आत्मीय जनों की स्मृतियों का रमणीय अंकन: यादें घर-आँगन की

समीक्षा: डॉ. शकुंतला कालरा


पुस्तक: यादें घर-आँगन की (संस्मरण)
लेखक: प्रकाश मनु
पृष्ठ संख्या: 275
मूल्य: ₹ 399 रुपए
प्रकाशन-वर्ष: 2022
प्रकाशक: लिटिलबर्ड पब्लिकेशंस, दरियागंज, नई दिल्ली-110002
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संस्मरण का अर्थ है, सम्यक् संस्मरण। यानी किसी व्यक्ति, घटना, दृश्य का स्मरण करना, जिनकी स्मृतियाँ मस्तिष्क में कहीं गहरी पड़ी होती हैं। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ प्रकाश मनु ने साहित्य की अनेक विधाओं के साथ, घर-परिवार के आत्मीय जनों के संस्मरण लिखकर इस विधा को भी गौरवान्वित किया है, जो उनकी पुस्तक ‘यादें घर-आँगन की’ में संकलित हैं। ये आत्म-संस्मरण है, किंतु इनमें ‘स्व’ के साथ लोक से प्राप्त अनुभव हैं, जिसे उन्होंने अपनी लेखन-प्रतिभा से नया रूप दिया है। सौंदर्य का संस्कार दिया है।

किस्सागोई के हुनर से भरे प्रकाश मनु ने जीवन की स्मृतियों को बहुत आत्मीय संस्मरणों के रूप में लिखा है। उनके इन भावभीने संस्मरणों की कथन-शैली रोचक है, घटना-क्रम के ब्योरों में सच्चाई है। यह इसलिए संभव है कि उसमें अकृत्रिमता है, जिसने आद्यंत कथा-रस को बनाए रखा है।

शकुंतला कालरा
मनु जी ने अपने संपर्क में आए व्यक्तियों और अपने आत्मीय जनों से जुड़ी घटनाओं आदि का सम्यक् स्मरण किया है और फिर उनमें से कुछ विशिष्ट और मार्मिक स्मृतियों को चुनकर उन्हें रमणीय शैली में इन संस्मरणों के रूप में लिखा है। इन्हें पढ़ते वक्त मुझे इस बात का अहसास हुआ कि कैसे चित्रित व्यक्ति के साथ वे पूरी तरह जुड़े हुए हैं। उनमें डूबकर एकाकार होकर उन्होंने लिखा है। अपनी लेखनी से सम्मोहित करने वाले प्रकाश मनु के अंतरंग संस्मरणों के आकर्षण से बँधे पाठक इन्हें आनंदपूर्वक पढ़ते हैं। लेखक की भावों की गहराई उन्हें प्रभावित करती है। पुस्तक के पृष्ठ खुलते जाते हैं और साथ ही उनके जीवन की पुस्तक के पन्ने भी, जिनमें आप उनके प्रिय और कभी न भूल पाने वाले पात्रों को सहज ही ढूँढ़ लेते हैं।

बालक को गढ़ने में परिवार और विशेष रूप से माता-पिता की अहम भूमिका रहती है। ‘यादें घर-आँगन’ की पुस्तक में माँ की प्यारी यादों से जुड़ा संस्मरण भी है। इस संस्मरण को पढ़ते-पढ़ते ऐसा लगता है जैसे हम कोई मार्मिक कहानी पढ़ रहे हैं। माता-पिता के संरक्षण में बच्चे को अहसास होता है कि उसकी दुनिया आनंद, संतोष, स्नेह और प्रेम की दुनिया है। माँ की अगर ढेर मीठी यादें हैं तो पिता के भी अविस्मरणीय संस्मरण हैं।

