पवित्र-प्रज्ञा और अहिंसा

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं एवं सेतु संपादन मंडल के सम्मानित सदस्य हैं। आप अहिंसा आयोग के समर्थक एवं अहिंसक सभ्यता के पैरोकार भी हैं।

हमारा जीवन बहुत ही अलौकिक है, मनुष्य का जीवन पाना तो हर व्यक्ति का सौभाग्य है। अपना सौभाग्य हम लेकिन बहुत कठिनाई से गढ़ पाते हैं। ईश्वर की दी हुई यह महान उपलब्द्धि हम क्यों नहीं संरक्षित कर पाते और क्यों नहीं हम इसे दिशा दे पाते हैं, कभी इस पर विचार किया आपने? यदि ऐसा नहीं कर पाते हैं तो जीवन बिखर जाता है। उसको कोई अर्थ नहीं मिल पाता।

वस्तुतः हमारे जीवन में हमें जीवन तो ईश्वर देता है। उँगलियाँ थाम हम अपने अभिभावक से चलना सीखते हैं। गुरु हमें बुद्धि से प्रखर कर जीवन के अच्छे-बुरे का भान कराते हैं। इसके बाद हम अपने जीवन की स्वयं ढाल बनते हैं। इस अनगढ़ से परिपक्व होने के अंतराल को यदि सही दिशा मिल जाये तो जीवन सौभाग्य सा लगता है। इस अंतराल को वास्तव में हम खोने से बचा दें और चेतस होकर अपने जीवन को राह दे दें तो ऐसा कोई भी कार्य नहीं है जिसमें हमें सफलता न मिल जाए।

गुण हमारे लिए वरदान हैं और अवगुण हमारे जीवन के विनाशक। गुण को हम कितने स्तर पर विकसित करने के लिए तैयार होते हैं, यह महत्त्वपूर्ण बात है। गुण हमारे जीवन की धुरी में उस तेल की भांति होते हैं, जो हमारी गति को बढ़ाते हैं। उन्हें अर्थहीन होने के लिए गतिशीलता प्रदान करते हैं। अवगुण इसके उलट हमारी चेतना को कुंद करते हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हम जिन उँगलियों को पकड़ कर चलाना सीखे, जिनसे हमने दीक्षा ली उन्होंने हमें क्या दिया।

यदि प्रारब्ध को छोड़ दें तो मनुष्य जो कुछ अपने भीतर जागृत करना चाहता है, वह इस जन्म का ही सृजन होता है और उसके अनुसार ही उस व्यक्ति का व्यक्तित्त्व बनता है। हम गुणी बनते हैं यदि हमारे परिवार और गुरुकुल हमें गुणी बनाने के लिए वैसी चेतना देते हैं, दिशा देते हैं और मनो-मस्तिष्क तैयार करते हैं। अब आपको समझ आ जायेगा कि हम जिन अन्तराल में मनुष्य सृजन की प्रक्रिया देख आहे थे, उसमें झोल कहाँ हो रहा है। हमारे समय-समय के अभिभावक हमारे उन समय-अंतराल में यदि सही भूमिका निभाएँ तो हम एक प्रखर, सौम्य और सुन्दर प्रवृत्ति वाला व्यक्ति सृजित होते पाएंगे। दूसरा जो सबसे बड़ा अंतर-गैप्स है वह है उन सभी अभिभावकों की पारी समाप्त होने के बाद जिस प्रकार हम अपने जीवन को जिन खांचे में बांधकर चलाने के लिए अग्रसर हुए हैं, वह भाग। यदि उन सभी अच्छे अवदानों और उपादानों के बाद भी अपने जीवन को हमने बर्बाद कर दिया तो एक अवगुणी व्यक्ति-मनुष्य होने से हमें कोई नहीं बचा पायेगा।

