प्रकाश मनु के चार रोमांचक और कौतूहलपूर्ण उपन्यास

समीक्षक: अशोक बैरागी


पुस्तक का नाम: चार बाल उपन्यास
लेखक: प्रकाश मनु
प्रकाशक: एस.के. इंटरप्राइजेज, दिल्ली।
प्रकाशन-वर्ष: 2021
पृष्ठ: 176
मूल्य: ₹ 350.00 रुपए

प्रकाश मनु जी बाल साहित्य के वरिष्ठ एवं सिद्धहस्त साहित्यकार हैं। उनके लिखे शब्दों और वाक्यों का अनोखा जादू किसी प्रिज्म की भांति सतरंगी आभा और किरणें बिखेरता है। जैसे कोई रेडियोएक्टिव पदार्थ अपने अंदर की अनुपम ऊर्जा, प्रकाश और सौंदर्य को प्रस्फुटित करता है, ठीक वैसे ही मनु जी द्वारा लिखा गया शब्द-शब्द अपनी ऊर्जा, प्रकाश और सुगंध से लबरेज हैं। ‘चार बाल उपन्यास’ उनकी सद्य प्रकाशित पुस्तक है, जिसमें मनु जी के चार उपन्यास ‘चिंकू, मिंकू और दो दोस्त गधे’, ‘भोलू पढ़ता नई किताब,’ ‘सांताक्लाज का पिटारा’ और ‘गोलू भागा घर से’ संगृहीत हैं।

अशोक बैरागी
वास्तव में ये चार बाल उपन्यास नहीं, बल्कि बच्चों के साहस और बहादुरी से भरे अजब-अनोखे कारनामे हैं। एक से बढ़कर एक। इनमें रहस्य, रोमांच, हास्य-विनोद, संस्कार, साहस, धैर्य और सूझ-बूझ इस तरह एक-दूसरे से गुँथे हुए हैं कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता। कहने को चारों बाल उपन्यास हैं। आकार भी छोटा है, पात्र और घटनाएँ भी बहुत अधिक और लंबी नहीं हैं। पर उनका प्रभाव गहरा है। रोचक कथानक, जिज्ञासापूर्ण कथन शैली, छोटे संवाद और भावपूर्ण भाषा के कारण ये इतने पठनीय बन पड़े हैं कि बच्चे पढ़ना शुरू करें तो बीच में छोड़ नहीं सकते। सच पूछिए तो छोटे-बड़े प्रत्येक आयु वर्ग के पाठकों को बाँधने की अद्भुत शक्ति इन उपन्यासों में है।

अब ‘चिंकू, मिंकू और दो दोस्त गधे’ को ही देख लीजिए! वास्तव में यह चार दोस्तों की बेमिसाल दोस्ती के साथ-साथ उनके हैरतअंगेज और बेमिसाल करतबों की कहानी है। इसमें दो गधे बाँका-बदरू और दो बच्चे चिंकू-मिंकू हैं। इन चारों प्राणियों के बीच में इनसान और पशु वाला कोई भेद नहीं है, बल्कि ये चारों मित्रता की कसौटी पर खरे उतरते हैं। बाँका और बदरू के बारे में लोगों की धारणा थी कि ये निकम्मे और नाकारा हैं! किसी काम के नहीं। लोगों को जैसे पता ही नहीं कि ईश्वर किसी जीव को वैसे ही बेकार में नहीं बनाता, उसे कोई न कोई गुण, कौशल, कला अवश्य वरदान रूप में प्रदान करता है। पर बाँका और बदरू के मालिकों के बच्चे भी कुछ अलग ही फक्कड़ किस्म के हैं। ये भी अपने उन दोस्तों पर जान निसार करते हैं। बहुत खयाल रखते हुए, खासी प्रशंसा भी करते हैं। बदरू अपने सखा चिंकू की तारीफ करता तो बाँका भी जोश में आकर कहता कि, “उस घर में एक मिंकू ही मेरा दुख समझता है और मुझे प्यार करता है। है तो अभी जरा सा लड़का ही, पर समझदार बहुत है। जब-जब मुझे मार पड़ती है, बेचारा अकेले में पूरे शरीर पर हाथ फेरता है और रोता जाता है। बड़ी हमदर्दी जताता है। और तो और, प्यारे दोस्त, वह मेरे लिए जंगल से बड़ी अच्छी-अच्छी मुलायम घास भी ले आता है, ताकि मेरा मन खुश रहे। मिंकू न होता तो मेरी तो मुसीबत हो जाती। जिंदगी पहाड़ बन जाती। सच्ची, भगवान जी ने बड़ी कृपा की!”

प्रकाश मनु
दोनों दोस्त चिंकू और मिंकू दोस्ती न तोड़ने और साथ जीने-मरने की कसमें उठाते हैं। चिंकू अपनी इस दोस्ती को लेकर एक अनोखा और मजेदार गीत लिखता है, जो सच्चे और अच्छे मित्रों के लिए मिलकर रहने, मुसीबत में काम आने और नित नया काम करने का आदर्श बन जाता है। यहाँ मनु जी की प्रशंसा करनी होगी कि इस अनूठे गीत द्वारा वे बच्चों में सकारात्मक ऊर्जा भरने में पूरी तरह सफल होते हैं। मनु जी लिखते हैं—
इन दोनों से सीखो, तुम भी मित्र बनाना भाई,
मित्र बनो तो मिलकर रहना, हो ना कभी लड़ाई।
बाँका, बदरू बता रहे हैं, यही दोस्ती का गहना,
दोस्त बनो, फिर नदिया जैसे कल-कल, छल-छल बहना।

मित्रता की कितनी सुंदर और श्रेष्ठ उपमाएँ मनु जी ने दी हैं कि नदी के जल की तरह पवित्र भाव से, निर्मल रहते हुए, मिलकर रहना और जल की ही भाँति निरंतर आगे बढ़ना। यह बहुत ही मनभावन गीत है। चारों मित्र मिलकर कुछ नया और अच्छा करने के सपने देखते हैं। उन्हें लगता है, “आदमी को कोई ऐसा काम करना चाहिए कि दुनिया याद रखे, वरना जीने से क्या फायदा?”