माँ और पिता के बारे में सुनहरी स्मृतियाँ हैं तो बड़े भैया श्याम को भी वे कम याद नहीं करते। वे उनके दोस्त हैं, भाई हैं, गाइड हैं और सबसे बढ़कर वे उनके आइडियल हीरो हैं। उनका साथ लेखक के लिए असीम आनंद की अनुभूति कराता है। यह संस्मरण वह दर्पण है जिसमें श्याम भैया के साथ-साथ लेखक का चेहरा भी दिखाई देता है। अपनी छवि श्याम भैया के चेहरे के साथ देखकर उन्हें जो आनंदानुभूति होती है, वह अद्भुत है। यह संस्मरण संबंधों को वहन करना सिखाता हैं। दरअसल एक संबंध में कई संबंधों की व्याख्या है यह आत्म-संस्मरण।

प्रकाश मनु
मनु जी की जीवन-यात्रा में भागीदार हुए पात्र हों अथवा आत्मीय जन, सबके साथ उनका भावनात्मक जुड़ाव महसूस किया जा सकता है। सौभाग्यशाली हैं वे पात्र, जिन्हें मनु जी के मन की भावनाओं ने अपने रस में डुबो-भिगोकर सिक्त किया है। तभी तो ये आत्म-संस्मरण इतने स्निग्ध हैं। माँ, पिता, भाई-बहन, उस दौर के मित्रों, अपने प्रिय अध्यापकों और अन्य आत्मीय जनों को उन्होंने बड़े प्रेम से याद किया है, जिनकी छल-छल करती स्मृतियाँ इस पूरी पुस्तक में बिखरी हैं। यहाँ तक कि जीवन-कथा से औचक ही जुड़ गए कुछ अनाम लोगों को भी उन्होंने भुलाया नहीं है। अपने जीवन में संवेदना को जगाने वाले चरित्रों का मर्मस्पर्शी स्वरूप अंकित किया है। उन्हें कुछ इस तरह से उभारकर सरस ढंग से प्रस्तुत किया है, कि पाठकों के हृदय पर ये चरित्र अपनी अमिट छाप छोड़ जाते हैं।
प्रकाश मनु यानी कुक्कू। जी हाँ, यही नाम है उनके बचपन का, जिन्होंने पाठकों के रू-ब-रू हो अपने संघर्षपूर्ण पारिवारिक जीवन, विभाजन की त्रासदी से उत्पन्न अनेक कष्टों के साथ हँसी-खुशी परिस्थितियों का मुकाबला करते बहन-भाइयों की प्यारी दुनिया का परिचय कराया है। वे लिखते हैं, “सात भाई और दो बहनें। यों कुल नौ भाई-बहनों का बड़ा-सा परिवार था हमारा, जिसमें मैं आठवाँ था। यानी मुझसे बस एक छोटा भाई था सत, बाकी सब भाई-बहन बड़े थे। बड़े भाइयों से तो कुछ डर-सा लगता था, इसलिए ज्यादातर मैं छोटे भाई सत के साथ खेलता था।”
मनु जी के इन अंतरंग संस्मरणों में संयुक्त परिवार के जीवन-मूल्य हैं और उसके प्रति आकर्षण और मोह है। परिवार में प्यार की सुगंध है जो परस्पर साहचर्य की चाह से उत्पन्न हुई है। माता-पिता के साथ भाई-बहनों से घिरा उनका जीवन बहुत ही सहज रहा।

घर-आँगन के आत्मीय जनों की चर्चा हो और उसमें माँ न हो, यह तो संभव ही नहीं। माँ का काया रूप ही है संतान। वह उसकी आत्मा है। तभी तो वह आत्मज कहलाती है। मनु जी के व्यक्तित्व की धुरी उनकी ममतालु माँ है। पुस्तक की भूमिका में उन्होंने बहुत भावुक होकर लिखा है कि “इनमें माँ तो जैसे मेरे लिए ईश्वर ही हैं, या कहिए, ईश्वर का एक दूसरा रूप। मैं कई बार कहता हूँ कि ईश्वर को मैंने कभी नहीं देखा, इसलिए नहीं जानता कि वह है भी या नहीं। पर माँ को मैंने जरूर देखा है और इतनी ममता उनकी आँखों से छलकती देखी है कि मुझे लगता है कि ईश्वर भी ऐसा ही होता होगा। बल्कि कई बार लगता है वह ईश्वर होगा तो जरूर ही, जिसने मेरी माँ को बनाया। और वह जरूर बड़ा ही नेक और ममतालु होगा।”