दुनिया इन्हीं गुणी, अवगुणी और मध्यम-मार्गियों के मध्यम से संचालित हो रही है। हमारी संगति और हमारी सोच ही हमें महान बनाती है और हमारी संगति और सोच ही हमें गिरा देती है। अब चुनाव तो व्यक्ति के अपने बस में है। मलीन होने से बचना है कि मलीन होकर जीवन को अर्थहीन बना देना है, यह तो चुनाव व्यक्ति-मनुष्य का है। जो गुणी होता है वह अपने साथ अपने परिवेश को भी गुणी बनाता है। जो अवगुणी होता है वह अपने परिवेश को गन्दा कर देता है और अपने समाज को भी संकट में डाल देता है। हम अपने आसपास को ज़रा देखें, इस बात के अनेकों उदाहरण आपके आसपास मिलेंगे। इसके लिए किसी तर्क को गढ़ने या किसी कहानी को सुनाने की आवश्यकता नहीं है। कर्ण महान दानी था। महान योद्धा था। ह्महान नैतिक गुणों से विभूषित था। सूर्यपुत्र था लेकिन उसने गलत शिविर चुना। उसका हस्र क्या हुआ आप इसे महाभारत पढ़कर समझ सकते हैं। कथाएँ महाभारत की बताती हैं कि स्वयं श्रीकृष्ण ने उसे उस दलदल से निकालने की कोशिश की लेकिन वह नहीं निकल सका। माँ कुंती के आग्रह को भी उसने मना कर दिया। यह उसके चुनाव का सवाल है। गुणी होने के साथ वह चुनाव जिन परिस्थितियों का किया उसके कारण वह अवगुण के उन षड्यंत्र का शिकार हुआ जो उसे कदाचित कभी न मिलता। इसलिए कभी कभी यह सोचते हुए कि हम सही गुण वाले हैं और सही रस्ते पर हैं, यह भ्रामक मनोसंरचना बनाकर चलना भी घातक होता है। इसलिए चुनाव और वरण का प्रश्न है यहाँ पर, कि आप चुनते क्या हैं।

गुण तो तीन ही होते हैं-सतो गुण, रजो गुण एवं तमो गुण। इन गुणों की व्याख्या हमारे धर्म शास्त्रों एवं दर्शन में मिलती हैं। कहा गया है- तमोगुण से प्रामाद में अभिवृद्धि होती है। इसलिए हमारे भीतर किन गुणों का विकास हो रहा है और किन कारणों से इसका मूल्यांकन तो हमें स्वयं करना होता है। मनुष्य इसी चीज का ध्यान नहीं रख पाता। फलतः मनुष्य उन विकारों और विषादों का भागी बनता है जो उसकी इच्छाओं में सम्मिलित नहीं था। यह तो सतत मूल्यांकन के साथ जीवन निर्वाह करके समाप्त मनुष्य कर सकता है लेकिन हम देखते हैं कि ऐसा लोग करते नहीं हैं और नानाप्रकार के दुखों को सहते रहते हैं।

आचार्य मम्मट ने गुणों की व्याख्या की है अपने काव्य में। उनकी उस व्याख्या को पढ़ें तो प्रतीत होगा कि जीवन तो जीवन-काव्य है। काव्यात्मक जीवन अपनी विशिष्टता में प्रतिष्ठित होता है। यह प्रतिष्ठा मनुष्य अपने जीवन में यदि स्थापित करे तो उसके जीवन का आनंद या रस माधुर्य अलौकिक हो जाये किन्तु विडंबना है कि मनुष्य न जाने किस कारण उन गुणों को अधिक जीवन-अंग बना लेता है जिसकी उपयोगिता उसके जीवन में थी ही नहीं।

फलतः मनुष्य उन कृत्यों के वशीभूत हो जाता है जो मनुष्य और प्रकृति के विरुद्ध होता है। इसमें हिंसा भी सम्मिलित है। इसमें झूठ सम्मिलित है। इसमें चोरी और चुगली भी सम्मिलित है। इसमें सत्य से इतर कार्य करने की प्रवृत्तियां सम्मिलित होती हैं। जिससे वह सत्य का सामना नहीं कर पता। यदि वह सत्व गुण के साथ जीवन जिया होता तो भयरहित होकर जीवन में सत्य के साथ सामना करता और उन परिस्थितियों को मात देता जिससे वह खुद मात खा रहा है।

