चैतन्य - ग्वालियर के स्मारक, भोपाल, 2002, पृष्ठ 17 - 18
9. चक्रवर्ती, के॰ के॰ - ग्वालियर फोर्ट, नई दिल्ली, 1984, पृष्ठ 28
10.  शर्मा, वी॰ के॰ - ग्वालियर एवं पश्चिमी बुंदेलखण्ड के दुर्ग एवं गढ़ियाँ, बरेली, 2013, पृष्ठ 58-59, द्विवेदी, एस॰ के॰ एवं मधुबाला कुलश्रेष्ठ - ग्वालियर, भोपाल, 2011, पृष्ठ 385

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