वे लिखते हैं, “याद पड़ता है, माँ मुझसे बहुत प्रेम करती थीं। ऐसा प्रेम कि वे बार-बार मानो बलिहारी जाती थीं और ‘मेरा पुत्तर, मेरा लाल’ कहकर लाड़ जताती थीं। सच ही मैं नहीं जानता कि माँ की डाँट क्या होती है। माँ ने शायद भूल से भी कभी डाँटा नहीं था और फूल से भी मारा नहीं था। हमेशा ‘पुत्तर-पुत्तर’ कहकर पुचकारती ही रहती थीं।”
पुस्तक में माँ पर लिखे गए संस्मरण ‘माँ का भोला प्रेम जो अब भी मेरी आत्मा में बहता है’ में माँ की ऐसी ममतालु छवियाँ हैं कि पढ़ते हुए मन बहता चला जाता है। सहज और सरल माँ का होना जीवन में ईश्वर का सबसे बड़ा वरदान है। माँ, जिनके जीवन में कोई बनावट नहीं, जो बच्चों सी निहायत मासूम हैं। उनकी आँखों ने मनु जी ने जो दुनिया देखी, वह भी खूबसूरत लगने लगी। माँ में दुख-निराशा या किसी किस्म की हीनता का मालिन्य नहीं था। बचपन में उन्होंने माँ से गायत्री मंत्र सुनकर याद किया। मन पर अमिट प्रभाव छोड़ने वाली कई कहानियाँ सुनीं। इनमें से ज्यादातर कहानियों में अद्भुत फैंटेसी होती। माँ बच्चों से असीम प्यार करती थीं। बीच-बीच में जीवन की बेहद जरूरी सीख भी देती थीं। दुनियादारी भी समझाती थीं, ताकि बच्चे दुनिया की ठोकरों से बच सकें।
माँ हमेशा चाहती थीं कि बच्चे बड़ी लालसाओं के चलते अपने घर-परिवार से दूर न चले जाएँ। वे कहतीं, “पास रहो, एक-दूसरे के सुख-दुख बाँटो और अनावश्यक लालसाएँ छोड़ दो। संतोष-भरा जीवन जियो।” ऐसी ममता की छाँव छोड़कर भला कौन जा सकता है? इसीलिए जगन भैया ने बाहर नौकरी के लिए जाने का फैसला छोड़ दिया। मनु जी के जीवन की धुरी हैं उनकी ममतामयी माँ। वे लिखते हैं, “यों भी माँ तो आज भी मेरे चारों ओर व्याप्त एक अगाध सिंधु-सी हैं, जिसमें डूबना, तैरना हर बार मेरी झोली को अनगिनत सुच्चे और अनमोल मोतियों से भर देता है। आज भी ज्यादातर मामलों में मेरे सोचने की शुरुआत माँ से होती है कि माँ थीं तो ये करती थीं, माँ वो करती थीं और ऐसे हालात में माँ ऐसे रास्ता निकाल लिया करती थीं।”