असल में जब वे मिलकर जंगल में मस्ती में नाच-गाना, उछल-कूद करते तो उन्हें अपने हुनर, अपने फन का पता लग गया और निरंतर अभ्यास द्वारा वे अपने इस कौशल को और निखार लेते हैं। ऐसा करके जहाँ उन्हें खुशी और संतोष होता है, वहीं अन्य लोगों से शाबाशी और सम्मान भी मिलता है। बस, यही सब दिखाने के लिए उन्होंने एक लंबी यात्रा करने का निश्चय किया। और यहीं से शुरू होती है स्वयं को सिद्ध करने की रोमांचक और साहसिक यात्रा। चिंकू-मिंकू अपने दोस्तों के प्रति इतने स्नेही और समर्पित हैं कि वे उनकी पीठ पर नहीं बैठते, बल्कि हँसते-गाते, मस्ती करते पैदल ही चलते हैं। बाहर निकलने पर ही उन्हें पता चलता है कि यह दुनिया कितनी सुंदर और रंग-बिरंगी है। घर में रहते-रहते तो आदमी गोबर का चौथ हो जाता है। कुछ सीखने और दुनिया-जहान को जानने के लिए घर छोड़कर निकलना जरूरी है। फिर अगर हम कुछ करने की ठान लें, तो दुनिया का ऐसा कोई कार्य नहीं, जिसे हम न कर सकें। 

बाँका और बदरू जहाँ से भी निकलते हैं, वहाँ के लोग उनके विचित्र करतब, कलाबाजी, लंबी कूद, यहाँ तक कि अनोखा नाच देखकर बड़े हैरान होते हैं। खूब सारा इनाम और सम्मान देते हैं, और वे उसके हकदार भी थे। चिंकू-मिंकू भी बड़े खुशदिल और अलमस्त हैं। इस कारण उन्हें अच्छे लोग निरंतर मिलते हैं। मनु जी ने लाला गुलजारीलाल के मुँह से बहुत अच्छी बात कहलवाई है कि, “...असली बात तो दिल की है और अच्छा दिल, सच्चा दिल कहीं से खरीदा नहीं जा सकता। वह तो आदमी भगवान के घर से ही लेकर आता है…!”

ये चारों दोस्त केवल हवाई बातें ही नहीं करते, बल्कि पूरे स्वाभिमान और निश्चय के साथ काम करके दिखाने में भी विश्वास रखते हैं। गुलजारीलाल के नौकर छकोरीलाल की बात बाँका और बदरू को चुभ गई तो उन्होंने वे करतब, तमाशे, कलाएँ दिखाईं कि छकोरीलाल को मुँह की खानी पड़ी। लोगों की तालियों की गड़गड़ाहट, शाबाशियाँ, फूल मालाएँ, इनाम आदि के ढेर लग गए। चारों तरफ उनकी ही तारीफ हो रही थी। कुछ दिन बाद बाँका-बदरू ने अपनी सूझ-बूझ और बहादुरी से दुष्ट चोरों को पकड़वाकर सबको हैरान कर दिया। इससे उनका कद और बढ़ गया। फिर बसंत पंचमी के दिन गज्जूधामी गाँव में इन मित्रों ने वे कमाल दिखाए जो बड़े-बड़े जीव हाथी, चीते और शेर तक नहीं दिखा पाते। उनकी विचित्र छलाँगें देखकर लोग उन्हें चीते की उपमा देते हैं। जहाँ बाँका-बदरू ने बड़ों का मनोरंजन करके खूब तालियाँ और वाहवही लूटी, वहीं बच्चों को अपनी पीठ पर बैठाकर उछलते-कूदते हुए मैदान के कई चक्कर लगाकर उन्हें ढेर सारी खुशियाँ उपहार में दीं। मजे की बात यह है कि बाँका और बदरू दोनों बच्चों के दिल की भाषा समझते हैं कि आखिर बच्चे क्या चाहते हैं!

ऐसे ही एक से एक रोचक प्रसंग इस उपन्यास में हैं। जब सेठ महताब राय के दोस्त पुन्नीलाल को इन दोस्त गधों के करतब देखकर लोभ आ गया कि, “ये गधे तो तीन लोक से न्यारे हैं। काश, ये मेरे पास हों, तो मेरी शान कितनी बढ़ जाएगी!” तब इन्हें बेचने की बात सुनकर चिंकू-मिंकू क्रोधित होकर कहते हैं कि हमें मारकर ही तुम इन्हें पा सकते हो। यात्रा से लौटते समय भी बाँका-बदरू बहुत ही सूझ-बूझ और बहादुरी का परिचय देते हैं। गुंडा सरदार बुल्ली बाबू और उसके साथी बाँका और बदरू से बुरी तरह पिटकर भागते हैं। इस तरह बाँका और बदरू ने अपने स्वभाव और करतबों से लोगों का दिल जीत लिया। इससे गाँव के लोगों में उनके लिए प्रेम उमड़ पड़ता है।

इस उपन्यास की पूरी कहानी प्रेम, हास्य, वीरता, करुणा, रहस्य-रोमांच, साहस आदि से लबालब है। उपन्यास की भाषा बहुत ही सरस और बोधगम्य है। दाँतों तले उँगली दबाना, पीठ थपथपाना, सिर पर पैर रखकर भागना, कान खड़े होना, दाल न गलना आदि मुहावरों के सार्थक प्रयोग से भाषा प्रभावी और प्रवाहमयी हो गई है। शब्द-चयन भी बहुत ही रोचक है।

