नववर्ष मंगलमय हो!

नववर्ष, कालचक्र की एक कड़ी, वार्षिक ऋतुचक्र का पुनरारम्भ, जीवनयात्रा का एक और पगारम्भ!

कोविड-19 का खतरा अभी टला नहीं है। जब भी स्थिति नियंत्रित होती लगती है विषाणु का कोई न कोई नया रूप सामने आ जाता है। प्रवासियों के लिये तो स्थिति और भी दुष्कर है क्योंकि उनकी यात्राएँ भी बुरी तरह बाधित हो रही हैं। अच्छी बात यह है कि अब तक जनता मास्क आदि की अभ्यस्त हो चुकी है और लोकतंत्र टीकाकरण के दायित्व को भरपूर निभा रहे हैं। नववर्ष आपकी प्रसन्नता, स्वास्थ्य और समृद्धि में वृद्धि करे यही हमारी कामना है और संसार में भुखमरी, बेघरी, आतंकवाद, तानाशाही और युद्ध जैसी समस्याओं का अंत हो।

पिछले वर्षों में भारत, विशेषकर हिंदी में एक नयी साहित्यिक प्रवृत्ति देखने को मिली है। वर्तमान मौके पर आधारित एक फड़कती हुई कविता लिखकर उसे कालिदास से लेकर दिनकर तक यदृच्छया चुने किसी प्रख्यात का नाम चेपकर वायरल कर देना। एक बार वाट्सऐप या फेसबुक पर आने के बाद तो भारत की भोली जनता कुछ भी (वास्तव में कुछ भी) आगे ज्ञानदान करने में माहिर है। ताज़ातरीन ट्रेंड है - राष्ट्रकवि श्रद्धेय रामधारी सिंह 'दिनकर' के नाम से फैलायी जा रही कविता, "ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं, है अपना ये त्यौहार नहीं" जिसका पहला शब्द ही ग़लत है - नववर्ष एकवचन होता है, उसे 'ये' नहीं, 'यह' होना चाहिये। दुःख है कि अनेक विद्वान साहित्यकार भी कविता के मूड और राष्ट्रकवि की परिपक्वता के बीच के भारी अंतर की परवाह किये बिना उत्साही अंध-फ़ॉरवर्डक बने हुए हैं। भोले और जोशीले फ़ॉरवर्डकों के श्रम से इस कविता को एक बार पॉपुलर हो जाने दीजिये, कई ओरिजिनल ठेलक अपना-अपना श्रेय लेने सामने आ जायेंगे। मूल रचनाकार का खुलासा होने तक तो इसका बोझ दिनकर जी को ही ढोना पड़ेगा क्योंकि लापता प्रामाणिकता वाले समाज के मूर्धन्य स्वर्गवासी कविगण ऐसे दुर्भाग्य के लिये अभिशप्त हैं।

 देश की स्वतंत्रता के लिये अनगिनत भारतीयों ने अपना जीवन दाँव पर लगा दिया। उनमें से कुछ नाम हमें याद हैं और न जाने कितने गुमनाम हो गये। इस अंक में गदर पार्टी के ऐसे ही नायक पंडित जगत राम हरियानवी के विषय में जानकारी है जिन्हें होशियारपुर के हरियाना में पंडित जगत राम कम्युनिटी हेल्थ सेंटर और पंडित जगत राम सरकारी पॉलीटेकनिक द्वारा अपनी जन्मभूमि पर याद किया जा रहा है। 

इस बीच, सेतु में प्रकाशन के उद्देश्य से आने वाली रचनाओं की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। बेशक़ अधिकांश रचनाकार गम्भीर सृजनकर्मी हैं और लेखकों से निवेदन पढ़कर अपनी उत्कृष्ट और अप्रकाशित रचनाएँ ही भेज रहे हैं तो भी कुछ गिने-चुने अति-उत्साही लेखक अभी भी हर तीसरे दिन घोर-लापरवाही से लिखी एक रचना ईमेल कर रहे हैं। इसके साथ ही कुछ लेखक एक ही रचना अनेक प्रकाशनों को भेज कर सम्पादकों के साथ पाठकों का समय भी नष्ट कर रहे हैं। यह प्रवृत्ति बचकानी तो है ही, लम्बी दौड़ में आत्मघाती भी है। एक रचना एक समय में एक ही पत्रिका को भेजिये। वहाँ से अस्वीकृत होने पर ही दूसरी जगह भेजने का कोई अर्थ बनता है। कुछ लेखक अस्वीकृति संदेश पाने पर उसे पढ़ने के बजाय त्वरित जवाबी ईमेल से सवाल-जवाब का सिलसिला जारी कर देते हैं। उन लेखकों के लिये मेरा निवेदन इतना ही है कि - कृपया संयम से काम लें। अस्वीकृति संदेश को भी पढ़ें, प्रकाशित रचनाएँ भी पढ़ें, और अपनी रचना भी फिर से पढ़ें तो आपकी अगली रचना की स्वीकृति-सम्भावना बढ़ सकती है। कई लेखक रचना भेजने के बाद बार-बार स्वीकृति के बारे में तपास आरम्भ कर देते हैं, जो सही नहीं है - समय दीजिये। प्रामाणिकता सेतु की विशेषता है। इसे बनाये रखने के लिये हमारे लेखकवृंद का सहयोग अनिवार्य है। एक और खास बात निम्नलिखित है जिसका प्रसार हिंदी लेखकों में आवश्यक लगता है:

कृपया एकपक्षीय, या अतिवादी रचनाएँ न भेजें। किसी राजनैतिक विचारधारा के प्रचार, हिंसक गतिविधि, या किसी भी प्रकार की घृणा या द्वेष की अभिव्यक्ति के लिये सेतु में कोई स्थान नहीं है, चाहे वह किसी भी वर्ग, जाति, धर्म, लिंग, भाषा, या राष्ट्रीयता के प्रति हो। घृणा, द्वेष, हिंसा, प्रतिहिंसा का समर्थन हमारे, और समाज के लिये हानिप्रद तो है ही, यह अनैतिक और अवैध भी है, इसे रोकने में ही हमारा हित है। 
  
मंझी हुई कथाकार दीपक शर्मा जी की तीन कहानियाँ हमारे अंदर के पाठक को चमत्कृत करने जा रही हैं। सेतु में पहली बार प्रकाशित हो रहे अभय शुक्ला की ग़ज़लें आपको प्रभावित करेंगी, ऐसा मेरा विश्वास है। नवगीत से नज़्म तक 18 कवियों के पद्य के साथ, सात कहानियों और पठनीय आलेखों, समीक्षाओं तथा नियमित स्तम्भों वाला, सेतु का यह अंक बहुत रोचक सामग्री लेकर आया है। हमारे लेखकों ने अपनी ओर से सर्वोत्तम लिखा है। बस, अब एक पाठक के रूप में आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा है। आपके सुझावों का भी स्वागत है।

पिछले रविवार को सेतु सम्पादनमंडल के सदस्य कन्हैया त्रिपाठी जी के पिता का स्वर्गवास हो गया। इस अंक का अहिंसा स्तम्भ उन्हीं को समर्पित है। सेतु परिवार की ओर से विनम्र श्रद्धाञ्जलि!  

शुभाकांक्षी,
सेतु, पिट्सबर्ग
31 दिसम्बर 2021 ✍️

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