माँ की ममता के साथ पिता का वात्सल्य भी संतान का पोषण करता है। ‘पिता, जो हमें सर्वशक्तिमान लगते थे’ शीर्षक से लिखे गए संस्मरण में मनु जी ने पिता का पूरा शब्द-चित्र प्रस्तुत कर दिया है। ऐसा लगता है व्यक्ति कोई रेखाचित्र पढ़ रहा है, “उनकी पठानों जैसी कद-काठी और छवि आँखों में तैर रही है। वे बिल्कुल पठानों जैसे ही थे। सफेद कुरता, सफेद धोती और सिर पर सफेद रंग का ही पग्गड़। बड़ी-बड़ी और शानदार मूँछें, जिनमें बाद में चलकर तो सफेदी उतर आई थी। खूब गोरे रंग के, पर चेहरे पर ऐसी लाली कि किसी को भी रश्क हो।”
माँ की तुलना में मनु जी को पिता कभी वैसे ‘ममता और वात्सल्य की मूरत’ नहीं लगे। पिता ने कभी उन्हें किसी चीज की कमी चाहे महसूस नहीं होने दी, “लेकिन यह भी उतना ही सच है कि उन्होंने कभी बच्चों को अपनी छाती से नहीं चिपकाया। कभी भाव-विभोर होकर मीठे बोल नहीं बोले।...” उनका प्रेम मूक था। उनकी सख्ती के भीतर एक मृदुलता थी। पिता का स्नेह किसी शांत अंतर्धारा की तरह अव्यक्त ही रहता। इसी तरह बड़ी बहन और जीजा जी की मीठी यादों के साथ कृष्ण भाई साहब का मुसकराता चेहरा भी मनु जी कभी नहीं भूलते, जिनके बड़प्पन के कारण घर में छोटे-बड़े सब उनकी इज्जत करते थे। प्रभावपूर्ण घटनाओं, प्रेरक प्रसंगों को चुनकर पूरी आत्मीयता के साथ इन संस्मरणों में इस प्रकार पिरोया गया है कि इसमें लेखक की सहृदयता, संवेदनशीलता पाठकों को भीतर तक छू जाती है। ये वे शख्सियतें हैं जो इन संस्मरणों में आज तक सुंदर और भावभीनी स्मृतियों के रूप में सुरक्षित हैं, ज्यों की त्यों।

मनु जी के जीवन मे श्याम भैया कितने अहम थे, यह पुस्तक की भूमिका पढ़कर ही पता चल जाता है। उनके हरफनमौलापन और सदाबहार शख्सियत के बारे में वे लिखते हैं, “श्याम भैया ने ही मुझे खुद से बाहर की दुनिया से जोड़ा और उसकी खूबसूरती और अनंतता का अहसास कराया। वरना मैं तो निपट एकांतवासी और अपने में ही खोया हुआ एक दब्बू और घरघुसरा बच्चा था, जो सारा दिन या तो पढ़ता रहता या फिर अपने आप से बातें करता रहता था। श्याम भैया पतंगें उड़ाने में उस्ताद थे तो थोड़ी-बहुत यह कला उन्हीं से सीखी। इसी तरह हमारे घर में कैरम, लूडो, ताश वगैरह-वगैरह सारे खेल वे ही लेकर आते। ज्यादातर फिल्में भी उन्हीं के साथ देखीं और फिर हवा से बातें करने वाली उनकी वो फर्राटा साइकिल...! सच पूछिए तो श्याम भैया की साइकिल के डंडे पर बैठकर दुनिया-जहान की सैर की इतनी यादें हैं मन में कि बताने चलूँ तो बता ही न पाऊँगा।”

यह अत्यंत सुंदर, भावभीना, कृतज्ञता से ओत-प्रोत विस्तृत वर्णन है, जिसमें निजत्व छलकता है। श्याम भैया पर लिखा गया संस्मरण ‘श्याम भैया—मेरे बचपन के हीरो भी, गाइड भी’ पढ़कर पता चलता है कि उनका साथ लेखक को असीम आनंद की अनुभूति कराता है। यह संस्मरण वह दर्पण है जिसमें श्याम भैया के साथ-साथ लेखक का चेहरा भी दिखाई देता है। अपनी छवि श्याम भैया के चेहरे के साथ देखकर उन्हें जो आनंदानुभूति होती है वह अद्भुत है। यह संस्मरण संबंधों को वहन करना सिखाता है। दरअसल एक संबंध में कई संबंधों की व्याख्या है यह आत्म-संस्मरण।