इसी तरह उपन्यास में पात्रों और स्थानों के नाम, जैसे चिंकू, मिंकू, लाला गुलजारीलाल, सेठ महताब राय, गुंडा सरदार बुल्ली बाबू, छल-कपट करने वाला लाला का नौकर छकोरीलाल और गाँव गज्जूधामी आदि ग्रामीण परिवेश के अनुरूप हैं और बाल पाठकों के मन में खासा आकर्षण पैदा करते हैं। देशज शब्दों के साथ-साथ उर्दू और अंग्रेजी के शब्दों का समन्वय मनमोहक है। फिर आगे क्या हुआ, यह जानने की उत्सुकता पाठकों में निरंतर बनी रहती है। भाव, भाषा और शैली के लिहाज से बिल्कुल सधी हुई यह कृति जीवन जीने का एक नया अंदाज सिखाती है। 

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पुस्तक में शामिल दूसरे उपन्यास ‘भोलू पढ़ता नई किताब’ में मुख्य पात्र एक भालू का बच्चा भोलू है, जिसे सब लोग ‘भोंदू’ या ‘मूर्ख’ समझते हैं। भोलू लिखना-पढ़ना नहीं जानता और स्वभाव से भी विनम्र हैं। इसी कारण लोमड़ी, चीता आदि उसके साथी मजाक उड़ाते हैं और उस पर व्यंग्य करते हैं। ऐसे में भोलू निराश होकर सोचता है कि “मेरे जीने से क्या फायदा? मुझे तो सभी बुद्धू कहते हैं। अगर मुझे जरा भी अक्ल नहीं आ सकती तो..!”

एक दिन इसी दुख की हालत में चलते-चलते वह मातुंगा जंगल में पहुँचता हैं, जहाँ उसकी भेंट मुटकू बंदर से होती है, जो थोड़ा शरारती भले ही हो, पर बड़ा ही सहृदय है। मुटकू उसे सांत्वना देकर सारी बात जान लेता है। फिर एक अच्छे मित्र की तरह प्रोत्साहित करके उसके खोए आत्मविश्वास और स्वाभिमान को जगाता है। इस कार्य में गीताराम मास्टर जी भी उसकी सहायता करते हैं। जब भोलू के जीवन में शिक्षा का उजाला होता है तो वह अपने आप से कहता है, “सच, पढ़ाई भी कितना बड़ा खजाना है। कोई जरा पढ़-लिख ले, तो दिल मजबूत होता है। उसके अंदर हिम्मत आ जाती है।”

उपन्यास का घटना-क्रम भी बड़ा रोचक है। पहले मुटकू भोलू का मन पक्का करता है। रंग-बिरंगी किताबों में उसकी रुचि पैदा करता है। उन किताबों के रंग-बिरंगे चित्र भोलू के मन में पढ़ाई के लिए जिज्ञासा और आकर्षण पैदा करते हैं, जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। वास्तव में ऐसा करके मनु जी स्कूल और शिक्षा से भटके हुए बच्चों को फिर पढ़ाई-लिखाई से जोड़ने की राह बताते हैं। किताबें ही सच्ची मित्र होने के साथ-साथ ज्ञान का भंडार भी होती हैं। पर पढ़ने का दृढनिश्चयी जिज्ञासु ही इस अथाह ज्ञान-भंडार को प्राप्त करके जीवन का वास्तविक आनंद ले सकता है। यही रहस्य भोलू समझ जाता है और अंततः अपनी लगन और परिश्रम से वह बुद्धू भोलू से भोलाराम शास्त्री हो जाता है। 

भोलू अब कविताएँ और कहानियाँ भी सुनाने लगा है। उसके द्वारा सुनाई गई कविताएँ जितनी छोटी और रुचिपूर्ण होती हैं, उतनी ही मजेदार और सरल भी। किसी भी बात को खेल-खेल में और बड़े ही मनोरंजक ढंग से कहने का ऐसा अद्भुत कौशल मनु जी के पास है। वे कोई विचार ऊपर से नहीं लादते। जब भोलू ने यह सुंदर कविता सुनाई और सबने मिलकर डांस किया तो बुल्लू खरगोश के अंदर भी सीखने की तीव्र इच्छा पैदा हुई। उसने शरमाते हुए मुटकू से कहा, “मुटकू भाई, अभी-अभी गोलू ने जो कविता सुनाई न, वह बड़ी अच्छी कविता है। बड़ी ही मजेदार। उस पर भोलू भैया का डांस भी बहुत अच्छा था। क्या भोलू भैया एक बार फिर सुना सकते हैं कविता? मैं भी इस पर डांस करना चाहता हूँ।”

यह है सीखने और स्वयं करने की अंत:प्रेरणा। इसके माध्यम से मनु जी यह भी समझाना चाहते हैं कि बच्चा अपने आसपास के परिवेश और उससे जुड़ी वस्तुओं, पशु-पक्षियों और जानवरों से अधिक लगाव रखने के कारण उन्हीं से जल्दी सीखते हैं। बच्चों को पढ़ाई जाने वाली रचनाएँ छोटी, रोचक, नाटकीय उतार-चढ़ाव और सुंदर चित्र वाली हों। साथ ही पढ़ाने का अंदाज भी नाटकीय और मस्ती भरा हो।

उपन्यास में मुटकू बंदर भोलू में सीखने की ऐसी ही ललक और जिज्ञासा पैदा करता है। यही एक अच्छे शिक्षक की पहचान भी है। ऐसे ही खुश्शू खरगोश और लूणी लोमड़ी जो गीत दोहराते हैं, वे बहुत रोचक मजेदार हैं। ये शिक्षा का महत्त्व बताते हैं, अच्छा इनसान बनने की चेतना और चैनो-अमन का संदेश भी देते हैं। मनु जी की कलम का कमाल देखिए, आपकी तबीयत खुश हो खिल जाएगी। गीत की पंक्तियाँ देखिए—
भोलाराम शास्त्री हैं सबसे निराले।
पढ़-पढ़कर साफ किए अँधेरे के जाले,
खोल दिए बंद दिमागों के ताले।
अब अपने इस जंगल में लाएँगे उजाले,
खोलेंगे सदियों से बंद थे जो ताले।
हटाएँगे गंदगी, अँधेरे के जाले,
भोलाराम शास्त्री हैं सचमुच निराले...!