हिंसा तो तमोगुण है। इसकी व्युत्पत्ति भी विकृत गुणों के कारण होती है। अब एक प्रश्न यह बौद्धिक लोग कर सकते हैं कि गीता में जिस युद्ध के लिए श्रीकृष्ण स्वयं अर्जुन को तैयार करते हैं, क्या वह तमोगुण के रूप में देखी जाए? नहीं। कदापि नहीं। वह युद्ध धर्म की रक्षा के लिए और स्थायी शांति के लिए होने वाला युद्ध था। इसलिए उसे श्रीकृष्ण ने स्वतः कहा कि यह तो धर्मयुद्ध है। उसमें वह परमब्रह्म स्वतः सम्मिलित होकर युग को दिशा दे रहा था इसलिए उसे उस श्रेणी में हम कदापि नहीं रख सकते। हाँ, उस युद्ध के परिप्रेक्ष्य को समझें तो यह लगेगा कि वह तो सभी के भीतर अहिंसा की स्थापना की अनेकों कोशिश थी। यदि सभी अच्छे गुणों का वरण करते तो युद्ध होते ही नहीं। वहां तो अखंड शांति होती और सबमें सौहार्द होता। सबमें प्रसन्नता होती लेकिन गुणों का वरण करने वाले युद्ध के परिणाम तक स्वयं को ले गए। इसमें प्रारब्ध भी अपने हिस्से की भूमिका का निर्वाह कर रहा था और परिणाम हम सभी को पता है।

अनेक पूर्व जन्मों से अर्जित पुण्यों और गुणों के साथ योगी अपने वर्तमान जीवन में ब्रह्म या उस परमसत्ता तक पहुँचने में समर्थ हो सकता है। किन्तु योगी बनकर एकाग्रता के साथ, अनुशासन के साथ उन गुणों को जीवन-व्यवहार में परिणत करना कितना कठिन है? हमारे महर्षियों में वह क्षमता थी। वह ओज थे। वह साधना थी और वह शक्ति संधान करने की इच्छाशक्ति और प्रतिबद्धता थी। इसलिए उनके गुणों को आज भी पीढ़ियों तक हम प्रेरणा के रूप में ले रहे हैं, उनको प्रणाम कर रहे हैं। उनको अपने प्रेरणा के लिए सौभाग्यशाली हेतु के रूप में देख रहे हैं। यदि सबके जीवन की पवित्रता, उनके गुणों की विशुद्धता जीवन-शैली बन जाये तो यह सम्पूर्ण धरती एक अद्भुत संसार बन जाए। किन्तु कहते हैं मनुष्य में ही प्रत्येक संभावनाएँ हैं। वह अपने जीवन को अपने अनुरूप बना सकता है बीएस उसके प्रारब्ध उसे प्रभावित न करें तो वह अपने भीतर अच्छे- व काल अछे गुणों की संभावनाओं की खोज कर सकता है। उसी अनुरूप अपना और अपने परिवेश का वातावरण तैयार कर सकता है। एक अहिंसक, प्रेम-पूर्ण, सौहार्दपूर्ण एवं सबमें अपनी ही जैसी आत्मा की अनुभूति करने वाला व्यक्ति ही ऐसा कर सकता है।
डॉ। राधाकृष्णन ने अपनी पुस्तक ‘धर्म और समाज’ में लिखा है- धर्म का मूल सिद्धांत है मानवीय आत्मा के गौरव को प्राप्त करना, जो भगवान का निवास स्थान है (द्रष्टव्य: धर्म और समाज, पृष्ठ-111)। अब आप स्वयं विचार करें कि जिन विकृत गुणों से हम अपने समय को प्रभावित करते हैं वह तो ईश्वर के साथ हिंसा एक प्रकार से हुई। इसलिए हमें कैसा मनुष्य बनना है? क्या आचरण अपनाना है? क्या जीवन का उद्देश्य बनाना है? क्या हमारे जीवन से दूसरों को मिलेगा? क्या हमारे जीवन का अभिप्राय है? क्या हम अपने जीवन से दूसरों को दे सकते हैं? ऐसे प्रश्नों की बौछार करें और उनका उत्तर ढूंढें तो हमें उत्तर मिलेगा। कम से कम यह उत्तर अवश्य मिलेगा कि अहिंसा हमारे जीवन की दृष्टि हो और अहिंसक पवित्र प्रज्ञा हमारे शरीर में निवास करे। यह पवित्र प्रज्ञा कुछ और नहीं अपितु-ईश्वर है।

पता: यूजीसी-एचआरडीसी, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470003 (मध्य प्रदेश),
चलभाष: +91 981 875 9757, ईमेल: hindswaraj2009@gmail.com

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।