मनु जी के ये अंतरंग संस्मरण एक तरह से उनकी आत्मकथा की भी छाप लिए हुए हैं, अतः वे उसका भी पूरा आनंद देते हैं। हालाँकि दोनों में थोड़ा से फर्क भी है। आत्मकथा में लेखक स्वयं अपने विषय में कहता है, पर संस्मरण में वह अपने से जुड़े व्यक्ति के विषय में कहता है। इसी तरह आत्मकथा में लेखक अपने जीवन-विषयक तथ्यों से तटस्थ रहता है, किंतु आत्म-संस्मरण में उसका पात्र से गहरा जुड़ाव होता है और उसके व्यक्तित्व और चरित्र के चित्रण में वह तटस्थ नहीं रहता, वरन् उसके प्रति गहरे राग के कारण ही वह चरितनायक उसकी स्मृतियों में ताउम्र जीवित रहता है।

मनु जी के इन संस्मरणों का आकार पर्याप्त विस्तृत है। ‘मेरे अध्यापक, जिन्होंने मेरी आँखों को रोशनी दी’ पुस्तक का सबसे लंबा आत्म-संस्मरण है। यह संस्मरण एक पूरा लघु उपन्यास है। मनु जी लिखते हैं, “सच में जिन्होंने यह जीवन बनाया, मुझे अपने हाथों से गढ़ा, एक बेहतर इनसान और लेखक बनाया, मेरे अंतःकरण को निमज्जित किया और मुझे सही मानों में आदमी बनाया, उनमें सबसे पहला नंबर तो मेरे अध्यापकों का ही आता है। उनमें कच्ची और शुरुआती कक्षाओं के अध्यापक हैं, इंटरमीडिएट की कक्षाओं के समय के अध्यापक हैं, कॉलेज की पढ़ाई के दौरान मिले अध्यापक हैं और बाद में भी जीवन के दोराहे पर सीख और मार्गदर्शन देने वाले अध्यापक हैं, जिन्होंने मुझे टूटनने-बिखरने से बचाया।...”

पुस्तक में स्कूल और कॉलेज की और भी अनेक मधुर स्मृतियाँ हैं। सहपाठियों रामगोपाल और भीकम ने चित्रकला में कच्चड़ मनु जी को चित्रकला के गुर सिखाए और अच्छी ‘कला का मर्म’ बताया। उनका उपकार वे कभी नहीं भूल पाते, क्योंकि यह मर्म तो स्वयं कला के अध्यापक कृष्णचंद्र मुंदा जी भी नहीं बता पाए थे। सबसे अधिक याद आने वालों में अंग्रेजी के अध्यापक राजनाथ सारस्वत हैं, जिनका नाटकीय अंदाज में पढ़ाना और पूरी क्लास पर कभी न मिटने वाला जादुई प्रभाव मनु जी कभी नहीं भूल पाए। उन्होंने नौवीं और दसवीं कक्षा में अंग्रेजी पढ़ाई। परिणामतः हाईस्कूल में मनु जी की अंग्रेजी में डिस्टिंक्शन आई। इसी तरह इंटरमीडिएट के आदर्श अध्यापक मिस्टर खुराना, गणित के अध्यापक गिरीशचंद्र गहराना, भौतिक विज्ञान के श्री लक्ष्मणस्वरूप शर्मा, मोहिनी मुसकान के स्वामी गणित के लालाराम शाक्य, विज्ञान के अध्यापक सी.पी. कुलश्रेष्ठ तथा अन्य अध्यापकों को भी उन्होंने अत्यंत श्रद्धा के साथ याद किया है।