इस उपन्यास की भाषा-शैली बहुत ही प्रभावी और संवेदित करने वाली है। छोटी-छोटी अनेक कहानियों का गुंफन बड़े ही कलात्मक ढंग से किया गया है। किस्सागोई में तो मनु जी को महारत हासिल है और नाम के लिए शब्दों का चयन भी बड़ा ही कौतूहलपूर्ण है। जैसे भोलू भालू, लूनी लोमड़ी, गोल-मटोल मुटकू बंदर, चतुर चीता, मातुंगा-मलिंगा जंगल, भिन्नू भेड़िया और लक्कू लकड़बग्घा आदि। ऐसे शब्द बच्चों में एक खास आकर्षण पैदा करते हैं। भावपूर्ण, चुस्त और छोटे-छोटे संवाद भी बच्चों में जिज्ञासा का जायका बढ़ा देते हैं। बालसुलभ सरल भाषा, लिखने के अलहदा अंदाज का जादू बच्चों के साथ-साथ बड़ों के भी सिर चढ़कर बोलता है।

उपन्यास के विषय में स्वयं मनु जी स्वीकारते हैं कि “भोलू पढ़ता नई किताब’ कुछ अलग ढंग का उपन्यास है, जो पढ़-लिखकर कुछ बनने की सीख देता है। पर उपन्यास में यह संदेश किसी स्थूल उपदेश के रूप में नहीं है, बल्कि पूरी कहानी में इतने महीन धागे की तरह पिरोया हुआ है कि बाल पाठक पढ़ते हुए आनंदित होंगे।”

इस उपन्यास की सबसे सुंदर बात है मुटकू द्वारा भोलू को दिया गया सकारात्मक और ऊर्जा से भरा प्रोत्साहन। बच्चों को कब, क्यों, कैसे और कितना प्रोत्साहन देना है, यह एक श्रेष्ठ बाल मनोवैज्ञानिक और संवेदनशील व्यक्ति समझ सकता है और ये सब गुण लेखक में हैं। मास्टर गीताराम द्वारा दी गई शिक्षा तथा बतख और लोमड़ी का संवाद प्रतीक रूप में इसी ओर संकेत करता है कि अच्छे शिक्षक, अच्छे मित्र और अच्छी पुस्तकों की भूमिका कैसी होनी चाहिए। उपन्यास का अंत भी रोचक है। जो लोग पहले भोलू को बुद्धू समझकर उसका मजाक उड़ाते हुए ताने देते थे, वे सब अब अपने किए पर पछताते हैं और माफी माँगते हैं। अब वे स्वयं भोलू से कहानियाँ सुनकर नई-नई बातें सीखते हैं। खुश्शू खरगोश और लूनी लोमड़ी ने भोलाराम के पास आकर बड़ी विनम्रता से कहा, “भोलू भाई, क्या हम भी किताब पढ़ना सीख सकते हैं? तुम हमें सिखाओगे?” 

आखिर भोलू इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि अच्छी शिक्षा द्वारा ही नई रोशनी और खुशियों के द्वार खुलते हैं। अच्छे प्रोत्साहन द्वारा स्वयं करने और सीखने का जो संस्कार मनु जी ने इस उपन्यास में दिया है, वह सुंदर और अनुकरणीय है।

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इस पुस्तक का तीसरा उपन्यास है, ‘सांताक्लाज का पिटारा’। प्रकाश मनु जी अपने उपन्यासों में ऐसे कथानक और पात्रों को लेते हैं जो हमेशा से बच्चों के आकर्षण और जिज्ञासा का केंद्र रहे हैं। इस प्रयोगात्मक उपन्यास के केंद्र में है, सांताक्लाज की बच्चों के सुखद बचपन को लेकर चिंता! सांताक्लाज और क्रिसमस को लेकर बालजगत में अनेक मिथक भी प्रचलित हैं। बच्चों की हँसी-खुशी के लिए, उनकी निराशा और गरीबी दूर करने तथा उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए सांताक्लाज जी-तोड़ परिश्रम करता हैं।

उपन्यास की शुरुआत प्रकृति के शांत वातावरण और ठंडी हवा में लहराते दरख्तों से घिरे बैठे सांताक्लाज के एक बहुत ही सुंदर, मनभावन गीत से होती है। मंगलाचरण की तरह ऐसा मधुर गीत गुनगुनाकर पाठकों की तबीयत खिल जाएगी—
गाए जा, मन तू गाए जा,
मीठी सी एक तान उठा जा।
सोया है जल शांत नदी का,
सोई-सोई आज हवाएँ,
सोए-सोए पेड़ ओढ़कर
मधुर चाँदनी की यह चादर।

सांताक्लाज भी मस्त-मलंग और घुमक्कड़-फक्कड़ बाबा है, जिसके लिए बच्चों की खुशी से बढ़कर कुछ भी नहीं है। बच्चों को हमेशा खुशियाँ बाँटना क्या छोटा काम है?.. नहीं न! इससे बढ़कर अच्छा और सुंदर काम तो कोई हो ही नहीं सकता। क्रिसमस आते ही सांताक्लाज के तन-मन में अजब-गजब सी ताकत और फुरफुरी आ जाती है। कितना उदार और पवित्र भाव है, सांताक्लाज के हृदय में, आप भी देखिए, “...पूरी दुनिया के बच्चों के लिए रंग-बिरंगे उपहारों, प्यार-दुलार और...और तमाम जादू वाली चीजों का दिन, जबकि हर बच्चे को मेरा इंतजार रहता है। पूरी रात अजब सी भागमभाग...! अजब सी उत्सुकता, रोमांच और प्यारे-प्यारे उपहारों का मेला...! ओह, कितना अनोखा है यह दिन...!”

सोचते हुए सांता के चेहरे पर निर्मल उजास छा जाती है। बच्चों की निर्मल हँसी और मीठी मुसकान से उसकी सारी थकान-उदासी छूमंतर हो जाती है। सांताक्लॉज को दूसरों की मदद करके सुख और आत्मसंतोष प्राप्त होता है, दूसरों की खुशी के लिए वह अपनी पीड़ा-थकान को भी भूल जाता है। उसके लिए इससे बढ़कर ईश्वरीय कार्य कोई हो ही नहीं सकता। मनु जी इस उपन्यास के जरिए एक तरह से आज के समाज और उसके वास्तविक हालात का आईना दिखाने की कोशिश करते हैं। आज भी दुनिया में लाखों-करोड़ों बच्चे हैं, जिनकी मूलभूत आवश्यकताएँ भी पूरी नहीं होती। ये सभी ऐसे ही सांताक्लाजों की बाट जोह रहे हैं।

सांता जब घर से निकलता है तो सबसे पहले उसे हैरी मिलता है जिसके पास एक भी ढंग का खिलौना नहीं है। वह किसी तरह गरीबी में मन मसोसकर जीता है। फिर जॉन मिलता है, जिसकी फीस जमा न होने के कारण स्कूल से नाम कटने वाला है। आगे पिंकी मिलती है जिसे पढ़ाई के नाम पर पिटाई मिलती है। दुबला-पतला रमजानी माता-पिता के झगड़े के कारण घर से भागने को है। और भी न जाने कितने बच्चे ढाबों पर छोटू बनकर बर्तन माँजने को मजबूर है। सांता जब इन दुखी-पीड़ित और बिलखते हुए मजबूर बच्चों को देखता है तो उसके हृदय की पीड़ा किसी महासागर की तरह गहरी होने लगती है। हर बार उसके भीतर से दुख और पीड़ा से लिपटा एक नया गीत जनमता है, देखिए—
दुख हैं सच दुनिया में ऐसे,
कोई उन्हें कहे तो कैसे,
कोई उन्हें सहे भी कैसे,
मेरे स्वर भी रोते-गाते,
कुछ कहते, पर कह न पाते।

यहाँ मुझे निराला जी की कविता की पंक्तियाँ याद आती हैं “दुख ही जीवन की कथा रही...!” मनु जी ने सांता के माध्यम से समाज में अमीर और गरीबों में बढ़ती खाई और बड़े-बड़े धनवान लोगों की असंवेदनशीलता की ओर भी ध्यान दिलाया है। जॉन, हैरी, बीनू, रमजानी, नीलू और पिंकी जैसे बच्चों की स्थिति बताने वाला प्रत्येक संवाद बहुत ही मार्मिक और दिल को झकझोर देने वाला है। एक-एक संवाद से उनकी पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति बड़ी बारीकी से तह-दर-तह खुलती चलती है। रोज-रोज की पिटाई से दुखी होकर लगातार कराहती हुई पिंकी बुदबुदा रही थी, “पता नहीं मैंने क्या कसूर किया है कि सुबह से शाम तक बस पिटाई, पिटाई, पिटाई...! इससे तो अच्छा था कि मैं पैदा ही न हुई होती।” इसी तरह बंगड़-झंगड़ देश में लड़कियों के प्रति असहिष्णुता का भाव वर्तमान समाज की मानसिकता को दर्शाता है। पढ़ाई-लिखाई को लेकर लड़कियों के साथ किया जाने वाला भेदभाव वर्तमान समाज के लिए शर्म की बात है।

संसार भर के बच्चों की पीड़ाओं से सांता बहुत दुखी है और वह दुनिया से बच्चों के लिए केवल एक ही चीज माँगता है कि “हमारी इस दुनिया में बच्चों को प्यार भी नसीब नहीं? अरे भाई, तुम उन्हें कुछ और न दो, मगर प्यार तो दो। बच्चे प्यार के भूखे हैं!” उसके मुख से जो गीत निकलता है, “वह अजीब सी कँपकँपाहट लिए, बड़ा उदास गीत है। दिन भर कूड़ा बीनने, साफ-सफाई करने और ढाबे में छोटू बनकर बर्तन माँजने वाले मैले-कुचैले, दुखी बच्चों का गीत। यह दुनिया के ऐसे सारे बच्चों का गीत था जिन्हें दिनभर डाँट खानी पड़ती है, और कितना कुछ सहना पड़ता है। उनके जीवन में कोई सुख नहीं। उम्मीद की कोई किरण नहीं।”

इतना होने पर भी सांता अपना कार्य नहीं छोड़ता। उसे एक सुंदर भविष्य की उम्मीद है। उसके हृदय में नेकी की अग्नि प्रज्वलित है। उसके हृदय में एक-एक बच्चे की तस्वीर स्पष्ट है कि किसके पास क्या और कैसे पहुँचना है? और सच पूछिए तो सांता बच्चों को वस्तुएँ नहीं, बल्कि खुशियाँ बाँटता है। इस काम में वह दिन-रात नहीं देखता। उसे तो केवल बच्चों की खुशी ही नजर आती है, ताकि प्यारे-प्यारे मासूम बच्चों का दिल टूटें नहीं। वे निराश न हों, हताशा और कुंठा का शिकार न बनें, बल्कि उनका अनगढ़-अल्हड़ बचपन मौज-मस्ती और खुशियों से भरा मुसकराता रहे। और कितना अच्छा हो कि सभी समर्थ व्यक्ति सांताक्लाज बन जाएँ, तो दुनिया वास्तव में स्वर्ग हो जाएगी। इसी आशा में उम्मीदों भरा एक गीत फिर सांता के मन में जनमता है—
तुम धरती की तसवीर बदल दो, बच्चो,
तुम धरती की तकदीर बदल दो, बच्चो।
तुम धरती पर खुशियाँ लहराओगे कल
मुट्ठी में नया सवेरा लाओगे कल,
हर दुखिया को हँसना सिखलाओगे कल,
हर सुखिया का सपना बन जाओगे कल।