इन अध्यापकों के साथ मनु जी ने उन आदर्श चरित्र वाले समर्पित अध्यापकों को विशेष रूप से याद किया है जिन्होंने उनके जीवन को बहुत प्रभावित किया और खुद दीया बनकर राह दिखाई। इनमें विशेष रूप से हिंदी के आचार्य किस्म के अध्यापक शांतिस्वरूप दीक्षित, अंग्रेजी के शांतमना ओंकारनाथ अग्रवाल और पालीवाल इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य रामगोपाल पालीवाल जी हैं, जिन्होंने इस सुंदर कॉलेज के निर्माण के लिए अपना पूरा जीवन होम कर दिया था। रामगोपाल पालीवाल जी के लिए मनु जी लिखते हैं, “वे ऐसे बड़े और समर्पित ‘कृतिकार’ थे जो अपनी रक्त और मज्जा से कृति की रचना करता है और अपना सर्वस्व उसे देकर निःशेष हो जाता है। आज मैं जो कुछ भी हूँ, उसे बनाने में रामगोपाल पालीवाल जी और उनके द्वारा निर्मित कॉलेज का बड़ा मूल्यवान योगदान है। मैं इसे भला कैसे भूल सकता हूँ।”

इन आत्मीय संस्मरणों में मनु जी स्वयं भी हैं और उनका परिवेश भी। जिस माहौल में हम रहते हैं, उसका प्रभाव तो आएगा ही। रचनाकार उससे तटस्थ होकर नहीं रह सकता। जो तटस्थ रहने की कोशिश करता है, वह रचनाकार हो ही नहीं सकता। मनु जी स्वयं के जीवन से जुड़े ऐसे अनेक मार्मिक प्रसंगों को लक्षित करते हैं, जिसमें सत्य और यथार्थ दोनों हैं। इस कारण अतीत की स्मृतियाँ एक-एक कर पुनजीर्वित होती जाती हैं।

उपन्यास में जिस प्रकार नायक के चरित्र को अन्य पात्रों के चरित्र के साथ उभारा जाता है, उसी प्रकार इन आत्मपरक संस्स्मरणों में मनु जी ने अपने संबद्ध पात्रों के क्रियाकलापों और विचार-विमर्श से अपने आत्म तत्त्व को उभारा है जो नितांत आवश्यक है। मनु जी के संपर्क में आए ये सभी पात्र, परिस्थितियाँ और घटनाएँ भी उनके चरित्र एवं व्यक्तित्व का विकास करते हुए आगे बढ़ती हैं। यानी केवल लेखक ही संबद्ध पात्रों के व्यक्तित्व और चरित्र पर प्रकाश नहीं डालता, बल्कि ये पात्र भी लेखक के चरित्र को उभारते चले जाते हैं।

इन संस्मरणों में कहीं भी आत्मश्लाघा की प्रवृत्ति दिखाई नहीं देती। स्वयं को प्रकट करने में शील-संकोच भी नहीं है। बड़े तटस्थ होकर, पूर्ण असंस्मृक्त रहकर लिखा है। इसलिए ये भावनात्मक संस्मरण पाठक की दृष्टि में लेखक को विश्वसनीय बनाते हैं और उसके प्रति सम्मान की भावना को पुष्ट करते हैं।

विशेष रूप से इन संस्मरणों को पढ़ते समय लेखक की संतुलित दृष्टि पाठक को प्रभावित करती है, जहाँ वह अपने और संबद्ध पात्रों की गुण-दोषों की अभिव्यंजना करता हैं। हालाँकि यह कार्य कठिन भी है, क्योंकि राग-द्वेष से स्वयं को मुक्त रह पाना मानव-स्वभाव के लिए उतना आसान नहीं है। यह बड़ी कठिन साधना है। निर्मम साधना है। सचेत और सजग रहकर किया गया कर्म है। इन संस्मरणों में अपने पात्रों को स्मरण करते समय लेखक अनुभव करता है कि उनके साथ-साथ वह अपने आप को भी पाठकों के साथ साझा कर रहा है। पाठकों को भी इस बात की पूरी आश्वस्ति होती है कि यह स्मरण किए गए पात्रों के साथ-साथ स्वयं लेखक का भी आत्मनिरीक्षण और आत्मविश्लेषण है। पात्रों के साथ-साथ लेखक भी सच्चे हृदय से स्वयं को उद्घाटित कर रहा है। लेखक को कुछ अपने बारे में कहना नही पड़ता, वरन् संबद्ध पात्रों के प्रति उसकी संवेदना ही लेखक के विषय में सब कुछ कह देती है। इसमें स्वतः निजत्व आ जाता है।