बाल उपन्यास होते हुए भी इस उपन्यास का स्वर बहुत अलग और अनोखा है। यथार्थ और कल्पना का ऐसा गुंफन अपने आप में निराला है। मनु जी कहते हैं, कि “आखिर बच्चे इस दुनिया में ईश्वर का ही तो रूप हैं, उसका सबसे भोला और निर्मल रूप...!!” उनका उद्देश्य बच्चों की अलग-अलग परिस्थितियाँ दरशाना नहीं, बल्कि यह बताना है कि ये साहसी बच्चे किस हाल में हैं, फिर भी जीवन जी रहे हैं। वे अँधेरे में भी जीवन की राह टटोल रहे हैं। पर इस हालत में भी वे अच्छे संस्कारों की डोर नहीं छोड़ते। हैरी कहता है, “नहीं-नहीं, मम्मी, ऐसा मत बोलो। मैं आप दोनों की खूब सेवा करूँगा। आप लोग इतनी मेहनत करके मुझे पढ़ा-लिखा रहे हैं।” नीलू का पत्र भी उसकी सहृदयता औ परोपकार का ही प्रमाण है। वह चाहती है कि और लड़कियाँ भी पढ़-लिखकर अपना जीवन सँवारें। बंगड़-झंगड़ देश की लड़की नीलू की चोरी-छिपे पढ़ने की लगन भी वाकई प्रशंसनीय है।

उपन्यास में सांताक्लाज के गीत सामान्य गीत या केवल पीड़ा की अनुभूति नहीं हैं, बल्कि श्रीकृष्ण की गीता जैसे प्रेरणा गीत हैं, जो जीवन में सौंदर्य और चेतना पैदा करते हैं। नई आशा, उम्मीद और सपनों से भरे उद्बोधन गीतों की ऐसी अद्भुत कल्पना हर कोई नहीं कर सकता। ये गीत भी उपन्यास को आकर्षक और प्रभावी बनाते हैं। लेखक बच्चों से भी अपेक्षा करता हैं कि वे स्वयं दूसरों के लिए सांताक्लाज बनकर बच्चों की दुनिया को सुंदर बनाने के यज्ञ में अपनी आहुति दें। सांताक्लाज से प्रेरित होकर सभी दिशाओं से एक आवाज गूँजती है “हम बनेंगे, हम बनेंगे...हम बनेंगे सांता! हम सांता के कामों में मदद करेंगे।” 

आखिर लेखक का उद्देश्य भी तो यही है। बच्चों का सांता बनकर स्वयं आगे आना, दूसरों के सुख-दुख और जरूरतों में सहभागी होना उपन्यास की बहुत बड़ी उपलब्धि है। निश्चय ही करुणा और संवेदना से परिपूर्ण यह बहुत ही रोचक और पठनीय उपन्यास है।

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’गोलू भागा घर से’ इस पुस्तक का अंतिम, बहुत ही जानदार और शानदार उपन्यास है, जो बालमन की इच्छाओं और आकांक्षाओं की बड़ी बारीकी से पड़ताल करता है। इसका कथानक, घटना, प्रसंग और भाव मन को अपने साथ बहा ले जाते हैं। बाल मनोविज्ञान की समझ इस उपन्यास को बहुत ऊँचाई पर ले जाती है। यह उपन्यास चार खंडों में लिखा गया है। पहले खंड में गोलू उर्फ गौरव कुमार के घर से भागने का प्रसंग है। गोलू बचपन से ही गणित को छोड़कर अन्य सभी विषयों में दूसरे बच्चों, यहाँ तक कि अपने भाई आशीष से भी अधिक प्रतिभाशाली है। पर घर हो या स्कूल, उसे झिड़कियाँ ही मिलती हैं। जब गोलू को गणित पढ़ाने वाला टीचर कक्षा में पढ़ाने के बजाय उसे ट्यूशन के लिए तंग करता है, तब गोलू का मन धिक्कार उठता है, “ये मैथ्सू सर जैसे मास्टर जी क्या अध्यापक कहलाने लायक हैं? ये तो व्यापारियों से भी गए बीते हैं। एकदम बेईमान। ...पैसे के लालची!”

अब परिवार की भूमिका देखिए। गोलू को गणित समझ में न आने के कारण को समझने का प्रयास कोई नहीं करता। ऊपर से डाँट-फटकार, अपमान और बात-बात पर रोका-टोकी। यह सब बच्चे को गणित जैसे कठिन समझे जाने वाले विषय से बहुत दूर ले जाता है। पापा गोलू से कहते हैं, “इतना नालायक तू कहाँ से आ गया हमारे घर में? मुझे तो शर्म आ रही है। एक तेरा आशीष भैया है कि सारे टीचर उसे प्यार से याद करते हैं और एक तू है, तू... नालायक कहीं का!” ऐसी स्थिति में गणित की भयंकरता को लेकर मनु जी ने जो उपमाएँ दी हैं, देखिए जरा, “...आज पहली बार उसे शब्द और अक्षर नहीं दिखाई पड़ रहे थे। वे मानो कीड़े-मकोड़े और जहरीले साँपों में बदल गए थे और उसे डसने लगे थे। हर शब्द, हर अक्षर के पीछे बस एक ही आवाज सुनाई देती थी, गोलू... गोलू... भाग भाग...!!” यहाँ तक कि गणित एक सींग वाला खूँखार पशु बनकर हमेशा उसे डराने लगता है। 

गोलू की मनःस्थिति को लेकर मनु जी ने कितनी सार्थक बात लिखी है कि “मगर वह रोज-रोज देखता था कि उसकी इच्छाओं का तो कोई मतलब ही नहीं। उसे तो वही करना है, जो सब करते हैं। तब दुख के मारे उसकी आँखों में आँसू आ जाते। यही चक्कर-पर-चक्कर आखिर इतना बड़ा घनचक्कर हो गया कि गोलू एक चक्रव्यूह में घिर गया। इस चक्रव्यूह से लड़ने की लाख कोशिशें कीं, नहीं लड़ पाया तो आखिर सब कुछ छोड़-छाड़कर भाग गया।” यहाँ गोलू भगोड़ा नहीं है, न ही उसका कोई कसूर है। कसूर है तो एक खास तरह की व्यवस्था का, जो बच्चों के दिल की बात नहीं समझती। इसी कारण गोलू जैसे बच्चे घर से भागते हैं।

दूसरे खंड में गोलू के कुछ सपने निर्मित होते हैं और उसका भावी जीवन एक नया आकार लेने लगता है। यहाँ गोलू का परिचय एक अलग तरह की दुनिया से होता है, जहाँ एक तरफ गिरीश मोहन जैसे सहृदय, गुरु तुल्य मार्गदर्शक और सच्चे हितैषी हैं, वही रंजीत जैसे अतृप्त आकांक्षी नवयुवक भी हैं जो रातों-रात अमीर बनने के सपने देखते हैं। पर रंजीत का गोलू के जीवन में आना बहुत कुछ सकारात्मक रहा। गोलू में नया काम करने का आत्मविश्वास जागा। रंजीत के बिना गोलू शायद ही दिल्ली से इतना परिचित हो पाता और अपने लिए काम ढूँढ़ पाता।

इस दुनिया का एक कुरूप पहलू भी उपन्यास में उजागर होता है कि आप कितनी ही मेहनत, ईमानदारी और लगन से काम करते रहें, फिर भी सरिता और सक्सेना मैडम जैसी सोच वाले प्राणी आपको सहज नहीं रहने देंगे। देखिए, मालती सक्सेना की फटी हुई, कर्कश आवाज में गोलू को साफ सुनाई दे रहा था कि “ये नौकर भी ऐसे ही होते हैं, बेईमान, चोर, बदमाश किस्म के...लफंगे! तू कहाँ फँस गई सरिता?” मनु जी ने निर्धन, असहाय और मजबूर लोगों के प्रति वर्तमान समाज की संकुचित मानसिकता को इन लोगों के माध्यम से प्रकट किया है। रंजीत की दूसरी माँ का आना, पागलदास जैसे कलाकार का साथ और लक्खा बादशाह जैसे लोगों का मिलना रंजीत के जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव ले आता है। 

रंजीत की कहानी और अच्छे-बुरे अनुभवों से गोलू बहुत कुछ सीखता है। गोलू को अहसास होता है कि दुनिया में केवल वही अकेला दुखी नहीं है, बल्कि उससे अधिक दुखी, संघर्षों में तपे, कदम-कदम पर धोखा खाने वाले और भी बहुत लोग हैं। गोलू शीघ्र ही रंजीत के साथ रहते हुए उसके दुर्गुणों को पहचान लेता है और शायद इसीलिए उसके साथ मुंबई जाने का रुख नहीं करता। गोलू रंजीत की तरह अति महत्त्वाकांक्षी नहीं है, बल्कि धैर्यवान है, आशावादी है। उसके पास अच्छे-बुरे की समझ और विवेक है। इसीलिए वह परिश्रम करके जीविका चलाता है। इससे उसके व्यक्तित्व को एक नई पहचान मिलती है।

तीसरे खंड ‘एक अधूरी दुनिया में गोलू’ में आकर लेखक का उद्देश्य पूरा होता है। यहाँ आकर गोलू के जीवन में एक बड़ा भीषण मोड़ आता है और वही हुआ जिससे वह अब तक बचता रहा था। गोलू अनजाने में अपराधियों के एक गिरोह में फँस जाता है। मिस्टर डिकी, नैन्सी क्रिस्टल, रफीक भाई और मिस्टर विन पॉल आदि इस गिरोह के सक्रिय सदस्य हैं। गोलू धोखे से इस गिरोह में फँस तो जाता है, पर उसे भीतर से संतोष नहीं मिलता। उसकी आत्मा उसे कचोटती है। गोलू शीघ्र ही अपनी सूझ-बूझ से इन लोगों की वास्तविकता का पता लग लेता है। वहाँ सफाई करने वाली रामप्यारी की ममता भरी प्रेरणा भी उसे इस कुचक्र से निकलने में मदद करती है। गोलू वापस घर लौटना चाहता है, लेकिन उससे पहले अपराधियों के षड्यंत्र का न केवल पर्दाफाश करता है, बल्कि उन्हें पुलिस से पकड़वाता भी है। उसके भीतर एक गहरी छटपटाहट है, “उफ, चंद सिक्कों के लिए देश को बेचना! देश की इज्जत, आबरू और आजादी को बेचना! इससे नीच काम भी कोई और हो सकता है? गोलू को लगा, उसके भीतर भयानक आग की लपटें उठ रही हैं और जब तक वह इस पूरे षड्यंत्र का परदाफाश नहीं करता, उसे चैन नहीं पड़ेगा।”