पुस्तक के प्रायः सभी संस्मरणों में लेखक अपने पात्र के हृदय की अतल गहराइयों में उतर जाता है। उसके भीतरी सौंदर्य से पहले स्वयं अभिभूत होता है। उसके उस आंतरिक सौंदर्य के रहस्य को देख लेता है, जिसे पात्र ने संभवतः स्वयं भी नहीं देखा होगा। यह उस पात्र की विनम्रता और अकिंचनता ही है, जो उसे कभी स्वयं को ‘अद्वितीय’ नहीं समझने देती, किंतु लेखक की तीसरी आँख उसे खोज लेती है। उस साधारण में असाधारण को पहचान लेती है। शायद इसीलिए लेखक की सूक्ष्म दृष्टि से खोजा गया आत्म-संस्मरण का वह पात्र अत्यंत प्रभावी बन जाता है और लेखक के साथ पाठकों के हृदय में भी अपना घर बना लेता है। ऐसा संस्मरण बेशक साहित्यिकता के गुण के साथ कलात्मक रचना बन जाता है। अतीत के कलेवर में आबद्ध संस्मरण में निहित गुण सहजता, आत्मीयता, मनोविज्ञान, विश्वसनीयता और जीवंत भाषा उसे वह वैशिष्ट्य प्रदान करते हैं, जो पाठक को पढ़ते समय उपन्यास, कहानी आदि का आस्वाद कराता है।

किसी अच्छे संस्मरण की एक बड़ी विशेषता यह है कि वह ‘अन्य’ के साथ ‘स्व’ को जोड़ता जाता है। इसमें स्वयं और अन्य दोनों प्रकाशित होते हैं किंतु इसमें लेखक का व्यक्तित्व अपेक्षाकृत कम रूपायित होता है। संबद्ध पात्र के चरित्र के विविध पक्षों को उजागर करना लेखक का उद्देश्य रहता है। ‘यादें घर-आँगन की’ पुस्तक के आत्मकथात्मक शैली में लिखे ये संस्मरण इन सभी विशेषताओं से युक्त हैं। इनमें जीवन की चुनी हुई घटनाओं के साथ स्मरण किए गए व्यक्ति और उनसे जुड़ा पूरा परिवेश भी चित्रित है। स्मृतियों में उभरकर आए व्यक्तित्व के प्रति आत्मीयता और निजी संबंध इन्हें भावप्रवणता और मार्मिकता प्रदान करते हैं। उनके बाहरी रूप के साथ-साथ उनके आंतरिक चरित्र का भी बड़ी खूबसूरती से अंकन हुआ है। इसीलिए ये संस्मरण मन पर अपनी एक अलग छाप छोड़ते हैं।

कहा जा सकता है कि लेखक के यथार्थ जीवन तथा व्यक्तित्व की आभा से संपृक्त, सरल प्रभावपूर्ण शैली में लिखे गए ये संस्मरण पाठकों को मुग्ध करने के साथ-साथ हिंदी के संस्मरण-साहित्य को निश्चय ही समृद्ध करेंगे।
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डॉ. शकुंतला कालरा, (एसोसिएट प्रोफेसर, मैत्रेयी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय), एन.डी.-57, पीतमपुरा, दिल्ली-110034, मो. 8287479455, 9958455392


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