यहाँ गोलू के साहस और आत्मबल की प्रशंसा करनी चाहिए। इस गिरोह में शामिल होने पर वह स्वयं को पूरे देश और समाज का दोषी मानता है। इसलिए पुलिस डीआईजी रहमान चाचा से आग्रह करता है कि “कृपया मुझे जल्दी से अरेस्ट कर लीजिए। मेरे पास कुछ जरूरी सूचनाएँ हैं—गोपनीय सूचनाएँ, जो इस देश की सुरक्षा को संकट में डाल सकती हैं। प्लीज जल्दी कीजिए, अरेस्ट मी!” यहाँ गोलू नई पीढ़ी के लिए एक आदर्श प्रेरणा-स्रोत बनकर उभरता है। उसकी यही सूझ-बूझ और बहादुरी पूरे देश में उसे प्रशंसा का पात्र बना देती है। फिर रंजीत जैसे भटके हुए युवक की आत्मस्वीकृति और गोलू के प्रति कृतज्ञ होना बहुत बड़ी उपलब्धि है। गोलू को भेजे गए एक पत्र में रंजीत लिखता है, “गोलू तुमने मेरी आँखें खोल दीं। मैं जिस बुरे धंधे के आकर्षण में मुंबई गया था, अब उससे मुझे घृणा हो गई है। मैं भी अब तुम्हारे जैसा सीधा-साधा, प्यार और इनसानियत का जीवन जीना चाहता हूँ।”

उपन्यास का अंतिम भाग बहुत ही मार्मिक है और हमारी संवेदना को परिष्कृत करता है। गोलू की संवेदना और सरोकार भी बहुत व्यापक हैं। वह अपनी पूरी कहानी लिखता है और उसे मनु अंकल की सहायता से ‘नया सवेरा’ में प्रकाशित करवाना चाहता है। रहमान चाचा का मिलना, उसे चिट्टी लिखना और फिर गोलू का घर लौटना उपन्यास के बहुत ही भावपूर्ण और संवेदित करने वाले प्रसंग है। पढ़ते-पढ़ते आँखें भर आती हैं। जैसे पाठक भी पात्रों के सुख-दुख के भावों में बह रहे हों।

उपन्यास की किस्सागोई के साथ-साथ कई प्रसंग उसे बहुत स्वाभाविक और प्रभावी बना देते हैं। यथार्थ और कल्पना का ऐसा अद्भुत सामंजस्य पढ़ते ही बनता है। पात्र और प्रसंग के अनुकूल सहज-सरल भाषा मनु जी की सबसे बड़ी उपलब्धि है। विपरीत और विकट परिस्थितियों में भी बुराई से बचने की अंतःप्रेरणा पैदा करने का कौशल मनु जी के पास है। किसी किशोर वय बच्चे की व्यथा-कथा को इतनी संजीदगी से लिखना बहुत बड़ी बात है। आत्मकथात्मक शैली में लिखे इस उपन्यास में गोलू स्वयं लेखक मनु जी हैं। भूमिका में मनु जी स्वीकारते भी हैं कि, “असल में बचपन में मैं किसी बात पर नाराज होकर घर छोड़कर चला गया था। उस समय मेरे मन में अपने ढंग से जीवन जीने का सपना था और वही मेरे पैरों को दूर उड़ाए लिए जा रहा था। पर दो-तीन दिनों में ही पता चल गया कि वे घरवाले, जिनसे रूठकर मैं घर छोड़कर जा रहा हूँ, सचमुच कितने अच्छे हैं और उनके बिना इस दुनिया में जीना कितना मुश्किल है। हालाँकि उस समय मन में जो आँधी-अंधड़ चले, वे ही ‘गोलू भागा घर से’ उपन्यास की शक्ल में सामने आए।” 

अपने भोगे हुए यथार्थ को लिखना इतना आसान नहीं है। इसके लिए एक बहुत बड़ी यंत्रणा, एक गहरे अंतर्द्वंद से गुजरना पड़ता है। उसी त्रासदी को वर्षों बाद दोबारा जीना कितना कष्टकर होता है, यह तो स्वयं लेखक ही बता सकता है। इसी कारण कथानक इतना स्वाभाविक है।

कुल मिलाकर पुस्तक में शामिल चारों बाल उपन्यासों की अपनी अलग-अलग विशेषताएँ हैं और कोई उपन्यास किसी दूसरे से कमतर नहीं है। ये रोचक और कौतूहलपूर्ण उपन्यास केवल बच्चों को ही नहीं, बड़े पाठकों को भी नई ऊर्जा और प्रेरणा देते हैं, साथ ही जीवन जीने की राह दिखाते हैं। उम्मीद है, बच्चे इन्हें बड़े मन से पढ़ेंगे और बहुत कुछ सीखेंगे भी।
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समीक्षक परिचय: अशोक बैरागी

जन्म तिथि: 6 मई 1979
स्थान: ढुराना (सोनीपत) हरियाणा
शिक्षा: एम. ए. हिन्दी, बी. एड, प्रभाकर, नेट/ जेआरएफ - जून 2007। पी. एच. डी.: "हिन्दी पत्रकारिता को अज्ञेय का अवदान" विषय पर गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार
प्रकाशन: 'साहित्य के पथ प्रदर्शक' (साक्षात्कार- हरियाणा साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित) 
अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानी, लघुकथाएंँ, समीक्षा, संस्मरण, आलेख, पत्र और साक्षात्कार प्रकाशित।
पता: ग्राम व डाकघर ढुराना, तहसील -गोहाना, जिला सोनीपत - 131306 हरियाणा

1 comment :

  1. आदरणीय, अनुराग शर्मा मेरी समीक्षा को ‘सेतु' में शामिल करने के लिए बहुत बहुत आभार। मैंने इसे पूरे मन से लिखा है। मनु जी का भरपूर सहयोग मिला। मनु जी अद्भुत जादूगर और कुशल गुरु है। उनका सिखाने और समझाने का तरीका भी अनुपम है। यह मेरा सौभाग्य है कि मैं उनका शिष्य हूँ।मैं सदैव उनका ऋणी रहूँगा।

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